Surah Ale -Imran # 3 Ayat 18 - 27 — Transcript
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- 0:00बिस्मिल्लाहहिर्रहमानिर्रहीम
- 0:13नूर
- 0:15किताब
- 0:17मुबीन
- 0:19बेशक तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ से नूर
- 0:21और रोशन किताब आ चुकी है।
- 0:29फल
- 0:33मुकिर
- 0:37मुर
- 0:38और हमने कुरान को समझने के लिए आसान कर
- 0:41दिया है तो कोई है कि सोचे समझे
- 0:45आउजुब्लाह मिन शैत रजीम
- 0:47बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
- 0:50इन अल्हम्दुलिल्लाह नदू वस्तनहु वस्तफिरहु
- 0:55वज बिल
- 0:58सलना
- 1:02फला
- 1:04फला हादला व अशद इलाहा इल्लल्लाहुदहु
- 1:09ला शरी व अशद अन मोहम्मद अबहु व रसूल
- 1:14सल्लल्लाहु अलैह व अला आही व असहाब वारिक
- 1:19वसल्लम
- 1:20अस्सलाम वालेकुम व रहमतुल्लाह व बरकातहू
- 1:24आज देखेंगे
- 1:26सूर आले इमरान जो स्त्री आयत नंबर 18 से
- 1:31आज की आयात में जो सबसे पहली आयत है उसमें
- 1:35अल्लाह ताला ने एक बात की गवाही दी है। अब
- 1:39इससे जरा तसवुर करें कि वो बात किस कदर
- 1:43अहम हो सकती है जिसके बारे में अल्लाह
- 1:45ताला ने खुद गवाही दी। और फिर इल्म वालों
- 1:48का मर्तबा बताया गया कि जो इल्म हासिल
- 1:50करते हैं उनका कितना बड़ा मर्तबा है। और
- 1:53फिर उसके बाद अल्लाह ताला को कौन सा दीन
- 1:57कुबूल है उसका जिक्र है। कौन सा दीन पसंद
- 2:00है उसके बारे में जिक्र है। और फिर अहले
- 2:03किताब का जिक्र है। यहूद और नसारा का।
- 2:06उनकी जो खराबियां, उनकी जो बीमारियां हैं,
- 2:09जो उनकी झूठी आरजुएं थी, जो उनकी सरकशी
- 2:12थी, उसका जिक्र किया गया। और फिर एक बहुत
- 2:15ही बेहतरीन और खूबसूरत दुआ है। तो उसको
- 2:18सीखेंगे भी और उसको याद भी जरूर करने की
- 2:21कोशिश करेंगे। और फिर उसके बाद अल्लाह
- 2:24ताला की अजीमोशान कुदरतों का बयान है।
- 2:29तो आयत नंबर 18 से शुरू करते हैं। इसकी
- 2:31तिलावत सुनिए।
- 2:34शद्लाहु
- 2:36अनहु
- 2:39इलाहा इल्लाहु
- 2:41मत
- 2:44उल इल
- 2:48बिल किस ला
- 2:52इलाहा इल्लाहु अज़जुल हकीम
- 3:00अल्लाह ने गवाही दी है कि उसके सिवा का
- 3:03कोई माबूद नहीं। फरिश्तों और अहले इल्म ने
- 3:06भी गवाही दी है। और वह अदल को कायम रखने
- 3:10वाला है। उस गालिब और हिकमत वाले के सिवा
- 3:14कोई इबादत के लायक नहीं।
- 3:17शहीद अल्लाहहु गवाही दी अल्लाह ताला ने।
- 3:21और यहां पर गवाही से मुराद है बयान करना
- 3:25या आगाह करने के माने हैं। और अल्लाह ताला
- 3:29ने शहादत दी है और अल्लाह ताला ही गवाह
- 3:32काफी है। और शहादत देने वालों में सबसे
- 3:36सच्चा और सबसे आदिल और सबसे सच्ची बात
- 3:41फरमाने वाला अल्लाह सुभाना ताला है।
- 3:43अल्लाह ताला ने खुद इस बात की गवाही दी।
- 3:46अल्लाह ताला ने खुद इस अपने बारे में
- 3:49गवाही दी। अल्लाह ताला खुद अपने बारे में
- 3:52कहता है कि मैं गवाही दे रहा हूं कि मेरे
- 3:55अलावा कोई हकीकी माबूद नहीं है।
- 4:00ला इलाहा इल्लाहु के अल्लाह ताला फरमा रहा
- 4:03है कि उसके अलावा कोई भी माबूद बरहक नहीं
- 4:09है। और यह गवाही अल्लाह ताला के साथ-साथ
- 4:13वल मलाईत और फरिश्तों ने भी गवाही दी इस
- 4:16बात की व उलुल इल्म और इल्म वालों ने भी
- 4:21तो यह बहुत बड़ी गवाही है। अल्लाह ताला की
- 4:25गवाही तो इस लिहाज से बहुत ज्यादा अहम है।
- 4:30बहुत ज्यादा मोहतबर है कि वह खुद तमाम
- 4:33कायनात का खालिक है। पैदा करने वाला है।
- 4:37और उसे ठीक-ठीक इल्म है कि इस कायनात की
- 4:41पैदाइश में इसकी तखलीक में, इसकी तदबीर
- 4:44में कोई भी उसका शरीक नहीं। तो, यह एक
- 4:48दलील है कुरान से कि अगर कोई कहे कि
- 4:52अल्लाह ताला के सिवा कोई माबूद नहीं, इसकी
- 4:54क्या दलील है? तो दलील यह है कि अल्लाह
- 4:57ताला ने खुद इसके बारे में गवाही दी है
- 5:01और इससे बड़ी क्या गवाही हो सकती है
- 5:06यानी अल्लाह ताला ने जो कुछ पैदा किया और
- 5:09बयान किया उसके जरिए से उसने अपनी
- 5:13वाहदानियत की तरफ हमारी रहनुमाई फरमाई कि
- 5:17इबादत के लायक इलाहा सिर्फ और सिर्फ माबूद
- 5:22बरहक सिर्फ और सिर्फ अल्लाह सुभान ताला
- 5:25और फिर फरमाया फरिश्ते और अहले इल्म भी
- 5:29इसकी तौहीद की गवाही देते हैं। फरिश्ते और
- 5:32इल्म वाले जो कुरान और हदीस का सही इल्म
- 5:35रखते हैं वो भी अल्लाह ताला की तौहीद की
- 5:39गवाही देते हैं। तो इसमें देखें कि एक तो
- 5:42जो इल्म वाले हैं उनकी बड़ी फज़ीलत और अजमत
- 5:47इसमें बताई गई है कि अल्लाह ताला ने अपने
- 5:50और फरिश्तों के नामों के साथ उनका भी
- 5:53जिक्र फरमाया।
- 5:55उनका भी जिक्र फरमाया कि अल्लाह ताला
- 5:57गवाही देता है। फरिश्ते गवाही देते हैं और
- 6:00इल्म वाले भी। तो इससे पता चलता है। इससे
- 6:03अंदाजा लगाया जा सकता है कि इल्म वालों का
- 6:07कितना मुकाम बुलंद है। क्या ही उनकी शान
- 6:11है कि अल्लाह ताला ने उनका भी जिक्र यहां
- 6:14पर फरमाया। तो अगर हम भी इल्म वालों में
- 6:18शामिल होना चाहते हैं। जो इस आयत में
- 6:20अल्लाह ताला ने जो अहले इल्म का जिक्र
- 6:22किया है तो फिर हमें क्या करना है? तो
- 6:25हमें अल्लाह ताला को जानना है। अल्लाह
- 6:28ताला की मारफत लेना है। तौहीद का इल्म
- 6:32लेना है। अल्लाह ताला के बारे में कि
- 6:34अल्लाह ताला के सिवा कोई इलाहा नहीं।
- 6:37तौहीद को जानना है तो फिर इंशा अल्लाह
- 6:40आपका भी शुमार उन्हीं लोगों में हो जाएगा
- 6:44जिनका जिक्र अल्लाह ताला ने इस आयत में
- 6:46किया है। तौहीद का इल्म हासिल करना हर
- 6:51किसी के लिए लाजमी है। यह ऐसा इल्म है कि
- 6:55जिसके पास ये तौहीद की दौलत होगी तो
- 6:57अल्लाह ताला उसके दर्जात को दुनिया में भी
- 6:59बुलंद फरमाते हैं। इज्जत से भी नवाजते हैं
- 7:02और आखिरत में उसके लिए नजात है। जिसके पास
- 7:06तौहीद होगी कयामत के रोज जिसके पास अकीदा
- 7:09तौहीद जिसका दुरुस्त होगा अगर फिर भी अगर
- 7:12उसके आमाल में कोई कोहताइए हैं कोई गुनाह
- 7:15हो सकते हैं लेकिन उसके अकीदे में कोई
- 7:18बिगाड़ नहीं था उसने कोई शिर्क नहीं किया
- 7:20उसने अल्लाह के सिवा किसी को नहीं पुकारा
- 7:23अल्लाह ताला के सिवा किसी के आगे उसने
- 7:24सजदे नहीं किए उसका अगर अकीदा दुरुस्त रहा
- 7:28तो अल्लाह सुभान ताला उसकी उन गुनाहों को
- 7:31अल्लाह ताला दरगुज़र फरमाएंगे और अल्लाह
- 7:34ताला इस तौहीद की वजह से अल्लाह ताला उसको
- 7:36जन्नत में दाखिल फरमाएंगे। लेकिन अगर ढेर
- 7:40सारे नेक आमाल भी हो लेकिन तौहीद में अगर
- 7:43बिगाड़ हो अगर किस कोई शिर्क करे उसकी
- 7:46तौहीद में शर्क की मिलावट हो तो फिर इस
- 7:49सूरत में उसके लिए नजात नामुमकिन है। तो
- 7:53तौहीद इसीलिए इस कदर अहम है कि अल्लाह
- 7:56ताला ने खुद इस बात की गवाही दी कि उसके
- 7:59सिवा कोई इलाहा नहीं। इलाहा कौन होता है?
