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समय का खेल | Samay Ka Khel | Story | Hindi Kahaniya | Animated Stories — Transcript

by Dream Toon · 3,091 words · 435 segments · language en · Watch on YouTube

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  1. 0:04संजय नगर गांव में हरिया नाम का एक लड़का
  2. 0:08अपनी मां गंगा देवी और छोटे भाई लालू के
  3. 0:11साथ रहता था। उसके पिता को गुजरे 10 साल
  4. 0:14बीत चुके थे और अब वो अपना गुजर-बसरर चाय
  5. 0:18की छोटी सी दुकान चलाकर कर रहा था।
  6. 0:21[संगीत]
  7. 0:25मां मैं काम पर जा रहा हूं।
  8. 0:27कुछ पैसे देता जा ताकि दोपहर का खाना बना
  9. 0:31सकूं।
  10. 0:33अरे मां पैसे तो नहीं है। अब जब जाकर चाय
  11. 0:37बेचूंगा तो कुछ पैसे आएंगे। तो हम लोग
  12. 0:40दोपहर में क्या खाएंगे भैया? अरे मुझसे
  13. 0:43क्या पूछता है रे? तू भी तो 18 साल का हो
  14. 0:45गया है। कुछ कामधाम कर। दो पैसे लेकर आ घर
  15. 0:49में तो घर का चूल्हा जले। अरे चिल्ला
  16. 0:52क्यों रहे भैया?
  17. 0:54हां बेटा अब वो भी काम करेगा। तू गुस्सा
  18. 0:57ना कर।
  19. 0:58हां, इसे समझाओ ना मां। वरना बहुत मुश्किल
  20. 1:01हो जाएगी। सिर्फ बैठे-बैठे खाने मात्र से
  21. 1:03जिंदगी नहीं चलती।
  22. 1:05यह बोलकर हरिया गुस्से में घर से निकला और
  23. 1:08अपनी चाय की टपरी पर पहुंचा।
  24. 1:10हे भगवान, आज अपनी कृपा से मेरी सही कमाई
  25. 1:14करवा देना। वरना मेरे घर में चूल्हा नहीं
  26. 1:16जलेगा।
  27. 1:18हरिया अपनी दुकान सजाकर तभी ढंग से बैठ भी
  28. 1:21नहीं पाया था कि वहां जमींदार अपने
  29. 1:24आदमियों के साथ आ पहुंचा।
  30. 1:28अरे आइए आइए जमींदार साहब बैठिए मैं आपको
  31. 1:31ना कड़क चाय पिलाता हूं। बताइए अदरक वाली
  32. 1:34या इलायची वाली?
  33. 1:36अरे ओए तेरी कड़क चाय पीने नहीं आया हूं
  34. 1:39मैं। अपने पैसे लेने आया हूं जो तू उधार
  35. 1:44लिए बैठा है महीनों से।
  36. 1:47जी जमींदार साहब मैं दे दूंगा आपके पैसे।
  37. 1:50ह आजकल बहुत दिक्कत चल रही है। काम अच्छा
  38. 1:54होता नहीं है और महंगाई बढ़ती चली जा रही
  39. 1:56है। देखिए ना आपको पता है यह सब कुछ। अरे
  40. 2:00सुन रे लड़के मुझे कोई मतलब नहीं। समझा?
  41. 2:03क्योंकि मैं तुझे दो बार मोहलत पहले ही दे
  42. 2:06चुका हूं।
  43. 2:08अब तू चुपचाप यह बता कि तू अपनी ये टपरी
  44. 2:11खाली करेगा या अपने आदमियों से पिटवाऊं
  45. 2:14तुझे। हैं।
  46. 2:18हरिया घबरा गया। उसने फौरन जमींदार के पैर
  47. 2:21पकड़े और कहा
  48. 2:25नहीं नहीं मालिक ऐसा मत करिए मैं मैं आपके
  49. 2:28पैसे चुका दूंगा पैसे चुका दूंगा अरे तुम
  50. 2:32लोग मेरा मुंह क्या देख रहे हो रे ए
  51. 2:35कालिया इसकी दुकान से सारा सामान निकाल कर
  52. 2:37बाहर फेंक और उसे भी मेरे पैरों से हटा
  53. 2:41कुछ आदमियों ने उसकी दुकान का सामान निकाल
  54. 2:44फेंका और उसे उठाकर एक साइड में फेंक दिया
  55. 2:49वो बेचारा रोता हुआ घर पहुंचा। उसके चेहरे
  56. 2:52पर निराशा और दर्द साफ झलक रहा था। मां और
  57. 2:57भाई उसकी हालत देखकर घबरा उठे।
  58. 2:59अरे बेटा ये क्या हाल बना रखा है? चेहरा
  59. 3:02क्यों उतरा हुआ है?
