Surajya Sanhita: Shung Kaal | Episode - 10 — Transcript
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- 0:08[संगीत]
- 0:16[संगीत]
- 0:29आ
- 0:33[संगीत]
- 0:34आ
- 0:46[संगीत]
- 0:58सा रे रे रे गा रे सा रे रे रे रे गा रे
- 1:02सा
- 1:05[संगीत]
- 1:14मा
- 1:17सा
- 1:18मा
- 1:20[संगीत]
- 1:51आ
- 1:53[प्रशंसा]
- 1:53[संगीत]
- 1:55[प्रशंसा]
- 2:06[संगीत]
- 2:18अपने पूर्वजों का स्मरण करके एक-एक कर
- 2:21उन्हें जलांजलि दीजिए।
- 2:28[संगीत]
- 2:33सम्राट पुष्यमित्र की
- 2:35जय।
- 2:35सम्राट पुष्यमित्र की
- 2:37जय।
- 2:38सम्राट पुष्यमित्र की
- 2:39जय।
- 2:50सम्राट पुष्यमित्र मेरी जलांजलि स्वीकार
- 2:53कीजिए।
- 2:59सम्राट अग्निमित्र की
- 3:01जय
- 3:01सम्राट अग्निमित्र की
- 3:03जय
- 3:04सम्राट अग्निमित्र की
- 3:05जय
- 3:06सम्राट अग्निमित्र की
- 3:07जय
- 3:17सम्राट अग्निमित्र मेरी जलांजलि स्वीकार
- 3:19कीजिए
- 3:24[संगीत]
- 3:25कुमार वसुमित्र की
- 3:27जय कुमार वसुमित्र की
- 3:29जय कुमार वसुमित्र की
- 3:31जय
- 3:39सम्राट वसुमित्र मेरी जलांजलि स्वीकार
- 3:41कीजिए।
- 3:44अपने पूर्वजों का श्रद्धा के साथ स्मरण
- 3:47करना ही श्राद्ध है। आज आप अपने परिजनों
- 3:51के साथ उनका स्मरण करें।
- 4:12क्या पढ़ रहे हैं शुंग सम्राट?
- 4:15हां पूर्णा।
- 4:25अर्थशास्त्र और मनुस्मृति एक साथ।
- 4:29मन में क्या चल रहा है?
- 4:31तथागत ठीक ही कहते हैं। जीवन
- 4:35क्षणभंगुर है। यह ज्ञान आज कैसे हुआ?
- 4:47मेरे पितामह सम्राट पुष्यमित्र शुंग ने
- 4:50मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या की। और
- 4:53शुंग साम्राज्य की नींव रखी। उन्होंने
- 4:56महान अश्वमेघ यज्ञ किया।
- 4:58तात वसुमित्र उस अश्वमेध यज्ञ के अश्व के
- 5:02रक्षक थे। उन्होंने यज्ञ के अश्व की रक्षा
- 5:05करते हुए यवनों से युद्ध किया। ऐसे
- 5:07महापराक्रमी
- 5:09और महान योद्धा वसुमित्र की नाटक देखते
- 5:13हुए हत्या होती है। जो रणभूमि में वीरों
- 5:16से नहीं मारा जा सका उसे रंगभूमि में
- 5:20विश्वस्तों ने आसानी से मार गिरा।
- 5:24यह है जीवन। एक राजा अपनी पत्नी से भी
- 5:29सावधान रहने को विवश है।
- 5:33देखो क्या कहते हैं भगवान कौटिल्य।
- 5:39मां की शैया के नीचे छिपकर कारुष के पुत्र
- 5:43ने अपने पिता की हत्या की थी। भद्रसेन की
- 5:46पत्नी से मिलकर वीरसेन ने अपने भाई की
- 5:49हत्या की थी।
- 5:52धान की खीलों में शहद की जगह विष मिलाकर
- 5:55काशीराज की पत्नी ने काशीराज की हत्या की
- 5:58थी।
- 6:01विष बुझे नपुर से राजा वैरंत्य को विष
- 6:04बुझी करधनी से राजा सोवीर को विष बुझी
- 6:09दर्पण से राजा जालूत की पत्नी और
- 6:14[संगीत]
- 6:15वेणी में शस्त्र छिपाकर
- 6:18विडुरथ की रानियों ने अपने पतियों की
- 6:21हत्या की थी।
- 6:25राजा को शैया, आभूषण और दर्पण से भी
- 6:29सावधान रहना चाहिए। यह है जीवन की
- 6:32क्षणभंगुरता जैसे पानी का बुलबुला।
- 6:38वेदों के अनुयाई
- 6:40आज बुद्ध के अनुयायियों की तरह बात करने
- 6:42लगे।
- 6:43पूर्ण सत्य एक ही है। वेद और बुद्ध दर्शन
- 6:47दोनों उसी तक पहुंचने के दो मार्ग हैं।
- 6:50क्या वेदांत के महान प्रवक्ता याज्ञवलके
- 6:53को बुद्ध धर्म के अनुयायी प्रचंड बौद्ध
- 6:55नहीं कहते? तुम तो बुद्ध के अनुयाई हो।
- 6:58वेदों से तुम जो चाहे निकालना चाहो निकाल
- 7:01दो तो जो बचता है क्या वह बौद्ध दर्शन
- 7:04नहीं है? मैं तो यही मानता हूं कि जो धर्म
- 7:08में स्थित है वह धार्मिक है और जो अधर्म
- 7:11में लिप्त है वह अधार्मिक है। मेरे लिए
- 7:16ब्राह्मण और बौद्ध में कोई अंतर नहीं है।
- 7:18एक बात बरसों से पूछना चाहती थी। क्षमा
- 7:21करें तो पूछो।
- 7:23पूछो।
- 7:25यदि बौद्ध और ब्राह्मण में अंतर नहीं है
- 7:28तो प्रप पितामह पुष्यमित्र ने बृहदत्त को
- 7:32क्यों मारा?
- 7:34क्या सेनापति पुष्यमित्र शुंग बौद्धों से
- 7:37द्वेष नहीं करते थे?
- 7:47पूर्णा क्या तुम भी यही मानती हो कि
- 7:50प्रप पितामह बौद्धी थे?