- 8:02कौन माबूद होता है? जो पैदा करने वाला है,
- 8:05जो रिज़्क देने वाला है, जो खिलाता पिलाता
- 8:08है, जिसे कभी नहीं मौत आती, जो हर चीज को
- 8:11कायम रखने वाला है, वो ही माबूदे बरहक है।
- 8:16तो वो अगर माबूदे बरहक है, तो तमाम चीजें
- 8:20क्या है? उसकी मखलूक है।
- 8:23और लोग जहालत में इल्म की कमी की वजह से
- 8:26अल्लाह ताला की मखलूक को ही अल्लाह ताला
- 8:30के बंदों को ही अल्लाह के बराबर लाके खड़ा
- 8:33कर देते हैं। अल्लाह ताला पाक है इन तमाम
- 8:35चीजों से। तो यह तौहीद का इल्म इस कदर अहम
- 8:39है कि यह इल्म जिस किसी के पास है अल्लाह
- 8:42ताला उनको नजात अता फरमाता है। दुनिया में
- 8:45भी अल्लाह ताला उनको बहुत चीजों से
- 8:48बुलंदियों से नवाजता है। और यह इल्म अगर
- 8:51किसी के पास नहीं है तौहीद का इल्म। वो
- 8:54जानता ही नहीं कि अल्लाह ताला है कौन।
- 8:57तौहीद ही नहीं पता तो वो चाहे इस दुनिया
- 9:00की जिंदगी में कितना ही बड़ा पढ़ा लिखा
- 9:04क्यों ना हो। कितनी ही डिग्रियां उसके पास
- 9:06क्यों ना हो। कितनी ही पीएचडी डिग्रियां
- 9:09कि कितना बड़ा डॉक्टर या इंजीनियर जो कुछ
- 9:13भी हो कितना भी पढ़ा लिखा हो। लेकिन अगर
- 9:15तौहीद का इल्म नहीं है तो यह सबसे बड़ा
- 9:19जाहिल है।
- 9:21इल्म वालों का अल्लाह ताला ने यहां पे
- 9:23जिक्र करके अल्लाह ताला ने इल्म की अहमियत
- 9:26को वाज़ किया कि जो कुरान और हदीस का इल्म
- 9:30लेते हैं। जो तौहीद का इल्म लेते हैं। तो
- 9:32देखें इल्म के बारे में कितनी सारी अहदीस
- 9:35आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बताई कि जो
- 9:38इल्म हासिल करते हैं। कुरान और हदीस का
- 9:41इल्म। फरिश्ते उनके लिए अपने परों को बिछा
- 9:44देते हैं। और समंदर की जितनी मछलियां हैं
- 9:49और जितनी चींटिए हैं सब उनकी मगफिरत की
- 9:52दुआएं करते हैं। और जो कोई इस इल्म के
- 9:55रास्ते पर चलेगा अल्लाह ताला उसके लिए
- 9:57जन्नत का रास्ता आसान फरमा देते हैं।
- 10:01अल्लाह ताला की नजर में इल्म वाले और बगैर
- 10:04इल्म वाले बराबर नहीं है। इल्म वालों की
- 10:08शान है। इल्म वालों का मर्तबा है। और
- 10:11अल्लाह ताला चुनता है। जिसके लिए अल्लाह
- 10:14ताला भलाई भलाई का इरादा फरमाता है,
- 10:17उन्हें ही अल्लाह ताला यह दीन की समझ अता
- 10:19फरमाता है। और हमें यह इल्म हासिल करने की
- 10:24के की दुआएं भी सिखाई गई हैं। और फिर
- 10:28फरमाया, वह इंसाफ के साथ कायम है। यानी
- 10:32अल्लाह ताला इंसाफ के साथ कायम है। ला
- 10:36इलाहा इल्लाहु उसके सिवा कोई लायक इबादत
- 10:41नहीं। वो इंसाफ के साथ कायम है। वो जुल्म
- 10:44नहीं करता। वो अपने तमाम कामों में तमाम
- 10:48चीजों में अल्लाह ताला इंसाफ के साथ कायम
- 10:51है। किसी पर जुल्म और जियादती नहीं करता।
- 10:54और वो अल अजीज है, अल हकीम है। निहायत
- 10:58गालिब और खूब हिकमत वाला है। यानी वो इस
- 11:02कदर गालिब है कि अजमत वो किबियाई में इसका
- 11:07कोई मुकाबला नहीं कर सकता। और उसके तमाम
- 11:11कामों में हिकमत है।
- 11:14उसके तमाम फैसले अदल पर मबनी है। उसकी
- 11:19शरीयत जो उसने शरीयत दी है, वह भी अदल पर
- 11:22मबनी है। जो उसके तकदीर के फैसले हैं, वह
- 11:26भी अदल पर है। उसके हर फैसले में इंसाफ
- 11:30है। और वह अल अजीज है कि ना कोई उससे कोई
- 11:35पूछ सकता है, ना कोई उसे रोक सकता है, ना
- 11:39ही कोई उस पर कोई दबाव डाल सकता है। वो सब
- 11:43पर गालिब है। फिर फरमाया कि उसको कौन सा
- 11:49दीन कबूल है।
- 11:53इन दी
- 11:57इस्लाम
- 12:00वज़ना
- 12:03किताब इला
- 12:07जा
- 12:09इल्म
- 12:13वफ
- 12:15आयातला
- 12:17फ इन अल्लाह स
- 12:24बेशक अल्लाह ताला के नजदीक दीन इस्लाम ही
- 12:28है। और अहले किताब ने अपने पास इल्म आ
- 12:33जाने के बाद आपस की सरकशी और हसद की बिना
- 12:37पर ही इख्तलाफ किया है। और अल्लाह ताला की
- 12:40आयतों के साथ जो भी कुफ करे अल्लाह ताला
- 12:43उसका जल्द हिसाब लेने वाला है।
- 12:48इस आयत में अल्लाह ताला ने इस बात को वाज़
- 12:51तौर पर बयान कर दिया कि वह इस्लाम के सिवा
- 12:54किसी और दीन को कुबूल नहीं फरमाएगा। और
- 12:58इस्लाम वही दीन है जिसकी दावत और तालीम हर
- 13:02पैगंबर अपने-अपने दौर में देते रहे हैं।
- 13:07तो ईमान इस्लाम और दीन यह है कि अल्लाह
- 13:11ताला को एक माना जाए। उसके साथ किसी को ना
- 13:14शरीक करें। सिर्फ उसी की इबादत की जाए और
- 13:18रसूल्लाह सल्ला अल वसल्लम के साथ तमाम
- 13:21अंबिया पर ईमान लाया जाए। जिन्हें अल्लाह
- 13:25ताला ने मुख्तलिफ औकात में मबूस फरमाया
- 13:28था। हत्ता के उन सब के आखिर में अल्लाह
- 13:32ताला ने खातिमुल अंबिया मोहम्मद
- 13:34सल्लल्लाहु अलह वसल्लम को मबूस फरमाया और
- 13:37मोहम्मद सल्लल्लाहु अल वसल्लम के रास्ते
- 13:39के सिवा अपने तक पहुंचने के तमाम रास्तों