  60. 3:05भैया क्या हुआ बताओ ना। मां मां आज हमारी
  61. 3:10टपरी भी चली गई। जमींदार ने अपने आदमियों
  62. 3:14से सब उजड़वा दिया मां। अब हमारे पास ना
  63. 3:19दुकान रही ना ही कोई सहारा मांग।
  64. 3:25यह सुनते ही गंगा देवी और लालू के पैरों
  65. 3:28तले जमीन खिसक गई।
  66. 3:31घर में सन्नाटा छा गया।
  67. 3:33हे भगवान अब हम क्या करेंगे?
  68. 3:37भैया तो अब हम दो वक्त की रोटी भी नहीं
  69. 3:40जुटा पाएंगे।
  70. 3:43और क्या? अरे और क्या? मुझे तो बस यही आता
  71. 3:47था। चाय बनाना और बेचना। अब और कौन सा काम
  72. 3:51करूं बता?
  73. 3:53कुछ देर तक घर में सिर्फ सिसकियां गूंजती
  74. 3:56रहीं। फिर मां ने गहरी सांस भर कर कहा।
  75. 4:00बेटा याद है तुम्हारे पिता जब गए थे तब
  76. 4:03उन्होंने वो खेत छोड़ा था। भले ही वो
  77. 4:06सालों से बंजर पड़ा है मगर अब तुम्हें उस
  78. 4:09पर मेहनत करनी होगी।
  79. 4:11मां वो खेत? अरे उस सूखी जमीन पर भला क्या
  80. 4:14उगेगा? वहां तो घास तक नहीं होती।
  81. 4:18कोशिश करने वाले की कभी हार नहीं होती
  82. 4:20बेटा। आज नहीं तो कल जमीन रंग लाएगी। अगर
  83. 4:24हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे तो भूख से
  84. 4:26मरेंगे।
  85. 4:28हां भैया मां सही कह रही है। चलो खेत पर
  86. 4:32मेहनत करते हैं।
  87. 4:34अरे भाई मगर उसमें लगाने के लिए बीज और
  88. 4:38खाद चाहिए। पैसे कहां से लाएंगे इन सबके
  89. 4:41लिए? खाना तक तो है नहीं घर में।
  90. 4:45गंगा देवी ने आंचल में हाथ डालकर अपना
  91. 4:48मंगलसूत्र निकाला और बोली
  92. 4:50ये ले लो इसे गिरवी रख दो। जो पैसे
  93. 4:54मिलेंगे उससे खेती शुरू कर देना।
  94. 4:58अरे नहीं मां ये कैसे हो सकता है? ये तो
  95. 5:02पिताजी की आखिरी निशानी है।
  96. 5:05बेटा अगर तुम्हारे पिता जिंदा होते तो वो
  97. 5:08भी यही करते। सुनो मैं बेचने की नहीं कह
  98. 5:12रही बस गिरवी रख दो। जब तरक्की होगी तो
  99. 5:15वापस छुड़ा लेंगे।
  100. 5:19बहुत मान मनोहार और आंसुओं के बीच दोनों
  101. 5:22बेटे आखिर मान गए।
  102. 5:26अगले ही दिन उन्होंने मंगलसूत्र गिरवी
  103. 5:29रखकर पैसे जुटाए।
  104. 5:31चलो लालू। अब कामयाबी या नाकामी सब के सब
  105. 5:36हमारी मेहनत पर निर्भर है।
  106. 5:38हां भैया। अब पीछे हटना नहीं है।
  107. 5:42दोनों भाइयों ने ठान लिया कि वो खेत पर
  108. 5:45तरबूज की खेती करेंगे। दिन हो या रात काफी
  109. 5:49तपती धूप हो या झमाझम बारिश हो। दोनों ने
  110. 5:52जी जाम लगाकर खेत को संवार दिया।
  111. 5:57[संगीत]
  112. 6:03देख लालू मिट्टी की खुशबू बदल रही है।
  113. 6:07लगता है हमारी मेहनत रंग लाएगी रे।
  114. 6:11हां भैया जमीन भी हमारी लगन को पहचान गई
  115. 6:14है लगता है।