- 7:55मैंने लोगों से सुना है।
- 7:57प्रप पितामह ने सम्राट बृहद्रथ को इसलिए
- 8:01मारा था क्योंकि वह अपने धर्म में स्थित
- 8:03नहीं था। राज धर्म में स्थित नहीं था। तुम
- 8:07ही तो कहती हो नज् वल होती नज् होती
- 8:11ब्राह्मणों। कमुन्ना वसलो होती कमुन्ना
- 8:14होती ब्राह्मणों। जाति से कोई शूद्र नहीं
- 8:17होता। न जाति से कोई ब्राह्मण कर्म से
- 8:20व्यक्ति शूद्र होता है और कर्म से ही
- 8:22ब्राह्मण।
- 8:26पितामह ने अपने धर्म के लिए बृहद्रथ पर
- 8:29हथियार उठाया था। वे कर्म से क्षत्रिय थे।
- 8:33यदि वे प्रतिज्ञा दुर्बल बृहद्रथ पर
- 8:35हथियार ना उठाते तो वह अपने धर्म का
- 8:37उल्लंघन करते।
- 8:39प्रतिज्ञा दुर्बल
- 8:43पूर्णा मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं इस
- 8:46तरह पितामह का स्मरण तुम्हारे साथ करूंगा।
- 8:48भारत को संगठित करने वाले महाराज
- 8:50चंद्रगुप्त का भारत खंडित हो रहा था। देव
- 8:54नाम प्रियदर्शी अशोक के उत्तराधिकारी चुप
- 8:57थे। प्रजा की रक्षा करना, राष्ट्र की
- 9:01रक्षा करना, उसके सम्मान की रक्षा करना एक
- 9:04राजा की प्रतिज्ञा होती है। परंतु
- 9:07उत्तरोत्तर भारत को निर्बल शासक मिले। और
- 9:11सम्राट बृहद्र तो और भी ज्यादा प्रतिज्ञा
- 9:13दुर्बल निकला।
- 9:20सेनापति
- 9:22आदेश
- 9:26बलाध्यक्ष
- 9:28तुम घर जाओ मैं कुछ देर बाद जाऊंगा
- 9:32सेनापति
- 9:43[संगीत]
- 9:53सम्राट
- 9:55महाराज चंद्रगुप्त ने यवनों को भारत से
- 9:57बाहर खतीर दिया था। उनके रहते किसी की
- 10:00हिम्मत नहीं थी कि भारत की ओर आंख उठाकर
- 10:03देखे। सम्राट अशोक ने कलिंग विजय की। उनके
- 10:07जीते जी किसी का साहस नहीं हुआ कि सुई की
- 10:09नोक के बराबर भारत की भूमि पर अपना अधिकार
- 10:11करें। आज छोटे-छोटे यवन सेनापति और सैनिक
- 10:15सागल और गांधार में भारत की छाती पर बैठकर
- 10:18मुंह दल रहे हैं। लेकिन मगध चुप है। कलिंग
- 10:21मगध के हाथों से निकल चुका है। सातवाहन
- 10:24ताल ठोक रहे हैं।
- 10:24सेनापति
- 10:27मौर्य साम्राज्य में अभी रण की नहीं धर्म
- 10:31की भेरी बजती है।
- 10:35सम्राट मैं मगध का योद्धा हूं। अपने
- 10:38राष्ट्र और अपने स्वामी की रक्षा के लिए
- 10:41तलवार सिराहाने रखकर सोता हूं। भारत की
- 10:43कण-कण भूमि के लिए कण-कण मिटने को तैयार
- 10:45रहना मेरा धर्म है। इसीलिए मेरे पुरखों ने
- 10:49एक हाथ में शास्त्र और दूसरे में शस्त्र
- 10:51लिया। सिर्फ राज सेवा में रहने के लिए
- 10:54आपको कर्ण प्रिय लगे वही नहीं कहना चाहता।
- 10:56मैं अप्रिय सुनने के लिए तैयार हूं
- 10:58सेनापति।
- 10:59सम्राट आपको शस्त्र सज होकर शत्रुओं को
- 11:02चुनौती देनी चाहिए। प्रजा को यह विश्वास
- 11:05दिलाना चाहिए कि उनका सम्राट प्रतिज्ञा
- 11:07दुर्बल नहीं है।
- 11:11यानी
- 11:11आपने राष्ट्र की रक्षा और राष्ट्र के
- 11:14शत्रुओं का नाश करने की प्रतिज्ञा ली है।
- 11:18क्या मैंने उसमें दुर्बलता दिखाई है?
- 11:20मगध
- 11:22यवनों से भारत की रक्षा नहीं कर रहा है
- 11:24सम्राट।
- 11:26यवन पीढ़ियों से पंचनद और गांधार में रहते
- 11:29आ रहे हैं।
- 11:29क्षमा सम्राट प्रजा मानती है कि सम्राट को
- 11:34धर्म विजय में रुचि है। शत्रु विजय में
- 11:37नहीं।
- 11:40युद्ध मनुष्यता का भविष्य तय नहीं कर सकते
- 11:42सेनापति। धर्म विजय सबसे बड़ी विजय है।
- 11:46वीर और प्रजा इसे रणधीरुता कहते हैं।
- 11:48और क्या कहती है प्रजा?
- 11:50जो आपके गुप्तचर कहने का साहस नहीं रखते।
- 11:52क्या?
- 11:53कि मौर्य सम्राट पूरे साम्राज्य को
- 11:56स्तूपों और विहारों से पाट देंगे।
- 11:59बौद्ध संघ को विहारों के लिए भूमि सुलभ
- 12:01है। पर निर्धन किसानों के लिए नहीं।
- 12:04यह ब्राह्मणों का द्वेष बोल रहा है
- 12:06सेनापति।
- 12:07प्रतिज्ञा दुर्बल मैं नहीं। यह समाज
- 12:10दुर्बल है। जो बुद्ध को, धम्म को, संघ को,
- 12:13नए विचार को, परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर
- 12:16पा रहा है।
- 12:17[संगीत]
- 12:32देमित इस गांधार में बैठा नहीं रहेगा यवन
- 12:35आज नहीं तो कल गंगा पार करेंगे क्षणिताम
- 12:37पुरुषो जहा नाम नावाम इ वारणवे टूटी हुई
- 12:40नाव को मनुष्य जैसे समुद्र में छोड़ देता
- 12:43है वैसे ही अरक्षितारम राजा नाम रक्षा
- 12:46करने में असमर्थ राजा को छोड़ देना चाहिए
- 12:49यह महाभारत का कथन है। बहुवे राजन्यो नितम
- 12:54करोति राजा बहुत अधिक असत्य का आचरण करते
- 12:58हैं। यह मैं नहीं ब्राह्मण ग्रंथ कहते
- 13:01हैं।
- 13:03राष्ट्र टूटी हुई नाव नहीं है आमाद।
- 13:11वसुदेख प्र पितामह को कुछ चाहिए तो नहीं?
- 13:14हां।
- 13:19सेनापति की तबीयत तो ठीक है।
- 13:23कुछ दिनों से पिता अनमने से दिखाई दे रहे
- 13:26हैं।
- 13:27आपने कारण नहीं पूछा?
- 13:29पिता ने उत्तर नहीं दिया। सेनापति से
- 13:32बलाध्यक्ष पूछ नहीं सकता। कभी-कभी राज
- 13:36सेवा भी पिता पुत्र के बीच आ खड़ी होती
- 13:38है।
- 13:40[संगीत]
- 13:42वसु वसुमित्र
- 13:44पितामह
- 13:49जेष्ठ वसु दिखाई नहीं दे रहा है।
- 13:51प्र पितामह के पास है।
- 13:52आप लोगों ने भोजन नहीं किया?
- 13:54आपकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
- 13:55और पिता ने
- 13:56उन्होंने कर लिया है।
- 13:58पितामह प्र पितामह आपको पूछ रहे हैं।
- 14:18बलाध्यक्ष मगध के भूत पूर्व और वर्तमान
- 14:22सेनापति को अकेले छोड़ दो।
- 14:35क्या चिंता है?
