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Surajya Sanhita: Shung Kaal | Episode - 10 — Transcript

by Sansad TV · 5,065 words · 885 segments · language en · Watch on YouTube

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  1. 0:08[संगीत]
  2. 0:16[संगीत]
  3. 0:29आ
  4. 0:33[संगीत]
  5. 0:34आ
  6. 0:46[संगीत]
  7. 0:58सा रे रे रे गा रे सा रे रे रे रे गा रे
  8. 1:02सा
  9. 1:05[संगीत]
  10. 1:14मा
  11. 1:17सा
  12. 1:18मा
  13. 1:20[संगीत]
  14. 1:51आ
  15. 1:53[प्रशंसा]
  16. 1:53[संगीत]
  17. 1:55[प्रशंसा]
  18. 2:06[संगीत]
  19. 2:18अपने पूर्वजों का स्मरण करके एक-एक कर
  20. 2:21उन्हें जलांजलि दीजिए।
  21. 2:28[संगीत]
  22. 2:33सम्राट पुष्यमित्र की
  23. 2:35जय।
  24. 2:35सम्राट पुष्यमित्र की
  25. 2:37जय।
  26. 2:38सम्राट पुष्यमित्र की
  27. 2:39जय।
  28. 2:50सम्राट पुष्यमित्र मेरी जलांजलि स्वीकार
  29. 2:53कीजिए।
  30. 2:59सम्राट अग्निमित्र की
  31. 3:01जय
  32. 3:01सम्राट अग्निमित्र की
  33. 3:03जय
  34. 3:04सम्राट अग्निमित्र की
  35. 3:05जय
  36. 3:06सम्राट अग्निमित्र की
  37. 3:07जय
  38. 3:17सम्राट अग्निमित्र मेरी जलांजलि स्वीकार
  39. 3:19कीजिए
  40. 3:24[संगीत]
  41. 3:25कुमार वसुमित्र की
  42. 3:27जय कुमार वसुमित्र की
  43. 3:29जय कुमार वसुमित्र की
  44. 3:31जय
  45. 3:39सम्राट वसुमित्र मेरी जलांजलि स्वीकार
  46. 3:41कीजिए।
  47. 3:44अपने पूर्वजों का श्रद्धा के साथ स्मरण
  48. 3:47करना ही श्राद्ध है। आज आप अपने परिजनों
  49. 3:51के साथ उनका स्मरण करें।
  50. 4:12क्या पढ़ रहे हैं शुंग सम्राट?
  51. 4:15हां पूर्णा।
  52. 4:25अर्थशास्त्र और मनुस्मृति एक साथ।
  53. 4:29मन में क्या चल रहा है?
  54. 4:31तथागत ठीक ही कहते हैं। जीवन
  55. 4:35क्षणभंगुर है। यह ज्ञान आज कैसे हुआ?
  56. 4:47मेरे पितामह सम्राट पुष्यमित्र शुंग ने
  57. 4:50मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या की। और
  58. 4:53शुंग साम्राज्य की नींव रखी। उन्होंने
  59. 4:56महान अश्वमेघ यज्ञ किया।
  60. 4:58तात वसुमित्र उस अश्वमेध यज्ञ के अश्व के
  61. 5:02रक्षक थे। उन्होंने यज्ञ के अश्व की रक्षा
  62. 5:05करते हुए यवनों से युद्ध किया। ऐसे
  63. 5:07महापराक्रमी
  64. 5:09और महान योद्धा वसुमित्र की नाटक देखते
  65. 5:13हुए हत्या होती है। जो रणभूमि में वीरों
  66. 5:16से नहीं मारा जा सका उसे रंगभूमि में
  67. 5:20विश्वस्तों ने आसानी से मार गिरा।
  68. 5:24यह है जीवन। एक राजा अपनी पत्नी से भी
  69. 5:29सावधान रहने को विवश है।
  70. 5:33देखो क्या कहते हैं भगवान कौटिल्य।
  71. 5:39मां की शैया के नीचे छिपकर कारुष के पुत्र
  72. 5:43ने अपने पिता की हत्या की थी। भद्रसेन की
  73. 5:46पत्नी से मिलकर वीरसेन ने अपने भाई की
  74. 5:49हत्या की थी।
  75. 5:52धान की खीलों में शहद की जगह विष मिलाकर
  76. 5:55काशीराज की पत्नी ने काशीराज की हत्या की
  77. 5:58थी।
  78. 6:01विष बुझे नपुर से राजा वैरंत्य को विष
  79. 6:04बुझी करधनी से राजा सोवीर को विष बुझी
  80. 6:09दर्पण से राजा जालूत की पत्नी और
  81. 6:14[संगीत]
  82. 6:15वेणी में शस्त्र छिपाकर
  83. 6:18विडुरथ की रानियों ने अपने पतियों की
  84. 6:21हत्या की थी।
  85. 6:25राजा को शैया, आभूषण और दर्पण से भी
  86. 6:29सावधान रहना चाहिए। यह है जीवन की
  87. 6:32क्षणभंगुरता जैसे पानी का बुलबुला।
  88. 6:38वेदों के अनुयाई
  89. 6:40आज बुद्ध के अनुयायियों की तरह बात करने
  90. 6:42लगे।
  91. 6:43पूर्ण सत्य एक ही है। वेद और बुद्ध दर्शन
  92. 6:47दोनों उसी तक पहुंचने के दो मार्ग हैं।
  93. 6:50क्या वेदांत के महान प्रवक्ता याज्ञवलके
  94. 6:53को बुद्ध धर्म के अनुयायी प्रचंड बौद्ध
  95. 6:55नहीं कहते? तुम तो बुद्ध के अनुयाई हो।
  96. 6:58वेदों से तुम जो चाहे निकालना चाहो निकाल
  97. 7:01दो तो जो बचता है क्या वह बौद्ध दर्शन
  98. 7:04नहीं है? मैं तो यही मानता हूं कि जो धर्म
  99. 7:08में स्थित है वह धार्मिक है और जो अधर्म
  100. 7:11में लिप्त है वह अधार्मिक है। मेरे लिए
  101. 7:16ब्राह्मण और बौद्ध में कोई अंतर नहीं है।
  102. 7:18एक बात बरसों से पूछना चाहती थी। क्षमा
  103. 7:21करें तो पूछो।
  104. 7:23पूछो।
  105. 7:25यदि बौद्ध और ब्राह्मण में अंतर नहीं है
  106. 7:28तो प्रप पितामह पुष्यमित्र ने बृहदत्त को
  107. 7:32क्यों मारा?
  108. 7:34क्या सेनापति पुष्यमित्र शुंग बौद्धों से
  109. 7:37द्वेष नहीं करते थे?
  110. 7:47पूर्णा क्या तुम भी यही मानती हो कि
  111. 7:50प्रप पितामह बौद्धी थे?
