Socialism in Europe and The Russian Revolution Class 9 (Animation) | Class 9 History Chapter 2 — Transcript
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- 0:00हेलो एवरीवन, मेरा नाम है राहुल रावत और
- 0:02आज हम एक ऐसे सफर पर निकलने जा रहे हैं जो
- 0:05हमें समय में पीछे ले जाएगा। एक ऐसे दौर
- 0:08में जब पूरी दुनिया खास करके यूरोप एक
- 0:11उबलता हुआ प्रेशर कुकर जैसा था। सोचिए एक
- 0:13ऐसी सोसाइटी जहां अमीर और गरीब के बीच में
- 0:16गहरी खाई थी। जहां मजदूर दिन के 14-4 घंटे
- 0:19फैक्ट्रीज के काले धुएं में काम करते थे।
- 0:22लेकिन उनकी मेहनत का फल उनकी जेब में नहीं
- 0:24बल्कि फैक्ट्री के मालिकों की तिजोरी में
- 0:26जाता था। जहां किसान सदियों से जमीन पर
- 0:29काम कर रहे थे, लेकिन वह जमीन उनकी नहीं
- 0:32थी। ऐसे में कुछ लोग उठते हैं नए आइडियाज
- 0:34के साथ एक नई बराबरी वाली सोसाइटी का सपना
- 0:37लेकर। यह कहानी है सोशल चेंज की। यह कहानी
- 0:40है उस सोच की जिसने दुनिया के नक्शे को
- 0:42हमेशा के लिए बदल दिया। तो चलिए पूरे फोकस
- 0:45के साथ शुरू करते हैं क्लास नाइंथ
- 0:46हिस्ट्री के चैप्टर नंबर टू को जिसका नाम
- 0:49है सोशलिज्म इन यूरोप एंड द रशियन
- 0:51रेवोल्यूशन। चैप्टर की शुरुआत होती है 19
- 0:54सेंचुरी से। यह वह समय था जब यूरोप की
- 0:56सोसाइटी में चेंजेस की लहर उड़ रही थी।
- 0:59जहां लोगों के बीच में नए-नए आइडियाज पनप
- 1:01रहे थे सोसाइटी में चेंजेस के लिए। इसी
- 1:03दौर को हम कहते हैं द एज ऑफ सोशल चेंज।
- 1:06देखो क्या हो रहा था। हमने लास्ट चैप्टर
- 1:08में फ्रांस रेवोल्यूशन के बारे में पढ़ा
- 1:10था। अब यह जो फ्रांस रेवोल्यूशन हुआ था,
- 1:12उसका इंपैक्ट केवल फ्रांस के ऊपर नहीं
- 1:14पढ़ा था बल्कि उसका इंपैक्ट पूरे के पूरे
- 1:16यूरोप पर पड़ा था। फ्रांस के रेवोल्यूशन
- 1:19को देखकर लोगों को यह लगने लगा था कि जब
- 1:21फ्रांस में लिबर्टी, इक्वलिटी, फर्टेनिटी
- 1:24जैसे आइडियाज को लेकर स्ट्रगल हो सकता है
- 1:26तो हम क्यों नहीं कर सकते? कहने का मतलब
- 1:28यह है कि फ्रांस रेवोल्यूशन को देखकर
- 1:31यूरोप में भी लिबर्टी, इक्वलिटी,
- 1:33फर्टेनिटी जैसे आइडियाज पॉपुलर होने लगे
- 1:36थे। जिस वजह से लोग अब सोसाइटी में चेंज
- 1:38चाह रहे थे। अब सोचिए एक समय था जब यूरोप
- 1:41में हर तरफ एक ही आवाज थी राजा के हुकुम
- 1:44की। मतलब राजा जो चाहेगा वही होता था।
- 1:46लेकिन फ्रांस रेवोल्यूशन के बाद लोगों के
- 1:48दिमाग में सवाल उठने लगे थे कि क्या राजा
- 1:51के पास एब्सोल्यूट पावर होना सही है? क्या
- 1:53सब लोगों को बराबर होना चाहिए? क्या समाज
- 1:56में बदलाव आना चाहिए? लोग कॉफी हाउसेस
- 1:58में, लाइब्रेरीज में, डिबेट्स में अक्सर
- 2:01यही बातें करते थे। तो इन्हीं सवालों के
- 2:03बीच में जन्म लेते हैं तीन तरह के लोग।
- 2:05पहले लिबरल्स, दूसरे रेडिकल्स और तीसरे
- 2:08कंजर्वेटिव्स। लिबरल्स वो लोग थे जो
- 2:10पर्सनल फ्रीडम चाहते थे। इनका मानना यह था
- 2:13कि हर व्यक्ति को सोच विचार करने की, अपने
- 2:15रिलीजन को चूज करने की, फॉलो करने की और
- 2:18बिजनेस करने की पूरी आजादी होनी चाहिए। पर
- 2:20इनका एक कैच था। यह यूनिवर्सल एडल्ट
- 2:23फ्रेंचाइसी के सपोर्ट में नहीं थे। मतलब
- 2:25यह कहते थे कि वोट डालने का अधिकार सिर्फ
- 2:27प्रॉपर्टी ओनर्स को होना चाहिए। यानी कि
- 2:30अमीर लोगों को वोट डालने का अधिकार मिलना
- 2:32चाहिए। बाकी जो गरीब लोग हैं बिना
- 2:34प्रॉपर्टी वाले उन्हें वोटिंग राइट्स नहीं
- 2:36मिलने चाहिए। साथ में महिलाओं को भी
- 2:38वोटिंग राइट्स नहीं मिलने चाहिए। मतलब
- 2:40लिबरल्स कह रहे थे कि वोट डालने का काम
- 2:42केवल समझदार लोगों का है और उनके हिसाब से
- 2:44समझदारी केवल अमीर लोगों के पास थी। दूसरे
- 2:47थे रेडिकल्स। रेडिकल्स लिबरल से दो कदम
- 2:50आगे थे। यह कहते थे कि अगर हमें
- 2:52डेमोक्रेसी चाहिए तो सबको वोटिंग राइट्स
- 2:54मिलना चाहिए। यह लोग ऐसी सोसाइटी का सपना
- 2:56देख रहे थे जिसमें सब लोगों का बराबरी का
- 2:58हक हो। चाहे वह अमीर हो या गरीब हो। सबको
- 3:02वोटिंग राइट्स मिले। तीसरे थे
- 3:04कंजर्वेटिव्स। कंजर्वेटिव वह लोग थे जो यह
- 3:06कहते थे कि जो चल रहा है सही चल रहा है।
- 3:09कहने का मतलब यह है कि यह राजा के सपोर्टर
- 3:11लोग थे। इन्हें चेंजेस पसंद नहीं थे। यह
- 3:13कहते थे कि पुराने जो इंस्टीटशंस हैं जैसे
- 3:16कि मोनार्की, चर्च यह सब इंपॉर्टेंट है।
- 3:18इसलिए यह पहले तो यही चाहते थे कि चेंजेस
- 3:20हो ही ना। लेकिन टाइम के साथ-साथ इन्होंने
- 3:23भी कुछ चेंजेस एक्सेप्ट किए पर धीरे-धीरे।
