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The Undiscovered Self — Transcript

by SyllabuswithRohit · 22,584 words · 3,092 segments · language en · Watch on YouTube

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  1. 0:01कार्ल यंग एक स्विस साइकेट्रिस्ट थे।
  2. 0:04जिन्होंने साइको एनालिसिस को एक नया
  3. 0:06डायरेक्शन दिया। उन्होंने माइंड के ऐसे
  4. 0:09पार्ट्स पर काम किया जिनके बारे में लोग
  5. 0:11अक्सर अनअवेयर होते हैं। जैसे अनकॉन्शियस,
  6. 0:14आर्कटाइप्स और
  7. 0:16इंडिविजुएशन। उनकी यह किताब द अनडिसकवर्ड
  8. 0:20सेल्फ एक वार्निंग जैसी है मॉडर्न इंसान
  9. 0:22के लिए। स्पेशली उन समय के लिए जब सोसाइटी
  10. 0:26ज्यादा ही पॉलिटिकल या साइंटिफिक हो जाती
  11. 0:28है और इंसान अपनी असली पहचान भूल जाता
  12. 0:33है। इस किताब में युंग कहते हैं कि अगर एक
  13. 0:36इंसान अपने अंदर के सच को नहीं समझता तो
  14. 0:40वह बाहर के आइडियाज जैसे मास मूवमेंट्स,
  15. 0:43प्रोपेगेंडा या कलेक्टिव आईडियोलॉजीस का
  16. 0:45आसानी से शिकार बन सकता है।
  17. 0:49यंग का मानना है कि साइकोलॉजिकल अवेयरनेस
  18. 0:52सिर्फ पर्सनल ग्रोथ के लिए नहीं बल्कि
  19. 0:54सोसाइटी को बैलेंस में रखने के लिए भी
  20. 0:57जरूरी
  21. 0:59है। वो इस बुक में एक्सप्लोर करते हैं कि
  22. 1:02कैसे हर इंसान के अंदर एक ऐसा ट्रू सेल्फ
  23. 1:04होता है जो अक्सर दर्द, रिप्रेशन और
  24. 1:07एक्सटर्नल प्रेशर के नीचे छिप जाता है।
  25. 1:11उनका फोकस यह है कि हर इंडिविजुअल को अपने
  26. 1:13आप को डीपली समझना चाहिए बिना किसी सोशल
  27. 1:16मास्क के।
  28. 1:18यह किताब एक तरह से स्पिरिचुअल भी है और
  29. 1:21एकिस्टेंशियल भी। जिसमें यंग सेल्फ को एक
  30. 1:24सेक्रेट रिस्पांसिबिलिटी के रूप में देखते
  31. 1:27हैं। यह सिर्फ एक साइकोलॉजिकल टेक्स्ट
  32. 1:30नहीं है बल्कि यह एक इनर मिरर है। युंग यह
  33. 1:35कहना चाहते हैं कि जब तक हम अपने आप को
  34. 1:37नहीं जानते तब तक हम दुनिया को भी ठीक से
  35. 1:40नहीं समझ सकते।
  36. 1:42तो आइए इस किताब को लाइन बाय लाइन समझने
  37. 1:46की कोशिश करते
  38. 1:50हैं। आगे क्या होगा? यह सवाल हमेशा से
  39. 1:55लोगों के दिमाग में रहता आया है। लेकिन हर
  40. 1:57दौर में इसका लेवल अलग होता है। जब दुनिया
  41. 2:01में फिजिकल, पॉलिटिकल, इकोनॉमिक या
  42. 2:03स्पिरिचुअल तकलीफ होती है तब लोग ज्यादा
  43. 2:06बेचैन होकर फ्यूचर के बारे में सोचने लगते
  44. 2:09हैं। तभी कई तरह के ड्रीम्स, परफेक्ट
  45. 2:13दुनिया के सपने और दुनिया के खत्म होने
  46. 2:16वाली सोच ज्यादा होने लगती है। जैसे कि
  47. 2:19क्रिश्चियन एरा के शुरू में अगस्तन टाइम
  48. 2:22में लोगों को लगता था कि कुछ बड़ा होने
  49. 2:24वाला है। या फिर जब पहला मिलेनियम खत्म हो
  50. 2:28रहा था तब वेस्टर्न वर्ल्ड में भी लोगों
  51. 2:29का सोचने का तरीका बदल गया था।
  52. 2:32आज जब दूसरा मिलेनियम खत्म होने के करीब
  53. 2:36है। हम फिर से एक ऐसे टाइम में जी रहे हैं
  54. 2:39जहां लोगों के दिमाग में दुनिया के तबाह
  55. 2:41होने वाले इमेजेस भर गए हैं। आयरन कर्टेन
  56. 2:46नाम का जो सिंबल है जो दुनिया को दो
  57. 2:48हिस्सों में बांट रहा है। इसका क्या मतलब
  58. 2:51है?
  59. 2:52अगर हाइड्रोजन बम चालू हो जाए या फिर
  60. 2:56स्टेट का स्पिरिचुअल और मोरल अंधेरा पूरे
  61. 2:59यूरोप में छा जाए तो हमारी सभ्यता का क्या
  62. 3:02होगा और इंसान का क्या होगा? इस थ्रेट को
  63. 3:06हल्के में लेना गलती होगी।
  64. 3:09वेस्टर्न कंट्रीज में कई ऐसे छोटे-छोटे
  65. 3:12ग्रुप्स हैं जो छुपके से आग लगाने के लिए
  66. 3:14तैयार हैं। यह ग्रुप्स हमारे ह्यूमन
  67. 3:17वैल्यूस और जस्टिस के कांसेप्ट का यूज
  68. 3:20करके अपने डिस्ट्रक्टिव आइडियाज फैला रहे
  69. 3:22हैं। इनके आइडियाज को बस एक छोटी सी
  70. 3:26पपुलेशन का क्रिटिकल थिंकिंग और मेंटल
  71. 3:28स्टेबिलिटी ही रोक सकता है। लेकिन यह लेयर
  72. 3:31कितनी स्ट्रांग है इसको ज्यादा समझना भी
  73. 3:34गलत होगा।
  74. 3:36हर कंट्री में यह अलग होती है। लोगों की
  75. 3:39नेचर और वहां की एजुकेशन सिस्टम पर डिपेंड
  76. 3:42करता है। और पॉलिटिकल या इकोनॉमिक
  77. 3:44प्रॉब्लम से भी यह आसानी से हिल जाती है।
  78. 3:48अगर हम पब्लिक वोटिंग को एक स्केल माने तो
  79. 3:50ज्यादा से ज्यादा 40% लोगों तक ही यह
  80. 3:53क्रिटिकल थिंकिंग पहुंचती है।
  81. 3:57लेकिन अगर आप नेगेटिव सोच से देखें तो यह
  82. 4:01भी ज्यादा लग सकता है क्योंकि लॉजिक और
  83. 4:03डीप सोच इंसान की एक खासियत नहीं होती और
  84. 4:07जहां होती भी है वहां भी यह हमेशा
  85. 4:09स्ट्रांग नहीं रहती स्पेशली जब ग्रुप बड़ा
  86. 4:12हो जाता है बॉडी क्राउड इंडिविजुअल के
  87. 4:16समझने की एबिलिटी को दबा देती है और अगर
  88. 4:19कॉन्स्टिट्यूशनल स्टेट कभी वीक पड़ गया तो
  89. 4:22यह सीधा एक हार्ड और डिक्टेटर टाइप रूल
  90. 4:26में बदल सकता
  91. 4:28है। जब तक लोगों के इमोशंस एक सर्टेन
  92. 4:31लिमिट तक हैं, तब तक रीजन का यूज़ हो सकता
  93. 4:34है। लेकिन जैसे ही इमोशंस बहुत ज्यादा बढ़
  94. 4:37जाते हैं, तब रीजन का कोई असर नहीं रहता।
  95. 4:40उसकी जगह स्लोगंस और अजीबोगरीब सपने आ
  96. 4:44जाते
  97. 4:45हैं। इसका मतलब यह है कि एक ग्रुप जैसी
  98. 4:48मेंटल स्टेट बन जाती है। जैसे एक
  99. 4:50साइकोलॉजिकल बीमारी सब में फैल गई हो। ऐसे
  100. 4:54स्टेट में वह लोग ऊपर आ जाते हैं जो
  101. 4:57नॉर्मल रूल्स के टाइम छुप जाते हैं। यह
  102. 5:00लोग कोई रेयर या सिर्फ जेल या पागलखानों
  103. 5:02में मिलने वाले लोग नहीं होते।
  104. 5:06जितने लोग ओपनली इनसेन दिखते हैं उनसे कम
  105. 5:08से कम 10 गुना ज्यादा लोग ऐसे होते हैं जो
  106. 5:12चुपके से मेंटली अनस्टेबल होते हैं लेकिन
  107. 5:15दिखाते नॉर्मल है। उनके थॉट्स और बिहेवियर
  108. 5:19पर ऐसे प्रॉब्लम्स का इफेक्ट होता है जो
  109. 5:21उन्हें खुद भी नहीं पता होता। ऐसे लोगों
  110. 5:24का डाटा मेडिकल वर्ल्ड के पास नहीं होता
  111. 5:27और ऑब्वियस बात है क्यों नहीं होता।
  112. 5:30लेकिन अगर यह लोग टोटल पापुलेशन का छोटा
  113. 5:32पार्ट भी हो तो भी यह लोग डेंजरस होते
  114. 5:35हैं। उनका माइंड एक एक्साइटेड क्राउड जैसा
  115. 5:39होता है जहां सब कुछ इमोशंस और फेक सपनों
  116. 5:42से चलता है। और जब सब एक जैसे सोचने लगते
  117. 5:45हैं तो यह लोग उस एनवायरमेंट में
  118. 5:48परफेक्टली फिट हो जाते हैं। उन्हें उस
  119. 5:51सिचुएशन का लैंग्वेज भी आता है और उसको
  120. 5:53कैसे हैंडल करना है वह भी।
  121. 5:56उनके स्ट्रेंज और गुस्से वाले आईडियाज
  122. 5:59क्राउड के इरेशनल सोच से मिल जाते हैं।
  123. 6:02वहां उनका आईडिया ग्रो करता
  124. 6:05है क्योंकि वह उन फीलिंग्स और गुस्से को
  125. 6:08बाहर लाते हैं जो नॉर्मल लोग यूजुअली छुपा
  126. 6:11के रखते हैं रीजन और लॉजिक के
  127. 6:15पीछे। इसलिए चाहे यह लोग थोड़े ही क्यों
  128. 6:18ना हो। यह बाकी लोगों के लिए डेंजर बन
  129. 6:20जाते हैं क्योंकि सो कॉल्ड नॉर्मल लोग भी
  130. 6:23अपने आप को पूरी तरह नहीं
  131. 6:25समझते। ज्यादातर लोग सेल्फ नॉलेज का मतलब
  132. 6:29अपने कॉन्शियस ईगो को समझने से लगाते हैं।
  133. 6:32जिस भी इंसान को थोड़ा भी ईगो का होश होता
  134. 6:35है, वह सोचता है कि उसे अपने बारे में सब
  135. 6:38पता है। लेकिन ईगो सिर्फ अपने ही थॉट्स और
  136. 6:41फीलिंग्स को जानता है। अनकॉन्शियस पार्ट
  137. 6:43और उसके कंटेंट्स को नहीं।
  138. 6:48लोग अपने सेल्फ नॉलेज का लेवल इस बात से
  139. 6:50नापते हैं कि उनके आसपास के लोग अपने बारे
  140. 6:53में क्या जानते हैं। लेकिन वह असली
  141. 6:55साइकोलॉजिकल फैक्ट्स को नहीं जानते जो
  142. 6:57मोस्टली उनसे छुपे होते
  143. 7:00हैं। इस केस में साइकी बिल्कुल बॉडी की
  144. 7:04तरह काम करती है। जैसे बॉडी के अंदर क्या
  145. 7:06चल रहा है उसके बारे में आम आदमी को
  146. 7:09ज्यादा नहीं पता होता।
  147. 7:11जबकि वह उस बॉडी में जीता है। उसके साथ
  148. 7:14रहता है। फिर भी उसका ज्यादा हिस्सा उसके
  149. 7:16लिए अननोन ही रहता है। और जो कुछ बॉडी के
  150. 7:20बारे में पता भी होता है उसके लिए स्पेशल
  151. 7:23साइंटिफिक नॉलेज चाहिए होती है। और बाकी
  152. 7:26जो अभी तक पता भी नहीं चला वह भी एकिस्ट
  153. 7:29करता है। इसलिए जो चीज सेल्फ नॉलेज के नाम
  154. 7:33से फेमस है वह एक्चुअली एक बहुत लिमिटेड
  155. 7:35नॉलेज
  156. 7:36है। यह मोस्टली सोशल फैक्टर्स पर डिपेंड
  157. 7:39करती है कि हम अपने साइकी के बारे में
  158. 7:41क्या फील करते
  159. 7:42हैं। इसी वजह से लोग अक्सर यह सोच लेते
  160. 7:46हैं कि ऐसा तो हमारे साथ होता ही नहीं।
  161. 7:48हमारे फैमिली में तो यह कभी नहीं होता या
  162. 7:51हमारे फ्रेंड्स ऐसा नहीं
  163. 7:54है। और कभी-कभी लोग यह भी मान लेते हैं कि
  164. 7:57उनमें कुछ खास क्वालिटी है। जबकि वह सिर्फ
  165. 8:00सच को छुपाने का एक तरीका होता है। इस
  166. 8:04अनकॉन्शियस ज़ोन के अंदर जहां हमारी
  167. 8:06कॉन्शियस थिंकिंग का असर नहीं चलता, हम
  168. 8:09बिल्कुल ओपन और वनरेबल होते
  169. 8:12हैं। हम हर तरह के इनफ्लुएंसेस और मेंटल
  170. 8:16इनफेक्शंस के लिए खुले पड़े होते
  171. 8:18हैं। जैसे हर डेंजर से बचने के लिए हमें
  172. 8:22उसके बारे में पहले से पता होना चाहिए।
  173. 8:25वैसे ही यह भी थोड़ा रोका जा सकता है जब
  174. 8:28हमें पता हो कि यह हम पर कैसे कब और कहां
  175. 8:32से अटैक
  176. 8:33करेगा। क्योंकि सेल्फ नॉलेज का मतलब होता
  177. 8:36है स्पेसिफिक चीजों को समझना। तो सिर्फ
  178. 8:40थ्यरी से ज्यादा मदद नहीं मिलती।
  179. 8:43जितनी ज्यादा थ्यरी यूनिवर्सल बनने की
  180. 8:45कोशिश करती है, उतना ही वह रियल
  181. 8:47इंडिविजुअल फैक्ट से दूर हो जाती
  182. 8:51है। जो भी थ्योरी एक्सपीरियंस पे बेस्ड
  183. 8:54होती है, वह स्टैटिस्टिकल होती है। मतलब
  184. 8:56एक एवरेज क्रिएट करती है। यह एवरेज
  185. 8:59एक्सट्रीम्स को हटा देता है और उनकी जगह
  186. 9:01एक बीच का एब्स्ट्रैक्ट नंबर दे देता है।
  187. 9:04वो नंबर वैलिड तो होता है, लेकिन जरूरी
  188. 9:07नहीं कि रियलिटी में वैसे केसेस एक्चुअली
  189. 9:10एक्सिस्ट करें। फिर भी थ्यरी उस एवरेज को
  190. 9:13एक फाइनल फैक्ट की तरह प्रेजेंट करती
  191. 9:16है। जो एक्सट्रीम केसेस होते हैं चाहे वह
  192. 9:19कितने भी रियल क्यों ना हो वो थ्यरी के
  193. 9:22रिजल्ट में दिखते ही नहीं क्योंकि वह एक
  194. 9:25दूसरे को कैंसिल कर देते हैं। मान लीजिए
  195. 9:29मैं एक पत्थर के ढेर में हर पत्थर का वेट
  196. 9:32निकालता हूं और एवरेज आता है 145 ग्राम।
  197. 9:36तो इससे मुझे असली पत्थर के नेचर के बारे
  198. 9:39में कुछ खास पता नहीं
  199. 9:41चलता। अगर कोई सोचे कि अब वह पहला पत्थर
  200. 9:45उठाएगा और वह 145 ग्राम का होगा तो उससे
  201. 9:48बड़ी डिसपॉइंटमेंट
  202. 9:51होगी। हो सकता है कि कितने भी ढेर वह
  203. 9:54ढूंढे उसे एक भी पत्थर एक्सजेक्टली 145
  204. 9:57ग्राम का ना मिले।
  205. 10:00स्टैटिस्टिक्स फैक्ट्स को एक आइडियल एवरेज
  206. 10:02के रूप में दिखाता है। लेकिन वह हमें उनकी
  207. 10:05रियल इमेज नहीं दिखाता। वो रियलिटी का एक
  208. 10:08सही पार्ट जरूर दिखाता है। लेकिन वो
  209. 10:10एक्चुअल ट्रुथ को गलत तरीके से भी
  210. 10:12रिप्रेजेंट कर सकता
  211. 10:14है। यह प्रॉब्लम स्पेशली तब होती है जब
  212. 10:17थ्यरी पूरी तरह स्टैटिस्टिक्स पे बेस्ड
  213. 10:19हो। लेकिन रियल फैक्ट्स की खासियत उनका
  214. 10:22इंडिविजुअल होना
  215. 10:24है। सीधी बात यह है कि असली पिक्चर उन
  216. 10:27एक्सेप्शनंस से ही बनती है जो किसी रूल
  217. 10:30में फिट नहीं बैठती। इसका मतलब यह है कि
  218. 10:32जो सच है उसमें ज्यादातर चीजें रेगुलर
  219. 10:35नहीं बल्कि अलग और यूनिक होती हैं। यह बात
  220. 10:39हमेशा याद रखनी चाहिए जब भी कोई थ्यरी
  221. 10:42सेल्फ नॉलेज को गाइड करने की बात करती है।
  222. 10:46कोई भी थ्यरी सेल्फ नॉलेज का बेस नहीं बन
  223. 10:49सकती क्योंकि जिसका नॉलेज लेना है वह एक
  224. 10:51इंसान है। एक यूनिक और रेगुलर रूल से हटके
  225. 10:54चीज।
  226. 10:58इसलिए एक इंडिविजुअल को समझने के लिए
  227. 11:01यूनिवर्सल या रेगुलर फीचर्स काम नहीं करते
  228. 11:04बल्कि उसकी यूनिकनेस ही जरूरी होती है। वो
  229. 11:08इंसान बार-बार आने वाली कोई यूनिट नहीं
  230. 11:10है। वो एक ऐसी चीज है जिसे किसी और चीज से
  231. 11:14कंपेयर भी नहीं किया जा सकता।
  232. 11:17लेकिन एक इंसान एक स्पीशीज का मेंबर भी
  233. 11:19है। इसलिए उसे एक स्टैटिस्टिकल यूनिट की
  234. 11:23तरह डिस्क्राइब करना जरूरी हो जाता है।
  235. 11:26अगर ऐसा नहीं करेंगे तो उसके बारे में
  236. 11:28जनरल बात ही नहीं की जा
  237. 11:32सकती। इस कारण से एंथ्रोपोलॉजी या
  238. 11:35साइकोलॉजी जैसी फील्ड्स में एक जनरल
  239. 11:37आईडिया बनता है। जिसमें इंसान को एक एवरेज
  240. 11:40यूनिट के रूप में दिखाया जाता है। जिसमें
  241. 11:42उसके सब इंडिविजुअल फीचर्स हटा दिए जाते
  242. 11:45हैं।
  243. 11:47लेकिन वही इंडिविजुअल फीचर्स सबसे
  244. 11:49इंपॉर्टेंट होते हैं अगर किसी इंसान को
  245. 11:51समझना
  246. 11:52हो। अगर मैं किसी एक इंसान को सच में
  247. 11:56समझना चाहता हूं तो मुझे एवरेज इंसान के
  248. 11:58बारे में जो साइंटिफिक नॉलेज है उसे साइड
  249. 12:01में रखना पड़ेगा। मुझे सारी थ्यरीज छोड़कर
  250. 12:04एक बिल्कुल फ्रेश और बिना बायस वाले
  251. 12:07एटीट्यूड अडॉप्ट करना पड़ेगा। मैं सिर्फ
  252. 12:10एक खुले और फ्री माइंड के साथ ही यह काम
  253. 12:12कर सकता हूं।
  254. 12:14लेकिन अगर मुझे जनरल मैनकाइंड के बारे में
  255. 12:17कुछ समझना है तो उसके लिए पूरी ह्यूमैनिटी
  256. 12:20के बारे में पहले से बहुत सारी नॉलेज
  257. 12:22चाहिए होती
  258. 12:23है। अगर बात किसी दूसरे इंसान को समझने की
  259. 12:27हो या खुद को तो दोनों केसेस में मुझे
  260. 12:29अपने सब थ्योरिटिकल आइडियाज को साइड में
  261. 12:31रखना पड़ता
  262. 12:33है। आजकल साइंटिफिक नॉलेज को लोग बहुत
  263. 12:36रिस्पेक्ट देते हैं और मॉडर्न इंसान के
  264. 12:38लिए यही एक असली स्पिरिचुअल और
  265. 12:40इंटेलेक्चुअल अथॉरिटी बन गई है। इसलिए जब
  266. 12:44मुझे किसी इंडिविजुअल को समझना होता है तो
  267. 12:46मुझे साइंटिफिक नॉलेज से आंख मूंद लेनी
  268. 12:49पड़ती है। जैसे किसी पावरफुल चीज के
  269. 12:52अगेंस्ट
  270. 12:53जाना। यह आसान काम नहीं है। क्योंकि
  271. 12:55साइंटिफिक थिंकिंग अपनी रिस्पांसिबिलिटी
  272. 12:58को आसानी से नहीं छोड़ती।
  273. 13:00और अगर साइकोलॉजिस्ट एक डॉक्टर भी है जो
  274. 13:03सिर्फ पेशेंट को साइंटिफिकली क्लासिफाई
  275. 13:06नहीं करना चाहता बल्कि उसे एक इंसान के
  276. 13:08रूप में भी समझना चाहता है तो उसके सामने
  277. 13:11दो अलग-अलग और ऑोजिट ड्यूटीज आ जाती हैं।
  278. 13:14एक तरफ नॉलेज होता है और दूसरी तरफ
  279. 13:17अंडरस्टैंडिंग दोनों एक दूसरे से टकराती
  280. 13:20हैं। यह प्रॉब्लम सिर्फ एक ऑप्शन छोड़ के
  281. 13:23सॉल्व नहीं होती। इसमें दोनों चीजें एक
  282. 13:25साथ सोचनी पड़ती है। एक काम करते हुए
  283. 13:28दूसरे को भी नजर में रखना पड़ता
  284. 13:32है। सच तो यह है कि नॉलेज के फायदे
  285. 13:35अंडरस्टैंडिंग के अगेंस्ट जाते हैं। इसलिए
  286. 13:38जो रिजल्ट आता है वह थोड़ा पैराडॉक्सिकल
  287. 13:41होता है। साइंस के अनुसार एक इंसान सिर्फ
  288. 13:45एक यूनिट है जो बार-बार रिपीट होता रहता
  289. 13:48है और उसे किसी अल्फाबेट के लेटर से भी
  290. 13:50रिप्रेजेंट किया जा सकता है। लेकिन समझने
  291. 13:54के लिए वही इंसान जो अपनी सारी सिमिलरिटीज
  292. 13:57और रेगुलर पैटर्न से अलग है, वही सबसे
  293. 14:00रियल और इंपॉर्टेंट ऑब्जेक्ट है स्टडी
  294. 14:02करने के लिए।
  295. 14:05डॉक्टर को यह कंट्राडिक्शन अच्छे से समझ
  296. 14:07लेना चाहिए। एक तरफ उसके पास साइंटिफिक
  297. 14:10ट्रेनिंग का स्टैटिस्टिकल नॉलेज होता है।
  298. 14:12लेकिन दूसरी तरफ उसके सामने एक बीमार
  299. 14:15इंसान होता है। जो
  300. 14:17स्पेशली जब उसकी तकलीफ साइकोलॉजिकल होती
  301. 14:20है तब इंडिविजुअल अंडरस्टैंडिंग मांगता
  302. 14:24है। जितना ज्यादा ट्रीटमेंट एक पैटर्न
  303. 14:27फॉलो करता है उतना ही पेशेंट उसके अगेंस्ट
  304. 14:30रेजिस्टेंस फील करता है और बिल्कुल सही
  305. 14:32करता है। इससे उसका ठीक होना और मुश्किल
  306. 14:36हो जाता है।
  307. 14:38साइकोथरेपिस्ट को चाहे ना चाहे पेशेंट की
  308. 14:41इंडिविजुअलिटी को सीरियस लेना पड़ता है और
  309. 14:44ट्रीटमेंट भी उसके हिसाब से सेट करना
  310. 14:46पड़ता
  311. 14:47है। आज मेडिसिन के फील्ड में भी यह बात
  312. 14:50एक्सेप्ट की जा चुकी है। डॉक्टर का काम
  313. 14:54होता है इंसान को ट्रीट करना। सिर्फ इलनेस
  314. 14:57को नहीं।
  315. 14:59यह मेडिकल एग्जांपल एक लार्जर प्रॉब्लम का
  316. 15:01छोटा हिस्सा है जो एजुकेशन और ट्रेनिंग
  317. 15:03में भी होता
  318. 15:05है। साइंटिफिक एजुकेशन मोस्टली
  319. 15:07स्टैटिस्टिकल ट्रुथ्स और ऑब्स्ट्रैक्ट
  320. 15:10नॉलेज पर बेस्ड होती
  321. 15:12है। इसलिए यह दुनिया का एक ऐसा इमेज बनाती
  322. 15:15है जो रियलिस्टिक नहीं होता। यह
  323. 15:17इंडिविजुअल सिर्फ एक साइड कैरेक्टर बन
  324. 15:20जाता है।
  325. 15:22लेकिन असली रियलिटी का कैरियर वही
  326. 15:24इंडिविजुअल होता है। एक ऐसा रियल इंसान जो
  327. 15:27इररेशनल और यूनिक होता है। वो एक कंक्रीट
  328. 15:31ह्यूमन होता है ना कि कोई अनरियल या
  329. 15:34आइडियल नॉर्मल इंसान जिसे साइंस अपने थरीज
  330. 15:37में दिखाता
  331. 15:38है। ज्यादातर नेचुरल साइंसेस अपने
  332. 15:41रिजल्ट्स को ऐसे दिखाती हैं जैसे वह बिना
  333. 15:44इंसान के इनवॉल्व हुए ही मिल गए हो। वह
  334. 15:47साइकी के रोल को इनविज़िबल बना देते हैं।
  335. 15:50जबकि वह एक जरूरी फैक्टर होता है। मॉडर्न
  336. 15:54फिजिक्स इसमें एक एक्सेप्शन है। वो मानता
  337. 15:56है कि जो ऑब्जर्व हो रहा है वो ऑब्जर्वर
  338. 15:58से अलग नहीं हो सकता।
  339. 16:01इस एंगल से भी देखें तो साइंस एक ऐसी
  340. 16:03दुनिया का इमेज बनाता है जिसमें रियल
  341. 16:05ह्यूमन साइकी का कोई रोल ही नहीं होता जो
  342. 16:08ह्यूमैनिटीज के बिल्कुल अपोजिट
  343. 16:10है। साइंटिफिक एजम्पशनंस के इफेक्ट में
  344. 16:14सिर्फ साइकी ही नहीं बल्कि इंडिविजुअल
  345. 16:16इंसान और सारी इंडिविजुअल इवेंट्स भी ब्लर
  346. 16:18हो जाती हैं। यह असली रियलिटी का इमेज
  347. 16:22डिस्टोर्ट करके एक कॉनसेप्चुअल एवरेज बना
  348. 16:25देता
  349. 16:26है। हमें स्टैटिस्टिकल वर्ल्ड पिक्चर के
  350. 16:29साइकोलॉजिकल इफेक्ट को कम नहीं आंकना
  351. 16:32चाहिए।
  352. 16:33यह इंडिविजुअल को हटा के उसकी जगह एनोनिमस
  353. 16:36यूनिट्स को लाता है जो मास में मिल जाते
  354. 16:40हैं। साइंस हमें एक कंक्रीट इंसान के बदले
  355. 16:43सिर्फ ऑर्गेनाइजेशंस के नाम देता है और
  356. 16:46सबसे ऊपर एक एब्स्ट्रैक्ट आईडिया स्टेट का
  357. 16:49जो पॉलिटिकल रियलिटी का बेस बन जाता
  358. 16:52है। फिर इंडिविजुअल की मोरल
  359. 16:54रिस्पांसिबिलिटी स्टेट की पॉलिसी से
  360. 16:56रिप्लेस हो जाती है। इंसान के अंदर जो
  361. 16:59मोरल और मेंटल यूनिकनेस होती है, उसके
  362. 17:02बदले आता है पब्लिक वेलफेयर और स्टैंडर्ड
  363. 17:05ऑफ लिविंग बढ़ाने की बात।
  364. 17:08इंडिविजुअल लाइफ का गोल और मीनिंग जो कि
  365. 17:10असली जिंदगी है अब पर्सनल डेवलपमेंट में
  366. 17:12नहीं बल्कि स्टेट की पॉलिसी में चला जाता
  367. 17:16है और यह पॉलिसी इंसान पर बाहर से थोपी
  368. 17:19जाती है एक अब्स्ट्रैक्ट आईडिया के फॉर्म
  369. 17:22में जो धीरे-धीरे हर लाइफ को अपनी तरफ
  370. 17:25खींच लेता
  371. 17:27है। इंसान से उसके खुद के लाइफ डिसीजंस ले
  372. 17:31लेने का हक छीन लिया जाता है। अब वह एक
  373. 17:34सोशल यूनिट बन गया है। जिसे रूल किया जाता
  374. 17:37है, खिलाया जाता है, कपड़े दिए जाते हैं,
  375. 17:39पढ़ाया जाता है। उसके लिए अलग हाउसिंग
  376. 17:42यूनिट होती है और उसे वही चीजें एंटरटेन
  377. 17:45करती हैं जो मास को पसंद आती हैं।
  378. 17:50रूलर्स भी अब वैसे ही सोशल यूनिट्स हैं
  379. 17:53जैसे रूल्ड। उनमें फर्क सिर्फ यह है कि वह
  380. 17:55स्टेट की आईडियोलॉजी के स्पेशलाइज्ड
  381. 17:58स्पोक्सपर्सन
  382. 17:59हैं। उन्हें जजमेंट वाली पर्सनालिटी होने
  383. 18:02की जरूरत नहीं। वह सिर्फ एक्सपर्ट्स हैं
  384. 18:05अपने फील्ड में और उसके बाहर उनका कोई
  385. 18:08यूज़ नहीं। अब क्या पढ़ना है, क्या सीखना
  386. 18:11है, यह सब स्टेट की पॉलिसी डिसाइड करती
  387. 18:14है। जो स्टेट की पावरफुल पॉलिसी दिखती है,
  388. 18:18उसे भी असली में कंट्रोल किया जाता है उन
  389. 18:21लोगों के थ्रू जो गवर्नमेंट के सबसे ऊपर
  390. 18:23वाले पोस्ट पर बैठे होते हैं। जहां सारी
  391. 18:26पावर इकट्ठी होती
  392. 18:28है। जो भी इंसान चाहे इलेक्शन के थ्रू या
  393. 18:32बदकिस्मत से ऐसे पोस्ट पर पहुंच जाता है
  394. 18:35उसके ऊपर अब किसी और की पावर नहीं होती
  395. 18:38क्योंकि अब वही स्टेट पॉलिसी बन जाता है।
  396. 18:42उस पोजीशन में वह अपनी मर्जी से काम कर
  397. 18:45सकता है सिचुएशन के लिमिट के अंदर। जैसे
  398. 18:48लुई 14 ने कहा था लेटेट सस्ट मूई मतलब मैं
  399. 18:53ही स्टेट हूं।
  400. 18:56इसलिए वही इंसान या उन जैसे कुछ ही लोग
  401. 19:00अपने इंडिविजुअलिटी का यूज कर सकते हैं।
  402. 19:02अगर उन्हें यह समझ आए कि वह स्टेट के रूल
  403. 19:05से अलग कैसे सोच सकते हैं।
  404. 19:09लेकिन ज्यादा चांसेस यह होते हैं कि वह
  405. 19:11अपने ही बनाए हुए इल्लुजंस के स्लेव बन
  406. 19:14जाते हैं। जब किसी का सोचना सिर्फ एक साइड
  407. 19:17हो जाता है तो उसका साइकोलॉजिकल रिएक्शन
  408. 19:20होता है। अंदर ही अंदर कुछ उल्टा चलने
  409. 19:22लगता है। जहां स्लेवरी होती है वहां
  410. 19:26रिबेलियन भी होता है। इसलिए पावर के लिए
  411. 19:30राइवलरी और ज्यादा ट्रस्ट ना होने वाली
  412. 19:32फीलिंग पूरे सिस्टम में ऊपर से नीचे तक
  413. 19:35फैल जाती है। और जब मास एकदम फॉर्मलेस और
  414. 19:39कयोटिक हो जाता है तो उसको बैलेंस करने के
  415. 19:42लिए वह हमेशा एक लीडर बना लेता है। और ऐसे
  416. 19:46लीडर ऑलमोस्ट हमेशा अपने ही ईगो के ट्रैप
  417. 19:49में फंस जाते हैं। हिस्ट्री में ऐसे कई
  418. 19:52एग्जांपल्स हैं।
  419. 19:54यह सब डेवलपमेंट तब अनअवॉयडेबल हो जाता है
  420. 19:57जब इंडिविजुअल अपना अलग होना छोड़ देता है
  421. 20:00और भीड़ का हिस्सा बन जाता है। बड़ी-बड़ी
  422. 20:03क्राउड्स में इंडिविजुअल खुद ब खुद गायब
  423. 20:06हो जाता
  424. 20:07है। और इसके पीछे एक बड़ा रीजन साइंटिफिक
  425. 20:10रैशनलिज्म है जो इंसान के बेसिक फाउंडेशन
  426. 20:13और उसकी डिग्निटी को छीन लेता
  427. 20:16है। अब वो सिर्फ एक सोशल यूनिट है। उसकी
  428. 20:20इंडिविजुअलिटी खत्म हो गई है। अब वह सिर्फ
  429. 20:23एक नंबर बन गया है स्टैटिस्टिक्स के ऑफिस
  430. 20:25में।
  431. 20:27अब उसका रोल सिर्फ एक रिप्लेसेबल पार्ट का
  432. 20:30हो गया है जिसकाेंस बिल्कुल छोटा सा
  433. 20:34है। बाहर से और लॉजिकल पॉइंट से देखें तो
  434. 20:38वह एग्जैक्टली यही है। और इस नजरिए से
  435. 20:41देखें तो लगता है कि अब इंडिविजुअल की