- 14:38सम्राट से मैंने नए हथियारों और जवान
- 14:41घोड़ों की मांग की।
- 14:43सैनिकों के लिए अधिक वेतन और भत्ते की
- 14:45मांग की। लेकिन सम्राट ने कोई उत्साह नहीं
- 14:48दिखाया।
- 14:49क्या कहा सम्राट ने?
- 14:52यदि युद्ध नहीं तो नए हथियार क्यों? अधिक
- 14:55वेतन क्यों? सैनिक संतुष्ट है।
- 14:58सैनिक मगद भक्त हैं।
- 15:01इसलिए अनुशासन में पर
- 15:05प्रजा में असंतोष है।
- 15:09अपनी बात पूरी करो।
- 15:16सेना से पहले बौद्ध संघ है। सैनिकों से
- 15:20पहले बौद्ध भिक्षु हैं। सम्राट पक्षपात कर
- 15:23रहे हैं। कलिंग और सातवाहन युद्ध के लिए
- 15:26तत्पर है। सागर में यवनों का उपद्रव बढ़
- 15:29रहा है। विदर्भ में बैठे याज्ञसेन पर
- 15:32विश्वास नहीं किया जा सकता। पर याज्ञसेन
- 15:35तो विदर्भ में मगध का राज्यपाल है। मौर्य
- 15:38मंत्री कौडिन्य उसका साला है।
- 15:40मंत्री उसका साला है। इसीलिए तो समस्या
- 15:43है।
- 15:45और सम्राट की सुरक्षा को लेकर भी चिंता
- 15:47है।
- 15:48भिक्षु भिक्षणियों के प्रवेश पर राज
- 15:50प्रसाद में कोई रोक-टोक नहीं है। नट नर्तक
- 15:54नर्तिकों की बहार है।
- 15:56पुष्यमित्र
- 15:57पीढ़ियों से हमारा कुल मौर्य साम्राज्य की
- 16:01रक्षा करता चला आ रहा है।
- 16:04हमारे लिए किसी भी धर्म से पहले राष्ट्र
- 16:08है। वो धर्म जाता है तो जाए
- 16:12राष्ट्र नहीं जाना चाहिए। हमेशा यजुर्वेद
- 16:15का यह आदेश याद रखना वयं राष्ट्रम जागृयाम
- 16:21हमेशा राष्ट्र के लिए जागृत रहें। राष्ट्र
- 16:25यज्ञ यम ते यज्ञत तनहु
- 16:29इसलिए राष्ट्र की रक्षा करने वाली सेना और
- 16:33सेनापतियों को नमस्कार किया जाता है।
- 16:37नमः सेनाभ्य सेनानी भसव नमः
- 16:44उसी समय सम्राट बृहद्रथ ने राज प्रसाद के
- 16:47प्रधान रक्षक की हत्या की।
- 16:49अपने ही अंतरवंशिक की।
- 16:53क्यों? क्योंकि अंतरवंशिक ने गांधार से
- 16:56उपहार में आई एक यवन सुंदरी और उसकी
- 16:58दासियों को बिना जांच के सम्राट के पास
- 17:01जाने से रोका था।
- 17:03फिर
- 17:06तब बृहद्रथ ने पितामह अग्निमित्र को अपना
- 17:08अंतरवंशिक और प्रधान अंगरक्षक नियुक्त
- 17:11किया। सेनापति इससे प्रसन्न नहीं थे।
- 17:14यह ठीक नहीं हुआ तात सम्राट की वाणी में
- 17:18है। आचरण में नहीं जो अंतवंशिक के साथ हुआ
- 17:24वो अग्निमित्र के साथ भी हो सकता है।
- 17:26पुष्य तुम दोनों अपना-अपना कर्तव्य करो।
- 17:36सम्राट ने बड़ा ही साहसिक कदम उठाया है।
- 17:40कौडिन्य
- 17:45अग्निमित्र अभेद्य कवच है। पिता पुत्र
- 17:48दोनों स्वामी भक्त है।
- 17:52अब मैं भीतर और बाहर दोनों ओर से सुरक्षित
- 17:56हूं।
- 18:01जैसा प्रप पितामह का अनुमान था वैसा ही
- 18:04हुआ। विदर्भ में याज्ञसेन ने विद्रोह किया
- 18:07और स्वयं को विदर्भ का राजा घोषित कर
- 18:09दिया। सेनापति ने तुरंत विदर्भ में सेना
- 18:11भेजने की सलाह दी। पर सेना की बजाय
- 18:14बृहद्रथ ने मौर्य मंत्री कंडिन्य को
- 18:16याज्ञसेन को समझाने के लिए विदर्भ भेजा।
- 18:22सम्राट को कैसे समझाऊं कि विदन में
- 18:24कंटिन्य ने ही याज्ञसेन को स्थापित किया
- 18:26है। साला जीजा दोनों मिले हुए हैं। फिर वह
- 18:30हुआ जिसके पितामह ने भी कल्पना नहीं की
- 18:32थी। उस दिन पाटलिपुत्र में सेना का संचालन
- 18:36था। मगध के वीर सैनिक सम्राट बृहद्रथ का
- 18:40अभिंदन करने वाले थे।
- 18:43सेना धूप में खड़ी थी।
- 18:46प्रितामह बार-बार संदेश भेज रहे थे। मगर
- 18:49सम्राट बृहद्रथ नहीं आ रहे थे। जिसकी सेना
- 18:52प्रतीक्षा कर रही थी। उसका सम्राट यवन
- 18:56नृत्यियों का नृत्य देख रहा था।
- 18:59[संगीत]
- 19:40[प्रशंसा]
- 19:43[संगीत]
- 19:46किसी तरह पितामह अग्निमित्र सम्राट
- 19:49बृहद्रथ को सैनिक अभिबंधन के लिए ले आए।
- 19:56[संगीत]
- 19:58सेनापति इन सैनिकों के लिए तुम मुझसे अधिक
- 20:01वेतन और हथियार मांग रहे थे। इनके लिए
- 20:05इससे तो बेहतर होता यह धम्म के सैनिक होते
- 20:08और इनके हाथ में भिक्षा पात्र होता और
- 20:10युद्ध की पुकार की जगह ये धम्म का घोष कर
- 20:12रहे होते।
- 20:22[संगीत]
- 20:29[संगीत]
- 20:44एक क्षण के लिए किसी को कुछ समझ नहीं आया
- 20:46कि क्या हुआ।
- 20:49अब ताज पितामह ने सम्राट बृहद की हत्या कर
- 20:52दी। अब ताज
- 20:58सेनानी पुष्यमित्र की
- 21:00जय सेनानी पुष्यमित्र की
- 21:02जय सेनानी पुष्यमित्र की
- 21:04जय सेनानी पुष्यमित्र की
- 21:06जय
- 21:07पितामह अग्निमित्र को समझ नहीं आ रहा था
- 21:09कि वे क्या करें
- 21:11अपने पिता की हत्या या आत्महत्या