- 3:25इन तीनों को आप सिंपल तरीके से ऐसे समझो
- 3:27कि लिबरल्स फ्रीडम चाहते थे लेकिन अमीरों
- 3:30के लिए। रेडिकल्स इक्वलिटी चाहते थे लेकिन
- 3:32सबके लिए। कंजर्वेटिव पुराना सिस्टम चाहते
- 3:35थे कि जो चल रहा है वही चलने दो। तो यह
- 3:37तीन तरह की आईडियोलॉजी के लोग उस समय
- 3:39यूरोप में उभर रहे थे और यूरोप की
- 3:41पॉलिटिक्स उस समय पर एक बैटल फील्ड बन गई
- 3:44थी। अब दोस्तों जब इंडस्ट्रियलाइजेशन आया
- 3:46मतलब जब मशीनों का युग शुरू हुआ तो सिर्फ
- 3:49मशीनें नहीं आई बल्कि साथ लाई एक नई
- 3:51दुनिया। पीज़ेंट जो फील्ड में हल चला रहे
- 3:54थे, क्राफ्ट्समैन जो हाथों से काम करते
- 3:56थे, सब लोग अपना काम छोड़कर फैक्ट्रीज की
- 3:58तरफ बढ़ने लगे। अब आदमी, औरत, बच्चे तीनों
- 4:01फैक्ट्रीज में जाकर काम करने लगे। मजदूरी
- 4:04करना अब एक नई जिंदगी बन गई थी। जरा सोच
- 4:06कर देखिए कि एक 8 साल का बच्चा भी मशीन के
- 4:09पास धुआं, ग्रीस और थकान के बीच जीवन सीख
- 4:12रहा था। जैसे-जैसे मशीन साइन फैक्ट्री
- 4:14सिस्टम डेवलप हुआ वैसे-वैसे इनकलिटी बढ़ती
- 4:17गई। फैक्ट्रीज के मालिक और अमीर बनते गए।
- 4:20काम करने वाले वर्कर्स उनकी हालत और खराब
- 4:23होती गई। मजदूर 12 14 घंटे काम करते थे।
- 4:26बिना सुरक्षा के, बिना अच्छे पैसों के।
- 4:29हालत यह हो गई थी कि जहां एक तरफ किंग्स
- 4:31और फैक्ट्री ओनर्स थे रसीले कपड़ों में और
- 4:34दूसरी तरफ मजदूर थे पसीने से भीगे हुए
- 4:36कपड़ों में। अब वर्कर्स क्या करते हैं?
- 4:38आवाज उठाते हैं। वह कहते हैं कि हमारे
- 4:41वर्किंग हावर्स को कम किया जाए। साथ में
- 4:43हमें भी वोटिंग राइट्स दिए जाए। उनका कहना
- 4:46था कि यार हम भी तो सिटीजंस हैं ना तो
- 4:48हमें भी तो अधिकार मिलना चाहिए। वर्कर्स
- 4:50अभी भी एक ही सवाल से जूझ रहे थे कि आखिर
- 4:53गरीब और अमीर के बीच में इतना फर्क क्यों
- 4:55है? जरा सोचिए फैक्ट्री किसी अमीर आदमी की
- 4:58है लेकिन काम तो मजदूर करते हैं ना फिर भी
- 5:01पैसा किसके पास जाता है? सिर्फ मालिक के
- 5:03पास। मजदूर का पसीना बहता है लेकिन
- 5:06प्रॉफिट का दरिया मालिक की जेब में गिरता
- 5:08है। इसलिए लोगों को लगने लगा था कि यह
- 5:10सिस्टम ही गलत है। ऐसे में एक नई सोच जन्म
- 5:13लेती है। एक नया आईडिया आता है जो कि था
- 5:15सोशलिज्म का। सोशलिज्म का आईडिया कहता था
- 5:19कि फैक्ट्री, लैंड और रिसोर्सेज पर सिर्फ
- 5:22एक व्यक्ति का अधिकार नहीं होना चाहिए।
- 5:24बल्कि जब सब मेहनत कर रहे हैं तो फल भी
- 5:27सबको मिलना चाहिए। तो यह जो सोशलिज्म का
- 5:29आईडिया था वो अब धीरे-धीरे यूरोप में फैल
- 5:31रहा था। चलो अब हम थोड़े कुछ फेमस थिंकर्स
- 5:34के बारे में बात करते हैं। ऐसे कई सारे
- 5:36थिंकर्स थे जिन्होंने वर्कर्स को काफी
- 5:38ज्यादा सपोर्ट किया था। जैसे कि रॉबर्ट
- 5:41ओवन इंग्लैंड के एक फैक्ट्री ओनर थे।
- 5:43लेकिन दिल से एक सोशलिस्ट थे। इन्होंने
- 5:45छोटी सी मॉडल सोसाइटी बनाई थी जहां वह
- 5:48वर्कर्स के लिए अच्छी वर्किंग कंडीशंस
- 5:50प्रोवाइड करते थे। ऐसे ही लुइस ब्लैंक जो
- 5:52कि फ्रांस के एक थिंकर थे उन्होंने भी यही
- 5:54कहा कि गवर्नमेंट अपने पैसों से ऐसे
- 5:57वर्कशॉप्स बनाएं जहां लोग मिलकर काम करें
- 6:00और प्रॉफिट आपस में बांट लें। इसी तरीके
- 6:02से दो बहुत ही फेमस थिंकर्स और थे कार्ल
- 6:05मार्क्स और फेडरिक एंगल। दोनों मिलकर 1948
- 6:08में एक बुक लिखते हैं द कम्युनिस्ट
- 6:10मैनिफेस्टो जिसमें वह बताते हैं कि दुनिया
- 6:13में हमेशा अमीर वर्सेस गरीब के बीच में एक
- 6:16क्लास स्ट्रगल होती रही है। मतलब गरीब और
- 6:18अमीर के बीच में हमेशा लड़ाई होती रही है
- 6:21और यह स्ट्रगल एक दिन रेवोल्यूशन का कारण
- 6:24बनेगी। यानी कि किसी दिन इसी गरीब और अमीर
- 6:26के भेदभाव के चक्कर में एक बहुत बड़ा
- 6:29रिवॉल्यूशन होगा। और ऐसा हुआ भी। दोस्तों,
- 6:3119 सेंचुरी के एंड तक आते-आते यूरोप के हर
- 6:34कोने में एक ही आईडिया पॉपुलर हो रहा था
- 6:37जो कि था सोशलिज्म का। यह सिर्फ एक
- 6:39फिलॉसफी नहीं रही थी। यह अब एक मूवमेंट बन
- 6:41गया था। चाहे फ्रांस हो या जर्मनी हो,
- 6:44चाहे ब्रिटेन हो, चाहे रशिया हो, बर्कर्स
- 6:46के बीच में एक नई उम्मीद जग चुकी थी।
- 6:48बर्कर्स को लगने लगा था कि सोशलिज्म के
- 6:50आने से उन्हें इक्वलिटी मिलेगी। धीरे-धीरे
- 6:53अलग-अलग कंट्रीज के सोशलिस्ट समझ गए कि
- 6:55अगर हम अलग-अलग लड़ेंगे तो सिस्टम कभी
- 6:57नहीं बदलेगा। हमें एकजुट होना होगा। तो
- 7:00सबने मिलकर एक इंटरनेशनल बॉडी बनाई जिसको
- 7:02बोला गया सेकंड इंटरनेशनल। एक ऐसी
- 7:05इंटरनेशनल बॉडी जहां सोशलिस्ट लोगों के