  436. 20:44वैल्यू के बारे में बात करना ही बेकार
  437. 20:47है। हालात ऐसे हो गए हैं कि सोचना भी
  438. 20:50मुश्किल लगता है कि हमने कब और कैसे एक
  439. 20:52इंडिविजुअल की जिंदगी को इतना
  440. 20:54रिस्पेक्टफुल बनाना शुरू किया। जबकि
  441. 20:57रियलिटी तो बिल्कुल आंखों के सामने
  442. 21:00है। इस नजरिए से देखें तो इंडिविजुअल
  443. 21:03कीेंस सच में कम हो गई है। और जो भी इस
  444. 21:06बात को चैलेंज करेगा उसके पास स्ट्रांग
  445. 21:09रीजन नहीं बचेगा।
  446. 21:11बस यह सोच लेना कि मैं मेरी फैमिली या
  447. 21:14मेरे दोस्तों का ग्रुप इंपॉर्टेंट है। यह
  448. 21:16सिर्फ एक थोड़ा फनी पर्सनल फीलिंग है।
  449. 21:20क्योंकि कुछ लोग 10,000, 1 लाख या 1
  450. 21:24मिलियन के सामने क्या ही
  451. 21:27है। मुझे एक बार एक समझदार दोस्त के साथ
  452. 21:30भीड़ में फंसने का याद है। उसने कहा, "यह
  453. 21:33देख, यह बेस्ट रीजन है इमोर्टिटी में
  454. 21:36बिलीव ना करने का। सब लोग इमोर्टल बनना
  455. 21:40चाहते
  456. 21:41हैं। जितनी बड़ी भीड़ होती है, उतना ही
  457. 21:44छोटा एक इंसान लगता है। और अगर कोई इंसान
  458. 21:47यह फील करने लगे कि उसकी जिंदगी का कोई
  459. 21:49मतलब ही नहीं बचा और उसके लिए पब्लिक
  460. 21:52वेलफेयर या स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग काफी नहीं
  461. 21:54है तो वह ऑलरेडी स्टेट स्लेवरी की तरफ जा
  462. 21:58रहा होता
  463. 21:59है। और बिना जाने बिना चाहे वह उसी का एक
  464. 22:03सपोर्टर बन जाता
  465. 22:05है। जो इंसान सिर्फ बाहर की दुनिया देखता
  466. 22:08है और बड़े ग्रुप से डर जाता है। उसके पास
  467. 22:11अपने सेंसेस और लॉजिक के अगेंस्ट लड़ने के
  468. 22:14लिए कुछ नहीं
  469. 22:16होता। और यही आज हो रहा
  470. 22:19है। हम सब नंबर्स और स्टैटिस्टिक्स के
  471. 22:22मैजिक से इंप्रेस हो चुके हैं। रोज हमें
  472. 22:25बताया जाता है कि इंडिविजुअल की कोई
  473. 22:27वैल्यू नहीं है क्योंकि उसका
  474. 22:29रिप्रेजेंटेशन किसी भी बड़ी ऑर्गेनाइजेशन
  475. 22:31में नहीं होता। और दूसरी तरफ वह बड़े-बड़े
  476. 22:35लोग जो स्टेज पर दिखते हैं और जिनकी आवाज
  477. 22:38सब जगह सुनाई देती है उन्हें पब्लिक एक
  478. 22:41मास मूवमेंट का हिस्सा समझ लेती
  479. 22:44है। इसलिए या तो उनकी तालियों से तारीफ
  480. 22:47होती है या गालियों से बुराई।
  481. 22:51लेकिन यहां मां सजेशन इतना पावरफुल होता
  482. 22:53है कि यह समझना मुश्किल हो जाता है कि
  483. 22:56उनका मैसेज उनका अपना है या सिर्फ पब्लिक
  484. 22:59ओपिनियन का इको है।
  485. 23:03ऐसे सिचुएशन में यह बात सरप्राइज नहीं
  486. 23:06करती कि इंडिविजुअल का जजमेंट धीरे-धीरे
  487. 23:08खुद पे से डाउट करने लगता है।
  488. 23:11रिस्पांसिबिलिटी को जितना हो सके कलेक्टिव
  489. 23:14बना दिया जाता है। मतलब इंसान अपनी
  490. 23:17जिम्मेदारी किसी ग्रुप पर डाल देता
  491. 23:19है। इस तरीके से इंसान सोसाइटी का एक
  492. 23:23फंक्शन बन जाता है। जबकि असल में सोसाइटी
  493. 23:26खुद सिर्फ एक एब्स्ट्रैक्ट आईडिया है
  494. 23:28स्टेट की तरह। दोनों स्टेट और सोसाइटी को
  495. 23:32एक रियल चीज बना दिया गया है। जैसे कि वह
  496. 23:35खुद जीती जागती पावर हो।
  497. 23:39स्टेट को तो एक ऐसे पर्सन की तरह ट्रीट
  498. 23:41किया जाता है जिसे सब कुछ एक्सपेक्ट किया
  499. 23:44जाता है। लेकिन असल में यह सिर्फ एक कवर
  500. 23:47है उन लोगों के लिए जो स्टेट को कंट्रोल
  501. 23:50करना जानते हैं। और ऐसे में
  502. 23:52कॉन्स्टिट्यूशनल स्टेट धीरे-धीरे एक ऐसे
  503. 23:55प्रिमिटिव सोसाइटी जैसा बन जाता है जहां
  504. 23:58सब लोग किसी चीफ या छोटे ग्रुप की
  505. 24:01ऑटोक्रेटिक रूल में जीते हैं।
  506. 24:09जो लोग स्टेट को अपने हिसाब से चलाते हैं,
  507. 24:12वह हमेशा यह कोशिश करते हैं कि स्टेट के
  508. 24:14नाम पर जो फिक्शन बना है, उसे किसी भी
  509. 24:17रियल कंट्रोल से आजाद कर दिया जाए।
  510. 24:21इसलिए जो भी सोशियोपॉलिटिकल मूवमेंट इस
  511. 24:23डायरेक्शन में जाते हैं, वह रिलीजन के बेस
  512. 24:26को हिलाने की पूरी कोशिश करते हैं।
  513. 24:29क्योंकि अगर इंडिविजुअल को सिर्फ स्टेट का
  514. 24:31पार्ट बनाना है, तो उसका स्टेट के अलावा
  515. 24:34किसी और चीज पर डिपेंडेंट होना बंद करना
  516. 24:37पड़ेगा। लेकिन रिलीजन का मतलब होता है ऐसे
  517. 24:41एक्सपीरियंसेस पर डिपेंडेंट होना जो
  518. 24:43इररेशनल होते हैं। और जिन्हें हम बस फील
  519. 24:46कर सकते
  520. 24:47हैं। यह एक्सपीरियंसेस इनडायरेक्ट सोशल या
  521. 24:51फिजिकल चीजों से रिलेटेड नहीं होते। यह
  522. 24:54इंसान के इनर एटीट्यूड से ज्यादा जुड़े
  523. 24:56होते हैं। लेकिन आउटर लाइफ को समझने के
  524. 24:59लिए एक ऐसी जगह होनी चाहिए जहां से हम
  525. 25:02उसको कंपेयर कर सकें। रिलीजन एक ऐसी ही
  526. 25:06जगह देता है या कम से कम यह क्लेम करता
  527. 25:10है। इस वजह से इंडिविजुअल अपना जजमेंट और
  528. 25:13डिसीजन लेने की पावर यूज कर पाता है।
  529. 25:15रिलजन एक तरह से एक बैकअप बनाता है। उस
  530. 25:18फोर्स के अगेंस्ट जो दुनिया में सब लोग
  531. 25:20फील करते हैं। जब उनके पास बस रोड का
  532. 25:24रास्ता ही होता है चलने के लिए।
  533. 25:28अगर सिर्फ स्टैटिस्टिक्स ही रियलिटी है तो
  534. 25:31वही एक असली अथॉरिटी बन जाता
  535. 25:34है। पर सिर्फ एक ही कंडीशन होती है और
  536. 25:38क्योंकि उसका कोई ऑोजिट नहीं होता तो
  537. 25:41जजमेंट और डिसीजन लेना बेकार हो जाता
  538. 25:44है। तब इंसान सिर्फ एक स्टैटिस्टिक बन
  539. 25:47जाता है और इसी वजह से स्टेट का एक हिस्सा
  540. 25:50बन जाता है या किसी भी ऐसे सिस्टम का जो
  541. 25:53एब्स्ट्रैक्ट ऑर्डर के नाम पर बना हो।
  542. 25:57लेकिन रिलीजन एक अलग ही अथॉरिटी सिखाता
  543. 26:00है। एक ऐसी जो दुनिया से उल्टी होती
  544. 26:03है। जो आईडिया यह कहता है कि इंसान गॉड पर
  545. 26:06डिपेंडेंट है। वह भी इंसान से उतना ही
  546. 26:09बड़ा क्लेम करता है जितना दुनिया करती
  547. 26:12है। कभी-कभी तो यह क्लेम इतना एब्सोल्यूट
  548. 26:15होता है कि इंसान दुनिया से उतना ही अलग
  549. 26:18हो जाता है जितना वह खुद से हो जाता है जब
  550. 26:20वह भीड़ की सोच में खो जाता
  551. 26:23है। उस केस में भी वह अपना जजमेंट और
  552. 26:26डिसीजन लेने की पावर खो सकता है। जैसे
  553. 26:29रिलीजन के रूल के लिए
  554. 26:32यही गोल रिलीजंस ओपनली रखते हैं। जब तक कि
  555. 26:35वह इस स्टेट के साथ कॉम्प्रोमाइज ना कर
  556. 26:37लें। और अगर वह कॉम्प्रोमाइज कर लेते हैं
  557. 26:40तो मैं उन्हें रिलीजन नहीं बल्कि क्रीड
  558. 26:43कहता हूं। क्रीड एक कलेक्टिव बिलीफ होता
  559. 26:47है। रिलीजन नहीं। रिलजन का मतलब होता है
  560. 26:50एक पर्सनल रिलेशनशिप उन चीजों से जो
  561. 26:52दुनिया के बाहर है। क्रीड एक फेथ का
  562. 26:55पब्लिक कॉन्फेशन होता है जो दुनिया के लिए
  563. 26:58होता है। इसलिए वह दुनिया के अंदर की चीज
  564. 27:00है।
  565. 27:03लेकिन रिलीजन का मतलब होता है इंसान का
  566. 27:05कनेक्शन गॉड से। जैसे क्रिश्चियनिटी,
  567. 27:08जुदेज़्म, इस्लाम, हिंदूइज़्म या सेल्वेशन
  568. 27:11के पाथ से जैसे बुद्धिज्म।
  569. 27:16इसी कोर फैक्ट से सब एथिक्स निकलती हैं।
  570. 27:20और अगर उसमें इंसान की गॉड के सामने
  571. 27:23पर्सनल रिस्पांसिबिलिटी नहीं है तो वह
  572. 27:25सिर्फ एक नॉर्मल मोरलिटी बन जाती है। कुछ
  573. 27:28खास नहीं।
  574. 27:31क्रिएट्स क्योंकि वह दुनिया से कंप्रोमाइज
  575. 27:34करते हैं। इसलिए उन्हें अपने बिलीव्स,
  576. 27:36कस्टम्स और रूल्स को प्रॉपर सिस्टम में
  577. 27:39डालना पड़ता
  578. 27:41है। और यह करते-करते उन्होंने अपनी असली
  579. 27:45रिलीजियस पार्ट को बहुत पीछे कर दिया
  580. 27:48है। जो लिविंग कनेक्शन था उनका उस दुनिया
  581. 27:52के बाहर के सोर्सेस से वह बैकग्राउंड में
  582. 27:55चला गया है। जो भी ट्रेडिशनल डॉक्ट्राइन
  583. 27:58थी उसके हिसाब से अब यह डिसाइड किया जाता
  584. 28:01है कि किसी का पर्सनल रिलीजियस
  585. 28:03एक्सपीरियंस कितना वैल्यूुएबल है। और जहां
  586. 28:06यह फ्रीक्वेंट नहीं होता जैसे
  587. 28:09प्रोटेस्टेंटिज्म में तो तुरंत लोग कहते
  588. 28:12हैं कि यह तो पाइटिज्म है। यह सेक्ट है।
  589. 28:15यह तो अजीब है। बस कोई भी नाम दे दिया
  590. 28:18जाता
  591. 28:19है। जब कोई कहता है कि वह गॉड की विल से
  592. 28:22गाइडेड है तो उसे ऐसे लेवल लग जाते हैं।
  593. 28:28क्रीड या तो एक एस्टैब्लिश्ड चर्च के साथ
  594. 28:30होती है या एक पब्लिक इंस्टिट्यूशन बन
  595. 28:33जाती है और उसमें सिर्फ ट्रू बिलीवर्स
  596. 28:36नहीं होते बल्कि बहुत सारे लोग होते हैं
  597. 28:38जो रिलीजन में इंटरेस्टेड ही नहीं बस
  598. 28:40हैबिट के चलते उसका हिस्सा है।
  599. 28:44यहीं से क्रीड और रिलीजन के बीच का असली
  600. 28:46फर्क दिखने लगता है। इसलिए किसी क्रीड का
  601. 28:50मेंबर बनना जरूरी नहीं कि रिलीजियस होना
  602. 28:52भी हो। यह ज्यादातर एक सोशल मैटर होता है
  603. 28:57और ऐसे में क्रीड इंसान को कोई डीप
  604. 29:00फाउंडेशन नहीं देता। सपोर्ट तब मिलता है
  605. 29:03जब इंसान का कनेक्शन किसी ऐसे अथॉरिटी से
  606. 29:06हो जो इस दुनिया की नहीं
  607. 29:08है। यह डिसाइड करने का क्राइटेरिया यह
  608. 29:11नहीं है कि कोई अपने मुंह से क्रीड को
  609. 29:13माने। बल्कि यह है कि उसकी जिंदगी सिर्फ
  610. 29:17ईगो या सोसाइटी के रूल से नहीं चलती बल्कि
  611. 29:19किसी हायर अथॉरिटी के इफेक्ट से भी चलती
  612. 29:22है। कोई भी एथिकल रूल चाहे कितना भी बड़ा
  613. 29:26हो और कोई भी क्रीड चाहे कितना भी प्योर
  614. 29:29हो। यह सब इंडिविजुअल की फ्रीडम और
  615. 29:32इंडिपेंडेंस की फाउंडेशन नहीं बना सकते।
  616. 29:35वह बस सिर्फ एक ही चीज बनाते हैं। एक
  617. 29:38पर्सनल और डायरेक्ट एक्सपीरियंस जिसमें
  618. 29:41इंसान को फील होता है कि उसका एक जिंदा
  619. 29:44रियल कनेक्शन है किसी दुनिया के बाहर वाली
  620. 29:46अथॉरिटी के
  621. 29:49साथ। और वही कनेक्शन इस दुनिया और इसके
  622. 29:53लॉजिक के अगेंस्ट बैलेंस का काम करता
  623. 29:56है। यह बात ना तो मास वाले इंसान को पसंद
  624. 30:00आएगी ना ही कलेक्टिव बिलीफ रखने वाले को।
  625. 30:03मास वाले के लिए स्टेट की पॉलिसी ही सबसे
  626. 30:06बड़ी सोच और एक्शन का रूल
  627. 30:08है। उसको इसी पर्पस के लिए ट्रेन किया गया
  628. 30:12है। इसीलिए उसके लिए इंडिविजुअल का कोई
  629. 30:15मतलब तभी है जब वह स्टेट के काम का हो।
  630. 30:19दूसरी तरफ जो बिलीवर है, वह मानता है कि
  631. 30:22स्टेट का भी कुछ मोरल और फक्चुअल राइट है।
  632. 30:26लेकिन उसका यह भी मानना है कि ना सिर्फ
  633. 30:28इंसान बल्कि स्टेट भी गॉड के कंट्रोल में
  634. 30:31होती है। और जब भी कोई कंफ्यूजन हो तो
  635. 30:34फाइनल डिसीजन गॉड लेगा ना कि
  636. 30:37स्टेट। मैं कोई मेटाफिजिकल जजमेंट नहीं
  637. 30:40देता। इसलिए मैं यह ओपन छोड़ता हूं कि यह
  638. 30:43दुनिया मतलब इंसान की दुनिया और नेचर क्या
  639. 30:46गॉड के अपोजिट है या
  640. 30:49नहीं। मैं सिर्फ यह कह सकता हूं कि
  641. 30:52साइकोलॉजिकली दोनों के बीच का जो फर्क है
  642. 30:55उसके बारे में सिर्फ बाइबल में ही नहीं
  643. 30:57लिखा है। बल्कि आज भी यह क्लियरली दिखाई
  644. 31:00देता है। जैसे डिक्टेटर स्टेट्स रिलीजन के
  645. 31:03अगेंस्ट होते हैं और चर्च एथिज्म और
  646. 31:06मटेरियलिज्म के अगेंस्ट।
  647. 31:08जैसे इंसान एक सोशल बीइंग होने के नाते
  648. 31:11कम्युनिटी से जुड़े बिना जी नहीं सकता।
  649. 31:14वैसे ही इंडिविजुअल अपने एकिस्टेंस का
  650. 31:16असली रीजन और अपने स्पिरिचुअल और मोरल
  651. 31:19फ्रीडम सिर्फ किसी ऐसे प्रिंसिपल में ही
  652. 31:22ढूंढ सकता है जो इस दुनिया के बाहर का हो।
  653. 31:25जो आउटर वर्ल्ड के स्ट्रांग इफेक्ट को
  654. 31:27बैलेंस कर सके।
  655. 31:30जो इंसान गॉड में एंकरर्ड नहीं है, वह
  656. 31:33अपने स्ट्रेंथ से दुनिया के फिजिकल और
  657. 31:36मोरल टिशंस के अगेंस्ट स्टैंड नहीं ले
  658. 31:39सकता। उसके लिए जरूरी है कि उसके पास कोई
  659. 31:42ऐसी अंदर की एक्सपीरियंस हो जो
  660. 31:45ट्रांसेंडेंट हो। जो उसे भीड़ में खत्म हो
  661. 31:48जाने से बचा सके।
  662. 31:52सिर्फ सोचने से या मोरल समझ से कि मास
  663. 31:56वाले इंसान कितना स्टूपिड और इरिस्पांसिबल
  664. 31:58हो गया है। यह सिर्फ एक नेगेटिव फीलिंग
  665. 32:01है। और यह इंडिविजुअल को सिर्फ कंफ्यूज
  666. 32:04करती है। उससे और अलग करती है और अकेला
  667. 32:07छोड़ती है। इसमें वह फोर्स नहीं होती जो
  668. 32:11रिलीजन से मिलती है क्योंकि यह सिर्फ
  669. 32:13लॉजिक है।
  670. 32:15डिक्टेटर स्टेट के पास एक बड़ी पावर यह है
  671. 32:18कि वह सिर्फ इंडिविजुअल को ही नहीं उसके
  672. 32:20रिलीजियस फीलिंग्स को भी खा जाता है।
  673. 32:23स्टेट ने गॉड की जगह ले ली है। इस एंगल से
  674. 32:26देखें तो सोशलिस्ट डिक्टेटरशिप्स एक तरह
  675. 32:29की रिलीजन बन चुकी है और स्टेट स्लेवरी एक
  676. 32:32वरशिप बन गई है।
  677. 32:35लेकिन रिलीजियस फीलिंग को ऐसे तोड़कर
  678. 32:37घुमाकर उसकी असली शेप बदल देना इससे अंदर
  679. 32:41ही अंदर डाउट्स पैदा होते हैं। और इन
  680. 32:45डाउट्स को तुरंत दबा दिया जाता है ताकि
  681. 32:47मास माइंडेडनेस के फ्लो के अगेंस्ट
  682. 32:50कॉन्फ्लिक्ट ना हो। रिजल्ट क्या होता है?
  683. 32:53हमेशा की तरह एक ओवर रिएक्शन फनेटिकल
  684. 32:57थिंकिंग और फिर इस फनेटिकल थिंकिंग को यूज
  685. 33:01किया जाता है अपोजिशन को पूरी तरह कुचल
  686. 33:04देने के लिए। फ्री ओपिनियन को दबा दिया
  687. 33:07जाता है। मोरल डिसीजन को भी ठोकर मार दी
  688. 33:10जाती है। और जस्टिफिकेशन यह होता है कि
  689. 33:13एंड जस्टिफाई करता है मींस को। चाहे वह
  690. 33:16कितना भी बेकार क्यों ना हो।
  691. 33:20स्टेट की पॉलिसी एक क्रीड बन जाती है।
  692. 33:23लीडर या पार्टी बॉस एक डेमी गॉड बन जाता
  693. 33:26है जो गुड और इविल के ऊपर होता है। और
  694. 33:30उसके फॉलोवरर्स को हीरो मार्टिर अपोस्टले
  695. 33:34या मिशनरी की तरह देखा जाता
  696. 33:37है। अब सिर्फ एक ही ट्रुथ होता है और उसके
  697. 33:40अलावा कोई दूसरा नहीं। वो ट्रुथ पवित्र
  698. 33:44है। उस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता।
  699. 33:48जो भी अलग सोचता है वह हेरेटिक है और
  700. 33:51हिस्ट्री से पता है कि ऐसे लोगों के साथ
  701. 33:53क्या होता
  702. 33:55है। सिर्फ पार्टी बॉस जिसके हाथ में
  703. 33:58पॉलिटिकल पावर होती है वही स्टेट
  704. 34:01डॉक्ट्रिन का असली मतलब बताने का हक रखता
  705. 34:03है। और वह उस डॉक्ट्राइन का मतलब वैसे ही
  706. 34:07बताता है जैसे उसके काम आए।
  707. 34:10जब मास रूल के चलते इंडिविजुअल सिर्फ एक
  708. 34:13सोशल यूनिट बन जाता है और स्टेट सबसे बड़ी
  709. 34:15पावर बन जाती है तो यह ऑब्वियस है कि
  710. 34:18रिलीजन भी उस वर्ल्ड पुल में खींच लिया
  711. 34:22जाएगा। रिलीजन जो कुछ इनविजिबल और
  712. 34:25अनकंट्रोलेबल फर्सेस को समझने और काउंट
  713. 34:28करने की इंस्टिंक्ट होती है। यह इंसान की
  714. 34:31एक नेचुरल टेंडेंसी है। और इसका प्रूफ
  715. 34:34हिस्ट्री के हर पार्ट में मिलता है।
  716. 34:38रिलीजन का असली काम होता है माइंड का
  717. 34:40बैलेंस बना के रखना। क्योंकि इंसान
  718. 34:42नेचुरली जानता है कि उसकी कॉन्शियस
  719. 34:44थिंकिंग किसी भी टाइम अंदर या बाहर से आई
  720. 34:47किसी अननोन पावर के चलते फेल हो सकती है।
  721. 34:52इसलिए इंसान ने हमेशा यह एनश्योर किया है
  722. 34:55कि कोई भी डिफिकल्ट डिसीजन लेने से पहले
  723. 34:58जो उसके या दूसरों के लिए इफेक्ट ला सकता
  724. 35:01हो उसके साथ कोई रिलीजियस प्रैक्टिस जरूर
  725. 35:04हो।
  726. 35:05इनविज़िबल पावर्स के लिए ऑफरिंग्स दिए जाते
  727. 35:08हैं, ब्लेसिंग्स दी जाती हैं और हर तरह के
  728. 35:10सेक्रेट रिचुअल्स किए जाते हैं। हर जगह हर
  729. 35:13टाइम एंट्री और एग्जिट के रिचुअल्स होते
  730. 35:16हैं। और इन रिचुअल्स को रैशन थिंकर्स
  731. 35:20मैजिक या सुपरस्टिशन कह के रिजेक्ट कर
  732. 35:22देते हैं। क्योंकि उनमें साइकोलॉजिकल समझ
  733. 35:24नहीं होती।
  734. 35:27लेकिन मैजिक का साइकोलॉजिकल इफेक्ट होता
  735. 35:30है जो इग्नोर नहीं किया जा
  736. 35:32सकता। जब कोई आदमी एक मैजिकल काम करता है
  737. 35:36तो उसे एक सेफ्टी का फील मिलता है और यह
  738. 35:40फीलिंग डिसीजन लेने के टाइम जरूरी होती है
  739. 35:43क्योंकि हर डिसीजन एक साइड पे हैवी होता
  740. 35:45ही है इसलिए वह रिस्की लगता है। इवन एक
  741. 35:49डिक्टेटर भी जब कोई स्टेट का काम करता है
  742. 35:51तो सिर्फ धमकी नहीं देता। वो उसको फुल शो
  743. 35:55के साथ करता है। ब्रास बैंड्स, फ्लैग्स,
  744. 35:58परेड्स, क्राउड रैलीज यह सब चर्च
  745. 36:02के प्रोसेशंस, फायरवक्स और कैनन फायर जैसा
  746. 36:06ही होता है। जो डेमंस को भगाने के लिए
  747. 36:09होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि स्टेट की
  748. 36:12पावर का यह शो एक कलेक्टिव सिक्योरिटी फील
  749. 36:15देता है। लेकिन यह रिलीजन की तरह इंसान के
  750. 36:19अंदर के डर को प्रोटेक्ट नहीं करता।
  751. 36:22इसलिए वह इंसान और भी ज्यादा स्टेट की
  752. 36:24पावर से चिपक जाता है। मतलब भीड़ से चिपक
  753. 36:27जाता है और अपने आप को मेंटली और मोरली
  754. 36:30उसके हवाले कर देता है। अपनी पर्सनल पावर
  755. 36:33भी दे देता
  756. 36:35है। स्टेट भी चर्च की तरह ही एंथूजियाज्म,
  757. 36:40सैक्रिफाइस और लव मांगता है।
  758. 36:43और जैसे रिलीजन में फियर ऑफ गॉड होता है
  759. 36:46वैसे ही डिक्टेटर स्टेट में इंश्योर करता
  760. 36:50है कि लोग उससे डरे। जब रैशनलिस्ट अपना
  761. 36:53मेन अटैक उन रिचुअल्स के मैजिकल इफेक्ट पर
  762. 36:56करते हैं जो ट्रेडिशन के थ्रू आए हैं तो
  763. 36:58असल में वह पॉइंट ही मिस कर देते हैं। जो
  764. 37:02सबसे जरूरी बात है साइकोलॉजिकल इफेक्ट उसे
  765. 37:05इग्नोर कर दिया जाता है। जबकि दोनों
  766. 37:08साइड्स उसी इफेक्ट का यूज करती हैं बस
  767. 37:11उल्टे पर्पस के लिए।
  768. 37:13ऐसा ही सीन उनके गोल्स के केस में भी होता
  769. 37:16है। रिलीजन के गोल्स जैसे इविल से
  770. 37:19छुटकारा, गॉड से मिलना, डेथ के बाद
  771. 37:22रिवॉर्ड मिलना, ईटीसी वो बदलकर बन जाते
  772. 37:26हैं वर्ल्डली प्रॉमिससेस। जैसे रोज की
  773. 37:28रोटी की चिंता से आजादी। सम्मान का इक्वल
  774. 37:31बंटवारा सबका फ्यूचर ब्राइट होगा और काम
  775. 37:34के घंटे कम हो जाएंगे। यह प्रॉमिससेस पूरा
  776. 37:38होना उतना ही दूर है जितना दूर है
  777. 37:40पैराडाइस। और यह बताता है कि मासेस ने
  778. 37:44अपना गोल दुनिया के बाहर से हटा के सिर्फ
  779. 37:46दुनिया तक ला दिया है। और उस नई वर्ल्डली
  780. 37:50बिलीफ को भी वही रिलीजियस पैशन और
  781. 37:53स्ट्रिक्टनेस के साथ फॉलो किया जाता है
  782. 37:55जैसे पहले क्रीड्स में होता था। मैं रिपीट
  783. 37:58नहीं करूंगा इसलिए सब कंपैरिजंस नहीं
  784. 38:01बताऊंगा। बस यह पॉइंट हाईलाइट करूंगा कि
  785. 38:04रिलीजन जैसे एक नेचुरल फंक्शन जो शुरू से
  786. 38:07इंसान के साथ है उसे सिर्फ लॉजिक और सो
  787. 38:10कॉल्ड एनलाइटमेंट से हटा नहीं
  788. 38:14सकते। आप क्रेट्स के रूल्स को इंपॉसिबल
  789. 38:17बता सकते हैं। उनका मजाक उड़ा सकते हैं।
  790. 38:20लेकिन ऐसे अटैक्स एक्चुअल रिलीजन के बेस
  791. 38:23पर नहीं लगते बल्कि सिर्फ आउटर कवर पर
  792. 38:26जाते हैं। रिलीजन जिसका मतलब है अपनी
  793. 38:29साइकी और पर्सनल डेस्टिनी के इरेशनल
  794. 38:31पार्ट्स को सीरियसली लेना। वही रिलीजन घूम
  795. 38:34के वापस आ जाता है। लेकिन हम बिगड़ के जब
  796. 38:38लोग स्टेट और डिक्टेटर को गॉड बना देते
  797. 38:41हैं। जैसे लैटिन में कहा जाता है नेचुरम
  798. 38:46एक्सपेलास फुर्का तमेन उसके रिकुेट नेचर
  799. 38:52को पिच फर्क से बाहर निकाल दो। फिर भी वह
  800. 38:56वापस आ जाएगी।
  801. 38:58डिक्टेटर्स और लीडर्स जो सिचुएशन को ठीक
  802. 39:00से समझ गए हैं, वह इस चीज को छुपाने की
  803. 39:03पूरी कोशिश करते हैं कि यह पूरा सीन सीजर
  804. 39:06को गॉड बनाने जैसा
  805. 39:09है। वो अपनी रियल पावर को स्टेट नाम के
  806. 39:12फिक्शन के पीछे छुपाते हैं। लेकिन यह
  807. 39:15ट्रिक ग्राउंड रियलिटी को नहीं
  808. 39:18बदलती। जैसे मैं पहले बोल चुका हूं।
  809. 39:21डिक्टेटर स्टेट सिर्फ इंसान के राइट्स
  810. 39:24नहीं छीनता। वह उसके दिमाग के नीचे से
  811. 39:27उसकी मेटाफिजिकल जमीन भी खींच लेता
  812. 39:30है। अब एक इंडिविजुअल का एथिकल डिसीजन
  813. 39:33मैटर ही नहीं करता। अब सिर्फ मासेस की
  814. 39:36अंधी मूवमेंट ही सब कुछ होती है और इसी से
  815. 39:40झूठ एक पॉलिटिकल पावर का रूल बन जाता
  816. 39:44है। स्टेट ने इस लॉजिक को पूरा फॉलो किया
  817. 39:48है और यह बात उन मिलियंस ऑफ स्टेट्स लेव्स
  818. 39:51की प्रेजेंस से क्लियर होती है जिनसे हर
  819. 39:53राइट छीन लिया गया है।
  820. 39:56डिक्टेटर स्टेट और रिलीजियस ग्रुप्स दोनों
  821. 39:59कम्युनिटी का आईडिया बहुत स्ट्रांग बनाते
  822. 40:02हैं। यही कम्युनिज्म का मेन आईडिया है और
  823. 40:05लोगों पे यह इतना फ़ किया जाता है कि इसका
  824. 40:08इफ़ेक्ट उल्टा हो जाता है। लोगों में
  825. 40:10ट्रस्ट कम हो जाता है। चर्च भी इस
  826. 40:13कम्युनिटी आईडिया को स्ट्रांग करते हैं।
  827. 40:16और जहां चर्च कमजोर होता है जैसे
  828. 40:18प्रोटेस्टेंटिज्म में वहां कम्युनल
  829. 40:21एक्सपीरियंस की उम्मीद या बिलीफ उस कमी को
  830. 40:23पूरा करने की कोशिश करती
  831. 40:25है। आसान है देखना कि कम्युनिटी मास
  832. 40:29कंट्रोल का एक टूल है और यह एक डेंजरस डबल
  833. 40:32एज्ड वेपन है। जैसे जितने भी जीरो जोड़िए
  834. 40:37वह कभी एक नहीं बनते। वैसे ही कम्युनिटी
  835. 40:41की वैल्यू सिर्फ उन इंसानों पर डिपेंड
  836. 40:43करती है जो उसमें हैं। इसलिए कम्युनिटी से
  837. 40:46यह एक्सपेक्ट नहीं कर सकते कि वह
  838. 40:49एनवायरमेंट के मास इन्फ्लुएंस से ज्यादा
  839. 40:51पावरफुल चेंज ला दे। चाहे वह चेंज गुड हो
  840. 40:55या बैड। ऐसे रियल चेंजेस सिर्फ तभी आते
  841. 40:58हैं जब दो इंसान आपस में पर्सनल लेवल पर
  842. 41:01मिलते हैं। मास बेप्टिज्म्स चाहे
  843. 41:04कम्युनिज्म के नाम पर हो या क्रिश्चियनिटी
  844. 41:06के। वो इंसान के अंदर को छूते ही नहीं।
  845. 41:10कम्युनिटी प्रोपगेंडा का इतना शैलो इफेक्ट
  846. 41:13होता
  847. 41:14है। यह ईस्टर्न यूरोप के रिसेंट इवेंट से
  848. 41:18क्लियरली दिख गया है। यह कम्युनल आईडिया
  849. 41:21इंडिविजुअल इंसान को भूल जाता है। लेकिन
  850. 41:24अंत में वही इंसान अपना हक लेने के लिए
  851. 41:27खुद खड़ा होता
  852. 41:33है। 20थ सेंचुरी के इस टाइम में जब यह सब
  853. 41:37कुछ हो रहा है। वेस्ट एक अजीब सिचुएशन में
  854. 41:39खड़ा है। उसके पास रोमन लॉ का हेरिटेज है।
  855. 41:43जुडे क्रिश्चियन एथिक्स की बड़ी लेगसी है
  856. 41:46जो मेटाफिजिक्स पर बेस्ड है। और एक
  857. 41:48स्ट्रांग आईडिया है कि इंसान के कुछ
  858. 41:50राइट्स होते हैं जो कोई भी उससे नहीं ले
  859. 41:53सकता।
  860. 41:55लेकिन वेस्ट अब घबरा के खुद से पूछ रहा
  861. 41:58है। इस डेवलपमेंट को कैसे रोका जाए? यह
  862. 42:01कैसे वापस घुमाया जाए?
