Reality of India-Pakistan War of 1947 | The Untold Truth of Kashmir’s Conflict — Transcript
Full transcript
- 0:0022 अक्टूबर 1947 धरती पर स्वर्ग कहे जाने
- 0:03वाले जम्मू एंड कश्मीर की वादियों में
- 0:05हल्की बर्फबारी शुरू हो चुकी थी। बर्फ की
- 0:08नरम चादर घाटी को ढकने लगी थी। लेकिन किसी
- 0:11को अंदाजा भी नहीं था कि इन खूबसूरत
- 0:13वादियों में जल्द ही एक भयानक तूफान उठने
- 0:16वाला है। जम्मू एंड कश्मीर के महाराजा हरि
- 0:18सिंह भारत और पाकिस्तान दोनों में से किसी
- 0:20के भी साथ ना जाने के फैसले को अपनी जीत
- 0:23मानकर चैन की नींद सो रहे थे। उन्हें यकीन
- 0:26था कि जम्मू एंड कश्मीर स्वतंत्र रहकर
- 0:28सुकून से जी सकेगा। मगर उन्हें कहां पता
- 0:30था कि उनकी हसीन रियासत को लहूलुहान करने
- 0:33के लिए सीमा के उस पार पाकिस्तान में एक
- 0:36नापाक साजिश रची जा चुकी है। उसी खौफनाक
- 0:39साजिश को अंजाम देने के लिए पाकिस्तान की
- 0:41ओर से हजारों हथियार बंद कबायली लड़ाकों
- 0:44और कबायलियों के ही भेष में हजारों
- 0:46पाकिस्तानी सैनिक जम्मू एंड कश्मीर में
- 0:48घुस आते हैं और कत्लेआम शुरू कर देते हैं।
- 0:51उन्होंने बारामुल्ला पूरी और मुजफराबाद
- 0:54में गांव के गांव जला दिए। जहां भी उन्हें
- 0:56हिंदू और सिख दिखे उनका गला काट दिया।
- 0:58महिलाओं की आबरू लूट ली गई। खौफ का ऐसा
- 1:01माहौल था कि कबायलियों के हाथ लगने से
- 1:04पहले करीब 400 महिलाओं ने अपनी इज्जत
- 1:06बचाने के लिए कुएं में कूदकर अपनी जान दे
- 1:08दी। हर सिंह का स्वतंत्र रहने का सपना
- 1:11चकनाचूर हो गया था। अपनी रियासत को जलते
- 1:13और लोगों को कटते देख उन्होंने जम्मू एंड
- 1:16कश्मीर का भारत में विलय कर दिया। अब
- 1:18जम्मू एंड कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा
- 1:20था और भारत ने अपनी जमीन और अपने लोगों की
- 1:23रक्षा के लिए इंडियन आर्मी को जम्मू एंड
- 1:25कश्मीर में तैनात कर दिया। इसी के साथ
- 1:27भारत और पाकिस्तान के बीच पहली वॉर शुरू
- 1:30हो जाती है। कड़ाके की ठंड, दुर्गम
- 1:32पहाड़ियों और पहले से घात लगाकर बैठे
- 1:35दुश्मन के बीच भारतीय जवानों ने करीब एक
- 1:38साल तक ऐसी जंग लड़ी कि पाकिस्तानी सेना
- 1:41और उसके कबायली लड़ाकों को एक-एक करके
- 1:43कश्मीर के बहुत से इलाकों से खदेड़ दिया।
- 1:46भारत जम्मू एंड कश्मीर की इस वॉर को जीतने
- 1:49की तरफ तेजी से बढ़ रहा था। लेकिन तभी कुछ
- 1:51ऐसा होता है कि भारत को जम्मू एंड कश्मीर
- 1:54के केवल 2 तिहाई हिस्से से ही संतोष करना
- 1:57पड़ता है। आइए जानते हैं भारत और
- 1:58पाकिस्तान के बीच लड़ी गई इस पहली जंग की
- 2:01पूरी कहानी। यह युद्ध आखिर शुरू क्यों
- 2:03हुआ? कैसे इंडियन आर्मी ने एक साथ
- 2:05पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी कबायलियों
- 2:08को काउंटर किया? और आखिर ऐसा क्या हुआ कि
- 2:10भारत को अपनी विजय यात्रा बीच में ही
- 2:13रोकनी पड़ी। फॉर द प्रिंसली स्टेट ऑफ
- 2:15जम्मू एंड कश्मीर रूल बाय द डोगरा किंग
- 2:17हरी सिंह। द वर्स्ट वाज़ येट टू कम। फर्स्ट
- 2:20अटैक ऑन इंडिपेंडेंट इंडिया टूक प्लेस एन
- 2:23अटैक ऑन कश्मीर बाई पश्तून ट्राइब्स मैन
- 2:26मोबिलाइज्ड बाय पाकिस्तान। द फर्स्ट ऑफ द
- 2:29इंडियन आर्मी सोल्जर्स डिस्पैचड फॉर द
- 2:31मिशन टू रिपल्स दिस पाकिस्तानी फोर्सेस।
- 2:36दिस वर्ल्ड पाकिस्तान वीट टू द
- 2:38सिक्योरिटी।
- 2:441947 भारत के इतिहास का वो साल था जब भारत
- 2:47ने आजादी की सांस तो ली लेकिन उस सांस में
- 2:49बंटवारे का दर्द घुला हुआ था। अनडिवाइडेड
- 2:52इंडिया के सपने को दरकिनार कर भारत के दो
- 2:55टुकड़े कर दिए गए और उसमें से एक नया देश
- 2:57पाकिस्तान बना दिया गया। इस विभाजन ने
- 2:59सिर्फ जमीनें ही नहीं बांटी बल्कि लाखों
- 3:02लोगों की जिंदगी, रिश्ते और घरों को भी
- 3:04बांट दिया। अगस्त 1947 के खत्म होते-होते
- 3:07इंडिया और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया
- 3:10था। कम्युनल राइट्स भड़क उठे चारों तरफ
- 3:12वायलेंस और केओस फैल गया। लाखों लोग अपनी
- 3:15जान बचाने के लिए अपना सब कुछ छोड़कर
- 3:17भागने के लिए मजबूर हो गए। इसी अफरातफरी
- 3:20में ही जम्मू एंड कश्मीर की कहानी शुरू
- 3:22होती है। जम्मू एंड कश्मीर के महाराजा हरी
- 3:24सिंह एक कठिन मोड़ पर खड़े थे। वो खुद
- 3:26हिंदू थे। लेकिन उनकी रियासत की करीब 77%
- 3:29आबादी मुस्लिम थी। देश के बंटवारे के बाद
- 3:32सभी प्रिंसली स्टेट्स के सामने तीन ऑप्शंस
- 3:35थे। पहला भारत में शामिल होना। दूसरा
- 3:37पाकिस्तान का हिस्सा बनना और तीसरा एक
- 3:40इंडिपेंडेंट स्टेट बनकर रहना। हरी सिंह ने
- 3:43यहां तीसरे ऑप्शन को चुनकर जम्मू एंड
- 3:45कश्मीर को एक इंडिपेंडेंट स्टेट बनाए रखने
- 3:47का फैसला किया। उन्होंने 12 अगस्त 1947 को
- 3:51भारत और पाकिस्तान के साथ स्टैंडस्टिल
- 3:53एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा। भारत ने इस
- 3:55एग्रीमेंट पर विचार करने के लिए कुछ वक्त
- 3:57मांगा लेकिन पाकिस्तान ने इसे तुरंत
- 3:59एक्सेप्ट कर लिया। पाकिस्तान इस तरह जम्मू
- 4:01एंड कश्मीर का दोस्त बनने का नाटक कर रहा
- 4:04था जबकि असल में उसकी नियत कुछ और ही थी।
- 4:07पाकिस्तान की नजरें गिद्ध की तरह कश्मीर
- 4:09पर टिकी हुई थी। वो किसी भी कीमत पर उसे
- 4:11कब्जा आना चाहता था। जिन्ना को यह गुमान
- 4:14भी था कि मुस्लिम मेजॉरिटी वाला कश्मीर
- 4:16उनकी टू नेशन थ्योरी को मानेगा और वहां के
- 4:19लोग खुद ब खुद पाकिस्तान में शामिल हो
- 4:21जाएंगे। लेकिन उनका यह भ्रम जल्द ही टूट
- 4:23गया। हुआ कुछ यूं कि उसी दौरान मोहम्मद
- 4:25अली जिन्ना फेफड़ों की गंभीर बीमारी से
- 4:28जूझ रहे थे और डॉक्टर्स ने उन्हें कुछ दिन