  116. 6:18और सचमुच कुछ ही महीनों में खेत बड़े-बड़े
  117. 6:22हरेभरे तरबूज से भर गया। अब समय आ गया जब
  118. 6:26उन्हें अपनी उपज मंडी ले जानी थी। दोनों
  119. 6:29भाई बैलगाड़ी में तरबूज भरकर मंडी पहुंचे।
  120. 6:34[संगीत]
  121. 6:42अरे वाह वाह भैया वाह। इतने ताजा और रसीले
  122. 6:45तरबूज तो मैंने सालों में नहीं देखे बता
  123. 6:47रहा हूं।
  124. 6:48हां हां भाई हमें सब चाहिए भाई।
  125. 6:54तरबूज हाथों हाथ बिक गए।
  126. 6:59जब हरिया और लालू ने गिनती की तो उनके
  127. 7:01हाथों में मोटी रकम थी।
  128. 7:05भैया देखो देखो आज कितना पैसा हुआ है। अब
  129. 7:09तो हम मां का मंगलसूत्र तुरंत छुड़ा कर ले
  130. 7:12आएंगे। हां। हां लालू अब हमारी मेहनत का
  131. 7:16फल हमें मिल गया। चलो मां की आंखों की चमक
  132. 7:19वापस लौटाते हैं अब।
  133. 7:23हरिया और लालू हाथ में मेहनत की कमाई थामे
  134. 7:26चेहरे पर उम्मीद की चमक लिए मंडी से
  135. 7:29निकले। दिल में बस एक ही बात थी कि आज मां
  136. 7:33का मंगलसूत्र छुड़ाना है। पर तभी पीछे से
  137. 7:36गड़गड़ाहट जैसी आवाज आई। भीड़ चीखती
  138. 7:40चिल्लाती उनकी तरफ भागी।
  139. 7:43भैया ये सब हमारे पीछे क्यों दौड़ रहे
  140. 7:45हैं?
  141. 7:47पता नहीं भाई। चलो जल्दी-जल्दी आगे बढ़ो।
  142. 7:52भीड़ ने उन्हें घेर लिया। दुकानदार चंपक
  143. 7:55सबके आगे आया।
  144. 7:57अरे ओ हरिया ठहर जा। हमें उल्लू समझ रखा
  145. 8:01है क्या? हैं? अरे क्या हुआ भाई? पैसे भी
  146. 8:04दिए, तरबूज भी दिए। अब और क्या बाकी है?
  147. 8:09अब क्या बाकी है? बाकी यह है कि तुम्हारे
  148. 8:12तरबूज बाहर से हरे-हरे हैं। मगर अंदर से
  149. 8:16बिल्कुल सफेद, ना मिठास, ना ही रस। हमारे
  150. 8:20ग्राहक थूक थूक कर हमें गालियां दे रहे
  151. 8:22हैं भैया।
  152. 8:24क्या ये कैसे हो सकता है? हमने तो मेहनत
  153. 8:27से खेत सवारा था।
  154. 8:29ए भैया ए सब देख लो तुम अपनी आंखों से। सब
  155. 8:32लोग कह रहे हैं कि तुम्हारा माल बेकार है
  156. 8:34भैया। अब एक काम करो हमारे पैसे वापस करो।
  157. 8:37वरना यहां से जिंदा नहीं जाओगे बता रहे
  158. 8:39हैं।
  159. 8:41भीड़ का गुस्सा आसमान छूने लगा। डंडे उठने
  160. 8:44लगे। आंखों में खून उतर आया।
  161. 8:49भाई लोग हमें एक मौका दो। जरूर कोई गड़बड़
  162. 8:52हो गई होगी।
  163. 8:54हां, हमारे पास बस यही पैसा है। इसे ले लो
  164. 8:59मगर हमें मारो मत।
  165. 9:01डरे सहमे दोनों भाइयों ने रकम लौटा दी।
  166. 9:06दुकानदार तरबूज वापस ठेलों पर पटक गए और
  167. 9:10गालियां देते हुए चले गए। हरिया और लालू
  168. 9:13धीरे-धीरे घर लौटे। अरे बेटा ऐसे मूलट
  169. 9:17खाकर क्यों आ गए हो? मंगलसूत्र कहां है?