- 7:07आइडियाज एक्सचेंज होते थे, स्ट्रेटजीस
- 7:09बनती थी और रिवॉल्यूशन की प्लानिंग होती
- 7:12थी ताकि सोशलिज्म को बढ़ावा मिल सके। यह
- 7:14इस बॉडी के जरिए डिमांड रखते थे कि
- 7:16वर्कर्स के लिए लेस वर्किंग हावर्स होने
- 7:18चाहिए और उन्हें भी वोट डालने का अधिकार
- 7:21होना चाहिए। इसी तरीके से 1900 के आसपास
- 7:24सोशलिज्म केवल एक आईडिया नहीं बचा था
- 7:26बल्कि यह पॉलिटिकल पावर्स की तरफ बढ़ने
- 7:28लगा था। कई देशों के अंदर भी इसको लेकर
- 7:31एसोसिएशंस पार्टीज बनने लगी थी। जैसे कि
- 7:34जर्मनी में पार्टी बनी सोशल डेमोक्रेटिक
- 7:36पार्टी, ब्रिटेन में लेबर पार्टी, फ्रांस
- 7:39में सोशलिस्ट पार्टी। यह वो पल था जब पहली
- 7:42बार सोशलिज्म के आईडिया ने पॉलिटिक्स में
- 7:44कदम रखा था। बरकास कह रहे थे कि हमें
- 7:46सिर्फ नारा नहीं चाहिए। हमें कुर्सी
- 7:48चाहिए, डिसीजन मेकिंग का हक चाहिए। लेकिन
- 7:51हां, यह भी सच है कि 1914 तक किसी भी
- 7:53यूरोपियन देश में सोशलिस्ट की सरकार नहीं
- 7:56बनी। लोग सपोर्ट कर रहे थे, रैलीज हो रही
- 7:59थी, आइडियाज फैल रहे थे। लेकिन पावर अभी
- 8:02भी राजाओं के पास थी, इंडस्ट्रियलिस्ट के
- 8:04पास थी और कैपिटलिस्ट लोगों के पास ही थी।
- 8:07सोशलिज्म अभी भी एक सफर था मंजिल नहीं।
- 8:10लेकिन दोस्तों, एक ऐसी कंट्री थी जहां यह
- 8:12सोच रियलिटी में बदलती है जिसका नाम है
- 8:15रशिया। रशिया में आगे जाकर राजा को हटाकर
- 8:18वास्तव में एक सोशलिस्ट गवर्नमेंट बनती
- 8:20है। अब यह कैसे बनती है? क्या है पूरी
- 8:23कहानी? आइए जानते हैं। सेकंड टॉपिक है
- 8:26हमारा द रशियन रेवोल्यूशन। अब हम आ गए हैं
- 8:29अपनी कहानी के सबसे क्रूशियल हिस्से पर
- 8:31रशिया पर। द रशियन एंपायर इन 1914। रशिया
- 8:35एक बहुत बड़ा एंपायर था और उसमें
- 8:37ऑटोक्रेसी रूल था। यानी कि पूरी पावर एक
- 8:40ही आदमी के पास थी और वह था ज़ार निकोलस
- 8:43सेकंड। यह सिर्फ एक किंग नहीं था। यह एक
- 8:45एब्सोल्यूट मोनार्क था। मतलब राजा ने जो
- 8:48कह दिया वही होना था। कोई पार्लियामेंट
- 8:51नहीं थी। कोई कोर्ट नहीं था और ना ही कोई
- 8:53उसके अगेंस्ट जा सकता था। रशिया के अंदर
- 8:55अलग-अलग रिलीजन फॉलो किए जाते थे। लेकिन
- 8:58सबसे ज्यादा लोग रशियन ऑर्थोडॉक्स
- 9:01क्रिश्चियनिटी को मानते थे। लेकिन इसके
- 9:03अलावा भी कैथोलिक्स, प्रोटेस्टेंट्स,
- 9:05मुस्लिम्स, बुद्धिस्ट यह रिलीजंस भी देखने
- 9:08को मिलते थे। लेकिन नोट करने वाली बात यह
- 9:10है कि सबसे ज्यादा लोग रशियन ऑर्थोडॉक्स
- 9:12क्रिश्चियनिटी को मानते थे। रशिया उस समय
- 9:15एक एग्रीकल्चर इकॉनमी थी। यानी कि
- 9:17ज्यादातर लोग किसान थे यानी कि लगभग 85%
- 9:20लेकिन उनके पास जमीनें नहीं थी। सारी
- 9:22जमीनों के मालिक लैंड लॉर्ड्स या नोबल
- 9:25फैमिलीज़ थे। और जो किसान थे, वह तो सिर्फ
- 9:27उनके लिए काम करते थे। अब एक आयरन ही देखो
- 9:30कि इतने लोग खेती करते थे, लेकिन फिर भी
- 9:33देश में खाने की कमी थी। लोग भूख और गरीबी
- 9:35से पीड़ित थे। अब हम देखते हैं
- 9:37इंडस्ट्रियलाइजेशन के दौर को। तो 1890 के
- 9:40दौरान रशिया में जब इंडस्ट्रियलाइजेशन
- 9:42शुरू हुआ तो इससे रशिया के ऊपर ज्यादा
- 9:44फर्क नहीं पड़ा। रशिया अभी भी एग्रीकल्चर
- 9:46इकॉनमी पर ही टिका हुआ था।
- 9:48इंडस्ट्रियलाइजेशन हो तो रहा था पर वह
- 9:50बहुत ही स्लो प्रोसेस में हो रहा था। इतने
- 9:53बड़े एंपायर में केवल दो ही ऐसे शहर थे
- 9:55जहां फैक्ट्रीज इस्टैब्लिश्ड थी। पहला था
- 9:58सेंट पीटर्सबर्ग और दूसरा था मॉस्को।
- 10:00लेकिन दोस्तों क्या लगता है आपको कि इन
- 10:02फैक्ट्रीज के सेटअप होने से सबसे ज्यादा
- 10:04फायदा किसने उठाया? केवल फैक्ट्री ओनर्स
- 10:07ने। और नुकसान किसका हुआ? केवल वर्कर्स
- 10:10का। वर्कर्स 12 14 घंटे की शिफ्ट्स में
- 10:12काम करते थे और वह भी अनसेफ कंडीशंस में।
- 10:15इन्हें ना ही प्रोटेक्शन मिलता था और ना
- 10:17ही अच्छी वेजेस मिलती थी। और जब वर्कर्स
- 10:20अपने अधिकार की मांग करते थे या आवाज
- 10:22उठाते थे तो उन्हें जेल ले जाकर मार अलग
- 10:25से पड़ती थी। कहने का मतलब यह है कि एक
- 10:27तरफ फैक्ट्री वर्कर्स थे और दूसरी तरफ
- 10:29पीजेंट्स थे और दोनों की हालत खराब थी।
- 10:32पीजेंट्स को टैक्स देना पड़ता था। उनका
- 10:34एक्सप्लइटेशन होता था और उनकी आवाज को कोई
- 10:36नहीं सुनता था। यानी कि रशिया में बर्कर्स
- 10:39भी परेशान थे और पीज़ेंट्स भी। कहने का
- 10:41मतलब यह है कि रशिया में एक कहावत बन चुकी
- 10:43थी कि जिंदा तो है पर जिंदगी कहां है? जार
- 10:46निकोलस सेकंड जो कि उनका राजा था वो सिर्फ