  112. 7:55मैंने लोगों से सुना है।
  113. 7:57प्रप पितामह ने सम्राट बृहद्रथ को इसलिए
  114. 8:01मारा था क्योंकि वह अपने धर्म में स्थित
  115. 8:03नहीं था। राज धर्म में स्थित नहीं था। तुम
  116. 8:07ही तो कहती हो नज् वल होती नज् होती
  117. 8:11ब्राह्मणों। कमुन्ना वसलो होती कमुन्ना
  118. 8:14होती ब्राह्मणों। जाति से कोई शूद्र नहीं
  119. 8:17होता। न जाति से कोई ब्राह्मण कर्म से
  120. 8:20व्यक्ति शूद्र होता है और कर्म से ही
  121. 8:22ब्राह्मण।
  122. 8:26पितामह ने अपने धर्म के लिए बृहद्रथ पर
  123. 8:29हथियार उठाया था। वे कर्म से क्षत्रिय थे।
  124. 8:33यदि वे प्रतिज्ञा दुर्बल बृहद्रथ पर
  125. 8:35हथियार ना उठाते तो वह अपने धर्म का
  126. 8:37उल्लंघन करते।
  127. 8:39प्रतिज्ञा दुर्बल
  128. 8:43पूर्णा मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं इस
  129. 8:46तरह पितामह का स्मरण तुम्हारे साथ करूंगा।
  130. 8:48भारत को संगठित करने वाले महाराज
  131. 8:50चंद्रगुप्त का भारत खंडित हो रहा था। देव
  132. 8:54नाम प्रियदर्शी अशोक के उत्तराधिकारी चुप
  133. 8:57थे। प्रजा की रक्षा करना, राष्ट्र की
  134. 9:01रक्षा करना, उसके सम्मान की रक्षा करना एक
  135. 9:04राजा की प्रतिज्ञा होती है। परंतु
  136. 9:07उत्तरोत्तर भारत को निर्बल शासक मिले। और
  137. 9:11सम्राट बृहद्र तो और भी ज्यादा प्रतिज्ञा
  138. 9:13दुर्बल निकला।
  139. 9:20सेनापति
  140. 9:22आदेश
  141. 9:26बलाध्यक्ष
  142. 9:28तुम घर जाओ मैं कुछ देर बाद जाऊंगा
  143. 9:32सेनापति
  144. 9:43[संगीत]
  145. 9:53सम्राट
  146. 9:55महाराज चंद्रगुप्त ने यवनों को भारत से
  147. 9:57बाहर खतीर दिया था। उनके रहते किसी की
  148. 10:00हिम्मत नहीं थी कि भारत की ओर आंख उठाकर
  149. 10:03देखे। सम्राट अशोक ने कलिंग विजय की। उनके
  150. 10:07जीते जी किसी का साहस नहीं हुआ कि सुई की
  151. 10:09नोक के बराबर भारत की भूमि पर अपना अधिकार
  152. 10:11करें। आज छोटे-छोटे यवन सेनापति और सैनिक
  153. 10:15सागल और गांधार में भारत की छाती पर बैठकर
  154. 10:18मुंह दल रहे हैं। लेकिन मगध चुप है। कलिंग
  155. 10:21मगध के हाथों से निकल चुका है। सातवाहन
  156. 10:24ताल ठोक रहे हैं।
  157. 10:24सेनापति
  158. 10:27मौर्य साम्राज्य में अभी रण की नहीं धर्म
  159. 10:31की भेरी बजती है।
  160. 10:35सम्राट मैं मगध का योद्धा हूं। अपने
  161. 10:38राष्ट्र और अपने स्वामी की रक्षा के लिए
  162. 10:41तलवार सिराहाने रखकर सोता हूं। भारत की
  163. 10:43कण-कण भूमि के लिए कण-कण मिटने को तैयार
  164. 10:45रहना मेरा धर्म है। इसीलिए मेरे पुरखों ने
  165. 10:49एक हाथ में शास्त्र और दूसरे में शस्त्र
  166. 10:51लिया। सिर्फ राज सेवा में रहने के लिए
  167. 10:54आपको कर्ण प्रिय लगे वही नहीं कहना चाहता।
  168. 10:56मैं अप्रिय सुनने के लिए तैयार हूं
  169. 10:58सेनापति।
  170. 10:59सम्राट आपको शस्त्र सज होकर शत्रुओं को
  171. 11:02चुनौती देनी चाहिए। प्रजा को यह विश्वास
  172. 11:05दिलाना चाहिए कि उनका सम्राट प्रतिज्ञा
  173. 11:07दुर्बल नहीं है।
  174. 11:11यानी
  175. 11:11आपने राष्ट्र की रक्षा और राष्ट्र के
  176. 11:14शत्रुओं का नाश करने की प्रतिज्ञा ली है।
  177. 11:18क्या मैंने उसमें दुर्बलता दिखाई है?
  178. 11:20मगध
  179. 11:22यवनों से भारत की रक्षा नहीं कर रहा है
  180. 11:24सम्राट।
  181. 11:26यवन पीढ़ियों से पंचनद और गांधार में रहते
  182. 11:29आ रहे हैं।
  183. 11:29क्षमा सम्राट प्रजा मानती है कि सम्राट को
  184. 11:34धर्म विजय में रुचि है। शत्रु विजय में
  185. 11:37नहीं।
  186. 11:40युद्ध मनुष्यता का भविष्य तय नहीं कर सकते
  187. 11:42सेनापति। धर्म विजय सबसे बड़ी विजय है।
  188. 11:46वीर और प्रजा इसे रणधीरुता कहते हैं।
  189. 11:48और क्या कहती है प्रजा?
  190. 11:50जो आपके गुप्तचर कहने का साहस नहीं रखते।
  191. 11:52क्या?
  192. 11:53कि मौर्य सम्राट पूरे साम्राज्य को
  193. 11:56स्तूपों और विहारों से पाट देंगे।
  194. 11:59बौद्ध संघ को विहारों के लिए भूमि सुलभ
  195. 12:01है। पर निर्धन किसानों के लिए नहीं।
  196. 12:04यह ब्राह्मणों का द्वेष बोल रहा है
  197. 12:06सेनापति।
  198. 12:07प्रतिज्ञा दुर्बल मैं नहीं। यह समाज
  199. 12:10दुर्बल है। जो बुद्ध को, धम्म को, संघ को,
  200. 12:13नए विचार को, परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर
  201. 12:16पा रहा है।
  202. 12:17[संगीत]
  203. 12:32देमित इस गांधार में बैठा नहीं रहेगा यवन
  204. 12:35आज नहीं तो कल गंगा पार करेंगे क्षणिताम
  205. 12:37पुरुषो जहा नाम नावाम इ वारणवे टूटी हुई
  206. 12:40नाव को मनुष्य जैसे समुद्र में छोड़ देता
  207. 12:43है वैसे ही अरक्षितारम राजा नाम रक्षा
  208. 12:46करने में असमर्थ राजा को छोड़ देना चाहिए
  209. 12:49यह महाभारत का कथन है। बहुवे राजन्यो नितम
  210. 12:54करोति राजा बहुत अधिक असत्य का आचरण करते
  211. 12:58हैं। यह मैं नहीं ब्राह्मण ग्रंथ कहते
  212. 13:01हैं।
  213. 13:03राष्ट्र टूटी हुई नाव नहीं है आमाद।
  214. 13:11वसुदेख प्र पितामह को कुछ चाहिए तो नहीं?
  215. 13:14हां।
  216. 13:19सेनापति की तबीयत तो ठीक है।
  217. 13:23कुछ दिनों से पिता अनमने से दिखाई दे रहे
  218. 13:26हैं।
  219. 13:27आपने कारण नहीं पूछा?
  220. 13:29पिता ने उत्तर नहीं दिया। सेनापति से
  221. 13:32बलाध्यक्ष पूछ नहीं सकता। कभी-कभी राज
  222. 13:36सेवा भी पिता पुत्र के बीच आ खड़ी होती
  223. 13:38है।
  224. 13:40[संगीत]
  225. 13:42वसु वसुमित्र
  226. 13:44पितामह
  227. 13:49जेष्ठ वसु दिखाई नहीं दे रहा है।
  228. 13:51प्र पितामह के पास है।
  229. 13:52आप लोगों ने भोजन नहीं किया?
  230. 13:54आपकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
  231. 13:55और पिता ने
  232. 13:56उन्होंने कर लिया है।
  233. 13:58पितामह प्र पितामह आपको पूछ रहे हैं।
  234. 14:18बलाध्यक्ष मगध के भूत पूर्व और वर्तमान
  235. 14:22सेनापति को अकेले छोड़ दो।
  236. 14:35क्या चिंता है?