- 4:30साफ हवा में आराम करने को कहा था। जिन्ना
- 4:33को इसके लिए धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले
- 4:35कश्मीर से बेहतर कोई जगह नहीं लगी। 24
- 4:37अगस्त 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने
- 4:41मिलिट्री सेक्रेटरी कर्नल विलियम बर्नी को
- 4:43कश्मीर जाकर वहां अपने ठहरने का अरेंजमेंट
- 4:46करने को कहा। कर्नल विलियम बर्नी कश्मीर
- 4:48गए। लेकिन 5 दिन बाद जब वह महाराजा हरी
- 4:51सिंह का जवाब लेकर लौटे तो जिन्ना तंग रह
- 4:53गए। हरी सिंह ने जिन्ना को कश्मीर में पैर
- 4:56रखने की भी इजाजत नहीं दी। जिन्ना की
- 4:58उम्मीदों पर पानी फिर गया। उन्हें पहली
- 5:00बार एहसास हुआ कि कश्मीर के हालात उनकी
- 5:02उम्मीदों से काफी अलग हैं। उनको एक और
- 5:05बड़ा झटका तब लगा जब उन्होंने जम्मू और
- 5:07कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्ला
- 5:10से कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने के
- 5:12प्रस्ताव का समर्थन करने को कहा। शेख
- 5:14अब्दुल्ला जो कि राजा हर सिंह के कट्टर
- 5:17विरोधी थे। लेकिन फिर भी उन्होंने जिन्ना
- 5:19के इस प्रपोजल को पूरी तरह ठुकरा दिया।
- 5:22जिन्ना के लिए साफ था कि ना केवल जम्मू
- 5:24एंड कश्मीर के राजा बल्कि वहां के मुस्लिम
- 5:27लीडर भी कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले
- 5:29नहीं करना चाहते थे। ऐसे में जिन्ना ने
- 5:31जम्मू एंड कश्मीर को बाय फोर्स कब्जाने का
- 5:34फैसला कर लिया। सितंबर 1947 में पाकिस्तान
- 5:37के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने लाहौर
- 5:40में कुछ चुनिंदा लोगों की एक गुप्त बैठक
- 5:42बुलाई जिसमें चर्चा हुई कि आखिर महाराजा
- 5:44हरी सिंह को जम्मू एंड कश्मीर के
- 5:47पाकिस्तान में मर्जर के लिए कैसे मजबूर
- 5:49किया जाए। बैठक में पहले कश्मीर पर सीधे
- 5:51हमले का सुझाव आया लेकिन पाकिस्तानी सेना
- 5:54हिंदुस्तान के साथ सीधी जंग लड़ने का
- 5:57जोखिम मोल लेने को तैयार नहीं थी। इसलिए
- 5:59दो और रास्तों पर विचार किया गया। पहला
- 6:01प्लान था कश्मीर की मुस्लिम आबादी को
- 6:04विद्रोह के लिए भड़काकर महाराजा के खिलाफ
- 6:06खड़ा करना। दूसरा प्लान था कबायली लड़ाकों
- 6:09को पैसे, हथियार और ट्रेनिंग देकर कश्मीर
- 6:11पर हमला करने के लिए भेजना। इस प्लान के
- 6:14पीछे सोच यह थी कि कबायलियों के जरिए हमला
- 6:16करने से पाकिस्तान पर इल्जाम भी नहीं आएगा
- 6:19और कश्मीर में दंगे, फसाद और हिंसा भी फैल
- 6:22जाएगी। जिससे महाराजा हरी सिंह घबराकर
- 6:24पाकिस्तान में विलय के लिए मजबूर हो
- 6:26जाएंगे। लियाकत अली खान को यह योजना बहुत
- 6:29पसंद आई और उन्होंने तुरंत इसे आगे बढ़ाने
- 6:31की मंजूरी दे दी। इसके बाद पाकिस्तान में
- 6:33जम्मू एंड कश्मीर को फोर्सफुली कैप्चर
- 6:35करने के लिए ऑपरेशन गुलमर की प्लानिंग
- 6:38शुरू हो गई। पाकिस्तान आर्मी ने कश्मीर पर
- 6:40हमले के लिए 20 ट्राइबल लश्कर तैयार किए।
- 6:43हर लश्कर में हजार पश्तून ट्राइब्समैन थे।
- 6:45इन फाइटर्स को बनू, वाना, पेशावर, कोहत,
- 6:49थाल और नौशेरा में ट्रेन किया जा रहा था।
- 6:51ट्रेनिंग पूरी होने के बाद 18 अक्टूबर तक
- 6:53यह सभी अबोटाबाद में गैदर होकर 22 अक्टूबर
- 6:56को जम्मू एंड कश्मीर पर दो तरफा हमला करने
- 6:59वाले थे। 10 लश्कर मुजफराबाद रूट से
- 7:02कश्मीर वैली पर अटैक करने वाले थे। जबकि
- 7:04बाकी के 10 भिम्बर, रावलकोट और पूंछ से
- 7:07होते हुए जम्मू की ओर बढ़ने वाले
- 7:12थे। उस समय भारत और पाकिस्तान दोनों
- 7:15सेनाओं के कमांडर इन चीफ ब्रिटिश ऑफिसर्स
- 7:18थे। पाकिस्तान की तरफ से जनरल फ्रैंक
- 7:20मेसरवी और भारत की तरफ से जनरल रॉबर्ट
- 7:23लोखार्ट थे। दोनों अंग्रेज थे और दोनों
- 7:25में दोस्ती थी। इसलिए मोहम्मद अली जिन्ना
- 7:27को डर था कि उनकी कश्मीर पर हमले की साजिश
- 7:30के बारे में अगर मेसरवी को पता चल गया तो
- 7:33बात कहीं लॉकट तक ना पहुंच जाए। इसलिए
- 7:35उन्होंने अपनी सेना के कमांडर इन चीफ जनरल
- 7:37फ्रैंक मेसरवी को लंदन भेज दिया। लेकिन
- 7:40किसी तरह इस हमले से पहले इस प्लानिंग की
- 7:42खबर एक इंडियन ऑफिसर मेजर ओ एस कालकट को
- 7:45लग जाती है। वह पाकिस्तान की इस नापाक
- 7:47साजिश की जानकारी अपने सीनियर ऑफिसर्स और
- 7:50डिफेंस मिनिस्ट्री तक पहुंचाते हैं। लेकिन
- 7:52हैरानी की बात यह थी कि कोई उनकी बातों पर
- 7:54भरोसा नहीं करता। जल्द ही मेजर ओएस कालकट
- 7:57की जानकारी सही साबित हुई और 22 अक्टूबर
- 8:001947 को पाकिस्तान ने हजारों कबायली
- 8:03लड़ाकों के जरिए जम्मू एंड कश्मीर पर हमला
- 8:05बोल दिया। कश्मीर में घुसते ही हथियारों
- 8:07से लेस कबायलियों ने तांडव मचाना शुरू कर
- 8:10दिया। उन्होंने यहां हिंदुओं और सिखों के
- 8:12घरों में भारी लूटपाट की। उनका गला काटकर
- 8:15उनके घरों को आग के हवाले कर दिया गया।
- 8:17हजारों निर्दोष लोगों को बेरहमी से मार
- 8:20दिया गया। शहर के शहर जला दिए गए। कश्मीर
- 8:23में हर तरफ लाशें बिछ गई। पाकिस्तानी
- 8:25कबायलियों ने बारामुल्ला में तो वह आतंक
- 8:28मचाया कि इंसानियत शर्मसार हो जाए। वहां
- 8:30के गिरजा घर और अस्पताल में मौजूद औरतों
- 8:33का सामूहिक यौन शोषण किया गया। अस्पताल
- 8:36में भर्ती मरीजों का कत्ल कर दिया गया और
- 8:38शहर में आग लगा दी गई। पाकिस्तान को पूरा
- 8:41यकीन था कि कश्मीर की मुस्लिम पॉपुलेशन
- 8:43उसकी इस नापाक साजिश का समर्थन करेगी।
- 8:46लेकिन असल सच्चाई कुछ और थी। कबाय अली जब
- 8:49बारामुल्ला को बुरी तरह रौंदने के बाद
- 8:51श्रीनगर पहुंचने की कोशिश में थे तब
- 8:53उन्हें मकबूल शेरवानी नाम का एक मुस्लिम
- 8:56नौजवान मिला जिससे उन्होंने श्रीनगर का
- 8:58रास्ता पूछा। शेरवानी उन्हें श्रीनगर के
