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इतने आकर्षित बनो, कि वो तुमसे मिलने की दुआ करे! || OSHO HINDI SPEECH || #OSHO — Transcript

by DHYAN SAGAR · 8,584 words · 1,093 segments · language en · Watch on YouTube

Full transcript

  1. 0:00सोचो एक ऐसा मनुष्य जो किसी के पीछे भागता
  2. 0:04नहीं। किसी से अपने प्रेम की भीख नहीं
  3. 0:06मांगता। किसी के सामने अपने महत्व को
  4. 0:09सिद्ध करने की कोशिश नहीं करता। फिर भी
  5. 0:13उसके भीतर कुछ ऐसा होता है कि लोग उसकी ओर
  6. 0:15खींचे चले आते हैं। उसके पास बैठकर उन्हें
  7. 0:18कुछ मिलता है। उसकी उपस्थिति में उन्हें
  8. 0:22अपने भीतर की कोई सोई हुई चीज जागती हुई
  9. 0:24महसूस होती है। और तब आकर्षण केवल चेहरे
  10. 0:28का नहीं रह जाता। तब आकर्षण तुम्हारे
  11. 0:30अस्तित्व की सुगंध बन जाता है। यही वह बात
  12. 0:34है जिसे समझना जरूरी है। इतने आकर्षित बनो
  13. 0:37कि कोई तुम्हें पाने के लिए बेचैन हो जाए।
  14. 0:40इतने आकर्षित बनो कि तुम्हारी अनुपस्थिति
  15. 0:43भी किसी को तुम्हारी उपस्थिति का एहसास
  16. 0:45करा दे। इतने आकर्षित बनो कि तुम्हारे
  17. 0:48मिलने की इच्छा किसी के भीतर प्रार्थना बन
  18. 0:50जाए। लेकिन ध्यान रखना इसका अर्थ यह नहीं
  19. 0:54कि तुम किसी को अपने पीछे पागल करने की
  20. 0:56चाल सीखो। यह किसी को बांधने की कला नहीं
  21. 0:59है। यह स्वयं को इतना सुंदर बनाने की
  22. 1:02यात्रा है कि जो भी तुम्हारे संपर्क में
  23. 1:04आए वह अपने भीतर भी सुंदरता की संभावना
  24. 1:07महसूस करने लगे। तुम्हारी सबसे बड़ी भूल
  25. 1:11यह है कि तुम आकर्षण को बाहर खोजते हो।
  26. 1:14तुम सोचते हो कि सुंदर कपड़े पहन लेने से,
  27. 1:17चेहरे को सजा लेने से, मीठे शब्द बोल लेने
  28. 1:20से, किसी को लगातार संदेश भेजने से, हर
  29. 1:24समय उपलब्ध रहने से या किसी को ईर्ष्या
  30. 1:27कराने से वह तुम्हारी ओर आकर्षित हो
  31. 1:29जाएगा। कुछ समय के लिए शायद ऐसा हो भी
  32. 1:32जाए। लेकिन वह आकर्षण बहुत जल्दी थक जाता
  33. 1:36है। क्योंकि वह तुम्हारे अस्तित्व से पैदा
  34. 1:38नहीं हुआ था। वह तुम्हारी बनाई हुई छवि से
  35. 1:42पैदा हुआ था।
  36. 1:43छवि को रोज संभालना पड़ता है। अस्तित्व को
  37. 1:47संभालना नहीं पड़ता और जिस दिन तुम छवि को
  38. 1:50बचाने में लगे रहते हो उसी दिन तुम अपनी
  39. 1:53असली शक्ति खोना शुरू कर देते हो। मनुष्य
  40. 1:56के भीतर एक अजीब भूख है। वह चाहता है कि
  41. 1:59दूसरा उसे स्वीकार करें। वो चाहता है कि
  42. 2:02कोई उसे सुंदर कहे। कोई उसे महत्वपूर्ण
  43. 2:05समझे। कोई उसे खोने से डरे। कोई उसके लिए
  44. 2:09रोए। कोई उसे सबसे अधिक चाहे। और इसी
  45. 2:13इच्छा में वह अपना पूरा जीवन दूसरों की
  46. 2:16आंखों में देखने लगता है। कभी किसी की
  47. 2:19आंखों में प्रेम खोजता है। कभी प्रशंसा,
  48. 2:22कभी स्वीकृति, कभी महत्व। और धीरे-धीरे
  49. 2:26उसे अपनी आंखों से अपना चेहरा दिखाई देना
  50. 2:29बंद हो जाता है। यहीं से निर्भरता जन्म
  51. 2:32लेती है। और निर्भरता प्रेम की सबसे बड़ी
  52. 2:35शत्रु है। क्योंकि जहां तुम्हें दूसरे की
  53. 2:38जरूरत से अपनी कीमत मिलती है, वहां प्रेम
  54. 2:41नहीं रहता। वहां सौदा शुरू हो जाता है।
  55. 2:44तुम कहते हो मैं तुम्हें इतना दूंगा। तुम
  56. 2:48मुझे उतना चाहो। मैं तुम्हारे लिए इतना
  57. 2:51करूंगा। तुम मुझे कभी मत छोड़ना। मैं
  58. 2:54तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूंगा। तुम मेरी
  59. 2:56कद्र करना। इस तरह दो लोग एक दूसरे से
  60. 2:59प्रेम नहीं करते। दो लोग अपनी-अपनी कमियों
  61. 3:02को एक दूसरे से भरने की कोशिश करते हैं।
  62. 3:05फिर एक दिन किसी एक की अपेक्षा पूरी नहीं
  63. 3:07होती। और जो चीज प्रेम लग रही थी वही
  64. 3:11शिकायत बन जाती है। इसलिए सबसे पहले अपने
  65. 3:14भीतर से यह भूख निकालो कि कोई तुम्हें
  66. 3:16चाहे तभी तुम महत्वपूर्ण हो। तुम
  67. 3:19महत्वपूर्ण हो। चाहे कोई तुम्हें देखे या
  68. 3:21ना देखे तुम सुंदर हो। चाहे कोई तुम्हारी
  69. 3:24सुंदरता की प्रशंसा करे या ना करे।
  70. 3:27तुम्हारा जीवन मूल्यवान है। चाहे दुनिया
  71. 3:30तुम्हारी कीमत समझे या नहीं। और जब यह बात
  72. 3:33तुम्हारे भीतर उतर जाती है तब तुम्हारे
  73. 3:36चारों ओर एक अद्भुत शांति पैदा होती है।
  74. 3:39फिर तुम्हारी आंखें किसी से कुछ मांगती
  75. 3:42हुई दिखाई नहीं देती। तुम्हारा चेहरा किसी
  76. 3:44को प्रभावित करने के लिए मुस्कुराता नहीं।
  77. 3:47तुम्हारी मुस्कान स्वयं की पूर्णता से
  78. 3:49निकलती है। तुम्हारे शब्द किसी को बांधने
  79. 3:52के लिए नहीं निकलते। वे केवल इसलिए निकलते
  80. 3:55हैं क्योंकि तुम्हारे भीतर कुछ बह रहा है।
  81. 3:57और याद रखना बहती हुई नदी को किसी के
  82. 4:01दरवाजे पर दस्तक नहीं देनी पड़ती। लोग
  83. 4:04उसके पास स्वयं आते हैं। तुम भी नदी बनो।
  84. 4:08तालाब मत बनो। तालाब पानी को रोक कर रखता
  85. 4:11है। नदी पानी को बांटती चलती है। तालाब
  86. 4:14सड़ सकता है। नदी रास्ते बदलती हुई भी
  87. 4:17जीवित रहती है। तुम्हारे भीतर प्रेम है।
  88. 4:20उसे किसी एक मनुष्य की मुट्ठी में कैद मत
  89. 4:23करो। तुम्हारे भीतर आनंद है। उसे किसी एक