  237. 14:38सम्राट से मैंने नए हथियारों और जवान
  238. 14:41घोड़ों की मांग की।
  239. 14:43सैनिकों के लिए अधिक वेतन और भत्ते की
  240. 14:45मांग की। लेकिन सम्राट ने कोई उत्साह नहीं
  241. 14:48दिखाया।
  242. 14:49क्या कहा सम्राट ने?
  243. 14:52यदि युद्ध नहीं तो नए हथियार क्यों? अधिक
  244. 14:55वेतन क्यों? सैनिक संतुष्ट है।
  245. 14:58सैनिक मगद भक्त हैं।
  246. 15:01इसलिए अनुशासन में पर
  247. 15:05प्रजा में असंतोष है।
  248. 15:09अपनी बात पूरी करो।
  249. 15:16सेना से पहले बौद्ध संघ है। सैनिकों से
  250. 15:20पहले बौद्ध भिक्षु हैं। सम्राट पक्षपात कर
  251. 15:23रहे हैं। कलिंग और सातवाहन युद्ध के लिए
  252. 15:26तत्पर है। सागर में यवनों का उपद्रव बढ़
  253. 15:29रहा है। विदर्भ में बैठे याज्ञसेन पर
  254. 15:32विश्वास नहीं किया जा सकता। पर याज्ञसेन
  255. 15:35तो विदर्भ में मगध का राज्यपाल है। मौर्य
  256. 15:38मंत्री कौडिन्य उसका साला है।
  257. 15:40मंत्री उसका साला है। इसीलिए तो समस्या
  258. 15:43है।
  259. 15:45और सम्राट की सुरक्षा को लेकर भी चिंता
  260. 15:47है।
  261. 15:48भिक्षु भिक्षणियों के प्रवेश पर राज
  262. 15:50प्रसाद में कोई रोक-टोक नहीं है। नट नर्तक
  263. 15:54नर्तिकों की बहार है।
  264. 15:56पुष्यमित्र
  265. 15:57पीढ़ियों से हमारा कुल मौर्य साम्राज्य की
  266. 16:01रक्षा करता चला आ रहा है।
  267. 16:04हमारे लिए किसी भी धर्म से पहले राष्ट्र
  268. 16:08है। वो धर्म जाता है तो जाए
  269. 16:12राष्ट्र नहीं जाना चाहिए। हमेशा यजुर्वेद
  270. 16:15का यह आदेश याद रखना वयं राष्ट्रम जागृयाम
  271. 16:21हमेशा राष्ट्र के लिए जागृत रहें। राष्ट्र
  272. 16:25यज्ञ यम ते यज्ञत तनहु
  273. 16:29इसलिए राष्ट्र की रक्षा करने वाली सेना और
  274. 16:33सेनापतियों को नमस्कार किया जाता है।
  275. 16:37नमः सेनाभ्य सेनानी भसव नमः
  276. 16:44उसी समय सम्राट बृहद्रथ ने राज प्रसाद के
  277. 16:47प्रधान रक्षक की हत्या की।
  278. 16:49अपने ही अंतरवंशिक की।
  279. 16:53क्यों? क्योंकि अंतरवंशिक ने गांधार से
  280. 16:56उपहार में आई एक यवन सुंदरी और उसकी
  281. 16:58दासियों को बिना जांच के सम्राट के पास
  282. 17:01जाने से रोका था।
  283. 17:03फिर
  284. 17:06तब बृहद्रथ ने पितामह अग्निमित्र को अपना
  285. 17:08अंतरवंशिक और प्रधान अंगरक्षक नियुक्त
  286. 17:11किया। सेनापति इससे प्रसन्न नहीं थे।
  287. 17:14यह ठीक नहीं हुआ तात सम्राट की वाणी में
  288. 17:18है। आचरण में नहीं जो अंतवंशिक के साथ हुआ
  289. 17:24वो अग्निमित्र के साथ भी हो सकता है।
  290. 17:26पुष्य तुम दोनों अपना-अपना कर्तव्य करो।
  291. 17:36सम्राट ने बड़ा ही साहसिक कदम उठाया है।
  292. 17:40कौडिन्य
  293. 17:45अग्निमित्र अभेद्य कवच है। पिता पुत्र
  294. 17:48दोनों स्वामी भक्त है।
  295. 17:52अब मैं भीतर और बाहर दोनों ओर से सुरक्षित
  296. 17:56हूं।
  297. 18:01जैसा प्रप पितामह का अनुमान था वैसा ही
  298. 18:04हुआ। विदर्भ में याज्ञसेन ने विद्रोह किया
  299. 18:07और स्वयं को विदर्भ का राजा घोषित कर
  300. 18:09दिया। सेनापति ने तुरंत विदर्भ में सेना
  301. 18:11भेजने की सलाह दी। पर सेना की बजाय
  302. 18:14बृहद्रथ ने मौर्य मंत्री कंडिन्य को
  303. 18:16याज्ञसेन को समझाने के लिए विदर्भ भेजा।
  304. 18:22सम्राट को कैसे समझाऊं कि विदन में
  305. 18:24कंटिन्य ने ही याज्ञसेन को स्थापित किया
  306. 18:26है। साला जीजा दोनों मिले हुए हैं। फिर वह
  307. 18:30हुआ जिसके पितामह ने भी कल्पना नहीं की
  308. 18:32थी। उस दिन पाटलिपुत्र में सेना का संचालन
  309. 18:36था। मगध के वीर सैनिक सम्राट बृहद्रथ का
  310. 18:40अभिंदन करने वाले थे।
  311. 18:43सेना धूप में खड़ी थी।
  312. 18:46प्रितामह बार-बार संदेश भेज रहे थे। मगर
  313. 18:49सम्राट बृहद्रथ नहीं आ रहे थे। जिसकी सेना
  314. 18:52प्रतीक्षा कर रही थी। उसका सम्राट यवन
  315. 18:56नृत्यियों का नृत्य देख रहा था।
  316. 18:59[संगीत]
  317. 19:40[प्रशंसा]
  318. 19:43[संगीत]
  319. 19:46किसी तरह पितामह अग्निमित्र सम्राट
  320. 19:49बृहद्रथ को सैनिक अभिबंधन के लिए ले आए।
  321. 19:56[संगीत]
  322. 19:58सेनापति इन सैनिकों के लिए तुम मुझसे अधिक
  323. 20:01वेतन और हथियार मांग रहे थे। इनके लिए
  324. 20:05इससे तो बेहतर होता यह धम्म के सैनिक होते
  325. 20:08और इनके हाथ में भिक्षा पात्र होता और
  326. 20:10युद्ध की पुकार की जगह ये धम्म का घोष कर
  327. 20:12रहे होते।
  328. 20:22[संगीत]
  329. 20:29[संगीत]
  330. 20:44एक क्षण के लिए किसी को कुछ समझ नहीं आया
  331. 20:46कि क्या हुआ।
  332. 20:49अब ताज पितामह ने सम्राट बृहद की हत्या कर
  333. 20:52दी। अब ताज
  334. 20:58सेनानी पुष्यमित्र की
  335. 21:00जय सेनानी पुष्यमित्र की
  336. 21:02जय सेनानी पुष्यमित्र की
  337. 21:04जय सेनानी पुष्यमित्र की
  338. 21:06जय
  339. 21:07पितामह अग्निमित्र को समझ नहीं आ रहा था
  340. 21:09कि वे क्या करें
  341. 21:11अपने पिता की हत्या या आत्महत्या
  342. 21:15मैं किसका धर्म निभाऊं पितामह पुत्र का या
