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उज्जियाह: एक राज एक गलती और भयानक मृत्यु | The Story of Uzziah | Bible Tube — Transcript

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  1. 0:05[संगीत]
  2. 0:10यह कहानी उस समय की है जब इजराइल का राज्य
  3. 0:13दो भागों में भट चुका था। उत्तर में
  4. 0:16इजराइल का राज्य था और दक्षिण में यहूदा
  5. 0:18का राज्य। यरूशलेम यहूदा की राजधानी थी और
  6. 0:22वहीं परमेश्वर का मंदिर भी था जहां लोग
  7. 0:24यहोवा की आराधना करने आते थे। उस समय
  8. 0:27यहूदा के सिंहासन पर एक राजा था जिसका
  9. 0:30[संगीत] नाम अमस्याह था। अब आप सोचेंगे कि
  10. 0:32यह कहानी तो उज्याह की है तो इसमें
  11. 0:35अमस्याह कहां से आया? तो मैं बता दूं कि
  12. 0:37अमस्याह उज्ज्याह का पिता था। इसलिए इस
  13. 0:40कहानी को अमस्याह से ही शुरू करना जरूरी
  14. 0:43है। अमस्याह योवाश का पुत्र था जो उज्याह
  15. 0:46का दादा था। उसने अपने पिता के बाद यहूदा
  16. 0:49का राज्य संभाला। बाइबल बताती है कि उसने
  17. 0:52अपने शासन की शुरुआत कुछ हद तक [संगीत]
  18. 0:54सही तरीके से की। दो इतिहास 25 का दो में
  19. 0:57लिखा है कि अमस्याह ने वह किया जो यहोवा
  20. 1:00की दृष्टि में ठीक था। परंतु पूरे मन से
  21. 1:03नहीं। इसका मतलब यह है कि उसके जीवन में
  22. 1:06कुछ अच्छी बातें थी लेकिन उसका हृदय पूरी
  23. 1:09तरह परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं था।
  24. 1:12फिर भी जब उसने शासन शुरू किया तो उसने
  25. 1:14अपने राज्य को व्यवस्थित करने की कोशिश
  26. 1:17की। उसके समय में यहूदा को कई चुनौतियों
  27. 1:20का सामना करना पड़ा। एक राजा के रूप में
  28. 1:22उसे अपने राज्य [संगीत] की सुरक्षा करनी
  29. 1:24थी। सेना को संगठित करना था और पड़ोसी
  30. 1:27राष्ट्रों से आने वाले खतरों का सामना
  31. 1:29करना था। बाइबल बताती है कि अमस्याह ने एक
  32. 1:33समय एदोमियो के खिलाफ युद्ध किया और उस
  33. 1:36युद्ध में उसे बड़ी विजय मिली। अमस्याह ने
  34. 1:38नमक की तराई में 10,000 एदोमियों को मार
  35. 1:40गिराया। यह उसके शासन की एक बड़ी जीत थी।
  36. 1:44लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि जब मनुष्य को
  37. 1:46सफलता मिलती है तो उसके हृदय में घमंड आने
  38. 1:49लगता है। अमस्याह के जीवन में भी यही हुआ।
  39. 1:52विजय प्राप्त करने के बाद उसने एक ऐसी
  40. 1:54गलती की जिसने परमेश्वर को अप्रसन्न कर
  41. 1:57दिया। जब वह एदोम से लौटा तो वह वहां के
  42. 2:00देवताओं की मूर्तियां अपने साथ [संगीत] ले
  43. 2:02आया और उन्हें अपने सामने रखकर उनकी पूजा
  44. 2:05करने लगा। दो इतिहास 25 का 14 में लिखा है
  45. 2:09कि उसने उन देवताओं के सामने दंडवत करके
  46. 2:12धूप जलाया। यह परमेश्वर की आज्ञा के
  47. 2:15बिल्कुल विरुद्ध था क्योंकि इजराइलियों को
  48. 2:17स्पष्ट आदेश दिया गया था कि वे केवल यहोवा
  49. 2:20की ही आराधना करें। जब अमस्याह ने ऐसा
  50. 2:23किया तो परमेश्वर ने एक भविष्यत वक्ता को
  51. 2:26उसके पास भेजा। उस भविष्यत्व वक्ता ने
  52. 2:28उससे कहा कि जिन देवताओं को तू पूज रहा है
  53. 2:31वे तो अपने लोगों को भी बचा नहीं सके। फिर
  54. 2:33तू उनकी पूजा क्यों कर रहा है? लेकिन
  55. 2:35अमस्याह ने उस चेतावनी को नहीं माना। उसने
  56. 2:38भविष्यत्व [संगीत] वक्ता की बात को ठुकरा
  57. 2:40दिया। धीरे-धीरे उसके जीवन में घमंड बढ़ने
  58. 2:43लगा और उसने ऐसे फैसले लेने शुरू कर दिए
  59. 2:46जो बुद्धिमानी के नहीं थे। उसी समय इजराइल
  60. 2:49के उत्तर [संगीत] के राज्य में भी योवाश
  61. 2:51नाम का एक राजा था जो यहूदा के योवाश से
  62. 2:54अलग था। अमस्याह ने उसी इजराइल के राजा
  63. 2:56योवाश को युद्ध के लिए चुनौती दी। योवाश
  64. 2:59ने पहले [संगीत] उसे समझाने की कोशिश की
  65. 3:01और कहा कि यह युद्ध तुम्हारे लिए अच्छा
  66. 3:04नहीं होगा। लेकिन अमस्याह ने उसकी बात
  67. 3:06नहीं मानी। अंत में युद्ध हुआ और अमस्याह
  68. 3:09हार गया। दो इतिहास 25 का 23 से 24 बताता
  69. 3:13है कि इसराइल के राजा ने यरूशलेम की दीवार
  70. 3:16का एक हिस्सा गिरा दिया और मंदिर तथा
  71. 3:18राजमहल के खजाने लेकर सामरिया लौट गया। यह
  72. 3:21यहूदा के लिए बहुत बड़ी शर्म और नुकसान की
  73. 3:23बात थी। उस हार के बाद अमस्याह की