  90. 4:27चेहरे की प्रतिक्रिया पर निर्भर मत करो।
  91. 4:30तुम्हारे भीतर जीवन है। उसे किसी के आने
  92. 4:33और जाने से छोटा मत करो। और तब तुम देखोगे
  93. 4:37जिस दिन तुम्हें किसी की जरूरत कम हो जाती
  94. 4:40है उसी दिन तुम्हारे भीतर आकर्षण बढ़ने
  95. 4:43लगता है। क्योंकि स्वतंत्रता में एक
  96. 4:45अद्भुत सौंदर्य है जो व्यक्ति तुम्हें
  97. 4:48पकड़ना चाहता है। वह तुम्हें अपनी मुट्ठी
  98. 4:50में बांधना चाहता है। जो व्यक्ति तुम्हें
  99. 4:53प्रेम करता है। वह तुम्हें आकाश देता है।
  100. 4:57तुम्हें ऐसा ही मनुष्य बनना है। इतने
  101. 5:00सुंदर कि तुम्हारे पास रहने वाले को
  102. 5:02स्वतंत्रता मिले। इतने गहरे कि तुम्हारे
  103. 5:05साथ रहने पर उसे स्वयं से मिलने का अवसर
  104. 5:08मिले। इतने सहज कि उसके भीतर अभिनय करने
  105. 5:11की आवश्यकता ना रहे। इतने जीवंत कि
  106. 5:15तुम्हारी संगति में उसके चेहरे की थकान
  107. 5:17उतरने लगे। यही वास्तविक आकर्षण है। तुम
  108. 5:20किसी के लिए आकर्षक तब नहीं बनते जब तुम
  109. 5:22उसे लगातार अपनी ओर देखते रहने के लिए
  110. 5:25मजबूर करो। तुम आकर्षक तब बनते हो जब
  111. 5:28तुम्हारे पास बैठकर उसका मन संसार की दौड़
  112. 5:31से थोड़ी देर के लिए मुक्त हो जाए।
  113. 5:34तुम्हारी उपस्थिति किसी को उसके दुख से
  114. 5:36बाहर निकाल दे। तुम्हारी हंसी किसी के
  115. 5:38भीतर की जमी हुई कठोरता को पिघला दे।
  116. 5:41तुम्हारी आंखें किसी को यह भरोसा दे दें
  117. 5:44कि यहां कोई निर्णय नहीं है। तुम्हारे
  118. 5:46शब्द किसी के भीतर ऐसी जगह छू दें जहां
  119. 5:49बहुत समय से किसी ने दस्तक नहीं दी। तब
  120. 5:52तुम्हारा आकर्षण शरीर से उठकर आत्मा तक
  121. 5:54पहुंचता है और ऐसा आकर्षण बहुत गहरा होता
  122. 5:57है क्योंकि चेहरे बूढ़े होते हैं। शरीर
  123. 6:00बदलता है। समय हर सुंदरता को बदल देता है।
  124. 6:04लेकिन जिस व्यक्ति की उपस्थिति में
  125. 6:06तुम्हें अपने भीतर शांति मिलती है उसे समय
  126. 6:09आसानी से छीन नहीं सकता। इसलिए सुंदर
  127. 6:12दिखने की बजाय सुंदर होने पर ध्यान दो।
  128. 6:15अपने चेहरे पर कम काम करो। अपने मन पर
  129. 6:18ज्यादा काम करो। अपनी आवाज को मधुर बनाने
  130. 6:21से अधिक जरूरी है कि तुम्हारे भीतर कटुता
  131. 6:24कम हो। अपने वस्त्रों से अधिक जरूरी है कि
  132. 6:27तुम्हारी दृष्टि साफ हो। अपने शरीर को
  133. 6:29सजाने से अधिक जरूरी है कि तुम्हारे भीतर
  134. 6:32ईर्ष्या ना पल रही हो। अपने शब्दों को
  135. 6:35आकर्षक बनाने से अधिक जरूरी है कि
  136. 6:37तुम्हारे मौन में भी प्रेम हो। क्योंकि
  137. 6:39मनुष्य शब्दों को बहुत देर तक नहीं पढ़ता।
  138. 6:42वह तुम्हारी ऊर्जा पढ़ता है। वह अनुभव
  139. 6:45करता है कि तुम्हारे पास आकर उसे अपने
  140. 6:47भीतर क्या महसूस होता है। क्या उसे बेचैनी
  141. 6:50मिलती है? क्या उसे डर मिलता है? क्या उसे
  142. 6:54तुलना मिलती है? क्या उसे दबाव मिलता है?
  143. 6:57या उसे एक खुला आकाश मिलता है? लोग उस
  144. 7:01व्यक्ति को याद नहीं रखते जिसने सबसे अधिक
  145. 7:03बातें की। लोग उस व्यक्ति को याद रखते हैं
  146. 7:06जिसकी उपस्थिति में वे स्वयं को थोड़ा
  147. 7:08अधिक जीवित महसूस करते थे। इसलिए अपने
  148. 7:11भीतर जीवन पैदा करो। अपने भीतर ऐसा जीवन
  149. 7:14पैदा करो कि सुबह उठते ही तुम्हें किसी की
  150. 7:17जरूरत ना पड़े कि वह तुम्हें जीवित महसूस
  151. 7:19कराए। सूरज को देखो, पेड़ों को देखो। हवा
  152. 7:24को महसूस करो। अकेले बैठो। अपने मन की चाल
  153. 7:28को देखो। अपने भीतर उठती इच्छाओं को देखो।
  154. 7:31अपनी बेचैनी को देखो। अपने डर को देखो।
  155. 7:35अपने अकेलेपन से भागो मत। क्योंकि जो
  156. 7:38व्यक्ति अकेलेपन से भागता है, वह किसी भी
  157. 7:41रिश्ते में स्वतंत्र नहीं रह सकता। वह
  158. 7:43दूसरे को पकड़ लेगा। उससे चिपक जाएगा। उसे
  159. 7:47खोने से डरेगा। फिर वही डर उसके प्रेम को
  160. 7:50धीरे-धीरे विष बना देगा। अकेले रहना सीखो।
  161. 7:54अकेलेपन और एकांत में अंतर है। अकेलापन तब
  162. 7:58है जब तुम दूसरे की कमी महसूस करते हो।
  163. 8:01एकांत तब है जब तुम स्वयं की उपस्थिति में
  164. 8:04पूर्ण होते हो। और जिस दिन तुम्हें अपने
  165. 8:06साथ बैठना आ गया उस दिन तुम्हारा संबंध
  166. 8:10किसी दूसरे के साथ जरूरत से नहीं चुनाव से
  167. 8:13बनेगा। तुम कहोगे मैं तुम्हारे साथ इसलिए
  168. 8:15हूं क्योंकि तुम्हारे बिना मेरा जीवन
  169. 8:17अधूरा है। ऐसा नहीं। मैं तुम्हारे साथ
  170. 8:20इसलिए हूं क्योंकि मेरा जीवन पहले से
  171. 8:23पूर्ण है और उस पूर्णता में तुम्हारी
  172. 8:25उपस्थिति एक उत्सव है। यह अंतर छोटा दिखाई
  173. 8:29देता है लेकिन पूरा जीवन बदल देता है। जो
  174. 8:33तुम्हें पूरा करने आएगा वो एक दिन तुम्हें
  175. 8:36दोष देगा कि तुमने उसे पूरा क्यों नहीं
  176. 8:38किया। जो तुम्हारे साथ उत्सव मनाने आएगा।
  177. 8:42वह तुम्हारे साथ स्वतंत्र रहेगा और
  178. 8:44स्वतंत्र मनुष्य का प्रेम सबसे सुंदर होता
  179. 8:47है। अब एक दूसरी बात समझो इतने आकर्षित
  180. 8:51बनने का अर्थ यह भी है कि तुम अपने भीतर
  181. 8:53के डर को देखो तुम्हें सबसे अधिक डर किस
  182. 8:56बात का है कि वो तुम्हें छोड़ देगा कि कोई