  170. 9:22मां मां सब खत्म हो गया मां। वो तरबूज
  171. 9:26अंदर से सफेद निकले। सब ने हमें धोखेबाज
  172. 9:30कहा मां। पैसे फिर वापस करने पड़े। मां
  173. 9:35हमने महीनों की मेहनत की थी। सब राख हो
  174. 9:38गया। अब तो जीने की भी इच्छा नहीं बची।
  175. 9:42देखा मां देखा।
  176. 9:45मैंने पहले ही कहा था वो खेत बंजर है। उस
  177. 9:50पर कुछ नहीं उगेगा मां।
  178. 9:54नहीं बेटा अगर जमीन सचमुच बंजर होती तो उस
  179. 9:58पर तरबूज के बेले लहलहाती। क्यों? कुछ तो
  180. 10:01चूक हुई है। हार मानने से जिंदगी नहीं
  181. 10:04चलती।
  182. 10:06मगर मां अब किस में ताकत बची है बताओ? ना
  183. 10:10पैसा है ना ही हिम्मत है। फिर से कैसे
  184. 10:12शुरू करेंगे?
  185. 10:15इस बार तरबूज नहीं खजूर की खेती करो। समय
  186. 10:18ज्यादा लगेगा। मगर मुझे यकीन है इस बार
  187. 10:21किस्मत बदल जाएगी।
  188. 10:24खजूर
  189. 10:26मगर मां मां बात वही है। पैसे कहां से
  190. 10:30आएंगे?
  191. 10:32इस बार मेरा आंगन ही गिरवी रख दो। एक
  192. 10:35झोपड़ी ही दे दो।
  193. 10:38मां घर अगर यह भी चला गया तो हम रहेंगे
  194. 10:41कामा।
  195. 10:43मां मां तुम पागल तो नहीं हो गई हो? क्या
  196. 10:46बोले जा रही हो?
  197. 10:48पागल नहीं हूं। बस समझती हूं कि जिंदा
  198. 10:51रहने के लिए छत से पहले पेड़ जरूरी है।
  199. 10:53अगर भगवान ने चाहा तो यह घर भी लौट आएगा।
  200. 10:57दोनों भाई मां की बात सुनकर पत्थर हो गए।
  201. 10:59मगर हालात ऐसे थे कि इंकार की गुंजाइश ही
  202. 11:03नहीं थी। अगले दिन वो जमींदार के पास
  203. 11:06पहुंचे।
  204. 11:09मालिक साहब हमारी झोपड़ी गिरवी रख लो पर
  205. 11:13कुछ पैसे दे दो।
  206. 11:20तुम्हारी
  207. 11:22झोपड़ी
  208. 11:24अरे वो माचिस की डिब्बी जैसी जगह मेरे किस
  209. 11:27काम की भाई? हैं?
  210. 11:31मालिक वो सड़क किनारे है। अगर आप वहां कुछ
  211. 11:34बनवाएं तो उसकी कीमत आसमान छू लेगी।
  212. 11:39जमींदार की आंखों में लालच चमक उठा। उसने
  213. 11:42सोचा सही कह रहे हैं। सड़क किनारे की जमीन
  214. 11:46सोने से कम नहीं होती।
  215. 11:50हम
  216. 11:51ठीक है। झोपड़ी मेरे पास रखो।
  217. 11:56और लो ले जाओ पैसे। मगर याद रहे अगर पैसे
  218. 12:02समय पर ना चुकाए तो समझो झोपड़ी हमेशा के
  219. 12:07लिए मेरी।
  220. 12:10क्या समझे?