  343. 21:19सेवक का अपने स्वामी की हत्यारे से युद्ध
  344. 21:21कर वीरगति पाऊं या आत्महत्या करूं
  345. 21:23स्वामी किस स्वामी के लिए अब आप प्राण
  346. 21:26देंगे। जाइए अपने सेनापति का साथ दीजिए और
  347. 21:30यदि अपने पिता से लड़ना है तो अपने
  348. 21:32पुत्रों से भी लड़ने को तैयार रहिए। वसु
  349. 21:34छोटा है। इसे मारने में आसानी होगी।
  350. 21:38तात मुझे आज्ञा दीजिए। मैं अपने सेनापति
  351. 21:41की सहायता के लिए जा रहा हूं।
  352. 21:46सेनापति ने तुरंत मंत्री परिषद की बैठक
  353. 21:48बुलाई।
  354. 21:49राष्ट्र के लिए प्राण देने वाले सैनिकों
  355. 21:52का अपमान करने वाले राजा की मैंने हत्या
  356. 21:54की है। मुझे उसका दंड दिया जाए और मंत्री
  357. 21:57परिषद जिसे योग्य समझे
  358. 22:01उसे मगध का सम्राट नियुक्त करें।
  359. 22:09सेनापति
  360. 22:10इस राष्ट्र ने वचन दुर्बल प्रतिज्ञा
  361. 22:13दुर्बल शासकों का शासन देख लिया।
  362. 22:17इस राष्ट्र को ऐसे शासक की जरूरत है
  363. 22:21जो राज धर्म का निर्वाह कर सके।
  364. 22:29मंत्री परिषद और बलाध्यक्षों ने मिलकर
  365. 22:31सेनापति को शासन का दायित्व स्वीकार करने
  366. 22:33को कहा और पाटलिपुत्र ने सेनापति पुष्यम
  367. 22:37में त्रिशुंग का राज्याभिषेक किया।
  368. 22:42माता भूमि
  369. 22:45पुत्रोहम पृथ्वी
  370. 22:47[संगीत]
  371. 22:49यह भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र
  372. 22:54हूं।
  373. 22:56नमो मात्रे पृथ्वीय
  374. 22:59मैं
  375. 23:02माता पृथ्वी को नमस्कार करता हूं।
  376. 23:06नमः सभा
  377. 23:09सभापति भसव नमः
  378. 23:15सभी सभाओं
  379. 23:17और सभापतियों को नमस्कार
  380. 23:24सभी छोटे बड़ों को मेरा नमस्कार।
  381. 23:30नमस्तक्षभ्यो
  382. 23:32रतकारभ्य
  383. 23:33वो नमः नमः
  384. 23:36[संगीत]
  385. 23:39कुलालेभ्य
  386. 23:42कर्मारेभ
  387. 23:43वो नमः
  388. 23:46शिल्पकारों
  389. 23:48रथकारों कुम्हारों लोहारों सबको मेरा
  390. 23:52नमस्कार
  391. 23:54[संगीत]
  392. 23:56भूत भविष्य भविष्य और वर्तमान के श्रेष्ठ
  393. 24:01जनों को मेरा नमस्कार।
  394. 24:06महाराज मनु का यह कहना है कि वह राजा जो
  395. 24:10अपने मंत्रियों और लोक सेवकों के साथ अपनी
  396. 24:13प्रजा को पीड़ित और चोर लुटेरों द्वारा
  397. 24:17सताए जाते देखता है। ऐसा राजा जीवित नहीं
  398. 24:22मरा हुआ है।
  399. 24:25यदि मैं
  400. 24:27शास्त्र के अनुसार
  401. 24:30अपने कर्तव्यों का पालन ना करूं तो मैं
  402. 24:34प्रजा का अपराधी होऊंगा, पाप का भागी
  403. 24:37होऊंगा।
  404. 24:40सम्राट पुष्यमित्र ने शासन संभालते ही
  405. 24:43अग्निमित्र को विदिशा का गुप्ता नियुक्त
  406. 24:45किया।
  407. 24:46गुप्ता यानी राज्यपाल ना।
  408. 24:50जष्ठ वसु और वसुमित्र मेरे पास रहेंगे।
  409. 24:53किसी एक को तो उनकी मां के साथ रहने
  410. 24:55दीजिए।
  411. 24:56ये दोनों यहां रहकर मनुस्मृति और धर्म
  412. 24:59शास्त्रों का अध्ययन करेंगे।
  413. 25:02उन्हें वैदिक धर्म धारण करने के योग्य
  414. 25:04बनना है। सातवाहन ब्राह्मण धर्म का
  415. 25:08पुनर्जागरण कर रहे हैं। हमें वैदिक धर्म
  416. 25:11का पुनरुत्थान करना है।
  417. 25:12श्रुति और स्मृतियों का अध्ययन तो दोनों
  418. 25:14विदिशा में रहकर भी कर सकते हैं।
  419. 25:21पुत्र मोह से बचो अग्निमित्र
  420. 25:24यह भी दुर्बलता है।
  421. 25:28वैदिक धर्म के पुनरुत्थान के लिए
  422. 25:31मैं अश्वमेध यज्ञ को पुनर्जीवित करना
  423. 25:34चाहता हूं।
  424. 25:37इसीलिए मैंने गुनार से
  425. 25:40आचार्य पतंजलि को आमंत्रित किया है। हम
  426. 25:44शुंगों का यह भाग्य होगा जो आचार्य पतंजलि
  427. 25:47हम शुंगों और इस अश्वमेध यज्ञ का ऋत्विक
  428. 25:52बनना स्वीकार करें। मैं चाहता हूं कि
  429. 25:54तुम्हारे दोनों पुत्र
  430. 25:56आचार्य पतंजलि की सेवा में रहे। फिर भी यह
  431. 26:00तुम्हारे साथ विदिशा जाना चाहते हैं तो
  432. 26:03मैं इन्हें रोकूंगा नहीं।
  433. 26:04मैं पितामह के पास ही रहूंगा तात।
  434. 26:10युवराज अग्निमित्र ने सम्राट के आदेश से
  435. 26:13मौर्य मंत्री को कारागार में डाल दिया और
  436. 26:15स्वयं पत्नियों के साथ विदिशा चले आए ताकि
  437. 26:18याज्ञसेन को दंड दे सके। शुंग शासन में
  438. 26:21मनुस्मृति और गृहसूत्रों का पुनरागमन हुआ।
  439. 26:25सम्राट कुमार से कहिए ना
  440. 26:29करने दो इसमें इन्हें मनमानी करने दो।
  441. 26:36[संगीत]
  442. 26:40मनुस्मृति का कौन सा अध्याय समाप्त किया?
  443. 26:43सातवां अध्याय राजधर्म पितामह
  444. 26:45क्या पढ़ा? कुछ बताओ।
  445. 26:48ब्रह्मा ने अराजकता से भयभीत प्राणियों की
  446. 26:50रक्षा के लिए राजा का निर्माण किया। और
  447. 26:53ब्रह्मा ने राजा को इंद्र, वायु, यम,
  448. 26:56सूर्य, अग्नि, वरुण, चंद्रमा और वित्तेश
  449. 27:00के गुणों से युक्त किया। पर इसका अर्थ हम
  450. 27:02दोनों को समझ में नहीं आया।
  451. 27:03तो आपने अपने आचार्य से क्यों नहीं पूछा?