- 10:49एक पॉलिटिकल रूलर नहीं था बल्कि वह एक
- 10:51डिवाइन अथॉरिटी माना जाता था। रशियन
- 10:53ऑर्थोडॉक्स चर्च उसकी पावर को भगवान से
- 10:56मिली हुई पावर बताते थे। इस वजह से जार के
- 10:59खिलाफ बोलना भगवान के खिलाफ बोलने जैसा
- 11:01समझा जाता था। लेकिन दोस्तों जब लोगों की
- 11:03आवाज दबाई गई तो वह चुप नहीं बैठे। चुपचाप
- 11:06आइडियाज पनपने लगे। अंडरग्राउंड ग्रुप्स
- 11:09बनने लगे। कुछ लोग कॉन्स्टिट्यूशनल
- 11:11मोनार्की चाहते थे तो कुछ लोग डेमोक्रेसी
- 11:13चाहते थे। कहने का मतलब यह है कि अब लोग
- 11:16किसी भी कीमत पर चेंज चाहते थे। लेकिन
- 11:18स्ट्रगल इतना आसान नहीं था। क्योंकि 1914
- 11:21से पहले रशिया में आप किसी भी पार्टी के
- 11:23सपोर्टर नहीं बन सकते थे। क्योंकि पार्टीज
- 11:26होना ही उस समय पर इललीगल माना जाता था।
- 11:28अरे पार्टी तो छोड़ो। कोई ग्रुप भी बनाना
- 11:30इललीगल माना जाता था। कहने का मतलब यह था
- 11:33कि जो भी जार के खिलाफ बात करता वह
- 11:35राजद्रोही माना जाता था। लेकिन दोस्तों
- 11:38फिर भी 1898 में कुछ सोचने वाले दिमाग,
- 11:41कुछ आईडियोलॉजी वाले लोगों ने चुपके से एक
- 11:43नई पार्टी बनाई जिसका नाम था रशियन सोशल
- 11:47डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी। यह पार्टी
- 11:49मेनली वर्कर्स के स्ट्रगल को सपोर्ट करने
- 11:51के लिए बनाई गई थी। यह लोग कार्ल मार्क्स
- 11:53की आईडियोलॉजी से काफी ज्यादा इंस्पायर
- 11:55थे। इनका मानना यह था कि रशिया में
- 11:57वर्कर्स की सरकार बन सकती है। लेकिन एक
- 12:00बात याद रखना कि यह पार्टी अभी अंडर
- 12:02ग्राउंड थी। जैसे मानो एक सीक्रेट मिशन चल
- 12:04रहा हो। इस पार्टी का मानना यह था कि केवल
- 12:07वर्कर्स ही रिवॉल्यूशन लेकर आएंगे।
- 12:09क्योंकि जो किसान थे वह एकजुट नहीं थे।
- 12:11कुछ बड़े जमींदार थे तो कुछ गरीब थे। ऐसे
- 12:14में सब एक जैसा नहीं सोचते थे। पीजेंट्स
- 12:17काफी बिखरे हुए थे। इसलिए यह पार्टी कहती
- 12:19थी कि रिवॉल्यूशन के असली हीरो होंगे
- 12:21बर्कर क्लास। तो यह मेनली वर्कर्स को ही
- 12:23ध्यान में रखकर बनाई गई थी। इसलिए इसका
- 12:26प्रेजेंस भी शहरों में ज्यादा देखने को
- 12:28मिल रहा था। लेकिन ठीक 2 साल बाद 1900 में
- 12:31एक दूसरी पार्टी उभरती है जिसका नाम था
- 12:34सोशल रिवोल्यूशनरी पार्टी। इसका मेन फोकस
- 12:37था पीजेंट्स के ऊपर। उन्होंने कहा कि जो
- 12:39जमीन आज नोब्स के पास है वह किसानों को
- 12:42मिलनी चाहिए। उनका स्लोगन था कि जमीन उनको
- 12:44मिलनी चाहिए जो उसे जोतते हैं। अब चूंकि
- 12:46यह किसानों के लिए काम करती थी इसलिए इसका
- 12:49प्रेजेंस भी सबसे ज्यादा रूरल एरिया में
- 12:51था। अब दोस्तों जो वर्कस पार्टी बनी थी
- 12:53यानी कि रशियन सोशल डेमोक्रेटिक लेबर
- 12:55पार्टी वह ज्यादा टाइम तक मिलजुलकर काम
- 12:58नहीं कर पाती है। बल्कि यह पार्टी 1903
- 13:01में दो हिस्सों में बंट जाती है। एक ग्रुप
- 13:03था मेनसेविक्स का और दूसरा ग्रुप था
- 13:06बुलसेविक्स का। मेनसेविक चाहते थे कि
- 13:08बदलाव ग्रेजुअल हो। डेमोक्रेसी के जरिए
- 13:10हो। मतलब यह थोड़े ठंडे मिजाज के लोग थे।
- 13:13सबको शामिल करो। डेमोक्रेसी के रूल्स को
- 13:15फॉलो करो। जब सब रेडी हो जाए तब
- 13:18रेवोल्यूशन लाना। लेकिन बुलसेविक कहते थे
- 13:20कि तेजी से रिवोल्यूशन लाओ। यह डिस्कशन
- 13:22वगैरह हम बाद में कर लेंगे। देखो इसे आप
- 13:24ऐसे याद रख सकते हो कि मेनसेविक मन से
- 13:27सोचते थे और बुलसेविक थोड़े बोल्ड थे। बुल
- 13:29की तरह सोचते थे। यानी कि थोड़े गुस्से
- 13:32रेडिकल टाइप के लोग थे। मेनसेविक को लीड
- 13:34कर रहे थे वह थे जूलियस स्मार्टब और
- 13:36बुलसेविक को जो लीड कर रहे थे वह थे
- 13:38लादिमर लेनिन। यह नाम याद रखना क्योंकि यह
- 13:41इस चैप्टर में मेन कैरेक्टर हैं और इनका
- 13:43नाम काफी ज्यादा गूंजने वाला है। अब
- 13:45मेनसेविक चाहते थे कि उनकी पार्टी सबके
- 13:47लिए ओपन हो। कोई भी जॉइ करें और हमारे साथ
- 13:50स्ट्रगल का हिस्सा बने। लेकिन बुलसेविक
- 13:52चाहते थे कि उनकी पार्टी डिसिप्लिंड हो
- 13:54ताकि सीरियस और चुनिंदा लोग ही उनकी
- 13:57पार्टी को जॉइ कर पाए। अब आते हैं 1904
- 14:00में। 1904 एक ऐसा साल था जहां रशिया के
- 14:03वर्कर्स की जिंदगी और भी ज्यादा खराब हो
- 14:05गई थी। लोग गुस्से में थे। फूड शॉर्टेजेस,
- 14:08अनइंप्लॉयमेंट और इनजस्टिस ने लोगों को
- 14:10सड़कों पर ला दिया था। महंगाई लगातार बढ़
- 14:13रही थी, लेकिन सैलरी कम थी। ऊपर से रशिया
- 14:16जापान से बोर भी लड़ रहा था। कहने का मतलब
- 14:18यह है कि रशिया की इकॉनमी हर तरीके से