  863. 42:03अगर हम सिर्फ सोशलिस्ट डिक्टेटरशिप को
  864. 42:06ब्लेम करें और बोले कि उनका सिस्टम
  865. 42:08अनरियलिस्टिक है तो इससे कुछ फर्क नहीं
  866. 42:12पड़ेगा। क्योंकि सबसे पहली बात तो यह है
  867. 42:15कि वेस्ट सिर्फ अपने आप से बात कर रहा है।
  868. 42:17उसकी बात आयरन कर्टेन के उस पार कोई नहीं
  869. 42:20सुन रहा। और दूसरी बात यह कि कोई भी
  870. 42:24इकोनॉमिक सिस्टम चलाया जा सकता है। बस
  871. 42:27कंडीशन यह है कि आप उसके लिए सैक्रिफाइस
  872. 42:30करने को रेडी हो। आप कोई भी रिफॉर्म
  873. 42:32इंप्लीमेंट कर सकते हैं। जैसे स्टेलिन ने
  874. 42:35किया
  875. 42:36था जिसने 3 मिलियन फार्मर्स को भूख से
  876. 42:39मरने दिया और मिलियंस ऑफ अनपेयर्ड लेबरर्स
  877. 42:42यूज
  878. 42:43किए। ऐसे स्टेट को सोशल या इकोनॉमिक
  879. 42:46क्राइसिस का डर नहीं होता। जब तक उसकी
  880. 42:49पावर सेफ है। मतलब जब तक एक वेल ट्रेंड और
  881. 42:52वेल फेल्ड पुलिस आर्मी रेडी है। वह स्टेट
  882. 42:56काफी टाइम तक टिक सकता है और अपनी पावर
  883. 42:58बढ़ाता ही जाता है।
  884. 43:01उसके पास ज्यादा पापुलेशन होने के कारण
  885. 43:03अनपेड वर्कर्स को बढ़ाने का भी ऑप्शन होता
  886. 43:07है और वह वर्ल्ड मार्केट के वेज सिस्टम की
  887. 43:10परवाह किए बिना अपने राइवल्स से कमट कर
  888. 43:13सकता है। असली खतरा सिर्फ तब हो सकता है
  889. 43:16जब कोई बाहर से मिलिट्री अटैक हो। लेकिन
  890. 43:18यह रिस्क हर साल कम होता जा रहा है।
  891. 43:21क्योंकि पहली बात कि डिक्टेटर स्टेट की
  892. 43:25वॉर पावर हर साल बढ़ रही है। और दूसरी कि
  893. 43:28वेस्ट यह रिस्क नहीं लेना चाहता कि अगर
  894. 43:30रशिया या चीन पर अटैक करें तो वहां के
  895. 43:33नेशनलिज्म और प्राइड जाग जाए और उनका करंट
  896. 43:36प्लान गलत डायरेक्शन में चला जाए। तो अब
  897. 43:40तक जितना समझ आया है सिर्फ एक रियल ऑप्शन
  898. 43:42बचा है। वो है कि पावर अंदर से ही टूट
  899. 43:45जाए।
  900. 43:46लेकिन यह नेचुरली होने देना पड़ेगा अपने
  901. 43:49फ्लो में। बाहर से कोई सपोर्ट अभी कुछ
  902. 43:52ज्यादा नहीं कर सकता। क्योंकि वहां के
  903. 43:55स्ट्रांग कंट्रोल सिस्टम्स और नेशनलिज्म
  904. 43:57के रिएक्शनंस का रिस्क
  905. 43:59है। एब्सोल्यूट स्टेट के पास फॉरेन पॉलिसी
  906. 44:03के लिए एक आर्मी होती है फनेटिकल मिशनरीज
  907. 44:06की। और यह लोग वेस्टर्न कंट्रीज के लॉस के
  908. 44:09अंडर इजीली असाइलम भी मिल जाते हैं। उसके
  909. 44:12अलावा वहां बिलीवर्स के ग्रुप्स भी होते
  910. 44:15हैं जो कई जगह स्ट्रांग होते हैं और यह
  911. 44:18वेस्टर्न गवर्नमेंट्स के डिसीजंस को कमजोर
  912. 44:20बना देते
  913. 44:21हैं। जबकि वेस्ट के पास अपने राइवल्स पे
  914. 44:25ऐसा कोई इफेक्ट डालने का चांस ही नहीं।
  915. 44:29लेकिन यह मान लेना भी गलत नहीं होगा कि
  916. 44:31ईस्ट में भी लोगों में कुछ अपोजिशन जरूर
  917. 44:34है। हमेशा कुछ ऐसे लोग होते हैं जो सच
  918. 44:37बोलते हैं जिनको झूठ और जुल्म से नफरत
  919. 44:40होती है। लेकिन यह नहीं पता कि वह लोग
  920. 44:43मासेस को कितना इन्फ्लुएंस कर पाते हैं।
  921. 44:45पुलिस के कंट्रोल में
  922. 44:47रहकर। इस मुश्किल सिचुएशन में वेस्ट
  923. 44:50बार-बार एक ही सवाल पूछता है। हम ईस्ट के
  924. 44:53इस थ्रेट का क्या जवाब दें? हां, वेस्ट के
  925. 44:56पास इंडस्ट्री और डिफेंस पावर काफी है।
  926. 44:59लेकिन सिर्फ यह काफी नहीं है। क्योंकि हम
  927. 45:03जानते हैं सबसे बड़े गंस और सबसे स्ट्रांग
  928. 45:05इकोनॉमी भी उस साइकोलॉजिकल इनफेक्शन को
  929. 45:08नहीं रोक सकते जो रिलीजियस फनेटिसिज्म से
  930. 45:12फैलता
  931. 45:13है। दिक्कत यह है कि वेस्ट अब तक यह बात
  932. 45:17समझाई नहीं कि जब हम आइडियलिज्म और रीजन
  933. 45:21के नाम पर अच्छी बातें बोलते हैं तो वह
  934. 45:23सिर्फ हवा में उड़ जाती है।
  935. 45:25क्योंकि जो रिलीजियस फेथ वहां है चाहे वह
  936. 45:29हमें कैसी भी लगे वह उस सबको उड़ा के ले
  937. 45:32जाती
  938. 45:33है। यह सिचुएशन लॉजिक या मोरल बातों से
  939. 45:36इवॉल्व नहीं हो सकती। यह एक इमोशनली
  940. 45:39स्टर्म है जो आइडियाज और इमोशंस के थ्रू
  941. 45:41चलती है। और हमें एक्सपीरियंस से पता है
  942. 45:44कि ऐसे इमोशनल फोर्सेस को लॉजिक या
  943. 45:47मोरलिटी कुछ खास इफेक्ट नहीं करती।
  944. 45:52कई लोगों ने ठीक ही समझा है कि इस पोजीशन
  945. 45:55के एंटीीडोट भी एक स्ट्रांग फेथ ही हो
  946. 45:58सकता है। लेकिन वह फेथ मटेरियलिस्टिक नहीं
  947. 46:00होना चाहिए। वही रिलीजियस एटीट्यूड जो इस
  948. 46:04नए टाइप के फेथ से निकले वही एक स्ट्रांग
  949. 46:08डिफेंस हो सकता है इस मेंटल इनफेक्शन के
  950. 46:10खिलाफ।
  951. 46:12लेकिन प्रॉब्लम यह है कि जब भी हम बोलते
  952. 46:14हैं शुड तो वह छोटा सा वर्ड दिखाता है कि
  953. 46:18हम खुद श्योर नहीं है या कमजोर
  954. 46:21हैं। इस जरूरी चीज का ना होने का असर
  955. 46:25वेस्ट में क्लियरली दिखता है। वेस्ट के
  956. 46:28पास एक ऐसा कॉमन फेथ नहीं है जो किसी
  957. 46:30फनेटिकल आईडियोलॉजी को रोक सके और आयरनी
  958. 46:34यह है कि वेस्ट ने ही मार्क्सिस्ट फिलॉसफी
  959. 46:36को जन्म दिया और वह भी वही स्पिरिचुअल
  960. 46:39आइडियाज वही आर्गुमेंट्स और वही गोल्स यूज
  961. 46:42करता
  962. 46:44है। वेस्ट में चर्चेस को फुल फ्रीडम मिली
  963. 46:47हुई है। लेकिन यह ईस्ट के चर्चेस से ना
  964. 46:50ज्यादा भरे हैं ना ज्यादा खाली। और फिर भी
  965. 46:54इनका पॉलिटिक्स पर कोई रियल असर नहीं
  966. 46:56दिखाई
  967. 46:58देता। क्रेट जब एक पब्लिक इंस्टिट्यूशन बन
  968. 47:02जाती है तो उसका प्रॉब्लम यह होता है कि
  969. 47:04वह दो मास्टर्स को सर्व करती है। एक तरफ
  970. 47:07उसका कनेक्शन इंसान के गॉड के साथ होने से
  971. 47:10होता है और दूसरी तरफ वो स्टेट के लिए भी
  972. 47:13जिम्मेदार होता है। मतलब दुनिया के
  973. 47:16लिए। इस वजह से वह बाइबल के लाइन सीजर को
  974. 47:20सीजर का दो जैसे कोर्ट का यूज करता है।
  975. 47:23पहले के टाइम में और कुछ टाइम पहले तक भी
  976. 47:26लोग कहते थे कि पावर्स गॉड के द्वारा बनाई
  977. 47:30गई हैं। लेकिन आज के टाइम में यह सोच
  978. 47:32पुरानी लगती है। चर्चेस अब एक ट्रेडिशनल
  979. 47:35और कलेक्टिव बिलीफ को रिप्रेजेंट करते
  980. 47:37हैं। और उनमें से काफी लोगों का बिलीफ
  981. 47:40अपने रियल एक्सपीरियंस पे बेस्ड नहीं
  982. 47:42होता। बल्कि बस एक ब्लाइंड बिलीफ होता है
  983. 47:46जो जैसे ही कोई सोचना शुरू करता है खत्म
  984. 47:49हो जाता
  985. 47:50है। जब बिलीफ का कंटेंट एक्चुअल नॉलेज से
  986. 47:54टकराता है तो अक्सर पता चलता है कि बिलीफ
  987. 47:57का इररेशनल पार्ट लॉजिक के सामने टिक नहीं
  988. 48:01पाता। बिलीफ कभी भी पर्सनल इनर
  989. 48:04एक्सपीरियंस का सही रिप्लेसमेंट नहीं हो
  990. 48:07सकती। और अगर यह एक्सपीरियंस नहीं है तो
  991. 48:10एक स्ट्रांग फेथ भी चाहे वह एक मिरेकल की
  992. 48:13तरह मिली हो वह भी वैसे ही चली जाती है।
  993. 48:17लोग फेथ को रियल रिलीजियस एक्सपीरियंस
  994. 48:20मानते हैं। लेकिन वह यह नहीं सोचते कि फेथ
  995. 48:23एक्चुअली एक सेकंड स्टेप है। वह तब आती है
  996. 48:27जब सबसे पहले कुछ ऐसा होता है जो हमें
  997. 48:30ट्रस्ट और लॉयलिटी का फील देता
  998. 48:32है। वह एक्सपीरियंस एक क्लियर कंटेंट के
  999. 48:35साथ आता है जो डिफरेंट क्रीड्स के थ्रू
  1000. 48:38इंटरप्रेट किया जा सकता है।
  1001. 48:41लेकिन जितना ज्यादा ऐसा होता है उतना ही
  1002. 48:44ज्यादा वह नॉलेज के साथ क्लैश करता है और
  1003. 48:47यह कॉन्फ्लिक्ट्स काफी पॉइंटलेस होते
  1004. 48:50हैं। क्रेट्स का व्यू आउटडेटेड होता है।
  1005. 48:53वह मैथोलॉजी से भरा होता है जो लिटरल
  1006. 48:56तरीके से समझा जाए तो नॉलेज के साथ
  1007. 48:59बिल्कुल क्लैश करता है। लेकिन अगर फॉर
  1008. 49:02एग्जांपल यह माना जाए कि क्राइस्ट का डेड
  1009. 49:04से वापस आना लिटरल नहीं बल्कि सिंबॉलिक है
  1010. 49:09तो उसका मतलब अलग-अलग वेज़ में इंटरप्रेट
  1011. 49:12किया जा सकता
  1012. 49:13है। जिससे ना तो वह नॉलेज के अगेंस्ट जाता
  1013. 49:16है और ना ही उसके मीनिंग को हार्म होता
  1014. 49:19है। अगर कोई यह बोले कि सिंबॉलिक
  1015. 49:21इंटरप्रिटेशन से क्रिश्चियन की इमोर्टिटी
  1016. 49:24का होप खत्म हो जाता है तो यह ऑब्जेक्शन
  1017. 49:27वैलिड नहीं है। क्योंकि क्रिश्चियनिटी के
  1018. 49:30आने से पहले भी लोग लाइफ आफ्टर डेथ में
  1019. 49:33बिलीव करते थे। इसलिए उन्हें ईस्टर
  1020. 49:36इवेंट्स की गारंटी की जरूरत नहीं थी। आज
  1021. 49:40के टाइम में यह डेंजर और ज्यादा बड़ा हो
  1022. 49:42गया है कि अगर चर्च की माइथोलॉजी को
  1023. 49:44बिल्कुल लिटरल माना गया तो लोग उसे एक ही
  1024. 49:47बार में पूरी तरह रिजेक्ट कर देंगे। क्या
  1025. 49:50अब यह समय नहीं आ गया है कि क्रिश्चियनिटी
  1026. 49:53माइथोलॉजी को मिटाने की जगह एक बार उसे
  1027. 49:55सिंबॉलिकली समझा जाए?
  1028. 49:59अभी यह कहना जल्दी होगा कि क्या होगा अगर
  1029. 50:01सब लोग यह मान लें कि मार्क्सिस्ट स्टेट
  1030. 50:04रिलीजन और चर्च की स्टेट रिलीजन में कितनी
  1031. 50:07डेंजरस सिमिलरिटी
  1032. 50:10है। जो सिवितेस देई का आईडिया है जिसमें
  1033. 50:14इंसान गॉड का रिप्रेजेंटेटिव है वो स्टेट
  1034. 50:16को गॉड बनाने के कांसेप्ट जैसा ही लगता
  1035. 50:20है। इग्निशियस लोयोला ने चर्च की पावर से
  1036. 50:24जो मोरल कंक्लूजन निकाला था कि एंड
  1037. 50:26जस्टिफाई करता है मी मेंस को वह भी
  1038. 50:28पॉलिटिकल झूठ के डेंजरस तरीके से लेजिड
  1039. 50:32बना देता है। दोनों चर्च और स्टेट फुल फेथ
  1040. 50:37मांगते हैं बिना क्वेश्चन के। और इससे
  1041. 50:39इंसान की फ्रीडम छीनती है। एक गॉड के
  1042. 50:42सामने की फ्रीडम और दूसरी स्टेट के सामने
  1043. 50:44की। और इसी तरह इंडिविजुअल का एकिस्टेंस
  1044. 50:48धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। इंडिविजुअल
  1045. 50:51जो लाइफ का रियल कैरियर है दोनों तरफ से
  1046. 50:53डेंजर में है। जबकि दोनों साइड्स प्रॉमिस
  1047. 50:56करती हैं कि स्पिरिचुअल या मटेरियल
  1048. 50:59पैराडाइज की। और सोचिए कितने लोग ऐसे हैं
  1049. 51:02जो एक हाथ के परिंदे दो जंगल के परिंदों
  1050. 51:05से बेहतर मानते हैं। यह वाली बात के
  1051. 51:08अगेंस्ट जा सकते
  1052. 51:10हैं। इसके अलावा वेस्ट भी वही साइंटिफिक
  1053. 51:13और रैशनलिस्टिक थिंकिंग को फॉलो करता है
  1054. 51:16जिसमें स्टैटिस्टिक्स से सब इक्वल बन जाते
  1055. 51:18हैं और गोल सिर्फ मटेरियल सक्सेस होता है।
  1056. 51:21बिल्कुल उसी तरह जैसे ईस्ट का स्टेट
  1057. 51:24रिलीजन करता
  1058. 51:25है। तो अब सवाल यह है कि वेस्ट जो खुद
  1059. 51:29पॉलिटिकल और रिलीजियस कॉन्फ्लिक्ट्स में
  1060. 51:31डिवाइडेड है, वह आज के इंसान को क्या दे
  1061. 51:34सकता
  1062. 51:35है? दुख की बात यह है कि कुछ खास नहीं।
  1063. 51:39सिर्फ अलग-अलग रास्ते जो आखिर में उसी
  1064. 51:41मार्क्सिस्ट गोल तक ले जाते हैं। ज्यादा
  1065. 51:45समझने की जरूरत नहीं। हर कोई देख सकता है
  1066. 51:47कि कम्युनिस्ट आईडियोलॉजी को क्यों लगता
  1067. 51:49है कि टाइम उसके साथ है और क्यों उसे लगता
  1068. 51:53है कि दुनिया चेंज होने के लिए रेडी है।
  1069. 51:56यह बातें इतनी क्लियरली दिख रही हैं कि
  1070. 51:58इन्हें इग्नोर करना हमारे लिए खतरा बन गया
  1071. 52:01है। अगर कोई इंसान एक बार अपने फ्रीडम
  1072. 52:04छोड़कर एक कलेक्टिव बिलीफ में पूरी तरह
  1073. 52:07भरोसा कर लेता है और अपनी पर्सनल
  1074. 52:09रिस्पांसिबिलिटी भी देने लगता है तो वह
  1075. 52:13उसी माइंडसेट में फिर किसी नए बिलीफ के
  1076. 52:15साथ भी चला जाता है अगर वह बिलीफ उससे
  1077. 52:20बेहतर लगे।
  1078. 52:22ऐसा ही कुछ टाइम पहले एक सिविलाइज्ड
  1079. 52:25यूरोपियन नेशन के साथ हुआ था। हम जर्मंस
  1080. 52:28को ब्लेम करते हैं कि वह सब भूल गए। लेकिन
  1081. 52:31सच यह है कि हमें खुद नहीं पता कि क्या
  1082. 52:33ऐसा कुछ फिर से कहीं और भी हो सकता है या
  1083. 52:36नहीं। और अगर हो जाए तो वह शॉकिंग नहीं
  1084. 52:39होगा।
  1085. 52:41अगर कोई और सिविलाइज्ड नेशन भी एक ऐसे वन
  1086. 52:44साइडेड आईडिया के इनफेक्शन में आ जाए।
  1087. 52:47अमेरिका जो अब वेस्टर्न यूरोप की रियल
  1088. 52:49पॉलिटिकल बैकबोन बन गया है वह लगता है कि
  1089. 52:52सेफ है क्योंकि उसने ओपनली एक स्ट्रांग
  1090. 52:55ऑोजिट स्टैंड लिया है लेकिन सच तो यह है
  1091. 52:59कि अमेरिका और भी ज्यादा व्नरेबल है
  1092. 53:01क्योंकि उसका एजुकेशन सिस्टम सबसे ज्यादा
  1093. 53:03साइंटिफिक थिंकिंग पे बेस्ड है। और उसकी
  1094. 53:07मिक्स्ड पपुलेशन को एक ऐसे लैंड में रूट्स
  1095. 53:10जमाना मुश्किल लगता है जिसका अपना
  1096. 53:12हिस्टोरिकल बेस ही बहुत कम
  1097. 53:15है। जो ह्यूमैनिस्टिक और हिस्टोरिकल
  1098. 53:18एजुकेशन वहां होनी चाहिए थी वह तो बस एक
  1099. 53:21सिंड्रेला जैसी छुपी हुई रियलिटी बन गई
  1100. 53:24है। यूरोप के पास यह चीज है लेकिन उसका
  1101. 53:27यूज वो नेशनलिज्म और डाउट में कर रहा है
  1102. 53:30जो खुद उसके लिए टॉक्सिक बन गया है। वेस्ट
  1103. 53:34और ईस्ट दोनों का गोल मटेरियलिस्टिक और
  1104. 53:36कलेक्टिविस्ट है और दोनों के पास वह एक
  1105. 53:39चीज नहीं है जो इंसान के पूरे बीइंग को टच
  1106. 53:42करती है। एक ऐसा आईडिया जिसमें इंडिविजुअल
  1107. 53:46इंसान ही सेंटर में हो। सब कुछ उसके
  1108. 53:48अराउंड
  1109. 53:49हो। ऐसा आईडिया आता ही नहीं या अगर आता है
  1110. 53:53तो सब तरफ से उसको डाउट और रेजिस्टेंस
  1111. 53:55मिलती है। और लगता है जैसे आज की दुनिया
  1112. 53:59में सबसे स्ट्रांग बिलीफ यही है कि
  1113. 54:01इंडिविजुअल की कोई रियल वैल्यू नहीं है।
  1114. 54:03जब वो बिग नंबर्स के सामने हो। हां, हम
  1115. 54:06कहते हैं कि यह कॉमन मैन का टाइम है। वह
  1116. 54:09अर्थ, एयर और वाटर का मालिक है। उसके
  1117. 54:11डिसीजंस पर नेशंस का फ्यूचर डिपेंड करता
  1118. 54:14है। लेकिन यह सब एक इल्लुजन है। असली
  1119. 54:17रियलिटी कुछ और ही है। इस रियल वर्ल्ड में
  1120. 54:20इंसान मशीन का स्लेव बन गया है। जो मशीन
  1121. 54:24उसके लिए स्पेस और टाइम कॉनक्वेयर करती
  1122. 54:27है, वही उसको कंट्रोल भी करती है। जो वॉर
  1123. 54:30टेक्नोलॉजी उसकी बॉडी को प्रोटेक्ट करने
  1124. 54:32के लिए है वही उसे डरा भी रही है और डेंजर
  1125. 54:35भी बना रही है। उसकी स्पिरिचुअल और मोरल
  1126. 54:38फ्रीडम एक साइड पर कुछ हद तक सेफ है लेकिन
  1127. 54:41दूसरी साइड में वह बिल्कुल खत्म हो चुकी
  1128. 54:44है। और ट्रेजडी के बीच में एक कॉमेडी भी
  1129. 54:47है। यह इंसान जो दुनिया के एलिमेंट्स का
  1130. 54:49किंग बन गया है। वही इंसान ऐसे आइडियाज को
  1131. 54:53पकड़ के बैठा है जो उसकी डिग्निटी को जीरो
  1132. 54:56बना देते हैं और उसकी फ्रीडम को एक
  1133. 55:01मजाक उसके पास जितनी भी चीजें हैं, जितनी
  1134. 55:04भी अचीवमेंट्स हैं, वह उसे बड़ा नहीं
  1135. 55:07बनाते बल्कि और छोटा कर देते हैं। जैसे एक
  1136. 55:11फैक्ट्री वर्कर का हाल दिखाता है जो एक
  1137. 55:14फेयर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में सिर्फ एक
  1138. 55:17नंबर बन जाता है।
  1139. 55:24यह बात हैरान करने वाली है कि इंसान जो हर
  1140. 55:27चीज का क्रिएटर, प्लानर और डिसीजन मेकर
  1141. 55:30है, वही खुद को इतना छोटा समझने लगता है।
  1142. 55:34यह जो कंट्राडिक्शन है कि इंसान खुद ही
  1143. 55:37इंसान को इतना कम वैल्यू देता है, वह सच
  1144. 55:39में एक अजीब बात
  1145. 55:41है। इसका रीजन यह हो सकता है कि इंसान
  1146. 55:44अपने बारे में श्योर ही नहीं है। मतलब
  1147. 55:47इंसान खुद अपने लिए एक पहेली है और यह बात
  1148. 55:51समझ आती है क्योंकि उसके पास अपने आप को
  1149. 55:53कंपेयर करने का कोई सॉलिड तरीका ही नहीं
  1150. 55:56है। वो अपने आप को एनिमल से अलग समझता है
  1151. 56:00एनाटॉमी और फिजियोलॉजी के बेसिस पे। लेकिन
  1152. 56:03जब बात उसकी कॉन्शियस थिंकिंग और लैंग्वेज
  1153. 56:06की होती है तो उसके पास अपने आप को जज
  1154. 56:09करने के लिए कोई क्लियर स्केल ही नहीं
  1155. 56:11होती।
  1156. 56:13इस प्लनेट पर वह एक ऐसी यूनिक चीज है जिसे
  1157. 56:16वह किसी और से कंपेयर ही नहीं कर
  1158. 56:19सकता। वह तभी कंपेयर कर पाता है अगर उसका
  1159. 56:22किसी और स्टार पर रहने वाले ह्यूमन लाइक
  1160. 56:25क्रिएचर से कांटेक्ट होता। जब तक ऐसा नहीं
  1161. 56:28होता इंसान एक ऐसे हर्मिट जैसा ही रहेगा
  1162. 56:31जो जानता है कि वह एनाटॉमी के लेवल पर
  1163. 56:34बंदरों से मिलता है। लेकिन जब साइकी की
  1164. 56:37बात आती है तो वह उनसे बिल्कुल अलग लगता
  1165. 56:40है।
  1166. 56:42और इसी सबसे इंपॉर्टेंट चीज में ही वह
  1167. 56:45अपने आप को समझ नहीं पाता। इसलिए वह हमेशा
  1168. 56:48अपने लिए एक मिस्ट्री बना रहता
  1169. 56:51है। इंसान के स्पीशीज के अंदर जो
  1170. 56:54डिफरेंसेस होते हैं वह कुछ खासेंस नहीं
  1171. 56:57रखते। अगर कंपेयर करें उस पॉसिबिलिटी से
  1172. 57:01जो किसी अलग ओरिजिन वाले लेकिन सिमिलर
  1173. 57:04स्ट्रक्चर वाले बीइंग से मिलने से मिलती।
  1174. 57:08हमारी साइकी जो कि इस प्लनेट पर इंसान के
  1175. 57:10हर बड़े हिस्टोरिकल चेंज के पीछे है वह एक
  1176. 57:13अनसॉल्वड पजल है। एक समझ से बाहर की चीज
  1177. 57:18और हमेशा कंफ्यूज करने वाली चीज भी है।
  1178. 57:21बिल्कुल वैसे ही जैसे नेचर के डीप
  1179. 57:23सीक्रेट्स होते
  1180. 57:25हैं। नेचर के केस में तो अभी भी उम्मीद है
  1181. 57:28कि हम नए डिस्कवरीज कर लेंगे। लेकिन साइकी
  1182. 57:31के केस में लोगों में एक अजीब हेजिटेशन
  1183. 57:34होती है। साइकोलॉजी सबसे यंग साइंस है और
  1184. 57:39अभी तक वह अपने रियल सब्जेक्ट के पास भी
  1185. 57:42प्रॉपर्ली नहीं पहुंची
  1186. 57:44है। जैसे पहले लोग सोलर सिस्टम को गलत
  1187. 57:47समझते थे और कॉपरनिकस ने वह प्रजुडिस
  1188. 57:50हटाया वैसे ही साइकोलॉजी को भी पहले
  1189. 57:53माइथोलॉजिकल आईडिया से आजाद करना पड़ा। और
  1190. 57:56फिर यह बिलीफ तोड़ना पड़ा कि साइकी सिर्फ
  1191. 57:59ब्रेन के केमिकल प्रोसेस का साइड इफेक्ट
  1192. 58:01है या फिर एक ऐसी चीज है जिसको समझना
  1193. 58:04पॉसिबल ही नहीं।
  1194. 58:07ब्रेन के साथ साइकी का कनेक्शन होना यह
  1195. 58:09प्रूव नहीं करता कि साइकी सिर्फ एक सेकंड
  1196. 58:12हैंड इफेक्ट है। हां, हमें पता है कि
  1197. 58:14ब्रेन के चेंजेस से साइकी डिस्टर्ब हो
  1198. 58:17सकती है। और यह इतना स्ट्रांग प्रूफ लगता
  1199. 58:19है कि लोग मान लेते हैं कि साइकी बस एक
  1200. 58:21साइड इफेक्ट ही है।
  1201. 58:25लेकिन पैरासाइकोलॉजी के फिनोमिना हमें
  1202. 58:28वर्न करते हैं। कि साइकिक चीजें स्पेस और
  1203. 58:32टाइम को अलग तरीके से फील करती
  1204. 58:34हैं। इसलिए यह कहना जल्दी होगा कि साइकी
  1205. 58:38और फिजिकल चीजों के बीच का लिंक आसान है।
  1206. 58:43लोग पैरासाइकोलॉजी के रिजल्ट्स को इग्नोर
  1207. 58:45कर देते हैं। या तो फिलॉसोफिकल रीजन से या
  1208. 58:48सिर्फ इंटेलेक्चुअल लेजीनेस की वजह से।
  1209. 58:52लेकिन यह अप्रोच साइंटिफिक नहीं कहला
  1210. 58:54सकती। चाहे लोग ऐसे ही आसान तरीके से निकल
  1211. 58:58लें इस डिफिकल्ट प्रॉब्लम से।
  1212. 59:01अगर हमें साइकी को समझना है तो हमें उसके
  1213. 59:04साथ आने वाले सभी फिनोमिना को भी सीरियसली
  1214. 59:07लेना
  1215. 59:08पड़ेगा। इसलिए अब ऐसी साइकोलॉजी नहीं चल
  1216. 59:11सकती जो अनकॉन्शियस या पैरासाइकोलॉजी को
  1217. 59:14इग्नोर
  1218. 59:15करे। ब्रेन के स्ट्रक्चर और उसकी बॉडी
  1219. 59:18फंक्शनंस साइकी के प्रोसेस को एक्सप्लेन
  1220. 59:21नहीं कर सकते।
  1221. 59:23साइकी अपने आप में एक अलग नेचर रखती है जो
  1222. 59:27किसी और चीज में रिड्यूस नहीं की जा सकती।
  1223. 59:32जैसे फिजियोलॉजी एक अपना इंडिपेंडेंट
  1224. 59:35फील्ड है, वैसे ही साइकी भी एक
  1225. 59:37इंडिपेंडेंट एक्सपीरियंस फील्ड है। और यह
  1226. 59:41इंपॉर्टेंट इसलिए है क्योंकि साइकी के
  1227. 59:43अंदर ही कॉन्शियसनेस होती है जो लाइफ के
  1228. 59:45एकिस्टेंस के लिए जरूरी है। अगर
  1229. 59:48कॉन्शियसनेस ना हो तो प्रैक्टिकली दुनिया
  1230. 59:51का होना भी मीनिंगलेस हो जाता। क्योंकि
  1231. 59:54दुनिया तभी तक है जब तक साइकी उसे समझ
  1232. 59:56सके, उसे एक्सप्रेस कर सके। इसलिए
  1233. 59:59कॉन्शियसनेस होना एक्सिस्टेंस की कंडीशन
  1234. 1:00:02है और साइकी को हम कॉस्मिक प्रिंसिपल का
  1235. 1:00:05स्टेटस देना पड़ता है क्योंकि वह फिजिकल
  1236. 1:00:09एकिस्टेंस के प्रिंसिपल के बराबर
  1237. 1:00:11इंपॉर्टेंट है। इस कॉन्शियसनेस का जो
  1238. 1:00:14कैरियर है वह इंडिविजुअल इंसान है। वो
  1239. 1:00:17साइकी को खुद से प्रोड्यूस नहीं करता
  1240. 1:00:19बल्कि वह साइकी के थ्रू पहले से ही बना
  1241. 1:00:22होता है। और उसकी कॉन्शियसनेस बचपन से
  1242. 1:00:25धीरे-धीरे डेवलप होती है।
  1243. 1:00:29अगर साइकी को इतना इंपॉर्टेंट माना गया है
  1244. 1:00:31तो इंडिविजुअल को भी उतना हीेंस मिलना
  1245. 1:00:34चाहिए क्योंकि वही साइकी का रियल डायरेक्ट
  1246. 1:00:38प्रूफ है। इस बात को क्लियरली हाईलाइट
  1247. 1:00:41करना बहुत जरूरी है दो रीज़ंस की वजह से।
  1248. 1:00:44पहला रीजन यह है कि इंडिविजुअल सकी
  1249. 1:00:47क्योंकि वह एकदम यूनिक होती है। वह
  1250. 1:00:49स्टैटिस्टिक्स के रूल का एक्सेप्शन होती
  1251. 1:00:52है। और जब उसे स्टैटिस्टिक्स के लेवल पर
  1252. 1:00:55जज किया जाता है तो उसकी असली क्वालिटी
  1253. 1:00:57छीन जाती है। दूसरा रीजन यह है कि चर्चेस
  1254. 1:01:01इंडिविजुअल साइकी को तभी वैलिड मानते हैं
  1255. 1:01:04जब वह उनके डॉग मास को एक्सेप्ट करें।
  1256. 1:01:08मतलब जब वह खुद को एक कलेक्टिव कैटेगरी
  1257. 1:01:10में डाल दें। दोनों केसेस में
  1258. 1:01:12इंडिविजुअलिटी को एक सेल्फ सेंटर्ड ज़िद
  1259. 1:01:15माना जाता है। साइंस उसे सब्जेक्टिविज्म
  1260. 1:01:19बोलकर उसकी वैल्यू कम कर देती है। और चर्च
  1261. 1:01:22उसे हेरेसी और स्पिरिचुअल प्राइड बोलकर