  183. 9:00दूसरा तुम्हारी जगह ले लेगा कि वो
  184. 9:03तुम्हारे बिना खुश हो जाएगा कि तुम्हें
  185. 9:06भूल जाएगा।
  186. 9:07यही भय तुम्हारे भीतर तुम्हारी सारी शक्ति
  187. 9:10चुरा लेता है। तुम जिस व्यक्ति को खोने से
  188. 9:13डरते हो उसके सामने तुम्हारा व्यवहार बदल
  189. 9:16जाता है। तुम वो नहीं रहते जो वास्तव में
  190. 9:19हो। तुम खुश करने लगते हो, मनाने लगते हो।
  191. 9:23बार-बार अपनी भावनाएं समझाने लगते हो।
  192. 9:26उसके हर परिवर्तन का अर्थ निकालते हो।
  193. 9:29उसके हर मौन को अपनी गलती समझते हो। उसके
  194. 9:32हर दूर जाने को अपने मूल्य का प्रमाण बना
  195. 9:35लेते हो। और तब धीरे-धीरे तुम आकर्षक
  196. 9:38नहीं, असुरक्षित दिखाई देने लगते हो।
  197. 9:41तुम्हें किसी को पकड़ कर रखना नहीं है।
  198. 9:44तुम्हें इतना गहरा होना है कि जो तुम्हारे
  199. 9:46साथ रहे वह स्वतंत्र होकर रहे। और जो चला
  200. 9:50जाए उसके जाने के बाद भी तुम्हारा प्रेम
  201. 9:54उसके लिए बद्दुआ ना बने। यह बहुत कठिन है।
  202. 9:58मगर यही आंतरिक सुंदरता है। क्योंकि जब
  203. 10:01कोई तुम्हें छोड़कर जाता है और तुम उसके
  204. 10:03पीछे अपना जीवन घसीटते नहीं। तब तुम स्वयं
  205. 10:06के प्रति ईमानदार होते हो। किसी के जाने
  206. 10:09पर दुख हो सकता है। आंखों में आंसू आ सकते
  207. 10:12हैं। हृदय में खालीपन भी महसूस हो सकता
  208. 10:15है। लेकिन उस खालीपन में भी अपने आप को मत
  209. 10:18खोना। रोना हो रो। दुख को महसूस करना हो।
  210. 10:23महसूस करो। लेकिन अपने भीतर यह बात मत
  211. 10:26बैठने देना कि उसके जाने से तुम छोटे हो
  212. 10:28गए। कोई तुम्हें छोड़कर गया। इसका अर्थ यह
  213. 10:32नहीं कि तुम कम हो गए। कभी-कभी दो रास्ते
  214. 10:35अलग हो जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि
  215. 10:37किसी एक रास्ते की कोई कीमत नहीं थी। किसी
  216. 10:40का निर्णय तुम्हारे अस्तित्व का प्रमाण
  217. 10:42पत्र नहीं है। तुम्हारी कीमत किसी दूसरे
  218. 10:45के हाथ में नहीं है। यह बात जिस दिन
  219. 10:47हड्डियों तक उतर जाती है। उसी दिन चेहरे
  220. 10:50पर एक अलग प्रकार की चमक आती है। तुम्हारी
  221. 10:53चाल बदलती है। तुम्हारी आंखों में एक
  222. 10:56भरोसा दिखाई देता है। तुम्हारी आवाज में
  223. 10:58विनती नहीं रहती। और तब तुम्हें देखकर लोग
  224. 11:01सोचते हैं आखिर इस व्यक्ति के भीतर ऐसा
  225. 11:04क्या है? वो क्या है? वो है स्वयं के साथ
  226. 11:08संबंध। आज मनुष्य ने पूरी दुनिया से संबंध
  227. 11:11बना लिए। लेकिन स्वयं से संबंध खो दिया।
  228. 11:16वो सबको जानता है। स्वयं को नहीं। वो सबकी
  229. 11:20पसंद जानता है। अपनी आत्मा की पुकार नहीं
  230. 11:23जानता। वह सबको प्रभावित करना चाहता है
  231. 11:26लेकिन स्वयं की आंखों में गिरता चला जाता
  232. 11:29है। तुम्हें संसार से पहले स्वयं की आंखों
  233. 11:32में सम्मान पाना है। रात को जब सब सो जाएं
  234. 11:36तब अपने भीतर देखना। क्या तुम अपने जीवन
  235. 11:40से संतुष्ट हो? क्या तुम वैसे जी रहे हो
  236. 11:42जैसे तुम्हारा हृदय चाहता है? क्या
  237. 11:45तुम्हारे शब्द और तुम्हारा जीवन एक ही
  238. 11:47दिशा में है? क्या तुम प्रेम करते हो या
  239. 11:50प्रेम का अभिनय करते हो? क्या तुम
  240. 11:52स्वतंत्र हो या केवल अकेले रहने से डरते
  241. 11:55हो? क्या तुम शांत हो या केवल चुप हो? इन
  242. 11:59प्रश्नों से भागना मत। यही प्रश्न तुम्हें
  243. 12:02उस व्यक्ति में बदलेंगे जिसके लिए किसी को
  244. 12:04मिलने की दुआ करनी पड़े। लेकिन यहां एक
  245. 12:07रहस्य है। लोग तुम्हें तब पाने की इच्छा
  246. 12:09करेंगे जब तुम स्वयं को पाने की यात्रा पर
  247. 12:12निकलोगे। यह उल्टा संसार है। तुम दूसरों
  248. 12:16को पाना चाहते हो। इसलिए वे दूर होते जाते
  249. 12:19हैं। तुम स्वयं को पा लो तो संसार स्वयं
  250. 12:23तुम्हारी ओर आने लगता है। तुम एक दीपक
  251. 12:26बनो। दीपक अंधेरे से लड़ता नहीं। वह बस
  252. 12:29जलता है। जिसे प्रकाश चाहिए वो उसके पास
  253. 12:34आता है। तुम भी बस जलो। अपने भीतर सत्य का
  254. 12:38दीप जलाओ। अपने भीतर प्रेम का दीप जलाओ।
  255. 12:41अपने भीतर आनंद का दीप जलाओ। अपने भीतर
  256. 12:44जागरूकता का दीप जलाओ। फिर तुम्हें किसी
  257. 12:47से यह कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि मेरे
  258. 12:49पास आओ। तुम्हारी रोशनी ही निमंत्रण बन
  259. 12:53जाएगी। और यह बात केवल प्रेम संबंधों के
  260. 12:55लिए नहीं है। तुम्हारी मित्रता में,
  261. 12:58तुम्हारे परिवार में, तुम्हारे काम में,
  262. 13:02तुम्हारी बातचीत में, तुम्हारे मौन में।
  263. 13:06हर जगह यह नियम काम करेगा। जो व्यक्ति
  264. 13:09स्वयं में आनंदित है, वह जहां जाता है,
  265. 13:12वहां थोड़ी रोशनी ले जाता है। जो व्यक्ति
  266. 13:16स्वयं से दुखी है, वह जहां जाता है, वहां
  267. 13:20अपनी बेचैनी बांट देता है। इसलिए अपने
  268. 13:22भीतर के वातावरण को बदलो। हर दिन किसी न
  269. 13:26किसी बात पर शिकायत करने की आदत छोड़ो।
  270. 13:29लोग तुम्हें देखते हैं और महसूस करते हैं
  271. 13:31कि तुम हमेशा कुछ ना कुछ कमी खोज रहे हो।
  272. 13:34कभी मौसम में कमी, कभी लोगों में कमी। कभी