  74. 3:26प्रतिष्ठा कमजोर हो गई। लोगों का विश्वास
  75. 3:29उस पर कम होने लगा। कुछ समय बाद यरूशलेम
  76. 3:32में उसके खिलाफ षड्यंत्र रचा गया। उसे
  77. 3:35मारने की योजना बनाई गई। जब उसे इसका पता
  78. 3:37चला तो वह लाखश नाम के शहर में [संगीत]
  79. 3:40भाग गया। लेकिन षड्यंत्रकारियों ने उसका
  80. 3:42पीछा किया और वहीं उसे मार डाला। इस
  81. 3:45प्रकार अमस्याह का जीवन समाप्त हो गया। अब
  82. 3:48यहूदा का सिंहासन खाली हो गया था और लोगों
  83. 3:51को एक नए [संगीत] राजा की जरूरत थी। उसी
  84. 3:54समय अमस्याह का एक पुत्र था जिसका नाम
  85. 3:56उजियाह था। बाइबल उसे अजर्याह भी कहती है।
  86. 4:00उस समय उसकी उम्र केवल 16 वर्ष थी। फिर भी
  87. 4:03यहूदा के लोगों ने उसे राजा बना दिया।
  88. 4:06सोचिए एक ऐसा युवक जो अभी जीवन की शुरुआत
  89. 4:10ही कर रहा था अचानक एक पूरे राष्ट्र का
  90. 4:12राजा बन गया। यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी।
  91. 4:15लेकिन यहीं से उजियाह की कहानी शुरू होती
  92. 4:18है। उज्जियाह का जन्म एक राज परिवार में
  93. 4:21हुआ था। उसकी माता का नाम यकोल्याह था और
  94. 4:24वह यरूशलेम की रहने वाली थी। बचपन से ही
  95. 4:27उज्जियाह ने राजमहल का जीवन देखा था। उसने
  96. 4:30देखा था कि राजा कैसे निर्णय लेते हैं।
  97. 4:32कैसे राज्य का शासन चलता है और कैसे
  98. 4:35युद्धों की तैयारी की [संगीत] जाती है।
  99. 4:37लेकिन उसने अपने पिता के जीवन से एक
  100. 4:39महत्वपूर्ण शिक्षा भी देखी थी कि जब
  101. 4:42[संगीत] कोई व्यक्ति परमेश्वर से दूर हो
  102. 4:44जाता है तो उसका जीवन और उसका राज्य दोनों
  103. 4:47कमजोर हो जाते हैं। जब उज्याह राजा बना तो
  104. 4:51उसके [संगीत] सामने दो रास्ते थे। वह चाहे
  105. 4:53तो अपने पिता की गलतियों को दोहरा सकता था
  106. 4:56या फिर वह परमेश्वर के मार्ग पर चल सकता
  107. 4:58था। बाइबल बताती है कि उसने सही रास्ता
  108. 5:01चुना। उसने वही किया जो यहोवा की दृष्टि
  109. 5:05में ठीक था। ठीक वैसे ही जैसे उसके पिता
  110. 5:08अमस्याह ने अपने जीवन के शुरुआती समय में
  111. 5:11किया था। उजियाह के जीवन में उस समय एक
  112. 5:14व्यक्ति था [संगीत] जिसने उसके जीवन पर
  113. 5:16गहरा प्रभाव डाला। उसका नाम जकरिया था।
  114. 5:19बाइबल बताती है कि जकरियाह को परमेश्वर के
  115. 5:22दर्शन की [संगीत] समझ थी और उसके दिनों
  116. 5:24में उज्याह परमेश्वर की खोज करता था। जब
  117. 5:28तक उजियाह ने यहोवा की खोज की तब तक
  118. 5:31परमेश्वर ने उसे सफल बनाया। यह बात उसके
  119. 5:34पूरे जीवन को समझने की कुंजी है। उसकी
  120. 5:36सफलता का रहस्य उसकी सेना नहीं थी। उसकी
  121. 5:40शक्ति नहीं थी बल्कि परमेश्वर की खोज थी।
  122. 5:43एक युवा राजा जिसने अपने जीवन [संगीत] की
  123. 5:46शुरुआत परमेश्वर को खोजने से की।
  124. 5:49धीरे-धीरे अपने राज्य को मजबूत करने लगा।
  125. 5:51उज्याह ने अपने शासन की शुरुआत में धैर्य
  126. 5:55से काम किया। उसने जल्दबाजी में निर्णय
  127. 5:57नहीं लिए। उसने राज्य को व्यवस्थित
  128. 5:59[संगीत] किया और अपने लोगों की स्थिति को
  129. 6:01समझा। उसी समय उसने एलोत नाम के शहर को
  130. 6:04फिर से बसाया और उसे यहूदा के अधीन मजबूत
  131. 6:07किया। यह शहर व्यापार के लिए महत्वपूर्ण
  132. 6:10था और इसे मजबूत करने से [संगीत] राज्य को
  133. 6:12आर्थिक लाभ भी हुआ। धीरे-धीरे उज्जियाह का
  134. 6:15शासन स्थिर होने लगा। लोग देखने लगे कि
  135. 6:18उनका युवा [संगीत] राजा समझदारी से काम कर
  136. 6:21रहा है। उसके निर्णयों में बुद्धि दिखाई
  137. 6:23[संगीत] देने लगी और राज्य में व्यवस्था
  138. 6:25आने लगी। जब एक राजा परमेश्वर के मार्ग पर
  139. 6:28चलता है तो परमेश्वर भी उसके कामों में
  140. 6:30आशीष देते हैं। उजियाह के साथ भी यही हुआ।
  141. 6:33उसके शासन की शुरुआत परमेश्वर की कृपा से
  142. 6:36भरी हुई थी। लोग शांति का अनुभव करने लगे
  143. 6:39और राज्य फिर से मजबूत होने लगा। लेकिन यह
  144. 6:42केवल शुरुआत थी। आगे चलकर परमेश्वर उसे और
  145. 6:46भी बड़ी सफलताएं देने वाला था। उसकी सेना
  146. 6:49मजबूत होने वाली थी। उसके शहर मजबूत होने
  147. 6:52वाले थे और उसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक
  148. 6:54फैलने वाली थी। लेकिन उस महान सफलता के
