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Radio Play - Malvikagnimitram by Kalidas । Episode #01 — Transcript

by Akashvani AIR · 2,960 words · 446 segments · language en · Watch on YouTube

Full transcript

  1. 0:02यह आकाशवाणी है मालविका अग्निमित्र आज
  2. 0:06प्रस्तुत है महाकवि कालिदास के सुप्रसिद्ध
  3. 0:11संस्कृत नाटक मालविका अग्नि मित्रम का
  4. 0:14हिंदी रेडियो नाट्य रूपांतर तो सुनिए नाटक
  5. 0:18मालविका अग्निमित्र
  6. 0:21[संगीत]
  7. 0:24आज प्रस्तुत है इस नाटक की पहली कड़ी
  8. 0:33[संगीत]
  9. 0:40विदिशा के राज प्रसाद की संगीत शाला में
  10. 0:44नृत्य सीखते हुई अनुपम सुंदरी मालविका के
  11. 0:48नूपुर की यह मद माती
  12. 0:52ध्वनि नव बसंत की मादक बला में शुंग वंशीय
  13. 0:58विदिशा पति महाराज आज अग्निमित्र के प्रेम
  14. 1:01पीड़ित मन को तड़पा रही थी अधीर और पागल
  15. 1:06बना रही
  16. 1:08[संगीत]
  17. 1:14थी एक
  18. 1:16दिन जब महाराज अग्निमित्र बड़ी रानी
  19. 1:20धारिणी के साथ चित्रशाला में गए
  20. 1:22थे तो अचानक उनकी दृष्टि उस चित्र पर
  21. 1:27पड़ी जिसमें बड़ी रानी धारणी के पास खड़ी
  22. 1:30दासिया में एक अत्यंत रूपवती लड़की
  23. 1:34चित्रित की गई
  24. 1:36थी चित्र से ही उन्हें विश्वास हो गया था
  25. 1:41कि मालविका जैसी अनुपम सुंदरी ना बड़ी
  26. 1:45रानी धारणी है और ना छोटी रानी
  27. 1:49इरावती पूछने पर पता चला कि वह लड़की
  28. 1:54महारानी धारिणी की एक नई दासी मालविका है
  29. 2:00उसे महारानी के भाई और राज्य के सीमावर्ती
  30. 2:03दुर्ग के रक्षक वीरसेन ने अपनी बहन की
  31. 2:08सेवा के लिए भेजा
  32. 2:10है चित्र पर पड़ी अपने पति की लुब्ध मुग्ध
  33. 2:14दृष्टि को महारानी धारिणी तुरंत समझ
  34. 2:19गई उसी दिन से उन्होंने ऐसा कड़ा प्रबंध
  35. 2:23किया कि मालविका संगीत शाला में बंद
  36. 2:27रहे ताकि वह महाराज अग्निमित्र की आंखों
  37. 2:31के सामने ना आ
  38. 2:33सके और उसी दिन
  39. 2:36से महाराज मालविका की एक झलक पाने को तरस
  40. 2:40रहे
  41. 2:41[संगीत]
  42. 2:45थे मित्र गौतम जी महाराज जिसका चित्र इतना
  43. 2:49सुंदर है व स्वयं कितनी सुंदर होगी वोह तो
  44. 2:53है महाराज शीघ्र कोई ऐसा उपाय करो जिससे
  45. 2:57मालविका को हम अपनी आख से साक्षात देख सके
  46. 3:01जो आज्ञा
  47. 3:10महाराज बहुत सोच विचार के बाद महाराज
  48. 3:14अग्निमित्र के गौतम नामधारी चतुर विदूषक
  49. 3:18ने उपाय ढूंढ ही
  50. 3:21लिया संगीत शाला में गण दस और हरदत्त नाम
  51. 3:25के दो नाट्यालय
  52. 3:30गनदा की शिष्या
  53. 3:31थी दोनों
  54. 3:36नाट्यांश को लेकर विदूषक ने गण दस और
  55. 3:40हरदत्त के बीच झगड़ा करा
  56. 3:42दिया दोनों महाराज के पास