- 21:15मैं किसका धर्म निभाऊं पितामह पुत्र का या
- 21:19सेवक का अपने स्वामी की हत्यारे से युद्ध
- 21:21कर वीरगति पाऊं या आत्महत्या करूं
- 21:23स्वामी किस स्वामी के लिए अब आप प्राण
- 21:26देंगे। जाइए अपने सेनापति का साथ दीजिए और
- 21:30यदि अपने पिता से लड़ना है तो अपने
- 21:32पुत्रों से भी लड़ने को तैयार रहिए। वसु
- 21:34छोटा है। इसे मारने में आसानी होगी।
- 21:38तात मुझे आज्ञा दीजिए। मैं अपने सेनापति
- 21:41की सहायता के लिए जा रहा हूं।
- 21:46सेनापति ने तुरंत मंत्री परिषद की बैठक
- 21:48बुलाई।
- 21:49राष्ट्र के लिए प्राण देने वाले सैनिकों
- 21:52का अपमान करने वाले राजा की मैंने हत्या
- 21:54की है। मुझे उसका दंड दिया जाए और मंत्री
- 21:57परिषद जिसे योग्य समझे
- 22:01उसे मगध का सम्राट नियुक्त करें।
- 22:09सेनापति
- 22:10इस राष्ट्र ने वचन दुर्बल प्रतिज्ञा
- 22:13दुर्बल शासकों का शासन देख लिया।
- 22:17इस राष्ट्र को ऐसे शासक की जरूरत है
- 22:21जो राज धर्म का निर्वाह कर सके।
- 22:29मंत्री परिषद और बलाध्यक्षों ने मिलकर
- 22:31सेनापति को शासन का दायित्व स्वीकार करने
- 22:33को कहा और पाटलिपुत्र ने सेनापति पुष्यम
- 22:37में त्रिशुंग का राज्याभिषेक किया।
- 22:42माता भूमि
- 22:45पुत्रोहम पृथ्वी
- 22:47[संगीत]
- 22:49यह भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र
- 22:54हूं।
- 22:56नमो मात्रे पृथ्वीय
- 22:59मैं
- 23:02माता पृथ्वी को नमस्कार करता हूं।
- 23:06नमः सभा
- 23:09सभापति भसव नमः
- 23:15सभी सभाओं
- 23:17और सभापतियों को नमस्कार
- 23:24सभी छोटे बड़ों को मेरा नमस्कार।
- 23:30नमस्तक्षभ्यो
- 23:32रतकारभ्य
- 23:33वो नमः नमः
- 23:36[संगीत]
- 23:39कुलालेभ्य
- 23:42कर्मारेभ
- 23:43वो नमः
- 23:46शिल्पकारों
- 23:48रथकारों कुम्हारों लोहारों सबको मेरा
- 23:52नमस्कार
- 23:54[संगीत]
- 23:56भूत भविष्य भविष्य और वर्तमान के श्रेष्ठ
- 24:01जनों को मेरा नमस्कार।
- 24:06महाराज मनु का यह कहना है कि वह राजा जो
- 24:10अपने मंत्रियों और लोक सेवकों के साथ अपनी
- 24:13प्रजा को पीड़ित और चोर लुटेरों द्वारा
- 24:17सताए जाते देखता है। ऐसा राजा जीवित नहीं
- 24:22मरा हुआ है।
- 24:25यदि मैं
- 24:27शास्त्र के अनुसार
- 24:30अपने कर्तव्यों का पालन ना करूं तो मैं
- 24:34प्रजा का अपराधी होऊंगा, पाप का भागी
- 24:37होऊंगा।
- 24:40सम्राट पुष्यमित्र ने शासन संभालते ही
- 24:43अग्निमित्र को विदिशा का गुप्ता नियुक्त
- 24:45किया।
- 24:46गुप्ता यानी राज्यपाल ना।
- 24:50जष्ठ वसु और वसुमित्र मेरे पास रहेंगे।
- 24:53किसी एक को तो उनकी मां के साथ रहने
- 24:55दीजिए।
- 24:56ये दोनों यहां रहकर मनुस्मृति और धर्म
- 24:59शास्त्रों का अध्ययन करेंगे।
- 25:02उन्हें वैदिक धर्म धारण करने के योग्य
- 25:04बनना है। सातवाहन ब्राह्मण धर्म का
- 25:08पुनर्जागरण कर रहे हैं। हमें वैदिक धर्म
- 25:11का पुनरुत्थान करना है।
- 25:12श्रुति और स्मृतियों का अध्ययन तो दोनों
- 25:14विदिशा में रहकर भी कर सकते हैं।
- 25:21पुत्र मोह से बचो अग्निमित्र
- 25:24यह भी दुर्बलता है।
- 25:28वैदिक धर्म के पुनरुत्थान के लिए
- 25:31मैं अश्वमेध यज्ञ को पुनर्जीवित करना
- 25:34चाहता हूं।
- 25:37इसीलिए मैंने गुनार से
- 25:40आचार्य पतंजलि को आमंत्रित किया है। हम
- 25:44शुंगों का यह भाग्य होगा जो आचार्य पतंजलि
- 25:47हम शुंगों और इस अश्वमेध यज्ञ का ऋत्विक
- 25:52बनना स्वीकार करें। मैं चाहता हूं कि
- 25:54तुम्हारे दोनों पुत्र
- 25:56आचार्य पतंजलि की सेवा में रहे। फिर भी यह
- 26:00तुम्हारे साथ विदिशा जाना चाहते हैं तो
- 26:03मैं इन्हें रोकूंगा नहीं।
- 26:04मैं पितामह के पास ही रहूंगा तात।
- 26:10युवराज अग्निमित्र ने सम्राट के आदेश से
- 26:13मौर्य मंत्री को कारागार में डाल दिया और
- 26:15स्वयं पत्नियों के साथ विदिशा चले आए ताकि
- 26:18याज्ञसेन को दंड दे सके। शुंग शासन में
- 26:21मनुस्मृति और गृहसूत्रों का पुनरागमन हुआ।
- 26:25सम्राट कुमार से कहिए ना
- 26:29करने दो इसमें इन्हें मनमानी करने दो।
- 26:36[संगीत]
- 26:40मनुस्मृति का कौन सा अध्याय समाप्त किया?
- 26:43सातवां अध्याय राजधर्म पितामह
- 26:45क्या पढ़ा? कुछ बताओ।
- 26:48ब्रह्मा ने अराजकता से भयभीत प्राणियों की
- 26:50रक्षा के लिए राजा का निर्माण किया। और
- 26:53ब्रह्मा ने राजा को इंद्र, वायु, यम,
- 26:56सूर्य, अग्नि, वरुण, चंद्रमा और वित्तेश
- 27:00के गुणों से युक्त किया। पर इसका अर्थ हम
- 27:02दोनों को समझ में नहीं आया।
- 27:03तो आपने अपने आचार्य से क्यों नहीं पूछा?