- 13:43को बंद कर दिया। लिहाजा मोहम्मद सल्लल्लाह
- 13:46वसल्लम के आ जाने के बाद कोई आपके दीन व
- 13:51शरीयत के सिवा किसी और दीन और शरीयत के
- 13:54साथ अल्लाह ताला के पास अगर जाएगा तो उसे
- 13:58कुबूल नहीं किया जाएगा। जिस तरह से आले
- 14:01इमरान आयत नंबर 85 में भी अल्लाह ताला ने
- 14:03फरमाया तर्जुमा है और जो शख्स इस्लाम के
- 14:06सिवा किसी और दीन का तालिब होगा वो उसे
- 14:10हरगिज़ कुबूल नहीं किया जाएगा। और हदीस में
- 14:14है नबी सल्लल्लाह अल वसल्लम ने फरमाया कसम
- 14:17है उस जात की जिसके हाथ में मेरी जान है
- 14:21जो यहूदी या नसरानी मुझ पर ईमान लाए बगैर
- 14:24फौत हो गया वो जहन्नमी है और आप सल्लल्लाह
- 14:28अलैहि वसल्लम तमाम इंसानों के लिए नबी
- 14:31बनाकर भेजे गए हैं। इसीलिए आप सल्लल्लाहु
- 14:34अलैहि वसल्लम अपने वक्त पर आप तमाम
- 14:37बादशाहों को खत लिखकर उनको इस्लाम की दावत
- 14:41देते थे। तो तमाम अंबियाओं पर ईमान जरूर
- 14:45है लेकिन अकीदा और आमाल इख्तियार करने के
- 14:50लिए जो तरीका जिस तरह से कुरान और हदीस
- 14:52में बयान किया गया है सिर्फ उसी पर अमल
- 14:55किया जाएगा।
- 14:57इसके अलावा कोई और तरीके को अल्लाह ताला
- 15:01कुबूल नहीं फरमाएगा। अल्लाह ताला के पास
- 15:04इस्लाम के सिवा कोई और दीन कोई और तरीके
- 15:08को अल्लाह ताला कुबूल नहीं फरमाएगा। तो
- 15:11जरा यहां पर एक बात यह भी समझने की है
- 15:14क्योंकि यहां जिस तरह से दीन की बात आई है
- 15:17तो एक यहां पर ना हमें एक अपनी सोच बदलने
- 15:21की जरूरत है। हम दीन और दुनिया को बिल्कुल
- 15:24अलग कर देते हैं। तो दीन सिर्फ यह नहीं है
- 15:27कि मस्जिदों में, मदरसों में या सिर्फ
- 15:30नमाज, रोजा और जिक्र जिक्र तक महदूद है।
- 15:34दीन सिर्फ यह नहीं है बल्कि ये भी दीन में
- 15:37शामिल है जो हमारी जिंदगी के मामलात हैं।
- 15:41दीन हमें हमारी जिंदगी के हर मामले में
- 15:44रहनुमाई फरमाता है। तो लिहाजा दुनिया की
- 15:49जिंदगी को हम दीन से अलग नहीं कर सकते।
- 15:53हमारी जिंदगी का हर मामला दीन इस्लाम की
- 15:57तालीमात के मुताबिक होना चाहिए। हमारे
- 16:01कारोबार, हमारे शादी ब्याह के मौके हैं।
- 16:04हमारा उठना, बैठना, हमारा पहनना, ओढ़ना,
- 16:09चलना, फिरना, हमारा खाना पीना, हमारी
- 16:12खुशियों और गमों का जो तरीका है, यह सब
- 16:15इस्लाम के बताए हुए तरीके से होना चाहिए।
- 16:20यही तो हमारे इस्लाम की असल खूबसूरती है
- 16:24कि इबादत के तरीकों के साथ-साथ हमें
- 16:28जिंदगी गुजारने का भी तरीका बताया गया है
- 16:32और अल्लाह ताला को यही दीन कुबूल है। अब
- 16:38फिर अहले किताब का रवैया बताया गया कि
- 16:41इल्म आ जाने के बाद भी इन्होंने इख्तलाफ
- 16:44किया। हालांकि होना क्या चाहिए था कि इल्म
- 16:47आ गया सब पता चल गया हक सामने है अब तो
- 16:51कोई इख्तलाफ नहीं होना चाहिए था लेकिन
- 16:53अहले किताब यहूद और नसारा के पास इल्म आ
- 16:56गया उनको पता है हक सामने है लेकिन फिर भी
- 16:59उन्होंने इख्तलाफ किया और वजह क्या बताई
- 17:02सरकशी और हसद और ज़िद की वजह से वाकई ऐसी
- 17:07चीजें हैं ना जब इंसान में ज़िद आ जाए हसद
- 17:09आ जाए तकब्ुर आ जाए सरकशी आ जाए तो सामने
- 17:13हक होते हुए भी इंसान फिर मानता नहीं है।
- 17:16तो यहूद और नसारा की वही यहां पर इस बात
- 17:19को बताया गया कि इल्म आ जाने के बाद
- 17:23इन्होंने इख्तलाफ किया। एक तो यहूदियों का
- 17:26आपस में खुद इख्तलाफ है। हालांकि ये एक ही
- 17:30दीन पर है। लेकिन फिर भी इनकी बनती नहीं
- 17:33है। फिर भी आपस में इनमें इख्तलाफ है। और
- 17:36फिर यह आपस में इख्तलाफ की वजह से फिर यह
- 17:38ग्रुप्स में बट गए। और ईसाइयों का भी यही
- 17:41हाल है। एक ही दीन पर होते हुए भी इनमें
- 17:44भी इख्तलाफ है। और यह भी फिर इन्होंने भी
- 17:48फिरकाबाजियां कर ली। ये भी ग्रुप्स में
- 17:50बंट गए। और फिर वो इख्तलाफ भी है जो इन
- 17:53दोनों अहले किताब के दरमियान है। यहूद और
- 17:57नसारा के दरमियान। जिसकी बिना पर फिर
- 18:00यहूदी नसरानियों को और नसरानी क्या करते
- 18:03हैं? यहूदियों को कहा करते थे कि तुम तो
- 18:05किसी चीज पर नहीं हो।
- 18:08यानी तुम तो हक पर नहीं हो। तुम तो किसी
- 18:11चीज पर नहीं हो। सच हक पर तो हम हैं।
- 18:13हमारा दीन सही है। तो यहूद और नसारा की
- 18:17यहां पे जो बात बताई गई कि इन्होंने हक को
- 18:21देखने के बाद, हक को जान लेने के बाद,
- 18:24पहचान लेने के बाद सिर्फ ज़िद और अपने
- 18:27दुनियावी फायदे के लिए वह अपनी गलत बात पर
- 18:31जमे रहे। और उसी को वो लोगों को दिखाते
- 18:35रहे कि वह सही दीन पर है ताकि उनकी नाक
- 18:40ऊंची रहे। तो फरमाया कि जो शख्स अल्लाह
- 18:44ताला की आया आयतों को ना माने। अल्लाह
- 18:46ताला की आयतों को झुठलाए। अल्लाह ताला की
- 18:49आयतों से कुफर करे। ये कौन सी आयात है?