  1262. 1:01:24मोरली कंडेम करते हैं। लेकिन यह बात याद
  1263. 1:01:27रखनी चाहिए कि क्रिश्चियनिटी का कोर सिंबल
  1264. 1:01:30एक इंसान की इंडिविजुअल लाइफ
  1265. 1:01:33है। सन ऑफ मैन का सिंबल और वो यह भी मानता
  1266. 1:01:38है कि इंडिविजुअलिटी का प्रोसेस खुद गॉड
  1267. 1:01:41की प्रेजेंस और रेवोल्यूशन
  1268. 1:01:43है। इसलिए सेल्फ का डीप होना एक ऐसी चीज
  1269. 1:01:46बन जाता है जिसका रियल मीनिंग अभी तक लोग
  1270. 1:01:49समझ ही नहीं पाए क्योंकि लोग बाहर की
  1271. 1:01:51चीजों पर इतना फोकस करते हैं कि उन्हें
  1272. 1:01:54अंदर के रियल एक्सपीरियंस तक पहुंचने का
  1273. 1:01:56रास्ता ही ब्लॉक हो जाता है।
  1274. 1:02:00अगर इंडिविजुअल की फ्रीडम इतनी स्ट्रांगली
  1275. 1:02:02डिजायर्ड ना होती लोगों के अंदर तो यह
  1276. 1:02:05इंडिविजुअलिटी का आईडिया कब का मोरली और
  1277. 1:02:08स्पिरिचुअली क्रश हो गया होता।
  1278. 1:02:12यह सारी प्रॉब्लम्स ह्यूमन साइकी को समझने
  1279. 1:02:15में मुश्किल जरूर बनाती हैं। लेकिन इन
  1280. 1:02:17सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट एक और चीज है जो
  1281. 1:02:20मेंशन करना जरूरी
  1282. 1:02:22है। यह बात हर साइकेट्रिस्ट एक्सपीरियंस
  1283. 1:02:26करता है कि साइकी को इग्नोर करना और
  1284. 1:02:28साइकोलॉजी से दूरी बनाना यह सब काफी हद तक
  1285. 1:02:32फियर से होता है। यह फियर उस डर का रिजल्ट
  1286. 1:02:36होता है कि कहीं अनकॉन्शियस माइंड में ऐसी
  1287. 1:02:38चीजें ना मिल जाए जो डरावनी हो सकती
  1288. 1:02:41हैं। यह डर सिर्फ उन लोगों तक लिमिटेड
  1289. 1:02:44नहीं है जो फ्रॉयड के अनकॉन्शियस के
  1290. 1:02:47पिक्चर से घबरा जाते हैं। यह फियर खुद
  1291. 1:02:50फ्रॉयड के अंदर भी था। उन्होंने खुद मुझसे
  1292. 1:02:54कहा कि उनकी सेक्सुअल थ्यरी को डोगमा
  1293. 1:02:57बनाना
  1294. 1:02:58पड़ा। क्योंकि वो थ्यरी एक लास्ट डिफेंस
  1295. 1:03:01थी रीजन के लिए। वरना वह ब्लैक फ्लड ऑफ
  1296. 1:03:05ओकल्टिज्म का अटैक आने से डर रहे थे।
  1297. 1:03:09फ्रॉड का मतलब यह था कि अनकॉन्शियस के
  1298. 1:03:11अंदर ऐसी चीजें होती हैं जो ओकल्ट
  1299. 1:03:14इंटरप्रिटेशन को इनवाइट कर सकती हैं और
  1300. 1:03:16वैसे ही होता भी है। यह जो आर्किक
  1301. 1:03:20वेस्टीजेस या आर्केट टिपिकल फॉर्म्स होते
  1302. 1:03:23हैं जो हमारे इंस्टिंक्ट्स पर बेस होते
  1303. 1:03:26हैं और उनका एक्सप्रेशन देते हैं। उनमें
  1304. 1:03:28एक ऐसा स्पिरिचुअल पावर होता है जो डर भी
  1305. 1:03:31जगाता है। इन्हें खत्म नहीं किया जा सकता
  1306. 1:03:35क्योंकि यह साइकी के असली फाउंडेशन है। आप
  1307. 1:03:39इन्हें लॉजिक से समझ नहीं सकते और अगर आप
  1308. 1:03:42इनका एक फॉर्म हटा भी दें तो यह किसी नए
  1309. 1:03:45फॉर्म में वापस आ जाते हैं। यही फियर
  1310. 1:03:48अनकॉन्शियस साइकी का न सिर्फ सेल्फ नॉलेज
  1311. 1:03:51को रोकता है बल्कि साइकोलॉजी के डीपर
  1312. 1:03:53अंडरस्टैंडिंग के रास्ते का सबसे बड़ा
  1313. 1:03:56बैरियर भी
  1314. 1:03:57है। कभी-कभी यह फियर इतना स्ट्रांग है कि
  1315. 1:04:01इंसान खुद से भी यह एक्सेप्ट नहीं करता कि
  1316. 1:04:03उसे डर लग रहा है। यह एक ऐसा सवाल है जो
  1317. 1:04:07हर रिलीजियस इंसान को सीरियसली सोचना
  1318. 1:04:10चाहिए। हो सकता है उसे एक डीप आंसर मिल
  1319. 1:04:15जाए। साइंस बेस्ड साइकोलॉजी को
  1320. 1:04:18एब्स्ट्रैक्ट ही रहना पड़ता है। मतलब वह
  1321. 1:04:21अपने ऑब्जेक्ट से थोड़ा दूर रहता है ताकि
  1322. 1:04:23उसे कंप्लीटली ना खो दे।
  1323. 1:04:26इसीलिए लैब बेस्ड साइकोलॉजी के रिजल्ट्स
  1324. 1:04:29अक्सर बोरिंग और यूज़लेस लगते हैं। जितना
  1325. 1:04:33ज्यादा एक रियल इंडिविजुअल ऑब्जेक्ट स्टडी
  1326. 1:04:35का फोकस बनेगा उतना ही डीप डिटेल्ड और
  1327. 1:04:38जिंदा नॉलेज मिलेगी।
  1328. 1:04:40लेकिन इससे एक और बात होती
  1329. 1:04:43है जो ऑब्जेक्ट हम स्टडी करते हैं वह भी
  1330. 1:04:47उतना ही कॉम्प्लेक्स हो जाता है और जितना
  1331. 1:04:49ज्यादा इंडिविजुअल फैक्टर्स होते हैं उतनी
  1332. 1:04:52ही अनसर्टेनिटी बढ़ती
  1333. 1:04:54है और एयर के चांसेस भी बढ़ जाते हैं। यह
  1334. 1:04:59रीजन है कि एकेडमिक साइकोलॉजी इस रिस्क से
  1335. 1:05:01डरते हुए कॉम्प्लेक्स सिचुएशंस को अवॉइड
  1336. 1:05:04करना पसंद करती
  1337. 1:05:06है। वह खुद डिसाइड करती है कि नेचर से कौन
  1338. 1:05:09सा सवाल पूछना है। मेडिकल साइकोलॉजी अभी
  1339. 1:05:13उस कंफर्टेबल पोजीशन से काफी दूर है।
  1340. 1:05:17यहां पर सवाल डॉक्टर नहीं पूछता। सवाल
  1341. 1:05:20ऑब्जेक्ट यानी पेशेंट पूछता है।
  1342. 1:05:24डॉक्टर के सामने कुछ ऐसे फैक्ट्स आते हैं
  1343. 1:05:26जो उसने ना तो चुने हैं और ना ही वह कभी
  1344. 1:05:29चुनता अगर उसके पास फ्री चॉइस होती।
  1345. 1:05:33यहां बीमारी या पेशेंट ही वह रियल सवाल
  1346. 1:05:36उठाता है। मतलब नेचर खुद डॉक्टर से
  1347. 1:05:38एक्सपेरिमेंट करती है और उससे जवाब चाहती
  1348. 1:05:41है। जो पेशेंट है उसकी इंडिविजुअलिटी और
  1349. 1:05:45उसकी सिचुएशन इतनी स्ट्रांग होती है कि
  1350. 1:05:47डॉक्टर उसे इग्नोर नहीं कर सकता। उसे कुछ
  1351. 1:05:50कहना ही पड़ता है।
  1352. 1:05:53डॉक्टर होने का फर्ज उसे फोर्स करता है कि
  1353. 1:05:56वह उस सिचुएशन का सामना करें। जहां हर तरफ
  1354. 1:06:00अनसर्टेनिटी ही अनसर्टेनिटी होती है। शुरू
  1355. 1:06:04में वह जनरल एक्सपीरियंस पर बेस्ड
  1356. 1:06:06प्रिंसिपल्स अप्लाई करेगा। लेकिन जल्दी ही
  1357. 1:06:09उसे समझ आ जाएगा कि यह प्रिंसिपल्स काफी
  1358. 1:06:11नहीं है। वो एक्चुअल फैक्ट्स को एक्सप्लेन
  1359. 1:06:15नहीं कर पाते। जितना डीप वह समझने लगता है
  1360. 1:06:18उतना ही जनरल प्रिंसिपल्स का मतलब कम होने
  1361. 1:06:20लगता है।
  1362. 1:06:23लेकिन वही प्रिंसिपल्स ऑब्जेक्टिव नॉलेज
  1363. 1:06:26का बेस होते हैं और उन्हीं से मेजरमेंट की
  1364. 1:06:29जाती है। जब पेशेंट और डॉक्टर दोनों को
  1365. 1:06:32लगता है कि समझ आ गया तो पूरी सिचुएशन
  1366. 1:06:35धीरे-धीरे सब्जेक्टिव बनने लगती है। जो
  1367. 1:06:39चीज पहले एडवांटेज थी वो अब डेंजर बनने
  1368. 1:06:41लगती है। सब्जेक्टिव होना टेक्निकल
  1369. 1:06:44लैंग्वेज में ट्रांसपेरेंस और काउंटर
  1370. 1:06:47ट्रांसपेरेंस एक ऐसी अलग दुनिया क्रिएट
  1371. 1:06:49करता है जिसमें दोनों लोग एनवायरमेंट से
  1372. 1:06:52कट हो जाते हैं। एक ऐसा सोशल लिमिटेशन आ
  1373. 1:06:56जाता है जो ना डॉक्टर चाहता है ना पेशेंट।
  1374. 1:07:01लेकिन जब अंडरस्टैंडिंग ज्यादा हो जाती है
  1375. 1:07:03और नॉलेज से बैलेंस नहीं होती तो यह
  1376. 1:07:05लिमिटेशन नेचुरली आ जाती
  1377. 1:07:07है। जैसे-जैसे अंडरस्टैंडिंग डीप होती है
  1378. 1:07:11वह नॉलेज से दूर हो जाती
  1379. 1:07:14है। एक परफेक्ट अंडरस्टैंडिंग का मतलब
  1380. 1:07:16होता है कि दोनों लोग बिना सोचे एक दूसरे
  1381. 1:07:19के एक्सपीरियंस में खो
  1382. 1:07:21जाए। एक ऐसी पैसिव स्टेट जिसमें ना
  1383. 1:07:25क्रिटिकल थिंकिंग होती ना सोशल
  1384. 1:07:27रिस्पांसिबिलिटी।
  1385. 1:07:29लेकिन इतनी बड़ी अंडरस्टैंडिंग होना
  1386. 1:07:31पॉसिबल ही नहीं है। क्योंकि इसके लिए तो
  1387. 1:07:34दो अलग-अलग लोग एक जैसे हो जाए जो पॉसिबल
  1388. 1:07:37नहीं है। किसी ना किसी पॉइंट पर ऐसा लगता
  1389. 1:07:40है कि एक आदमी अपनी इंडिविजुअलिटी छोड़
  1390. 1:07:43रहा है ताकि वह दूसरे में घुल मिल जाए और
  1391. 1:07:47यही पॉइंट अंडरस्टैंडिंग को तोड़ देता है।
  1392. 1:07:50क्योंकि अंडरस्टैंडिंग तभी तक पॉसिबल है
  1393. 1:07:52जब दोनों की इंडिविजुअलिटी बरकरार रहे।
  1394. 1:07:55इसलिए यह जरूरी है कि अंडरस्टैंडिंग को
  1395. 1:07:58उसी पॉइंट तक ले जाया जाए जहां वह नॉलेज
  1396. 1:08:01के साथ बैलेंस में हो। क्योंकि सिर्फ
  1397. 1:08:03अंडरस्टैंडिंग चाहिए। यह सोचना दोनों के
  1398. 1:08:06लिए हार्मफुल हो सकता
  1399. 1:08:08है। यह प्रॉब्लम हर बार आती है जब किसी
  1400. 1:08:12कॉम्प्लेक्स पर्सनल सिचुएशन को समझना
  1401. 1:08:14पड़ता है और यही साइकोलॉजी का असली काम है
  1402. 1:08:18कि वह ऐसी नॉलेज और अंडरस्टैंडिंग दे।
  1403. 1:08:22यह काम एक रिलीजियस कन्फेसर भी कर सकता
  1404. 1:08:25था। अगर उसका रोल उसे फोर्स नहीं करता
  1405. 1:08:28होता कि वह क्रिटिकल मूवमेंट पर अपने
  1406. 1:08:31रिलीजियस रूल्स का स्केल अप्लाई करें। जब
  1407. 1:08:35ऐसा होता है तो इंडिविजुअल के राइट को एक
  1408. 1:08:37यूनिक इंसान के रूप में छोटा कर दिया जाता
  1409. 1:08:40है और वह भी उसके सबसे सेंसिटिव एरिया
  1410. 1:08:43में। यह तभी नहीं होता जब रिलीजियस सिंबल
  1411. 1:08:47जैसे क्राइस्ट की लाइफ इंसान को रियल लगे।
  1412. 1:08:49उसके एक्सपीरियंस से मैच करें।
  1413. 1:08:54आज यह कितना सच है वह मैं दूसरों पर
  1414. 1:08:57छोड़ता
  1415. 1:08:58हूं। जो डॉक्टर होता है उसे अक्सर ऐसे
  1416. 1:09:02पेशेंट्स मिलते हैं जिनके लिए रिलीजियस
  1417. 1:09:04बाउंड्रीज की कोई वैल्यू नहीं
  1418. 1:09:07होती। इसलिए डॉक्टर का काम यह डिमांड करता
  1419. 1:09:10है कि उसके पास पहले से बनाए गए आइडियाज
  1420. 1:09:13कम से कम हो। और अगर कोई पर्सन अपनी नॉन
  1421. 1:09:17वेरीिफायबल मेटाफिजिकल बिलीव्स रखता है तो
  1422. 1:09:20डॉक्टर उसकी रिस्पेक्ट करेगा। लेकिन उसे
  1423. 1:09:23यूनिवर्सल ट्रुथ नहीं मानेगा। यह केयर
  1424. 1:09:26लेना जरूरी है क्योंकि किसी की पर्सनालिटी
  1425. 1:09:29के यूनिक फीचर्स को बाहर के फोर्स से तोड़
  1426. 1:09:32मोड़ नहीं देना चाहिए।
  1427. 1:09:35डॉक्टर को यह सब छोड़ देना चाहिए। वक्त के
  1428. 1:09:38साथ होने वाले इनर डेवलपमेंट पे, उस इंसान
  1429. 1:09:40के एनवायरमेंट पे और बड़े सेंस में उसकी
  1430. 1:09:44किस्मत पे चाहे वो वाइज हो या
  1431. 1:09:50फुलिश। बहुत लोगों को यह लग सकता है कि
  1432. 1:09:53एक्स्ट्रा कॉशन कुछ ज्यादा हो रही है।
  1433. 1:09:55लेकिन जब दो इंसानों के बीच बातचीत चलती
  1434. 1:09:58है, तब उसमें ऑलरेडी इतने सारे म्यूचुअल
  1435. 1:10:01इफेक्ट्स होते हैं। चाहे दोनों कितना भी
  1436. 1:10:03पोलाइटली बात करें।
  1437. 1:10:05इसलिए एक रिस्पांसिबल डॉक्टर यह नहीं
  1438. 1:10:07चाहेगा कि पेशेंट के ऊपर ऑलरेडी जो
  1439. 1:10:10कलेक्टिव प्रेशर है उसमें वह और कुछ और ऐड
  1440. 1:10:13करें।
  1441. 1:10:16डॉक्टर यह भी जानता है कि अगर वह पेशेंट
  1442. 1:10:18को अच्छी बातें भी प्रीच करें तो या तो
  1443. 1:10:22पेशेंट ओपनली गुस्सा करेगा या अंदर ही
  1444. 1:10:24अंदर रेजिस्टेंस डेवलप करेगा और इस तरह
  1445. 1:10:27ट्रीटमेंट का गोल खतरे में पड़ जाएगा।
  1446. 1:10:31आजकल पेशेंट के माइंड पर ऑलरेडी बहुत
  1447. 1:10:34प्रेशर होता है। एड्स, प्रोपेगेंडा और हर
  1448. 1:10:37तरह के एडवाइस उसको हर तरफ से मिल रही
  1449. 1:10:39होती हैं। तो शायद पहली बार उसे एक ऐसा
  1450. 1:10:43रिलेशनशिप मिलना चाहिए जहां उसे यह ना
  1451. 1:10:46सुनना पड़े कि तुम्हें क्या करना चाहिए और
  1452. 1:10:48तुम्हें क्या बनना चाहिए। और ऐसे पावरलेस
  1453. 1:10:52कमांड्स ना मिले।
  1454. 1:10:54बाहर के प्रेशर के अगेंस्ट और पेशेंट के
  1455. 1:10:57माइंड के अंदर भी जो रिएक्शन चलते हैं उन
  1456. 1:10:59सबके बीच डॉक्टर को एक डिफेंडर बनना पड़ता
  1457. 1:11:02है। लोग डरते हैं कि अगर ऐसा छोड़ा जाए तो
  1458. 1:11:06पेशेंट के अंदर के वाइल्ड इंस्टिंक्ट्स
  1459. 1:11:08बाहर आ जाएंगे। लेकिन यह डर बहुत ज्यादा
  1460. 1:11:11बढ़ा चढ़ा के बोला जाता
  1461. 1:11:13है। क्योंकि ऑलरेडी इंसान के अंदर और बाहर
  1462. 1:11:16सेफ्टी सिस्टम्स होते हैं। सबसे पहले तो
  1463. 1:11:19ज्यादातर लोग नेचुरली कावट होते हैं।
  1464. 1:11:24उसके बाद मोरलिटी, गुड टेस्ट और लीगल
  1465. 1:11:28रूल्स भी होते हैं। यह डर कुछ भी नहीं है
  1466. 1:11:31उस एफर्ट के सामने जो किसी इंसान को अपने
  1467. 1:11:34रियल इंडिविजुअल सेल्फ को समझने में लगता
  1468. 1:11:37है। और जब कभी इंडिविजुअल इंपल्ससेस बहुत
  1469. 1:11:40तेजी से और बिना सोचे समझे बाहर आती हैं
  1470. 1:11:43तो डॉक्टर को पेशेंट को उसके खुद के शॉर्ट
  1471. 1:11:46साइटेड रूट या सिनिकल बिहेवियर से बचाना
  1472. 1:11:50पड़ता है।
  1473. 1:11:53जब यह डीप बातचीत चलती रहती है तो एक
  1474. 1:11:56पॉइंट आता है जहां पेशेंट के इनर
  1475. 1:11:58इंपल्ससेस को समझना जरूरी हो जाता है तब
  1476. 1:12:02तक पेशेंट इतना मैच्योर हो चुका होता है
  1477. 1:12:04कि वह खुद अपने डिसीजंस अपने समझ से ले
  1478. 1:12:08सके ना कि सिर्फ इसलिए क्योंकि सोसाइटी ने
  1479. 1:12:11बोला या कन्वेंशन फॉलो करना
  1480. 1:12:14है। अगर वह अपने पैरों पर खुद नहीं खड़ा
  1481. 1:12:18है तो सो कॉल्ड ऑब्जेक्टिव वैल्यूस उसके
  1482. 1:12:21किसी काम की नहीं क्योंकि तब वह सिर्फ
  1483. 1:12:24कैरेक्टर के सब्सीट्यूट बन जाते हैं और
  1484. 1:12:26उसकी इंडिविजुअलिटी को और दबा देते हैं।
  1485. 1:12:29हां, सोसाइटी का फुल राइट है कि वह खुद को
  1486. 1:12:33प्रोटेक्ट करें। उन लोगों से जो सिर्फ
  1487. 1:12:35अपनी ही सोच चलाना चाहते हैं।
  1488. 1:12:39लेकिन जब सोसाइटी के मेंबर्स खुद अपनी
  1489. 1:12:41इंडिविजुअलिटी भूल चुके होते हैं तो वह
  1490. 1:12:43आसानी से किसी रूथलेस लीडर के हाथ में आ
  1491. 1:12:46जाते हैं। चाहे वह कितने भी ग्रुप्स या
  1492. 1:12:49ऑर्गेनाइजेशंस बना लें। वही ग्रुपिंग उनकी
  1493. 1:12:52इंडिविजुअलिटी को खत्म कर देता है और वह
  1494. 1:12:55किसी डिक्टेटर के कंट्रोल में चले जाते
  1495. 1:12:59हैं। 1 मिलियन जीरो मिलके भी एक वन नहीं
  1496. 1:13:03बनाते।
  1497. 1:13:05आखिर में सब कुछ इंडिविजुअल की क्वालिटी
  1498. 1:13:08पर डिपेंड करता है। लेकिन आज का जमाना
  1499. 1:13:10सिर्फ बिग नंबर्स और क्राउड थिंकिंग में
  1500. 1:13:12ही सोचता है। जबकि दुनिया ऑलरेडी देख चुकी
  1501. 1:13:16है कि एक डिसिप्लिन भीड़ एक पागल इंसान के
  1502. 1:13:19हाथ में क्या कर सकती है। लेकिन अफसोस यह
  1503. 1:13:23बात लोगों तक पूरी तरह पहुंची ही नहीं है।
  1504. 1:13:26और यह अंधापन बहुत डेंजरस है। लोग बिना
  1505. 1:13:29सोचे समझे ऑर्गेनाइज करते जा रहे हैं और
  1506. 1:13:32मास एक्शन में ही सॉल्यूशन ढूंढ रहे
  1507. 1:13:35हैं। उन्हें पता भी नहीं होता कि सबसे
  1508. 1:13:38बड़ी ऑर्गेनाइजेशन सिर्फ तब चलती हैं जब
  1509. 1:13:40उनके लीडर्स सबसे ज्यादा रूथलेस होते हैं
  1510. 1:13:43और उनका स्लोगन सबसे सस्ता होता है। बड़ी
  1511. 1:13:47अजीब बात है कि चर्चेस भी अब मास एक्शन का
  1512. 1:13:50यूज करना चाहते हैं ताकि वह इविल को दूसरे
  1513. 1:13:53इविल से निकाल सकें। वही चर्चेस जिनका काम
  1514. 1:13:56है एक-एक सोल को
  1515. 1:13:59बचाना। उन्होंने शायद यह बेसिक रूल सुना
  1516. 1:14:02ही नहीं है कि मास में इंडिविजुअल मोरली
  1517. 1:14:05और स्पिरिचुअली नीचे गिर जाता है। इसलिए
  1518. 1:14:08वह अपने असली काम को सीरियसली नहीं
  1519. 1:14:11लेते। जो है एक इंसान को इनर चेंज तक ले
  1520. 1:14:15जाना। एक स्पिरिचुअल रिब्थ तक अगर गॉड ने
  1521. 1:14:18अलव किया।
  1522. 1:14:20यह क्लियरली दिख रहा है कि अगर इंडिविजुअल
  1523. 1:14:23अंदर से चेंज नहीं होता तो सोसाइटी भी कभी
  1524. 1:14:27चेंज नहीं होगी। क्योंकि सोसाइटी सिर्फ उन
  1525. 1:14:29इंडिविजुअल्स का ग्रुप है जो खुद रिडेंशन
  1526. 1:14:32के लिए फाइट कर रहे हैं। इसलिए मुझे लगता
  1527. 1:14:35है कि जब चर्चेस इंडिविजुअल को एक सोशल
  1528. 1:14:37मशीन का हिस्सा बना देते हैं और उसे उसकी
  1529. 1:14:41जिम्मेदारी भुला देते हैं तो वह अपना ही
  1530. 1:14:44काम डिस्ट्रॉय कर रहे होते
  1531. 1:14:46हैं। उन्हें इंसान को उस माइंडलेस क्राउड
  1532. 1:14:49से बाहर निकालना चाहिए और उसे बताना चाहिए
  1533. 1:14:52कि वही सबसे इंपॉर्टेंट है और दुनिया को
  1534. 1:14:55बचाने का मतलब है एक सोल को बचाना एक
  1535. 1:14:58आत्मा को। हां, मास मीटिंग्स में यह सब
  1536. 1:15:01बोल दिया जाता है और क्राउड को इंप्रेस
  1537. 1:15:03करने की कोशिश की जाती है। लेकिन जब यह
  1538. 1:15:06एक्साइटमेंट खत्म होती है, तो वही क्राउड
  1539. 1:15:08किसी और नए और लाउड स्लोगन के पीछे भाग
  1540. 1:15:11जाती
  1541. 1:15:13है। अगर इंसान का गॉड के साथ पर्सनल
  1542. 1:15:17कनेक्शन होता, तो यह सब गलत इनफ्लुएंसेस
  1543. 1:15:20उस पर काम ही नहीं
  1544. 1:15:21करते। क्या कभी क्राइस्ट ने अपने
  1545. 1:15:24डिसाइपल्स को किसी मास मीटिंग्स में
  1546. 1:15:26बुलाया था? क्या जब उन्होंने 5000 लोगों
  1547. 1:15:29को खिलाया था तो वह लोग बाद में क्रुसिफाई
  1548. 1:15:32हिम चिल्लाने वालों में नहीं
  1549. 1:15:35थे। और जब पीटर जैसे लोग भी कमजोर हो गए
  1550. 1:15:39थे तो क्या यह नहीं दिखाता कि पब्लिक
  1551. 1:15:41ओपिनियन पर चलने से कुछ नहीं होता। जीसस
  1552. 1:15:45और पॉल दोनों ने अपने पर्सनल एक्सपीरियंस
  1553. 1:15:47पर भरोसा किया और अपना अलग रास्ता चुना।
  1554. 1:15:51पब्लिक ओपिनियन की परवाह किए बिना।
  1555. 1:15:55यह बात हमें कंफ्यूज नहीं करनी चाहिए कि
  1556. 1:15:57चर्च किस रियल सिचुएशन का सामना कर रही
  1557. 1:16:01है। जब चर्च कोशिश करता है कि वह एक बी
  1558. 1:16:06शेप क्राउड को एक कम्युनिटी बनाए जहां
  1559. 1:16:10लोगों को एक बिलीफ के अंदर जोड़ा जाए
  1560. 1:16:12सजेशंस के जरिए और जब वह उस कम्युनिटी को
  1561. 1:16:15बनाए रखने की कोशिश करती है तो वह सिर्फ
  1562. 1:16:17एक सोशल काम नहीं कर रहा होता।
  1563. 1:16:21बल्कि वह एक इंडिविजुअल को एक मीनिंगफुल
  1564. 1:16:23लाइफ का फॉर्म भी दे रहा होता है। लेकिन
  1565. 1:16:26यह जो गिफ्ट्स हैं, यह अक्सर सिर्फ इंसान
  1566. 1:16:28की एकिस्टिंग टेंडेंसी को कंफर्म करते
  1567. 1:16:31हैं। उन्हें चेंज नहीं
  1568. 1:16:33करते। एक्सपीरियंस यह दिखाता है कि चाहे
  1569. 1:16:36इंसान कितना भी कम्युनिटी में हो। उसका
  1570. 1:16:40अंदर का इंसान ज्यादा कुछ चेंज नहीं होता।
  1571. 1:16:43उसका एनवायरमेंट उसे वह नहीं दे सकता जो
  1572. 1:16:46सिर्फ वह खुद मेहनत और दर्द से पा सकता
  1573. 1:16:48है। उल्टा अगर एनवायरमेंट ज्यादा अच्छा हो
  1574. 1:16:51तो इंसान का यह डेंजरस टेंडेंसी और
  1575. 1:16:53स्ट्रांग हो जाती है कि सब कुछ बाहर से
  1576. 1:16:55मिलेगा। इवन वह इनर चेंज भी जो सिर्फ अंदर
  1577. 1:16:59से हो सकता है और जो आज की मास कल्चर और
  1578. 1:17:02आने वाले पॉपुलेशन के प्रॉब्लम्स को देखते
  1579. 1:17:05हुए और भी अर्जेंट
  1580. 1:17:07है। हमें यह सोचना होगा कि हम मास
  1581. 1:17:10ऑर्गेनाइजेशंस में क्या-क्या मिला रहे हैं
  1582. 1:17:13और इंसान का असली नेचर क्या है? मतलब एक
  1583. 1:17:16रियल इंसान ना कि एक स्टैटिस्टिकल
  1584. 1:17:19नंबर। यह तभी पॉसिबल होगा जब एक नया सेल्फ
  1585. 1:17:23अंडरस्टैंडिंग का प्रोसेस शुरू हो। हर मास
  1586. 1:17:25मूवमेंट जैसे एक्सपेक्टेड है बहुत आसानी
  1587. 1:17:29से एक स्लोप पर स्लाइड कर जाती है। जहां
  1588. 1:17:31नंबर्स ही सब कुछ होते हैं। जहां ज्यादा
  1589. 1:17:34लोग होते हैं वहां लोगों को सेफ्टी लगती
  1590. 1:17:36है। जो सब मानते हैं वह सोच होना चाहिए।
  1591. 1:17:41जो सब चाहते हैं वह जरूरी होना चाहिए और
  1592. 1:17:44इसी वजह से सही भी लगता है। भीड़ के शोर
  1593. 1:17:47में एक ऐसी पावर होती है जो अपनी इच्छा
  1594. 1:17:50फोर्स से पूरा करवा लेती है। लेकिन सबसे
  1595. 1:17:53अच्छी बात लगती है यह इजी और पेनलेस
  1596. 1:17:56फीलिंग जहां इंसान वापस बचपन की दुनिया
  1597. 1:17:58में चला जाता है। पेरेंट्स के केयर में
  1598. 1:18:01बिना जिम्मेदारी केयर फ्री दुनिया में।
  1599. 1:18:04ऊपर से सब कुछ सोचा जाता है, डिसाइड होता
  1600. 1:18:07है। हर सवाल का जवाब मिलता है। हर नीड के
  1601. 1:18:11लिए कुछ ना कुछ मिल जाता है। मासमैन का यह
  1602. 1:18:15चाइलिश ड्रीम इतना अनरियलिस्टिक होता है
  1603. 1:18:18कि वह कभी यह नहीं सोचता कि इस पैराडाइज
  1604. 1:18:20का बिल कौन भर रहा है। यह हिसाब किताब
  1605. 1:18:24किसी बड़े पॉलिटिकल या सोशल पावर के हवाले
  1606. 1:18:27कर दिया जाता है। वह पावर खुश होती है यह
  1607. 1:18:30सब उठाकर क्योंकि इससे उसकी पावर और बढ़
  1608. 1:18:33जाती है और जितनी पावर उसके पास होती है
  1609. 1:18:36उतना ही इंसान कमजोर और हेल्पलेस हो जाता
  1610. 1:18:40है। जहां भी यह टाइप का सोशल सिस्टम लार्ज
  1611. 1:18:43स्केल पर बन जाता है। वहां टरेनी का
  1612. 1:18:46रास्ता खुल जाता है। और इंसान की फ्रीडम
  1613. 1:18:49स्पिरिचुअल और फिजिकल स्लेवरी में बदल
  1614. 1:18:52जाती है। हर टरेनी अपने आप में इमोरल और
  1615. 1:18:56रूथलेस होती है। इसलिए उसके पास मेथड चूज़
  1616. 1:19:00करने की ज्यादा फ्रीडम होती है एज कंपेयर
  1617. 1:19:02टू उन सिस्टम्स के जो इंडिविजुअल को अभी
  1618. 1:19:04भी वैल्यू देते
  1619. 1:19:06हैं। अगर ऐसा कोई सिस्टम एक ऑर्गेनाइज्ड
  1620. 1:19:09स्टेट से टकराता है तो उसे तुरंत फील होता
  1621. 1:19:12है कि उसकी मोरलिटी एक डिसएडवांटेज बन गई
  1622. 1:19:15है। और फिर वह भी वही मेथड्स यूज़ करना
  1623. 1:19:19शुरू कर देता है जो उसका अपोनेंट करता
  1624. 1:19:22है। इस तरह बुराई फैल जाती है। चाहे
  1625. 1:19:26डायरेक्ट इनफेक्शन ना भी हो। और यह डेंजर
  1626. 1:19:30और बड़ा हो जाता है। जहां सब कुछ नंबर्स
  1627. 1:19:32और स्टैटिस्टिक्स के बेसिस पर मेजर किया
  1628. 1:19:35जाता है। जैसे वेस्ट में होता
  1629. 1:19:38है। मास की चोकिंग पावर हर रोज किसी न
  1630. 1:19:41किसी फॉर्म में न्यूज़ में दिखाई जाती है
  1631. 1:19:43और इंडिविजुअल को बार-बार बताया जाता है
  1632. 1:19:46कि उसकी कोई वैल्यू नहीं है। ओल्ड
  1633. 1:19:49आइडियल्स जैसे लिबर्टी, इगेलिटेट,
  1634. 1:19:52फ्रेटरनिटी उसकी हेल्प नहीं करते क्योंकि
  1635. 1:19:55अब वह सिर्फ अपने एग्जीक्यूशनर्स यानी
  1636. 1:19:58भीड़ के लीडर से अपील कर सकता
  1637. 1:20:00है। ऑर्गेनाइज्ड मास के अगेंस्ट सिर्फ वही
  1638. 1:20:04आदमी खड़ा हो सकता है जो अपने
  1639. 1:20:05इंडिविजुअलिटी में भी उतना ही स्ट्रांग हो
  1640. 1:20:08जितना मास अपनी यूनिटी में