- 27:05क्योंकि हमें इसका उत्तर एक सम्राट पितामह
- 27:08से सुनना था।
- 27:10तो सुनो।
- 27:13बैठो।
- 27:19तो अपने पितामह से मनु की व्याख्या सुनो।
- 27:22राजा में इंद्र का पराक्रम होना चाहिए और
- 27:26वायु की तरह व्याप्त
- 27:27यानी
- 27:28उसके दंड की धाक सर्वत्र होनी चाहिए। जैसे
- 27:32वायु सर्वत्र व्याप्त होती है। वो यम की
- 27:36तरह न्याय करने वाला होना चाहिए। सूर्य की
- 27:39तरह सबके जीवन को आलोकित करने वाला।
- 27:43आशा, उत्साह, उल्लास से भर देने वाला
- 27:46अग्नि की तरह ऊर्जावान स्वयं भी और प्रजा
- 27:50को भी ऊर्जा दे और वरुण की तरह मनुष्य और
- 27:56धरती की प्यास बुझाए। यानी
- 27:58कुएं, तालाब, जलाशय बनवाए।
- 28:01खेतों तक पानी ले जाए ताकि धरती पर फसल
- 28:03लहलाए।
- 28:04और
- 28:06चंद्रमा की तरह शीतल रहे और सबको शीतलता
- 28:09दे। दग्ध मन को उद्वग्न जन को शांत करें
- 28:14और विदेश
- 28:17यानी
- 28:19धन की देवता की तरह
- 28:21सबको संपन्न करें। और क्या पढ़ा? सभी
- 28:25प्राणियों की रक्षा के लिए ब्रह्मा ने
- 28:28राजा के लिए दंड का निर्माण किया। उस दंड
- 28:31के भय से ही सभी अपने-अपने धर्म का पालन
- 28:34करते हैं। देश, काल, विद्या और अपराध के
- 28:37अनुसार अपराधी को योग्य दंड देना चाहिए।
- 28:39राज दंड की शासक है। दंड ही प्रजा पर शासन
- 28:42करता है। दंड ही सभी की रक्षा करता है।
- 28:45दंड ही सोए हुए को जगाता है। विद्वान दंड
- 28:47को ही गुणों का मूर्त रूप कहते हैं। विचार
- 28:50करके दिया गया उचित दंड प्रजा को प्रसन्न
- 28:52करता है। अनुचित दंड प्रजा का नाश करता
- 28:56है।
- 28:56जब शासक अपराधियों को निरंतर दंड नहीं
- 28:59देता तब ताकतवर कमजोर को उसी तरह कष्ट
- 29:02देते हैं जैसे मछलियों को लोहे की सलाखों
- 29:04पर सेका जाता है। क्या मनुष्य हमेशा
- 29:07नैतिकता का पालन करता है? वसुमित्र?
- 29:10नहीं पितामह विरले ही नैतिकता के लिए
- 29:12नैतिकता का पालन करते हैं। दंड के भय से
- 29:15ही सभी नीति से अपनी आय और संपत्ति का
- 29:18उपभोग करते हैं। देवता, दानव, गंधर्व,
- 29:21राक्षस आदि देवी प्रतिकार के भय से
- 29:24अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।
- 29:28यदि दंड ना हो या विधि संगत ना हो तो समाज
- 29:32अराजक हो जाएगा। सभी संबंध नष्ट हो
- 29:35जाएंगे। प्रजा के सभी वर्गों में भय फैल
- 29:38जाएगा। हम
- 29:40उस राजा की प्रजा उत्तेजित नहीं होती।
- 29:43जहां राजा दंड का आधार लेकर स्थितियों को
- 29:46सत्य के प्रकाश में देखता है।
- 29:48तो फिर प्रजा राजा किसे कहती है?
- 29:50सत्यवादी,
- 29:52बुद्धिमान, दंड देने वाले, विवेचना और
- 29:55समीक्षा करने में समर्थ। धर्म, अर्थ, काम
- 30:00को समझने वाले को प्रजा राजा कहती है।
- 30:03हम जाओ अब सो जाओ।
- 30:11पितामह अग्निमित्र ने विदिशा पहुंचते ही
- 30:15धारिणी देवी के भाई वीरसेन को नर्मदा के
- 30:18तट पर सीमा रक्षक नियुक्त किया और
- 30:21याज्ञसेन को समर्पण के लिए संदेश भेजा।
- 30:24याज्ञसेन का एक चचेरा भाई था माधवसेन।
- 30:27उसकी बहन थी मालविका। माधवसेन पुराने
- 30:30राजकुल से था। उसने पितामह अग्निमित्र को
- 30:34संधि करने के लिए पत्र भेजा।
- 30:36विदर्भ पर मगध के अधिकार के पहले मेरे
- 30:39पुरखे राज्य करते थे। इसलिए विदर्भ पर
- 30:42मेरा अधिकार पहला है। पर मौर्य मंत्री ने
- 30:45अपने जीजा को विदर्भ में स्थापित कर मेरे
- 30:47साथ अन्याय किया है। आप मुझे मेरा अधिकार
- 30:50दिलाएं और याज्ञसेन को सिंहासन से हटाएं।
- 30:54मगध और विदर्भ की मैत्री दृढ़ करने के लिए
- 30:57मैं आपके साथ अपने परिवार का विवाह संबंध
- 31:00स्थापित करना चाहता हूं। इसलिए आपसे मिलने
- 31:03के लिए विदिशा आ रहा हूं। मुझसे और इरावती
- 31:06से मन नहीं भरा।
- 31:17फिर तो विदिशा में गृह युद्ध छिड़ गया
- 31:19होगा। स्त्रियां पुरुषों को हमेशा क्षमा
- 31:21कर देती हैं। पर विदर्भ और विदिशा के बीच
- 31:24दांव पेच शुरू हो गए। यहां पाटलिपुत्र में
- 31:27सम्राट पुष्यमित्र ने वेदों, धर्मशास्त्र,
- 31:31काव्य, व्याकरण, सूत्र साहित्य और
- 31:33अर्थशास्त्र के अध्ययन को प्रोत्साहन
- 31:35दिया। दूर-दूर से आचार्य पाटलिपुत्र आने
- 31:38लगे। वैदिक धर्म जैसे सदियों के बाद जागृत
- 31:42हो उठा था। राज सेवा के लिए स्नातक,
- 31:45मनुस्मृति और राजनीति शास्त्रों का अध्ययन
- 31:48करने लगे।
- 31:49गोष्ठियों और उत्सवों में अब शास्त्र
- 31:52चर्चा हो रही थी।
- 31:57नए अमात्यों, सचिवों, दंड नेतृत्व, नायक,
- 32:02राजदूत और कार्यकारी अधिकारियों की
- 32:05नियुक्ति के लिए सम्राट पुष्यमित्र ने
- 32:07कोमोदी महोत्सव के दिन ज्ञान सत्र रखा है।
- 32:10स्नातक अपनी योग्यता दिखाने के लिए
- 32:13आमंत्रित हैं।
- 32:19राष्ट्र संचालन के लिए राजा को क्या करना
- 32:21चाहिए?
- 32:22राष्ट्र संचालन के लिए राजा को 100 गांव,
- 32:24200 गांव, 300 गांव और 500 गांव का गुल्म
- 32:27बनाना चाहिए और प्रत्येक गुल में एक
- 32:29अधिपति को नियुक्त करना चाहिए। राजा को
- 32:32अधिपतियों की नियुक्ति कैसे करनी चाहिए?