  149. 6:57साथ एक खतरा भी आने वाला था। घमंड का
  150. 7:00खतरा। उस समय तक उजियाह एक ऐसा राजा था जो
  151. 7:04परमेश्वर को खोजता था और उसी के कारण उसे
  152. 7:07सफलता मिल रही थी। लेकिन उसकी कहानी का
  153. 7:09अगला भाग हमें बताएगा कि परमेश्वर ने उसे
  154. 7:12युद्धों में कैसे विजय दी। उसका राज्य
  155. 7:15कैसे शक्तिशाली बना और उसकी प्रसिद्धि
  156. 7:17कैसे दूर देशों तक फैल गई। उज्जियाह के
  157. 7:20जीवन का आरंभ बहुत ही आशाजनक था। वह एक
  158. 7:24युवा राजा था जिसने अपने शासन की शुरुआत
  159. 7:26में परमेश्वर की खोज की थी और बाइबल
  160. 7:29स्पष्ट रूप से बताती है कि जब तक उसने
  161. 7:31यहोवा को खोजा तब तक परमेश्वर ने उसे
  162. 7:34[संगीत] सफल बनाया। यही वह समय था जब उसके
  163. 7:37राज्य में धीरे-धीरे स्थिरता आने लगी और
  164. 7:40यहूदा का राष्ट्र फिर से मजबूत होने लगा।
  165. 7:43अमस्याह के समय में हुई हार और अपमान के
  166. 7:46कारण राज्य की शक्ति कुछ कमजोर पड़ गई थी।
  167. 7:49लेकिन अब एक [संगीत] नया राजा था जो
  168. 7:51परमेश्वर के मार्ग पर चलने की कोशिश कर
  169. 7:54रहा था। परमेश्वर की कृपा उसके जीवन पर
  170. 7:57दिखाई देने [संगीत] लगी और उसका शासन
  171. 7:59धीरे-धीरे फलदाई बनने लगा। उजिया केवल एक
  172. 8:03धार्मिक व्यक्ति ही नहीं था बल्कि एक ऐसा
  173. 8:06राजा भी था जो अपने राज्य को मजबूत बनाने
  174. 8:08के लिए मेहनत करता था। उसने केवल मंदिर की
  175. 8:11आराधना पर ध्यान नहीं दिया बल्कि अपने
  176. 8:14लोगों की सुरक्षा, अपने देश की सीमाओं और
  177. 8:17अपने शहरों की मजबूती पर भी ध्यान दिया।
  178. 8:19यह एक अच्छे राजा की पहचान होती है कि वह
  179. 8:22अपने लोगों की रक्षा करें और अपने देश को
  180. 8:25सुरक्षित बनाएं। इसलिए उजियाह ने अपने
  181. 8:28शासन के शुरुआती वर्षों में अपने राज्य की
  182. 8:30सीमाओं को सुरक्षित करना शुरू किया। उस
  183. 8:33समय यहूदा के आसपास कई ऐसे राष्ट्र थे जो
  184. 8:36कभी-कभी यहूदा के लिए खतरा बन जाते थे।
  185. 8:39उनमें से एक राष्ट्र पलिस्ती थे। पलिस्ती
  186. 8:42इजराइल और यहूदा के पुराने शत्रु थे और कई
  187. 8:45बार उन्होंने इसराइल के लोगों के साथ
  188. 8:47युद्ध किया था। लेकिन बाइबल बताती है कि
  189. 8:50परमेश्वर ने उज्याह की सहायता की और उसे
  190. 8:53अपने शत्रुओं पर विजय दी। दो इतिहास 26 का
  191. 8:56छह में लिखा है कि उजियाह ने पलिस्तियों
  192. 8:59के साथ युद्ध किया और उसने गत यमने
  193. 9:01[संगीत] और अशदोत की दीवारों को गिरा
  194. 9:04दिया। यह बहुत बड़ी जीत थी क्योंकि यह
  195. 9:06पलिस्तियों के महत्वपूर्ण नगर थे। केवल
  196. 9:09इतना ही नहीं बल्कि उसने अशदोत के क्षेत्र
  197. 9:11में और पलिस्तियों [संगीत]
  198. 9:12के बीच कई नगर भी बसाए। इसका मतलब यह था
  199. 9:16कि उजिया [संगीत] केवल युद्ध जीतकर वापस
  200. 9:18नहीं लौटा। बल्कि उसने उन क्षेत्रों में
  201. 9:20अपना प्रभाव भी स्थापित किया। इससे यहूदा
  202. 9:23का राज्य और भी [संगीत] मजबूत हो गया।
  203. 9:25बाइबल यह भी बताती है कि परमेश्वर ने उसे
  204. 9:28केवल पलिस्तियों पर ही नहीं बल्कि अन्य
  205. 9:31शत्रुओं पर भी विजय दी। परमेश्वर [संगीत]
  206. 9:33ने उज्याह को पलिस्तियों, गुरबाल में रहने
  207. 9:37वाले अरबियों और मुनियों के विरुद्ध
  208. 9:39सहायता दी। इसका अर्थ यह है कि उज्याह का
  209. 9:43प्रभाव केवल एक ही दिशा में नहीं बल्कि कई
  210. 9:46दिशाओं में फैलने लगा था। जब एक राजा
  211. 9:48परमेश्वर के मार्ग पर चलता है तो परमेश्वर
  212. 9:51उसे ऐसे अवसर देता है जिनसे उसका राज्य
  213. 9:54सुरक्षित और समृद्ध हो सकता है। उजियाह के
  214. 9:57समय में भी यही हुआ। उसकी विजय की खबर
  215. 10:00दूर-दूर तक फैलने लगी। यहां तक कि अमोनी
  216. 10:03लोग भी उसे भेंट देने लगे। उसकी प्रसिद्ध
  217. 10:06मिस्र की सीमा तक फैल गई क्योंकि वह बहुत
  218. 10:09शक्तिशाली हो गया था। यह सब केवल उसकी
  219. 10:11अपनी शक्ति से नहीं हुआ था बल्कि परमेश्वर
  220. 10:14की सहायता से हुआ था। जब परमेश्वर किसी
  221. 10:17व्यक्ति की सहायता करता है तो उसकी सफलता
  222. 10:19केवल उसके अपने देश तक सीमित नहीं रहती
  223. 10:22बल्कि उसका नाम दूर देशों तक फैल जाता है।
  224. 10:25लेकिन उजियाह केवल युद्धों में ही सफल
  225. 10:27नहीं था। उसने अपने राज्य के शहरों को भी