- 18:52यहां पर वो आयात मुराद है जो इस्लाम के
- 18:56अल्लाह ताला की तरफ से दीन होने पर दलालत
- 19:00करती है कि इस्लाम ही अल्लाह ताला की तरफ
- 19:02से सच्चा दीन है। तो ऐसी आयत को जान लेने
- 19:07के बाद अगर इसका इंकार करते हैं, झुठलाते
- 19:10हैं तो फरमाया फ इनल्लाह सरी उल हिसाब तो
- 19:13बेशक अल्लाह ताला जल्द हिसाब लेने वाला
- 19:17है। अल्लाह ताला उसे उसके बदले में सजा
- 19:21देगा और अपनी तकजीब और झुठलाने का अल्लाह
- 19:26ताला मुहासिबा फरमाएगा और अपनी किताब पर
- 19:29जो उन्होंने अल्लाह ताला की किताब की
- 19:31मुखालिफत की थी उस पर सजा देगा। अल्लाह
- 19:34ताला हम सबका आसान हिसाब फरमाए।
- 19:38तो जरा देखें इस आयत से कहीं ना कहीं यही
- 19:42सूरते हाल आज इस उम्मत में भी मौजूद है।
- 19:46क्या रवैया बताया गया इस आयत में यहूद और
- 19:49नसारा का कि उनके बाद उनके पास हक आ जाने
- 19:52के बाद भी उन्होंने इंकार किया उसको माना
- 19:56नहीं। सिर्फ अपनी ज़िद की वजह से। तो यही
- 19:59चीज आज इस उम्मत में भी देखेंगे। रसूल्लाह
- 20:02सल्ला वसल्लम ने फरमाया यह उम्मत कदम ब
- 20:05कदम यहूद और नसारा के नक्शे कदम पर चलेगी।
- 20:09तो देख लें वही हो रहा है कि जो बीमारियां
- 20:12जो खराबियां यहूद और नसारा में थी वही
- 20:16खराबियां वही बीमारियां आज हमारे अंदर भी
- 20:19मौजूद होती चली जा रही है। हालांकि हमें
- 20:22क्या सिखाया गया कि अगर इख्तलाफ हो तो
- 20:25क्या करना है? कुरान और हदीस से रुजू करना
- 20:28है। कुरान और हदीस की तरफ पलटना है। तो जब
- 20:32इख्तलाफ कोई चीज किसी चीज में आ जाता है।
- 20:35अगर आज हम किसी मुसलमान को अगर बताएं
- 20:37कुरान और हदीस का के दलाइल देकर भी बताएं
- 20:40तो वह मानने से इंकार कर देते हैं। और वजह
- 20:44वही होती है कि बस जििद में आकर कि बस
- 20:48मानना नहीं। अपने कोई दुनिया के फायदे की
- 20:51वजह से उस चीज को मानना नहीं। तो यहूद और
- 20:54नसारा की बात यहां पर बताई। अल्लाह ताला
- 20:57से हम सब यही दुआ करते हैं कि यह बीमारी
- 21:00यह खराबी से अल्लाह ताला हम सब की हिफाजत
- 21:02फरमाए। जब कुरान और हदीस की बात हमारे
- 21:06सामने आ जाए। जब इल्म हमारे पास आ जाए तो
- 21:10हमें उसे ले लेना चाहिए। उसे मान लेना
- 21:12चाहिए। उसके बाद भी फिर कोई इख्तलाफ नहीं
- 21:15होना चाहिए। अल्लाह ताला हम सबको कामिल
- 21:18ईमान अता फरमाए। आमीन या रब। और उसके बाद
- 21:22अब आयत नंबर 20
- 21:30असम्लाह
- 21:33व
- 21:35कुल
- 21:38किताब व
- 21:41असलम तुम असलम फद
- 21:46इन तव फ इन
- 21:50अल बला
- 21:54व्लाहु बसी
- 21:57इबा
- 22:01ऐ नबी फिर अगर वो आपसे झगड़ा करें तो कह
- 22:05दीजिए मैंने अपना सर अल्लाह ताला के आगे
- 22:07झुका दिया है और मेरी इत्तबा करने वालों
- 22:10ने भी और इन अहले किताब और अनपढ़ लोगों से
- 22:14पूछें क्या तुम इस्लाम लाते हो फिर अगर वह
- 22:18इस्लाम कबूल कर लें तो वह हिदायत पा गए और
- 22:21अगर मुंह मोड़े तो आपके जिम्मे सिर्फ पैगाम
- 22:25पहुंचाना है और अल्लाह ताला अपने बंदों को
- 22:28खूब देख रहा है।
- 22:32फिर अल्लाह ताला ने अपने बंदे अपने रसूल
- 22:36मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को हुक्म
- 22:38दिया कि आप अहले किताब यहूद और नसारा और
- 22:42अनपढ़ लोग यानी मुशरिकने अरब इन तीनों को
- 22:47दीन की दावत दें। दीन की दीन शरीयत दीन और
- 22:51शरीयत में दाखिल होने की दावत दें। तो
- 22:54वाकई रसूल अल्लाह सल्ला वसल्लम ने यह
- 22:57हुक्म को बजा लाया। सही बुखारी की हदीस है
- 23:01कि नबी सल्लल्लाह वसल्लम ने दुनिया के
- 23:03बादशाहों और फिर मुख्तलिफ इंसानी गिरोहों
- 23:08यानी अरब हो या गैर अरब है अहले किताब और
- 23:12अनपढ़ लोगों को रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु
- 23:14अलैहि वसल्लम ने खत लिखकर दीन इस्लाम की
- 23:18दावत दी अल्लाह ताला के इस हुक्म पर और आप
- 23:21सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया मुझे
- 23:23हर सुर्ख वसिया की तरफ भेजा गया है और
- 23:27दूसरी हदीस में है कि हर नबी को खास उसकी
- 23:30कौम की तरफ भेजा जाता था। जबकि मुझे तमाम
- 23:35लोगों की तरफ भेजा गया है। तो आप
- 23:37सल्लल्लाह अलह वसल्लम ने सबको दीन इस्लाम
- 23:41की दावत दी। हर किसी तक यह पैगाम
- 23:44पहुंचाया। और इसी पर अल्लाह सुभाना ताला
- 23:47ने फरमाया कि आपका काम तो सिर्फ अल्लाह
- 23:51ताला का पैगाम पहुंचा देना है। और अगर वह
- 23:54नहीं मानते वो नहीं ईमान लाते तो अल्लाह
- 23:57ताला के जिम्मे उनका हिसाब है।
- 24:01और यह आयत इस बात की दलील है कि इस्लाम ही
- 24:04हिदायत का रास्ता है। अल्लाह ताला ने अपने
- 24:08नबी से कहा कि पूछे उनसे अहले किताब से
- 24:11पूछे मुशरिकन अरब से पूछें कि क्या तुम
- 24:14इस्लाम लाते हो? अगर वह इस्लाम कुबूल कर
- 24:18ले तो वो हिदायत पा गए। तो यही हिदायत का
- 24:20रास्ता है। दीन इस्लाम ही हिदायत का
- 24:23रास्ता है।
- 24:25व्लाहु बसीरु बिल इबाद। और अल्लाह ताला
- 24:28अपने बंदों को देख रहा है। यानी वह जानता
- 24:31है कि कौन हिदायत का मुस्तहक है और कौन
- 24:35गुमराही का मुस्तहक है।
- 24:40इन
- 24:42यफ आया
- 24:45वतुल
- 24:47नबी
- 24:49हतन
- 24:54बिलस
- 24:57फ
- 25:02अलीम
- 25:06जो लोग अल्लाह ताला की आयतों से कुफ करते
- 25:09हैं और नाहक नबियों को कत्ल कर डालते हैं।
- 25:13और जो लोग अदल और इंसाफ की बात कहें
- 25:15उन्हें भी कत्ल कर डालते हैं। तो ऐ नबी
- 25:18उन्हें दर्दनाक अज़ाब की खबर दे दीजिए।
- 25:23अहले किताब अपनी सरकशी में, अपनी ज़िद,
- 25:27अपनी तकब्बुर, अपनी बगावत में इस हद तक
- 25:30पहुंच चुके थे कि वह नबियों का इंकार ही
- 25:34नहीं बल्कि नाहक नबियों का कत्ल भी कर
- 25:38दिया करते थे। बगैर किसी सबब के। हालांकि
- 25:42नबी कौन थे? नबी वह जो अल्लाह ताला का
- 25:45पैगाम इन तक पहुंचाते थे। इन्हें भलाई का
- 25:48हुक्म देते थे, बुराइयों से रोकते थे।
- 25:51उन्हीं नबियों को इन्होंने नाहक कत्ल
- 25:54किया। और नबियों को ही नहीं नबियों को ही
- 25:57नहीं बल्कि वो लोग जो इनको अदल और इंसाफ
- 26:01की बात करते थे। ऐसे लोग जो इन्हें इंसाफ
- 26:04का हुक्म देते थे। जो इन्हें अच्छी और
- 26:07सच्ची बात कहते थे। बुरी चीजों से रोकते
- 26:10थे। ऐसे लोगों को भी उन्होंने कत्ल कर
- 26:12दिया। नबियों के साथ-साथ लोगों को भी कत्ल
- 26:16किया। वो जो मोमिनीन हैं, मुखलिसीन हैं,
- 26:19जो जो हक के दाई हैं, जो हक के दाई हैं
- 26:24उनको तक इन्होंने मार दिया। और यह तकब्बुर
- 26:28की इंतहा है। इस कदर उनमें तकुर था कि
- 26:31नबियों के साथ-साथ ऐसे लोगों को भी
- 26:34उन्होंने मार डाला। और तकब्बुर क्या है?