  273. 13:38रिश्तों में कमी, कभी अपनी किस्मत में
  274. 13:41कमी। ऐसा मनुष्य कितना भी सुंदर क्यों ना
  275. 13:44हो उसकी उपस्थिति थका देती है। इसके
  276. 13:47विपरीत कुछ लोग ऐसे होते हैं जो किसी
  277. 13:49साधारण क्षण को भी सुंदर बना देते हैं। एक
  278. 13:52कप पानी उनके हाथ में आए तो उसमें भी
  279. 13:55कृतज्ञता दिखाई देती है। एक छोटा सा फूल
  280. 13:58सामने हो तो उनकी आंखों में उत्सव आ जाता
  281. 14:02है। किसी बच्चे की हंसी सुनाई दे तो वे
  282. 14:05मुस्कुरा देते हैं। वे जीवन से बड़ी चीजें
  283. 14:08मांगने की बजाय जीवन की छोटी चीजों को
  284. 14:11गहराई से जीते हैं। यही लोग आकर्षक होते
  285. 14:14हैं क्योंकि उनके भीतर जीवन के प्रति हां
  286. 14:16होती है। तुम्हारी आंखों में जीवन की हां
  287. 14:19चाहिए। तुम्हें हर समय गंभीर चेहरा बनाकर
  288. 14:22आध्यात्मिक नहीं दिखना है। तुम्हें जीवित
  289. 14:25होना है। हंसना सीखो। खेलना सीखो। नाचना
  290. 14:29सीखो। बिना कारण मुस्कुराना सीखो। जिस दिन
  291. 14:32तुम बिना किसी कारण के खुश हो सकते हो उस
  292. 14:36दिन संसार तुम्हें देखकर चकित होगा।
  293. 14:38क्योंकि लोग खुशी के लिए कारण ढूंढते हैं।
  294. 14:41उन्हें सफलता चाहिए, पैसा चाहिए, प्रेम
  295. 14:44चाहिए, प्रशंसा चाहिए, जीत चाहिए। तभी वे
  296. 14:48खुश होते हैं। लेकिन कारण से आई खुशी कारण
  297. 14:51के साथ चली जाती है। तुम्हें ऐसी खुशी
  298. 14:54चाहिए जिसका कोई कारण ना हो। फिर कोई
  299. 14:57तुम्हें छोड़ दे। तुम्हारे भीतर दुख आएगा।
  300. 15:01लेकिन तुम्हारी जड़े नहीं टूटेंग। कोई
  301. 15:03तुम्हें अपना ले तुम प्रसन्न होगे। लेकिन
  302. 15:07तुम अपना केंद्र नहीं खोओगे। कोई तुम्हारी
  303. 15:09प्रशंसा करे तुम मुस्कुराओगे। लेकिन तुम
  304. 15:13उसके शब्दों पर निर्भर नहीं होगे। कोई
  305. 15:15आलोचना करे। तुम सुनोगे। देखोगे कि कुछ
  306. 15:19सत्य है या नहीं। और फिर आगे बढ़ जाओगे।
  307. 15:22तुम्हें पत्थर नहीं बनना है। तुम्हें इतना
  308. 15:25संवेदनशील भी नहीं बनना कि हर शब्द
  309. 15:27तुम्हें तोड़ दे। तुम्हें कमल बनना है।
  310. 15:30कीचड़ में रहकर भी कीचड़ को अपने भीतर जगह
  311. 15:33ना देना। लोग कुछ भी कहें तुम अपना केंद्र
  312. 15:36खोजते रहो। लोग तुम्हारे बारे में कुछ भी
  313. 15:39सोचें तुम्हें अपने बारे में सत्य जानना
  314. 15:41है। क्योंकि दुनिया की राय हवा की तरह
  315. 15:44बदलती रहती है। आज कोई तुम्हें महान
  316. 15:46कहेगा। कल वही तुम्हें गलत कहेगा। आज कोई
  317. 15:50तुम्हारे लिए तड़पेगा। कल वही किसी और के
  318. 15:53साथ हंस सकता है। आज तुम्हें कोई अपना
  319. 15:56कहेगा। कल वही तुम्हें भूल सकता है। तुम
  320. 15:59इन बदलती हुई लहरों पर अपना घर मत बनाओ।
  321. 16:02अपना घर भीतर बनाओ। फिर किसी के आने से
  322. 16:05उत्सव होगा। जाने से जीवन समाप्त नहीं
  323. 16:08होगा। और यही वो स्थान है जहां आकर्षण की
  324. 16:11सबसे गहरी जड़ छिपी है। तुम जितने भीतर से
  325. 16:15स्वतंत्र होगे उतने ही अधिक आकर्षक होगे।
  326. 16:18क्योंकि स्वतंत्र मनुष्य की आंखों में डर
  327. 16:21कम और प्रेम अधिक होता है। उसके पास
  328. 16:24अपेक्षा कम और अनुभव अधिक होता है। वह
  329. 16:27तुम्हें पकड़ता नहीं, तुम्हें छूता है। वह
  330. 16:30तुम्हें बदलने की कोशिश नहीं करता।
  331. 16:32तुम्हें समझने की कोशिश करता है। वह
  332. 16:34तुम्हारी स्वतंत्रता से ईर्ष्या नहीं
  333. 16:37करता। उसे तुम्हारी स्वतंत्रता देखकर खुशी
  334. 16:40होती है। और ऐसा प्रेम बहुत दुर्लभ है।
  335. 16:43तुम दुर्लभ बनो। भीड़ में शामिल होकर मत
  336. 16:46सोचो कि तुम विशेष हो जाओगे। भीड़ से अलग
  337. 16:49होने के लिए अजीब बनने की जरूरत नहीं। बस
  338. 16:52स्वयं होने की जरूरत है। तुम्हारे भीतर जो
  339. 16:56सत्य है उसे जीना शुरू करो। तुम्हें हर
  340. 16:59बात पर सबको खुश करने की जरूरत नहीं। कई
  341. 17:03बार ना कहना होगा। कई बार चुप रहना होगा।
  342. 17:06कई बार लोगों को निराश करना होगा। क्योंकि
  343. 17:10जो हर किसी को खुश करना चाहता है अंत में
  344. 17:13सबसे अधिक स्वयं को दुख देता है। तुम्हें
  345. 17:16सम्मान चाहिए तो अपनी सीमाओं का सम्मान
  346. 17:18करना सीखो। किसी को तुम्हारे साथ कैसा
  347. 17:21व्यवहार करना चाहिए। यह दुनिया को सिखाने
  348. 17:24से पहले स्वयं को सिखाओ कि अपमान के सामने
  349. 17:27खड़े रहना प्रेम नहीं है। जहां बार-बार
  350. 17:30तुम्हें छोटा किया जाता है। वहां केवल
  351. 17:33इसलिए मत रहो क्योंकि तुम्हें डर है कि
  352. 17:35दूसरा चला जाएगा। जिस रिश्ते को बचाने के
  353. 17:39लिए तुम्हें स्वयं को नष्ट करना पड़े उस
  354. 17:42रिश्ते में तुम्हारी उपस्थिति नहीं।
  355. 17:44तुम्हारी अनुपस्थिति ही अधिक सच्ची है।
  356. 17:46तुम्हें किसी के पैरों में गिरकर यह साबित
  357. 17:49नहीं करना कि तुम प्रेम के योग्य हो। तुम
  358. 17:52प्रेम के योग्य जन्म से हो। बस तुम्हें
  359. 17:55अपने भीतर इतना प्रेम जगाना है कि तुम गलत
  360. 17:57जगह प्रेम मांगना बंद कर दो। तुम्हारे
  361. 18:00जीवन में कुछ लोग आएंगे। वे तुम्हें
  362. 18:02छोड़कर जाएंगे। कुछ तुम्हें समझेंगे। कुछ
  363. 18:05तुम्हें गलत समझेंगे। कुछ तुम्हारे बारे