  221. 12:12[संगीत]
  222. 12:15बेबस हरिया और लालू ने शर्त मान ली और
  223. 12:18पैसे लेकर लौटे। इस बार दोनों ने खजूर की
  224. 12:21खेती शुरू की। समय बीता साल बदला और मेहनत
  225. 12:25रंग लाई। खेत में खजूर के पेड़ लहलहा उठे।
  226. 12:29उनकी डालियां फलों से झुक गई।
  227. 12:34देखो लालू बगीचा कितना प्यारा लग रहा है।
  228. 12:36देखो। हां भैया। अब मंडी में सबको मुंहत
  229. 12:41जवाब देंगे।
  230. 12:43दोनों भाइयों ने खजूर के टोकरे तैयार किए
  231. 12:46और मंडी पहुंच गए।
  232. 12:49[संगीत]
  233. 12:50अरे लो जी लो भैया ताजे खजूर। जरा देखो
  234. 12:53तो। इस बार हमारी मेहनत का फल चखो।
  235. 12:56अरे हां हां बहुत देख लिया तुम्हारा माल।
  236. 13:00अबकी बार बिना देखे ही कहता हूं कि ये सब
  237. 13:03बेकार है। नहीं चाहिए भैया। आगे बढ़ो।
  238. 13:06हां हां हम नहीं कर देंगे। तुम दोनों
  239. 13:09धोखेबाज हो भैया। जाओ यहां से।
  240. 13:12अरे भाई कम से कम देख तो लो। एक बार चख तो
  241. 13:16लो। फिर कह देना खराब है। ऐ भाई कहा ना
  242. 13:20यार हमें नहीं चाहिए। चलो भागो यहां से
  243. 13:22वरना अच्छा नहीं होगा। बता रहे हैं।
  244. 13:28भीड़ फिर से शोर मचाने लगी। दुकानदारों ने
  245. 13:32बिना देखे ही खजूर ठुकरा दिए। अपमान से
  246. 13:35झुके सर और टूटे दिल लिए हरिया और लालू
  247. 13:38मंडी से वापस लौटे।
  248. 13:41भैया लगता है किस्मत ही हमसे रूठ गई है।
  249. 13:45हां लालू मेरी तो समझ में ही नहीं आ रहा
  250. 13:48है कि अब क्या करेंगे।
  251. 13:51हरिया और लालू मंडी से अपमानित होकर लौटे।
  252. 13:55चेहरों पर निराशा की कालिख थी। घर पहुंचकर
  253. 13:58उन्होंने मां को सारी आपबीती सुनाई।
  254. 14:00क्या बिना देखे ही लौटा दिया?
  255. 14:03अरे भगवान ये कैसा अन्याय है मेरे बच्चों
  256. 14:06पर?
  257. 14:09हां मां। अब तो लगता है कि इस धरती पर
  258. 14:13हमारे लिए जगह ही नहीं बची।
  259. 14:17तीनों कुछ देर तक खामोश बैठे रहे। सन्नाटा
  260. 14:20इतना गहरा कि मानो वक्त भी ठहर गया हो।
  261. 14:24अचानक गंगा देवी के चेहरे पर चमक आ गई।
  262. 14:27रुक जाओ। इतनी जल्दी हार मानना पाप है।
  263. 14:30पहले यह तो देखो कि ये खजूर वाकई बेकार है
  264. 14:32या नहीं।
  265. 14:38मां क्या फायदा? जब मंडी वाले ही नहीं
  266. 14:42मानते तो।
  267. 14:44चुप बिना चखे फैसला मत करो। ले आओ ये
  268. 14:47खजूर।
  269. 14:49तीनों ने खजूर तोड़े और खाने लगे।
  270. 14:53अरे अरे वाह ये तो गजब के मीठे हैं।
  271. 14:59सच कहूं तो मैंने इतनी स्वादिष्ट चीज अपनी
  272. 15:02जिंदगी में नहीं चखी।
  273. 15:05देखा ये कोई साधारण खजूर नहीं। यह तो
  274. 15:08वरदान है। मगर कमी है हमारी सोच में। मंडी
  275. 15:12वालों की दया पर जीने की बजाय हमें खुद
  276. 15:14रास्ता बनाना होगा।
  277. 15:17पर पर मां कैसे?