- 9:00बजाय एक दूसरे ही रास्ते पर ले गया और 2
- 9:03दिन तक उनको इधर-उधर भटकाता रहा। उसका
- 9:05इरादा था कि पाकिस्तानी श्रीनगर तक ना
- 9:08पहुंच पाए या फिर उन्हें इतनी देर हो जाए
- 9:10कि तब तक कश्मीर को बचाने के लिए कहीं से
- 9:13कोई मदद आ जाए। लेकिन दो दिन तक भटकने के
- 9:15बाद पाकिस्तानी ट्राइबल फोर्सेस को एहसास
- 9:18हो गया कि शेरवानी उनको बेवकूफ बना रहा
- 9:20है। इसलिए वह उसे वापस बारामुल्ला लेकर आए
- 9:23और उसे खंभे से लटका कर 14 गोलियां मारी
- 9:26जिससे उसका शरीर छल्ली हो गया। उसकी बेरहम
- 9:28हत्या करके पाकिस्तानी घुसपैठिए लोकल जनता
- 9:32में दहशत फैलाना चाहते थे। इस तरह उन्हें
- 9:34आम मुस्लिम जनता का साथ पाने के लिए भी
- 9:36बंदूक का सहारा लेना पड़ रहा था। इसके बाद
- 9:39इन कबायलियों ने महूरा पावर हाउस को उड़ा
- 9:41दिया जिससे पूरे श्रीनगर की बिजली कट गई
- 9:44और हर तरफ अंधेरा छा गया। वक्त बड़ी तेजी
- 9:46से निकलता जा रहा था और पाकिस्तानी
- 9:49घुसपैठियों के हर बढ़ते कदम के साथ कश्मीर
- 9:51बर्बाद होता जा रहा था। गौर करने वाली बात
- 9:54यह है कि पाकिस्तान की वजह से जो कश्मीर
- 9:56में कत्लेआम चल रहा था जब पाकिस्तान से
- 9:59इसके बारे में पूछा गया तो उसने सफेद झूठ
- 10:01बोलते हुए इस हमले में अपनी इनवॉल्वमेंट
- 10:04से साफ इंकार कर दिया। पाकिस्तान के इस
- 10:06दोहरी चाल में महाराजा हररी सिंह फंसते जा
- 10:08रहे थे और उन्हें अपनी रियासत रेत की तरह
- 10:11साफ-साफ पाकिस्तान की ओर फिसलती दिख रही
- 10:14थी। ऐसे में उन्हें अपने राज्य को बचाने
- 10:16के लिए भारत की याद आई। आखिरकार उन्होंने
- 10:18भारत से मदद की गुहार लगाई। कश्मीर को
- 10:20जलता देख भारत भी कश्मीर की मदद करना
- 10:23चाहता था। लेकिन दिक्कत यह थी भारत इस
- 10:26मामले में तब तक कुछ नहीं कर सकता था जब
- 10:28तक आधिकारिक रूप से जम्मू एंड कश्मीर भारत
- 10:31का हिस्सा नहीं बन जाता। पाकिस्तानी आर्मी
- 10:33भी कबालियों के साथ मिलकर जम्मू एंड
- 10:36कश्मीर पर लगातार तेज हमला कर रही थी और
- 10:39हरी सिंह के पास भारत की मदद के अलावा अब
- 10:41कोई ऑप्शन नहीं था। इसलिए 26 अक्टूबर 1947
- 10:45को महाराजा हरि सिंह ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ
- 10:47एक्सेशन पर दस्तखत कर दिए और इसके साथ ही
- 10:50जम्मू एंड कश्मीर आधिकारिक रूप से भारत का
- 10:53हिस्सा बन गया। इसके बाद इंडियन आर्म्ड
- 10:55फोर्सेस तुरंत हरकत में आ गई और अगले ही
- 10:57दिन कश्मीर की ओर निकल
- 11:01पड़ी। 27 अक्टूबर 1947 की सुबह भारतीय
- 11:05सेना ने कश्मीर की रक्षा के लिए ऑपरेशन
- 11:08जाग शुरू किया। इस मिशन का नेतृत्व
- 11:10लूटिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय कर रहे थे
- 11:12और उनके नेतृत्व में वन सिख बटालियन को
- 11:15गुड़गांव से श्रीनगर एयरलिफ्ट कर दिया
- 11:17गया। सुबह 5:00 बजे चार डकोटा प्लेेंस
- 11:19दिल्ली के सबदर्जन एयरपोर्ट से उड़े और
- 11:223:30 घंटे बाद सुबह के 8:30 बजे श्रीनगर
- 11:25पहुंच गए। श्रीनगर पहुंचते ही लूटिनेंट
- 11:27कर्नल दीवान रंजीत राय की अगुवाई में
- 11:29इंडियन आर्मी ने बारामुल्ला में मोर्चा
- 11:31संभाला और कबायलियों पर कहर बनकर टूट
- 11:34पड़े। उनकी कंपनी ने पाकिस्तानी कबायलियों
- 11:36और पाकिस्तानी सैनिकों को रोकने के लिए
- 11:39जबरदस्त काउंटर अटैक किया। लेकिन यहां
- 11:414000 से भी ज्यादा पाकिस्तानी सोल्जर्स और
- 11:44ट्राइबल इंफिल्ट्रेटर्स मौजूद थे। इसलिए
- 11:46उन्हें भी यहां एक जबरदस्त प्रतिरोध का
- 11:48सामना करना पड़ा। लटिनेंट कर्नल दीवान
- 11:51रंजीत राय ने अपने जवानों को हौसला देते
- 11:53हुए कई दिनों तक दुश्मन को उलझाए रखा और
- 11:56आगे बढ़ने से रोके रखा। बारामुल्ला में
- 11:58इंडियन आर्मी की स्थिति को मजबूत करने के
- 12:00बाद उन्होंने श्रीनगर की ओर अपना ध्यान
- 12:02शिफ्ट किया। लेकिन इसी बीच दुश्मन की एक
- 12:05गोली उनकी गर्दन में लग गई और लूटिनेंट
- 12:08कर्नल दीवान रंजीत राय वीरगति को प्राप्त
- 12:10हो गए। आगे चलकर उनके अदम में साहस और देश
- 12:13की खातिर सर्वोच्च बलिदान के लिए महावीर
- 12:16चक्र देकर उनका ऑनर किया गया। वह इस
- 12:18सम्मान को पाने वाले पहले इंडियन सोल्जर
- 12:21थे। इंडियन आर्मी ने इस जंग में अपनी ताकत
- 12:23बढ़ाने के लिए 31 अक्टूबर को एचक्यू 161
- 12:26ब्रिगेड को श्रीनगर एयरलिफ्ट कर दिया। साथ
- 12:29ही थ्री पैरा राजपूत बटालियन और वन मेहर
- 12:32एमएमजी की कंपनी को पठानकोट से बाय रोड
- 12:34जम्मू भेजा गया। इसके अगले ही दिन 1 नवंबर
- 12:37को इंडियन आर्मी की कई बटालियंस को कश्मीर
- 12:39के अलग-अलग हिस्सों में तैनात कर दिया
- 12:41गया। दुश्मन के आक्रमण की गति को धीमा
- 12:44करने के बाद 3 नवंबर की सुबह बड़गांव में
- 12:47चार कुमाऊं रेजीमेंट की तीन कंपनीज़
- 12:49पेट्रोल ड्यूटी पर भेजी गई। जिसमें मेजर
- 12:51सोमनाथ शर्मा की डी कंपनी भी शामिल थी। जब
- 12:54उनकी कंपनी बड़गांव पहुंची तो अचानक यहां
- 12:56के घरों से उनके ऊपर गोलीबारी शुरू हो गई।
- 12:59इससे पहले कि वह इससे संभल पाते गुलम्ग की
- 13:02दिशा में 700 ट्राइबल इनफिल्ट्रेटर्स का
- 13:04एक बड़ा लश्कर बड़गांव पहुंच गया। मेजर
- 13:07सोमनाथ शर्मा और उनकी कंपनी के जवान चारों
- 13:09ओर से दुश्मनों से घिर चुके थे। स्थिति
- 13:12इतनी नाजुक थी कि इंडियन सोल्जर के
- 13:14मुकाबले यहां सात गुना ज्यादा दुश्मन थे
- 13:16जो भारतीय सेना पर अंधाधुंध गोलीबारी कर
- 13:19रहे थे। इसके बावजूद मेजर सोमनाथ शर्मा ने
- 13:22बिना डरे दुश्मन का सामना करना जारी रखा
- 13:25और अपनी कंपनी का हौसला बढ़ाते हुए कहा,
- 13:27भले ही हम संख्या में कम है लेकिन हम यहां
- 13:30से 1 इंच भी पीछे नहीं हटेंगे। हम अपने