  364. 18:08में ऐसी बातें कहेंगे जो तुम्हें चोट
  365. 18:10पहुंचाएंगी। उन्हें भी जाने दो। हर
  366. 18:12व्यक्ति तुम्हारी कहानी का अंत नहीं होता।
  367. 18:15कुछ लोग अध्याय होते हैं। कुछ लोग दर्पण
  368. 18:18होते हैं। कुछ लोग परीक्षा होते हैं। कुछ
  369. 18:21लोग उपहार होते हैं। और कुछ लोग केवल
  370. 18:24तुम्हें यह सिखाने आते हैं कि अब तुम्हें
  371. 18:26स्वयं से दूर नहीं जाना। जिस दिन तुम यह
  372. 18:29सीख जाते हो उस दिन तुम्हारा अकेलापन भी
  373. 18:33शिक्षक बन जाता है। रात की खामोशी में
  374. 18:36बैठो और स्वयं से पूछो। मैं किसके पीछे
  375. 18:39भाग रहा हूं? क्यों? क्या मुझे उस व्यक्ति
  376. 18:42की जरूरत है या मुझे उसकी स्वीकृति की
  377. 18:45जरूरत है? क्या मैं वास्तव में प्रेम करता
  378. 18:48हूं या मुझे डर है कि कोई और मुझे प्रेम
  379. 18:51नहीं करेगा। क्या मैं उसके साथ रहना चाहता
  380. 18:54हूं? या मैं केवल अकेला नहीं रहना चाहता।
  381. 18:58यह प्रश्न तुम्हें भीतर तक हिला सकते हैं।
  382. 19:01लेकिन इन्हीं प्रश्नों के बाद तुम्हारे
  383. 19:03भीतर एक नया मनुष्य जन्म लेता है। फिर
  384. 19:06तुम्हारा प्रेम मांग नहीं रहता। फिर
  385. 19:08तुम्हारी मुस्कान हथियार नहीं रहती। फिर
  386. 19:11तुम्हारा मौन सजा नहीं रहता। फिर तुम्हारा
  387. 19:14दूर जाना किसी को जलाने के लिए नहीं होता
  388. 19:16है। तुम जो करते हो अपने सत्य के कारण
  389. 19:20करते हो और यही प्रामाणिकता आकर्षक है।
  390. 19:24लोगों को नकली पूर्णता से ज्यादा सच्ची
  391. 19:27अपूर्णता आकर्षित करती है। इसलिए अपनी
  392. 19:30कमजोरियों से शर्मिंदा मत हो। उन्हें
  393. 19:32देखो। उन्हें समझो। उनसे भागो मत। कहो हां
  394. 19:38मेरे भीतर डर है। हां, मैं कभी-कभी
  395. 19:41असुरक्षित हो जाता हूं। हां, मुझे भी
  396. 19:44प्रेम चाहिए। हां, कभी-कभी मुझे भी किसी
  397. 19:48की याद आती है। लेकिन मैं अपनी आवश्यकता
  398. 19:51का गुलाम नहीं हूं। यह बात तुम्हें बहुत
  399. 19:54शक्तिशाली बना देगी। क्योंकि शक्ति का
  400. 19:56अर्थ यह नहीं कि तुम्हें किसी की जरूरत ही
  401. 19:58ना हो। शक्ति का अर्थ यह है कि जरूरत होने
  402. 20:02पर भी तुम स्वयं को ना खो। प्रेम करो मगर
  403. 20:05खुद को मत खोना। पास जाओ मगर अपना केंद्र
  404. 20:09मत खोना। किसी का हाथ पकड़ो मगर अपने
  405. 20:13पैरों पर खड़े रहना मत भूलो। किसी के साथ
  406. 20:16जीवन बांटो मगर अपनी आत्मा का स्वामित्व
  407. 20:19मत दे दो। यह तुम्हारा जीवन है और
  408. 20:22तुम्हारा जीवन किसी दूसरे की संपत्ति नहीं
  409. 20:24है। यही बात समझकर जीने वाला मनुष्य अलग
  410. 20:27दिखाई देता है। उसमें एक गरिमा आती है।
  411. 20:30उसकी चाल में शांति आती है। वो किसी कमरे
  412. 20:33में प्रवेश करता है तो अपनी उपस्थिति का
  413. 20:36विज्ञापन नहीं करता। फिर भी लोग उसकी ओर
  414. 20:38देखते हैं क्योंकि वह स्वयं को दिखाने
  415. 20:40नहीं आया है। वह बस है। और जो मनुष्य केवल
  416. 20:44है वह बहुत दुर्लभ है। तुम्हें भी बस होना
  417. 20:48सीखना है। कुछ साबित नहीं करना। किसी से
  418. 20:52जीतना नहीं। किसी को हराना नहीं। किसी को
  419. 20:55जलाना नहीं। किसी को पछताना सिखाना नहीं।
  420. 20:59तुम अपने भीतर इतनी सुंदरता पैदा करो कि
  421. 21:01यदि कोई तुम्हें खो दे तो उसे पछतावा
  422. 21:04तुम्हारी चालाकी से नहीं तुम्हारी सच्चाई
  423. 21:07से हो। यह फर्क समझो। तुम किसी को पछताने
  424. 21:11के लिए मजबूर नहीं कर सकते। लेकिन तुम
  425. 21:13अपने जीवन को इतना सुंदर बना सकते हो कि
  426. 21:16तुम्हें खोने वाला स्वयं महसूस करें कि
  427. 21:19उसने क्या खोया और यह करने का सबसे सरल
  428. 21:22रास्ता है अपना जीवन जीना पूरा जीना बिना
  429. 21:27किसी की अनुमति के जीना बिना किसी की
  430. 21:30निगाह के डर के जीना बिना किसी की
  431. 21:33स्वीकृति के नाचना बिना किसी के आदेश के
  432. 21:36मुस्कुराना बिना किसी के डर के प्रेम करना
  433. 21:40अपने काम में गहराई लाओ अपने शरीर को
  434. 21:43स्वस्थ रखो। अपने मन को स्वच्छ रखो। अपनी
  435. 21:47दृष्टि को निर्मल रखो। अपनी वाणी में सत्य
  436. 21:50रखो। और अपने जीवन में उत्सव रखो। फिर
  437. 21:54तुम्हें आकर्षण पैदा करने की जरूरत नहीं
  438. 21:56पड़ेगी। आकर्षण अपने आप पैदा होगा।
  439. 21:59क्योंकि सुगंध को यह पता नहीं होता कि कौन
  440. 22:01उसे सूंघेगा। फूल ये तय नहीं करता कि कौन
  441. 22:04उसकी ओर आए। सूरज ये नहीं देखता कि कौन
  442. 22:07उसकी रोशनी का आभार मानेगा। वह बस चमकता
  443. 22:10है। तुम भी चमको और तब शायद कोई तुम्हें
  444. 22:14खोजते हुए आए। शायद कोई तुम्हारे मिलने की
  445. 22:17दुआ करें। शायद कोई तुम्हें याद करे। शायद
  446. 22:20कोई तुम्हारे साथ बिताए हुए एक छोटे से
  447. 22:23क्षण को वर्षों तक अपने भीतर संजो कर रखे।
  448. 22:27लेकिन तुम्हें तब भी उसकी जरूरत नहीं
  449. 22:29होगी। क्योंकि तुमने अपने भीतर वह स्थान
  450. 22:32खोज लिया होगा जहां किसी के आने से आनंद
  451. 22:34बढ़ सकता है। मगर किसी के जाने से आनंद
  452. 22:37समाप्त नहीं होता। और यही सच्ची
  453. 22:40स्वतंत्रता है। यही सच्चा आकर्षण है। यही
  454. 22:43वह सुंदर रहस्य है जिसे समझ लेने पर