  278. 15:20मेरे पास एक उपाय है। हम इन खजूरों की
  279. 15:22बर्फी बनाएंगे और सीधा गांव वालों को
  280. 15:25बेचेंगे।
  281. 15:27बर्फी खजूर की।
  282. 15:31हां, मीठे खजूर और देसी गुड़ से जो स्वाद
  283. 15:35बनेगा, उसे खाकर लोग दीवाने हो जाएंगे।
  284. 15:38हरिया को थोड़ी उम्मीद जगी। वो तुरंत
  285. 15:41बाजार की ओर भागा और गुड़ खरीद लाया। गंगा
  286. 15:44देवी ने खजूर और गुड़ को मिलाकर रात भर
  287. 15:47चूल्हे पर पकाया। भट्टे की आंच, मां के
  288. 15:50हाथों का जादू और उनकी आस्था। तीनों ने
  289. 15:53मिलकर बर्फी तैयार कर दी।
  290. 15:57[संगीत]
  291. 15:59मां, यह तो चमचमाते सोने जैसी लग रही है।
  292. 16:03हां भैया, अब देखते हैं गांव वाले क्या
  293. 16:06कहते हैं।
  294. 16:08अगले दिन दोनों भाई टोकरियों में बर्फी
  295. 16:10भरकर गांव की गलियों में निकल पड़े।
  296. 16:15अरे आओ आओ भैया अरे खजूर की बर्फी मीठी
  297. 16:19नरम और एकदम देसी भैया अरे बाबूजी आओ अरे
  298. 16:23माता जी अरे भैया ऐ आओ भैया आओ
  299. 16:28लो जी लो खाओ और बताओ कैसी है ये खास
  300. 16:31बर्फी लो भैया ए दादा आओ देखो चखो
  301. 16:36गांव वालों को तो पहले ही शक था मगर जैसे
  302. 16:39ही बर्फी मुंह में गई सबके चेहरे खिल उठे
  303. 16:45हैं क्या क्या खिला रहे हो? क्या है ये?
  304. 16:48बर्फी खजूर की बर्फी। चलो चखा रहे हो तो
  305. 16:53खा ही लेते हैं भैया। चखने में कौन सा
  306. 16:56पैसा लग रहा है?
  307. 17:04अरे भैया ये तो गजब है भैया। अरे भैया गजब
  308. 17:08हो गया। ए गजब है।
  309. 17:14अरे भाई और मिठाई तो छोड़ो। ये तो बिल्कुल
  310. 17:17दवा की तरह ताकत दे रही है। मेरे तो हाथ
  311. 17:21पैर में दर्द था लेकिन अब मुझे काफी अच्छा
  312. 17:24महसूस हो रहा है भैया ये खा के। हैं
  313. 17:28एक काम करो भैया। मेरे लिए आधा किलो तोल
  314. 17:31दो। हां। और मेरे लिए 1 किलो भाई। भैया
  315. 17:36मुझे भी 1 किलो कर देना।
  316. 17:39मुझे तो बच्चों के लिए भी चाहिए। कुछ ही
  317. 17:42दिनों में खजूर की बर्फी पूरे गांव की
  318. 17:44सबसे ज्यादा बिकने वाली मिठाई बन गई। सभी
  319. 17:48तरफ उन्हीं की चर्चा थी। पैसे बरसने लगे।
  320. 17:54सबसे पहले हरिया ने मां का मंगलसूत्र
  321. 17:57छुड़वाया। मंदिर जाकर उसने मां के हाथों
  322. 18:00में उसे डालते हुए कहा।
  323. 18:03मां ये सिर्फ कहना नहीं यह हमारी इज्जत
  324. 18:08है। आज फिर से आपके गले की शोभा लौटी है।
  325. 18:12[संगीत]
  326. 18:15भगवान करे ये कभी दोबारा ना छूटे।
  327. 18:19अब सिर्फ झोपड़ी छुड़वाने का सपना बाकी
  328. 18:21था। परिवार की आंखों में नई उम्मीद थी।
  329. 18:24मगर उनकी तरक्की देखकर जमींदार के दिल में
  330. 18:27आग लग गई।
  331. 18:30अरे धत तेरे की ये गरीब अब अमीर बनेंगे
  332. 18:35ऐसा नहीं हो सकता नहीं हो सकता ऐसा अगर
  333. 18:39इनके खजूर ऐसे ही बिकते रहे तो कल को तो
  334. 18:42ये हमारी बराबरी करने पर आ जाएंगे
  335. 18:45ऐ तो मालिक करना क्या है ये बताओ
  336. 18:49अरे रात में जाओ रे गमभक्तों और इसके सारे