- 13:32देश की खातिर अपनी आखिरी सांस तक लड़ते
- 13:35रहेंगे। उनकी मदद के लिए वन कुमाऊं की एक
- 13:37कंपनी भी बड़गांव की ओर आगे बढ़ी। लेकिन
- 13:40मेजर सोमनाथ शर्मा को मदद के इंतजार में
- 13:42बैठे रहना मंजूर नहीं था। उन्होंने अपने
- 13:45साथी जवानों के साथ मिलकर इस खूनी संघर्ष
- 13:48में 200 से ज्यादा दुश्मनों को मार
- 13:50गिराया। इतनी भारी कैजुअल्टीज के कारण
- 13:52पाकिस्तानी ट्राइबल्स का मोमेंटम टूट गया।
- 13:54बड़गांव की इस लड़ाई ने इंडियन आर्मी को
- 13:56रीइंफोर्समेंट्स भेजने के लिए जरूरी समय
- 13:59दिला दिया और दुश्मन का श्रीनगर पर कब्जे
- 14:01का सपना चकनाचूर कर दिया। लेकिन इस भीषण
- 14:04लड़ाई में मेजर सोमनाथ शर्मा बड़गांव की
- 14:07रक्षा करते-करते देश के लिए शहीद हो गए।
- 14:10इंडियन गवर्नमेंट ने उनके सर्वोच्च बलिदान
- 14:12के लिए उन्हें परमवीर चक्र देकर सम्मानित
- 14:15किया। वह परमवीर चक्र पाने वाले देश के
- 14:18पहले जवान थे। अगले कुछ दिनों में इंडियन
- 14:20आर्मी ने बारामुल्ला को फिर से अपने
- 14:22नियंत्रण में ले लिया और फिर पूंछ की ओर
- 14:25कूच कर दिया। भारतीय जवान किसी तरह पूंछ
- 14:27तक पहुंचने में सफल तो रहे लेकिन वहां
- 14:29दुश्मन की घेराबंदी को पूरी तरह से हटा
- 14:32नहीं सके। कोतली में भी इंडियन आर्मी की
- 14:34संख्या बहुत कम थी इसलिए उन्हें कोतली को
- 14:37खाली करना पड़ा। हालांकि भारतीय सेना 13
- 14:39नवंबर 1947 तक पूरी को रिकैप्चर करने में
- 14:43सफल रही। जिससे श्रीनगर पर मंडरा रहा खतरा
- 14:45पूरी तरह से टल गया। रॉयल इंडियन एयरफोर्स
- 14:48ने भी बारामुल्ला मुजफराबाद रोड पर दुश्मन
- 14:51पर लगातार हवाई हमले करके उसको पीछे हटने
- 14:54को मजबूर किया। शुरुआती दौर में ही ऑपरेशन
- 14:56जैक की सफलता ने कश्मीर पर पाकिस्तान के
- 14:59कब्जे के सपने को पूरी तरह से तोड़ दिया
- 15:01था। लेकिन यह बस एक शुरुआत थी। जम्मू एंड
- 15:04कश्मीर के कई क्षेत्रों में अब भी
- 15:06पाकिस्तानी सैनिकों और कबाइलों का कब्जा
- 15:08था और इन्हें उनसे फ्री करने के लिए कई
- 15:10मोर्चों पर भयानक युद्ध जारी था। इस बीच
- 15:13सबसे बुरा हाल मीरपुर का था। 25 नवंबर
- 15:161947 तक मीरपुर को अपने कब्जे में करने के
- 15:19बाद पाकिस्तान आर्मी और कबायलियों ने यहां
- 15:22एक बड़े मैसकर को अंजाम दिया। यहां
- 15:24उन्होंने हजारों हिंदुओं का नरसंहार किया
- 15:26और महिलाओं को किडनैप कर पाकिस्तान भेज
- 15:29दिया। वहां महिलाओं को रावलपिंडी के कोठों
- 15:31पर कौड़ियों के भाप बेच दिया गया। जहां
- 15:34उनके साथ अत्याचार की सारी हदें पार कर दी
- 15:36गई। इस भयानक अत्याचार से मीरपुर की हिंदू
- 15:39महिलाएं इस कदर डर गई कि उन्होंने
- 15:41कबायलियों के हाथ लगने से पहले खुद को
- 15:44खत्म करना सही समझा और करीब 400 महिलाओं
- 15:47ने कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी।
- 15:49पाकिस्तानी हमलावरों को कश्मीर को दहलाते
- 15:52हुए अब करीब 2 महीने होने को थे। दिसंबर
- 15:55के महीने में उन्होंने पूरे जम्मू डिवीजन
- 15:57में भारी तबाही मचाई। कोतली, बाग, रावलकोट
- 16:00और पूंछ में हजारों हिंदुओं की हत्या कर
- 16:02दी। रजौरी में तो क्रूरता की सारी हदें
- 16:05पार करते हुए 30ज़ नॉन मुस्लिम्स का बेरहमी
- 16:08से कत्ल कर दिया गया। इस दौरान भारतीय
- 16:10सैनिकों को नौशेरा और कोतली में कुछ सफलता
- 16:13जरूर मिली। लेकिन कहूता, भादगिरन और झांगर
- 16:17में काफी कैजुअल्टीज का सामना करना पड़ा।
- 16:19अगले महीने भारतीय सेना की स्थिति में
- 16:21यहां काफी सुधार आया। 23 जनवरी 1948 तक
- 16:24भारतीय सेना ने तुंग क्षेत्र को अपने
- 16:27कंट्रोल में ले लिया। इसके बाद ठंडा पानी
- 16:29में तावी नदी पार कर आगे बढ़ने की योजना
- 16:31बनाई गई। लेकिन जैसे ही भारतीय सेना 25
- 16:34जनवरी की सुबह सयत और 2502 की ओर बढ़ी,
- 16:38उन्हें दुश्मन की ओर से भारी गोलीबारी का
- 16:40सामना करना पड़ा। इससे भारतीय सेना को कुछ
- 16:42देर के लिए पीछे हटना पड़ा। लेकिन पीछे
- 16:44हटते हुए भी उन्होंने दुश्मन को करारा
- 16:47जवाब दिया और करीब 100 पाकिस्तानी सैनिकों
- 16:49को मार गिराया।
- 16:53इस महत्वपूर्ण जीत के बाद इंडियन आर्मी ने
- 16:56वेस्टर्न कमांड को अपने कंट्रोल में करने
- 16:58का फैसला किया। लटिनेंट जनरल के एम
- 17:00कारियापा ने पूंछ और जांगर को जीतने की
- 17:03जिम्मेदारी ब्रिगेडिया उस्मान को सौंपी।
- 17:05जांगर भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद
- 17:07महत्वपूर्ण था। लेकिन वहां तक पहुंचने के
- 17:10लिए भारतीय सेना को पहले नौशेरा से
- 17:12पाकिस्तानियों को खदेड़ना जरूरी था। इस
- 17:14इरादे से ब्रिगेडियर उस्मान ने अपनी 50th
- 17:17पैराशूट रेजीमेंट के साथ 6th फरवरी 1948
- 17:20को नौशेरा पर धावा बोल दिया। वहां कब्जा
- 17:23जमाए बैठे पाकिस्तानी हमलावरों ने इसका
- 17:25जबरदस्त प्रतिरोध किया लेकिन ब्रिगेडियर
- 17:28उस्मान की शानदार रणनीति और 50थ पैराशूट
- 17:31रेजीमेंट के जवानों के आगे वो ज्यादा देर
- 17:33तक टिक नहीं सके। भारतीय फौज का यह हमला
- 17:35इतना जबरदस्त था कि यहां हजार से ज्यादा
- 17:38पाकिस्तानी मारे गए और हजारों बुरी तरह से
- 17:41घायल हो गए। इतनी भारी संख्या में अपनों
- 17:43को मरता देख पाकिस्तानी घुसपैठिए पूरी तरह
- 17:46घबरा गए और आखिरकार वो नौशेरा से भाग
- 17:48निकले। इस भीषण युद्ध में भारत के भी 32
- 17:51सैनिकों को अपने प्राणों की आहुति देनी
- 17:53पड़ी थी। इस युद्ध के बाद ब्रिगेडियर
- 17:55उस्मान को लायन ऑफ नौशेरा कहा जाने लगा।
- 17:58पाकिस्तान ब्रिगेडियर उस्मान से इतना
- 18:00भयभीत हो गया कि उसने उन्हें मारने या
- 18:03जिंदा पकड़ने वाले को ₹500 इनाम देने की