  455. 22:45तुम्हें किसी के पीछे दौड़ना बंद करना
  456. 22:47पड़ेगा। तुम अपने भीतर उतरोगे। तुम अपनी
  457. 22:51आत्मा की धूल साफ करोगे। तुम पुराने घावों
  458. 22:54को देखोगे। तुम अपने डर को समझोगे। तुम
  459. 22:57अपनी इच्छाओं को पहचानोगे। तुम अपने
  460. 23:00अकेलेपन के साथ बैठोगे। तुम स्वयं से
  461. 23:02प्रेम करना सीखोगे। और फिर एक दिन अचानक
  462. 23:05तुम्हें पता चलेगा कि जिसे पाने के लिए
  463. 23:08तुम संसार भर में घूम रहे थे वह कोई दूसरा
  464. 23:11व्यक्ति नहीं था। वह तुम स्वयं थे। तुम
  465. 23:14स्वयं को खोजते रहे। और जैसे ही तुम स्वयं
  466. 23:17तक पहुंचोगे। तुम्हारी आंखों में वह चमक आ
  467. 23:20जाएगी जिसे कोई प्रसाधन नहीं दे सकता।
  468. 23:23तुम्हारे चेहरे पर वो शांति आ जाएगी जिसे
  469. 23:25कोई प्रशंसा नहीं दे सकती। तुम्हारी आवाज
  470. 23:28में वो वजन आ जाएगा जिसे कोई शब्दों का
  471. 23:31खेल नहीं दे सकता। तुम्हारे मौन में वह
  472. 23:33गहराई आ जाएगी जिससे किसी का हृदय स्वयं
  473. 23:36तुम्हारी ओर मुड़ सकता है। फिर तुम किसी
  474. 23:38से यह नहीं कहोगे कि मुझे छोड़कर मत जाना।
  475. 23:41तुम कहोगे अगर तुम्हें मेरे साथ चलना
  476. 23:44अच्छा लगे तो चलो। अगर किसी दिन तुम्हें
  477. 23:47किसी और दिशा में जाना हो तो जाओ। मेरा
  478. 23:50प्रेम तुम्हारे लिए जेल नहीं बनेगा। और
  479. 23:53जिस प्रेम में यह स्वतंत्रता है, उसी
  480. 23:56प्रेम में लौटने की संभावना सबसे अधिक
  481. 23:58होती है। क्योंकि मनुष्य वहां लौटता है
  482. 24:01जहां उसे बांधा नहीं गया था। वो वहां
  483. 24:03लौटता है जहां उसकी आत्मा को जगह मिली थी।
  484. 24:06वो वहां लौटता है जहां उसे बदलने के लिए
  485. 24:08मजबूर नहीं किया गया था। वो वहां लौटता है
  486. 24:11जहां वह स्वयं हो सकता था। इसलिए अपने
  487. 24:14भीतर ऐसी जगह बनाओ, ऐसा हृदय बनाओ जहां
  488. 24:17कोई आए तो उसे भय ना लगे। ऐसा मन बनाओ
  489. 24:21जहां कोई अपनी कमजोरियां रख सके। ऐसी
  490. 24:23आंखें बनाओ जिनमें निर्णय नहीं, समझ हो।
  491. 24:27ऐसी मुस्कान बनाओ जिसमें मांग नहीं, जीवन
  492. 24:30हो। ऐसी उपस्थिति बनाओ जिसमें पकड़ नहीं।
  493. 24:34स्पर्श हो। और फिर देखना आकर्षण तुम्हारे
  494. 24:38पीछे चलेगा। तुम आकर्षण के पीछे नहीं
  495. 24:40चलोगे। लोग तुम्हारी आवाज सुनना चाहेंगे।
  496. 24:44लोग तुम्हारे साथ बैठना चाहेंगे। लोग
  497. 24:46तुम्हारे पास लौटना चाहेंगे। क्योंकि तुम
  498. 24:49उन्हें अपने पास इसलिए नहीं रखोगे कि
  499. 24:51तुम्हें उनकी जरूरत है। तुम उन्हें इसलिए
  500. 24:54जगह दोगे क्योंकि तुम्हारे भीतर जगह है और
  501. 24:56जगह हमेशा आकर्षित करती है। आसमान आकर्षित
  502. 25:00करता है क्योंकि उसमें जगह है। समुद्र
  503. 25:02आकर्षित करता है क्योंकि उसमें गहराई है।
  504. 25:05फूल आकर्षित करता है क्योंकि उसमें सुगंध
  505. 25:08है। और मनुष्य आकर्षित करता है क्योंकि
  506. 25:10उसके भीतर एक जीवित आत्मा है। तुम्हें वही
  507. 25:13आत्मा जगानी है। तुम्हें किसी के आने की
  508. 25:16प्रतीक्षा में जीवन को रोकना नहीं है।
  509. 25:18जीवन पहले से चल रहा है। नाचो, सीखो,
  510. 25:23पढ़ो, रचना करो, हंसो, प्रेम करो, अकेले
  511. 25:27बैठो। सुबह को सुबह की तरह जियो, रात को
  512. 25:30रात की तरह जियो। हर दिन को उधार मत बनाओ।
  513. 25:34यह मत सोचो कि जब वो आएगा तब मैं खुश
  514. 25:36होऊंगा। यह मत सोचो कि जब वो मुझे चुनेगा
  515. 25:39तब मैं महत्वपूर्ण होऊंगा। यह मत सोचो कि
  516. 25:42जब वो वापस आएगा तब मेरा जीवन पूरा होगा
  517. 25:45नहीं। तुम्हारा जीवन अभी पूरा है और यही
  518. 25:49पूर्णता तुम्हें आकर्षक बनाएगी। जिस दिन
  519. 25:52तुम भीतर से कहना शुरू कर दोगे कि मेरा
  520. 25:54जीवन किसी के लौटने की प्रतीक्षा में रुका
  521. 25:57हुआ नहीं है। उसी दिन तुम्हारे भीतर एक
  522. 26:00ऐसी स्वतंत्रता जन्म लेगी जिसे देखकर
  523. 26:02संसार चौकेगा। फिर चाहे कोई लौटे या ना
  524. 26:05लौटे। तुम खिलते रहोगे। और यही तुम्हारी
  525. 26:08सबसे बड़ी विजय होगी। क्योंकि अंततः
  526. 26:11तुम्हें किसी व्यक्ति को अपने पास वापस
  527. 26:13लाना नहीं है। तुम्हें स्वयं को अपने पास
  528. 26:16वापस लाना है। तुम बहुत दूर चले गए हो
  529. 26:19दूसरों की उम्मीदों में। अब वापस आओ अपने
  530. 26:22भीतर, अपने मौन में, अपने हृदय में। उस
  531. 26:26जगह जहां तुम किसी के प्रेम के बिना भी
  532. 26:28प्रेम हो। जहां तुम किसी की प्रशंसा के
  533. 26:31बिना भी सुंदर हो। जहां किसी के आने के
  534. 26:34बिना भी उत्सव है और जब तुम उस जगह खड़े
  535. 26:37हो जाओगे तब संसार में जो भी तुम्हारे
  536. 26:40जीवन में आएगा वह तुम्हारी जरूरत नहीं
  537. 26:43होगा वो तुम्हारी यात्रा का साथी होगा और
  538. 26:46साथी को बांधा नहीं जाता साथी के साथ चला
  539. 26:50जाता है कभी पास कभी दूर कभी मौन में कभी
  540. 26:56हंसी में कभी आंखों के आंसुओं में लेकिन
  541. 27:00एक चीज स्थिर रहती है तुम स्वयं से दूर
  542. 27:03नहीं जाते। यही रहस्य है। यही तुम्हारी
  543. 27:07शक्ति है। और जब तुम स्वयं से दूर नहीं
  544. 27:09जाते तब तुम्हारे भीतर ऐसी उपस्थिति पैदा
  545. 27:12होती है कि किसी दिन बहुत साधारण से दिन