  57. 3:45आए निर्णय के लिए महाराज ने बड़ी रानी
  58. 3:49धारणी को और राज प्रासाद में रहने वाली
  59. 3:52पंडिता कौशकी नाम की परिवलावे
  60. 4:00विदूषक ने पहले ही साट गाट कर रखी
  61. 4:03थी उसी को तटस्थ मानकर निर्णायक का भार
  62. 4:07सौंपा
  63. 4:09गया दोनों
  64. 4:17नाट्यांश में दोनों ही अपने अपने शिष्यों
  65. 4:20का नाट्य कौशल राजा महारानी और
  66. 4:26परिवश के सामने प्रदर्शित करें
  67. 4:31महारानी धारिणी इस सारे प्रपंच के
  68. 4:34उद्देश्य को ताड़
  69. 4:36गई उन्होंने शिष्यों के नाट्य प्रदर्शन पर
  70. 4:39आपत्ति
  71. 4:41की परंतु झगड़ालू
  72. 4:44नाट्यालय
  73. 4:47दी निश्चय हुआ कि सबसे पहले नाट्यांश की
  74. 4:54शिष्या मालविका अपना अभिनय दिखाए
  75. 5:00[संगीत]
  76. 5:05दुर्लभ
  77. 5:06पि है ह दया दुर्लभ पिया है हृदय छोड़
  78. 5:16तू मिलन की आशा छोड़
  79. 5:21तू मिलन की आशा
  80. 5:30क्य भाई आंख फड़कती है देकर कुछ
  81. 5:40कुछ अति सुंदर महाराज देखा यह मालविका
  82. 5:46चित्र में जैसी सुंदर लगती थी उससे कहीं
  83. 5:50अधिक सुंदर है मित्र गौतम जी महाराज चित्र
  84. 5:54में इसकी सुंदरता देखकर हम यह समझ रहे थे
  85. 5:57कि सचमुच इतनी सुंदर नहीं होगी
  86. 6:00पर अब इसे साक्षात
  87. 6:03देखकर हम सोचने लगे हैं कि चित्रकार ने
  88. 6:06इसका चित्र ठीक से नहीं बनाया जी इसकी
  89. 6:10अनुपम रूप छवि को सिर से पांव तक निहार कर
  90. 6:15ऐसा जान पड़ता है मानो विधाता ने इसके
  91. 6:18शरीर को इसके नाट्य गुरु गण दस के कहने पर
  92. 6:22ही विशेष रूप से कड़ बहुत दिनों से देख
  93. 6:28रहे
  94. 6:30बहुत दिनों से देख नहीं हूं करते
  95. 6:37सिर अप नाऊ परद
  96. 6:41से
  97. 6:48अपना नाथ विवस
  98. 6:52ह पर नाथ दि बच
  99. 6:56हो पर अपनी
  100. 7:01[संगीत]
  101. 7:02लीजिए महाराज इसने तो इस गीत के बहाने
  102. 7:06अपने को आप पर न्योछावर कर डाला है मैं भी
  103. 7:11यही समझता हूं इसने मुझे ही संबोधित करके
  104. 7:15कहा है कि नाथ विवश ह पर अपने ही समझो
  105. 7:20बिल्कुल
  106. 7:23[संगीत]
  107. 7:29[संगीत]
  108. 7:39[संगीत]
  109. 7:41मालविका अब तू जा ठहरो अभिनय में कुछ भूल
  110. 7:46हुई है मैं पूछना चाहूंगा
  111. 7:48कि अच्छा अच्छा कौशिकी जी पहले आप पूछिए
  112. 7:53महाराज जी भर कर देख
  113. 7:57लीजिए मैं क्या पूछूंगी
  114. 8:00मैंने तो जो देखा है उसमें कहीं कोई दोष
  115. 8:03दिखाई नहीं दिया मालविका ने गीत के सब
  116. 8:07भावों का ठीक ठीक अर्थ अंगों के अभिनय से
  117. 8:11भली भाति दिखा दिया है आपका क्या विचार है
  118. 8:15महाराज हम हरद जी के अभिभावक हैं और गण दस
  119. 8:20जी की अभिभावक है
  120. 8:21महारानी जो देखा है उससे अपने पक्ष का