  1641. 1:20:11है। मुझे पता है कि आज के इंसान के लिए यह
  1642. 1:20:15बात मुश्किल लगती है। वह ओल्ड बिलीफ की
  1643. 1:20:18इंसान एक माइक्रो कॉस्म है। एक छोटी
  1644. 1:20:21दुनिया जो बड़े कॉस्मोस का रिफ्लेक्शन है
  1645. 1:20:23वह बिलीफ कब का छूट चुका है। जबकि उसकी
  1646. 1:20:28साइकी जो दुनिया को समझने और बनाने में
  1647. 1:20:30काम आती है, उसने उसे यह सिखाया होता तो
  1648. 1:20:35ज्यादा बेहतर
  1649. 1:20:36होता। इंसान के अंदर दुनिया का पूरा इमेज
  1650. 1:20:39बस गया होता है। वह इस इमेज को खुद भी
  1651. 1:20:43मनाता है और वह उसके अंदर भी होता है। यह
  1652. 1:20:46इसलिए होता है क्योंकि उसके अंदर
  1653. 1:20:48रिफ्लेक्टिव कॉन्शियसनेस होती है और उसके
  1654. 1:20:52इंस्टिंक्ट्स उसे नेचर से जोड़ते हैं।
  1655. 1:20:55लेकिन यह इंस्टिंक्ट सिर्फ जोड़ते ही नहीं
  1656. 1:20:57बल्कि उसे तोड़ते भी हैं क्योंकि उसके
  1657. 1:21:00डिजायर्स उसे अलग-अलग डायरेक्शन में
  1658. 1:21:02खींचते
  1659. 1:21:03हैं। इस वजह से वह अक्सर खुद से लड़ता
  1660. 1:21:06रहता है और मुश्किल से ही अपने जीवन को एक
  1661. 1:21:09ही गोल दे पाता
  1662. 1:21:11है। और अगर वह ऐसा करता भी है तो उसे अपनी
  1663. 1:21:15बाकी नेचर को दबाना पड़ता है जिसका प्राइस
  1664. 1:21:18उसे हैवी पड़ता
  1665. 1:21:20है। कभी-कभी लगता है कि क्या यह वन साइडेड
  1666. 1:21:24लाइफ जीना वर्थ भी है क्योंकि इंसान की
  1667. 1:21:26साइकी का नेचर स्टेट होता है। उसके
  1668. 1:21:29पार्ट्स का एक दूसरे से टकराना एक इंटरनल
  1669. 1:21:33केओस। बुद्धिज्म इसको बोलता है अटैचमेंट
  1670. 1:21:37टू द 100 थाउजेंड थिंग्स। और ऐसे स्टेट को
  1671. 1:21:41जरूरत होती है ऑर्डर की और सिंथेसिस
  1672. 1:21:45की। जैसा भीड़ कीटिक मूवमेंट्स हमेशा एक
  1673. 1:21:48दूसरे से टकरा के खत्म हो जाती है। और तब
  1674. 1:21:52एक डिक्टेटर की विल उन सबको एक डायरेक्शन
  1675. 1:21:54में ले जाती है। वैसे ही एक इंसान जब वह
  1676. 1:21:57अंदर से टूटा होता है, उसे भी एक स्ट्रांग
  1677. 1:22:00और क्लियर डायरेक्शन चाहिए होती है। ईगो
  1678. 1:22:04कॉन्शियसनेस चाहती है कि वह खुद यह
  1679. 1:22:06डायरेक्शन दे। लेकिन वह भूल जाता है कि
  1680. 1:22:09उसके अंदर कुछ अनकॉन्शियस पावर भी हैं जो
  1681. 1:22:12उसके प्लांस को बिगाड़ देती हैं। अगर वह
  1682. 1:22:14सिंथेसिस तक पहुंचना चाहता है तो सबसे
  1683. 1:22:17पहले उसे यह समझना होगा कि यह अनकॉन्शियस
  1684. 1:22:19पावर क्या
  1685. 1:22:21है? उसे इन्हें एक्सपीरियंस करना होगा या
  1686. 1:22:25फिर उसके पास कोई ऐसा सिंबल होना चाहिए जो
  1687. 1:22:28इन पावर्स को एक्सप्रेस करता हो और
  1688. 1:22:30सिंथेसिस तक ले जाता हो।
  1689. 1:22:33एक ऐसा रिलीजियस सिंबल जो मॉडर्न इंसान के
  1690. 1:22:35अंदर जो कुछ हो रहा है उसको दिखाए। वह
  1691. 1:22:39शायद यह काम कर सकता है। लेकिन जो तरीका
  1692. 1:22:41अब तक क्रिश्चियन सिंबल को समझने का रहा
  1693. 1:22:44है वो यह काम नहीं कर पाया। उल्टा जो
  1694. 1:22:47दुनिया में इतना बड़ा डिवीजन आया है वह
  1695. 1:22:49क्रिश्चियन दुनिया के अंदर ही क्लियरली
  1696. 1:22:51दिख रहा है। और जो क्रिश्चियन नजरिया है
  1697. 1:22:55वो कम्युनिज्म जैसी पुरानी सोशल सिस्टम को
  1698. 1:22:57वापस आने से नहीं रोक पाया। इसका मतलब यह
  1699. 1:23:01नहीं कि क्रिश्चियनिटी खत्म हो गई
  1700. 1:23:03है। मैं तो यह मानता हूं कि क्रिश्चियनिटी
  1701. 1:23:06खत्म नहीं हुई। पर हमने जो सोच बना रखी है
  1702. 1:23:10उसके बारे में वह आउटडेटेड हो चुकी है।
  1703. 1:23:13क्रिश्चियन सिंबल एक जिंदा चीज है। जो
  1704. 1:23:15अपने अंदर ही नए ग्रोथ के सीड्स रखता है।
  1705. 1:23:18वह आगे बढ़ सकता है। यह सिर्फ हम पर
  1706. 1:23:21डिपेंड करता है कि क्या हम फिर से
  1707. 1:23:23सीरियसली और डीपली क्रिश्चियन बेस पर
  1708. 1:23:25ध्यान देना चाहते हैं या नहीं।
  1709. 1:23:29इसके लिए हमें इंडिविजुअल को एक नई नजर से
  1710. 1:23:32देखना होगा। उस सेल्फ के माइक्रोकोज्म के
  1711. 1:23:35रूप में जो अब तक हमने नहीं
  1712. 1:23:37देखा। इसलिए हमें यह भी नहीं पता कि इंसान
  1713. 1:23:40के लिए अभी कौन से रास्ते खुले हैं। वह
  1714. 1:23:43कैसे इनर एक्सपीरियंसेस से गुजर सकता है
  1715. 1:23:46और रिलीजियस मिथ के पीछे का एक्चुअल
  1716. 1:23:49साइकिक ट्रुथ क्या
  1717. 1:23:50है। सब कुछ एक ऐसे अंधेरे में छुपा है
  1718. 1:23:54जहां किसी को समझ नहीं आता कि इसमें
  1719. 1:23:56इंटरेस्ट क्यों लें?
  1720. 1:23:58या अपने आप को किस गोल के लिए डडीिकेट
  1721. 1:24:01करें।
  1722. 1:24:03इस प्रॉब्लम के सामने हम बिल्कुल हेल्पलेस
  1723. 1:24:05खड़े हैं और यह कोई हैरानी की बात नहीं है
  1724. 1:24:10क्योंकि जितने भी स्ट्रांग कार्ड्स हैं वह
  1725. 1:24:12सब हमारे अपोनेंट्स के हाथ में है। वो
  1726. 1:24:14अपने स्ट्रांग आर्मीज और पावर का यूज करके
  1727. 1:24:17इंप्रेस करते हैं। पॉलिटिक्स, साइंस और
  1728. 1:24:21टेक्नोलॉजी उनके साइड में है। साइंस के
  1729. 1:24:24आर्गुमेंट्स सबसे लॉजिकल और पावरफुल लगते
  1730. 1:24:27हैं। और आज का इंसान मान लेता है कि वही
  1731. 1:24:29अल्टीमेट ट्रुथ है। क्योंकि उसे बार-बार
  1732. 1:24:32बताया गया है कि पुराने जमाने के लोग
  1733. 1:24:34अंधेरे में थे और उनके बिलीव्स बैकवर्ड
  1734. 1:24:38थे। लेकिन यह नहीं सोचता कि उसके टीचर्स
  1735. 1:24:41खुद गलत कंपैरिजनंस कर रहे हैं। उन चीजों
  1736. 1:24:45को कंपेयर कर रहे हैं जो कंपेयर ही नहीं
  1737. 1:24:47की जा सकती। और जब वो अपने क्वेश्चंस किसी
  1738. 1:24:50इंटेलेक्चुअल एक्सपर्ट से पूछता है तो वह
  1739. 1:24:53लोग ऑलमोस्ट हमेशा एग्री करते हैं कि जो
  1740. 1:24:56साइंस के लिए आज इंपॉसिबल है वह हमेशा
  1741. 1:24:58इंपॉसिबल रहा है। फेथ के फैक्ट्स जो इंसान
  1742. 1:25:02को एक स्पिरिचुअल बेस दे सकते हैं उन्हें
  1743. 1:25:04भी साइंस के फैक्ट्स के लेवल पर ही जज
  1744. 1:25:06किया जाता
  1745. 1:25:08है। तो जब एक इंसान चर्च या उनके
  1746. 1:25:11रिप्रेजेंटेटिव से सवाल करता है जो उसकी
  1747. 1:25:14सोल की केयर के लिए बने हैं तो उसे कहा
  1748. 1:25:17जाता है कि रिलीजन का मतलब है किसी क्रीड
  1749. 1:25:19का मेंबर बनना जो कि एक पॉलिटिकल टाइप का
  1750. 1:25:23सिस्टम है और उसे यह भी बोला जाता है कि
  1751. 1:25:26फेथ के फैक्ट्स एक्चुअल हिस्टोरिकल
  1752. 1:25:28इवेंट्स हैं और कुछ रिचुअल्स मिरेकुलस
  1753. 1:25:31रिजल्ट्स लाते हैं और क्राइस्ट के दर्द ने
  1754. 1:25:34उसे सीन और उसके पनिशमेंट से बचा लिया है।
  1755. 1:25:38अब अगर वह इंसान अपने लिमिटेड
  1756. 1:25:40अंडरस्टैंडिंग से इन सब चीजों पर सोचे तो
  1757. 1:25:43उसे लगता है कि या तो इन सब बातों पर बिना
  1758. 1:25:46सोचे विश्वास करो या फिर इन्हें रिजेक्ट
  1759. 1:25:48कर दो क्योंकि यह समझ ही नहीं आती। आज का
  1760. 1:25:52इंसान आसानी से स्टेट की तरफ से आए सब
  1761. 1:25:55ट्रुथ्स को समझ जाता है। लेकिन रिलीजन को
  1762. 1:25:58समझना उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाता है
  1763. 1:26:01क्योंकि उसे कुछ एक्सप्लेन ही नहीं किया
  1764. 1:26:03जाता।
  1765. 1:26:05जैसे बाइबल में लिखा है क्या तुम समझ रहे
  1766. 1:26:08हो जो पढ़ रहे हो? उसने कहा कैसे समझूंगा
  1767. 1:26:11अगर कोई गाइड ही ना हो। लेकिन फिर भी अगर
  1768. 1:26:14उसने अपने रिलीजियस बिलीफ अब तक नहीं
  1769. 1:26:16छोड़े तो उसका रीजन यह है कि रिलीजन का
  1770. 1:26:19इंपल्स एक इंस्टिंक्ट है। और वह इंसान के
  1771. 1:26:22अंदर नेचुरली होता है। आप उसके गॉड्स उससे
  1772. 1:26:27ले सकते हो। लेकिन कुछ और गॉड्स उसे देने
  1773. 1:26:30पड़ेंगे। मास स्टेट के लीडर्स चाहे या ना
  1774. 1:26:33चाहे वह डिफाइड बन ही जाते हैं। और जहां
  1775. 1:26:38यह फोर्सफुली नहीं होता वहां कुछ ऑब्सेसिव
  1776. 1:26:41फोर्सेस उनकी जगह ले लेती हैं। जैसे पैसा,
  1777. 1:26:44काम, पॉलिटिक्स, इट सी। और यह सब चीजें
  1778. 1:26:48इतनी पावरफुल हो जाती हैं कि वह डीमन बन
  1779. 1:26:50जाती हैं इंसान के लिए।
  1780. 1:26:53जब कोई भी नेचुरल ह्यूमन फंक्शन खो जाता
  1781. 1:26:56है या उसे जान के एक्सप्रेस नहीं किया
  1782. 1:26:59जाता तो पूरी सिस्टम में डिस्टरबेंस आ
  1783. 1:27:02जाती
  1784. 1:27:03है। इसलिए यह बिल्कुल नेचुरल है कि जब
  1785. 1:27:06रीजन की देवी जीत गई तो मॉडर्न इंसान में
  1786. 1:27:10एक जनरल न्यूरोसिस आना शुरू हो गया। एक
  1787. 1:27:13ऐसी पर्सनालिटी का टूटना जैसे आज दुनिया
  1788. 1:27:16दो हिस्सों में बंटी दिख रही
  1789. 1:27:18है। आयरन कर्टन के
  1790. 1:27:21साथ यह बाउंड्री जो तारों से भरी हुई है
  1791. 1:27:25इंसान के दिमाग के अंदर भी चलती है। चाहे
  1792. 1:27:28वह किस साइड हो।
  1793. 1:27:30और जैसे एक न्यूरोटिक इंसान अपने शैडो
  1794. 1:27:32साइड को नहीं जानता वैसे ही एक नॉर्मल
  1795. 1:27:35इंसान भी अपने शैडो को दूसरे में देखता
  1796. 1:27:37है। अपने नेबर में या उस आदमी में जो उस
  1797. 1:27:40डिवाइड के दूसरी साइड
  1798. 1:27:43है। यह तो अब पॉलिटिकल और सोशल ड्यूटी बन
  1799. 1:27:47चुकी है कि एक तरफ के कैपिटलिज्म को और
  1800. 1:27:50दूसरी तरफ के कम्युनिज्म को शैतान कहना है
  1801. 1:27:53ताकि लोग बाहर देखें लेकिन अंदर अपने खुद
  1802. 1:27:55के लाइफ में ना देखें।
  1803. 1:27:59लेकिन जैसे एक न्यूरोटिक इंसान भले ही वह
  1804. 1:28:02अपनी दूसरी साइड को ना जाने उसे फिर भी यह
  1805. 1:28:05फील होता है कि उसके अंदर कुछ गड़बड़ है।
  1806. 1:28:07वैसे ही वेस्टर्न आदमी को भी अपनी साइकी
  1807. 1:28:10और साइकोलॉजी में नेचुरली इंटरेस्ट आने
  1808. 1:28:13लगा
  1809. 1:28:14है। इसीलिए डॉक्टर को मजबूरन दुनिया के
  1810. 1:28:17स्टेज पर आना पड़ता है। और उसे ऐसे सवाल
  1811. 1:28:21पूछे जाते हैं जो इंसान के सबसे पर्सनल और
  1812. 1:28:24हिडन लाइफ से जुड़े होते हैं। लेकिन जो
  1813. 1:28:26असल में उस टाइम की स्पिरिट यानी जििदगस्त
  1814. 1:28:30का इफेक्ट होते
  1815. 1:28:32हैं क्योंकि यह प्रॉब्लम्स पर्सनल
  1816. 1:28:34सिम्टम्स के रूप में दिखते हैं। लोग
  1817. 1:28:36इन्हें न्यूरोटिक कहते हैं और सही भी कहते
  1818. 1:28:39हैं क्योंकि यह बचपन की फेंटसीस होती हैं
  1819. 1:28:41जो एक एडल्ट साइकी के कंटेंट के साथ मैच
  1820. 1:28:44नहीं करती और इसीलिए मोरल जजमेंट उन्हें
  1821. 1:28:48रिप्रेस कर देता है अगर वह कॉन्शियस माइंड
  1822. 1:28:51तक पहुंच भी जाए तो।
  1823. 1:28:55इनफेंटसीस का ज्यादातर हिस्सा कभी
  1824. 1:28:58कॉन्शियसली याद ही नहीं आता और लगता है कि
  1825. 1:29:01शायद यह कभी कॉन्शियस थी ही नहीं। यह तो
  1826. 1:29:05हमेशा से अंदर थी या फिर अनकॉन्शियस में
  1827. 1:29:07डेवलप हुई और वहीं छुपी
  1828. 1:29:10रही। जब तक साइकोलॉजिस्ट की हेल्प से यह
  1829. 1:29:13कॉन्शियस सरफेस तक नहीं आ गई। अनकॉन्शियस
  1830. 1:29:16फेंटसीज का एक्टिव होना तब होता
  1831. 1:29:19है जब कॉन्शियस माइंड किसी बहुत ही
  1832. 1:29:22क्रिटिकल सिचुएशन में होता है। अगर ऐसा ना
  1833. 1:29:25होता तो यह फेंटसीज नॉर्मली आती और उसके
  1834. 1:29:30बाद न्यूरोटिक डिस्टरबेंस भी दिख जाता।
  1835. 1:29:32लेकिन सच यह है कि यह फेंटसीज असल में
  1836. 1:29:35बचपन की दुनिया से आती हैं और सिर्फ तब
  1837. 1:29:38तकलीफ देती हैं जब कुछ अबनॉर्मल चीजें
  1838. 1:29:41कॉन्शियसली उन्हें अर्ली ही स्ट्रांग कर
  1839. 1:29:43देती हैं।
  1840. 1:29:45यह तब ज्यादा होता है जब पेरेंट से कुछ
  1841. 1:29:48नेगेटिव इनफ्लुएंस मिलता है जो एटमॉस्फियर
  1842. 1:29:51को पोइजन करता है और चाइल्ड के अंदर
  1843. 1:29:54कॉन्फ्लिक्ट क्रिएट करता है जिससे उसका
  1844. 1:29:56साइकोलॉजिकल बैलेंस हिल जाता है जब एक
  1845. 1:30:00एडल्ट में न्यूरोसिस टूट कर बाहर आता है
  1846. 1:30:03तो बचपन की फेंटसी वर्ल्ड फिर से लौट आती
  1847. 1:30:06है और ऐसे में लगता है कि न्यूरोसिस की
  1848. 1:30:10वजह यही फेंटसीज है लेकिन यह नहीं बताता
  1849. 1:30:13कि इन फेंटसीज ने बीच के समय में कुछ
  1850. 1:30:16क्यों नहीं किया? वो इफेक्ट तभी आते हैं
  1851. 1:30:19जब इंसान ऐसे सिचुएशन में आ जाता है जिसे
  1852. 1:30:22वह कॉन्शियसली हैंडल नहीं कर
  1853. 1:30:26सकता। तब उसकी पर्सनालिटी का डेवलपमेंट
  1854. 1:30:29रुक जाता है और वह फेंटसी जो हर इंसान के
  1855. 1:30:31अंदर चुप होती हैं उनका दरवाजा खुल जाता
  1856. 1:30:35है। जब कॉन्शियस माइंड स्मूथली चल रहा
  1857. 1:30:38होता है तो यह फेंटसीज एक्टिव नहीं होती।
  1858. 1:30:41लेकिन जब यह इंटेंस हो जाती हैं तो वह
  1859. 1:30:44कॉन्शियस माइंड में घुसने लगती
  1860. 1:30:46हैं और एक ऐसा कॉन्फ्लिक्ट क्रिएट करती
  1861. 1:30:49हैं जो पेशेंट को दिखने लगता है और वह खुद
  1862. 1:30:53को दो अलग-अलग पर्सनालिटी के रूप में
  1863. 1:30:55महसूस करता है।
  1864. 1:30:58लेकिन यह पर्सनालिटी का स्प्लिट पहले से
  1865. 1:31:01अनकॉन्शियस में रेडी था। जब कॉन्शियसनेस
  1866. 1:31:04से निकली हुई एनर्जी जो यूज नहीं हो रही
  1867. 1:31:07थी। अनकॉन्शियस माइंड की नेगेटिव पार्ट्स
  1868. 1:31:09को स्ट्रांग करने लगी और स्पेशली उसके
  1869. 1:31:12चाइलिश पार्ट्स को।
  1870. 1:31:15बचपन के नॉर्मल फेंटसीज असल में वही होती
  1871. 1:31:18हैं जो इंस्टिंक्ट से पैदा होने वाली
  1872. 1:31:20इमेजिनेशन होती हैं। और इन्हें फ्यूचर के
  1873. 1:31:23कॉन्शियस सेक्शंस के लिए प्रैक्टिस की तरह
  1874. 1:31:26समझा जा सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि
  1875. 1:31:30न्यूरोटिक इंसान की फेंटसीज भी चाहे वह
  1876. 1:31:32कितनी भी बदल चुकी हो या एनर्जी के रिवर्स
  1877. 1:31:35फ्लो से उल्टी पुलटी हो गई हो। उनके अंदर
  1878. 1:31:38भी एक नॉर्मल इंस्टिंक्ट का कोर होता है।
  1879. 1:31:41जिसका मेन साइन होता है एडप्टेशन।
  1880. 1:31:46न्यूरोटिक इलनेस का मतलब होता है कि
  1881. 1:31:49नॉर्मल इंस्टिंक्टिव एनर्जी और इमेजिनेशन
  1882. 1:31:51का शेप बिगड़ गया है। लेकिन इंस्टिंक्ट्स
  1883. 1:31:55बहुत पुराने और कंजर्वेटिव होते हैं। उनका
  1884. 1:31:57एनर्जी का फ्लो भी और उनका शेप
  1885. 1:32:03भी। जब इंस्टिंक्ट्स माइंड में दिखते हैं
  1886. 1:32:06तो वह इमेज की फॉर्म में आते हैं जो उस
  1887. 1:32:09इंपल्स को विजुअली और क्लियरली शो करता
  1888. 1:32:11है। जैसे एक तस्वीर
  1889. 1:32:15अगर हम यूका मौथ के साइकी को देख पाते तो
  1890. 1:32:18हमें वहां ऐसे इमेज मिलते जो नुमिनोस और
  1891. 1:32:22फैसनेटिंग होते जो उस मौथ को पुश करते हैं
  1892. 1:32:25कि वह यूका प्लांट को फर्टिलाइज करें और
  1893. 1:32:28उसे यह पूरा सिचुएशन पहचानने में हेल्प भी
  1894. 1:32:32करते इंस्टिंक्ट्स कभी भी अंधा और वेग
  1895. 1:32:35इंपल्स नहीं होते। वो हमेशा एक एग्जैक्ट
  1896. 1:32:38एक्सटर्नल सिचुएशंस के साथ टर्नड होते
  1897. 1:32:42हैं। और इसी वजह से उसका शेप स्पेसिफिक और
  1898. 1:32:45यूनिक होता
  1899. 1:32:47है। जैसा इंस्टिंक्ट ओरिजिनल और
  1900. 1:32:50इन्हहेरिटेड होता है वैसा ही उसका शेप भी
  1901. 1:32:53बहुत पुराना होता है। इसलिए उस शेप को
  1902. 1:32:57आर्कटाइपल कहते
  1903. 1:32:58हैं। वो इंसान के बॉडी के शेप से भी
  1904. 1:33:01पुराना और ज्यादा कंजर्वड होता है। यह सब
  1905. 1:33:05बायोलॉजिकल पॉइंट्स इंसान पर भी अप्लाई
  1906. 1:33:07होते हैं। चाहे उसके पास कॉन्शियसनेस, विल
  1907. 1:33:11और रीजन
  1908. 1:33:12हो। यह फैक्ट कि हमारी कॉन्शियस एक्टिविटी
  1909. 1:33:16इंस्टिंक्ट से ही निकली है और उससे ही
  1910. 1:33:19अपनी एनर्जी और बेसिक आईडिया की शेप लेती
  1911. 1:33:21है। यह ह्यूमन साइकोलॉजी के लिए उतना ही
  1912. 1:33:24इंपॉर्टेंट है जितना किसी भी एनिमल
  1913. 1:33:26स्पीशीज के
  1914. 1:33:27लिए। इंसान का नॉलेज असल में क्या है? वह
  1915. 1:33:31हमेशा उन पुराने आईडिया पैटर्न्स को नए
  1916. 1:33:34सिचुएशन के हिसाब से एडजस्ट करता रहता
  1917. 1:33:37है। यह पैटर्न्स हमें पहले से ही दिए गए
  1918. 1:33:41होते हैं। उन्हें बदलना इसलिए जरूरी होता
  1919. 1:33:43है क्योंकि उनका ओरिजिनल शेप तो एक पुराने
  1920. 1:33:46जमाने की लाइफ के लिए बना था ना कि आज के
  1921. 1:33:49कॉम्प्लेक्स वर्ल्ड के लिए।
  1922. 1:33:51अगर हम चाहते हैं कि इंस्टिंक्ट की एनर्जी
  1923. 1:33:53हमारे लाइफ में बनी रहे जो कि हमारे जीने
  1924. 1:33:57के लिए जरूरी है तो हमें इन पुराने आर्के
  1925. 1:34:00टाइपल शेप्स को आज के टाइम के अकॉर्डिंग
  1926. 1:34:03नए आइडियाज में बदलना पड़ेगा।
  1927. 1:34:12हमारी सोच का एक प्रॉब्लम यह है कि वह
  1928. 1:34:14हमेशा दुनिया के बदलते हालत से पीछे रह
  1929. 1:34:18जाती है। यह होना भी नेचुरल है। क्योंकि
  1930. 1:34:22जब तक दुनिया में कुछ बदल नहीं रहा होता
  1931. 1:34:24हमारी सोच भी ठीक-ठाक काम करती रहती है।
  1932. 1:34:27तो फिर उसे बदलने की कोई जरूरत महसूस नहीं
  1933. 1:34:30होती।
  1934. 1:34:33लेकिन जब बाहर की सिचुएशन इतनी बदल जाती
  1935. 1:34:36है कि वह हमारी पुरानी सोच से बिल्कुल मैच
  1936. 1:34:39नहीं करती तब एक बड़ी प्रॉब्लम खड़ी होती
  1937. 1:34:42है। हमारी दुनिया को समझने का जो नजरिया
  1938. 1:34:46है उसका सवाल उठता है और साथ ही यह सवाल
  1939. 1:34:50भी आता है कि जो पुराने सिंबल्स हैं जो
  1940. 1:34:53हमारे इंस्टिंक्ट्स को एनर्जी देते हैं
  1941. 1:34:55उन्हें कैसे नए तरीके से समझाया जाए या
  1942. 1:34:59एडजस्ट किया जाए।
  1943. 1:35:01इन्हें हम सिर्फ नए रशनल आईडिया से
  1944. 1:35:04रिप्लेस नहीं कर
  1945. 1:35:05सकते क्योंकि वह सिर्फ बाहर की दुनिया के
  1946. 1:35:09हिसाब से बनेंगे ना कि इंसान के अंदर की
  1947. 1:35:11बायोलॉजिकल नीड्स
  1948. 1:35:13के और ऐसे आइडियाज ना तो असली इंसान से
  1949. 1:35:17कनेक्शन बनाएंगे और ना ही उसके पास
  1950. 1:35:19पहुंचने का रास्ता खुला छोड़ेंगे।
  1951. 1:35:23मार्क्सिस्ट एजुकेशन भी यही करती है। वह
  1952. 1:35:25भी इंसान को गॉड की तरह शेप करना चाहती
  1953. 1:35:28है। लेकिन स्टेट के इमेज में आज हमारी
  1954. 1:35:32बेसिक सोच ज्यादा रशनल बन गई है। फिलॉसफी
  1955. 1:35:35पहले जैसा जीने का तरीका नहीं रही। वह अब
  1956. 1:35:38बस एक एकेडमिक सब्जेक्ट बन चुकी है। हमारे
  1957. 1:35:41रिलीजंस और उनके पुराने रिचुअल्स चाहे वह
  1958. 1:35:44अपने आप में जस्टिफाइड क्यों ना हो।
  1959. 1:35:47एक ऐसे दुनिया का नजरिया दिखाते हैं जो
  1960. 1:35:50मिडिल एजेस में तो काम करता था लेकिन आज
  1961. 1:35:52के इंसान के लिए वह अजीब और समझ से बाहर
  1962. 1:35:54हो गया है। फिर भी मॉडर्न साइंटिफिक
  1963. 1:35:58थिंकिंग के साथ टकराव होने के बावजूद
  1964. 1:36:01इंसान के अंदर एक डीप इंस्टिंक्ट होता
  1965. 1:36:04है। जो उसे इन पुरानी आइडियाज से जुड़े
  1966. 1:36:07रहने के लिए बोलता है। चाहे वह आइडियाज
  1967. 1:36:10लिटरल समझने पर पिछले 500 सालों के
  1968. 1:36:13डेवलपमेंट को इग्नोर करते हो। इसका एक ही
  1969. 1:36:16रीजन होता है कि इंसान खुद को टोटल
  1970. 1:36:19डिस्पेयर में गिरने से बचाना चाहता
  1971. 1:36:21है। और जब हम रेशनल लोग कहते हैं कि आज की
  1972. 1:36:26रिलीजन नैरो माइंडेड आउटडेटेड और टू लिटरल
  1973. 1:36:28हो गई है तब भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए
  1974. 1:36:32कि क्रीड एक ऐसे बिलीफ को दिखाता है जिसका
  1975. 1:36:35सिंबल एक अपनी अलग लाइफ रखता है क्योंकि
  1976. 1:36:38वह आर्कटाइपल होता है। इसलिए हर केस में
  1977. 1:36:42इंटेलेक्ट जरूरी नहीं होता। सिर्फ तब होता
  1978. 1:36:45है जब किसी के लिए लॉजिक ही सबसे बड़ी
  1979. 1:36:48पावर हो। सबसे बड़ी बात यह है कि आज फेथ
  1980. 1:36:52और नॉलेज के बीच एक बड़ा गैप बन गया है।
  1981. 1:36:55यह दोनों इतने अलग हो गए हैं कि ऐसे लगता
  1982. 1:36:58है कि दोनों अलग दुनिया को देख रहे हैं।
  1983. 1:37:02लेकिन दोनों का कंसर्न तो वही दुनिया है
  1984. 1:37:04जिसमें हम जीते हैं। क्योंकि थियोलॉजी भी
  1985. 1:37:08यह कहती है कि फेथ कुछ हिस्टोरिकल फैक्ट्स
  1986. 1:37:11पर बेस्ड है। जैसे कि क्राइस्ट का रियल
  1987. 1:37:14इंसान के रूप में जन्म लेना। उनके
  1988. 1:37:17मिरेकल्स, उनका दुख, उनकी डेथ पोंटियस
  1989. 1:37:20पिलेटे के टाइम पर और फिर उनका वापस जिंदा
  1990. 1:37:24होना। थियोलॉजी मना करती है कि यह सब
  1991. 1:37:26मिथ्स हैं और इन्हें सिंबॉलिक माना जाए।
  1992. 1:37:31लेकिन कुछ थियोलॉजियंस ने अब यह ट्राई
  1993. 1:37:33किया है कि वह अपने फेथ के ऑब्जेक्ट को डी
  1994. 1:37:38मिथोलजाइज करेंगे।
  1995. 1:37:42वह भी सिर्फ इसलिए ताकि नॉलेज के आगे झुक
  1996. 1:37:45सके। लेकिन वह अपनी लाइन उस जगह पर खींच
  1997. 1:37:48लेते हैं जहां सबसे इंपॉर्टेंट बात होती
  1998. 1:37:50है। जो लोग क्रिटिकल थिंकिंग करते हैं
  1999. 1:37:53उनके लिए यह साफ है कि मिथ हर रिलीजन का
  2000. 1:37:56बेसिक हिस्सा होता है और अगर उसे हटा दिया
  2001. 1:37:59जाए तो फेथ को नुकसान होता है। यह जो फेथ
  2002. 1:38:03और नॉलेज का कॉन्फ्लिक्ट है वो आज के समय
  2003. 1:38:06के मेंटल डिसऑर्डर का सिम्टम है। ऐसे लगता
  2004. 1:38:10है जैसे दो अलग लोग एक ही चीज के बारे में
  2005. 1:38:13बात कर रहे हैं। अपने-अपने पॉइंट ऑफ व्यू
  2006. 1:38:15से या एक ही आदमी दो अलग-अलग मूड में अपना
  2007. 1:38:19एक्सपीरियंस डिस्क्राइब कर रहा
  2008. 1:38:21है। अगर हम इंसान की जगह मॉडर्न सोसाइटी
  2009. 1:38:25लिखें तो यह दिखाई देता है कि सोसाइटी भी
  2010. 1:38:28मेंटली स्प्लिट हो गई है एक न्यूरोटिक
  2011. 1:38:30प्रॉब्लम
  2012. 1:38:32में। ऐसे में अगर एक ग्रुप सिर्फ राइट
  2013. 1:38:35साइड खींचता है और दूसरा लेफ्ट साइड तो यह
  2014. 1:38:38कुछ हेल्प नहीं करता। वही होता है हर
  2015. 1:38:41न्यूरोटिक माइंड में और वही तकलीफ उस
  2016. 1:38:44इंसान को डॉक्टर के पास ले जाती है। जैसे
  2017. 1:38:47मैंने पहले शॉर्ट में बताया
  2018. 1:38:50था और कुछ इंपॉर्टेंट डिटेल्स भी बताई थी
  2019. 1:38:53ताकि रीडर कंफ्यूज ना हो। डॉक्टर को
  2020. 1:38:55पेशेंट के दोनों हिस्सों से कनेक्शन बनाना
  2021. 1:38:58पड़ता है। क्योंकि सिर्फ दोनों पार्ट्स को