- 26:36तकब्बुर के बारे में आप सल्लल्लाह वसल्लम
- 26:39ने फरमाया तकुर हक को हटधर्मी से ना मानना
- 26:43यानी ज़िद की वजह से नहीं मानना सच को हक
- 26:47को नहीं मानना और लोगों को हकीर जानना
- 26:51लोगों को हमसे अपने से कमतर समझना यही वजह
- 26:55कि इन्होंने फिर तकब्बुर का इज़हार करते
- 26:58हुए हक से मुंह मोड़ा इन्होंने अहले किताब
- 27:01ने और अल्लाह ताला की मखलूक को हकीर समझा
- 27:05तो फिर अल्लाह ताला ने भी इन्हें दुनिया
- 27:07में जिल्लत और रुसवाई और आखिरत में फिर
- 27:10अल्लाह ताला उन्होंने उनके लिए रुसवाक
- 27:13अज़ाब रखा है। फरमाया फबिन
- 27:16अलीम यानी इनको दुख देने वाला और जलील व
- 27:21रुसवा कर देने वाला अज़ाब की खुशखबरी सुना
- 27:24दे।
- 27:27उज़ाल
- 27:33दुनिया व आखिर वहुरीन
- 27:42इनके आमाल दुनिया और आखिरत में गारत है और
- 27:46इनका कोई मददगार नहीं। यानी यह ऐसे लोग
- 27:50हैं जिनके आमाल दुनिया और आखिरत दोनों में
- 27:53बर्बाद है और इनका कोई मददगार नहीं होगा।
- 27:58और फिर अहले किताब की एक और सरकशी का
- 28:01जिक्रम
- 28:09किताब
- 28:11इला किताब्लाहु
- 28:15तुम
- 28:18फरी
- 28:21मुब
- 28:25क्या आपने उन्हें नहीं देखा जिन्हें एक
- 28:28हिस्सा किताब का दिया गया है। वह अपने आपस
- 28:31के फैसलों के लिए अल्लाह ताला की किताब की
- 28:33तरफ बुलाए जाते हैं। फिर भी एक जमात उनकी
- 28:37मुंह फेर कर लौट जाती है। तो यहां अहले
- 28:41किताब यहूद और नसारा के बारे में बताया
- 28:44गया कि वह अल्लाह ताला के किताब के
- 28:47मुताबिक फैसला नहीं करते और उसकी वजह अगली
- 28:49आयत में बताई गई। तो यहूद और नसारा अहले
- 28:53किताब से कहा जा रहा है कि भाई जो आसमानी
- 28:55किताबें तुम्हें दी गई तरात और इंजील उसी
- 28:59के मुताबिक जो तुम्हारी किताब की तालीमात
- 29:02है उसी के मुताबिक तुम अल्लाह ताला की
- 29:04इतात करो और मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि
- 29:07वसल्लम की इत्तेबा करो क्योंकि उनकी
- 29:09किताबों में खुद लिखा था रसूल अल्लाह
- 29:12सल्लल्लाह वसल्लम की खुशखबरी दी गई थी और
- 29:14वह बेसब्री से इंतजार भी कर रहे थे तो वही
- 29:17उनसे कहा गया कि कहा गया कि तुम्हारी
- 29:19किताबों में खुद कि अल्लाह की इतात करो और
- 29:22रसूल सल्लल्लाह वसल्लम की इत्तेबा करो। तो
- 29:25उन्होंने क्या किया? तर और इंजील से
- 29:27उन्होंने मुंह फेरा और एरा किया। और
- 29:31यहूदियों का तो यह हाल था कि अक्सरियत
- 29:34उनमें से इस्लाम कबूल करने से महरूम रही।
- 29:37और वो इस्लाम के साथ, मुसलमानों के साथ,
- 29:40नबी सल्लल्लाह वसल्लम के साथ, मकर में,
- 29:43चाले चलने में, साजिशें करने में वो मशरूफ
- 29:46रहे।
- 29:47अब आगे की आयत में वजह बताई गई कि वह
- 29:51क्यों इस वजह से करते थे। क्यों अल्लाह
- 29:53ताला की किताब के मुताबिक उन्होंने फैसला
- 29:55नहीं किया।
- 30:03तस
- 30:05इमूद
- 30:12व
- 30:14दीन
- 30:21ये इस वजह से है कि उन्होंने कहा हमें आग
- 30:25चंद दिनों के सिवा हरगिज़ नहीं छुएगी। गी
- 30:28और उनको उनके दीन की बाबत इन बातों ने
- 30:31धोखे में डाल रखा है जो वह खुद घड़ते
- 30:34[गला साफ़ करने की आवाज़] हैं।
- 30:36अल्लाह ताला की किताब के मानने से एराज की
- 30:40वजह बताई गई उनका यह बाततिल अकीदा यह उनकी
- 30:44मनघड़त बातें कि वो क्या गुमान करते हैं?
- 30:48पहले तो वह यह गुमान करते हैं कि वह
- 30:50जहन्नुम में जाएंगे ही नहीं। कहां हमें
- 30:54भेजा जाएगा? हम अंबिया की औलाद में से
- 30:56हैं। हम बड़े लाडले हैं। हम अल्लाह के
- 30:59बड़े चहीते हैं। हमें तो जहन्नुम में कभी
- 31:02नहीं डाला जाएगा। और अगर डाला भी जाएगा
- 31:05अगर हम जहन्नुम में चले भी गए तो उनका
- 31:07गुमान तो यही था कि चंद दिन के लिए जाएंगे
- 31:10फिर हमें जहन्नुम से निकाल लिया जाएगा। तो
- 31:13यह इनकी मनगढ़ंत बातें थी। और यही बातों
- 31:16ने उन्हें धोखे और फरेब में डाला रख डाले
- 31:19रखा। और ऐसे ही होता है कि जब इंसान के
- 31:22दिल दिल से खौफ निकल जाए, पकड़ और सजा का
- 31:27जब डर ना हो तो फिर इंसान क्या है किसी
- 31:30चीज का पाबंद नहीं होता। फिर हर चीज को
- 31:32बड़ी आसानी से ले लेता है। जैसे इन्होंने
- 31:35कहा अहले किताब ने कहा अगर हम गए भी
- 31:38जहन्नुम में तो कुछ दिन के लिए जाएंगे।
- 31:40फिर हमें निकाल लिया जाएगा। बड़ी आसानी से
- 31:43उन्होंने कह दिया। हालांकि जहन्नुम में एक
- 31:46लम्हा गुजारना भी नाकाबिल बर्दाश्त है। वह
- 31:51जहन्नुम तो ऐसी जहन्नुम है कि जिसको दूर
- 31:54से देखकर ही सब घुटनों के बल गिर पड़ेंगे।
- 31:59सब घुटनों के बल गिर पड़ेंगे और उस दिन
- 32:03जहन्नुम को देखकर पैगंबर औलिया सालहीन सब
- 32:07नफसी नफसी पुकारेंगे। सबको बस यह होगा कि
- 32:11आज मेरे साथ क्या मामला होगा। कोई उस
- 32:14जहन्नुम में लम्हा भर भी जाना पसंद नहीं
- 32:17करेगा। सिर्फ जहन्नुम को देखकर यह हाल है।
- 32:21और हदीस में आता है कि जब एक इंसान को
- 32:26जहन्नुम में एक गौता दिया जाएगा। जहन्नुम
- 32:29में एक गौता और फिर उससे पूछा जाएगा कि
- 32:32तुमने कभी कोई आसानी राहत आराम देखा है?