  121. 8:25हमारा अभिमत कम हो गया है गण दस जी जी
  122. 8:29महारानी जी अपने परीक्षकों को संतुष्ट
  123. 8:32करने के लिए आपको
  124. 8:34बधाई और हां रे गौतम जी तुम क्या कहना
  125. 8:38चाहते थे महारानी मुझे तो गण दस जी से ही
  126. 8:41एक बात पूछनी है जब पहले पहल अपनी सिखाई
  127. 8:45विद्या का लोगों के सम्मुख प्रदर्शन किया
  128. 8:48जाता है तो सर्वप्रथम हम जैसे ब्राह्मणों
  129. 8:51की पूजा होती है वाह क्या नाट्य कला के
  130. 8:55मर्म की बात सोझी है
  131. 9:01वाह मालविका की ये
  132. 9:05मुस्कुराहट हमें तो मन चाई वस्तु देखने को
  133. 9:08मिल गई
  134. 9:09मालविका जब भगवती कौशिकी ने तुम्हारे
  135. 9:12अभिनय को निर्दोष और सुंदर कह दिया है तो
  136. 9:15मैं भी तुम्हें पुरस्कार स्वरूप महाराज का
  137. 9:19ये ये ये कंगन देता हूं खैर हो गौतम जी
  138. 9:23दूसरे पक्ष का अभिनय देखे बिना तुम
  139. 9:25पुरस्कार स्वरूप ये कंगन कैसे दे सकते हो
  140. 9:28देवी
  141. 9:29दूसरे का है यही समझ कर तो दे रहा
  142. 9:35हूं गण दस जी आपकी यह शिष्य अपना अभिनय
  143. 9:40दिखा चुकी अब इसे अपने साथ ले जाइए जा
  144. 9:46मालविका जो आ
  145. 9:48क्या महाराज जहां तक मेरी बुद्धि की
  146. 9:52सामर्थ्य थी मैंने अपना काम कर डाला है
  147. 9:55मित्र जी उसके जाने से मुझे ऐसा लग रहा है
  148. 10:00मानो मेरी आंखों की ज्योति चली गई है मेरे
  149. 10:03हृदय का उल्लास ठंडा पड़ गया है और मेरे
  150. 10:06धेरे का द्वार बंद हो गया है महाराज
  151. 10:10महाराज आप तो निर्धन रोगी की तरह यह भी
  152. 10:14चाहते हैं कि वैद्य ही अपने पास से औषध भी
  153. 10:17दे अरे पुत्र अब हर दत की शीष का भी अभिनय
  154. 10:22देख लिया जाए जो देखना था सो देख
  155. 10:27लिया क्यों नहीं हम तो अभ ने देखने के लिए
  156. 10:31आए हैं तो हरद जी महारानी अब आप अपनी
  157. 10:35शिष्य को बुलाइए और दोपहर का समय देव बढ़ा
  158. 10:39है ताप दीप्तिमान सूरज प्रखर दीप्तिमान
  159. 10:45जो अब तो हम लोगों के भोजन का समय हो गया
  160. 10:48है वैद्य का कहना है कि समय पर भोजन ना
  161. 10:52करने से बड़ी हानि होती है महाराज तो हरद
  162. 10:56जी आपकी शिष्य का विनय हम कल ही दे देख
  163. 11:00पाएंगे आप जाकर विश्राम कीजिए आर्य पुत्र
  164. 11:04मैं भी जाकर आपके भोजन की व्यवस्था करती
  165. 11:06हूं महाराज अब मुझे भी आज्ञा दीजिए आपका
  166. 11:11कल्याण
  167. 11:12हो देखा महाराज सुंदरता में ही नहीं कला
  168. 11:18में भी मालविका अद्वितीय है
  169. 11:21मित्र सच पूछो तो विधाता ने इस सज सुंदरी
  170. 11:25मालविका को ललित कला का ज्ञान क्या दिया
  171. 11:30मानो इसके हाथों में कामदेव का विष पूजा
  172. 11:34बाणी दे दिया