  546. 27:16में बिना किसी घोषणा के बिना किसी प्रयास
  547. 27:20के कोई तुम्हारे बारे में सोचते हुए ठहर
  548. 27:23जाएगा। उसे तुम्हारी हंसी याद आएगी।
  549. 27:27तुम्हारी आंखें याद आएंगी। तुम्हारे साथ
  550. 27:29बिताया हुआ कोई छोटा सा क्षण याद आएगा।
  551. 27:32उसे याद आएगा कि तुम्हारे पास बैठकर वह
  552. 27:35स्वयं को थोड़ा अधिक सच्चा महसूस करता था
  553. 27:38और तभी उसके भीतर तुम्हारे मिलने की इच्छा
  554. 27:41जन्म लेगी। लेकिन उस क्षण भी तुम्हें
  555. 27:43दौड़ना नहीं है। बस अपनी जगह खड़े रहना
  556. 27:46है। क्योंकि जो तुम्हारे जीवन में
  557. 27:49तुम्हारी सच्चाई के कारण आएगा उसे पकड़ने
  558. 27:52की जरूरत नहीं होगी। वो तुम्हारे जीवन में
  559. 27:55ठहरेगा। और जो तुम्हारे जीवन से चला जाएगा
  560. 27:59उसे रोकने की जरूरत नहीं होगी क्योंकि
  561. 28:01तुम्हारी आत्मा ने अब यह सीख लिया होगा कि
  562. 28:04प्रेम का अर्थ किसी को रोकना नहीं। प्रेम
  563. 28:06का अर्थ इतना सुंदर होना है कि तुम्हारी
  564. 28:08उपस्थिति स्वतंत्रता में भी याद आए और यही
  565. 28:12वह आकर्षण है जिसके सामने शब्द छोटे पड़
  566. 28:14जाते हैं। जिसे देखकर कोई कहे भी नहीं कि
  567. 28:18क्यों बस उसके भीतर एक इच्छा उठे तुमसे
  568. 28:22मिलने की तुम्हारे पास बैठने की। तुम्हारी
  569. 28:26आंखों में देखने की और शायद बिना तुम्हें
  570. 28:30बताए तुम्हारे लिए दुआ करने की। लेकिन उस
  571. 28:34दुआ तक पहुंचने के लिए तुम्हें किसी के मन
  572. 28:36में अपनी तस्वीर नहीं बनानी है। तुम्हें
  573. 28:38अपने भीतर एक ऐसा जीवन बनाना है जिसे
  574. 28:41देखकर तुम्हें स्वयं अपने होने पर प्रेम
  575. 28:43हो जाए। क्योंकि ध्यान से समझो। जो मनुष्य
  576. 28:47स्वयं को पसंद नहीं करता वह दूसरों से
  577. 28:50चाहे जितना प्रेम मांग ले उसके भीतर एक
  578. 28:53खाली कटोरा बना ही रहता है। कोई उसमें
  579. 28:56कितना भी भर दे वो फिर खाली हो जाता है।
  580. 29:00आज प्रशंसा मिली तो आनंद आया। कल किसी ने
  581. 29:03ध्यान नहीं दिया तो मन बुझ गया। आज किसी
  582. 29:06ने कहा कि तुम बहुत खास हो तो तुम फूल गए।
  583. 29:10कल किसी ने तुम्हें साधारण समझ लिया तो
  584. 29:13तुम भीतर से टूट गए। ये कैसी स्वतंत्रता
  585. 29:16है। तुम्हारी खुशी किसी दूसरे की जीभ पर
  586. 29:19क्यों टंगी हुई है? तुम्हारा आत्मसम्मान
  587. 29:22किसी दूसरे की आंखों का मोहताज क्यों है?
  588. 29:25तुम्हारा हृदय किसी दूसरे के व्यवहार से
  589. 29:27क्यों तय करता है कि आज तुम्हें प्रसन्न
  590. 29:29होना है या दुखी। जिस दिन यह समझ आ जाती
  591. 29:32है। उसी दिन तुम दूसरों के हाथों की
  592. 29:34कठपुतली होना बंद कर देते हो। और सुनो
  593. 29:38आकर्षण का पहला नियम है। किसी को प्रभावित
  594. 29:42मत करो। स्वयं को प्रकाशित करो। प्रभावित
  595. 29:45करने वाला व्यक्ति हमेशा तनाव में रहता
  596. 29:47है। उसे सोचना पड़ता है कि मैं कैसे दिख
  597. 29:50रहा हूं। उसने मेरे बारे में क्या सोचा?
  598. 29:53मुझे क्या बोलना चाहिए? मुझे कितना बोलना
  599. 29:56चाहिए? मुझे कब पास जाना चाहिए? कब दूर
  600. 29:59होना चाहिए? कौन सा चेहरा बनाना चाहिए?
  601. 30:02लेकिन प्रकाशित व्यक्ति ऐसा नहीं करता। वो
  602. 30:05बस अपने भीतर का दीपक जलाकर बैठा रहता है।
  603. 30:08जो देखना चाहता है देख ले। जो समझना चाहता
  604. 30:12है समझ ले जो पास आना चाहता है आ जाए जो
  605. 30:17जाना चाहता है चला जाए उसके भीतर किसी को
  606. 30:21बांधने की इच्छा नहीं होती और यही
  607. 30:24स्वतंत्रता
  608. 30:25एक गहरी चुंबकीय शक्ति बन जाती है तुमने
  609. 30:29कभी देखा है जंगल में खड़ा कोई वृक्ष किसी
  610. 30:32को बुलाता नहीं फिर भी पक्षी उसके ऊपर आकर
  611. 30:35बैठते हैं कोई नदी किसी को नहीं कहती कि
  612. 30:38मेरी ओर आओ फिर भी प्यासा उसके किनारे तक
  613. 30:41पहुंच जाता है। कोई फूल रास्ते से गुजरते
  614. 30:45मनुष्य को पकड़ कर नहीं कहता कि मेरी
  615. 30:46सुगंध लो। वह बस खिलता है। तुम भी खिलो।
  616. 30:51तुम्हारा काम किसी को बुलाना नहीं है।
  617. 30:53तुम्हारा काम खिलना है। और खिलने में सबसे
  618. 30:56बड़ी बाधा है अपने बारे में तुम्हारी बनाई
  619. 31:00हुई धारणा। तुमने अपने ऊपर बहुत सारे नाम
  620. 31:03चिपका रखे हैं। मैं ऐसा हूं, मैं वैसा
  621. 31:06हूं, मैं सुंदर हूं, मैं बदसूरत हूं। मैं
  622. 31:10सफल हूं। मैं असफल हूं। मुझे लोग पसंद
  623. 31:14करते हैं। मुझे लोग पसंद नहीं करते। मैं
  624. 31:16बहुत अच्छा हूं। मैं बहुत कमजोर हूं। इन
  625. 31:20सब धारणाओं को थोड़ी देर के लिए अलग रखो।
  626. 31:23और देखो जब तुम्हारे पास अपने बारे में
  627. 31:26बताने के लिए कोई कहानी नहीं होती तब क्या
  628. 31:29बचता है? एक मौन, एक जीवित उपस्थिति, एक
  629. 31:34सीधा अनुभव और उसी में वास्तविक सौंदर्य
  630. 31:38है। तुम्हें अपने बारे में कहानी नहीं
  631. 31:39बनानी। तुम्हें स्वयं को जीना है। क्योंकि
  632. 31:43कहानी हमेशा अतीत से आती है। लेकिन जीवन
  633. 31:46हमेशा अभी है। किसी ने तुम्हें कभी छोड़
  634. 31:49दिया था इसलिए तुम आज डरते हो। किसी ने
  635. 31:53तुम्हें कभी धोखा दिया था इसलिए तुम आज