  452. 27:05क्योंकि हमें इसका उत्तर एक सम्राट पितामह
  453. 27:08से सुनना था।
  454. 27:10तो सुनो।
  455. 27:13बैठो।
  456. 27:19तो अपने पितामह से मनु की व्याख्या सुनो।
  457. 27:22राजा में इंद्र का पराक्रम होना चाहिए और
  458. 27:26वायु की तरह व्याप्त
  459. 27:27यानी
  460. 27:28उसके दंड की धाक सर्वत्र होनी चाहिए। जैसे
  461. 27:32वायु सर्वत्र व्याप्त होती है। वो यम की
  462. 27:36तरह न्याय करने वाला होना चाहिए। सूर्य की
  463. 27:39तरह सबके जीवन को आलोकित करने वाला।
  464. 27:43आशा, उत्साह, उल्लास से भर देने वाला
  465. 27:46अग्नि की तरह ऊर्जावान स्वयं भी और प्रजा
  466. 27:50को भी ऊर्जा दे और वरुण की तरह मनुष्य और
  467. 27:56धरती की प्यास बुझाए। यानी
  468. 27:58कुएं, तालाब, जलाशय बनवाए।
  469. 28:01खेतों तक पानी ले जाए ताकि धरती पर फसल
  470. 28:03लहलाए।
  471. 28:04और
  472. 28:06चंद्रमा की तरह शीतल रहे और सबको शीतलता
  473. 28:09दे। दग्ध मन को उद्वग्न जन को शांत करें
  474. 28:14और विदेश
  475. 28:17यानी
  476. 28:19धन की देवता की तरह
  477. 28:21सबको संपन्न करें। और क्या पढ़ा? सभी
  478. 28:25प्राणियों की रक्षा के लिए ब्रह्मा ने
  479. 28:28राजा के लिए दंड का निर्माण किया। उस दंड
  480. 28:31के भय से ही सभी अपने-अपने धर्म का पालन
  481. 28:34करते हैं। देश, काल, विद्या और अपराध के
  482. 28:37अनुसार अपराधी को योग्य दंड देना चाहिए।
  483. 28:39राज दंड की शासक है। दंड ही प्रजा पर शासन
  484. 28:42करता है। दंड ही सभी की रक्षा करता है।
  485. 28:45दंड ही सोए हुए को जगाता है। विद्वान दंड
  486. 28:47को ही गुणों का मूर्त रूप कहते हैं। विचार
  487. 28:50करके दिया गया उचित दंड प्रजा को प्रसन्न
  488. 28:52करता है। अनुचित दंड प्रजा का नाश करता
  489. 28:56है।
  490. 28:56जब शासक अपराधियों को निरंतर दंड नहीं
  491. 28:59देता तब ताकतवर कमजोर को उसी तरह कष्ट
  492. 29:02देते हैं जैसे मछलियों को लोहे की सलाखों
  493. 29:04पर सेका जाता है। क्या मनुष्य हमेशा
  494. 29:07नैतिकता का पालन करता है? वसुमित्र?
  495. 29:10नहीं पितामह विरले ही नैतिकता के लिए
  496. 29:12नैतिकता का पालन करते हैं। दंड के भय से
  497. 29:15ही सभी नीति से अपनी आय और संपत्ति का
  498. 29:18उपभोग करते हैं। देवता, दानव, गंधर्व,
  499. 29:21राक्षस आदि देवी प्रतिकार के भय से
  500. 29:24अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।
  501. 29:28यदि दंड ना हो या विधि संगत ना हो तो समाज
  502. 29:32अराजक हो जाएगा। सभी संबंध नष्ट हो
  503. 29:35जाएंगे। प्रजा के सभी वर्गों में भय फैल
  504. 29:38जाएगा। हम
  505. 29:40उस राजा की प्रजा उत्तेजित नहीं होती।
  506. 29:43जहां राजा दंड का आधार लेकर स्थितियों को
  507. 29:46सत्य के प्रकाश में देखता है।
  508. 29:48तो फिर प्रजा राजा किसे कहती है?
  509. 29:50सत्यवादी,
  510. 29:52बुद्धिमान, दंड देने वाले, विवेचना और
  511. 29:55समीक्षा करने में समर्थ। धर्म, अर्थ, काम
  512. 30:00को समझने वाले को प्रजा राजा कहती है।
  513. 30:03हम जाओ अब सो जाओ।
  514. 30:11पितामह अग्निमित्र ने विदिशा पहुंचते ही
  515. 30:15धारिणी देवी के भाई वीरसेन को नर्मदा के
  516. 30:18तट पर सीमा रक्षक नियुक्त किया और
  517. 30:21याज्ञसेन को समर्पण के लिए संदेश भेजा।
  518. 30:24याज्ञसेन का एक चचेरा भाई था माधवसेन।
  519. 30:27उसकी बहन थी मालविका। माधवसेन पुराने
  520. 30:30राजकुल से था। उसने पितामह अग्निमित्र को
  521. 30:34संधि करने के लिए पत्र भेजा।
  522. 30:36विदर्भ पर मगध के अधिकार के पहले मेरे
  523. 30:39पुरखे राज्य करते थे। इसलिए विदर्भ पर
  524. 30:42मेरा अधिकार पहला है। पर मौर्य मंत्री ने
  525. 30:45अपने जीजा को विदर्भ में स्थापित कर मेरे
  526. 30:47साथ अन्याय किया है। आप मुझे मेरा अधिकार
  527. 30:50दिलाएं और याज्ञसेन को सिंहासन से हटाएं।
  528. 30:54मगध और विदर्भ की मैत्री दृढ़ करने के लिए
  529. 30:57मैं आपके साथ अपने परिवार का विवाह संबंध
  530. 31:00स्थापित करना चाहता हूं। इसलिए आपसे मिलने
  531. 31:03के लिए विदिशा आ रहा हूं। मुझसे और इरावती
  532. 31:06से मन नहीं भरा।
  533. 31:17फिर तो विदिशा में गृह युद्ध छिड़ गया
  534. 31:19होगा। स्त्रियां पुरुषों को हमेशा क्षमा
  535. 31:21कर देती हैं। पर विदर्भ और विदिशा के बीच
  536. 31:24दांव पेच शुरू हो गए। यहां पाटलिपुत्र में
  537. 31:27सम्राट पुष्यमित्र ने वेदों, धर्मशास्त्र,
  538. 31:31काव्य, व्याकरण, सूत्र साहित्य और
  539. 31:33अर्थशास्त्र के अध्ययन को प्रोत्साहन
  540. 31:35दिया। दूर-दूर से आचार्य पाटलिपुत्र आने
  541. 31:38लगे। वैदिक धर्म जैसे सदियों के बाद जागृत
  542. 31:42हो उठा था। राज सेवा के लिए स्नातक,
  543. 31:45मनुस्मृति और राजनीति शास्त्रों का अध्ययन
  544. 31:48करने लगे।
  545. 31:49गोष्ठियों और उत्सवों में अब शास्त्र
  546. 31:52चर्चा हो रही थी।
  547. 31:57नए अमात्यों, सचिवों, दंड नेतृत्व, नायक,
  548. 32:02राजदूत और कार्यकारी अधिकारियों की
  549. 32:05नियुक्ति के लिए सम्राट पुष्यमित्र ने
  550. 32:07कोमोदी महोत्सव के दिन ज्ञान सत्र रखा है।
  551. 32:10स्नातक अपनी योग्यता दिखाने के लिए
  552. 32:13आमंत्रित हैं।
  553. 32:19राष्ट्र संचालन के लिए राजा को क्या करना
  554. 32:21चाहिए?
  555. 32:22राष्ट्र संचालन के लिए राजा को 100 गांव,
  556. 32:24200 गांव, 300 गांव और 500 गांव का गुल्म
  557. 32:27बनाना चाहिए और प्रत्येक गुल में एक
  558. 32:29अधिपति को नियुक्त करना चाहिए। राजा को
  559. 32:32अधिपतियों की नियुक्ति कैसे करनी चाहिए?