  173. 11:35है अब तुम कुछ हमारी चिंता करो इस समय तो
  174. 11:40महाराज आप मेरी चिंता कीजिए भूख के कारण
  175. 11:44मेरा पेट हलवाई की कड़ाई की भाति चल रहा
  176. 11:48है मित्र शीघ्र कोई उपाय करो कि हम
  177. 11:51मालविका से मिल सके महाराज कठिनाई तो यह
  178. 11:54है कि बादलों में छिपी चांदनी की तरह
  179. 11:59मालविका का दर्शन भी दूसरों के हाथ में है
  180. 12:02मित्र गौतम सोचो कोई उपाय
  181. 12:05उपाय उपा हां हां महाराज महारानी धारणी की
  182. 12:12दासी बकला वालिका से सहायता लेनी होगी हम
  183. 12:15उसे मालामाल कर देंगे तो मैं अभी
  184. 12:22चला बकुला वालिका जी आर्य गौतम समझ गई ना
  185. 12:27यदि तुम महाराज का यह काम कर दो तो वो
  186. 12:31तुम्हें मालामाल कर देंगे हां अरे गौतम
  187. 12:34महाराज से आप निवेदन कर दीजिएगा कि मुझे
  188. 12:37यह काम सौंप कर उन्होंने मुझ पर अत्यंत
  189. 12:40कृपा की है पर बेचारी मालविका को महारानी
  190. 12:44धारिणी ने अपनी कड़ी देखरेख में रखा हुआ
  191. 12:46है फिर भी मैं जतन करूंगी करो करो अवश्य
  192. 12:51जतन करो
  193. 12:53[संगीत]
  194. 13:02प्रणाम देवी अरे
  195. 13:05मालविका तुम आ गई दासी सेवा में उपस्थित
  196. 13:09है
  197. 13:10देवी देवी पांव में क्या बहुत कष्ट है इस
  198. 13:15दुष्ट गौतम के नटखट पन के कारण झूले से
  199. 13:19गिर पड़ी हूं दोनों पांव में ऐसी चोट आई
  200. 13:22है कि मैं उठकर चल फिर भी नहीं
  201. 13:25सकती
  202. 13:27उधर उधर मुझे अपने प्यारे अशोक वृक्ष की
  203. 13:30चिंता है आज वसंत उत्सव है और उसमें अभी
  204. 13:35तक फूल नहीं
  205. 13:37आए उसे किसी सुंदरी का पदा घात अपेक्षित
  206. 13:40है यदि यदि मैं स्वस्थ होती तो यह काम
  207. 13:45स्वयं ही
  208. 13:47करती पर अब अब मैं यह काम तुम्हें सौंप
  209. 13:52हूं मेरा अहो भाग्य है जो देवी ने मुझे इस
  210. 13:57योग्य समझा तो तुम बकुला बलिका के साथ
  211. 14:01प्रम बन जाओ यदि तुम्हारे पदा घात से मेरे
  212. 14:04सुनहले अशोक में पांच दिन के अंदर फूल आ
  213. 14:08गए तो मैं तो मैं तुम्हें मुह मांगा
  214. 14:11पुरस्कार दूंगी जैसी देवी की
  215. 14:15[संगीत]
  216. 14:25आज्ञा ये लीजिए महाराज हम मवन में पहुंच
  217. 14:30गए तन ध्यान से
  218. 14:34देखिए
  219. 14:36आ प्रम वन की लक्ष्मी ने आपको लुभाने के
  220. 14:40लिए युवतियों के 16 श्रृंगार को भी मार
  221. 14:43करने वाला यह वसंत के फूलों का श्रृंगार
  222. 14:47किया है हां
  223. 14:49मित्र हम देख रहे हैं वसंत की य अनुपम
  224. 14:55शोभा सुनो
  225. 14:58जी इस मधुर कोकिल स्वर द्वारा वसंत ऋतु
  226. 15:02मानो मुझसे पूछ रही है
  227. 15:06क्यों प्रेम की पीड़ा सह नहीं पा रहे हो