  226. 10:30मजबूत बनाने का काम किया। वह समझता था कि
  227. 10:33अगर शहर सुरक्षित होंगे तो लोग भी
  228. 10:35सुरक्षित रहेंगे। इसीलिए उसने यरूशलेम की
  229. 10:38दीवारों को मजबूत किया। उजियाह ने यरूशलेम
  230. 10:41में कोने के फाटक, तराई के फाटक और दीवार
  231. 10:44के मोड़ पर मीनारें बनाई और उन्हें मजबूत
  232. 10:47किया। इन मीनारों का उद्देश्य शहर की
  233. 10:50रक्षा करना था ताकि शत्रु जब भी आक्रमण
  234. 10:53करें तो सैनिक ऊंचाई से उनकी गतिविधियों
  235. 10:55को देख सकें और शहर की रक्षा कर सकें। यह
  236. 10:58उस समय की एक महत्वपूर्ण सैन्य व्यवस्था
  237. 11:01थी। लेकिन उजियाह का ध्यान केवल राजधानी
  238. 11:04पर ही नहीं था। उसने जंगलों और दूर के
  239. 11:07इलाकों में भी मीनारें बनवाई। बाइबल बताती
  240. 11:10है कि उसने जंगल में भी मीनारें बनाई और
  241. 11:12बहुत से कुंड खुदवाए क्योंकि उसके पास
  242. 11:15बहुत पशु थे। इसका मतलब यह है कि उज्जियाह
  243. 11:18[संगीत] ने कृषि और पशुपालन पर भी ध्यान
  244. 11:20दिया। एक राजा के रूप में वह समझता था कि
  245. 11:24राष्ट्र [संगीत] की समृद्धि केवल युद्ध
  246. 11:25जीतने से नहीं आती बल्कि खेतों, पशुओं और
  247. 11:29व्यापार से भी आती है। इसीलिए उसने
  248. 11:32किसानों की मदद की और भूमि को उपजाऊ बनाने
  249. 11:35के लिए कई काम करवाए। उज्जिया को खेती और
  250. 11:38खेतों से विशेष प्रेम था। यह बात एक राजा
  251. 11:40के लिए असामान्य लग सकती है। लेकिन वास्तव
  252. 11:43में यह उसके समझदार होने का प्रमाण था। वह
  253. 11:46जानता था कि अगर खेतों में फसल अच्छी
  254. 11:48होगी, तो लोग खुशहाल रहेंगे और राज्य
  255. 11:51मजबूत होगा। इसके साथ-साथ [संगीत]
  256. 11:54उसने अपनी सेना को भी संगठित किया। एक
  257. 11:56मजबूत राष्ट्र के लिए एक मजबूत सेना का
  258. 11:59होना बहुत जरूरी होता है। इसलिए उजियाह
  259. 12:01[संगीत]
  260. 12:02ने अपनी सेना की गिनती करवाई और उन्हें
  261. 12:05परिवारों के अनुसार व्यवस्थित किया। उसके
  262. 12:08पास युद्ध के लिए तैयार एक बड़ी सेना थी।
  263. 12:10इन सैनिकों की संख्या बहुत बड़ी थी और वे
  264. 12:13संगठित रूप से युद्ध के [संगीत] लिए तैयार
  265. 12:15रहते थे। उसके पास 37500
  266. 12:19सैनिक थे जो शक्तिशाली योद्धा थे। यह
  267. 12:22संख्या उस समय के लिए बहुत बड़ी थी और यह
  268. 12:24दिखाती है कि जियाह का राज्य सैन्य
  269. 12:27[संगीत] रूप से बहुत मजबूत हो चुका था।
  270. 12:29लेकिन उसने केवल सैनिकों की संख्या ही
  271. 12:31नहीं बढ़ाई बल्कि उनके लिए हथियारों की भी
  272. 12:34अच्छी व्यवस्था की। उसने पूरी सेना के लिए
  273. 12:37ढाल, [संगीत] भाले, टोप, बख्तर, धनुष और
  274. 12:40गोपन के पत्थर तैयार करवाए। इसका मतलब यह
  275. 12:44है कि उसकी सेना पूरी तरह सुसज्जित थी। यह
  276. 12:47सब दिखाता है कि उजियाह केवल धार्मिक
  277. 12:49व्यक्ति ही नहीं बल्कि एक बुद्धिमान
  278. 12:51[संगीत] और दूरदर्शी शासक भी था। उसने
  279. 12:54अपने राज्य को हर क्षेत्र में मजबूत बनाने
  280. 12:57की कोशिश की। लेकिन उसकी उपलब्धियां यहीं
  281. 13:00समाप्त नहीं हुई। बाइबल हमें एक और रोचक
  282. 13:02बात बताती है। दो इतिहास 26 का 15 कहता है
  283. 13:06कि उसने यरूशलेम में कुशल लोगों से ऐसे
  284. 13:09यंत्र बनवाए जो मीनारों और दीवारों पर
  285. 13:12लगाए जाते थे ताकि उनसे तीर और बड़े पत्थर
  286. 13:14फेंके जा सके। यह उस समय के लिए एक प्रकार
  287. 13:18की उन्नत युद्ध तकनीक थी। इससे पता चलता
  288. 13:21है कि उज्जियाह ने अपने राज्य की रक्षा के
  289. 13:24लिए नई-नई व्यवस्थाएं भी विकसित की। इन
  290. 13:27यंत्रों के कारण शहर की दीवारें और भी
  291. 13:29सुरक्षित हो [संगीत] गई और शत्रुओं के लिए
  292. 13:32यरूशलेम पर आक्रमण करना कठिन हो गया। इस
  293. 13:35प्रकार हम देखते हैं कि उजियाह के शासन के
  294. 13:38दौरान यहूदा का राज्य हर दिशा में मजबूत
  295. 13:40हो रहा था। उसके युद्ध सफल थे। उसके शहर
  296. 13:44सुरक्षित थे। उसकी सेना शक्तिशाली थी और
  297. 13:47उसका नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो रहा था।
  298. 13:50उसकी कीर्ति बहुत दूर तक फैल गई क्योंकि
  299. 13:53उसे अद्भुत सहायता मिली थी। यह सहायता
  300. 13:56वास्तव में परमेश्वर की ओर से थी। जब एक