  560. 32:34राजा को हर गांव में ग्रामपति, 10 गांव
  561. 32:37में 10 ग्रामपति, 20 गांव पर विषती और 100
  562. 32:40गांव पर शतेश और हजार गांव में सहस्त्रपति
  563. 32:42नामक अधिपति नियुक्त करने चाहिए। इन
  564. 32:44अधिपतियों को कैसे काम करना चाहिए?
  565. 32:46ग्रामपति को अपने गांव के अपराध संबंधी
  566. 32:48विवादों को स्वयं सुलझाना चाहिए। जिसे वह
  567. 32:50सुलझाने में असमर्थ हो उसे वह 10 ग्रामपति
  568. 32:53को सौंपे। यदि 10 ग्रामपति को शंका हो या
  569. 32:55वह असमर्थ हो तो उसे विशी को सौंपे। यदि
  570. 32:58विंशी असमर्थ हो तो उसे सतेश को सौंपे।
  571. 33:01यदि सतेश असमर्थ हो तो उसे सहस्त्रपति को
  572. 33:04सौंपे। अंतिम निर्णय महिपति का होता है।
  573. 33:07राज प्रदेह या राजभाग का उपयोग किस प्रकार
  574. 33:09करना चाहिए? राजा के प्रतिदिन के राजभाग
  575. 33:11का अन्न पे और ईंधन ग्रामपति को प्रतिदिन
  576. 33:15मिलना चाहिए। दश ग्रामपति को एक कुल माप
  577. 33:17की भूमि का उत्पन्न वंश ग्रामपति को पांच
  578. 33:20कुल माप की भूमि का उत्पन्न शतेश को एक
  579. 33:22ग्राम का उत्पन्न और सहस्त्रपति को एक
  580. 33:25शाखा नगर का उत्पन्न मिलना चाहिए। कुल माप
  581. 33:28यानी क्या? एक किसान एक दिन में छह बैलों
  582. 33:31द्वारा खींचे जाने वाले हल से 6 घंटे में
  583. 33:34जितनी भूमि पर हल चला सके उस भूमि का नाप
  584. 33:36एक कुल है।
  585. 33:37साधु साधु यो
  586. 33:42राज सेवक अक्सर घूसखोर और धूर्त होते हैं।
  587. 33:45राजा को इनसे प्रजा की रक्षा करनी चाहिए।
  588. 33:50राजा को ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों को
  589. 33:52बहिष्कृत कर देना चाहिए राज्य से जो घूस
  590. 33:54लेते हैं और घूस देने वालों की वस्तु भी
  591. 33:56जप्त कर लेनी चाहिए। राज्य सेवा में
  592. 33:59नियुक्त दास, दासियों और हरकारों को
  593. 34:01प्रतिदिन वेतन देना चाहिए। वेतन कितना
  594. 34:04होना चाहिए? निम्न श्रेणी के सेवक
  595. 34:06सेविकाओं को एक पंड प्रतिदिन। उच्च श्रेणी
  596. 34:09के सेवक सेविकाओं को छह पंड प्रतिदिन।
  597. 34:11निम्न श्रेणी के सेवक को एक द्रोण धान
  598. 34:13प्रतिमाह। उच्च श्रेणी के सेवक को छह
  599. 34:16द्रोण धान प्रतिमाह। निम्न श्रेणी के सेवक
  600. 34:18सेविकाओं को प्रति छह माह में एक वस्त्र।
  601. 34:20उच्च श्रेणी के सेवक सेविकाओं को छह
  602. 34:22वस्त्र प्रति छह माह।
  603. 34:24राजा कर कैसे तय करें? क्रय विक्रय का
  604. 34:27मूल्य, यात्रा का व्यय, दैनिक जीवन का
  605. 34:29व्यय, आकस्मिक व्यय, वस्तु की सुरक्षा के
  606. 34:32लिए योगक्षेम या बीमा का व्यय, वन, नदियों
  607. 34:36और पहाड़ी मार्गों पर सामग्री की सुरक्षा
  608. 34:38के लिए किया गया व्यय आदि का विचार कर
  609. 34:41राजा को शुल्क तय करना चाहिए।
  610. 34:42साधु साधु योग योग
  611. 34:45कर या शुल्क किस पर लगाना चाहिए?
  612. 34:48राजा को सूक्ष्म विवेचना कर व्यापारियों
  613. 34:50और किसानों के लाभ पर कर लगाना चाहिए। यही
  614. 34:53नियम शासन के अधीन भूमि पर खेती करने
  615. 34:55वालों के लिए भी है।
  616. 34:56साधु साधु योग योग
  617. 35:11यहां शुल्काध्यक्ष कौन है?
  618. 35:13मैं शोल्किक हूं।
  619. 35:15पाटलिपुत्र में अब शुल्काध्यक्ष को
  620. 35:16शोल्किक कहने लगे।
  621. 35:18आप जो चाहे कहें हमें शुल्क से मतलब है।
  622. 35:22मैं पहली बार मथुरा से पाटलिपुत्र आ रहा
  623. 35:24हूं। पहले मेरे पिताजी आते थे।
  624. 35:26मथुरा के श्रेष्ठ ही हैं।
  625. 35:27जी।
  626. 35:28स्वागत है। कोई कष्ट?
  627. 35:30कर के बारे में पूछना था। किसी निम्न सहाय
  628. 35:32से मिला देंगे?
  629. 35:33मैं ही बता देता हूं।
  630. 35:36स्वर्ण और पशुओं के मूल्य का 50वां हिस्सा
  631. 35:38खाद्यान्न के मूल्य पर छठा आठवां या 12वां
  632. 35:43हिस्सा यह स्थितियों पर निर्भर करता है।
  633. 35:46पर प्रजा से संवत्सर में एक ही बार इसी
  634. 35:49तरह काष्ट मधु घृत सुगंध रस औषधि धान्य
  635. 35:55पुष्प मूल फल शाक तण बांस चर्म मिट्टी और
  636. 36:02पत्थर के बर्तनों से लाभ पर छठा हिस्सा पर
  637. 36:06श्रोत्रिय ब्राह्मण से कोई कर नहीं
  638. 36:10छोटे-छोटे व्यवसाय से जीवन यापन करने वाले
  639. 36:13गरीब प्रजा से महिपति को नाम मात्र का कर
  640. 36:15लेना चाहिए न्याय के लिए महिपति को विधि
  641. 36:17विवेचना में निपुण मंत्री और ब्राह्मणों
  642. 36:19के साथ सभा में प्रवेश करना चाहिए और
  643. 36:21प्रतिदिन शास्त्रों के अनुसार न्याय करना
  644. 36:23चाहिए।
  645. 36:23यदि महिपति न्यायिक निर्णय के लिए स्वयं
  646. 36:26उपस्थित ना हो पाए तो उन्हें अपने स्थान
  647. 36:28पर एक विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त करना
  648. 36:30चाहिए।
  649. 36:31उस नियुक्त ब्राह्मण को न्यायालय के तीन
  650. 36:34सभासदों के साथ न्याय सभा में प्रवेश करना
  651. 36:36चाहिए और वहां बैठकर या खड़े होकर न्याय
  652. 36:39संचालन की प्रक्रिया को देखना चाहिए।
  653. 36:42जिस सभा में तीन वैदज्ञ ब्राह्मण और राज
  654. 36:45प्रतिनिधि या न्यायाधीश उपस्थित हो उसे
  655. 36:48ब्रह्म सभा कहते हैं।
  656. 36:51जिस न्यायालय में सत्य असत्य से पराजित
  657. 36:53होता है और जहां अन्याय को न्याय की सुई
  658. 36:56से छेद नहीं दिया जाता वो न्यायालय अधर्म
  659. 36:58द्वारा मारा गया समझना चाहिए।
  660. 37:01पहले तो न्यायालय में जाना ही नहीं चाहिए।
  661. 37:03पर वहां जाने के बाद केवल सत्य ही बोलना
  662. 37:06चाहिए। न्यायालय में मौन रहकर या झूठ
  663. 37:08बोलकर व्यक्ति पाप का दोषी होता है।
  664. 37:11अन्याय करने के पाप का एक चौथाई भाग झूठा
  665. 37:14अभियोग लगाने वाले के हिस्से में जाता है।
  666. 37:16एक चौथाई भाग झूठे साक्षी के हिस्से में
  667. 37:18जाता है। एक चौथाई भाग न्यायालय के
  668. 37:20सभासदों के हिस्से में और एक चौथाई भाग
  669. 37:23राजा के हिस्से में जाता है।
  670. 37:25राजा पाप मुक्त हो जाता है। न्यायालय के
  671. 37:27सभी सभासद पाप मुक्त हो जाते हैं। जब
  672. 37:29अपराधी को उचित दंड दिया जाता है। साधु
  673. 37:32साधु यो
  674. 37:35याज्ञसेन का चचेरा भाई माधव सेन युवराज
  675. 37:38अग्निमित्र से मिलने विदिशा जा रहा था कि
  676. 37:40विदर्भ के सीमा रक्षक ने उसे घेर लिया।
  677. 37:45कोई माधवसेन को मारेगा नहीं याज्ञ सेन उसे
  678. 37:48जीवित रखना चाहते हैं।
  679. 37:51[संगीत]
  680. 37:53माधवसेन को कारागार में डाल दिया गया।
  681. 37:58क्या लिखा है याज्ञ सेन ने?