  228. 15:11ना जो ऊपर से जितने कोमल दिखाई देते हैं
  229. 15:16वो अंदर से उतने ही कठोर होते हैं महाराज
  230. 15:19महाराज तनिक धीरज से काम लीजिए आपका मनोरथ
  231. 15:24पूरा करने के लिए मैंने कुछ उपाय किया है
  232. 15:28अ महाराज उधर देखिए सीधे साधे वस्त्र पहने
  233. 15:34उदास सी वृक्षों के बीच में कौन इधर चली आ
  234. 15:39रही है क्या मालविका आ रही है और क्या
  235. 15:41महाराज तो समझ लो अब हमारे प्राण बच
  236. 15:45जाएंगे कौतम जी जैसे दूर से कलकल शब्द
  237. 15:51सुनकर प्यासे पथिक को यह भरोसा हो जाता है
  238. 15:55कि वृक्षों के झुरमुट के पीछे अवश्य ही
  239. 15:58कोई नदी होगी
  240. 16:00वैसे यह जानकर हमारे व्याकुल मन को बड़ा
  241. 16:03धीरज मिला है कि मालविका पास ही
  242. 16:07है लीजिए महाराज देखिए वो पुष्प विहीन
  243. 16:11अशोक वृक्ष के
  244. 16:13नीचे शिला पर बैठ गई
  245. 16:18वाह ये सीधे साधे वस्त्रों में पहले से भी
  246. 16:22अधिक सुंदर लग रही है लगता है वसंत से
  247. 16:27परिपक्व पत्तों वाली
  248. 16:29किसी कुंद लता में इने गिने फूल बचे रह गए
  249. 16:35हो महाराज इसे भी आपके जैसा प्रेम रोग लग
  250. 16:40गया होगा मित्रों को ऐसे ही परिहास सूज
  251. 16:43करता
  252. 16:44है अरे बालविका अपने आप से कुछ कह रही है
  253. 16:49आ मित्र हम लोग पास वाली उस लदा के पीछे
  254. 16:51चिपक
  255. 16:57सुनेल प्र है
  256. 17:00हृदय छोड़ तू मिलन की
  257. 17:07आशा अरे
  258. 17:09हृदय तू ऐसे की चाह क्यों करता
  259. 17:13है जिस पर ना तो अपना कोई अधिकार ही है और
  260. 17:18ना जिस तक अपनी पहुच
  261. 17:22है
  262. 17:23हाय मुझे यू जता कर तुझे क्या मिल रहा है
  263. 17:35प्रीत की कैसी उल्टी रीती
  264. 17:38है मित्र जी महाराज इसने अभी तक अपने मन
  265. 17:43की व्याकुलता का कारण तो बताया ही नहीं
  266. 17:45फिर हम कैसे समझ ले कि हमारे ही लिए
  267. 17:48व्याकुल हो रही है महाराज आपके मन का
  268. 17:51संदेह अभी दूर हुआ जाता है वो देखिए हमारी
  269. 17:57साहिका बकुला लिका मालविका के पास पहुंच
  270. 18:04गई सखी
  271. 18:06मालविका महारानी ने तुम्हें जो काम सौंपा
  272. 18:09है उसके लिए तुम ही योग्य
  273. 18:14थी लाओ अपने पैर इधर
  274. 18:17बढ़ाओ मैं उसम महावर लगाकर यह नुपुर पहना
  275. 18:22द लो सखी
  276. 18:26हृदय यह सामान
  277. 18:29तुम फिर भूल मत
  278. 18:32जाना सखी बकुला वालिका तुम्हें आज मेरे
  279. 18:37पैरों का श्रृंगार करना पड़ रहा है इसके
  280. 18:40लिए मुझे क्षमा करना वाह सखी तुम तो ऐसे
  281. 18:45कह रही हो जैसे मैं कोई पराई
  282. 18:48हूं तुम तो मुझे देह प्राण जैसी प्यारी
  283. 18:55हो मित्र गतम जी महाराज प्रिया के पैर में