- 18:06घोषणा कर दी। नौशेरा की शानदार जीत के बाद
- 18:09इंडियन फोर्सेस ने झांगर की ओर कदम बढ़ा
- 18:11दिए। झांगर कई महीनों से पाकिस्तानी सेना
- 18:14और कबायलियों के लिए मीरपुर और कोतली के
- 18:16बीच एक इंपॉर्टेंट जंक्शन बना हुआ था।
- 18:19इसलिए भारत जल्द से जल्द दुश्मन की इस
- 18:21कम्युनिकेशन लाइन को काटना चाहता था। 5
- 18:23मार्च 1948 को भारतीय सेना ने झांगर की ओर
- 18:27कूच किया। सबसे पहले अमलीधार को दुश्मनों
- 18:29के कब्जे से मुक्त कराया गया। अमलीधार की
- 18:32जीत से भारतीय सेना के लिए आगे का रास्ता
- 18:34खुल गया। जिसके बाद भारतीय सेना ने कमान
- 18:37गोशा गाला से भी दुश्मन को खदेड़ दिया।
- 18:40मगर असली चुनौती अभी बाकी थी। जंगर पर
- 18:42सीधा हमला करना बेहद जोखिम भरा था। इसलिए
- 18:45भारतीय सेना ने जंगर को दुश्मनों के चंगुल
- 18:48से मुक्त कराने के लिए ऑपरेशन विजय की
- 18:50शुरुआत कर इस अभियान को दो फेजेस में बांट
- 18:53दिया। पहले फेज में भारतीय सेना की 19
- 18:56ब्रिगेड को 0.3327 और 0.3283 जैसी
- 19:00ऊंचाइयों पर कब्जा जमाने का जिम्मा सौंपा
- 19:02गया। जिसमें वन राजपूत, फोर डोगरा, वन
- 19:05कुमाऊं और अन्य सैन्य टुकड़ियों ने नाका
- 19:07गैप से आगे बढ़ते हुए दुश्मनों के ठिकानों
- 19:10पर धावा बोल दिया। दूसरे फेज के जरिए 50
- 19:12पैरा ब्रिगेड को झांगर और कुछ जरूरी
- 19:15पॉइंट्स को कैप्चर करना था। जिसका नेतृत्व
- 19:17खुद ब्रिगेडियर उस्मान कर रहे थे, जो अपने
- 19:19साथियों के साथ पहले ही नौशेरा में
- 19:22पाकिस्तानियों को धूल चटा चुके थे। झांगर
- 19:24तक पहुंचने के लिए भारतीय सैनिकों को
- 19:26पहाड़ों के बीच बेहद सावधानी से आगे बढ़ना
- 19:29पड़ रहा था। इसी बीच पाकिस्तानी सैनिक जो
- 19:32यहां पहले से ही जमे बैठे थे उन्होंने
- 19:34भारतीय सैनिकों की मौजूदगी भांप ली और
- 19:36तुरंत गोलीबारी शुरू कर दी। जल्द ही यहां
- 19:39दोनों तरफ से भीषण लड़ाई छिड़ गई। पूरा
- 19:41इलाका चारों तरफ गोलियों की तड़तहट और बम
- 19:44धमाकों की गूंज से दहल उठा। पाकिस्तानी
- 19:47सोल्जर्स ने इंडियन आर्मी पर जोरदार हमला
- 19:49बोला था। लेकिन भारतीय जांबाजों ने भी
- 19:52उनकी हर गोली का ऐसा जवाब दिया कि 17
- 19:55मार्च 1948 तक भारतीय सेना ने पीरथिल नाका
- 19:59से दुश्मन को साफ करके अपने अंडर कर लिया
- 20:02जो कि वन ऑफ द वाइटल स्ट्रेटेजिक पॉइंट्स
- 20:04था। अगले दिन सूरज की पहली किरण के साथ ही
- 20:07भारतीय सेना ने झांगर पर फाइनल अटैक लॉन्च
- 20:10कर दिया। पहले ही दिन थ्री पैरा राजपूत ने
- 20:13पॉइंट3477 को कैप्चर किया। जिसके बाद 50
- 20:16पैरा ब्रिगेड, थ्री मराठा ली और वन
- 20:18पटियाला ने झांगर को चारों तरफ से घेर
- 20:21लिया। यहां अगले दो महीनों तक भीषण लड़ाई
- 20:24चलती रही। भारतीय सेना के साहस और बेहतर
- 20:26रणनीति से यहां दुश्मन कमजोर पड़ने लगे।
- 20:29भारतीय सेना चिंगास, रजौरी और थाना मंडी
- 20:32में अपना जीत का परचम लहरा चुकी थी। दूसरी
- 20:35तरफ 19 और 80 ब्रिगेड्स ने छावा ब्रिज और
- 20:38सदावत सामान्य क्षेत्र में भी
- 20:40पाकिस्तानियों को एक और बुरी हार दे दी
- 20:42थी। जिससे जम्मू नौशेरा लाइन पूरी तरह
- 20:45सुरक्षित हो गई। लेकिन झांगर में हालात अब
- 20:48भी तनावपूर्ण बने हुए थे। दुश्मन रहकर
- 20:50हमले कर रहा था। देखते ही देखते जुलाई का
- 20:53महीना आ गया। 3 जुलाई 1948 की शाम
- 20:56ब्रिगेडियर उस्मान अपनी ब्रिगेड के साथ
- 20:58आगे की रणनीति पर काम कर रहे थे। तभी
- 21:00दुश्मनों ने अचानक से उनके कैंप पर 25
- 21:03पाउंडर शेल से भीषण हमला कर दिया। हमला
- 21:05इतना तेज और अचानक से हुआ था कि उन्हें
- 21:08संभलने का मौका नहीं मिल पाया और वह शहीद
- 21:10हो गए। मरणोपरांत भारत सरकार ने अपने इस
- 21:13बहादुर ऑफिसर का सम्मान महावीर चक्र देकर
- 21:16किया था। अपने कमांडर की मौत से भारतीय
- 21:19सेना गुस्से से भर गई और घायल शेर की तरह
- 21:21पाकिस्तानियों पर टूट पड़ी। नतीजा यह हुआ
- 21:24कि जुलाई खत्म होते-होते झांगर को पूरी
- 21:26तरह आजाद करवा लिया
- 21:30गया। झांगर की जीत के बाद भारतीय सेना ने
- 21:34अब टथवाल विलेज की ओर कदम बढ़ाए। यह विलेज
- 21:36स्ट्रेटेजिकली बहुत इंपॉर्टेंट था क्योंकि
- 21:38यहां से रिचमर गली और नस्ताचुन पास जैसे
- 21:41दो महत्वपूर्ण दर्रे निकलते थे जो घाटी के
- 21:44अन्य शहरों से संपर्क का मुख्य मार्ग थे।
- 21:46इथवाल विलेज की रक्षा की जिम्मेदारी सिक्स
- 21:48राजपूताना राइफलल्स को सौंपी गई। यहां
- 21:50पाकिस्तानी आर्मी ने पहाड़ियों की ऊंचाई
- 21:52पर मशीन गन पोस्ट और ग्रेनेड लॉन्चर्स
- 21:55तैनात कर रखे थे। ऊंचाई का फायदा उठाते
- 21:57हुए वह वहां से भारी संख्या में भारतीय
- 22:00सैनिकों को लगातार ग्रेनेड और गोलियों से
- 22:02निशाना बना रहे थे। इस तरह तिथवाल की
- 22:04लड़ाई भारतीय सेना के लिए मुश्किल साबित
- 22:07हो रही थी। भारतीय जवान दुश्मन की मशीन गन
- 22:09फायर और ग्रेनेड अटैक्स की चपेट में आ रहे
- 22:12थे। कई जवान शहीद हो चुके थे और सेना का
- 22:14मनोबल टूटने लगा था। उन्हें इस क्षेत्र को
- 22:16बचाने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।
- 22:19लेकिन तभी कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह ने
- 22:22अपने साथियों में जोश भरने के लिए अकेले
- 22:24मोर्चा संभालने का फैसला किया। पीरू सिंह
- 22:27ने दुश्मनों के ठिकानों की ओर तेजी से
- 22:29बढ़ना शुरू किया। वो मशीन गन और ग्रेनेड
- 22:31फायर के बीच भी दुश्मन के बंकर्स की ओर
- 22:34बढ़ते चले गए और बीच-बीच में दुश्मन पर
- 22:36ग्रेनेड से हमला करते रहे। एक के बाद एक
- 22:39उन्होंने कई पाकिस्तानी पोस्ट को तबाह कर
- 22:41दिया। बदले में पाकिस्तानियों ने भी उनके