- 14:20डाउन हो रही थी। तो दोस्तों, जैसा कि हमने
- 14:22देखा कि 1904 तक रशिया एक उबलता हुआ
- 14:25प्रेशर कुकर जैसा बन चुका था। गरीबी,
- 14:28भुखमरी और जार का अत्याचार सब कुछ हद-पार
- 14:31हो रहा था। और तब होता है एक ऐसा हादसा जो
- 14:34रशिया के इतिहास को हमेशा के लिए बदल देता
- 14:36है। इमेजिन कीजिए 22 जनवरी 1905 की सुबह
- 14:40सेंट पीटरबर्ग्स की सड़कों पर बर्फ जमी
- 14:42हुई है। हजारों की भीड़ जिसमें औरतें,
- 14:45बच्चे, मजदूर शामिल हैं। शांति से ज़ार के
- 14:48विंटर पैलेस की तरफ बढ़ रहे हैं। उनके
- 14:50हाथों में कोई हथियार नहीं है बल्कि ज़ार
- 14:53की तस्वीरें हैं और एक पिटीशन है, एक अपील
- 14:55है। यह लोग एक प्रीस्ट फादर गैप के
- 14:58नेतृत्व में इकट्ठे हुए थे। उनकी मांगे
- 15:01बहुत सिंपल थी कि हमारे काम के घंटे 8
- 15:03घंटे करो। हमें बेहतर मजदूरी दो और हमें
- 15:07भी वोट देने का अधिकार दो। वह अपने लिटिल
- 15:09फादर यानी कि ज़ार से यानी कि अपने राजा से
- 15:12मदद मांगने आए थे। उन्हें लगता था कि ज़ार
- 15:14उनकी पुकार जरूर सुनेगा। लेकिन दोस्तों,
- 15:17जवाब में उन्हें क्या मिला? मदद नहीं
- 15:19गोलियां। ज़ार के सिपाहियों ने उस शांत
- 15:21भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
- 15:24सड़कें खून से लाल हो गई। 100 से ज्यादा
- 15:26लोग मारे गए और तीन से ज्यादा लोग घायल हो
- 15:29गए। रशिया के इतिहास में यह दिन ब्लडी
- 15:32संडे के नाम से जाना जाता है। यह गोलियां
- 15:34सिर्फ उन लोगों के सीने में नहीं लगी थी।
- 15:36यह गोलियां जार पर लोगों के विश्वास पर
- 15:39लगी थी। जिस राजा को वह भगवान मानते थे,
- 15:42आज उसी ने उन पर गोलियां बरसा दी थी।
- 15:44ब्लडी संडे की खबर जैसे ही पूरे रशिया में
- 15:46फैली, आग लग गई। शहरों में स्ट्र्राइक्स
- 15:49होने लगी, यूनिवर्सिटीज बंद हो गई।
- 15:51स्टूडेंट ने प्रोटेस्ट करना शुरू कर दिया।
- 15:54लॉयर्स, डॉक्टर्स, इंजीनियर्स सबने मिलकर
- 15:56यूनियंस ऑफ यूनियंस बना ली और एक
- 15:58कॉन्स्टिट्यूशन की मांग करने लगे। यह था
- 16:011905 का रेवोल्यूशन। ज़ार निकोलस सेकंड हाफ
- 16:05दबाव में आ गया था। उसको समझ में आ गया था
- 16:07कि अब सिर्फ डंडे से काम नहीं चलेगा। तो,
- 16:09उसने एक मास्टर स्ट्रोक प्लान चला। उसने
- 16:12लोगों से कहा कि ठीक है, ठीक है, शांत हो
- 16:13जाओ। मैं तुम्हारे लिए एक पार्लियामेंट
- 16:16बनाऊंगा। इसी पार्लियामेंट का नाम था डमा।
- 16:18लोगों को लगा कि चलो देर से ही सही। लेकिन
- 16:21ज़ार ने हमारी सुन ली। अब हमारे
- 16:22रिप्रेजेंटेटिव्स भी डिसीजन लेंगे। लेकिन
- 16:25ज़ार के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था।
- 16:27पहली डमा सिर्फ 75 दिन ही चली। जैसे ही
- 16:30उसने ज़ार की पावर पर सवाल उठाया ज़ार ने
- 16:33उसे डिॉल्व कर दिया। दूसरी डमा 3 महीने
- 16:35बाद बनी लेकिन उसे भी भगा दिया। ज़ार को
- 16:38ऐसी डूमा चाहिए थी जो उसकी हां में हां
- 16:40मिलाए। तो उसने वोटिंग लॉज़ ही चेंज कर
- 16:42दिए। उसने ऐसा सिस्टम कर दिया कि डमा में
- 16:45सिर्फ अमीर लैंड लॉर्ड्स और कंजर्वेटिव्स
- 16:47ही चुनकर आए। लिबरल्स और रेडिकल्स को बाहर
- 16:49ही कर दिया जाए। तो कहने का मतलब यह है कि
- 16:52रशिया में पार्लियामेंट तो थी लेकिन असली
- 16:54पावर अभी भी किसके हाथ में थी? बिल्कुल
- 16:56सही जार के हाथ में। रेवोल्यूशन शांत तो
- 16:59हो गया था पर आग अभी भी अंदर ही अंदर सुलग
- 17:02रही थी। अब कहानी में आता है एक और बड़ा
- 17:05ट्विस्ट द फर्स्ट वर्ल्ड वॉर 1914।
- 17:08शुरू-शुर में तो पूरा रशिया ज़ार के पीछे
- 17:10खड़ा हो गया कि लोगों को लगा कि चलो हमारा
- 17:13राजा वॉर लड़ रहा है। तो चलो राजा को
- 17:15सपोर्ट करते हैं। लोगों में देशभक्ति की
- 17:17लहर दौड़ गई। लेकिन यह जोश बहुत ही जल्दी
- 17:19ठंडा पड़ गया क्योंकि यह वॉर रशिया के लिए
- 17:22एक भयानक सपना साबित हुआ। एक बार सोच के
- 17:24देखिए कि रशियन सोल्जर्स जिनके पास ना ही
- 17:27ढंग के हथियार हैं ना ही पूरे कपड़े हैं।
- 17:29एक तरफ जर्मन और ऑस्ट्रियन आर्मी है जो
- 17:31मशीन गन से लैस है और दूसरी तरफ रशियन
- 17:34आर्मी है जो बस अपनी हिम्मत के सहारे लड़
- 17:36रही है। रशिया यह जंग बुरी तरीके से हार
- 17:39रहा था। 1917 तक आते-आते 7 मिलियन यानी कि
- 17:4370 लाख से ज्यादा रशियन लोग या तो मारे जा
- 17:46चुके थे या घायल हो चुके थे। जब रशियन
- 17:49आर्मी पीछे हटती थी तो वह दुश्मन के लिए
- 17:51कुछ नहीं छोड़ना चाहती थी। इसलिए वह अपने
- 17:53ही देश की फसलें और इमारतों को तबाह कर
- 17:55देती थी। इससे रशिया के अंदर 3 मिलियन से