  284. 19:00महावर की जो रेखा खींची है व ऐसी दिखती है
  285. 19:04पानो महादेव के क्रोध से जले कामदेव रूपी
  286. 19:08वृक्ष में नई गोपले फूट आई और महाराज जैसे
  287. 19:13इसके चरण सुंदर है वैसा ही इसे काम भी तो
  288. 19:18सौंपा गया है यह ठीक कहा तुमने इस सुंदरी
  289. 19:22के सुंदर सुकमा चरण या तो फूलने की इच्छा
  290. 19:26करने वाले इस अन फूले शोक पर पड़ने योग्य
  291. 19:29हैं या प्रेम में अपराध करके सिर झुकाने
  292. 19:34वाले पति के सिर पर पड़ने योग्य
  293. 19:37है तो समझ लीजिए महाराज यदि आप भी अपराध
  294. 19:43करेंगे तो यही चरण आप पर भी
  295. 19:48पड़ेंगे मन चाहा भविष्य बताने वाले
  296. 19:51ब्राह्मण देवता का आशीर्वाद स्वीकार है
  297. 19:55महाराज आप तो बस
  298. 20:04अरे नि पुर्णिका जी आर्य पुत्र तो यहां
  299. 20:10झूला गिरी में कहीं दिखाई नहीं पड़ रहे
  300. 20:14वसंतोत्सव पूजा के भेंट के लोभी आर्य गौतम
  301. 20:17ने तो यही कहा था कि महाराज निश्चय ही
  302. 20:20यहां मिलेंगे और आपके साथ झूला झूलेंगे
  303. 20:25देवी तनिक ध्यान से देखिए ना
  304. 20:29आपसे परिहास करने के विचार से महाराज यहीं
  305. 20:33कहीं छुपे बैठे होंगे आइए उन्हें ढूंढे
  306. 20:37अरे मदिरा कुछ इतनी चढ़ गई है कि
  307. 20:42आर्यपुत्र को देखने की हकलाहट होने पर भी
  308. 20:47मेरे
  309. 20:48पैर आगे नहीं बढ़ रहे तो आइए देवी हम लोग
  310. 20:53उधर अशोक के तले प्रियंगु की लता मंडप में
  311. 20:57बैठे अच्छा
  312. 21:02चल स्वामीनी क्या हुआ रे निपु निका हम चली
  313. 21:08थी आम की कोपल ढूंढने और काट लिया चीटियों
  314. 21:12ने अरे क्या कह रही है
  315. 21:16देवी तनिक उधर देखिए कहां
  316. 21:21वहां अशोक की छाया में महारानी धारणी की
  317. 21:25दासी बकुला वालिका मालविका के पैर रंग रही
  318. 21:29है
  319. 21:31क्या मालविका तो इधर आ नहीं सकती आज इसे
  320. 21:35किसने इधर आने
  321. 21:40दिया पांव की चोट के कारण महारानी धारणी
  322. 21:44तो आ नहीं
  323. 21:45सकती इसलिए उन्होंने अन फूले अशोक पर पदा
  324. 21:49घात करने का काम मालविका को सौंपा होगा
  325. 21:54नहीं तो महारानी क्या कभी अपने नूपुर उतार
  326. 21:57कर इन दास को दे सकती थी
  327. 22:00हां हो सकता
  328. 22:02है परंतु मालविका का यह साज
  329. 22:07श्रृंगार इन्हीं बातों से तो मेरा जी जल
  330. 22:10जाता
  331. 22:16है क्यों सखी मालविका पैरों पर यह महावरी
  332. 22:20रंगाई पसंद
  333. 22:23आई अपने पैरों की प्रशंसा
  334. 22:26करते मुझे ला जाती है
  335. 22:29सखी बकुला वालिका ये तो बताओ कि श्रृंगार
  336. 22:33की इतनी बढ़िया कला तुम्ह सिखाई किसने सच
  337. 22:36सच कह दो हां कह दो ये कला मैंने स्वयं
  338. 22:39महाराज से सीखी है सच