- 22:44ऊपर एक ग्रेनेड फेंका जो उनके चेहरे पर
- 22:46आकर फटा। पीू सिंह बुरी तरह घायल हो गए और
- 22:49उनका चेहरा लहूलुहान हो गया। इसके बावजूद
- 22:51वो पीछे हटने के बजाय एक और ग्रेनेड लेकर
- 22:54दुश्मनों की ट्रेंच में कूद पड़े और दो
- 22:56पाकिस्तानी सोल्जर्स को मौत के घाट उतार
- 22:59दिया। हालांकि इसी दौरान दुश्मन की एक
- 23:01गोली मेजर पीरू सिंह के सिर में आ लगी। यह
- 23:04उनकी बहादुरी ही थी कि मौत के उस पल में
- 23:06भी उन्होंने एक ग्रेनेड एक और पाकिस्तानी
- 23:08ट्रेंच में फेंक दिया था। पीरू सिंह कई
- 23:11पाकिस्तानी फाइटर्स को मौत की नींद सुलाकर
- 23:13वीरगति को प्राप्त हो गए। पीू सिंह की
- 23:16वीरता ने उनकी बटालियन के साथियों को
- 23:18रिग्रुप और ऑर्गेनाइज होने का बहुमूल्य
- 23:21समय दे दिया। इंडियन आर्मी ने रीग्रुप
- 23:23होकर दुश्मनों पर भीषण हमला किया और
- 23:25तिथवाल विलेज को दुश्मनों से पूरी तरह
- 23:28मुक्त कर दिया। भारत सरकार ने मेजर पीरू
- 23:30सिंह के निस्वार्थ बलिदान का सम्मान
- 23:33मरणोपरांत परमवीर चक्र देकर
- 23:37किया। सदर्न फ्रंट पर जब इंडियन आर्मी ने
- 23:40जोरदार सफलता हासिल की, उसी दौरान नदर्न
- 23:43जम्मू एंड कश्मीर को भी पाकिस्तानियों से
- 23:45छुड़ाने की लड़ाई लड़ी जा रही थी। लेकिन
- 23:48यह राह इतनी आसान नहीं थी। पाकिस्तानियों
- 23:50का कंट्रोल सदर्न एरिया की तुलना में
- 23:52जम्मू एंड कश्मीर के नदर्न एरियाज में
- 23:55ज्यादा था। नदर्दन एरियाज में पाकिस्तान
- 23:57को लोकल मुस्लिम आबादी को महाराजा के
- 23:59खिलाफ भड़काने में काफी सफलता मिल चुकी
- 24:02थी। जिससे वो इस एरिया पर आसानी से कब्जा
- 24:04करने में कामयाब रहा। यहां तक कि 1 नवंबर
- 24:071947 को गिलगित में मेजर ब्राउन, लेटिनेंट
- 24:11हैदर खान और सब मेजर बाबर खान ने गिलगित
- 24:14स्काउट्स के 100 सैनिकों के साथ महाराजा
- 24:16के खिलाफ कु कर दिया और पाकिस्तान से जा
- 24:19मिले। गिलगित के बाद स्कर्दू की सिचुएशन
- 24:21भी टेंस हो गई। वहां की जनता भी महाराजा
- 24:23के खिलाफ विद्रोह करने लगी और इससे
- 24:25पाकिस्तान को गुराइस, द्रास, कारगिल और लह
- 24:28तक घुसपैठ करने का एक आसान रास्ता मिल
- 24:31गया। गिलगित पर पाकिस्तानी कब्जे के बाद
- 24:33नवंबर 1947 में लुटिनेंट कर्नल शेर जंग
- 24:37थापा और उनकी सिक्स जेन के इन्फेंट्री को
- 24:39स्करदू की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई।
- 24:413 दिसंबर 1947 को वह अपनी सैन्य टुकड़ी के
- 24:45साथ स्करदू पहुंचे और तुरंत मोर्चा संभाल
- 24:47लिया। यहां 285 भारतीय सैनिकों को 600
- 24:50दुश्मन लड़ाकों का सामना करना पड़ रहा था।
- 24:53लेकिन इसके बावजूद शेरजंग थापा के कुशल
- 24:56नेतृत्व और अदम में साहस ने पाकिस्तानी
- 24:58सेना को आगे बढ़ने का कोई मौका नहीं दिया।
- 25:0111 फरवरी 1948 को पाकिस्तानी फोर्सेस ने
- 25:04स्कर्दू पर कब्जे के मकसद से एक जोरदार
- 25:07हमला किया। इस बार वो हजारों की संख्या
- 25:10में मॉडर्न वेपन से लैस थे। इसके बावजूद
- 25:13शेरजंग थापा और उनके साथियों ने कई महीनों
- 25:16तक स्कर्दू को पाकिस्तानी जंगुल से बचा
- 25:18रखा। लेकिन 13 अगस्त 1948 को आखिरकार
- 25:21पाकिस्तान के संख्या बल और लगातार हमलों
- 25:24के कारण भारतीय सैनिकों को यहां अपनी
- 25:26पोजीशन गवानी पड़ी। हालांकि इतनी कम
- 25:29संख्या में होते हुए भी भारतीय सैनिकों ने
- 25:31इस करदू में जिस तरह का अद्भुत साहस
- 25:34दिखाया था वो उनके प्रतिरोध, बहादुरी और
- 25:36अटूट संकल्प की एक अमर गाथा बन गया।
- 25:39भारतीय सैनिकों के लिए नदन कश्मीर में
- 25:41हालात और भी गंभीर हो गए थे। लद्दाख वैली
- 25:4410,000 से 15,000 फीट की ऊंचाई पर
- 25:46सिचुएटेड है और कुछ जगहों पर यह ऊंचाई
- 25:4917,000 से 25,000 फीट तक होती है। भारत की
- 25:52ओर से लेह की रक्षा का जिम्मा डोगरा
- 25:54रेजीमेंट के कैप्टन पृथ्वी चंद और उनके
- 25:56कजिन कैप्टन कुशल चंद के नेतृत्व में 40
- 25:59लाहौली जवानों ने संभाला। मई 1948 तक
- 26:02सिचुएशन कंट्रोल में थी। लेकिन जैसे ही
- 26:05पाकिस्तानी हमलावरों ने कारगिल और द्रास
- 26:08पर कब्जा जमाकर लेह की ओर बढ़ना शुरू
- 26:10किया, भारत के लिए हालात बेहद गंभीर हो
- 26:12गए। अब लह को बचाने का एकमात्र रास्ता
- 26:15इंडियन एयरफोर्स की ताकत का इस्तेमाल करना
- 26:17ही था। 24 मई 1948 को स्थिति की गंभीरता
- 26:21को देखते हुए मेजर जनरल थेमैया और एयर
- 26:24कमोडोर मेहर सिंह खुद लह पहुंचे। दोनों ने
- 26:26मिलकर एयरक्राफ्ट को लह की दुर्गम घाटी
- 26:29में उतारने का साहसिक फैसला लिया। जल्द ही
- 26:31इंडियन एयरफोर्स के कई एयरक्राफ्ट्स ने इस
- 26:34क्षेत्र में उड़ान भरना शुरू कर दिया और
- 26:36मात्र दो हफ्तों में 24 गोखा राइफलल्स की
- 26:39एक पूरी कंपनी को एयरलिफ्ट करके लेह
- 26:41पहुंचाया। इससे पाकिस्तान फोर्सेस की लह
- 26:44की ओर बढ़ती तेज चाल को रोक दिया गया और
- 26:46इस क्षेत्र को भारत के एक मजबूत अभैद्य
- 26:49किले में तब्दील कर दिया गया। इस पूरे
- 26:51अभियान में एयर कॉमडोर, मेहर सिंह और उनके
- 26:54तीन साथी पायलट्स ने अहम भूमिका निभाई थी।
- 26:56उनकी इंस्पिरेशनल लीडरशिप और करेजियस
- 26:59फ्लाइंग के लिए उन्हें महावीर चक्र से
- 27:01सम्मानित किया गया। लेकिन जैसे ही गर्मी
- 27:03का मौसम आया, पाकिस्तान फोर्सेस ने एक बार
- 27:06फिर से कारगिल और दराज पर अपना शिकंजा
- 27:08कसना शुरू कर दिया। गिलगित स्काउट्स और
- 27:11पाकिस्तान फ्रंटियर राइफल्स के सैनिकों ने
- 27:13कारगिल के बुद्धिस्ट मंक्स का भयानक
- 27:15नरसंहार किया। गंस्कर पादुम मोनेस्ट्री के
- 27:18प्रमुख लामा को गोली मार दी गई और लद्दाख
- 27:21के दूसरे सबसे बड़े मठ रंगदुम गोमपा को