- 32:37तो वह जहन्नुम का एक गौता खाकर वह कहेगा
- 32:40मैं तो आज तक अब तक यानी कोई आसानी देखी
- 32:44ही नहीं। कोई आराम मुझे मिला ही नहीं। तो
- 32:46वो जहन्नुम का एक गौता दुनिया में जितनी
- 32:51भी अच्छी जिंदगी गुजारी होगी वह सब भूल
- 32:53जाएगा। यह वो शख्स है जिसने दुनिया में
- 32:57कोई गम नहीं देखा। दुनिया में मजे में रहा
- 33:00और सिर्फ जहन्नुम का एक गौता खाकर उसे यह
- 33:03हाल है कि तमाम दुनिया में पाए जाने वाली
- 33:06हासिल करने वाली तमाम नेमतें और आराम वो
- 33:10सब भूल जाएगा।
- 33:12तो ईमान ला लेने के बाद बेखौफ होकर बैठ
- 33:15नहीं जाना। यह यहूद और नसारा के तरीके हैं
- 33:18कि हम तो कुछ दिन जहन्नुम में जाएंगे। आज
- 33:22भी आप देखेंगे कुछ मुसलमानों को बड़ी
- 33:24आसानी से कहते हैं कोई नहीं अल्लाह ताला
- 33:26बखशने वाला है। अगर हम जाएंगे भी तो
- 33:28जहन्नुम में कुछ लम्हों के लिए कुछ दिनों
- 33:30के लिए जाएंगे। कुछ लम्हे कुछ दिन भी
- 33:33नाकाबिले बर्दाश्त है। जब अगर अकीदे में
- 33:36एक दफे बिगाड़ आ जाए। अकीदे में एक दफा
- 33:39अगर कोई प्रॉब्लम आ जाए तो फिर इंसान
- 33:42बेपरवाह हो जाता है। फिर कोई खौफ नहीं
- 33:45रहता। फिर वो आखिरत की तैयारी नहीं करता।
- 33:48ईमान क्या है? ईमान तो उसे हमेशा अमल पर
- 33:52उभारता है। अगर ईमान हो तो वाकई इंसान फिर
- 33:56अमल करता है। फिर वाकई वो कोशिश करता है
- 33:59कि अपनी आखिरत को वह सवारे। वाकई वो पूरी
- 34:02कोशिश करता है कि कोई ऐसा अमल ना हो कि
- 34:04जिससे वह जहन्नुम में जिससे जिसकी वजह से
- 34:07जहन्नुम में उसे डाला जाए।
- 34:10अब अगली आयत में उनका बताया गया है कि जो
- 34:12यह मनगढ़ंत बातें करके यह बातों से या
- 34:15अपने आप को धोखा दे रहे हैं फरेब में डाला
- 34:18रखा है इनको इन बातों ने उनका अंजाम बताया
- 34:24फ्लाह
- 34:29फी
- 34:32फ्ल्लाह
- 34:37फी वफियत कुल नस
- 34:41कसबत
- 34:43लाम
- 34:48फिर क्या हाल होगा जब हम उन्हें उस दिन
- 34:50जमा करेंगे जिसमें कोई शक नहीं और उस रोज
- 34:54हर शख्स को उसकी कमाई का पूरापूरा बदला
- 34:57दिया जाएगा और उन पर जुल्म नहीं किया
- 35:00जाएगा।
- 35:03यानी कयामत वाले दिन उनके यह दावे और गलत
- 35:07अकायद कुछ काम नहीं आएंगे और अल्लाह ताला
- 35:11इंसाफ के साथ हर किसी के साथ फैसला
- 35:14फरमाएगा तो यह तो दुनिया में बड़ी बातें
- 35:17करते रहे तो क्या हाल होगा उस दिन फिर
- 35:19उनका उन्होंने अल्लाह ताला पर बहुत बांधा
- 35:22अल्लाह के रसूलों की तकसीब की अंबियाओं को
- 35:26नाहक कत्ल किया जो नेकी का हुक्म देते थे
- 35:28बुराइयों से मना करते थे तो अल्लाह ताला
- 35:31उनसे इन सब बातों के बारे में पूछेगा और
- 35:35उनका मुहासबा करेगा और उन्हें सजा देगा और
- 35:39हर नफ्स को पूरा पूरा बदला दिया जाएगा।
- 35:42अगर किसी ने जर्रा बराबर नेकी की है छोटी
- 35:45सी भी अगर नेकी की है तो अल्लाह ताला जरूर
- 35:48उसका भी बदला देगा। अगर किसी ने बुराई की
- 35:52है तो अल्लाह ताला उसको भी सजा देगा।
- 35:55अल्लाह ताला इंसाफ पसंद है और जिसने जो
- 35:59किया है उसको उस तरह से पूरा पूरा उसका
- 36:02बदला दिया जाएगा।
- 36:04अल्लाह ताला से हम यही दुआ करते हैं कि या
- 36:07अल्लाह हम सबका तू आसान हिसाब फरमाना। या
- 36:10अल्लाह हमारे नेकियों की तू हिफाजत फरमाना
- 36:13और हमें अपने शान के मुताबिक या रब हमारे
- 36:17नेकियों का अजो सवाब अता फरमाना और हमारे
- 36:20तमाम गुनाहों को तू बखश देना। आमीन या रब।
- 36:28मालिक मुल मुलशा
- 36:34त
- 36:36मुल
- 36:38मन तशा
- 36:41व तशा
- 36:46व तशा
- 36:50व तशा
- 36:56ख
- 36:58इन
- 37:00कुल श कदीर
- 37:06ऐ नबी आप कह दीजिए ऐ अल्लाह ऐ बादशाही के
- 37:11मालिक तू जिसे चाहे बादशाही देता है और
- 37:14जिससे चाहे बादशाही छीन लेता है और तू ही
- 37:18है जिसे चाहे इज्जत देता है और जिसे चाहे
- 37:21जिल्लत देता है सब भलाई तेरे ही हाथ में
- 37:25है। बेशक तू हर चीज पर खूब खादिर है।
- 37:29इस आयत का शान नजूल देख लेते हैं कि यह
- 37:33आयत किस वक्त पर नाजिल हुई। हिजरत के बाद
- 37:36जब दिन-ब दिन इस्लाम में तरक्की होती गई,
- 37:39इस्लाम बढ़ता गया, मुसलमान बढ़ते गए और
- 37:43लोग मक्का से मुसलमान होकर इस्लाम कुबूल
- 37:46करके, हिजरत करके मदीना आते गए। तो यह चीज
- 37:50यहूदियों को, नसारा को और मुशरिकने अरब को
- 37:53पसंद नहीं आ रहा था कि इस्लाम इस कदर
- 37:55तरक्की पा रहा है। तो यह सब मिलकर
- 37:58इन्होंने एक प्लान बनाया और यह प्लान
- 38:01बनाया कि सब मिलकर एक बड़ा लश्कर लेके
- 38:04चारों तरफ से मदीना पर हमला करेंगे। और
- 38:08फिर उसके बाद इन तमाम मुसलमानों को यानी
- 38:11इनका हम खात्मा कर देंगे। तो इनकी तादाद
- 38:14बहुत ज्यादा थी क्योंकि सब सब इस्लाम के
- 38:18जो दुश्मन थे सब एक साथ जमा होकर हमला
- 38:21करने के लिए तैयार होकर आने लगे और यह खबर
- 38:24जब रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को
- 38:26इसकी इत्तला मिली तो आप सल्लल्लाहु अलैहि
- 38:29वसल्लम ने सहाबा से मशवरा किया तो इस पर
- 38:32सलमान फारसी उन्होंने मशवरा दिया कि हम
- 38:35ऐसे करते हैं कि मदीना के अतराफ जो है
- 38:38खंदख खोद लेते हैं ताकि दुश्मन इस तरफ आ
- 38:41ना सके और वो खंद खंदख इस तरह खोदेंगे कि
- 38:44इतनी लंबी हो कि आने का दुश्मन को अंदर
- 38:47आने का कोई रास्ता ही ना मिले और इतनी