  682. 38:01मुझसे सौदेबाजी कर रहा है। लिखा है कि मैं
  683. 38:04उसके साले मौर्य मंत्री को कारागार से
  684. 38:06छोड़ दूं तो माधवसेन को छोड़ देगा।
  685. 38:11अब
  686. 38:18युद्ध
  687. 38:21सेनानी पुष्यमित्र की
  688. 38:22जय
  689. 38:23सेनानी पुष्यमित्र की
  690. 38:24जय
  691. 38:25सेनानी पुष्यमित्र की
  692. 38:27जय
  693. 38:27सेनानी पुष्यमित्र की
  694. 38:29जय
  695. 38:29सेनानी पुष्यमित्र की
  696. 38:31जय
  697. 38:31शुंग सेना ने वीरसेन के नेतृत्व में
  698. 38:34विदर्भ पर आक्रमण किया और यागसेन को
  699. 38:37पराजित किया यागसेन ने शुंगों की अधीनता
  700. 38:40स्वीकार कर ली। अग्निमित्र ने विदर्भ के
  701. 38:43शासन को दो हिस्सों में विभाजित किया। एक
  702. 38:46हिस्सा यागसेन और दूसरा हिस्सा माधवसेन को
  703. 38:49मिला। अग्निमित्र ने माधवसेन की बहन
  704. 38:52मालविका से विवाह किया।
  705. 38:54तीसरा विवाह।
  706. 38:58फिर
  707. 39:00महर्षि पतंजलि पाटलिपुत्र आए।
  708. 39:04उन्होंने शुंगों के अश्वमेध यज्ञ में
  709. 39:06पुरोहित बनना स्वीकार किया।
  710. 39:09शुंगों ने अश्वमेध यज्ञ की महान परंपरा को
  711. 39:12पुनर्जीवित किया। सम्राट पुष्यमित्र ने
  712. 39:16कुमार वसुमित्र को अश्व का रक्षक बनाया और
  713. 39:20100 वीर राजपुत्रों के साथ शुंग सेना लेकर
  714. 39:23कुमार वसुमित्र दिग्विजय के लिए निकल
  715. 39:26पड़े। प्रजा हर्ष से झूम उठी। भारत को फिर
  716. 39:30से एक करने का अवसर आया था। पर इसी उत्साह
  717. 39:33और उन्माद में
  718. 39:36वह भी हुआ जो
  719. 39:38नहीं होना चाहिए था।
  720. 39:42कुछ बौद्ध द्वेषी प्रजा ने बौद्ध विहारों
  721. 39:45को तोड़ा।
  722. 39:47आग लगाई। बौद्ध भिक्षुओं को अपमानित किया।
  723. 39:54कुछ अपराधियों ने सांची के स्तूप को
  724. 39:56तोड़ने का प्रयास किया।
  725. 40:00अग्निमित्र विचलित हो उठे।
  726. 40:11क्या ये सच है युवराज?
  727. 40:15कुछ मूर्खों ने महा स्तूप को क्षति
  728. 40:17पहुंचाई है।
  729. 40:19पर स्तूप और भगवान तथागत की अस्थियां
  730. 40:21सुरक्षित है।
  731. 40:23ऐसा नहीं होना चाहिए था धारणी। कैसे कोई
  732. 40:26इन धर्म के उन्मक्त लोगों को समझाए कि
  733. 40:28पूरा भारत बुद्ध की धर्म का आया है। भारत
  734. 40:31में हर संप्रदाय को अपने विश्वास के साथ
  735. 40:34जीने का अधिकार है।
  736. 40:36चाहे वह वैदिक हो या अवैदिक चाहे वह वेदों
  737. 40:38में आस्था रखता हो या वेद विरोधी हो
  738. 40:41चारवाक हो
  739. 40:45मैं नए सार्वजनिक कार्यों के अधिकारी
  740. 40:46नवकर्मिक अब पुराने सार्वजनिक कार्यों के
  741. 40:49अधिकारी कार्मांतिक को साथ लेकर सांची जा
  742. 40:51रहा हूं।
  743. 40:56युवराज अग्निमित्र ने सांची के महा स्तूप
  744. 40:59को फिर से बनवा दिया।
  745. 41:01ईंटों के बने पुराने स्तूप को आकार में
  746. 41:03दुगना करवाकर उसे पत्थर की पटियाओं से
  747. 41:06मंडवा दिया।
  748. 41:09बौद्धों के विरुद्ध वैदिकों का विरोध
  749. 41:11सम्राट पुष्यमित्र के लिए सबसे बड़ी
  750. 41:13चुनौती थी।
  751. 41:15बौद्ध समुदाय में भी सम्राट के प्रति दबा
  752. 41:20हुआ आक्रोश था।
  753. 41:21सम्राट क्या यह प्रजा के आक्रोश की
  754. 41:24अभिव्यक्ति है? जिसे हम बौद्धों के
  755. 41:27विरुद्ध आक्रोश समझ रहे हैं। ब्राह्मण
  756. 41:28शासन का विरोध भी तो हो सकता है।
  757. 41:31यह ब्राह्मणों का विरोध हो या बौद्धों के
  758. 41:35प्रति आक्रोश किसी को भी अधिकार नहीं है
  759. 41:39कि वह किसी के उपासना स्थलों को क्षति
  760. 41:41पहुंचाए।
  761. 41:43सम्राट अशोक ने 84,000 स्तूप इसलिए बनवाए
  762. 41:46थे कि प्रजा उनकी रूप काया और धर्म काया
  763. 41:49की उपासना कर सके।
  764. 41:52यह अश्वमेघ प्रजा को अभय देने के लिए है।
  765. 41:56भयभीत करने के लिए नहीं। इसलिए वसुमित्र
  766. 41:59और प्रत्येक ग्राम में यह सूचना पहुंचा दी
  767. 42:01जाए कि शुंग शासन सांप्रदायिक असहिष्णुणता
  768. 42:06को कदापि स्वीकार नहीं करेगा और जो भी
  769. 42:09असंतोष फैलाएगा शासन उसे दंड देगा।
  770. 42:13सम्राट इस समय बौद्ध समुदाय के घाव पर
  771. 42:16मरहम लगाने की आवश्यकता है। इसलिए मेरा
  772. 42:19मानना है कि मौर्यों की तरह ही शुंग भी
  773. 42:22संघ और बिहार को प्रशय दे।
  774. 42:25शुंग शासन संप्रदाय के आधार पर ना भेद
  775. 42:29करेगा
  776. 42:31ना ही किसी संप्रदाय को प्रश्रय देगा।
  777. 42:36संप्रदाय यह व्यक्तिगत आस्था का चुनाव है।
  778. 42:40राष्ट्रीय नहीं। यदि इसके लिए मुझे राज्य
  779. 42:43खोना भी पड़ा तो मैं तैयार हूं।
  780. 42:46क्योंकि मेरे लिए संप्रदाय से पहले
  781. 42:49राष्ट्र है। यदि राष्ट्र सुरक्षित रहा तो
  782. 42:52आस्थाएं सुरक्षित रहेंगी। वरना आक्रांता
  783. 42:56ब्राह्मणों और बौद्धों में भेद नहीं
  784. 42:57करेंगे। यह अश्वमेध वैदिक धर्म की विजय का
  785. 43:01घोष नहीं बल्कि प्रजा को उसके सेनापति
  786. 43:04पुष्यमित्र का वचन है कि उसका सेनापति
  787. 43:07राष्ट्र के लिए जागृत है और अपनी प्रजा की
  788. 43:11रक्षा करने में समर्थ है। प्रश्न यह है कि
  789. 43:14क्या उसकी प्रजा एकात्म भाव से राष्ट्र के
  790. 43:18लिए समर्पित है?