  2022. 1:39:00मिला के ही वह एक पूरा इंसान बना सकता है
  2023. 1:39:04ना कि सिर्फ एक पार्ट को लेके और दूसरे को
  2024. 1:39:06दबा के।
  2025. 1:39:08पेशेंट तो हमेशा से वही कर रहा था क्योंकि
  2026. 1:39:11आज की दुनिया उसे कोई और रास्ता दिखाती ही
  2027. 1:39:13नहीं। उसकी पर्सनल सिचुएशन भी वही है जो
  2028. 1:39:17सोसाइटी की कलेक्टिव सिचुएशन
  2029. 1:39:19है। वह एक छोटा सोशल मॉडल है जो पूरी
  2030. 1:39:23सोसाइटी का रिफ्लेक्शन है या फिर वो एक
  2031. 1:39:26छोटी सोशल यूनिट है जो मिलके कलेक्टिव
  2032. 1:39:29ब्रेकडाउन क्रिएट करती
  2033. 1:39:31है। यह दूसरा पॉइंट ज्यादा रियल लगता है
  2034. 1:39:34क्योंकि असली जिंदगी का करियर तो सिर्फ
  2035. 1:39:36इंडिविजुअल इंसान ही होता
  2036. 1:39:39है। सोसाइटी और स्टेट तो सिर्फ आइडियाज
  2037. 1:39:42हैं और वह तब तक ही रियल हैं जब तक कुछ
  2038. 1:39:45लोग उन्हें रिप्रेजेंट करते हैं। लोग यह
  2039. 1:39:48बात बहुत कम समझते हैं कि हमारा जमाना
  2040. 1:39:50चाहे जितना भी इरिलीजियस हो फिर भी
  2041. 1:39:53क्रिश्चियनिटी के एक खास लेगसी के नीचे जी
  2042. 1:39:56रहा है। वो है वर्ल्ड की सुप्रीमसी यानी
  2043. 1:40:00लोगस जो हमारे क्रिश्चियन फेथ का सेंटर
  2044. 1:40:04है। वर्ल्ड लिटरली हमारे गॉड बन चुके हैं
  2045. 1:40:07और वह गॉड ही बना हुआ है।
  2046. 1:40:10चाहे लोगों ने क्रिश्चियनिटी सिर्फ नाम से
  2047. 1:40:13ही सुनी हो। सोसाइटी और स्टेट जैसे वर्ड्स
  2048. 1:40:16इतने रियल बन चुके हैं कि लोग उन्हें
  2049. 1:40:18इंसान की तरह ट्रीट करने लगते
  2050. 1:40:21हैं। सड़क पर चलने वाला आदमी भी यह मानता
  2051. 1:40:25है कि स्टेट सबसे बड़ा गिवर
  2052. 1:40:27है। उससे ज्यादा कोई किंग भी कभी नहीं था।
  2053. 1:40:32लोग स्टेट को बुलाते हैं। उससे उम्मीद
  2054. 1:40:35रखते हैं। उस पर गुस्सा होते हैं। कंप्लेन
  2055. 1:40:37करते हैं। और यह सब नॉर्मल बन गया
  2056. 1:40:40है। सोसाइटी को भी एक सुप्रीम मोरल आईडिया
  2057. 1:40:44बना दिया गया है। लोग तो यह तक मानते हैं
  2058. 1:40:47कि सोसाइटी कुछ नया क्रिएट भी कर सकती है।
  2059. 1:40:51पर कोई यह नहीं देख रहा कि वर्ड की इतनी
  2060. 1:40:54रिस्पेक्ट देना एक रिस्क भी बन गया है।
  2061. 1:40:57शुरू में यह जरूरी था कि एक हिस्टोरिकल
  2062. 1:40:59फेस के लिए लेकिन अब इसका दूसरा साइड बहुत
  2063. 1:41:02डेंजरस हो गया है। जब वर्ड यानी शब्द हर
  2064. 1:41:06जगह वैलिड बन जाता है तो वह अपने डिवाइन
  2065. 1:41:09सोर्स से कट जाता है। उसके बाद चर्च एक
  2066. 1:41:12कैरेक्टर बन जाता है। स्टेट भी एक पर्सन
  2067. 1:41:14बन जाता है। शब्दों पर विश्वास बन जाता है
  2068. 1:41:19अंधविश्वास और शब्द खुद बन जाते हैं एक
  2069. 1:41:22झूठा स्लोगन जो किसी भी धोखे के लिए यूज़
  2070. 1:41:25हो सकते
  2071. 1:41:26हैं। जब अंधविश्वास आता है तब प्रोपेगेंडा
  2072. 1:41:29और एडवरटाइजिंग लोगों को बेवकूफ बनाने
  2073. 1:41:32लगती है और झूठ का स्केल दुनिया की
  2074. 1:41:35हिस्ट्री में पहली बार इतना बड़ा हो जाता
  2075. 1:41:37है। पहले जो वर्ड जो शब्द सब इंसानों को
  2076. 1:41:41एक करता था आज वही वर्ड वही शब्द सबको एक
  2077. 1:41:44दूसरे से शक करवाने लगा है। अंधविश्वास अब
  2078. 1:41:48हमारा सबसे बड़ा दुश्मन बन गया है। लेकिन
  2079. 1:41:51यही ट्रिक एक न्यूरोटिक माइंड यूज़ करता
  2080. 1:41:53है। ताकि अपने अंदर के डाउट को छुपा सके
  2081. 1:41:56या उसे खत्म कर सके।
  2082. 1:42:00लोग सोचते हैं कि अगर आप किसी को बोल दें
  2083. 1:42:03कि तुम्हें यह करना चाहिए तो वह सही
  2084. 1:42:05रास्ते पर आ जाएगा। लेकिन वह कर सकता है
  2085. 1:42:09या करना चाहता भी है या नहीं यह अलग बात
  2086. 1:42:12है। साइकोलॉजिस्ट ने यह समझ लिया है कि
  2087. 1:42:16सिर्फ बोलने, समझने या अच्छा एडवाइस देने
  2088. 1:42:18से कुछ नहीं होता। उसे पेशेंट के डिटेल्स
  2089. 1:42:21को भी समझना पड़ता है और उसके साइकी के हर
  2090. 1:42:24कोने में जाना पड़ता
  2091. 1:42:27है। उसे पेशेंट की इंडिविजुअलिटी के साथ
  2092. 1:42:30रिलेट करना पड़ता है और उसके माइंड के सब
  2093. 1:42:33अंधेरों में घुसना पड़ता है। टीचर या
  2094. 1:42:36स्पिरिचुअल गाइड भी इतनी गहराई तक नहीं
  2095. 1:42:38जाते। उसका साइंटिफिक ऑब्जेक्टिविटी
  2096. 1:42:41जिसमें कुछ भी एक्सक्लूड नहीं होता उसे
  2097. 1:42:44पेशेंट को सिर्फ एक इंसान के रूप में नहीं
  2098. 1:42:47देखने देता बल्कि एक एनिमल के रूप में भी
  2099. 1:42:50जो अपनी बॉडी से जुड़ा होता
  2100. 1:42:52है। साइंस के डेवलपमेंट ने उसका इंटरेस्ट
  2101. 1:42:55कॉन्शियस माइंड से आगे बढ़ा दिया है।
  2102. 1:42:58अनकॉन्शियस इंस्टिंक्ट्स के दुनिया तक जो
  2103. 1:43:02सेक्सुअलिटी और पावर ड्राइव से चलते हैं।
  2104. 1:43:05संत अगस्तीन के शब्दों में कनक को
  2105. 1:43:09पिसेंथिया और
  2106. 1:43:10सुपरबिया यह दोनों इंस्टिंक्ट्स एक
  2107. 1:43:14स्पीशीज को जिंदा रखने के लिए और दूसरा
  2108. 1:43:16खुद को बचाने के लिए आपस में टकराते हैं
  2109. 1:43:19और यही उनका कॉन्फ्लिक्ट होता है जिसे
  2110. 1:43:23मोरालिटी जज करती है ताकि यह टकराव जितना
  2111. 1:43:26हो सके कम हो।
  2112. 1:43:29जैसे मैंने पहले बताया था इंस्टिंक्ट के
  2113. 1:43:32दो मेन पार्ट्स होते हैं। एक तरफ होता है
  2114. 1:43:34उसका एनर्जी या फोर्स जिससे वह चलता है और
  2115. 1:43:37दूसरी तरफ होता है उसका स्पेसिफिक मीनिंग
  2116. 1:43:40या
  2117. 1:43:41इंटेंशन। बहुत ही पॉसिबल है कि इंसान के
  2118. 1:43:45हर मेंटल फंक्शन का बेस भी इंस्टिंक्ट ही
  2119. 1:43:48हो। जैसे एनिमल्स में होता
  2120. 1:43:51है। एनिमल्स में इंस्टिंक्ट उनके हर
  2121. 1:43:54बिहेवियर का मास्टर होता है। यह बात तब
  2122. 1:43:57थोड़ी अनक्लियर हो जाती है जब लर्निंग
  2123. 1:43:59एबिलिटी डेवलप होने लगती है। जैसे हायर
  2124. 1:44:02एप्स या इंसान में।
  2125. 1:44:05एनिमल्स में लर्निंग की वजह से
  2126. 1:44:07इंस्टिंक्ट्स काफी बदल जाते हैं और अलग
  2127. 1:44:09तरीके से दिखते हैं। सिविलाइज्ड इंसान में
  2128. 1:44:13इंस्टिंक्ट्स इतने टूट चुके होते हैं कि
  2129. 1:44:15सिर्फ कुछ बेसिक इंस्टिंक्ट्स ही अपने
  2130. 1:44:17ओरिजिनल फॉर्म में पहचाने जा सकते
  2131. 1:44:20हैं। सबसे इंपॉर्टेंट होते हैं वह दो
  2132. 1:44:23बेसिक इंस्टिंक्ट्स और उनके ब्रांचेस और
  2133. 1:44:26अब तक मेडिकल साइकोलॉजी सिर्फ इन्हीं पर
  2134. 1:44:28फोकस करती रही है।
  2135. 1:44:31लेकिन जब रिस्चरर्स इन इंस्टिंक्ट्स के
  2136. 1:44:33इफेक्ट्स को फॉलो करते गए तो उन्हें ऐसे
  2137. 1:44:36पैटर्न्स मिले जो किसी एक ग्रुप में
  2138. 1:44:38क्लियरली फिट नहीं होते थे।
  2139. 1:44:41एक एग्जांपल लीजिए। जिसने पावर
  2140. 1:44:43इंस्टिंक्ट्स को डिस्कवर किया, उसे भी
  2141. 1:44:45डाउट हुआ कि जो चीज सेक्सुअल इंस्टिंक्ट्स
  2142. 1:44:47लग रही थी, वह शायद पावर का ही एक्सप्रेशन
  2143. 1:44:50हो। और फ्रॉड को भी यह मानना पड़ा कि
  2144. 1:44:54सेक्स इंस्टिंक्ट के अलावा भी ईगो
  2145. 1:44:56इंस्टिंक्ट्स होते हैं। जो एडलर की थ्यरी
  2146. 1:44:59की तरफ एक क्लियरली रुख था। जब कंफ्यूजन
  2147. 1:45:03इतना हो तो यह एक्सपेक्ट करना नॉर्मल है
  2148. 1:45:06कि न्यूरोटिक सिम्टम्स दोनों थ्यरी से
  2149. 1:45:08एक्सप्लेन किए जा सकते हैं।
  2150. 1:45:10इसका मतलब यह नहीं कि दोनों ही गलत है
  2151. 1:45:13बल्कि दोनों पार्शियल ट्रुथ है और अनलाइक
  2152. 1:45:16डॉग्मेटिक थरी यह अलऊ करते हैं कि दूसरे
  2153. 1:45:18इंस्टिंक्ट्स भी एक्सिस्ट करें। जैसे
  2154. 1:45:21मैंने पहले कहा इंसान के इंस्टिंक्ट्स एक
  2155. 1:45:24सिंपल टॉपिक नहीं है।
  2156. 1:45:27लेकिन यह मान लेना गलत नहीं होगा कि इंसान
  2157. 1:45:30का लर्निंग एबिलिटी जो मोस्टली सिर्फ
  2158. 1:45:32इंसान में मिलता है। एनिमल्स के इमिटेशंस
  2159. 1:45:36इंस्टिंक्ट्स पे बेस है। और यह इमिटेशन
  2160. 1:45:39इंस्टिंक्ट दूसरे इंस्टिंक्ट्स को
  2161. 1:45:41डिस्टर्ब करती है और आखिर में उन्हें बदल
  2162. 1:45:43भी देती है। जैसे बर्ड्स दूसरे बर्ड्स के
  2163. 1:45:47ट्यून से अडॉप कर लेते हैं। इंसान को अपने
  2164. 1:45:50इंस्टिंक्ट से सबसे ज्यादा दूर ले जाता है
  2165. 1:45:53उसका सीखने का पावर जो उसके बिहेवियर को
  2166. 1:45:56कास्टेंटली चेंज करने की कोशिश करता है।
  2167. 1:46:00इसी वजह से हमारा जीवन बदल गया है और हमें
  2168. 1:46:03नए एनवायरमेंट के हिसाब से एडजस्ट करना
  2169. 1:46:05पड़ता है। लेकिन इसी प्रोसेस में उसके
  2170. 1:46:08अंदर कई साइकोलॉजिकल प्रॉब्लम्स भी शुरू
  2171. 1:46:11हो जाती
  2172. 1:46:12हैं। क्योंकि वह अपने इंस्टिंक्टिव रूट से
  2173. 1:46:15कट ऑफ हो जाता है और सिर्फ अपने कॉन्शियस
  2174. 1:46:18सेल्फ इमेज में जीने लगता
  2175. 1:46:20है। वह अपने अनकॉन्शियस को इग्नोर करता
  2176. 1:46:24है। इसलिए मॉडर्न इंसान सिर्फ वही जानता
  2177. 1:46:28है जो वह कॉन्शियसली समझ सकता है। और यह
  2178. 1:46:31भी डिपेंड करता है उसके आसपास के
  2179. 1:46:33एनवायरमेंट पे और उसकी नॉलेज और कंट्रोल
  2180. 1:46:35की डिजायर पे जिसकी वजह से उसके
  2181. 1:46:38इंस्टेंट्स बदल चुके
  2182. 1:46:41हैं। अब उसका कॉन्शियस माइंड दुनिया को
  2183. 1:46:44ऑब्जर्व करता है और वही दुनिया के नॉर्म्स
  2184. 1:46:46के हिसाब से अपनी साइकी और टेक्नोलॉजी को
  2185. 1:46:48एडजस्ट करता
  2186. 1:46:50है। यह काम इतना डिमांडिंग है और इसका
  2187. 1:46:54रिवॉर्ड इतना बड़ा लगता है कि वह खुद को
  2188. 1:46:56ही भूल जाता है और अपने इंस्टिंक्ट से दूर
  2189. 1:46:59हो जाता है। वो अपने रियल सेल्फ की जगह
  2190. 1:47:03अपनी सोची समझी इमेज में जीने लगता
  2191. 1:47:06है। ऐसे में वह धीरे-धीरे एक फेक वर्ल्ड
  2192. 1:47:09में चला जाता है। जहां उसके खुद के थॉट्स
  2193. 1:47:12रियलिटी को रिप्लेस कर देते
  2194. 1:47:14हैं। जब इंसान अपने इंस्टिंक्ट से कट हो
  2195. 1:47:17जाता है तो वह इनर कॉन्फ्लिक्ट में चला
  2196. 1:47:19जाता है। कॉन्शियस और अनकॉन्शियस स्पिरिट
  2197. 1:47:23और नेचर, नॉलेज और फेथ के बीच।
  2198. 1:47:28जब उसका कॉन्शियस माइंड अपने इंस्टिंक्ट्स
  2199. 1:47:30को दबा नहीं पाता तो यह कॉन्फ्लिक्ट
  2200. 1:47:32डेंजरस लेवल तक पहुंच जाता
  2201. 1:47:35है। जब ऐसे बहुत सारे लोग बन जाते हैं तो
  2202. 1:47:38एक मास मूवमेंट शुरू हो जाता है जो दिखाता
  2203. 1:47:42है कि वह ऑपरेस्ड लोगों का सेवियर है। और
  2204. 1:47:45क्योंकि लोगों का कॉन्शियस माइंड हमेशा
  2205. 1:47:48प्रॉब्लम को ब्लेम बाहर करता है। तो वह
  2206. 1:47:51पॉलिटिकल और सोशल चेंज मांगते हैं। सोच कर
  2207. 1:47:55कि यह अंदर के प्रॉब्लम को भी सॉल्व
  2208. 1:47:57करेगा।
  2209. 1:48:00लेकिन जब यह चेंज हो भी जाता है तो वही
  2210. 1:48:04पुरानी प्रॉब्लम वापस आ जाती है बस नए रूप
  2211. 1:48:08में। तब क्या होता है? सब कुछ उल्टा हो
  2212. 1:48:11जाता है। अंधेरा ऊपर आ जाता है और रोशनी
  2213. 1:48:14नीचे। और क्योंकि यह शैडो पार्ट हमेशा
  2214. 1:48:17वाइल्ड और अनकंट्रोलेबल होता है। जो लोग
  2215. 1:48:20फ्री हुए होते हैं उनकी फ्रीडम फिर से
  2216. 1:48:23स्ट्रिक्ट कंट्रोल में आ जाती
  2217. 1:48:25है। यह सब इसलिए होता है क्योंकि असली रूट
  2218. 1:48:28कॉज छुपा रह जाता है और सिर्फ उसका उल्टा
  2219. 1:48:31वर्जन बाहर दिख जाता
  2220. 1:48:33है। कम्युनिस्ट रिवोल्यूशन ने इंसान को और
  2221. 1:48:37भी ज्यादा गिरा दिया है। डेमोक्रेटिक
  2222. 1:48:40कलेक्टिव साइकोलॉजी से भी ज्यादा क्योंकि
  2223. 1:48:43इसने उसकी फ्रीडम सिर्फ सोशल लेवल पर नहीं
  2224. 1:48:46बल्कि मोरल और स्पिरिचुअल लेवल पर भी छीन
  2225. 1:48:49ली है। पॉलिटिकल प्रॉब्लम्स के अलावा
  2226. 1:48:52वेस्ट को एक बड़ा साइकोलॉजिकल नुकसान भी
  2227. 1:48:55हुआ है जो नाजी जर्मनी के टाइम पर भी
  2228. 1:48:58महसूस हुआ था। जब एक डिक्टेटर होता है तो
  2229. 1:49:02हम अपनी बुराइयों का ब्लेम उस पर डाल देते
  2230. 1:49:04हैं और अपने शैडो से नजर हटा लेते हैं। वो
  2231. 1:49:08क्लियरली दूसरी साइड का होता है। हमारी
  2232. 1:49:10साइड तो गुड होती है और हम समझते हैं कि
  2233. 1:49:13हम राइट आइडियल्स के मालिक हैं। एक फेमस
  2234. 1:49:17लीडर ने रिसेंटली यह तक कहा कि उसके पास
  2235. 1:49:20इविल की इमेजिनेशन ही नहीं है। वो
  2236. 1:49:22एक्चुअली यह बोल रहा था कि वेस्टर्न इंसान
  2237. 1:49:25अपने शैडो को ही खो बैठा है। अपने फेक
  2238. 1:49:28इमेज से खुद को मिला रहा है और दुनिया को
  2239. 1:49:31सिर्फ साइंटिफिक रैशनलिज्म के
  2240. 1:49:32एब्स्ट्रैक्ट ड्राइंग जैसे देख रहा
  2241. 1:49:36है। उसका रियल स्पिरिचुअल और मोरल एनिमी
  2242. 1:49:39जो उतना ही रियल है जितना वह खुद अब उसके
  2243. 1:49:42अंदर नहीं रहता बल्कि एक ज्योग्राफिकल
  2244. 1:49:45बॉर्डर के उस पार चला गया
  2245. 1:49:48है। वो बाउंड्री अब सिर्फ पॉलिटिकल लाइन
  2246. 1:49:52नहीं रही। वह तो अब उसके कॉन्शियस और
  2247. 1:49:55अनकॉन्शियस को अलग कर रही है और वह
  2248. 1:49:58सेपरेशन और भी खतरनाक होता जा रहा
  2249. 1:50:01है। सोच और फीलिंग का नेचुरल बैलेंस टूट
  2250. 1:50:04रहा है और जहां रिलीजन वीक हो गया है वहां
  2251. 1:50:07तो एक भी गॉड नहीं है जो अंदर से आए
  2252. 1:50:10अनकंट्रोल्ड साइकिक पावर को रोक सके।
  2253. 1:50:14हमारी रेशनल फिलॉसफी इस बात पर ध्यान ही
  2254. 1:50:16नहीं देती कि हमारे अंदर जो दूसरा इंसान
  2255. 1:50:19है जिसे शैडो कहकर नीचा दिखाया जाता है वह
  2256. 1:50:23हमारे कॉन्शियस प्लान से एग्री करता है या
  2257. 1:50:26नहीं करता।
  2258. 1:50:29यह जानना तो दूर। वह यह भी नहीं मानता कि
  2259. 1:50:32हमारे अंदर एक रियल शैडो होता है जो हमारे
  2260. 1:50:35इंस्टिंक्ट से बना होता
  2261. 1:50:37है। इंस्टिंक्ट की एनर्जी और इमेजेस मिलके
  2262. 1:50:40एक बेसिक सिस्टम बनाते हैं जिसे इग्नोर
  2263. 1:50:43करना हर इंसान के लिए सबसे बड़ा रिस्क
  2264. 1:50:46है। अगर कोई अपने इंस्टिंक्ट को इग्नोर या
  2265. 1:50:49तोड़ता है तो उसका रिजल्ट होता है दर्द।
  2266. 1:50:52बॉडी और माइंड दोनों लेवल पर और तब उसे
  2267. 1:50:56डॉक्टर की मदद चाहिए होती
  2268. 1:50:58है। 50 साल से ज्यादा हो गए हैं जब से
  2269. 1:51:02हमें पता है कि अनकॉन्शियस एक रियल चीज है
  2270. 1:51:05जो कॉन्शियस माइंड का काउंटर बैलेंस है।
  2271. 1:51:09मेडिकल साइकोलॉजी ने इसके प्रूफ दिए हैं।
  2272. 1:51:13एक्सपेरिमेंट्स के थ्रू भी और रियल
  2273. 1:51:15एक्सपीरियंस के थ्रू भी।
  2274. 1:51:17अनकॉन्शियस साइके एक रियलिटी है जो
  2275. 1:51:20कॉन्शियस माइंड को इनफ्लुएंस करती है।
  2276. 1:51:23लेकिन हमने अब तक इस बात का कोई
  2277. 1:51:25प्रैक्टिकल यूज नहीं किया। हम अब भी वही
  2278. 1:51:29सोच रहे हैं, वही कर रहे हैं जैसे हम एक
  2279. 1:51:32सिंपल इंसान हैं। दो पार्ट वाले नहीं।
  2280. 1:51:36इसलिए हम समझते हैं कि हम सेफ हैं, लॉजिकल
  2281. 1:51:39हैं और काइंड हैं। हम अपने मोटिव्स पर
  2282. 1:51:43डाउट नहीं करते। ना ही यह सोचते हैं कि
  2283. 1:51:45हमारे अंदर का आदमी उन कामों के बारे में
  2284. 1:51:48क्या महसूस करता है जो हम दुनिया के सामने
  2285. 1:51:51कर रहे हैं।
  2286. 1:51:54लेकिन यह सोचना एक्चुअली स्टूपिड है, शैलो
  2287. 1:51:57है और गलत भी है। और यह माइंड के लिए
  2288. 1:52:01अनहेल्दी भी
  2289. 1:52:03है। कि हम अपने अनकॉन्शियस रिएक्शन को
  2290. 1:52:06इग्नोर करें। जैसे अगर कोई अपने स्टमक या
  2291. 1:52:10हार्ट को इग्नोर करे तो इसका मतलब यह नहीं
  2292. 1:52:12कि ओवर ईट या ओवरवर्क का कोई इफेक्ट नहीं
  2293. 1:52:15होगा।
  2294. 1:52:18लेकिन हम यह समझते हैं कि मेंटल गलतियां
  2295. 1:52:20सिर्फ शब्दों से ठीक हो जाएंगी। क्योंकि
  2296. 1:52:24लोगों के लिए साइकी हवा से भी हल्की चीज
  2297. 1:52:26है। लेकिन सच यह है कि बिना साइकी के
  2298. 1:52:29दुनिया का कोई मतलब नहीं होता। इंसानों की
  2299. 1:52:33दुनिया का तो बिल्कुल भी नहीं।
  2300. 1:52:36सब कुछ ह्यूमन सोल पर ही डिपेंड करता है।
  2301. 1:52:39हमें उसे जितना हो सके उतना सीरियसली लेना
  2302. 1:52:42चाहिए। खासकर आज के समय में जब सब मानते
  2303. 1:52:47हैं कि कल का फ्यूचर किसी वाइल्ड एनिमल के
  2304. 1:52:50अटैक से नहीं ना किसी नेचुरल डिजास्टर से
  2305. 1:52:53ना ही किसी एपिडेमिक से डिसाइड होगा बल्कि
  2306. 1:52:55इंसान के अंदर होने वाले मेंटल चेंजेस से
  2307. 1:52:58होगा।
  2308. 1:53:01बस सिर्फ कुछ लीडर्स के दिमाग का बैलेंस
  2309. 1:53:04हिल जाए तो पूरी दुनिया खून, आग और
  2310. 1:53:07रेडिएशन में डूब सकती है। दोनों साइड्स के
  2311. 1:53:10पास आज सब टूल्स रेडी हैं। और जब कोई
  2312. 1:53:14डिसीजन किसी इनर और पोोजिशन के कंट्रोल के
  2313. 1:53:16बिना लिया जाता है, तो वह बहुत आसानी से
  2314. 1:53:19डेंजरस हो सकता है। जैसे एक डिक्टेटर ने
  2315. 1:53:22दिखा भी दिया था।
  2316. 1:53:25आज का इंसान अब भी बाहरी चीजों से इतना
  2317. 1:53:28चिपका हुआ है कि वह उन्हीं पर पूरा ब्लेम
  2318. 1:53:30डाल देता है। जैसे सब कुछ उन्हीं पर
  2319. 1:53:34डिपेंड करता
  2320. 1:53:35हो। यह सोच कि किसी का दिमाग अपने आउटर
  2321. 1:53:38वर्ल्ड से अलग हो जाए और अपने अंदर के थॉट
  2322. 1:53:41से चलने लगे। लोग इस पर ध्यान ही नहीं
  2323. 1:53:44देते। जबकि यह अजीब चीजें हर दिन हो रही
  2324. 1:53:47हैं और किसी के साथ भी कभी भी हो सकती
  2325. 1:53:52हैं। हमारे जमाने में कॉन्शियसनेस इतना
  2326. 1:53:56अकेला इसलिए हो गया है क्योंकि हमने अपने
  2327. 1:53:59इंस्टिंक्ट्स खो दिए
  2328. 1:54:01हैं। और इसका रीजन है इंसान के माइंड का
  2329. 1:54:04बहुत लंबा
  2330. 1:54:06डेवलपमेंट। जितना ज्यादा इंसान ने नेचर पर
  2331. 1:54:09कंट्रोल पाया उतना ही ज्यादा उसका दिमाग
  2332. 1:54:12उसके सर पर चढ़ गया। और वह नेचुरल और
  2333. 1:54:15एक्सीडेंटल चीजों को नीचा समझने लगा। उन
  2334. 1:54:18सब चीजों को भी जो लॉजिक के बाहर होती हैं
  2335. 1:54:21जिसमें अनकॉन्शियस साइकी भी आती है जो वह
  2336. 1:54:25सब है जो कॉन्शियसनेस नहीं
  2337. 1:54:28है। जहां कॉन्शियस माइंड सब्जेक्ट होता है
  2338. 1:54:32वहीं अनकॉन्शियस बिल्कुल ऑब्जेक्टिव होता
  2339. 1:54:35है। वह अलग-अलग फीलिंग्स, फेंटसीज,
  2340. 1:54:39इमोशंस, इंपल्ससेस और सपनों के रूप में
  2341. 1:54:42आता है जो इंसान खुद नहीं बनाता बल्कि जो
  2342. 1:54:46खुद ब खुद उसके पास आता
  2343. 1:54:48है। आज भी साइकोलॉजी ज्यादातर कॉन्शियस
  2344. 1:54:52माइंड की ही साइंस है। जिसे लोगों के
  2345. 1:54:55स्टैंडर्ड्स के अकॉर्डिंग मेजर किया जाता
  2346. 1:54:58है। इंडिविजुअल साइकी को सिर्फ एक रैंडम
  2347. 1:55:02एक्सीडेंट समझा जाता है और अनकॉन्शियस को
  2348. 1:55:05जो सिर्फ असली इरेशनल तरीके से बने इंसान
  2349. 1:55:08में दिखता है उसे पूरी तरह इग्नोर किया
  2350. 1:55:11गया
  2351. 1:55:12है। यह इग्नोर इसलिए नहीं हुआ क्योंकि लोग
  2352. 1:55:15केयरलेस थे या उन्हें नॉलेज नहीं था।
  2353. 1:55:18मुल्क इसलिए हुआ क्योंकि ईगो को यह पसंद
  2354. 1:55:20नहीं है कि उसके अलावा भी कोई साइकिक पावर
  2355. 1:55:24हो सकती है।
  2356. 1:55:27ईगो को लगता है कि उसकी मोनार्की खत्म हो
  2357. 1:55:30जाएगी।
  2358. 1:55:32लेकिन जो रिलीजियस इंसान होता है, वह तो
  2359. 1:55:34यह मानने का आदत डाल चुका है कि वह अपने
  2360. 1:55:37घर का अकेला मालिक नहीं है। वह मानता है
  2361. 1:55:40कि आखिरी डिसीजन गॉड का होता है ना कि
  2362. 1:55:43उसका।
  2363. 1:55:45लेकिन हम में से कितने लोग वाकई में गॉड
  2364. 1:55:47के डिसीजन पर छोड़ने की हिम्मत रखते हैं
  2365. 1:55:50और कौन एंबरेस्ड फील नहीं करेगा। अगर उसे
  2366. 1:55:54बताना पड़े कि उसका डिसीजन वाकई गॉड की
  2367. 1:55:57तरफ से आया था या नहीं।
  2368. 1:56:00जितना देखा जा सकता है रिलीजियस इंसान
  2369. 1:56:02मोस्टली अनकॉन्शियस के रिएक्शन के इफेक्ट
  2370. 1:56:05में रहता है। वह इसे कॉन्शियस का काम कहता
  2371. 1:56:09है। लेकिन क्योंकि वही अनकॉन्शियस और भी
  2372. 1:56:13रिएक्शनंस देता है जो सिर्फ मोरल नहीं
  2373. 1:56:15होते। वह अपने कॉन्शियस को ट्रेडिशनल मोरल
  2374. 1:56:18रूल्स के हिसाब से मेजर करता है जो एक
  2375. 1:56:21कलेक्टिव वैल्यू
  2376. 1:56:23है। और चर्च भी उसमें उसका फुल सपोर्ट
  2377. 1:56:26करता है।
  2378. 1:56:29जब तक इंसान अपने पुराने बिलीव्स पर टिका
  2379. 1:56:31होता है और जमाने की हालत उसे पर्सनल
  2380. 1:56:35फ्रीडम की तरफ नहीं धकेलती।
  2381. 1:56:39तब तक वह इस सेटअप से खुश रह सकता है।
  2382. 1:56:45लेकिन सब कुछ तब बदल जाता है जब
  2383. 1:56:47दुनियादारी में डूबा हुआ इंसान जो सिर्फ
  2384. 1:56:49आउटर दुनिया पर डिपेंड करता है और जिसने
  2385. 1:56:52अपना रिलीजन खो दिया है वह मास में सामने
  2386. 1:56:55आता है। जैसे कि आज हो रहा है। वह भीड़ का
  2387. 1:56:59हिस्सा होता
  2388. 1:57:01है। अब बिलीवर को डिफेंड करना पड़ता है और
  2389. 1:57:04उसे खुद से पूछना पड़ता है कि उसका बिलीफ
  2390. 1:57:06किस बेस पर टिका
  2391. 1:57:08है। अब वह पुरानी कॉमन बिलीफ की पावर से
  2392. 1:57:12सपोर्टेड नहीं है। वह चर्च की कमजोर होती
  2393. 1:57:14पोजीशन को भी महसूस करता है और उसके
  2394. 1:57:17डॉगमास पे भी शक होने लगता
  2395. 1:57:20है। इसका सशन चर्च यह बताता है और ज्यादा
  2396. 1:57:25फेथ रखो। जैसे यह फेथ एक ऐसी चीज है जो
  2397. 1:57:28इंसान की मर्जी से आती हो।
  2398. 1:57:32लेकिन फेथ का असल घर तो कॉन्शियसनेस नहीं
  2399. 1:57:35है बल्कि एक रियल स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस
  2400. 1:57:37है जो इंसान को गॉड से डायरेक्टली कनेक्ट
  2401. 1:57:41करता
  2402. 1:57:42है? तो अब सवाल यह उठता है क्या मेरे पास
  2403. 1:57:46कोई रियल रिलीजियस एक्सपीरियंस है? क्या
  2404. 1:57:49मेरा गॉड से डायरेक्ट कनेक्शन है? क्या
  2405. 1:57:51मेरे पास वह सर्टेनिटी है जो मुझे एक
  2406. 1:57:54इंडिविजुअल के रूप में भीड़ में खत्म होने
  2407. 1:57:56से बचा सके?