  301. 13:59व्यक्ति परमेश्वर के मार्ग पर चलता है तो
  302. 14:01परमेश्वर उसके कामों में ऐसी सहायता देता
  303. 14:04है जो साधारण मनुष्य की शक्ति से संभव
  304. 14:07नहीं होती। उजियाह के जीवन का यह समय उसके
  305. 14:10राज्य का स्वर्ण काल जैसा था। लोग शांति
  306. 14:13में रह रहे थे। शहर सुरक्षित थे और
  307. 14:16राष्ट्र समृद्ध हो रहा था। लेकिन अक्सर
  308. 14:19ऐसा होता है कि जब मनुष्य को लगातार सफलता
  309. 14:22मिलती है तो उसके हृदय में धीरे-धीरे घमंड
  310. 14:25आने लगता है। यही खतरा उज्जियाह के जीवन
  311. 14:28में भी आने वाला था। उसकी शक्ति बढ़ रही
  312. 14:31थी। उसकी प्रसिद्धि फैल रही थी और [संगीत]
  313. 14:33लोग उसकी प्रशंसा कर रहे थे। लेकिन आगे
  314. 14:36चलकर यही सफलता उसके लिए परीक्षा बन गई।
  315. 14:39उसकी कहानी का अगला भाग हमें बताएगा कि
  316. 14:42कैसे उसके हृदय में घमंड आने लगा। कैसे
  317. 14:45उसने परमेश्वर के मंदिर में एक ऐसा काम
  318. 14:47किया जो केवल याजकों के लिए था और कैसे उस
  319. 14:50एक गलती ने उसके जीवन की दिशा बदल दी।
  320. 14:54उजियाह के जीवन का वह समय आ चुका था जब
  321. 14:57उसकी [संगीत] शक्ति, उसकी प्रसिद्ध और
  322. 14:59उसके राज्य की महानता अपने चरम पर पहुंच
  323. 15:02चुकी थी। उसने अपने शासन की शुरुआत
  324. 15:04परमेश्वर को खोजने से की थी और उसी कारण
  325. 15:08परमेश्वर ने उसे असाधारण सफलताएं दी थी।
  326. 15:11उसके युद्ध सफल हुए थे। उसके शत्रु पराजित
  327. 15:13हुए थे। उसके शहर मजबूत हो गए थे। उसकी
  328. 15:17सेना शक्तिशाली बन गई थी और उसका नाम
  329. 15:19दूर-दूर तक फैल चुका था। लोग उसके शासन की
  330. 15:22प्रशंसा करते थे और उसके राज्य को एक
  331. 15:25मजबूत राष्ट्र के रूप में देखने लगे थे।
  332. 15:28लेकिन मनुष्य के जीवन में एक बहुत बड़ा
  333. 15:30खतरा भी होता है। सफलता के बाद आने वाला
  334. 15:33घमंड। जब मनुष्य बार-बार सफल होता है,
  335. 15:36[संगीत] जब लोग उसकी प्रशंसा करते हैं और
  336. 15:39जब उसकी शक्ति बढ़ती जाती है, तब उसके
  337. 15:41हृदय में यह विचार आने [संगीत] लगता है कि
  338. 15:44वह स्वयं ही सब कुछ कर सकता है। यही बात
  339. 15:47उज्जियाह के जीवन [संगीत] में भी
  340. 15:48धीरे-धीरे होने लगी। बाइबल इस स्थिति को
  341. 15:51बहुत स्पष्ट शब्दों में बताती है। जब वह
  342. 15:54शक्तिशाली हो गया तो [संगीत] उसका हृदय
  343. 15:56घमंड से भर गया और यही घमंड उसके पतन का
  344. 16:00कारण बना। यह एक बहुत गहरी और महत्वपूर्ण
  345. 16:03बात है। वही व्यक्ति [संगीत] जो पहले
  346. 16:04परमेश्वर को खोजता था, वही व्यक्ति
  347. 16:07धीरे-धीरे अपने आप को इतना शक्तिशाली
  348. 16:09समझने [संगीत] लगा कि उसने परमेश्वर की
  349. 16:11व्यवस्था की सीमा को पार कर दिया।
  350. 16:13परमेश्वर ने इसराइल के लोगों के लिए एक
  351. 16:15स्पष्ट व्यवस्था बनाई थी कि मंदिर में
  352. 16:18कौन-कौन से कार्य कौन करेगा। मंदिर में
  353. 16:21बलिदान चढ़ाने और धूप जलाने [संगीत] का
  354. 16:23काम केवल याजकों के लिए निर्धारित था और
  355. 16:26वे याजक हारून के वंश से होते थे। यह
  356. 16:29परमेश्वर की व्यवस्था का हिस्सा था। राजा
  357. 16:32का कार्य शासन करना था। लोगों की रक्षा
  358. 16:35करना था और परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन
  359. 16:37करना था। लेकिन मंदिर के अंदर धूप जलाना
  360. 16:40उसका काम नहीं था। यह केवल याजकों की
  361. 16:43जिम्मेदारी थी। लेकिन जब उज्याह के हृदय
  362. 16:46में घमंड आ गया तो उसने यह सोचना शुरू
  363. 16:49किया कि वह इतना महान और शक्तिशाली है कि
  364. 16:52वह यह काम भी कर सकता है। एक दिन उज्याह
  365. 16:55परमेश्वर के मंदिर में गया। मंदिर वह
  366. 16:58स्थान था जहां परमेश्वर की उपस्थिति का
  367. 17:00सम्मान किया जाता था और जहां हर कार्य
  368. 17:02परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार किया जाता
  369. 17:04था। लेकिन उस दिन उजियाह एक ऐसा काम करने
  370. 17:08के लिए मंदिर में गया जो उसे नहीं करना
  371. 17:10चाहिए था। बाइबल बताती है कि वह धूप जलाने
  372. 17:14के लिए धूप दान लेकर [संगीत] मंदिर में
  373. 17:15प्रवेश कर गया। यह एक बहुत गंभीर बात थी
  374. 17:18क्योंकि वह परमेश्वर की व्यवस्था का