  337. 18:52खजूर चुरा के ले आओ सुबह सूरज निकले उससे
  338. 18:57पहले खेत खाली होना चाहिए
  339. 19:01जमींदार ने योजना खतरनाक बनाई। मगर किस्मत
  340. 19:04से उसकी बातें मंडी के दुकानदार चंपक ने
  341. 19:07सुन ली।
  342. 19:09अरे भैया ये तो घोर अन्याय है। मेहनत से
  343. 19:13हो गए खजूर यूं चुराना। नहीं नहीं मैं
  344. 19:16हरिया को बता दूंगा। हां।
  345. 19:19चंपक ने फौरन जाकर हरिया को सब बता दिया।
  346. 19:24अरे भैया सुनो एक अंदर की बात है जमींदार
  347. 19:28जो है तुम्हारे खिलाफ साजिश कर रहा है
  348. 19:29भैया आज रात उसके आदमी तुम्हारे सारे खजूर
  349. 19:33चुराने वाले हैं मैंने सुन लिया था भैया
  350. 19:35तभी बताने आ गया क्या हमारे खजूर
  351. 19:40धिक्कार है ऐसे जमींदार पर हमारी मेहनत का
  352. 19:43फल चुराने की हिम्मत कर रहा है वो
  353. 19:46बेटा अब ये वक्त है हिम्मत दिखाने का अगर
  354. 19:50तुम आज डरे तो हमेशा दबे रह जाओगे?
  355. 19:54नहीं मां, आज मैं सबक उसे जरूर सिखाऊंगा।
  356. 19:58हरिया ने एक योजना बनाई और उसने खजूर के
  357. 20:01पेड़ों पर खुजली वाली जड़ी बूटी लगा दी।
  358. 20:04फिर जब आधी रात को जमींदार के गुंडे आकर
  359. 20:07खजूर तोड़ने लगे तो उनके पूरे शरीर में
  360. 20:10खुजली होने लगी।
  361. 20:13अरे भाई मुझे ये खुजली सी हो रही है। अरे
  362. 20:16अरे अरे ये हाथों में खुजली हो रही है।
  363. 20:19अरे भाई अरे अब तो पैरों में भी होने लगी
  364. 20:21भाई। अरे यार ये क्या हो रहा है? अरे मोरी
  365. 20:24मैया अरे पूरी अरे पूरा शरीर तो फैल गई
  366. 20:27भैया। अरे अरे भैया पूरी खुजली खुजली हो
  367. 20:30रही है।
  368. 20:33अरे भाई अरे भाई मुझे तो ऐसा लग रहा है
  369. 20:35जैसे चींटियों ने बारात निकाल ली हो मेरे
  370. 20:37शरीर के ऊपर। ए भैया ए भैया
  371. 20:41अबे यार खजूर बाद में सुनो पहले खुजली
  372. 20:44वुजली रोकने का इलाज लाओ भैया अरे
  373. 20:50कुछ ही पलों में सब आदमी पेड़ छोड़छोड़ कर
  374. 20:53सड़क पर ऐसे भागे जैसे उनकी कमर में आग लग
  375. 20:56गई हो।
  376. 21:01पूरा मंजर देखकर हरिया लालू और चंपक
  377. 21:05ठहाकों से लौटपोट हो गए।
  378. 21:09अरे भाई मैंने तो बहुत तमाशे देखे लेकिन
  379. 21:12इतना शानदार कॉमेडी शो पहली बार देख रहा
  380. 21:14हूं भैया।
  381. 21:16जब सब भाग गए तो हरिया ने चंपक से पूछा
  382. 21:21अरे चंपक भाई अरे चंपक भाई एक बात बताओ
  383. 21:25आपने हमारी मदद क्यों की? तुमने तो कहा था
  384. 21:28कि हमारे खजूर बेकार है।
  385. 21:31अरे अब क्या बताऊं हरिया? जमींदार ने ही
  386. 21:35हमें भड़काया था भैया। उसने कहा था कि
  387. 21:37तुम्हारे फल कोई ना खरीदे ताकि वो फिर
  388. 21:40तुम्हारा घर हड़प ले।
  389. 21:44इसलिए
  390. 21:46तो यह सब उस जमींदार का खेल था।
  391. 21:50लेकिन अब देखना मैं अपना घर छुड़वा कर ही
  392. 21:53दम लूंगा। हां।
  393. 21:55अगले दिन अचानक शहर में एक आदमी आता है और
  394. 21:58हरिया से कहता है,
  395. 22:02ओ तुम हरिया हो ना जो खजूर की बर्फी बेचते
  396. 22:05हो?