- 27:24पूरी तरह से नष्ट कर दिया। पाकिस्तान के
- 27:26इस बेरहम रवैया से पूरा इलाका दहल
- 27:31उठा। सितंबर 1948 में द्रास और कारगिल को
- 27:35फिर से हासिल करने के लिए भारतीय सेना ने
- 27:37ऑपरेशन डक की शुरुआत की। लेकिन उन्हें
- 27:40सफलता नहीं मिली क्योंकि द्रास और कारगिल
- 27:42में पाकिस्तानी सैनिकों और मिलीशिया ने
- 27:44भारी संख्या में मोर्चा संभाल रखा था। जो
- 27:47इलापास की दुर्गम पहाड़ियां और वहां का
- 27:49कठिन रास्ता पाकिस्तानियों के फेवर में था
- 27:52जिससे भारतीय सेना के लिए दुश्मन के
- 27:54ठिकानों पर लैंड और एयर दोनों से हमला
- 27:57करना लगभग नामुमकिन हो गया था। लेकिन ऐसी
- 28:00मुश्किल स्थिति में लेटिनेंट जनरल के एम
- 28:02कारियाप्पा ने इस युद्ध में एक नए रणनीतिक
- 28:05प्रयोग से पाकिस्तान को चौंकाने का फैसला
- 28:07किया। प्लान था हजारों किलो वजनी स्टुअर्ट
- 28:10टैंक को कच्चे रास्ते से पहाड़ों के ऊपर
- 28:13ले जाकर पाकिस्तानी सेना पर आक्रमण करना।
- 28:16केएम कारियाप्पा ने पाकिस्तानियों को चकमा
- 28:18देने के लिए ऑपरेशन डक का कोड नाम बदलकर
- 28:21ऑपरेशन बायसन कर दिया और जोजिलापास तक
- 28:24टैंकों को पहुंचाने की जिम्मेदारी जनरल
- 28:27थिमैया को सौंपी। इतनी ऊंचाई पर बसे
- 28:29दुश्मन ठिकानों तक भारतीय सेना का
- 28:31भारी-भरकम टैंकों के साथ पहुंचना और वहां
- 28:34से पाकिस्तानी फोर्सेस को हटाना किसी भी
- 28:36तरह से आसान नहीं था। पाकिस्तानी सेना
- 28:38पूरी तरह से सतर्क थी और भारतीय सैनिकों
- 28:41की हर हरकत पर नजर रख रही थी। जोजिला पास
- 28:44तक टैंकों को ले जाने के लिए मद्रास
- 28:47इंजीनियरिंग ग्रुप की दो कंपनियों ने
- 28:48दुर्गम रास्तों को तैयार किया। कमजोर
- 28:51लकड़ी के पुलों को मजबूत किया गया और
- 28:53सड़कों को भी बनाया गया। टैंक्स की
- 28:55टूरिट्स को अलग करके उन्हें ट्रंकों में
- 28:57छिपा कर ले जाया गया। रात के अंधेरे में
- 29:00पाकिस्तानी सेना की नजरों से बचते हुए यह
- 29:02टैंक्स जोजिला पास तक पहुंचा दिए गए। अब
- 29:05तक यहां का तापमान -20° सेल्सियस तक गिर
- 29:08चुका था। इस भीषण ठंड में भी भारतीय सेना
- 29:11ने 1 नवंबर 1948 को जोजिला पास पर आर्मर
- 29:15के 25 पाउंडर रेजीमेंट्स और 3.7 इंच गंस
- 29:18रेजीमेंट के साथ एक जबरदस्त सरप्राइज अटैक
- 29:21कर दिया। इस हमले में उनका साथ देने के
- 29:23लिए इंडियन एयरफोर्स के फाइटर प्लेेंस भी
- 29:26आसमान में गश्त कर रहे थे। जो किसी भी समय
- 29:28पाकिस्तानियों पर कहर बरपाने को तैयार थे।
- 29:31जब पाकिस्तानियों ने इंडियन आर्मी के
- 29:33टैंक्स और फाइटर प्लेेंस को एक साथ देखा
- 29:35तो उनके होश उड़ गए। उन्हें अपनी आंखों पर
- 29:37यकीन नहीं हो रहा था कि भारतीय सेना ने
- 29:40इतने भारी-भरकम टैंकों को बर्फ से ढके
- 29:4311,553 फीट ऊंचे पहाड़ों पर आखिर कैसे
- 29:46पहुंचाया। अगले दो हफ्तों तक भारतीय सेना
- 29:49और पाकिस्तानी सेना के बीच यहां घमासान
- 29:52युद्ध जारी रहा। इस बार भारतीय सेना की
- 29:54जबरदस्त तैयारी के आगे पाकिस्तानी फाइटर्स
- 29:57बिल्कुल नहीं टिक सके। पाकिस्तानी सेना के
- 29:59पास एंटी टैंक वेपंस नहीं थे जिससे वह
- 30:02भारतीय टैंकों के हमले के आगे पूरी तरह से
- 30:05बेबस हो गए। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी
- 30:07बंकरों को नेस्तानाबूद कर दिया और वह जल्द
- 30:10ही धराशाही हो गए। जोजिला पास अब पूरी तरह
- 30:13से भारत के नियंत्रण में आ गया। जोजिलापास
- 30:16की जीत के बाद इंडियन आर्मी ने 17 नवंबर
- 30:18को कारगिल और द्रास पर जोरदार हमला बोल
- 30:21दिया। यहां की लड़ाई जल्द ही हैंड टू हैंड
- 30:24कॉम्बैट में तब्दील हो गई। जिससे यह
- 30:26संघर्ष सिर्फ हथियारों तक सीमित ना रहकर
- 30:28शारीरिक बल और मानसिक संकल्प की परीक्षा
- 30:31बन गया था। दोनों मोर्चों पर कई दिनों तक
- 30:34लातघूंसों की लड़ाई चलती रही। आखिरकार
- 30:37भारतीय सैनिकों की ताकत के आगे
- 30:39पाकिस्तानियों ने अपने घुटने टेक दिए। 24
- 30:41नवंबर तक कारगिल और द्रास में
- 30:43पाकिस्तानियों को पूरी तरह से खदेड़ दिया
- 30:45गया। जोजिला पास द्रास और कारगिल की जीत
- 30:48के साथ-साथ लह पर पड़ रहा दबाव भी पूरी
- 30:51तरह खत्म हो गया। उसी दिन कारगिल को लेह
- 30:54और श्रीनगर से लिंक कर दिया गया जो भारतीय
- 30:56सेना की ऐतिहासिक जीत का जीता जागता
- 30:59प्रमाण बन गया। 1947 और 48 इंडोपाक वॉर की
- 31:03यह कुछ अंतिम महत्वपूर्ण घटनाएं थी। इस
- 31:06युद्ध में भारतीय सेना के 10,104 जवान
- 31:09शहीद हुए, और 3154 सैनिक घायल हुए। जबकि
- 31:13पाकिस्तानी सेना के 6000 से अधिक सैनिक
- 31:16मारे गए और 14,000 से ज्यादा घायल हुए।
- 31:19युद्ध की शुरुआत में ज्योग्राफिकल
- 31:20डिस्टेंस, खराब रोडवे और लिमिटेड एयर पावर
- 31:23के कारण भारतीय सेना को रिटालिएशन में कुछ
- 31:26देरी जरूर हुई। लेकिन भारतीय फौज ने अपनी
- 31:29मेंटल एंड फिजिकल रेजिलियंस, कमिटमेंट,
- 31:31ब्रेवरी और बेटर वॉर स्ट्रेटजी से
- 31:34पाकिस्तान के सैनिकों और कबायलियों से एक
- 31:36साथ भिड़कर उन्हें जम्मू एंड कश्मीर के एक
- 31:39बहुत बड़े पोर्शन से उल्टे पांव लौटने पर
- 31:41मजबूर कर दिया था। भारतीय फौज इस युद्ध की
- 31:44पूरी जीत की तरफ बढ़ ही रही थी कि तभी कुछ
- 31:46ऐसा होता है जिससे कश्मीर का मुद्दा ऐसा
- 31:49उलझता है कि वह आज तक नहीं सुलझ सका।
- 31:55जब जम्मू एंड कश्मीर में घमासान युद्ध
- 31:57छिड़ा हुआ था तब दिल्ली में भी काफी हलचल
- 32:00हो रही थी। युद्ध लगातार खींचता जा रहा
- 32:02था। दूर-दूर तक शांति की कोई उम्मीद नहीं
- 32:05दिखाई दे रही थी। ऐसे में भारत के वायसरॉय
- 32:07लॉर्ड माउंटबेटन ने युद्ध की गंभीरता को
- 32:10समझते हुए प्राइम मिनिस्टर जवाहरलाल नेहरू