- 32:34राजा को हर गांव में ग्रामपति, 10 गांव
- 32:37में 10 ग्रामपति, 20 गांव पर विषती और 100
- 32:40गांव पर शतेश और हजार गांव में सहस्त्रपति
- 32:42नामक अधिपति नियुक्त करने चाहिए। इन
- 32:44अधिपतियों को कैसे काम करना चाहिए?
- 32:46ग्रामपति को अपने गांव के अपराध संबंधी
- 32:48विवादों को स्वयं सुलझाना चाहिए। जिसे वह
- 32:50सुलझाने में असमर्थ हो उसे वह 10 ग्रामपति
- 32:53को सौंपे। यदि 10 ग्रामपति को शंका हो या
- 32:55वह असमर्थ हो तो उसे विशी को सौंपे। यदि
- 32:58विंशी असमर्थ हो तो उसे सतेश को सौंपे।
- 33:01यदि सतेश असमर्थ हो तो उसे सहस्त्रपति को
- 33:04सौंपे। अंतिम निर्णय महिपति का होता है।
- 33:07राज प्रदेह या राजभाग का उपयोग किस प्रकार
- 33:09करना चाहिए? राजा के प्रतिदिन के राजभाग
- 33:11का अन्न पे और ईंधन ग्रामपति को प्रतिदिन
- 33:15मिलना चाहिए। दश ग्रामपति को एक कुल माप
- 33:17की भूमि का उत्पन्न वंश ग्रामपति को पांच
- 33:20कुल माप की भूमि का उत्पन्न शतेश को एक
- 33:22ग्राम का उत्पन्न और सहस्त्रपति को एक
- 33:25शाखा नगर का उत्पन्न मिलना चाहिए। कुल माप
- 33:28यानी क्या? एक किसान एक दिन में छह बैलों
- 33:31द्वारा खींचे जाने वाले हल से 6 घंटे में
- 33:34जितनी भूमि पर हल चला सके उस भूमि का नाप
- 33:36एक कुल है।
- 33:37साधु साधु यो
- 33:42राज सेवक अक्सर घूसखोर और धूर्त होते हैं।
- 33:45राजा को इनसे प्रजा की रक्षा करनी चाहिए।
- 33:50राजा को ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों को
- 33:52बहिष्कृत कर देना चाहिए राज्य से जो घूस
- 33:54लेते हैं और घूस देने वालों की वस्तु भी
- 33:56जप्त कर लेनी चाहिए। राज्य सेवा में
- 33:59नियुक्त दास, दासियों और हरकारों को
- 34:01प्रतिदिन वेतन देना चाहिए। वेतन कितना
- 34:04होना चाहिए? निम्न श्रेणी के सेवक
- 34:06सेविकाओं को एक पंड प्रतिदिन। उच्च श्रेणी
- 34:09के सेवक सेविकाओं को छह पंड प्रतिदिन।
- 34:11निम्न श्रेणी के सेवक को एक द्रोण धान
- 34:13प्रतिमाह। उच्च श्रेणी के सेवक को छह
- 34:16द्रोण धान प्रतिमाह। निम्न श्रेणी के सेवक
- 34:18सेविकाओं को प्रति छह माह में एक वस्त्र।
- 34:20उच्च श्रेणी के सेवक सेविकाओं को छह
- 34:22वस्त्र प्रति छह माह।
- 34:24राजा कर कैसे तय करें? क्रय विक्रय का
- 34:27मूल्य, यात्रा का व्यय, दैनिक जीवन का
- 34:29व्यय, आकस्मिक व्यय, वस्तु की सुरक्षा के
- 34:32लिए योगक्षेम या बीमा का व्यय, वन, नदियों
- 34:36और पहाड़ी मार्गों पर सामग्री की सुरक्षा
- 34:38के लिए किया गया व्यय आदि का विचार कर
- 34:41राजा को शुल्क तय करना चाहिए।
- 34:42साधु साधु योग योग
- 34:45कर या शुल्क किस पर लगाना चाहिए?
- 34:48राजा को सूक्ष्म विवेचना कर व्यापारियों
- 34:50और किसानों के लाभ पर कर लगाना चाहिए। यही
- 34:53नियम शासन के अधीन भूमि पर खेती करने
- 34:55वालों के लिए भी है।
- 34:56साधु साधु योग योग
- 35:11यहां शुल्काध्यक्ष कौन है?
- 35:13मैं शोल्किक हूं।
- 35:15पाटलिपुत्र में अब शुल्काध्यक्ष को
- 35:16शोल्किक कहने लगे।
- 35:18आप जो चाहे कहें हमें शुल्क से मतलब है।
- 35:22मैं पहली बार मथुरा से पाटलिपुत्र आ रहा
- 35:24हूं। पहले मेरे पिताजी आते थे।
- 35:26मथुरा के श्रेष्ठ ही हैं।
- 35:27जी।
- 35:28स्वागत है। कोई कष्ट?
- 35:30कर के बारे में पूछना था। किसी निम्न सहाय
- 35:32से मिला देंगे?
- 35:33मैं ही बता देता हूं।
- 35:36स्वर्ण और पशुओं के मूल्य का 50वां हिस्सा
- 35:38खाद्यान्न के मूल्य पर छठा आठवां या 12वां
- 35:43हिस्सा यह स्थितियों पर निर्भर करता है।
- 35:46पर प्रजा से संवत्सर में एक ही बार इसी
- 35:49तरह काष्ट मधु घृत सुगंध रस औषधि धान्य
- 35:55पुष्प मूल फल शाक तण बांस चर्म मिट्टी और
- 36:02पत्थर के बर्तनों से लाभ पर छठा हिस्सा पर
- 36:06श्रोत्रिय ब्राह्मण से कोई कर नहीं
- 36:10छोटे-छोटे व्यवसाय से जीवन यापन करने वाले
- 36:13गरीब प्रजा से महिपति को नाम मात्र का कर
- 36:15लेना चाहिए न्याय के लिए महिपति को विधि
- 36:17विवेचना में निपुण मंत्री और ब्राह्मणों
- 36:19के साथ सभा में प्रवेश करना चाहिए और
- 36:21प्रतिदिन शास्त्रों के अनुसार न्याय करना
- 36:23चाहिए।
- 36:23यदि महिपति न्यायिक निर्णय के लिए स्वयं
- 36:26उपस्थित ना हो पाए तो उन्हें अपने स्थान
- 36:28पर एक विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त करना
- 36:30चाहिए।
- 36:31उस नियुक्त ब्राह्मण को न्यायालय के तीन
- 36:34सभासदों के साथ न्याय सभा में प्रवेश करना
- 36:36चाहिए और वहां बैठकर या खड़े होकर न्याय
- 36:39संचालन की प्रक्रिया को देखना चाहिए।
- 36:42जिस सभा में तीन वैदज्ञ ब्राह्मण और राज
- 36:45प्रतिनिधि या न्यायाधीश उपस्थित हो उसे
- 36:48ब्रह्म सभा कहते हैं।
- 36:51जिस न्यायालय में सत्य असत्य से पराजित
- 36:53होता है और जहां अन्याय को न्याय की सुई
- 36:56से छेद नहीं दिया जाता वो न्यायालय अधर्म
- 36:58द्वारा मारा गया समझना चाहिए।
- 37:01पहले तो न्यायालय में जाना ही नहीं चाहिए।
- 37:03पर वहां जाने के बाद केवल सत्य ही बोलना
- 37:06चाहिए। न्यायालय में मौन रहकर या झूठ
- 37:08बोलकर व्यक्ति पाप का दोषी होता है।
- 37:11अन्याय करने के पाप का एक चौथाई भाग झूठा
- 37:14अभियोग लगाने वाले के हिस्से में जाता है।
- 37:16एक चौथाई भाग झूठे साक्षी के हिस्से में
- 37:18जाता है। एक चौथाई भाग न्यायालय के
- 37:20सभासदों के हिस्से में और एक चौथाई भाग
- 37:23राजा के हिस्से में जाता है।
- 37:25राजा पाप मुक्त हो जाता है। न्यायालय के
- 37:27सभी सभासद पाप मुक्त हो जाते हैं। जब
- 37:29अपराधी को उचित दंड दिया जाता है। साधु
- 37:32साधु यो
- 37:35याज्ञसेन का चचेरा भाई माधव सेन युवराज
- 37:38अग्निमित्र से मिलने विदिशा जा रहा था कि
- 37:40विदर्भ के सीमा रक्षक ने उसे घेर लिया।
- 37:45कोई माधवसेन को मारेगा नहीं याज्ञ सेन उसे
- 37:48जीवित रखना चाहते हैं।
- 37:51[संगीत]
- 37:53माधवसेन को कारागार में डाल दिया गया।
- 37:58क्या लिखा है याज्ञ सेन ने?