  397. 22:06जी आप कौन?
  398. 22:09देखो भैया शहर में मेरी कई सारी मिठाई की
  399. 22:11दुकानें हैं। लेकिन जब से कुछ लोग यहां से
  400. 22:14खजूर की बर्फी खाकर गए हैं तो वो उसी की
  401. 22:17बात करते रहते हैं। और मेरी दुकानों पर भी
  402. 22:19उसकी मांग बहुत बढ़ गई है। इसलिए मैं
  403. 22:22चाहता हूं कि तुम हमारे लिए खजूर की बर्फी
  404. 22:24बनाओ भैया। हम तुम्हें अच्छा दाम दे देंगे
  405. 22:27भाई।
  406. 22:29अरे ये तो बहुत खुशी की बात है। तो आपको
  407. 22:32कितनी बर्फी चाहिए होगी?
  408. 22:35अ पहली बार में 10 से 20 किलो भी दे दोगे
  409. 22:38तो चलेगा लेकिन मुझे ज्यादा चाहिए होगी
  410. 22:40भैया क्योंकि मेरी पांच दुकानें हैं।
  411. 22:45ठीक है भाई साहब आपको मिल जाएगी।
  412. 22:48अच्छा ठीक है फिर ये लो पैसे एडवांस।
  413. 22:53वो आदमी एडवांस पैसे देकर चला गया।
  414. 22:57बेटा इतना बड़ा ऑर्डर आज मुझे लग रहा है
  415. 23:00कि मेरी तपस्या सफल हुई।
  416. 23:03सच में मां विश्वास नहीं हो रहा है।
  417. 23:06कुछ ही महीनों में हरिया और लालू बहुत
  418. 23:09अमीर हो गए और वो अपना घर छुड़वा लेते
  419. 23:11हैं।
  420. 23:14तुमने हमको और सभी गांव वालों को बहुत
  421. 23:15सताया जमींदार लेकिन याद रखना अब हम तुमसे
  422. 23:19ज्यादा अमीर हैं।
  423. 23:21और इसीलिए अब कोई समझदारी दिखाने की कोशिश
  424. 23:24मत करना। हां।
  425. 23:27अरे नहीं नहीं भाई मैं अब से कभी ऐसा नहीं
  426. 23:30करूंगा। अब मैंने तुम्हारी गरीबी का फायदा
  427. 23:33उठाने की कोशिश की लेकिन भूल गया था कि
  428. 23:37किस्मत के आगे किसी की नहीं चलती। मुझे
  429. 23:40माफ कर दो भाई। मुझे माफ कर दो।
  430. 23:43हां, जाओ माफ किया। चलो बच्चों। इस घटना
  431. 23:47के बाद गांव का कोई भी शख्स जमींदार के
  432. 23:50आगे नहीं दबता था। और इस तरह हरिया और
  433. 23:53लालू की मेहनत से उनका भाग्य तो बदला और
  434. 23:56साथ ही जमींदार का दबदबा भी खत्म हो गया।
  435. 24:01[संगीत]

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