- 17:58ज्यादा लोग रिफ्यूजी बन गए थे। देश के
- 18:00अंदर हालात और भी खराब थे। ज्यादातर
- 18:03स्किल्ड वर्कर्स को जंग में भेज दिया गया
- 18:04था। जिससे फैक्ट्रीज में प्रोडक्शन ठप पड़
- 18:07गया था। रेलवे लाइंस टूट गई थी। फूड
- 18:10ग्रेंस की सारी सप्लाई आर्मी के लिए जा
- 18:12रही थी। शहरों में रोटी के लिए दंगे हो
- 18:14रहे थे। लोगों को लगता था कि लोग रशिया को
- 18:16बर्बाद कर रहे हैं। लोगों का गुस्सा अब
- 18:18सिर्फ जार पर नहीं था बल्कि उसकी जर्मन
- 18:20ओरिजन वाइफ जरीना एलेग्जेंड्रा के ऊपर भी
- 18:23था और उसके सलाहकार एक फेस सन्यासी
- 18:26राजपूतिन पर भी फूट रहा था। लोगों को लगता
- 18:29था कि यह तीनों ही रशिया को बर्बाद करने
- 18:31पर तुले हुए हैं। तो दोस्तों कंडीशन क्या
- 18:34थी कि सिपाही जंग में मर रहे हैं। किसान
- 18:36की जमीनें छीन गई हैं। मजदूर भूख से मर
- 18:39रहे हैं और राजा आराम से अपने महल में
- 18:41बैठा हुआ है। प्रेशर कुकर की सीटी अब बजने
- 18:43ही वाली थी। रशिया एक और रेवोल्यूशन के
- 18:46दरवाजे पर खड़ा था जो कि था फेब
- 18:48रिवॉल्यूशन। तो अब यह फेवर रिवॉल्यूशन
- 18:50कैसे होता है? चलो अब यह जानते हैं।
- 18:55द फरी रिवॉल्यूशन 1970। अब हम आ गए हैं
- 18:58कहानी के उस मोड़ पर जहां सब कुछ बदल जाता
- 19:01है। जगह है पेट्रोग्रेड। हां, वही सेंट
- 19:04पीटरबक्स जिसका नाम वर्ल्ड वॉर फर्स्ट के
- 19:06दौरान बदल दिया गया था और महीना है फरवरी
- 19:09का। सर्दी का मौसम है। शहर में फूड
- 19:11शॉर्टेजेस अपनी चरम सीमा पर है। 22 फरवरी
- 19:15को एक फैक्ट्री में ताला लग जाता है। अब
- 19:17आप सोच के देखो कि अगर फैक्ट्री में ताला
- 19:19लग गया तो बेचारे मजदूरों के पास काम नहीं
- 19:21होगा। अब काम नहीं होगा तो वह क्या
- 19:23करेंगे? हड़ताल करेंगे। तो वह हड़ताल करने
- 19:25लगते हैं। अगले दिन इस फैक्ट्री के
- 19:27वर्कर्स के सपोर्ट में 50 और फैक्ट्रीज के
- 19:30मजदूर भी इस हड़ताल में शामिल हो जाते
- 19:32हैं। और इस बार इस मूवमेंट को लीड करती
- 19:34हैं औरतें। 23 फरवरी का दिन था यानी कि
- 19:37इंटरनेशनल वुमस डे था। हजारों औरतें
- 19:39सड़कों पर उतर आती हैं। उनके हाथों में
- 19:42बैनर थे जिन पर लिखा हुआ था हमें रोटी दो।
- 19:45यह सिर्फ रोटी की लड़ाई नहीं थी। यह लड़ाई
- 19:47थी बेहतर मजदूरी की, बेहतर शासन की।
- 19:50धीरे-धीरे यह प्रोटेस्ट पूरे शहर में फैल
- 19:52गया। तो यह सब देखकर सरकार ने कर्फ्यू लगा
- 19:55दिया। लेकिन लोग फिर भी नहीं माने। 25
- 19:58फरवरी को सार ने पुलिस को और सेना को
- 20:00आर्डर दिया कि जाओ प्रोटेस्टर्स पर
- 20:02गोलियां चलाओ। कुछ रेजीमेंट्स ने आर्डर
- 20:04माना लेकिन ज्यादातर सिपाहियों ने साफ मना
- 20:07कर दिया। उन्होंने कहा कि यह हमारे ही
- 20:09भाई-बहन हैं। हम इन पर गोलियां नहीं
- 20:11चलाएंगे। और फिर वो हुआ जिसका ज़ार को सबसे
- 20:14ज्यादा डर था। सिपाही भी वर्कर्स के साथ
- 20:16मिल गए और उन्होंने अपने ही ऑफिसर्स को
- 20:18गोली मार दी और रिवॉल्यूशन को ज्वॉइ कर
- 20:21लिया। जिस सेना के दम पर जार राज कर रहा
- 20:23था आज वही सेना उसके खिलाफ खड़ी थी। शाम
- 20:26तक सिपाहियों और वर्कर्स ने मिलकर एक
- 20:28सोवियत बनाई या हम काउंसिल भी कह सकते हैं
- 20:31जो कि थी पेट्रोगेट सोवियत। ज़ार को समझ
- 20:34में आ गया था कि अब सब खेल खत्म हो चुका
- 20:36है। और उसके जो मिलिट्री कमांडर्स थे
- 20:38उन्होंने सलाह दी कि भैया गद्दी छोड़
- 20:40दीजिए महाराज। और 2 मार्च को ज़ार निकोलस
- 20:43सेकंड ने गद्दी छोड़ दी। रशिया से 300 साल
- 20:46पुराना रेमनोव का शासन खत्म हो गया। एक
- 20:50बिना लीडर के बना हुआ ग्रुप बिना किसी
- 20:53प्लानिंग के जनता के गुस्सा से पैदा हुआ
- 20:55यह रिवॉल्यूशन कामयाब हो गया। इसी को हम
- 20:58कहते हैं द फेवर रेवोल्यूशन। अब देखो आगे
- 21:01क्या होता है? ज़ार तो चला गया लेकिन अब
- 21:03सबसे बड़ा सवाल यह था कि अब देश कौन
- 21:05चलाएगा? यहां कहानी में एक नया ट्विस्ट
- 21:08आता है। रशिया में एक नहीं बल्कि दो-दो
- 21:10पावर सेंटर्स बन जाते हैं। पहली थी द
- 21:13प्रोविजनल गवर्नमेंट। इसे डमा के लीडर्स,
- 21:15लैंड लॉर्ड्स और इंडस्ट्रियलिस्ट ने मिलकर
- 21:17बनाया था। यह एक ऑफिशियल सरकार थी जो
- 21:20चाहती थी कि रशिया में एक ऐसी डेमोक्रेसी
- 21:22आए कि जहां प्रॉपर्टी ओइंग क्लास यानी कि
- 21:24रईस लोगों का बोलबाला हो। और दूसरी थी
- 21:26पेट्रोगेट सोवियत जो कि हाल ही में बनी थी
- 21:29वर्कर्स और सोल्जर्स ने जिसे मिलकर बनाया
- 21:31था। तो फिलहाल असली पावर इनके पास ही थी
- 21:34क्योंकि सेना और मजदूर इनकी सुनते थे और