  2408. 1:58:03इस सवाल का एक पॉजिटिव जवाब तभी मिलता है
  2409. 1:58:06जब एक इंसान तैयार हो अपने आप को ऑनेस्टली
  2410. 1:58:09देखने और समझने के लिए। अगर वह अपनी इस
  2411. 1:58:12सोच को पूरा करता है तो उसे सिर्फ अपने
  2412. 1:58:15बारे में कुछ इंपॉर्टेंट बातें ही नहीं
  2413. 1:58:17पता चलेंगी बल्कि एक साइकोलॉजिकल फायदा भी
  2414. 1:58:21मिलेगा। उसने अपने आप को इतना इंपॉर्टेंट
  2415. 1:58:24माना कि उसने खुद पर ध्यान देना शुरू
  2416. 1:58:26किया।
  2417. 1:58:28यह एक तरह से उसने अपनी इंसानी सेल्फ
  2418. 1:58:31रिस्पेक्ट को एक्सेप्ट किया और अपनी
  2419. 1:58:33कॉन्शियसनेस की फाउंडेशन की तरफ पहला कदम
  2420. 1:58:37उठाया। मतलब अपने अनकॉन्शियस की तरफ जो
  2421. 1:58:40इकलौता सोर्स है रिलीजियस एक्सपीरियंस का।
  2422. 1:58:44इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि
  2423. 1:58:46अनकॉन्शियस का मतलब ही गॉड है या उसकी जगह
  2424. 1:58:49ले रहा है। यह सिर्फ एक ऐसा मीडियम है
  2425. 1:58:52जहां से रिलीजियस एक्सपीरियंस आता है।
  2426. 1:58:55लेकिन यह एक्सपीरियंस का असली कारण क्या
  2427. 1:58:57है? इसका जवाब इंसान की नॉलेज के बाहर है।
  2428. 1:59:00गॉड का ज्ञान एक ऐसा सवाल है जो इंसान के
  2429. 1:59:03समझ से परे
  2430. 1:59:05है। जो लोग रिलीजियस होते हैं उनके पास एक
  2431. 1:59:09बड़ा एडवांटेज होता है जब वह इस जमाने के
  2432. 1:59:11सबसे बड़े सवाल का जवाब देने की कोशिश
  2433. 1:59:14करते हैं। उन्हें क्लियरली पता होता है कि
  2434. 1:59:17उनका अपना वजूद गॉड से जुड़ा हुआ
  2435. 1:59:21है। मैं गॉड को ऐसा इसलिए बोल रहा हूं
  2436. 1:59:24क्योंकि यह एक ऐसा आईडिया है जो इंसान के
  2437. 1:59:28अनकॉन्शियस साइकी के थ्रू फ़िल्टर होकर आता
  2438. 1:59:32है। जो चाहे वह कम से कम इस एक्सपीरियंस
  2439. 1:59:36के सोर्स के पास तो पहुंच सकता है। चाहे
  2440. 1:59:38वह गॉड में बिलीव करे या नहीं।
  2441. 1:59:41अगर यह अप्रोच ना हो तो सिर्फ कभी-कभी ही
  2442. 1:59:44वह मिरेकुलस कन्वर्जंस होते हैं। जैसे पॉल
  2443. 1:59:49का डेमस्कस वाला एक्सपीरियंस
  2444. 1:59:52था। यह प्रूफ देने की जरूरत नहीं कि
  2445. 1:59:55रिलीजियस एक्सपीरियंसेस होते हैं। लेकिन
  2446. 1:59:57यह डाउट हमेशा रहेगा कि मेटाफिजिक्स और
  2447. 2:00:00थियोलॉजी जिसे गॉड या गॉड्स कहते हैं। वही
  2448. 2:00:04क्या इन एक्सपीरियंसेस के असली कारण है?
  2449. 2:00:08यह सवाल बेकार है क्योंकि जब एक इंसान ऐसी
  2450. 2:00:10पावरफुल रिलीजियस एक्सपीरियंस फील करता है
  2451. 2:00:14तो वह उस मोमेंट में लॉस्ट हो जाता है और
  2452. 2:00:16ऐसे क्वेश्चंस पूछने का स्कोप ही नहीं बचा
  2453. 2:00:20रहता। जिसने भी एक्सपीरियंस किया है वह
  2454. 2:00:23उसे इतना पकड़ता जाता है कि वो फिलॉसोफिकल
  2455. 2:00:27या लॉजिकल सोचने की हालत में ही नहीं
  2456. 2:00:30होता।
  2457. 2:00:32एब्सोल्यूट सर्टेनिटी अपने आप में प्रूफ
  2458. 2:00:34बन जाती है। उसे किसी एंथ्रोपोमॉर्फिक
  2459. 2:00:37प्रूफ की जरूरत नहीं होती।
  2460. 2:00:39आज के टाइम में लोग साइकोलॉजी के बारे में
  2461. 2:00:42या तो कुछ जानते ही नहीं या फिर गलत सोच
  2462. 2:00:44रखते हैं। यह एक बदकिस्मती वाली बात है कि
  2463. 2:00:48वह एक एक्सपीरियंस जो एक इंसान की लाइफ को
  2464. 2:00:50मीनिंगफुल बनाता है वो ऐसे मीडियम से आता
  2465. 2:00:53है जिसके अगेंस्ट लोगों के ऑलरेडी बायसेस
  2466. 2:00:56होते
  2467. 2:00:58हैं। फिर से वही डाउट आता है कि नज़ारे
  2468. 2:01:02इसका क्या अच्छा आ सकता है। अनकॉन्शियस को
  2469. 2:01:06लोग या तो एक कचरे का डब्बा समझते हैं जो
  2470. 2:01:09कॉन्शियस माइंड के नीचे छुपा है या फिर
  2471. 2:01:11सिर्फ एक जानवरों जैसी नेचर वाली चीज।
  2472. 2:01:15लेकिन असल में यह अनकॉन्शियस क्या है? यह
  2473. 2:01:18ना पूरा समझा गया है और ना ही इसका कोई
  2474. 2:01:22फिक्स स्ट्रक्चर है। इसलिए इसे ज्यादा
  2475. 2:01:25अच्छा या बुरा माना भी गलत है। यह सिर्फ
  2476. 2:01:29प्रजुडिस है। और यह बातें क्रिश्चियंस के
  2477. 2:01:33मुंह से और भी अजीब लगती हैं। लेकिन लॉर्ड
  2478. 2:01:35खुद एक इस टेबल में पैदा हुए थे जानवरों
  2479. 2:01:38के बीच। आम पब्लिक को ज्यादा पसंद आता अगर
  2480. 2:01:41वह किसी मंदिर में पैदा हुए होते।
  2481. 2:01:45वैसे ही मॉडर्न भीड़ वाला आदमी मासमैन
  2482. 2:01:49अपने रिलीजियस एक्सपीरियंस को भी एक बड़े
  2483. 2:01:51क्राउड के इवेंट में ढूंढता है क्योंकि वह
  2484. 2:01:54एक इंडिविजुअल सोल से ज्यादा इंप्रेसिव
  2485. 2:01:56लगता है। चर्च वाले क्रिश्चियंस भी इस
  2486. 2:02:00गलतफहमी में फंसे होते
  2487. 2:02:02हैं। साइकोलॉजी का यह कहना कि अनकॉन्शियस
  2488. 2:02:06का रोल रिलीजियस एक्सपीरियंस में
  2489. 2:02:08इंपॉर्टेंट है। यह बात पॉलिटिकल राइट को
  2490. 2:02:10भी पसंद नहीं और लिफ्ट को भी नहीं। राइट
  2491. 2:02:14के लिए सबसे इंपॉर्टेंट चीज होती है वह
  2492. 2:02:16हिस्टोरिकल रेवोलेशन जो बाहर से आई। लेफ्ट
  2493. 2:02:20के लिए यह सब बकवास होती है। उनके लिए
  2494. 2:02:22रिलीजन का कोई मतलब ही नहीं होता। उनके
  2495. 2:02:25लिए सिर्फ पार्टी डॉक्टराइन में बिलीफ
  2496. 2:02:27होना चाहिए और वह भी एक्सट्रीम लेवल तक।
  2497. 2:02:31ऊपर से अलग-अलग रिलीजंस अलग-अलग बातें
  2498. 2:02:34कहते हैं और हर एक कहता है कि उसके पास ही
  2499. 2:02:37सच है। लेकिन आज हम एक ऐसे वर्ल्ड में जी
  2500. 2:02:40रहे हैं जो एक हो चुका है। जहां डिस्टेंस
  2501. 2:02:44घंटों में मेजर होता है महीनों में नहीं।
  2502. 2:02:48जो रेसेस पहले सिर्फ म्यूजियम्स में दिखाई
  2503. 2:02:50जाती थी, अब वह हमारे नेबर्स बन चुकी हैं।
  2504. 2:02:53जो चीज पहले सिर्फ एथनोलॉजिस्ट की स्टडी
  2505. 2:02:56का हिस्सा थी, वह एक पॉलिटिकल, सोशल और
  2506. 2:02:59साइकोलॉजिकल प्रॉब्लम बन गई है। अब
  2507. 2:03:02अलग-अलग आइडियोलॉजीस एक दूसरे को टच करने
  2508. 2:03:04लगी हैं और हो सकता है वह टाइम दूर ना हो
  2509. 2:03:07जब म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग सबसे बड़ी
  2510. 2:03:09जरूरत बन
  2511. 2:03:11जाए। दूसरे को समझने के लिए हमें उनकी सोच
  2512. 2:03:15को डीपली समझना होगा। और इस अंडरस्टैंडिंग
  2513. 2:03:18का असर दोनों तरफ
  2514. 2:03:21पड़ेगा। हिस्ट्री उन लोगों को इग्नोर कर
  2515. 2:03:23देगी जो इस इनवेटेबल चेंज के खिलाफ खड़े
  2516. 2:03:26हैं। चाहे वह अपने ट्रेडिशंस को कितना भी
  2517. 2:03:28इंपॉर्टेंट मानते हो। जितने भी डिफरेंसेस
  2518. 2:03:32हो मैनकाइंड की यूनिटी अपने आप को जरूर
  2519. 2:03:34एक्सप्रेस करेगी। इस पॉइंट पे मार्क्सिस्ट
  2520. 2:03:38डॉक्ट्राइन ने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी है
  2521. 2:03:40और वेस्ट यह सोचता है कि वह टेक्नोलॉजी और
  2522. 2:03:43इकोनॉमिक एड से काम चला लेगा।
  2523. 2:03:47कम्युनिज्म ने यह समझा है कि आइडियोलॉजिकल
  2524. 2:03:50एलिमेंट्स कितने पावरफुल हैं और बेसिक
  2525. 2:03:52प्रिंसिपल्स का यूनिवर्सल होना कितना
  2526. 2:03:54इंपॉर्टेंट है। फॉरेस्ट के कंट्रीज भी इसी
  2527. 2:03:57आईडियोलॉजिकल वीकनेस का सामना कर रहे हैं
  2528. 2:04:00जैसे हम कर रहे
  2529. 2:04:02हैं। मैं चाहता हूं कि रीडर का ध्यान एक
  2530. 2:04:06बड़ी दिक्कत की तरफ ले जाऊं।
  2531. 2:04:10जो हॉरर डिक्टेटर कंट्रीज ने लोगों पर
  2532. 2:04:13लाया है, वह उन सब बुराइयों का फाइनल
  2533. 2:04:16वर्जन है जो हमारे पुरखों ने कुछ टाइम
  2534. 2:04:19पहले किया था। क्रिश्चियन नेशंस ने यूरोप
  2535. 2:04:22के हिस्ट्री में आपस में जो बबेरिटी और
  2536. 2:04:24खूनखराबा किया है। उसके अलावा यूरोपियन
  2537. 2:04:27लोगों ने जो क्राइम्स डार्क स्किन लोगों
  2538. 2:04:29के साथ कॉलोनाइजेशन के टाइम किए उनका भी
  2539. 2:04:32जवाब देना होगा।
  2540. 2:04:34इस मामले में वाइट आदमी के कंधों पर बहुत
  2541. 2:04:37भारी बोझ है। यह हमें इंसान के अंदर के
  2542. 2:04:41डार्क साइड का एक इतना काला पिक्चर दिखाता
  2543. 2:04:44है जो और ज्यादा काला नहीं हो सकता। जो
  2544. 2:04:48इविल इंसान के अंदर छुपा है और समय के साथ
  2545. 2:04:50बाहर आता है वह इतना बड़ा है कि अगर चर्च
  2546. 2:04:54इसे सिर्फ ओरिजिनल सीन बोले और एडमम के ईव
  2547. 2:04:57के साथ थोड़ा सा गलत करने पर डाले तो यह
  2548. 2:05:00बात छोटी सी लगती है।
  2549. 2:05:05असली केस बहुत ही सीरियस है और इसे लोग
  2550. 2:05:09बहुत ही कम समझते हैं। सब लोग यह मानते
  2551. 2:05:12हैं कि इंसान सिर्फ वही है जो उसका
  2552. 2:05:14कॉन्शियस माइंड उसके बारे में जानता है।
  2553. 2:05:16इसलिए वह खुद को निर्दोष मानता है और ऐसे
  2554. 2:05:19में बेवकूफी भी जोर देता है अपनी बुराई
  2555. 2:05:22में। वो यह नहीं कहता कि बुरा कुछ हुआ
  2556. 2:05:26नहीं। लेकिन हमेशा बोलता है कि यह तो
  2557. 2:05:28दूसरे लोगों ने किया। और जब यह कांड पास्ट
  2558. 2:05:32में हुआ होता है तो लोग उसे जल्दी से भूल
  2559. 2:05:35जाते हैं और फिर वापस वही कंफ्यूज्ड
  2560. 2:05:37नॉर्मल लाइफ जीना शुरू कर देते हैं।
  2561. 2:05:40लेकिन इसके बिल्कुल
  2562. 2:05:42अपोजिट सच यह है कि कुछ भी खत्म नहीं हुआ
  2563. 2:05:45है। ना ही कुछ ठीक किया गया
  2564. 2:05:48है। इविल गिल्ट अंदर से जो अनइजी फीलिंग
  2565. 2:05:52होती है, सब कुछ हमारे सामने है। बस देखने
  2566. 2:05:55की बात
  2567. 2:05:56है। इंसान ने यह सब किया है। मैं भी एक
  2568. 2:06:00इंसान हूं। मेरे अंदर भी वही नेचर है।
  2569. 2:06:02इसलिए मैं भी गिल्टी हूं। और मेरे अंदर भी
  2570. 2:06:04वही कैपेसिटी और दूसरी डिजायर्स छुपी हुई
  2571. 2:06:08है कि मैं भी कभी भी यह सब कर सकता हूं।
  2572. 2:06:12चाहे लॉ के हिसाब से हमने वह क्राइम नहीं
  2573. 2:06:15किया हो लेकिन इंसान होने के नाते हम सबके
  2574. 2:06:17अंदर पोटेंशियल क्रिमिनल छुपा होता
  2575. 2:06:22है। हकीकत यह है कि हम सिर्फ एक मौके के
  2576. 2:06:25नहीं मिलने की वजह से उन क्राइम्स में
  2577. 2:06:27शामिल नहीं हुए। हम में से कोई भी
  2578. 2:06:30ह्यूमैनिटी के इस डार्क शैडो से अलग नहीं
  2579. 2:06:33है। क्राइम चाहे कई जनरेशन पहले हुआ हो या
  2580. 2:06:36आज हो रहा हो। वह एक ऐसे नेचर का सिम्टम
  2581. 2:06:40है जो हमेशा सब जगह होता
  2582. 2:06:43है। इसलिए अच्छा यह होगा कि इंसान के अंदर
  2583. 2:06:46के इविल को समझने की थोड़ी इमेजिनेशन हो।
  2584. 2:06:49वरना जो लोग अपने नेचर को इग्नोर करते
  2585. 2:06:51हैं, वह फूल कहलाते
  2586. 2:06:54हैं। असल में अपने नेचर को ना समझना ही
  2587. 2:06:59इंसान को इविल का टूल बना देता है।
  2588. 2:07:02इनोसेंट दिखना या भोला बनना उतना ही बेकार
  2589. 2:07:05है जितना कि एक कोलेरा पेशेंट को यह ना
  2590. 2:07:08पता हो कि उसकी बीमारी कंटजियस
  2591. 2:07:12है। ऐसा सोचना सिर्फ इस बात को बढ़ावा
  2592. 2:07:15देता है कि हम अपने अंदर के विल को दूसरों
  2593. 2:07:17पर डाल दें और जब हम ऐसा करते हैं तो
  2594. 2:07:21सामने वाले को और स्ट्रांग बना देते हैं
  2595. 2:07:23क्योंकि हम अपने अंदर का डर उस पर डाल
  2596. 2:07:26देते
  2597. 2:07:27हैं। और सबसे बुरा यह होता है कि हमारी यह
  2598. 2:07:31समझ की कमी हमें इविल को डील करने लायक
  2599. 2:07:34नहीं रहने देती। यहीं पर हमें क्रिश्चियन
  2600. 2:07:36ट्रेडिशन के बड़े प्रजुडिस से टकराते हैं
  2601. 2:07:39जो हमारे लिए एक बड़ा ऑब्सकल बन जाता है।
  2602. 2:07:43हमें यह सिखाया गया है कि बुराई से दूर
  2603. 2:07:45रहो। उसे छुओ भी मत, उसका नाम भी मत लो।
  2604. 2:07:49क्योंकि बुराई को माना गया है कि वह एक
  2605. 2:07:51बैड वोमेन है जो डरावनी
  2606. 2:07:54है। यह सोच बुराई के सामने आंख बंद करने
  2607. 2:07:58की हमारी प्रिमिटिव आदत को और स्ट्रांग कर
  2608. 2:08:00देती है। जैसे कि पुराने समय में एस्केप
  2609. 2:08:04को डेजर्ट में भेज दिया जाता था ताकि वह
  2610. 2:08:07सबकी बुराई ले जाए।
  2611. 2:08:10लेकिन अगर कोई यह समझने लगे कि बुराई
  2612. 2:08:12इंसान के नेचर का हिस्सा है। बिना उसके
  2613. 2:08:15चूज किए भी तो वह साइकोलॉजी के स्टेज पर
  2614. 2:08:18गुड का इक्वल और ऑोजिट पार्टनर बन जाती
  2615. 2:08:22है। यह समझ सीधा हमें एक साइकोलॉजिकल
  2616. 2:08:26डुअलिज्म की तरफ ले जाता है जो ऑलरेडी
  2617. 2:08:28पॉलिटिकल वर्ल्ड में भी दिख रहा है और
  2618. 2:08:31मॉडर्न इंसान के अंदर भी छुपा हुआ
  2619. 2:08:34है। यह डुअलिज्म इस रियलाइजेशन की वजह से
  2620. 2:08:38नहीं आया। असल में हम पहले से ही स्प्लिट
  2621. 2:08:40कंडीशन में हैं। यह सोचना ही मुश्किल है
  2622. 2:08:44कि इतने बड़े गिल्ट के लिए हमें पर्सनली
  2623. 2:08:46रिस्पांसिबल माना
  2624. 2:08:48जाए। इसलिए हम अक्सर बुराई को किसी
  2625. 2:08:51पर्टिकुलर क्रिमिनल या ग्रुप के सर डाल
  2626. 2:08:54देते हैं और खुद को क्लीन समझते हैं।
  2627. 2:08:57लेकिन यह फेक होलीनेस ज्यादा देर तक टिकती
  2628. 2:09:00नहीं है। क्योंकि एक्सपीरियंस यह दिखाता
  2629. 2:09:02है कि इविल इंसान के अंदर ही होता है।
  2630. 2:09:05जब तक कोई क्रिश्चियन थॉट के हिसाब से यह
  2631. 2:09:08नहीं मानता कि इविल एक मेटाफिजिकल
  2632. 2:09:10प्रिंसिपल
  2633. 2:09:12है। इस व्यू का एक फायदा यह है कि यह
  2634. 2:09:15इंसान के कॉन्शियंस से बर्डन हटा देता है
  2635. 2:09:18और डेविल पर डाल देता है। क्योंकि यह
  2636. 2:09:21साइकोलॉजिकली सही है कि इंसान अपने साइकिक
  2637. 2:09:24नेचर का शिकार ज्यादा है। क्रिएटर कम।
  2638. 2:09:28जब हम यह देखते हैं कि आज की इविल पूरी
  2639. 2:09:31हिस्ट्री की सबसे बड़ी तकलीफों से भी
  2640. 2:09:34ज्यादा भयानक है तो यह सवाल उठता है कि जब
  2641. 2:09:37हम इतना प्रोग्रेस कर चुके हैं जस्टिस,
  2642. 2:09:39मेडिसिन, टेक्नोलॉजी और ह्यूमन हेल्थ के
  2643. 2:09:42फील्ड में तो फिर ऐसे डेंजरस डिस्ट्रक्शन
  2644. 2:09:45मशीनंस क्यों बनाई गई हैं जो पूरे ह्यूमन
  2645. 2:09:48रेस को खत्म कर सकती हैं?