  375. 17:20उल्लंघन कर रहा था। उस समय मंदिर में याजक
  376. 17:23भी उपस्थित थे। मुख्य याजक का नाम अजर्याह
  377. 17:26था। जब उसने देखा कि राजा स्वयं धूप जलाने
  378. 17:29के लिए मंदिर में आया है तो उसने तुरंत
  379. 17:32इसका विरोध किया। लेकिन वह अकेला नहीं था।
  380. 17:35बाइबल बताती है कि उसके साथ यहोवा के 80
  381. 17:37साहसी याजक भी थे। वे सभी राजा के सामने
  382. 17:40खड़े हो गए। यह एक बहुत साहसिक [संगीत]
  383. 17:43काम था क्योंकि उस समय राजा के सामने खड़े
  384. 17:45होकर उसका विरोध करना आसान नहीं था। लेकिन
  385. 17:48वे जानते थे कि परमेश्वर की व्यवस्था राजा
  386. 17:51से भी ऊपर है। इसीलिए उन्होंने राजा से
  387. 17:54कहा हे उजिया यह तेरे लिए उचित [संगीत]
  388. 17:56नहीं है कि तू यहोवा के लिए धूप जलाए। यह
  389. 18:00काम हारून के वंश के याजकों के लिए है जो
  390. 18:02धूप जलाने के लिए पवित्र किए गए हैं। तू
  391. 18:05पवित्र स्थान से बाहर निकल जा क्योंकि
  392. 18:07तूने विश्वासघात किया है और इससे यहोवा
  393. 18:09[संगीत] परमेश्वर की ओर से तुझे सम्मान
  394. 18:12नहीं मिलेगा। यह शब्द बहुत स्पष्ट और दृढ़
  395. 18:14थे। याजकों ने राजा को याद दिलाया कि वह
  396. 18:17परमेश्वर की व्यवस्था को तोड़ रहा है।
  397. 18:19उन्होंने उसे समझाया कि उसे तुरंत मंदिर
  398. 18:21से बाहर निकल जाना चाहिए। यह एक ऐसा क्षण
  399. 18:24था जब उजियाह के पास एक अवसर था कि वह
  400. 18:27अपनी गलती स्वीकार [संगीत] कर ले और
  401. 18:29विनम्र होकर मंदिर से बाहर निकल जाए। अगर
  402. 18:31वह ऐसा करता तो शायद स्थिति अलग हो सकती
  403. 18:34थी। लेकिन घमंड मनुष्य के हृदय को कठोर
  404. 18:37बना देता है। जब किसी के हृदय में घमंड आ
  405. 18:40जाता है [संगीत] तो वह सलाह को सुनना बंद
  406. 18:42कर देता है और उसे लगता है कि वह जो कर
  407. 18:44रहा है वही सही है। बाइबल बताती है कि जब
  408. 18:47याजकों ने उसे रोका तो वह क्रोधित हो गया।
  409. 18:49उसके हाथ में धूप दान था और वह धूप जलाने
  410. 18:52के लिए तैयार था। लेकिन याजकों की बात
  411. 18:55सुनकर उसका क्रोध बढ़ गया। उसी क्षण एक
  412. 18:58ऐसी घटना हुई जिसने [संगीत] उसके जीवन की
  413. 19:00दिशा बदल दी। जब वह क्रोध में याजकों से
  414. 19:03बात कर रहा था तभी उसके माथे पर कोढ़
  415. 19:06प्रकट हो गया। यह अचानक [संगीत] हुआ और यह
  416. 19:09सब कुछ मंदिर में ही हुआ। जब महायाजक याजक
  417. 19:12अजर्याह और अन्य याजकों ने उसकी ओर देखा
  418. 19:15तो उन्होंने देखा कि उसके माथे पर [संगीत]
  419. 19:18कोड़ फैल गया है। वे तुरंत समझ गए कि यह
  420. 19:21परमेश्वर का न्याय है। इसलिए उन्होंने उसे
  421. 19:23तुरंत मंदिर से बाहर निकाल दिया। वास्तव
  422. 19:26में उजियाह स्वयं भी जल्दी से बाहर निकल
  423. 19:28गया क्योंकि वह समझ गया था कि यहोवा ने
  424. 19:30उसे दंड [संगीत] दिया है। यह एक बहुत ही
  425. 19:33दुखद और गंभीर क्षण था। वही राजा जो कभी
  426. 19:36परमेश्वर की खोज करता था। वही राजा जिसने
  427. 19:39अपने राज्य को मजबूत बनाया था। वही राजा
  428. 19:42जिसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई थी। अब
  429. 19:45परमेश्वर के न्याय का सामना कर रहा था।
  430. 19:47उसका घमंड उसे उस सीमा तक ले आया था जहां
  431. 19:50उसने परमेश्वर की व्यवस्था को तोड़ दिया
  432. 19:52था और उसी क्षण उसका जीवन बदल गया। कोढ़
  433. 19:56उस समय एक बहुत गंभीर बीमारी मानी जाती
  434. 19:58थी। यह केवल शारीरिक बीमारी ही नहीं थी
  435. 20:01बल्कि इसके कारण व्यक्ति समाज से अलग भी
  436. 20:03कर दिया जाता था। जो व्यक्ति कोढ़ से
  437. 20:06ग्रस्त होता था, वह मंदिर में प्रवेश नहीं
  438. 20:08कर सकता था और सामान्य लोगों के साथ नहीं
  439. 20:11रह सकता था। इसलिए उस दिन मंदिर में जो
  440. 20:14हुआ वह केवल एक दंड नहीं था बल्कि उसके
  441. 20:17पूरे जीवन की दिशा बदलने वाला निर्णय
  442. 20:19[संगीत] था। यह घटना हमें एक गहरी शिक्षा
  443. 20:22देती है कि चाहे मनुष्य कितना भी
  444. 20:24शक्तिशाली क्यों ना हो जाए, चाहे उसे
  445. 20:27कितनी भी सफलता क्यों ना मिल जाए, उसे
  446. 20:30परमेश्वर की व्यवस्था और उसकी सीमाओं का
  447. 20:32सम्मान करना चाहिए। उजियाह की कहानी का यह
  448. 20:35भाग हमें दिखाता है कि घमंड मनुष्य को उस