- 38:01मुझसे सौदेबाजी कर रहा है। लिखा है कि मैं
- 38:04उसके साले मौर्य मंत्री को कारागार से
- 38:06छोड़ दूं तो माधवसेन को छोड़ देगा।
- 38:11अब
- 38:18युद्ध
- 38:21सेनानी पुष्यमित्र की
- 38:22जय
- 38:23सेनानी पुष्यमित्र की
- 38:24जय
- 38:25सेनानी पुष्यमित्र की
- 38:27जय
- 38:27सेनानी पुष्यमित्र की
- 38:29जय
- 38:29सेनानी पुष्यमित्र की
- 38:31जय
- 38:31शुंग सेना ने वीरसेन के नेतृत्व में
- 38:34विदर्भ पर आक्रमण किया और यागसेन को
- 38:37पराजित किया यागसेन ने शुंगों की अधीनता
- 38:40स्वीकार कर ली। अग्निमित्र ने विदर्भ के
- 38:43शासन को दो हिस्सों में विभाजित किया। एक
- 38:46हिस्सा यागसेन और दूसरा हिस्सा माधवसेन को
- 38:49मिला। अग्निमित्र ने माधवसेन की बहन
- 38:52मालविका से विवाह किया।
- 38:54तीसरा विवाह।
- 38:58फिर
- 39:00महर्षि पतंजलि पाटलिपुत्र आए।
- 39:04उन्होंने शुंगों के अश्वमेध यज्ञ में
- 39:06पुरोहित बनना स्वीकार किया।
- 39:09शुंगों ने अश्वमेध यज्ञ की महान परंपरा को
- 39:12पुनर्जीवित किया। सम्राट पुष्यमित्र ने
- 39:16कुमार वसुमित्र को अश्व का रक्षक बनाया और
- 39:20100 वीर राजपुत्रों के साथ शुंग सेना लेकर
- 39:23कुमार वसुमित्र दिग्विजय के लिए निकल
- 39:26पड़े। प्रजा हर्ष से झूम उठी। भारत को फिर
- 39:30से एक करने का अवसर आया था। पर इसी उत्साह
- 39:33और उन्माद में
- 39:36वह भी हुआ जो
- 39:38नहीं होना चाहिए था।
- 39:42कुछ बौद्ध द्वेषी प्रजा ने बौद्ध विहारों
- 39:45को तोड़ा।
- 39:47आग लगाई। बौद्ध भिक्षुओं को अपमानित किया।
- 39:54कुछ अपराधियों ने सांची के स्तूप को
- 39:56तोड़ने का प्रयास किया।
- 40:00अग्निमित्र विचलित हो उठे।
- 40:11क्या ये सच है युवराज?
- 40:15कुछ मूर्खों ने महा स्तूप को क्षति
- 40:17पहुंचाई है।
- 40:19पर स्तूप और भगवान तथागत की अस्थियां
- 40:21सुरक्षित है।
- 40:23ऐसा नहीं होना चाहिए था धारणी। कैसे कोई
- 40:26इन धर्म के उन्मक्त लोगों को समझाए कि
- 40:28पूरा भारत बुद्ध की धर्म का आया है। भारत
- 40:31में हर संप्रदाय को अपने विश्वास के साथ
- 40:34जीने का अधिकार है।
- 40:36चाहे वह वैदिक हो या अवैदिक चाहे वह वेदों
- 40:38में आस्था रखता हो या वेद विरोधी हो
- 40:41चारवाक हो
- 40:45मैं नए सार्वजनिक कार्यों के अधिकारी
- 40:46नवकर्मिक अब पुराने सार्वजनिक कार्यों के
- 40:49अधिकारी कार्मांतिक को साथ लेकर सांची जा
- 40:51रहा हूं।
- 40:56युवराज अग्निमित्र ने सांची के महा स्तूप
- 40:59को फिर से बनवा दिया।
- 41:01ईंटों के बने पुराने स्तूप को आकार में
- 41:03दुगना करवाकर उसे पत्थर की पटियाओं से
- 41:06मंडवा दिया।
- 41:09बौद्धों के विरुद्ध वैदिकों का विरोध
- 41:11सम्राट पुष्यमित्र के लिए सबसे बड़ी
- 41:13चुनौती थी।
- 41:15बौद्ध समुदाय में भी सम्राट के प्रति दबा
- 41:20हुआ आक्रोश था।
- 41:21सम्राट क्या यह प्रजा के आक्रोश की
- 41:24अभिव्यक्ति है? जिसे हम बौद्धों के
- 41:27विरुद्ध आक्रोश समझ रहे हैं। ब्राह्मण
- 41:28शासन का विरोध भी तो हो सकता है।
- 41:31यह ब्राह्मणों का विरोध हो या बौद्धों के
- 41:35प्रति आक्रोश किसी को भी अधिकार नहीं है
- 41:39कि वह किसी के उपासना स्थलों को क्षति
- 41:41पहुंचाए।
- 41:43सम्राट अशोक ने 84,000 स्तूप इसलिए बनवाए
- 41:46थे कि प्रजा उनकी रूप काया और धर्म काया
- 41:49की उपासना कर सके।
- 41:52यह अश्वमेघ प्रजा को अभय देने के लिए है।
- 41:56भयभीत करने के लिए नहीं। इसलिए वसुमित्र
- 41:59और प्रत्येक ग्राम में यह सूचना पहुंचा दी
- 42:01जाए कि शुंग शासन सांप्रदायिक असहिष्णुणता
- 42:06को कदापि स्वीकार नहीं करेगा और जो भी
- 42:09असंतोष फैलाएगा शासन उसे दंड देगा।
- 42:13सम्राट इस समय बौद्ध समुदाय के घाव पर
- 42:16मरहम लगाने की आवश्यकता है। इसलिए मेरा
- 42:19मानना है कि मौर्यों की तरह ही शुंग भी
- 42:22संघ और बिहार को प्रशय दे।
- 42:25शुंग शासन संप्रदाय के आधार पर ना भेद
- 42:29करेगा
- 42:31ना ही किसी संप्रदाय को प्रश्रय देगा।
- 42:36संप्रदाय यह व्यक्तिगत आस्था का चुनाव है।
- 42:40राष्ट्रीय नहीं। यदि इसके लिए मुझे राज्य
- 42:43खोना भी पड़ा तो मैं तैयार हूं।
- 42:46क्योंकि मेरे लिए संप्रदाय से पहले
- 42:49राष्ट्र है। यदि राष्ट्र सुरक्षित रहा तो
- 42:52आस्थाएं सुरक्षित रहेंगी। वरना आक्रांता
- 42:56ब्राह्मणों और बौद्धों में भेद नहीं
- 42:57करेंगे। यह अश्वमेध वैदिक धर्म की विजय का
- 43:01घोष नहीं बल्कि प्रजा को उसके सेनापति
- 43:04पुष्यमित्र का वचन है कि उसका सेनापति
- 43:07राष्ट्र के लिए जागृत है और अपनी प्रजा की
- 43:11रक्षा करने में समर्थ है। प्रश्न यह है कि
- 43:14क्या उसकी प्रजा एकात्म भाव से राष्ट्र के
- 43:18लिए समर्पित है?