  2646. 2:09:51साइकोलॉजिकल फैक्टर को इग्नोर करना एक दिन
  2647. 2:09:54बुरा बदला ले सकता है। इसलिए अब टाइम आ
  2648. 2:09:57गया है कि हम खुद को इस मामले में पकड़े।
  2649. 2:10:01लेकिन फिलहाल यह सिर्फ एक अच्छी इच्छा ही
  2650. 2:10:04रह जाएगी क्योंकि सेल्फ नॉलेजनल सिर्फ
  2651. 2:10:06लोगों को पसंद नहीं बल्कि लोग इसे बोरिंग
  2652. 2:10:09और मोरल जैसा समझते
  2653. 2:10:11हैं। और यह उस साइकोलॉजिकल शैडो से जुड़ी
  2654. 2:10:14होती है जिसे लोग या तो इग्नोर करते हैं
  2655. 2:10:17या उसके बारे में बात भी नहीं करते।
  2656. 2:10:21आज के टाइम का काम इतना मुश्किल है कि
  2657. 2:10:24लगता है जैसे इसे पूरा करना ऑलमोस्ट
  2658. 2:10:26नामुमकिन
  2659. 2:10:27है। यह हमारी रिस्पांसिबिलिटी पर सबसे
  2660. 2:10:30बड़ा प्रेशर डाल रहा है। अगर हम दोबारा
  2661. 2:10:33किसी और
  2662. 2:10:35त्रहसन डिस क्लेयर्स के गिल्टी नहीं बनना
  2663. 2:10:38चाहते
  2664. 2:10:39तो। यह उन लोगों के लिए है जो समझदारी और
  2665. 2:10:43इनफ्लुएंस रखते हैं। जिनके पास इतनी अकल
  2666. 2:10:45है कि वह समझ सके कि दुनिया किस सिचुएशन
  2667. 2:10:48में है।
  2668. 2:10:50उम्मीद की जा सकती है कि वह अपने कॉन्शियस
  2669. 2:10:52से बात करें। लेकिन क्योंकि यह सिर्फ
  2670. 2:10:55समझने का नहीं बल्कि मोरल डिसीजन लेने का
  2671. 2:10:57भी सवाल है। इसलिए कोई खास उम्मीद नहीं की
  2672. 2:11:00जा
  2673. 2:11:01सकती। नेचर ने हमेशा हर गिफ्ट एक साथ नहीं
  2674. 2:11:05दिया। अक्सर जहां ज्यादा अकल होती है,
  2675. 2:11:08वहां दिल की कमी होती
  2676. 2:11:11है। जहां कोई स्किल परफेक्ट होती है, वहां
  2677. 2:11:14बाकी सब चीजें सैक्रिफाइस होती हैं।
  2678. 2:11:17इंटेलेक्ट और फीलिंग के बीच का डिफरेंस
  2679. 2:11:20ह्यूमन साइकी का सबसे पेनफुल हिस्सा है।
  2680. 2:11:23इस वक्त की प्रॉब्लम को सिर्फ मोरल डिमांड
  2681. 2:11:26के रूप में रखना बेकार
  2682. 2:11:28है। हम बस इतना कर सकते हैं कि दुनिया की
  2683. 2:11:32साइकोलॉजिकल हालत को इतना क्लियर दिखा दें
  2684. 2:11:35कि अंधे भी देख सकें और ऐसे शब्दों में
  2685. 2:11:38बात करें कि बहरे भी सुन सकें। उम्मीद
  2686. 2:11:41रखनी चाहिए कि कुछ समझदार और अच्छे लोग
  2687. 2:11:44होंगे और हमें बार-बार वही बातें बोलते
  2688. 2:11:47रहना चाहिए जो जरूरी हैं। आखिर में सच भी
  2689. 2:11:52फेल हो सकता है। सिर्फ झूठ ही नहीं।
  2690. 2:11:56यह कहकर मैं यह नहीं कहूंगा कि एटॉमिक
  2691. 2:12:00साइंटिस्ट क्रिमिनल्स हैं। सिर्फ इसलिए
  2692. 2:12:02क्योंकि उनकी वजह से हाइड्रोजन बम बना।
  2693. 2:12:05न्यूक्लियर फिजिक्स को डेवलप करने में जो
  2694. 2:12:07इतनी मेहनत लगी वह उन लोगों ने की जो अपने
  2695. 2:12:10काम के लिए सब कुछ दे दिया। अगर उनका मोरल
  2696. 2:12:13इंटेंशन कुछ और होता तो वह ह्यूमैनिटी के
  2697. 2:12:16लिए कुछ अच्छा भी बना सकते थे। शायद
  2698. 2:12:19इन्वेंशन का पहला कदम एक कॉन्शियस डिसीजन
  2699. 2:12:22हो। लेकिन हमेशा की तरह यहां भी इंट्यूशन
  2700. 2:12:24या अंदाज भी काम करता
  2701. 2:12:28है। मतलब अनकॉन्शियस भी इसमें साथ देता है
  2702. 2:12:31और कभी-कभी तो मेन रोल भी प्ले करता
  2703. 2:12:35है। तो जो रिजल्ट आता है उसके पीछे सिर्फ
  2704. 2:12:39कॉन्शियस एफर्ट नहीं होती। अनकॉन्शियस भी
  2705. 2:12:41काम करता है अपने छुपे गोल्स और इरादों के
  2706. 2:12:44साथ।
  2707. 2:12:46अगर यह
  2708. 2:12:47अनकॉन्शियस आपके हाथ में एक वेपन देता है
  2709. 2:12:50तो उसका मतलब होता है कि वह किसी ना किसी
  2710. 2:12:53वायलेंस की तरफ ले जा रहा है। साइंस का
  2711. 2:12:56मेन गोल होता है सच का ज्ञान। और अगर यह
  2712. 2:13:00लाइट ढूंढते हुए हम किसी बड़े डेंजर तक
  2713. 2:13:02पहुंच जाते हैं तो लगता है जैसे यह सब कुछ
  2714. 2:13:06डेस्टिनी का हिस्सा था। कोई पहले से सोची
  2715. 2:13:08समझी प्लानिंग नहीं।
  2716. 2:13:11आज का इंसान पहले के लोगों से ज्यादा इविल
  2717. 2:13:14नहीं है। उसके पास सिर्फ ज्यादा पावरफुल
  2718. 2:13:16टूल्स हैं अपने इविल नेचर को पूरा करने के
  2719. 2:13:19लिए। जैसे-जैसे उसकी कॉन्शियसनेस बढ़ी है,
  2720. 2:13:22वैसे-वैसे उसका मोरल नेचर पीछे रह गया है।
  2721. 2:13:26यही आज का सबसे बड़ा प्रॉब्लम है। सिर्फ
  2722. 2:13:29रीजन काफी नहीं है। थ्यरी के हिसाब से
  2723. 2:13:33रीजन के पास पावर है कि वो न्यूक्लियर फीज
  2724. 2:13:36जैसे डेंजरस एक्सपेरिमेंट से रुक जाए।
  2725. 2:13:38सिर्फ इसलिए क्योंकि वह डेंजरस है।
  2726. 2:13:42लेकिन जब तक इंसान अपने अंदर की इविल नहीं
  2727. 2:13:45देखता और हमेशा दूसरों में ही ढूंढता है
  2728. 2:13:48तब तक रीजन फेल हो जाता है। चाहे वह जानता
  2729. 2:13:51हो कि इस वेपन का यूज़ का मतलब है कि
  2730. 2:13:54ह्यूमन वर्ल्ड का
  2731. 2:13:56एंड। यह होप कि दुनिया को खत्म होने का डर
  2732. 2:13:59हमें बचा ले। लेकिन फिर भी यह पॉसिबिलिटी
  2733. 2:14:02हमारे ऊपर एक खाली बादल की तरह लटकती
  2734. 2:14:05रहेगी।
  2735. 2:14:07जब तक हम इस ग्लोबल साइकोलॉजिकल और
  2736. 2:14:10पॉलिटिकल स्प्लिट के पार एक ब्रिज नहीं
  2737. 2:14:12बना लेते। एक ऐसा ब्रिज जो उतना ही रियल
  2738. 2:14:15हो जितना हाइड्रोजन बम।
  2739. 2:14:18अगर एक वर्ल्ड वाइड कॉन्शियसनेस आ जाए
  2740. 2:14:21जिसमें सब समझ सकें कि हर डिवीजन और
  2741. 2:14:24दुश्मनी साइकी के अंदर की स्प्लिट की वजह
  2742. 2:14:26से है। तब हमें समझ आएगा कि हमें अटैक
  2743. 2:14:30कहां करना है।
  2744. 2:14:32लेकिन अगर एक इंडिविजुअल सोल के छोटे और
  2745. 2:14:35पर्सनल इमोशंस भी वैसे के वैसे अनकॉन्शियस
  2746. 2:14:38और अननोन बने रहे जैसे पहले थे। तो यह
  2747. 2:14:41धीरे-धीरे इकट्ठा होकर मास मूवमेंट्स बना
  2748. 2:14:44देंगे। जिनको ना कंट्रोल किया जा सकता है
  2749. 2:14:48ना अच्छे पर्पस के लिए
  2750. 2:14:50यूज। और जो लोग डायरेक्टली इन्हें कंट्रोल
  2751. 2:14:53करने की कोशिश करते हैं, वह बस हवा में
  2752. 2:14:55घूसे मार रहे होते
  2753. 2:14:57हैं। सबसे ज्यादा इल्लुजन में वही होते
  2754. 2:15:00हैं जो यह फाइट लड़ रहे होते हैं।
  2755. 2:15:04डिसीजन का असली पॉइंट उस इंसान के पास है
  2756. 2:15:07जो अपने अंदर के डुअलिज्म का कोई जवाब
  2757. 2:15:09नहीं जानता।
  2758. 2:15:11यह अंदर का खालीपन उसके सामने तब खुला जब
  2759. 2:15:14दुनिया में नए इवेंट्स हुए। जबकि इंसानी
  2760. 2:15:17हिस्ट्री में लोगों ने हमेशा यह सोच के
  2761. 2:15:19जीना सीख लिया था कि एक ही गॉड ने इंसान
  2762. 2:15:22को अपनी इमेज में बनाया है। एक छोटी
  2763. 2:15:25यूनिटी के रूप में।
  2764. 2:15:28आज भी लोग यह बात नहीं समझते कि हर इंसान
  2765. 2:15:31एक इंटरनेशनल सिस्टम के स्ट्रक्चर में एक
  2766. 2:15:33सेल है और इसी वजह से उनके कॉन्फ्लिक्ट्स
  2767. 2:15:36का हिस्सा भी
  2768. 2:15:38है। एक इंडिविजुअल आदमी को लगता है कि वह
  2769. 2:15:41अकेला कुछ नहीं है। उसकी कोई वैल्यू नहीं
  2770. 2:15:43है और वह उन पावर्स का शिकार है जो उसके
  2771. 2:15:46कंट्रोल के बाहर है।
  2772. 2:15:49लेकिन उसके अंदर ही एक डार्क शैडो छुपी
  2773. 2:15:51होती है। एक ऐसा अपोनेंट जो विज़िबल हेल्पर
  2774. 2:15:54की तरफ पॉलिटिकल मॉन्सर के डार्क कामों
  2775. 2:15:56में हिस्सा लेता
  2776. 2:15:59है। पॉलिटिकल सिस्टम्स का नेचर ही ऐसा
  2777. 2:16:02होता है कि वो हमेशा बुराई दूसरी साइड में
  2778. 2:16:05देखते
  2779. 2:16:06हैं। जैसे कि एक इंसान भी हमेशा अपने अंदर
  2780. 2:16:09की वह बातें जो वो जानना नहीं चाहता
  2781. 2:16:12उन्हें दूसरों पर डाल देता
  2782. 2:16:14है। सोसाइटी को तोड़ने और लोगों को एक
  2783. 2:16:17दूसरे से अलग करने वाली सबसे बड़ी चीज
  2784. 2:16:20होती है यह मोरल घमंड और रिस्पांसिबिलिटी
  2785. 2:16:23की
  2786. 2:16:24कमी। और सबसे ज्यादा समझ और कनेक्शन तब
  2787. 2:16:28बढ़ता है जब लोग अपने प्रोजेक्शंस वापस ले
  2788. 2:16:31लें। लेकिन यह कनेक्शन तभी हो सकता है जब
  2789. 2:16:35सेल्फ क्रिटिसिज्म हो। क्योंकि किसी और को
  2790. 2:16:38यह कह देना कि तू अपने प्रोजेक्शन हटा ले।
  2791. 2:16:41यह काम नहीं करता।
  2792. 2:16:44वह अपने प्रोजेक्शन को पहचानता ही नहीं।
  2793. 2:16:47जैसे हम भी अपनी पहचानते
  2794. 2:16:49नहीं। हम अपने प्रजुडिसेस और इल्लुजंस को
  2795. 2:16:53तभी समझ सकते हैं जब हमारे पास
  2796. 2:16:54साइकोलॉजिकल नॉलेज हो। खुद के लिए भी और
  2797. 2:16:57दूसरों के लिए भी। और जब हम अपने एजमशंस
  2798. 2:17:01को डाउट करना सीख जाए और उन्हें सच्चाई के
  2799. 2:17:04फैक्ट्स के साथ कंपेयर करें ध्यान से।
  2800. 2:17:09मजाकिया बात यह है कि सेल्फ क्रिटिसिज्म
  2801. 2:17:12मार्क्सिस्ट कंट्रीज में एक फेमस आईडिया
  2802. 2:17:14है। लेकिन वहां यह सिर्फ स्टेट के लिए
  2803. 2:17:16होता है। ट्रुथ और जस्टिस के लिए
  2804. 2:17:20नहीं। मार्स स्टेट का गोल यह नहीं होता कि
  2805. 2:17:23इंसान एक दूसरे को समझे या कनेक्ट करें।
  2806. 2:17:26वह चाहते हैं कि हर इंसान अलग हो जाए।
  2807. 2:17:28अपने दिमाग में अकेला हो। जितना ज्यादा
  2808. 2:17:31लोग डिस्कनेक्टेड होंगे स्टेट उतना ही
  2809. 2:17:33स्ट्रांग बनेगा। और वाइसवरसा
  2810. 2:17:36डेमोक्रेसीज में भी यह बात क्लियर है कि
  2811. 2:17:38इंसान इंसान के बीच का डिस्टेंस बहुत
  2812. 2:17:41ज्यादा हो गया है। जो ना पब्लिक वेलफेयर
  2813. 2:17:44के लिए अच्छा है ना इंसानी दिमाग के
  2814. 2:17:47लिए। कई तरीके ट्राई किए जा रहे हैं ताकि
  2815. 2:17:51यह सोशल डिफरेंसेस कम हो जाए। आइडियलिज्म,
  2816. 2:17:55एंथूजियाज्म और एथिक्स का यूज करके।
  2817. 2:17:58लेकिन अक्सर लोग भूल जाते हैं सेल्फ
  2818. 2:18:00क्रिटिसिज्म करना यह सवाल पूछना है कि यह
  2819. 2:18:04आइडियलिस्टिक डिमांड कर कौन रहा है?
  2820. 2:18:07कहीं यह वही तो नहीं जो अपने शैडो को जंप
  2821. 2:18:10करके एक आइडियलिस्टिक प्रोग्राम में छुप
  2822. 2:18:12जाता है। जहां उसे एक अच्छा एक्सक्यूज
  2823. 2:18:15मिलता
  2824. 2:18:16है। कितना रिस्पेक्टेबल और मोरल दिखने
  2825. 2:18:19वाला इंसान अंदर से एक डार्क वर्ल्ड छुपा
  2826. 2:18:22के रखता है। पहले तो यह श्योर होना चाहिए
  2827. 2:18:26कि जो आइडियल की बात कर रहा है वह खुद
  2828. 2:18:28आइडियल है। ताकि उसकी बातें और काम दोनों
  2829. 2:18:32सच लग सके।
  2830. 2:18:35लेकिन आइडियल बनना इंपॉसिबल है। इसलिए वह
  2831. 2:18:37बस एक अधूरा ड्रीम ही रहता
  2832. 2:18:40है। हम सब इस मामले में काफी शार्प होते
  2833. 2:18:43हैं। इसलिए जब कोई आइडियलिज्म दिखता है तो
  2834. 2:18:45वह हमें फेक लगता है। और तभी एक्सेप्ट
  2835. 2:18:49होता है जब उसका ऑोजिट भी ओपनली एक्सेप्ट
  2836. 2:18:52किया जाता
  2837. 2:18:54है। अगर यह बैलेंस ना हो तो आइडियल इंसान
  2838. 2:18:57के कंट्रोल के बाहर चला जाता है। बोरिंग
  2839. 2:19:00लगता है और एक झूठ लगने लगता है। चाहे वह
  2840. 2:19:03इंटेंशन अच्छा ही क्यों ना हो।
  2841. 2:19:06झूठ का यूज़ लोगों को दबाने के लिए होता है
  2842. 2:19:08और इसका एंड कभी अच्छा नहीं होता। लेकिन
  2843. 2:19:11अगर कोई अपने शैडो को एक्सेप्ट कर ले तो
  2844. 2:19:14उसे एक ह्यूमिलिटी मिलती है जो जरूरी है
  2845. 2:19:18अपनी इमपरफेक्शंस को मानने के लिए।
  2846. 2:19:22और यही कॉन्शियस रिकॉग्निशन और अटेंशन
  2847. 2:19:25चाहिए होती है जब हम इंसानी कनेक्शन बनाना
  2848. 2:19:28चाहते
  2849. 2:19:28हैं। एक इंसानी कनेक्शन डिफरेंस और
  2850. 2:19:32परफेक्शन पर बेस्ड नहीं होता क्योंकि यह
  2851. 2:19:34सिर्फ दूरी बढ़ाता है या उल्टा इफेक्ट
  2852. 2:19:36देता
  2853. 2:19:37है। यह कनेक्शन वीकनेस, हेल्पलेसनेस और
  2854. 2:19:41सपोर्ट की जरूरत पर बेस्ड होता है। वही
  2855. 2:19:44बेस जहां डिपेंडेंसी बनती है। जो परफेक्ट
  2856. 2:19:48होता है उसे किसी और की जरूरत नहीं होती।
  2857. 2:19:52लेकिन जो वीक होता है उसे हेल्प चाहिए
  2858. 2:19:54होती है। वह किसी को नीचा नहीं
  2859. 2:19:56दिखाता और ना ही उसके सामने कुछ ऐसा रखता
  2860. 2:20:00है जिससे वह दूसरा बंदा छोटा महसूस करे या
  2861. 2:20:03इंसल्ट
  2862. 2:20:04हो। यह इंसल्ट तभी होती है जब आइडियलिज्म
  2863. 2:20:08ज्यादा ज्यादा हो जाता है। ऐसे थॉट्स को
  2864. 2:20:12सिर्फ एक्स्ट्रा इमोशनल बातें समझ के
  2865. 2:20:14इग्नोर नहीं करना चाहिए।
  2866. 2:20:16आज के टाइम में ह्यूमन रिलेशनशिप और
  2867. 2:20:19सोसाइटी के अंदर के कनेक्शंस का सवाल बहुत
  2868. 2:20:21इंपॉर्टेंट है क्योंकि भीड़ वाला आदमी का
  2869. 2:20:25इंसानी कनेक्शन टूट रहा है और हर जगह
  2870. 2:20:28मिसट्रस्ट फैल रहा
  2871. 2:20:30है। जहां जस्टिस क्लियर नहीं होती और
  2872. 2:20:33पुलिस स्पाइंग और डर का माहौल होता है।
  2873. 2:20:35वहां लोग अलग हो जाते हैं और यही डिक्टेटर
  2874. 2:20:38स्टेट का गोल होता है। क्योंकि वह चाहता
  2875. 2:20:41है कि सोसाइटी के सब लोग कमजोर और अलग-अलग
  2876. 2:20:44हो जाए।
  2877. 2:20:46इस डेंजर को रोकने के लिए फ्री सोसाइटी को
  2878. 2:20:48एक इमोशनल बॉन्ड चाहिए। एक प्रिंसिपल जैसा
  2879. 2:20:52कि कैरिटास मतलब क्रिश्चियन लव। अपने नेबर
  2880. 2:20:55से प्यार करना।
  2881. 2:20:58लेकिन दूसरे इंसान से प्यार सबसे ज्यादा
  2882. 2:21:00तब सफर करता है जब लोग एक दूसरे को गलत
  2883. 2:21:03समझते हैं। प्रोजेक्शन की वजह से
  2884. 2:21:06मिसअंडरस्टैंडिंग बढ़ती है। इसलिए फ्री
  2885. 2:21:10सोसाइटी के इंटरेस्ट में यह जरूरी है कि
  2886. 2:21:12वह ह्यूमन रिलेशनशिप्स को साइकोलॉजी के
  2887. 2:21:14पॉइंट ऑफ व्यू से सोचे।
  2888. 2:21:17क्योंकि इसी में सोसाइटी का असली कनेक्शन
  2889. 2:21:20और उसकी स्ट्रेंथ छुपी होती है। जहां
  2890. 2:21:23प्यार खत्म होता है, वहां पावर शुरू होती
  2891. 2:21:26है। फिर आता है वायलेंस और टेरर। यह थॉट्स
  2892. 2:21:29आइडियलिज्म का कॉल नहीं है। यह सिर्फ इतना
  2893. 2:21:32कहना चाहते हैं कि लोग साइकोलॉजिकल
  2894. 2:21:34सिचुएशन को
  2895. 2:21:37समझें। मुझे नहीं पता कि क्या ज्यादा
  2896. 2:21:39कमजोर है। आइडियलिज्म या पब्लिक की समझ।
  2897. 2:21:44मुझे सिर्फ यह पता है कि साइकी में चेंज
  2898. 2:21:46लाना टाइम लेता है और वही चेंज टिकता
  2899. 2:21:50है। जो इनसाइड धीरे-धीरे आती है उसका
  2900. 2:21:53इफेक्ट ज्यादा स्ट्रांग होता है एस कंपेयर
  2901. 2:21:56टू वो आइडियलिज्म जो कभी-कभी जगता है और
  2902. 2:21:58फिर जल्दी चला जाता
  2903. 2:22:01[संगीत]
  2904. 2:22:05है। आज के टाइम में लोग जो शैडो या साइकी
  2905. 2:22:09का लो पार्ट समझते हैं उसमें सिर्फ
  2906. 2:22:11नेगेटिव चीजें नहीं
  2907. 2:22:13होती। जब हम अपने आप को समझने की कोशिश
  2908. 2:22:16करते हैं मतलब अपनी सोल को अपनी आत्मा को
  2909. 2:22:19एक्सप्लोर करते हैं तब हमें अपने
  2910. 2:22:22इंस्टिंक्ट्स और उनके इमेज का एक पूरा
  2911. 2:22:24वर्ल्ड मिलता है। यह दिखाता है कि साइकी
  2912. 2:22:27के अंदर काफी पावरफुल चीजें छुपी होती
  2913. 2:22:30हैं। जो जब तक सब कुछ ठीक चल रहा है तब तक
  2914. 2:22:34हमें पता ही नहीं चलता।
  2915. 2:22:36यह सब फर्सेस एकदम एनर्जेटिक होती हैं और
  2916. 2:22:39यह पूरी तरह से इस बात पर डिपेंड करती हैं
  2917. 2:22:41कि कॉन्शियस माइंड कितना रेडी है कि यह
  2918. 2:22:45फर्सेस और उनके साथ है इमेजेस और आइडियाज
  2919. 2:22:48किसी चीज को बनाएंगे या बिगाड़ेंगे।
  2920. 2:22:52साइकोलॉजिस्ट शायद एक ही ऐसा इंसान है
  2921. 2:22:55जिसे यह एक्सपीरियंस से पता है कि मॉडर्न
  2922. 2:22:57इंसान का साइकिक रेडीनेस कितना कमजोर है।
  2923. 2:23:01क्योंकि वही एक ऐसा बंदा है जो बार-बार
  2924. 2:23:04इंसान के नेचर में जाके उन हेल्पफुल
  2925. 2:23:07फर्सेस और आइडियाज को ढूंढता है। जो हर
  2926. 2:23:10बार एक इंसान को अंधेरे और डेंजर से
  2927. 2:23:12निकालने का रास्ता दिखाते आए
  2928. 2:23:16हैं। इस मुश्किल काम के लिए साइकोलॉजिस्ट
  2929. 2:23:20को बहुत पेशेंस चाहिए होती है। वह किसी
  2930. 2:23:22ट्रेडिशनल ऐसा होना चाहिए या ऐसा जरूर
  2931. 2:23:25होना चाहिए पर भरोसा नहीं कर सकता। और वह
  2932. 2:23:29सिर्फ दूसरे पे एफर्ट डाल के खुद सिर्फ
  2933. 2:23:31एडवाइजर बनके नहीं बैठ सकता। सब जानते हैं
  2934. 2:23:35कि सिर्फ अच्छी बातें बोलना बेकार होता
  2935. 2:23:37है। लेकिन यह सिचुएशन इतनी हेल्पलेस है और
  2936. 2:23:40जरूरत इतनी ज्यादा है कि लोग पुरानी
  2937. 2:23:42गलतियां रिपीट करना पसंद करते
  2938. 2:23:45हैं। बजाय अपने अंदर के प्रॉब्लम को डीपली
  2939. 2:23:48सोचने के और वैसे भी बात हमेशा सिर्फ एक
  2940. 2:23:52इंसान की होती है। 10,000 लोगों की नहीं।
  2941. 2:23:56जहां लगता है कि अगर ज्यादा लोगों को चेंज
  2942. 2:23:58किया जाए तो रिजल्ट्स बड़ा दिखाई देगा।
  2943. 2:24:01लेकिन असली बात सबको पता है। जब तक एक
  2944. 2:24:04आदमी चेंज नहीं होता कुछ भी बदला नहीं
  2945. 2:24:08जाता। जो इफेक्ट हम सब लोगों में देखना
  2946. 2:24:11चाहते हैं, वह शायद 100 साल बाद आएगा
  2947. 2:24:14क्योंकि इंसानी स्पिरिट का बदलाव बहुत
  2948. 2:24:17स्लो होता है और इसे ना तो जल्दी किया जा
  2949. 2:24:21सकता है, ना लाया जा सकता है, ना रोका जा
  2950. 2:24:24सकता है। सिर्फ सोच
  2951. 2:24:26के और तो और एक जनरेशन में तो बिल्कुल भी
  2952. 2:24:29नहीं।
  2953. 2:24:31लेकिन जो चीज हमारे हाथ में है वह यह है
  2954. 2:24:34कि कुछ लोग जो चेंज चाहते हैं या दूसरों
  2955. 2:24:37को इनफ्लुएंस करने का चांस बना लेते हैं
  2956. 2:24:40वह बदल सकते हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि
  2957. 2:24:44वह किसी को समझा के या लेक्चर दे के बदले।
  2958. 2:24:47मैं बात कर रहा हूं उस नोन फैक्ट की कि जो
  2959. 2:24:52आदमी अपने एक्शनंस को समझता है और
  2960. 2:24:54अनकॉन्शियस तक पहुंचता है, वह अपने आसपास
  2961. 2:24:56के लोगों पर बिना कुछ कहे भी असर डालता
  2962. 2:24:59है।
  2963. 2:25:01उसकी कॉन्शियसनेस का डीप और वाइड होना एक
  2964. 2:25:05ऐसे इफेक्ट क्रिएट करता है जिसे पुराने
  2965. 2:25:08लोग माना कहते
  2966. 2:25:11थे। यह एक अनकॉन्शियस इन्फ्लुएंस होता है
  2967. 2:25:15दूसरों के अनकॉन्शियस पर। एक तरह का
  2968. 2:25:17साइलेंट
  2969. 2:25:19प्रेस्टीज और यह तब तक काम करता है जब तक
  2970. 2:25:22इसमें कॉन्शियस ईगो का इंटरफेरेंस नहीं
  2971. 2:25:25आता।
  2972. 2:25:26और सेल्फ नॉलेज की जर्नी सिर्फ पर्सनल
  2973. 2:25:29लेवल तक ही लिमिटेड नहीं होती। क्योंकि एक
  2974. 2:25:31फैक्टर ऐसा होता है जो लोग इग्नोर करते
  2975. 2:25:34हैं। लेकिन वह हमारे होप्स को हाफ वे तक
  2976. 2:25:37पूरा करता है। यह है अनकॉन्शियस
  2977. 2:25:42जिदगस्त। यह अनकॉन्शियस माइंड की सोच का
  2978. 2:25:44बैलेंस करता है और आने वाले बदलाव का
  2979. 2:25:47सिग्नल देता है। इसका एक परफेक्ट एग्जांपल
  2980. 2:25:49है मॉडर्न आर्ट।
  2981. 2:25:52वो लगता तो है कि सिर्फ ब्यूटी का इशू से
  2982. 2:25:55डील कर रहा है। लेकिन असल में यह पब्लिक
  2983. 2:25:57का साइकोलॉजिकल लेवल पर ट्रेन कर रहा होता
  2984. 2:25:59है। उनके पुराने आइडियाज तोड़ के उनके
  2985. 2:26:03सोचने का तरीका बदल रहा है। जो फॉर्म के
  2986. 2:26:06ब्यूटी और कंटेंट के मीनिंग पर बेस्ड था।
  2987. 2:26:09अब आर्ट ब्यूटीफुल नहीं लगता। तब वो
  2988. 2:26:11अब्स्ट्रैक्ट और पर्सनल हो गई है। जो एकदम
  2989. 2:26:15से सेंसेस के साथ होने वाले प्यार और
  2990. 2:26:17सिंपल डिलाइट का दरवाजा बंद कर देता है।
  2991. 2:26:20यह क्लियरली बताता है कि आर्ट का
  2992. 2:26:23प्रोफेटिक स्पिरिट अब पुरानी ऑब्जेक्ट
  2993. 2:26:25बेस्ड थिंकिंग से हट गया है। और अब वह
  2994. 2:26:29सब्जेक्टिव केओस की तरफ जा रहा है जो
  2995. 2:26:31फिलहाल डार्क लगता है। लेकिन अब तक जितना
  2996. 2:26:36हम देख पाए हैं। आर्ट ने अभी तक उस चीज को
  2997. 2:26:39नहीं ढूंढा है जो सब इंसानों को एक साथ
  2998. 2:26:42जोड़ सकती हो और उनकी साइकी को पूरा
  2999. 2:26:45एक्सप्रेस कर सके। शायद यह काम किसी और
  3000. 2:26:48फील्ड के लिए रखा गया हो। जहां रिफ्लेक्शन
  3001. 2:26:51और डीप थिंकिंग का यूज होता
  3002. 2:26:53है। ग्रेट आर्ट ने अब तक हमेशा अपनी असली
  3003. 2:26:57पावर मिथ से लिया है। अनकॉन्शियस
  3004. 2:27:00सिंबोलाइजेशन के प्रोसेस से जो टाइम के
  3005. 2:27:03साथ चलता आया है। और जो ह्यूमन स्पिरिट का
  3006. 2:27:07एक बेसिक एक्सप्रेशन है और फ्यूचर में भी
  3007. 2:27:09सब क्रिएशन का बेस बनेगा।
  3008. 2:27:13मॉडर्न आर्ट का डेवलपमेंट जो एक तरह से सब
  3009. 2:27:15कुछ तोड़ने जैसा लगता है उसे हमें एक ऐसे
  3010. 2:27:19मूड का सिम्टम और सिंबल समझना चाहिए जो
  3011. 2:27:22वर्ल्ड को तोड़ने और फिर से बनाने की सोच
  3012. 2:27:25को दिखाता है। यह मूड हर जगह महसूस होता
  3013. 2:27:28है। पॉलिटिक्स में, सोसाइटी में और
  3014. 2:27:31फिलॉसफी में
  3015. 2:27:33भी। हम ऐसे टाइम में जी रहे हैं जिसे
  3016. 2:27:36ग्रीक्स कास कहते थे। मतलब बिल्कुल सही
  3017. 2:27:39वक्त।
  3018. 2:27:41एक ऐसे बदलाव के लिए जहां गॉड्स का रूप
  3019. 2:27:43बदल रहा है। यानी बेसिक सिंबल्स और
  3020. 2:27:46प्रिंसिपल्स बदल रहे हैं। यह जो चीज हमारे
  3021. 2:27:49टाइम की खासियत है यह हमने कॉन्शियसली चूस
  3022. 2:27:53नहीं की है। यह उस अनकॉन्शियस इंसान का
  3023. 2:27:57एक्सप्रेशन है जो हम सबके अंदर बदल रहा
  3024. 2:27:59है। जो जनरेशंस बाद में आएंगी उन्हें इस
  3025. 2:28:03बड़े से ट्रांसफॉर्मेशन को सीरियसली लेना
  3026. 2:28:06पड़ेगा। अगर ह्यूमैनिटी अपने ही साइंस और
  3027. 2:28:09टेक्नोलॉजी के पावर से खुद को डिस्ट्रॉय
  3028. 2:28:11नहीं करना चाहती
  3029. 2:28:14तो जैसा कि क्रिश्चियन एरा की शुरुआत में
  3030. 2:28:17हुआ था वैसे ही प्रॉब्लम्स आज भी हैं।
  3031. 2:28:20हमारी मोरलिटी अब तक साइंस, टेक और सोशल
  3032. 2:28:23डेवलपमेंट के लेवल तक नहीं पहुंची
  3033. 2:28:26है। सब कुछ दांव पर लगा है और सब कुछ
  3034. 2:28:30डिपेंड करता है मॉडर्न इंसान की
  3035. 2:28:32साइकोलॉजिकल स्टेट पे।
  3036. 2:28:36क्या वह इतना स्ट्रांग है कि अपने पावर का
  3037. 2:28:38गलत यूज करने से बच सके? क्या उसे पता है
  3038. 2:28:42कि वह किस रास्ते पर जा रहा है और आज के
  3039. 2:28:45वर्ल्ड सिचुएशन से क्या कंक्लूजन निकालता
  3040. 2:28:48है? उसके अपने साइकी से
  3041. 2:28:51भी? क्या उसे यह समझ है कि वह अपने अंदर
  3042. 2:28:55के इंसान के लाइफ सेविंग मिथ को खो रहा
  3043. 2:28:58है। वही मिथ जो क्रिश्चियनिटी ने उसके लिए
  3044. 2:29:01संभाल के रखा था।
  3045. 2:29:03क्या वह यह समझ सकता है कि अगर यह मिथ चला
  3046. 2:29:06गया तो उसके साथ क्या होगा? क्या वह यह भी
  3047. 2:29:10समझ पाएगा कि यह एक कैटस्ट्रोफी होगी? और
  3048. 2:29:13आखिर में क्या एक इंसान यह जानता है कि
  3049. 2:29:16वही वह वेट है जो बैलेंस को इधर साइड में
  3050. 2:29:19गिरा सकता है। हैप्पीनेस, सुकून, इनर
  3051. 2:29:24बैलेंस और लाइफ का मतलब। यह सब सिर्फ एक
  3052. 2:29:28इंसान एक्सपीरियंस कर सकता है ना कि कोई
  3053. 2:29:30स्टेट।
  3054. 2:29:32जो एक तरफ तो इंडिपेंडेंट लोगों का ग्रुप
  3055. 2:29:35होता है और दूसरी तरफ वही स्टेट इंसान को
  3056. 2:29:38दबाने और कंट्रोल करने लगता
  3057. 2:29:41है। साइकेट्रिस्ट उन लोगों में से एक है
  3058. 2:29:44जिसे सोल की वेल बीइंग के बारे में सबसे
  3059. 2:29:47ज्यादा पता होता है। और सोसाइटी के हेल्थ
  3060. 2:29:51काफी हद तक इसी सोल के वेल बीइंग पर
  3061. 2:29:53डिपेंड करती है। हां, सोशल और पॉलिटिकल
  3062. 2:29:56सिचुएशंस काफी इंपॉर्टेंट होती हैं। लेकिन
  3063. 2:30:00उनका इंसान के दुख सुख पर जितना इंपैक्ट
  3064. 2:30:02समझा जाता है, वह काफी ओवरएस्टीमेटेड
  3065. 2:30:06है। क्योंकि लोग उन्हें ही फाइनल
  3066. 2:30:09डिसाइडिंग फैक्टर मान लेते हैं। इस एंगल
  3067. 2:30:13से देखा जाए तो हमारे सब सोशल गोल्स एक
  3068. 2:30:15बड़ी गलती करते हैं। वह उस इंसान के
  3069. 2:30:18साइकोलॉजी को इग्नोर कर देते हैं जिनके
  3070. 2:30:20लिए वह गोल्स बनाए जा रहे
  3071. 2:30:22हैं। और काफी बार सिर्फ उनके इल्लुजंस को
  3072. 2:30:26बढ़ावा देते हैं।
  3073. 2:30:29इसलिए मैं यह उम्मीद करता हूं कि एक
  3074. 2:30:31साइकेट्रिस्ट जिसने अपनी पूरी लाइफ साइकी
  3075. 2:30:34के प्रॉब्लम्स और उनके इफेक्ट्स को समझने
  3076. 2:30:36में लगा दी उसे यह राइट मिलना चाहिए कि वह
  3077. 2:30:40अपनी ओपिनियन दे सके। एक सिंपल और हंबल
  3078. 2:30:43तरीके से। आज के वर्ल्ड सिचुएशन से जुड़े
  3079. 2:30:47सवालों के बारे में। मैं ना ओवरली होपफुल
  3080. 2:30:50हूं ना किसी बड़े आइडियल के पीछे भाग रहा
  3081. 2:30:53हूं। मुझे सिर्फ एक इंसान के फ्यूचर की
  3082. 2:30:56चिंता है।
  3083. 2:30:58वह छोटी सी यूनिट जिस पर पूरी दुनिया टिकी
  3084. 2:31:01है और जिसमें अगर हम क्रिश्चियन मैसेज का
  3085. 2:31:05मीनिंग सही समझे तो खुद गॉड भी अपना गोल
  3086. 2:31:09ढूंढ रहे
  3087. 2:31:14हैं। यह बुक यहीं खत्म होती
  3088. 2:31:18है। हम फिर मिलेंगे आपसे एक नए एपिसोड में
  3089. 2:31:21एक और बुक के साथ। मेरा नाम है रोहित और
  3090. 2:31:25आप सुन रहे थे सिलेबस वि रोहित। धन्यवाद।
  3091. 2:31:33[संगीत]
  3092. 2:31:42हम

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