  791. 43:21क्या खंड खंड में बटा हुआ भारत एक है? यदि
  792. 43:23हम एक ना हो पाए तो क्या हमारे वेद सफल
  793. 43:26हैं?
  794. 43:28[संगीत]
  795. 43:31आज मैं भारत को
  796. 43:33फिर उस घोषणा का स्मरण करा रहा हूं जो
  797. 43:37मौर्य सम्राट
  798. 43:39देना प्रिय अशोक ने पाषाण शिलाओं में
  799. 43:43खुदवाई थी ताकि प्रजा उसे पढ़ सके
  800. 43:48ताकि आने वाली सहस्त्रों पीढ़ियां उसे पढ़
  801. 43:50सके। क्या कहा था सम्राट अशोक ने?
  802. 43:55मुझे याद है।
  803. 43:58प्रियदर्शी ने कहा था कि देवताओं का प्रिय
  804. 44:01प्रियदर्शी
  805. 44:03विविध दान और पूजा से सभी संप्रदायों के
  806. 44:06प्रवर्जितों और गृहस्थों की पूजा करता है।
  807. 44:10किंतु प्रियदर्शी
  808. 44:12दान वो पूजा को इतना नहीं मानता जितना कि
  809. 44:15हर संप्रदायों में सार वृद्धि को मानता
  810. 44:18है। सार वृद्धि अनेक प्रकार की होती है।
  811. 44:22किंतु उसका मूल है वाक संयम।
  812. 44:26मतलब लोग अपने संप्रदाय का आदर और दूसरे
  813. 44:31के संप्रदाय की अकारण निंदा ना करें। सदा
  814. 44:33दूसरे संप्रदायों की प्रशंसा करनी चाहिए।
  815. 44:37जो मनुष्य ऐसा करता है,
  816. 44:41वह अपने संप्रदाय की उन्नति करता है
  817. 44:44और दूसरे संप्रदायों का उपकार करता है। जो
  818. 44:47इसके विपरीत करता है, वह अपने संप्रदाय की
  819. 44:51क्षति करता है और दूसरे संप्रदायों का
  820. 44:55अपकार करता है। क्योंकि जो कोई अपने
  821. 44:58संप्रदाय की भक्ति में आकर इस विचार से कि
  822. 45:02मैं कैसे अपने संप्रदाय का गौरव बढ़ाऊं
  823. 45:06अपने संप्रदाय की प्रशंसा करें और दूसरे
  824. 45:09के संप्रदाय की निंदा करता है। वह वास्तव
  825. 45:12में
  826. 45:14अपने संप्रदाय को गहरी क्षति पहुंचाता है।
  827. 45:17इसलिए संयम ही अच्छा है।
  828. 45:22इस अर्थ में कि लोग दूसरे के धर्म को
  829. 45:25ध्यान से सुने
  830. 45:27और सुनने के लिए तैयार रह। आचार्य
  831. 45:30विष्णुगुप्त
  832. 45:32राष्ट्र धर्म के वाहक थे।
  833. 45:36वैदिक दर्शन के अनुयाई थे।
  834. 45:40चंद्रगुप्त
  835. 45:42राष्ट्र धर्म के पालक थे। उन्होंने जैन
  836. 45:46दर्शन स्वीकार किया था। राष्ट्रधर्मी
  837. 45:48बिंदुसार
  838. 45:50जैन मत के अनुयाई थे।
  839. 45:54राष्ट्र धर्म को धारण करने वाले
  840. 45:55प्रियदर्शी अशोक बौद्ध दर्शन के अनुयाय
  841. 45:58बने। मैं
  842. 46:01वैदिक धर्म का अनुयाय हूं। पर मेरे लिए
  843. 46:06वेदों से पहले राष्ट्र है। यही मैंने
  844. 46:09शास्त्रों से सीखा है। इसलिए किसी भी
  845. 46:13संप्रदाय को क्षति पहुंचती है
  846. 46:16तो वो राष्ट्र के प्रति आघात है। और यह
  847. 46:22मैं बिल्कुल नहीं सहऊंगा।
  848. 46:30आंसुओं से अपने पितामह को श्रद्धांजलि दे
  849. 46:32रही है।
  850. 46:38बेटे जलसे देते हैं और बेटियां
  851. 46:42आंसुओं से
  852. 46:49फिर क्या हुआ?
  853. 46:51देवी
  854. 46:52देवी
  855. 46:53क्या हुआ? पिता का पत्र आया है। तुम्हारा
  856. 46:56बेटा वसुमित्र दिग्विजय कर पाटलिपुत्र लौट
  857. 46:59आया है। पिता ने हमें यज्ञ के लिए
  858. 47:01पाटलिपुत्र बुलाया है।
  859. 47:05ओम अग्नय स्वाहा
  860. 47:08ओम वरुणाय स्वाहा
  861. 47:11ओम यमााय
  862. 47:12स्वाहा आदित्याय स्वाहा
  863. 47:17शुंगों ने दो बार अश्वमेध यज्ञ किया।
  864. 47:20शुंग काल में ही पतंजलि ने महा भाष्य
  865. 47:23लिखा। और भरुत स्तूप में तोरण द्वार और
  866. 47:27वेदिका को समर्पित किया।
  867. 47:30[संगीत]
  868. 47:59धा
  869. 48:05धन ता धा धन धा ग धा ग धा ग सा सा धा नी
  870. 48:10पा गा मा रे सा नी सा ध सा मा धा नी सा धा
  871. 48:15नी पा रे सा नी सा धन धन सा धा नी रा
  872. 48:21[संगीत]
  873. 48:36[संगीत]
  874. 48:38सा नी प सा
  875. 48:45[संगीत]
  876. 48:45[प्रशंसा]
  877. 48:48[संगीत]
  878. 48:48[प्रशंसा]
  879. 48:50[संगीत]
  880. 49:12दा
  881. 49:14त
  882. 49:16[संगीत]
  883. 49:31सा
  884. 49:34[संगीत]
  885. 49:50[संगीत]

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