  339. 22:43हां बड़ी भाग्यवान
  340. 22:46हो सखी इतनी पर भी तुम्हें तनिक भी खमण
  341. 22:51नहीं पर मैंने जो कुछ सीखा है वैसी कला
  342. 22:55दिखला योग्य तुम्हारे यह सुंदर चरण कर आज
  343. 22:59मुझे अवश्य घमंड हो गया है सखी मैं तो
  344. 23:04मनाती हूं कि तुम सदा महाराज के अंक में
  345. 23:07रहो सखी मैं तुम्हें प्यारी हूं इसीलिए
  346. 23:11तुम ऐसा कह रही हो मुझे ही नहीं तुम
  347. 23:15महाराज को भी प्यारी हो
  348. 23:17मालविका सब झूठ है उनका तो मुझ पर तनक भी
  349. 23:22प्रेम नहीं अरे सखी प्रेम की परीक्षा
  350. 23:27प्रेम से ही होती है ये सब अपने मन से ही
  351. 23:30बोलती जा रही हू नहीं नहीं ये तो स्वयं
  352. 23:33महाराज ने कहा
  353. 23:37है सकी बकुला वाले का उधर महारानी का
  354. 23:41व्यवहार देखती हूं तो रही सही आशा भी मिट
  355. 23:45जाती है अरे पगली भौर के डर से कोई कानों
  356. 23:49में आम्र मंजरी पहनना थोड़ा ही छोड़ देता
  357. 23:52है लाओ पैरों में नुपुर पहना
  358. 23:56दूं लो
  359. 24:07सखी अब उठकर इस अन फुले अशोक की इच्छा
  360. 24:11पूरी
  361. 24:12करो अरे क्या सोच रही
  362. 24:17हो
  363. 24:18सखी यदि कभी मुझ पर कोई विपत्ति आए तो
  364. 24:22मेरा साथ ना छोड़
  365. 24:25देना अरे मेरा तो नाम ही बकुला वली का है
  366. 24:30मैं तो जितनी ही अधिक मसली जाऊंगी उतनी ही
  367. 24:33अधिक सुगंध
  368. 24:36दूंगी वाह बकुला बलिका वाह मित्र इसने
  369. 24:41बड़ी चतुराई से मालविका के मन की था लेकर
  370. 24:44हमारा प्रेम प्रस्ताव प्रस्तुत किया है
  371. 24:47महाराज उधर देखिए हा मालविका ने अशोक के
  372. 24:52कोमल पत्तों का
  373. 24:54गुच्छा ये लटकाया अपने कानों में और अब अब
  374. 24:59यह किया उसने अपने पाए सुंदर सजीले पांव
  375. 25:04से अशोक पर प्रहार है यदि इन चरणों की
  376. 25:10पूजा पाकर भी अशोक ना फूला तो दोष इन
  377. 25:13चरणों का नहीं य अशोक अ भागा समझा जाएगा
  378. 25:18मित्र जी महाराज अब हम लोगों को किसी
  379. 25:20बहाने उनके पास चलना चाहिए हा आइए महाराज
  380. 25:23आइए मैं छेड़छाड़ करता हूं
  381. 25:33कहिए देवी मालविका क्या हमारे प्यारे अशोक
  382. 25:36पर अपने पैर से प्रहार करके आपने कोई
  383. 25:39अच्छा काम किया है अरे
  384. 25:42गौतम महाराज भी क्यों री बकुला बलिका यह
  385. 25:46सब कुछ जानते हुए भी तुमने इन्ह ऐसी ष्टता
  386. 25:49करने से रोका नहीं अरे गतम
  387. 25:53मैं अरे मालविका ने यह दृष्ट जानबूझकर
  388. 25:57नहीं की
  389. 25:59महारानी धारनी की आज्ञा का पालन किया है
  390. 26:03फिर भी हम दोनों महाराज के चरणों में गिर
  391. 26:06कर क्षमा याचना करती है ठीक है महारानी की
  392. 26:10आज्ञा तो माननी ही चाहिए