  449. 20:38स्थान तक पहुंचा सकता है जहां वह परमेश्वर
  450. 20:41की आज्ञा को भी हल्के में लेने लगता है।
  451. 20:44लेकिन परमेश्वर पवित्र है और उसकी
  452. 20:46व्यवस्था का सम्मान किया जाना चाहिए। उस
  453. 20:48दिन मंदिर में जो हुआ उसने उजियाह के जीवन
  454. 20:51को पूरी तरह बदल दिया। अब उसका जीवन पहले
  455. 20:54जैसा नहीं रहने वाला था। उसकी शक्ति, उसका
  456. 20:56सिंहासन और उसका गौरव अब एक नई परिस्थिति
  457. 20:59में प्रवेश करने वाले थे। आगे उसके जीवन
  458. 21:02में क्या हुआ? उसने अपने शेष जीवन को कैसे
  459. 21:05बिताया? उसके पुत्र योताम ने कैसे राज्य
  460. 21:08संभाला? और अंत में उज्जियाह की मृत्यु
  461. 21:10कैसे हुई? [संगीत] यह सब हम कहानी के अगले
  462. 21:13और अंतिम भाग में देखेंगे। मंदिर में हुई
  463. 21:16उस घटना ने उज्जियाह के जीवन को एक ही
  464. 21:18क्षण में बदल दिया। जब उसके माथे पर कोड
  465. 21:21प्रकट हुआ और याजकों ने उसे देखा तो वे
  466. 21:24तुरंत समझ गए कि यह परमेश्वर का न्याय है।
  467. 21:27इसलिए उन्होंने उसे तुरंत मंदिर से बाहर
  468. 21:29निकाल दिया। बाइबल बताती है कि उस समय
  469. 21:32उज्याह स्वयं भी जल्दी से बाहर निकल गया
  470. 21:34क्योंकि वह जान गया था कि यहोवा ने उसे
  471. 21:36दंड दिया है। [संगीत] उस समय की व्यवस्था
  472. 21:38के अनुसार जो व्यक्ति कोर्ट से पीड़ित
  473. 21:40होता था उसे समाज से अलग रखा जाता था।
  474. 21:43[संगीत] वह सामान्य लोगों के साथ नहीं रह
  475. 21:45सकता था और मंदिर में प्रवेश भी नहीं कर
  476. 21:47सकता था। इसका अर्थ यह था कि उज्याह अब
  477. 21:50अपने राजमहल में सामान्य जीवन नहीं जी
  478. 21:53सकता था और ना ही वह मंदिर में जाकर
  479. 21:56परमेश्वर की आराधना कर सकता था जैसा वह
  480. 21:58पहले करता था। उज्याह अपनी मृत्यु के दिन
  481. 22:01तक कोड़ी रहा और वह एक अलग घर में [संगीत]
  482. 22:03रहता था क्योंकि वह यहोवा के मंदिर से अलग
  483. 22:06कर दिया गया था। एक राजा जिसने कभी पूरे
  484. 22:09राष्ट्र पर शासन किया था। अब अपने जीवन के
  485. 22:12अंतिम वर्षों में बीमारी और अलगाव के साथ
  486. 22:15जी रहा था। इस कारण वह अब राज्य का शासन
  487. 22:18भी पहले की [संगीत] तरह नहीं कर सकता था।
  488. 22:20इसलिए उसके पुत्र योताम ने राज्य के
  489. 22:22कार्यों को संभालना शुरू किया। योताम
  490. 22:25लोगों का न्याय करता था और राज्य का
  491. 22:27प्रशासन संभालता था। इसका मतलब यह है कि
  492. 22:30उज्याह अभी जीवित था। लेकिन वास्तविक शासन
  493. 22:34उसके पुत्र के हाथ में चला गया था। यह भी
  494. 22:37एक कठिन स्थिति थी क्योंकि एक राजा के लिए
  495. 22:39अपने [संगीत] ही जीवन में अपने अधिकार को
  496. 22:41कम होते देखना आसान नहीं होता। लेकिन
  497. 22:44परिस्थितियां ऐसी थी कि अब यही व्यवस्था
  498. 22:47करनी पड़ी। योताम ने धीरे-धीरे शासन की
  499. 22:50जिम्मेदारियों को संभालना शुरू किया। वह
  500. 22:53लोगों के मामलों को सुनता था, न्याय करता
  501. 22:55था और राज्य के प्रशासन को व्यवस्थित रखता
  502. 22:58था। बाद में योताम ने भी अपने जीवन में
  503. 23:01परमेश्वर के मार्ग पर चलकर अपने मार्ग को
  504. 23:04उसके सामने ठीक रखा। लेकिन उस समय उजियाह
  505. 23:07का जीवन एक अलग ही परिस्थिति में चल रहा
  506. 23:09था। वह अब भी राजा था, लेकिन उसका जीवन
  507. 23:12पहले जैसा नहीं था। वह उस बीमारी के साथ
  508. 23:15जी रहा था जो उसे हर दिन उसकी गलती की याद
  509. 23:18दिलाती थी। यह केवल शारीरिक पीड़ा ही नहीं
  510. 23:21थी बल्कि एक गहरी आत्मिक शिक्षा भी थी।
  511. 23:24बाइबल यह भी बताती है कि उज्जियाह के जीवन
  512. 23:26की घटनाओं को भविष्यवक्ता यशायाह ने लिखा
  513. 23:29था। इसका मतलब यह है कि उस समय के
  514. 23:32भविष्यद्वक्ताओं ने भी उसके जीवन को एक
  515. 23:35महत्वपूर्ण इतिहास के रूप में देखा।
  516. 23:38उजियाह का जीवन एक ऐसा उदाहरण बन गया था
  517. 23:40जिससे आने वाली पीढ़ियां सीख सकती थी।
  518. 23:43उसने अपने जीवन में बहुत महान काम किए थे।
  519. 23:46उसने अपने राज्य को मजबूत बनाया था। उसने
  520. 23:49अपने शत्रुओं को हराया था। उसने शहरों को
  521. 23:52मजबूत किया था और उसने अपने राष्ट्र को
  522. 23:55समृद्ध बनाया था। लेकिन उसके जीवन की
  523. 23:57कहानी हमें यह भी दिखाती है कि घमंड कितना