- 38:50चौड़ी खंदख खोदेंगे कि अगर वह छलांग मारकर
- 38:53भी इस तरफ आना चाहे तो वह छलांग मारकर आ
- 38:55ना सके और इतनी गहरी होगी वो खंदक कि अगर
- 38:58उसमें कोई गिर जाए तो उसे निकल ना सके
- 39:01निकल ना सके तो आप सल्लल्लाहु अलैहि
- 39:04वसल्लम को यह मशवरा बहुत पसंद आया और इस
- 39:07पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह
- 39:11हुक्म दिया कि हर हर 10 आदमी हर 10 आदमी
- 39:15मिलकर 40 हाथ खंदख खोदेगा और फिर वो भूखे
- 39:20भी हैं, प्यासे भी है, इतनी मशक्कत है और
- 39:23सब मिलकर खंदख खोदने में लगे हुए हैं।
- 39:27इतनी मशक्कतों के बाद और जब यह खंदख खोद
- 39:31रहे थे तो एक जगह ऐसे हुआ कि एक खंदख में
- 39:34कितनी बड़ी चट्टान आ गई कि वह किसी भी तरह
- 39:39टूटने के लिए टूट ही नहीं रही थी। इतनी
- 39:41सख्त थी तो आप सल्लल्लाह वसल्लम को आकर
- 39:44बताया कि भ इतनी बड़ी चट्टान है ये तो टूट
- 39:46ही नहीं रही है। आप सल्लल्लाहहु अलैहि
- 39:48वसल्लम उतर कर बिस्मिल्लाह कहा और चट्टान
- 39:51पर जोर से मारा तो चट्टान का कुछ हिस्सा
- 39:54टूटा और उसमें से एक रोशनी एक चिंगारी
- 39:57निकली। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा
- 39:59अल्लाहू अकबर मुझे मुल्क शाम की कुंजियां
- 40:03दी गई हैं और मैं उसके सुर्ख महल्लात को
- 40:06देख रहा हूं। यानी आप सल्लल्लाहु अलैहि
- 40:08वसल्लम को खुशखबरी दी गई कि मुल्क के शाम
- 40:10फतह होगा। और उसके बाद आप सल्लल्लाहु
- 40:13अलैहि वसल्लम ने दूसरी बार फिर से जोर से
- 40:15उस चट्टान पे मारा। उसका दूसरा हिस्सा टूट
- 40:18गया। और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने
- 40:21फारिस फतह होने की खुशखबरी सुनाई। और इसी
- 40:24तरह तीसरी बार जोर से उस चट्टान पे मारा
- 40:27और यमन फतह होने की खुशखबरी सुनाई और पूरी
- 40:31चट्टान कट गई।
- 40:33तो यह सुनने के बाद जब यह मुनाफिकन को पता
- 40:37चला तो उन मजाक उड़ाने लगे, मजाक उड़ाने
- 40:40लगे, तंज करने लगे कि यह कहां पर यह अपने
- 40:44आप को तो देखें भूखे प्यासे इस कदर यह
- 40:47मुट्ठी भर लोग हैं। यहां ये इनके साथ ही
- 40:50मुकाबला नहीं कर सकते। कहां यह चले हैं
- 40:53फारिस और शाम और यमन को फतह करने के लिए।
- 40:56तो मजाक उड़ाने लगे, तंज करने लगे। तो उस
- 40:59पर अल्लाह ताला ने इस आयत को नाजिल फरमा
- 41:02दिया। अपने नबी से कहा कि ऐ नबी आप कहें
- 41:06अपने रब की ताजीम बजा लाएं। उसका शुक्र
- 41:09अदा करते हुए अपने आप को अपने रब के
- 41:11सुपुर्द करते हुए अपने रब पर तवक्कल करते
- 41:15हुए कहें
- 41:17अल्लाह हु्मा मालिकल मुल्क ऐ अल्लाह ऐ
- 41:21बादशाही के मालिक यानी सारी बादशाहत तेरे
- 41:24ही लिए है तू तिल मुल्क का मन तशाऊ तू
- 41:28जिसको चाहे बादशाही बख्शे और जिससे चाहे
- 41:32बादशाही छीन ले व तू मन तशाऊ व तजिल मन
- 41:37तशा और जिसको चाहे इज्जत दे और जिसे चाहे
- 41:41जलील करे। यानी तू ही देने वाला है, तू ही
- 41:44महरूम कर देने वाला है। तू ही जो चाहता है
- 41:48वो होता है और जो तू ना चाहे वो चीज नहीं
- 41:51होती। यानी इसमें अल्लाह सुभान ताला की
- 41:54ताकत और कुत का इजहार है। फैसला सिर्फ
- 41:58अल्लाह ताला का है। अल्लाह ताला जिसे चाहे
- 42:01बादशाहत अता करे। जिसे चाहे हुकूमत दे।
- 42:04जिसे चाहे ताकत और कुत दे और जिससे चाहे
- 42:08यह तमाम चीजें छीन ले। जिसे चाहे इज्जत
- 42:11दे, जिसे चाहे वह जलील करे और जिल्लत दे।
- 42:16इस आयत में खास तौर पर इस तरफ तवज्जो कर
- 42:19करवाई गई और रहनुमाई फरमाई गई कि अल्लाह
- 42:22ताला ने अपने रसूल मोहम्मद सल्लल्लाहु
- 42:25अलैहि वसल्लम और रसूल सल्ला वसल्लम की
- 42:28उम्मत को जिस नेमत से नवाजा है उसका शुक्र
- 42:31बजा लाना चाहिए। अल्लाह ताला ने किस तरह
- 42:35से रसूल अल्लाह सल्ला वसल्लम पर अपनी
- 42:37नेमतें अल्लाह ताला ने दी और इस उम्मत पर
- 42:39जैसे पहले नबूवत का सिलसिला बनी इसराइल
- 42:43में था। बनी इसराइल से ही तमाम नबी आते
- 42:46रहे। अब अल्लाह सुभाना ताला ने बनी इसराइल
- 42:49से नबूवत को लेकर बनी इस्माइल में मुंतकिल
- 42:52कर दिया। और फिर अल्लाह ताला ने रसूल
- 42:55अल्लाह सल्लल्लाहु अल वसल्लम को ऐसीऐसी
- 42:58चीजों से नवाजा जो किसी और अंबिया को नहीं
- 43:01नवाजा। आप सल्लल्लाह वसल्लम खातिमुल
- 43:03अंबिया है और आप सल्लल्लाह अल वसल्लम तमाम
- 43:07इंसानों और जिन्नों के रसूल हैं। और मशर
- 43:10मशरिक से ले मगरिब तक हर तरफ आप सल्लल्ला
- 43:14अल वसल्लम की उम्मत को फैला दिया गया और
- 43:18आप सल्लल्लाहु अल वसल्लम के दीन और शरीयत
- 43:20को दूसरे तमाम दीनों पर गालिब कर दिया
- 43:23गया। तो यहां पर शुक्र की तरफ रहनुमाई
- 43:27फरमाई गई कि ऐ नबी आप इसका शुक्र अदा
- 43:30करें। आप अल्लाह ताला पर तवकल करें
- 43:33और अल्लाह ताला की मदद आई और वाकई शाम
- 43:37फारिस यमन सब फता हुए और देखें जैसे अगर
- 43:42हम इस आयत से अगर कुछ सीखना चाहे तो हमें
- 43:45क्या लगता है यानी इज्जत है ताकत है या
- 43:48कोई और चीज है यह हमें लगता है कि ये तमाम
- 43:51चीजें जो है यह माल से हासिल हो सकती है।
- 43:54अगर हमारे पास माल और दौलत हो या हमारे
- 43:56पास कोई डिग्रियां हो या बड़े-बड़े घर या
- 43:59हमारे पास गाड़ियां हो तो इसी से हमें
- 44:01इज्जत हासिल हो सकती है। यही इज्जत की
- 44:04निशानी है। लोग इससे हमारी इज्जत करेंगे।