  393. 26:11थी क्यों भद्रे तुम्हारा यह किसल कोमल
  394. 26:16बाया चरण अशोक व्रक्ष पर लगने से दुखने तो
  395. 26:20नहीं लगा न गया काम
  396. 26:23से आओ सखी बकुला वालिका महारानी को जाकर
  397. 26:27सूचना दे
  398. 26:28कि उनकी आज्ञा अनुसार हमने पहले महाराज से
  399. 26:31जाने की अनुमति तो ले लो भद्र तुम जा सकती
  400. 26:35हो परंतु इससे पहले हमारी एक बात सुननी
  401. 26:39होगी सखी मालविका ध्यान देकर सुनो हां तो
  402. 26:45महाराज आज्ञा
  403. 26:47कीजिए देखो
  404. 26:50सुंदरी बहुत दिनों से इसी अशोक की तरह मुझ
  405. 26:54में भी धैर्य के फूल नहीं आ
  406. 26:56रहे इसलिए आज तुम अपने स्पर्श का अमृत
  407. 27:00पिलाकर अपने इस अनन्य प्रेमी के मन की भी
  408. 27:03साथ पूरी कर दो हा हा
  409. 27:06मालविका पूरी कर दो इनके मन की साथ कौन
  410. 27:10अरे रानी रावती और कौन अशोक में तो अभी
  411. 27:14फूल आए नहीं है पर महाराज तो अभी से फूले
  412. 27:18जा रहे हैं यह मालविका जैसे गूंगी हो गई
  413. 27:21है मैं पूछती हूं तो मित्र अब क्या किया
  414. 27:25जाए महाराज जल्दी से का सहारा लिया जाए
  415. 27:29क्यों रे बकुला वालिका तूने यह दूति का
  416. 27:33अच्छा काम अपने ऊपर लिया है अब करा ना आरे
  417. 27:36पुत्र की साथ पूरी देवी आप तो व्यर्थ ही
  418. 27:40हम पर क्रोध कर रही है भला हम कौन होती है
  419. 27:43महाराज के साथ पूरी करने वाली आओ मालविका
  420. 27:47हम
  421. 27:47[संगीत]
  422. 27:49चले चलिए दे
  423. 27:52[संगीत]
  424. 27:57[प्रशंसा]
  425. 27:58[संगीत]
  426. 28:12मालविका अग्निमित्र अभी आप महाकवि कालिदास
  427. 28:16के सुप्रसिद्ध संस्कृत नाटक मालविका अग्नि
  428. 28:21मित्रम का यह हिंदी रेडियो नाट्य रूपांतर
  429. 28:25सुन रहे थे हिंदी अनुवादक थे सीताराम
  430. 28:30चतुर्वेदी रेडियो नाट्य रूपांतर श्री
  431. 28:33चिरंजीत ने किया नाटक के निर्देशक थ
  432. 28:36सुदर्शन कुमार संगीतकार थे सत्यदेव पवार
  433. 28:41और प्रस्तुतीकरण सहायक महफूज हसन नाटक में
  434. 28:47भाग लेने वाले कलाकार थे सर्वश्री अश्विनी
  435. 28:51कुमार मनोज भटनागर नीरज शर्मा वीना गौड़
  436. 28:56विजय राजधान
  437. 28:58बाला रश्म दर सरला टंडन कविता वैद योगेश
  438. 29:03कुमार जैन सुशील बैनर्जी सुरेश पंत
  439. 29:07मंगतराम और अर्चना गायिका थी श्रीमती
  440. 29:12उर्मिला
  441. 29:13नागर आज आप इस नाटक की पहली कड़ी सुन रहे
  442. 29:17थे कल इसी समय इस नाटक की दूसरी और अंतिम
  443. 29:21कड़ी प्रसारित की जाएगी केंद्रीय नाटक
  444. 29:24एकांश के लिए तैयार किए गए इस नाटक को
  445. 29:27आकाश वाणी के दिल्ली केंद्र से प्रसारित
  446. 29:30किया गया

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