- 21:36यह लोग रेडिकल चेंजेस चाहते थे यानी कि
- 21:38जल्दी से बदलाव चाहते थे। सोचिए एक ही देश
- 21:41में दो-दो सरकारें बन चुकी थी। एक के पास
- 21:43ऑफिशियल टाइटल था लेकिन दूसरे के पास
- 21:46पब्लिक का सपोर्ट था। दोनों के बीच में
- 21:48लगातार खींचातानी चलती रहती थी। इसी बीच
- 21:51कहानी में एंट्री होती है हमारे उस हीरो
- 21:53की जिसका नाम हमने पहले सुना था लादीमार
- 21:56लेनिन की। लेनिन जो बुलसेविक के लीडर थे
- 21:59अभी तक देश से बाहर एग्जाइल में थे। जैसे
- 22:02ही उन्हें ज़ार के हटने की खबर मिली वह
- 22:04तुरंत रशिया से वापस आ गए। अप्रैल 1917
- 22:07में जब वो पेट्रोगेट पहुंचे तो उन्होंने
- 22:09आते ही बुल्सेविक पार्टी को एक नया
- 22:11डायरेक्शन दिया। उन्होंने तीन जबरदस्त
- 22:13नारे दिए जिसे अप्रैल थीसिस के नाम से
- 22:16जाना जाता है। पहला जंग खत्म करो। दूसरा
- 22:20सारी जमीनें किसानों को दो और तीसरा सारे
- 22:23बैंक्स को नेशनलाइज करो। लेनिन ने साफ-साफ
- 22:26कह दिया था कि यह प्रोविजनल गवर्नमेंट के
- 22:28साथ काम करने का वक्त नहीं है। यह वक्त है
- 22:30पावर को अपने हाथ में लेने का। अब एक और
- 22:32रेवोल्यूशन होगा एक सोशलिस्ट रेवोल्यूशन।
- 22:35उसका सिंपल सा स्लोगन था पीस, लैंड एंड
- 22:38ब्रेड। शांति, जमीन और रोटी। यह स्लोगन
- 22:42रशिया के जनता के दिलों में उतर गया
- 22:44क्योंकि यही वह चीजें थी जिनके लिए लोग
- 22:46तरस रहे थे।
- 22:49द रेवोल्यूशन ऑफ अक्टूबर 1917 गर्मियों तक
- 22:53लेनिन और उसकी पार्टी बुलसेविक का
- 22:55इन्फ्लुएंस तेजी से बढ़ने लगा था।
- 22:57प्रोविजनल गवर्नमेंट लोगों की उम्मीदें
- 22:59पूरी नहीं कर पा रही थी। वह अभी भी वर्ल्ड
- 23:01वॉर फर्स्ट ही लड़ रही थी और लोगों का
- 23:03सब्र जवाब दे रहा था। लेन को लगा कि यही
- 23:06सही मौका है। उन्होंने पेट्रोगेट सोवियत
- 23:08और बुलसेविक पार्टी को पावर हाथ में लेने
- 23:11के लिए राजी कर लिया। 24 अक्टूबर 1917 रात
- 23:15का अंधेरा है। बुलसेविक सपोर्टर्स चुपचाप
- 23:17बिना कोई शोर किए शहर कीेंट बिल्डिंग्स पर
- 23:20कब्जा करना शुरू कर देते हैं। टेलीफोन
- 23:23एक्सचेंज, रेलवे स्टेशंस, गवर्नमेंट
- 23:25ऑफिसिसेस सब उनके कंट्रोल में आ जाते हैं।
- 23:27प्रोविजनल गवर्नमेंट के मिनिस्टर विंटर
- 23:29पैलेस में छुपे बैठे हैं और फिर अरोरा नाम
- 23:32का एक जहाज विंटर पैलेस पर एक ब्लैंक शॉट
- 23:34फायर करता है। एक सिग्नल के तौर पर और
- 23:37बुलसेविक के फाइटर्स पैलेस में घुस जाते
- 23:39हैं और सारे मिनिस्टर्स को अरेस्ट कर लेते
- 23:42हैं। बिना ज्यादा खून खराबे के एक ही दिन
- 23:44में बुलसेविक्स पावर में आ गई। इसे कहते
- 23:47हैं अक्टूबर रिवॉल्यूशन। रशिया अब दुनिया
- 23:50का पहला कम्युनिस्ट स्टेट बनने की राह पर
- 23:52था।
- 23:55पावर में आते ही लेनिन ने तेजी से फैसले
- 23:57लेने शुरू कर दिए। लेनिन ने सबसे पहला
- 24:00फैसला लिया। उन्होंने वर्ल्ड वॉर फर्स्ट
- 24:02से रशिया को अलग करने का ऐलान किया। मार्च
- 24:051918 में उन्होंने जर्मनी के साथ ट्रीटी
- 24:07ऑफ ब्रेस्ट लेटो बीएसके साइन की और जंग से
- 24:10बाहर हो गए। दूसरा ज्यादातर इंडस्ट्रीज और
- 24:13बैंक्स को नेशनलाइज कर दिया गया। यानी कि
- 24:15अब वह सरकार की प्रॉपर्टी थे। तीसरा
- 24:18जमींदारी खत्म कर दी गई और सारी जमीनें
- 24:20किसानों को बांट दी गई। और चौथा रशिया एक
- 24:23वन पार्टी स्टेट बन गया जिसे अब
- 24:25कम्युनिस्ट पार्टी के नाम से जाना जाता
- 24:27था। सीक्रेट पुलिस बनाई गई जो पार्टी के
- 24:30खिलाफ बोलने वालों को सजा देती थी। कहने
- 24:32का मतलब यह है कि अब थोड़ा फ्रीडम भी छीनी
- 24:36जा रही थी। लेकिन लेनिन ने वाकई में काफी
- 24:38अच्छे चेंजेस कर दिए थे ऑलरेडी।
- 24:43द सिविल वॉर 1918 1920 लेकिन दोस्तों
- 24:47कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। जैसे ही
- 24:49बुलसेविक्स ने पावर अपने हाथ में ली उनके
- 24:52दुश्मन भी एकजुट हो गए। एक तरफ थे रेड्स
- 24:55जिन्हें हम बुलसेविक्स कहते हैं और दूसरे
- 24:57तरफ थे वाइट्स जिन्हें एंटी बुलसेविक्स कह
- 25:00सकते हैं जो सोशलिस्ट के खिलाफ थे और
- 25:02लिबरल्स के खिलाफ थे और तीसरे थे ग्रीस जो
- 25:05सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरी थे जो पीजेंट्स के
- 25:07लिए लड़ रहे थे। अब क्या होने वाला था इन
- 25:09तीनों के बीच में सिविल वॉर होने वाला था
- 25:12क्योंकि इन तीनों की आपस में बन नहीं रही
- 25:14थी। अब दोस्तों मेनली यह सिविल वॉर रेड और
- 25:16वाइट्स के बीच में ही लड़ा गया था क्योंकि