- 44:07लेकिन इस आयत से हमें पता चलता है कि
- 44:10इज्जत और जिल्लत अल्लाह सुभाना ताला देता
- 44:13है। किसी चीज से इज्जत या जिल्लत नहीं
- 44:15मिलती। और इसकी एक बहुत बड़ी मिसाल हम देख
- 44:18सकते हैं। खारून क्या उसके पास कितने
- 44:21खजाने थे। कितना मालदार था वो। फिरौन
- 44:24कितना ताकतवर था। वह तो अपने तकुर में,
- 44:28अपने अना और अकड़ में अपने आप को सबसे
- 44:31बड़ा यानी अपने आप को वो माबूद कहता था।
- 44:34तो खारून का क्या अंजाम हुआ? फिरौन जो
- 44:36इतना ताकतवर था उसका क्या अंजाम हुआ? इनकी
- 44:40कहीं इज्जत नहीं। इतना बुरा अंजाम हुआ।
- 44:44इनको अल्लाह ताला ने इतनी जिल्लत और
- 44:46रुसवाई इस दुनिया में भी दी और आखिरत में
- 44:48भी है। तो कई ऐसे आपने देखे होंगे जिसको
- 44:52अल्लाह ताला ने ताकत से नवाजा। उनको
- 44:55अल्लाह ताला ने हुकूमतें दी और फिर यही
- 44:58बड़ी-बड़ी ताकतों को बड़ी-बड़ी कुतों को
- 45:01के अल्लाह ताला ने तख्त पलट दिए। तो
- 45:04बादशाहत अल्लाह ताला देता है। अल्लाह ताला
- 45:07ही है जो बादशाही देता है, ताकत देता है
- 45:10और वही है जो छीन लेता है। और इज्जत और
- 45:13जिल्लत अल्लाह सुभाना ताला के हाथ में है।
- 45:15अल्लाह जिसे चाहे उन्हें अता करता है। और
- 45:18इस आयत की फज़लत में एक रिवायत में यह भी
- 45:20आता है कि मुआज़ रदी अल्लाहहु ताला अनू ने
- 45:23नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अपने ऊपर
- 45:25करज़ की शिकायत की। तो आप सल्लल्लाह वसल्लम
- 45:28ने फरमाया यही आयत और उसके साथ एक छोटी सी
- 45:31और भी दुआ है। फरमाया कि यह ऐसी दुआ है कि
- 45:34तुम पर उद पहाड़ जितना कर भी हो तो अल्लाह
- 45:38ताला उसकी अदायगी का तुम्हारे लिए इंतजाम
- 45:40फरमा देगा। तो जो जो कर डूबे हुए हैं कर्ज
- 45:45की वजह से परेशान हैं। तो इंशा्लाह इस आयत
- 45:48को और यह जो छोटी सी दुआ बताई गई है इसको
- 45:51याद कर लें और इस दुआ के जरिए अल्लाह ताला
- 45:54से मदद हासिल करें।
- 45:57अल्लाह मालिक मुल्क मुलशा
- 46:02मुलशा
- 46:09खल
- 46:12कदीर रहमान दुनिया
- 46:16रहीमशा
- 46:22रहमत
- 46:25रहमत
- 46:29फिर उसके बाद अगली आयत में अल्लाह ताला की
- 46:31अज़म कुदरतों का बयान है।
- 46:37नहार व तह
- 46:44वजु हन
- 46:47वजन
- 46:49हज
- 46:52तशा
- 46:55हिसाब
- 46:59तू ही रात को दिन में दाखिल करता है और
- 47:02दिन को रात में ले जाता है। तू ही बेजान
- 47:05से जानदार पैदा करता है और तू ही जानदार
- 47:08से बेजान पैदा करता है। तू ही है कि जिसे
- 47:11चाहता है बेशुमार रिज़्क देता है। तो यहां
- 47:16पे रात को दिन में और दिन को रात में
- 47:19दाखिल करने का मतलब यह है कि जो मौसम में
- 47:21जो चेंजेस आते हैं उससे यह मुराद है। यानी
- 47:24रात लंबी होती है तो दिन छोटा हो जाता है।
- 47:28इसी तरह अगर दूसरे मौसम में देखें तो इसके
- 47:31बरक्स क्या है? जैसे गर्मियां हैं तो
- 47:33उसमें क्या है कि दिन लंबा हो जाता है और
- 47:35रात छोटी हो जाती है। तो यानी कभी रात का
- 47:38हिस्सा दिन में और दिन का हिस्सा कभी रात
- 47:42में दाखिल कर देता है और जिसकी वजह से रात
- 47:45और दिन छोटे या बड़े हो जाते हैं। यह
- 47:48अल्लाह ताला की ऐसी बड़ी निशानियां हैं।
- 47:51दिन और रात इनमें इतनी बड़ी तब्दीली है और
- 47:54यह दोनों मुख्तलिफ चीजें हैं। ये दोनों
- 47:57मुख्तलिफ चीजें हैं। रात सिया काली और दिन
- 48:01इसी तरह सफेद और चमकदार। तो किस तरह से
- 48:05अल्लाह ताला एक काली चीज को सफेद में यानी
- 48:08किस तरह रात की अंधेरे को हटाकर अल्लाह
- 48:11ताला सुबह लेकर सुबह लेकर आता है और यह
- 48:14तब्दीली हर रोज हो रही है। गैर महसूस
- 48:17तरीके से हो रही है और इसमें अल्लाह सुभान
- 48:20ताला की एक बहुत बड़ी कुदरत है। तू ही
- 48:23बेजान से जानदार पैदा करता है और तू ही
- 48:26जानदार से बेजान पैदा करता है। यानी तू ही
- 48:30है। तू ही है कि खेती से दाना और फिर उसी
- 48:33दाने से खेती पैदा करता है। खजूर है खजूर
- 48:37से गुठली और फिर उसी गुठली से खजूर को
- 48:40पैदा करता है। इसी तरह अंडे से मुर्गी और
- 48:43मुर्गी से अंडा पैदा फरमाता है। और इसी
- 48:46तरह मोमिन से काफिर और काफिर से मोमिन
- 48:49पैदा फरमाता है। और फिर तू ही है जिसको
- 48:53चाहता है बेशुमार रिज़्क अता फरमाता। यानी
- 48:57तू जिसको चाहता है, जिस कदर चाहे उसको माल
- 49:01अता फरमाता है, रिज़्क अता फरमाता है, जिसे
- 49:04कोई गिन नहीं सकता। और जिसके लिए तू चाहे
- 49:08उन उसके रिज़्क को तू तंग कर देता है। और
- 49:11यह तेरे फैसले हैं। और यह तेरे फैसले तमाम
- 49:16हिकमत पर मबनी है। अदल पर मबनी है। इसमें
- 49:19कोई जुल्म और जियादती नहीं है। अल्लाह
- 49:22ताला हम सबको दोनों जहानों में भलाइयां
- 49:25अता फरमाए। आमीन या रब। अस्सलाम वालेकुम
- 49:28रहमतुल्लाही व बरकातहू।
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This page contains the full transcript of Surah Ale -Imran # 3 Ayat 18 - 27 by Huda Dawah, generated from the public captions YouTube serves with the video. The transcript has 6,711 words across 885 segments, with the original timestamps preserved so you can click any line to jump to that moment in the embedded player.
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