- 43:21क्या खंड खंड में बटा हुआ भारत एक है? यदि
- 43:23हम एक ना हो पाए तो क्या हमारे वेद सफल
- 43:26हैं?
- 43:28[संगीत]
- 43:31आज मैं भारत को
- 43:33फिर उस घोषणा का स्मरण करा रहा हूं जो
- 43:37मौर्य सम्राट
- 43:39देना प्रिय अशोक ने पाषाण शिलाओं में
- 43:43खुदवाई थी ताकि प्रजा उसे पढ़ सके
- 43:48ताकि आने वाली सहस्त्रों पीढ़ियां उसे पढ़
- 43:50सके। क्या कहा था सम्राट अशोक ने?
- 43:55मुझे याद है।
- 43:58प्रियदर्शी ने कहा था कि देवताओं का प्रिय
- 44:01प्रियदर्शी
- 44:03विविध दान और पूजा से सभी संप्रदायों के
- 44:06प्रवर्जितों और गृहस्थों की पूजा करता है।
- 44:10किंतु प्रियदर्शी
- 44:12दान वो पूजा को इतना नहीं मानता जितना कि
- 44:15हर संप्रदायों में सार वृद्धि को मानता
- 44:18है। सार वृद्धि अनेक प्रकार की होती है।
- 44:22किंतु उसका मूल है वाक संयम।
- 44:26मतलब लोग अपने संप्रदाय का आदर और दूसरे
- 44:31के संप्रदाय की अकारण निंदा ना करें। सदा
- 44:33दूसरे संप्रदायों की प्रशंसा करनी चाहिए।
- 44:37जो मनुष्य ऐसा करता है,
- 44:41वह अपने संप्रदाय की उन्नति करता है
- 44:44और दूसरे संप्रदायों का उपकार करता है। जो
- 44:47इसके विपरीत करता है, वह अपने संप्रदाय की
- 44:51क्षति करता है और दूसरे संप्रदायों का
- 44:55अपकार करता है। क्योंकि जो कोई अपने
- 44:58संप्रदाय की भक्ति में आकर इस विचार से कि
- 45:02मैं कैसे अपने संप्रदाय का गौरव बढ़ाऊं
- 45:06अपने संप्रदाय की प्रशंसा करें और दूसरे
- 45:09के संप्रदाय की निंदा करता है। वह वास्तव
- 45:12में
- 45:14अपने संप्रदाय को गहरी क्षति पहुंचाता है।
- 45:17इसलिए संयम ही अच्छा है।
- 45:22इस अर्थ में कि लोग दूसरे के धर्म को
- 45:25ध्यान से सुने
- 45:27और सुनने के लिए तैयार रह। आचार्य
- 45:30विष्णुगुप्त
- 45:32राष्ट्र धर्म के वाहक थे।
- 45:36वैदिक दर्शन के अनुयाई थे।
- 45:40चंद्रगुप्त
- 45:42राष्ट्र धर्म के पालक थे। उन्होंने जैन
- 45:46दर्शन स्वीकार किया था। राष्ट्रधर्मी
- 45:48बिंदुसार
- 45:50जैन मत के अनुयाई थे।
- 45:54राष्ट्र धर्म को धारण करने वाले
- 45:55प्रियदर्शी अशोक बौद्ध दर्शन के अनुयाय
- 45:58बने। मैं
- 46:01वैदिक धर्म का अनुयाय हूं। पर मेरे लिए
- 46:06वेदों से पहले राष्ट्र है। यही मैंने
- 46:09शास्त्रों से सीखा है। इसलिए किसी भी
- 46:13संप्रदाय को क्षति पहुंचती है
- 46:16तो वो राष्ट्र के प्रति आघात है। और यह
- 46:22मैं बिल्कुल नहीं सहऊंगा।
- 46:30आंसुओं से अपने पितामह को श्रद्धांजलि दे
- 46:32रही है।
- 46:38बेटे जलसे देते हैं और बेटियां
- 46:42आंसुओं से
- 46:49फिर क्या हुआ?
- 46:51देवी
- 46:52देवी
- 46:53क्या हुआ? पिता का पत्र आया है। तुम्हारा
- 46:56बेटा वसुमित्र दिग्विजय कर पाटलिपुत्र लौट
- 46:59आया है। पिता ने हमें यज्ञ के लिए
- 47:01पाटलिपुत्र बुलाया है।
- 47:05ओम अग्नय स्वाहा
- 47:08ओम वरुणाय स्वाहा
- 47:11ओम यमााय
- 47:12स्वाहा आदित्याय स्वाहा
- 47:17शुंगों ने दो बार अश्वमेध यज्ञ किया।
- 47:20शुंग काल में ही पतंजलि ने महा भाष्य
- 47:23लिखा। और भरुत स्तूप में तोरण द्वार और
- 47:27वेदिका को समर्पित किया।
- 47:30[संगीत]
- 47:59धा
- 48:05धन ता धा धन धा ग धा ग धा ग सा सा धा नी
- 48:10पा गा मा रे सा नी सा ध सा मा धा नी सा धा
- 48:15नी पा रे सा नी सा धन धन सा धा नी रा
- 48:21[संगीत]
- 48:36[संगीत]
- 48:38सा नी प सा
- 48:45[संगीत]
- 48:45[प्रशंसा]
- 48:48[संगीत]
- 48:48[प्रशंसा]
- 48:50[संगीत]
- 49:12दा
- 49:14त
- 49:16[संगीत]
- 49:31सा
- 49:34[संगीत]
- 49:50[संगीत]
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