  524. 24:00खतरनाक हो सकता है। एक ही गलती ने उसके
  525. 24:03जीवन की दिशा बदल दी थी। अंत में वह समय
  526. 24:06[संगीत] भी आया जब उज्याह का जीवन समाप्त
  527. 24:08हुआ। वह अपने पूर्वजों के साथ सो गया।
  528. 24:11अर्थात उसकी मृत्यु हो गई। [संगीत] लेकिन
  529. 24:13उसकी मृत्यु के बाद भी उसकी स्थिति अलग ही
  530. 24:15रही क्योंकि वह कौड़ी था इसलिए उसे उन
  531. 24:18कब्रों में नहीं दफनाया गया जहां अन्य
  532. 24:20राजा दफनाए जाते थे। उसे राजा की कब्रों
  533. 24:23के पास के खेत में दफनाया गया। लोगों ने
  534. 24:26कहा वह कौड़ी था। यह वाक्य बहुत छोटा है,
  535. 24:29लेकिन इसमें एक गहरी बात छिपी है। यह हमें
  536. 24:31याद दिलाता है कि उसके जीवन के अंत में
  537. 24:33लोग उसे केवल एक शक्तिशाली राजा के रूप
  538. 24:36में नहीं बल्कि उस राजा के रूप में भी याद
  539. 24:38करते थे जिसे कोड हो गया था। इसके बाद
  540. 24:41उसका पुत्र योताम राजा बना और [संगीत]
  541. 24:43उसने अपने पिता के स्थान पर यहूदा के
  542. 24:46राज्य पर शासन किया। इस प्रकार उज्याह का
  543. 24:49जीवन समाप्त हुआ। लेकिन उसकी कहानी केवल
  544. 24:51एक इतिहास नहीं है। यह एक शिक्षा भी है।
  545. 24:54उज्ज्याह के जीवन की शुरुआत बहुत अच्छी
  546. 24:57थी। उसने परमेश्वर को खोजा और परमेश्वर ने
  547. 25:00उसे सफलता दी। उसने अपने राष्ट्र को मजबूत
  548. 25:04बनाया और अपने लोगों की रक्षा की। लेकिन
  549. 25:07जब उसके हृदय में घमंड आ गया तो उसने
  550. 25:09परमेश्वर की व्यवस्था की सीमा को पार कर
  551. 25:12दिया और उसी कारण उसे दंड मिला। उसकी
  552. 25:15कहानी हमें यह सिखाती है कि सफलता मिलने
  553. 25:18के बाद भी [संगीत] मनुष्य को विनम्र बने
  554. 25:20रहना चाहिए। शक्ति, प्रसिद्ध और
  555. 25:23उपलब्धियां मनुष्य को महान बना सकती हैं।
  556. 25:26लेकिन यदि उसके हृदय में नम्रता नहीं है
  557. 25:29तो [संगीत] वही चीजें उसके पतन का कारण भी
  558. 25:32बन सकती हैं। उजियाह की कहानी हमें यह भी
  559. 25:34याद दिलाती [संगीत] है कि परमेश्वर की
  560. 25:36व्यवस्था मनुष्य की व्यवस्था से ऊपर है।
  561. 25:39चाहे कोई व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली
  562. 25:41क्यों ना हो उसे परमेश्वर की आज्ञाओं
  563. 25:43[संगीत] का सम्मान करना चाहिए। जब मनुष्य
  564. 25:46परमेश्वर के मार्ग पर चलता है तो उसे आशीष
  565. 25:49मिलती है। लेकिन जब वह घमंड में आकर उस
  566. 25:52मार्ग से हट जाता है तो उसके जीवन में
  567. 25:54कठिन [संगीत] परिणाम भी आ सकते हैं। इसलिए
  568. 25:57उज्याह का जीवन एक चेतावनी और एक शिक्षा
  569. 26:00दोनों है। उसकी शुरुआत हमें प्रेरित करती
  570. 26:03है कि हम परमेश्वर
  571. 26:04[गला साफ़ करने की आवाज़] को खोजें और
  572. 26:06उसके मार्ग पर चलें और उसका अंत हमें
  573. 26:08चेतावनी देता है कि हमें अपने जीवन में
  574. 26:11हमेशा नम्रता बनाए रखनी चाहिए। यही इस
  575. 26:14कहानी का सबसे गहरा संदेश है। अगर
  576. 26:17उज्जियाह की इस कहानी ने आपको नम्रता,
  577. 26:19[संगीत]
  578. 26:20विश्वास और परमेश्वर की आज्ञा मानने की
  579. 26:22याद दिलाई है तो इसे अपने तक मत रखिए। इसे
  580. 26:25अपने परिवार और दोस्तों के साथ जरूर शेयर
  581. 26:27करें क्योंकि हो सकता है कि आपका एक शेयर
  582. 26:31किसी के जीवन में विश्वास और हिम्मत की नई
  583. 26:33रोशनी जगा दे। और अगर आप चाहते हैं कि
  584. 26:36बाइबल की ऐसी ही गहरी और प्रेरणादायक
  585. 26:39कहानियां आप तक लगातार पहुंचती रहे तो
  586. 26:42हमारे चैनल बाइबल ट्यूब को अभी सब्सक्राइब
  587. 26:45करें। परमेश्वर आपको और आपके पूरे परिवार
  588. 26:48को अपनी शांति, सुरक्षा और भरपूर आशीषों
  589. 26:52से भर दें। जय मसीह की।

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This page contains the full transcript of उज्जियाह: एक राज एक गलती और भयानक मृत्यु | The Story of Uzziah | Bible Tube by Bible Tube , generated from the public captions YouTube serves with the video. The transcript has 4,737 words across 589 segments, with the original timestamps preserved so you can click any line to jump to that moment in the embedded player.

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