- 32:12को इस मुद्दे को यूनाइटेड नेशंस यानी यूएन
- 32:15में ले जाने की सलाह दी। हालांकि सरदार
- 32:17वल्लभ भाई पटेल ऐसा नहीं चाहते थे। उनका
- 32:20मानना था कि कश्मीर भारत का इंटरनल मैटर
- 32:22है और इसमें विदेशी देशों का हस्तक्षेप
- 32:25भारत के विरोध में भी जा सकता है। इसलिए
- 32:27उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को
- 32:30इस मुद्दे को यूएन में ले जाने से काफी
- 32:32रोका। लेकिन नेहरू सरदार पटेल की बात को
- 32:35नजरअंदाज कर देते हैं और 1 जनवरी 1948 को
- 32:39इस मामले को यूनाइटेड नेशंस में ले जाते
- 32:41हैं। उन्होंने यूएन में यह तर्क दिया कि
- 32:43महाराजा हरी सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को
- 32:47इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर कर
- 32:49भारत में विलय स्वीकार कर लिया था। जिससे
- 32:51अब जम्मू एंड कश्मीर कानूनी रूप से इंडिया
- 32:54का इंटीग्रल पार्ट है। पर चूकि पाकिस्तानी
- 32:56इनफिल्ट्रेटर्स अवैध रूप से इसके कुछ
- 32:59हिस्से पर कब्जा कर चुके हैं। इसलिए
- 33:01यूनाइटेड नेशंस को इस मामले में हस्तक्षेप
- 33:04कर पाकिस्तान को जल्द से जल्द जम्मू एंड
- 33:06कश्मीर खाली करने का आदेश देना चाहिए।
- 33:08जवाहरलाल नेहरू को उम्मीद थी कि यूनाइटेड
- 33:11नेशंस भारत के पक्ष में फैसला लेगा। लेकिन
- 33:13यूएन में भारत का यह कदम एक बड़ी कूटनीतिक
- 33:16भूल साबित हुआ। यूएन ने सबसे पहले इसे
- 33:19भारत द्वारा उठाया गया जम्मू एंड कश्मीर
- 33:21क्वेश्चन मानने के बजाय इसे इंडिया
- 33:24पाकिस्तान क्वेश्चन में बदल दिया। इससे
- 33:26भारत का मामला आंतरिक सुरक्षा का मुद्दा
- 33:28ना रहकर दो देशों के बीच के विवाद में
- 33:30तब्दील हो गया जिससे पाकिस्तान को
- 33:33इंटरनेशनल लेवल पर बराबरी का दर्जा मिल
- 33:35गया। यह जवाहरलाल नेहरू के लिए एक बड़ा
- 33:37सेटबैक था। 21 अप्रैल 1948 को यूएन ने
- 33:41रेज़ोल्यूशन 47 पारित किया जिसमें कहा गया
- 33:43कि पाकिस्तान को पहले अपने सभी रेगुलर
- 33:46ट्रूप्स, इर्रेगुलर्स और ट्राइबल इनवेडर्स
- 33:48को जम्मू एंड कश्मीर से हटाना होगा। साथ
- 33:51ही भारत से भी अपनी सैन्य ताकत को वहां कम
- 33:54करने की बात की गई। भारत लॉ एंड ऑर्डर को
- 33:56मेंटेन करने के लिए लिमिटेड फोर्सेस को
- 33:58जम्मू एंड कश्मीर में रख सकता था। इसके
- 34:01बाद रेजोल्यूशन 47 में कहा गया कि जब ये
- 34:04दोनों शर्तें पूरी हो जाएंगी तब वहां फेयर
- 34:06एंड फ्री प्लेबिसाइड कराया जाएगा जिससे
- 34:08वहां की जनता तय करेगी कि जम्मू एंड
- 34:11कश्मीर भारत का हिस्सा बना रहेगा या
- 34:13पाकिस्तान में शामिल होगा। नवंबर 1948 में
- 34:16भारत और पाकिस्तान जनमत संग्रह पर सहमत हो
- 34:19गए। लेकिन पाकिस्तान ने यहां से अपने
- 34:21ट्रूप्स को कभी विड्रॉ ही नहीं किया।
- 34:23पाकिस्तान ने कश्मीर में अपनी सेना के
- 34:25साथ-साथ कबायली लड़ाकों को तैनात रखा। जिस
- 34:28वजह से भारत ने भी साफ कर दिया कि जब तक
- 34:31पाकिस्तान अपनी सेना पूरी तरह से वापस
- 34:33नहीं बुलाएगा प्लेबीसाइट संभव नहीं होगा।
- 34:36युद्ध के इस मोड़ पर 1 जनवरी 1949 को
- 34:39दोनों देशों ने युद्ध विराम पर सहमति
- 34:41जताई। सीज फायर लाइन वहीं पर तय की गई
- 34:44जहां उस वक्त दोनों देशों की सेनाओं ने
- 34:46अपनी-अपनी पोजीशन कायम कर रखी थी। इससे
- 34:49भारत के हिस्से जम्मू एंड कश्मीर का केवल
- 34:5165% हिस्सा ही आ सका। जबकि 35% हिस्सा
- 34:55पाकिस्तान के कब्जे में चला गया। जिसे
- 34:57पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर यानी पीओके के
- 35:00नाम से जाना जाता है। सीज फायर लाइन को
- 35:02लाइन ऑफ कंट्रोल यानी एलओसी में तब्दील कर
- 35:05दिया गया। आगे चलकर पाकिस्तान ने इस
- 35:07मुद्दे को और अधिक उलझाने के लिए 1963 में
- 35:10पीओके के शासकाम वैली का 5180 स्क्वायर
- 35:14कि.मी. एरिया चाइना को सौंप कर इस विवाद
- 35:17को और भी उलझा दिया। कश्मीर मुद्दे को
- 35:19यूएन में ले जाने के कारण जवाहरलाल नेहरू
- 35:22को आज भी क्रिटिसाइज किया जाता है। इस
- 35:24युद्ध में भारतीय सेना लगातार सफलताएं
- 35:27हासिल कर रही थी और पाकिस्तान की पकड़
- 35:29लगभग टूट चुकी थी। जिस वजह से काफी लोग आज
- 35:32भी यह मानते हैं कि अगर जवाहरलाल नेहरू इस
- 35:35मुद्दे को यूनाइटेड नेशंस में ना ले जाते
- 35:37तो भारतीय सेना पूरी रफ्तार से आगे बढ़कर
- 35:40पाकिस्तानी सेना और कबालियों को पीछे धकेल
- 35:43देती और आज पूरा का पूरा जम्मू एंड कश्मीर
- 35:46भारत का होता।
About this transcript
This page contains the full transcript of Reality of India-Pakistan War of 1947 | The Untold Truth of Kashmir’s Conflict by Mighty Monk, generated from the public captions YouTube serves with the video. The transcript has 6,390 words across 834 segments, with the original timestamps preserved so you can click any line to jump to that moment in the embedded player.
What you can do with it
Use the transcript to take notes, quote the speaker, build a study guide, generate a summary with ChatGPT or Claude via the YouTube Summary tool, or export it as a timed subtitle file with YouTube to SRT. You can also re-open it in the transcriber to translate the transcript into 100+ languages.
Free YouTube transcript tool
YouTube2Text is a free YouTube transcript generator — no signup, no daily limit. Paste any YouTube link and get the full transcript instantly, with timestamps, click-to-jump, translation to 100+ languages, AI prompts for ChatGPT, Claude, and Gemini, and exports to TXT, SRT, VTT, or Markdown.