- 25:18दोनों एक दूसरे के खिलाफ थे। वाइट्स को
- 25:20फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका और जापान जैसी
- 25:23विदेशी ताकतों का सपोर्ट मिल रहा था
- 25:25क्योंकि वह रशिया में सोशलिज्म के विचार
- 25:28से डरते थे। तो यह जो सारे देश थे वह
- 25:30वाइट्स को सपोर्ट कर रहे थे क्योंकि
- 25:31उन्हें डर था बुलसेविक से क्योंकि
- 25:33बुलसेविक सोशलिज्म को प्रमोट कर रहे थे और
- 25:36उन्हें डर था कि अगर बुलसेविक इसी तरीके
- 25:38से सोशलिज्म को बढ़ावा देंगे तो कहीं उनके
- 25:40देश में भी सोशलिज्म ना आ जाए। इसलिए वह
- 25:43वाइट्स को सपोर्ट कर रहे थे ताकि वह
- 25:44बुलसेविक्स को हरा दें। और अगले 3 साल तक
- 25:47रशिया में एक भयानक सिविल वॉर चलता है। इस
- 25:50दौरान लाखों लोग मारे गए थे। लूटपाट और
- 25:52भुखमरी ने देश को तोड़ कर रख दिया था।
- 25:54लेकिन आखिर में जीत बुलसेविक्स की होती
- 25:56है। क्यों? क्योंकि उनके पास एक क्लियर
- 25:59विज़न था। वह जमीन को लेकर किसानों का
- 26:01सपोर्ट जीत चुके थे और उनके लीडर थे लेनिन
- 26:04और ट्रटस्की जिन्होंने बेहतरीन लीडरशिप
- 26:06दिखाई थी।
- 26:081922 तक आते-आते ज्यादातर पुराना रशियन
- 26:11एंपायर पूरा का पूरा बुलसेबिक्स के
- 26:14कंट्रोल में आ गया था और उन्होंने इसे नया
- 26:16नाम दिया यूएसएसआर यूनियन ऑफ सोवियत
- 26:19सोशलिस्ट रिपब्लिक। सिविल वॉर के बाद
- 26:22उन्होंने एक सोशलिस्ट सोसाइटी बनाने का
- 26:24काम शुरू किया। लेकिन अब लेनिन लीडर नहीं
- 26:27रहे थे। लेन के बाद अब एक नया लीडर बनता
- 26:29है जिसका नाम था जोसेफ स्टेलिन। अब
- 26:32स्टेलिन की लीडरशिप में एक सेंट्रलाइज्ड
- 26:34प्लानिंग सिस्टम लाया गया। सरकार डिसाइड
- 26:36करती थी कि देश में क्या बनेगा और कैसे
- 26:38बनेगा। इसके लिए फाइव ईयर प्लान शुरू किए
- 26:41गए। सरकार ने खेतीबाड़ी पर भी पूरा
- 26:43कंट्रोल कर लिया। उन्होंने कलेक्टिवाइजेशन
- 26:46की पॉलिसी शुरू की जिसमें किसानों से उनकी
- 26:48जमीनें छीनकर बड़े-बड़े कलेक्टिव फार्म्स
- 26:51कुलहोज बनाए गए। जहां सबको मिलकर काम करना
- 26:54होता था और जो भी प्रॉफिट होता था, वह सब
- 26:56में बांट दिया जाता था। बहुत से किसानों
- 26:58ने इसका विरोध किया। उन्होंने अपने जानवर
- 27:00मार दिए और फसलें जला दी। जवाब में जोसेफ
- 27:03स्टेलिन ने बेहद क्रूरता दिखाई। जो भी
- 27:05विरोध करता उसे या तो मार दिया जाता था या
- 27:08तो लेबर कैंप में भेज दिया जाता था। इस
- 27:10दौरान 1930 में एक भयानक अकाल पड़ा जिसमें
- 27:14लाखों लोग मारे गए थे।
- 27:18द ग्लोबल इन्फ्लुएंस एंड लेगेसी। तो
- 27:20दोस्तों इस पूरे सफर का नतीजा क्या निकला?
- 27:23रशियन रेवोल्यूशन सिर्फ रशिया की कहानी
- 27:25नहीं है। इसने पूरी दुनिया को हिला दिया।
- 27:28दुनिया भर में कम्युनिस्ट पार्टीज बनने
- 27:30लगी। इसने कॉलोनियल देशों को जैसे कि
- 27:32हमारा देश इंडिया जो उस समय पर अंग्रेजों
- 27:35का गुलाम था और हमारे जो फ्रीडम फाइटर्स
- 27:38थे उनको इंस्पिरेशन दी। इसने कैपिटलिज्म
- 27:40और सोशलिज्म की एक नई ग्लोबल लड़ाई को
- 27:43जन्म दिया। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी
- 27:45था। भले ही यूएसएसआर ने पिछड़े हुए रशिया
- 27:48को एक ग्लोबल सुपर पावर बना दिया था।
- 27:50गरीबों को रोटी दी थी। एजुकेशन दी थी।
- 27:53लेकिन यह सब एक भारी कीमत पर हुआ था।
- 27:55फ्रीडम ऑफ स्पीच, डेमोक्रेसी और इंसानी
- 27:58अधिकारों को कुचला गया था। तो यह थी कहानी
- 28:00सोशलिज्म इन यूरोप एंड द रशियन रेवोल्यूशन
- 28:03की। एक ऐसी कहानी है जो हमें बताती है कि
- 28:06कैसे बदलाव के सपने जब हकीकत में बदलते
- 28:08हैं तो वह उम्मीद और दुख दोनों ला सकते
- 28:10हैं। यह कहानी है आजादी की, बराबरी की और
- 28:14उसके लिए चुकाई गई कीमत की। उम्मीद है
- 28:16आपको यह एक्सप्लेनेशन पसंद आया होगा। अगर
- 28:18आपको यह वीडियो पसंद आई तो आप इसे लाइक कर
- 28:20सकते हो, चैनल को सब्सक्राइब भी कर सकते
- 28:22हो। बाकी मिलते हैं नेक्स्ट वीडियो में।
- 28:24तब तक के लिए टेक केयर। बाय बाय।
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This page contains the full transcript of Socialism in Europe and The Russian Revolution Class 9 (Animation) | Class 9 History Chapter 2 by Sunlike study, generated from the public captions YouTube serves with the video. The transcript has 5,415 words across 687 segments, with the original timestamps preserved so you can click any line to jump to that moment in the embedded player.
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