  636. 31:55किसी पर भरोसा नहीं कर पाते। किसी ने
  637. 31:58तुम्हें कभी अपमानित किया था। इसलिए तुम
  638. 32:01आज हर जगह सम्मान खोजते हो। लेकिन सोचो
  639. 32:05जिसने कल तुम्हें चोट पहुंचाई। वो आज
  640. 32:08तुम्हारे भीतर क्यों जीवित है? वो चला
  641. 32:10गया। घटना चली गई। शब्द चले गए। दिन चला
  642. 32:15गया। फिर भी तुम उस स्मृति को रोज अपने
  643. 32:18भीतर पानी देते हो। और फिर कहते हो मेरे
  644. 32:22भीतर शांति क्यों नहीं है? तुम्हें अतीत
  645. 32:25को सुलाना होगा। तुम्हें हर उस चेहरे को
  646. 32:28अपने भीतर से विदा करना होगा जिसे तुम अब
  647. 32:30भी अपने वर्तमान का मालिक बनाए बैठे हो।
  648. 32:33जिसने तुम्हें छोड़ा उसे छोड़ दो। जिसने
  649. 32:37तुम्हें ठुकराया उसे उसकी जगह दे दो।
  650. 32:41जिसने तुम्हें गलत समझा उसे समझाने की
  651. 32:44जिम्मेदारी अपने ऊपर मत रखो। क्योंकि
  652. 32:47कभी-कभी मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन यह होता
  653. 32:50है कि वह अपने बारे में किसी दूसरे की गलत
  654. 32:52धारणा को सही साबित करने में अपना जीवन
  655. 32:55लगा देता है। तुम्हें हर किसी को समझाना
  656. 32:58नहीं है। सत्य को प्रमाण की जरूरत नहीं
  657. 33:01होती। तुम सत्य में जीते रहो। समय स्वयं
  658. 33:05बता देगा कि तुम कौन थे। और यही वह जगह है
  659. 33:08जहां तुम्हारा आकर्षण और गहरा हो जाता है।
  660. 33:11क्योंकि अब तुम प्रतिक्रिया नहीं करते।
  661. 33:13तुम प्रतिक्रिया से ऊपर उठकर उत्तर देना
  662. 33:16सीखते हो। कोई तुम्हें अनदेखा करे तुम
  663. 33:20टूटते नहीं। कोई तुम्हारी प्रशंसा करे तुम
  664. 33:23उड़ते नहीं। कोई तुम्हें बुलाए तुम दौड़ते
  665. 33:27नहीं। कोई दूर जाए तुम उसके पीछे नहीं
  666. 33:31जाते। तुम्हारे भीतर एक केंद्र होता है।
  667. 33:34और जिसका केंद्र उसके भीतर है उसे कोई
  668. 33:38बाहर की घटना हिला नहीं सकती। तुम ऐसे बनो
  669. 33:42क्योंकि आकर्षण का अर्थ यह नहीं कि लोग
  670. 33:44तुम्हें देखते रहे। आकर्षण का अर्थ यह है
  671. 33:47कि तुम्हें देखकर लोगों को अपने भीतर
  672. 33:49देखने की इच्छा होने लगे। तुम्हारी संगति
  673. 33:52उन्हें स्वयं से दूर ना करें। स्वयं के
  674. 33:55पास ले आएं। तुम्हारे पास बैठकर किसी को
  675. 33:58अपने दुख की कहानी सुनाने में सुरक्षा
  676. 34:00मिले। किसी को अपने डर स्वीकार करने में
  677. 34:03शर्म ना आए। किसी को रो लेने में कमजोरी
  678. 34:06महसूस ना हो। किसी को यह अभिनय ना करना
  679. 34:08पड़े कि वह बहुत मजबूत है। ऐसा मनुष्य
  680. 34:11दुर्लभ होता है और दुर्लभ चीजों को खोजा
  681. 34:15जाता है। तुम भी अपने भीतर ऐसा दुर्लभपन
  682. 34:18पैदा करो। लेकिन याद रखना दुर्लभ बनने का
  683. 34:22अर्थ दूसरों से अलग दिखना नहीं। दुर्लभ
  684. 34:25बनने का अर्थ है स्वयं होना। भीड़ जैसा
  685. 34:30बनना बहुत आसान है। सब जिस दिशा में जा
  686. 34:33रहे हैं उसी दिशा में चलो। सब जिस बात पर
  687. 34:37हंस रहे हैं उस पर हंस दो। सब जिस बात से
  688. 34:41डर रहे हैं उससे डर जाओ। सब जो कह रहे हैं
  689. 34:45उसे सच मान लो। यह भीड़ है। लेकिन जागा
  690. 34:49हुआ मनुष्य पूछता है। क्या यह सच में मेरा
  691. 34:52रास्ता है?
  692. 34:54यहीं से उसकी यात्रा शुरू होती है और जब
  693. 34:57तुम अपनी राह चुनते हो तब तुम में गहराई
  694. 35:00आती है। गहराई हमेशा आकर्षक होती है। उथली
  695. 35:04चीजें शोर करती हैं। गहरी चीजें शांत होती
  696. 35:07हैं। समुद्र शोर नहीं करता कि मैं बहुत
  697. 35:10गहरा हूं। वो बस गहरा है। तुम्हें भी अपने
  698. 35:13भीतर गहराई चाहिए। कम बोलो। लेकिन जो बोलो
  699. 35:18उसमें जीवन हो। कम वादे करो लेकिन जो करो
  700. 35:23उसे निभाओ। कम लोगों से मिलो लेकिन जिनसे
  701. 35:27मिलो उनके सामने सच में उपस्थित रहो। कम
  702. 35:31प्रेम का प्रदर्शन करो लेकिन प्रेम करो तो
  703. 35:35पूरा करो। क्योंकि आधा प्रेम, आधी
  704. 35:38उपस्थिति, आधी ईमानदारी मनुष्य को भीतर से
  705. 35:43थका देती है। तुम्हारी पूरी उपस्थिति ही
  706. 35:46तुम्हारा सबसे बड़ा आकर्षण है। जब तुम
  707. 35:48किसी से बात करो तो सच में उसके साथ रहो।
  708. 35:52जब सुनो तो सच में सुनो। जब हंसो तो सच
  709. 35:57में हंसो। जब रोच
  710. 36:00में रो। तुम्हारे भीतर विभाजन जितना कम
  711. 36:03होगा तुम्हारी ऊर्जा उतनी ही शक्तिशाली
  712. 36:07होगी और एक बहुत सुंदर बात है लोग सुंदर
  713. 36:11चेहरे भूल सकते हैं लेकिन वे उस मनुष्य को
  714. 36:14नहीं भूलते जिसके सामने वे स्वयं होने की
  715. 36:16अनुमति पा गए थे इसलिए दूसरों के लिए
  716. 36:19सुरक्षित जगह बनो ऐसी जगह जहां कोई आकर
  717. 36:23अपने मुखौटे उतार सके जहां कोई अपने कमजोर
  718. 36:27हिस्से छिपाने की जरूरत महसूस ना करे जहां
  719. 36:30कोई यह ना सोचे कि मेरी कमी देखकर यह
  720. 36:32व्यक्ति मुझे छोड़ देगा। और जब तुम किसी
  721. 36:35को ऐसी स्वतंत्रता देते हो तो ध्यान रखना
  722. 36:39वह स्वतंत्रता तुम्हें भी बदलती है। तुम
  723. 36:42नियंत्रक से प्रेमी बन जाते हो। मालिक से
  724. 36:45साथी बन जाते हो। भयभीत मनुष्य से जागरूक
  725. 36:48मनुष्य बन जाते हो। और तब संबंधों का अर्थ
  726. 36:52बदल जाता है। तुम किसी से यह नहीं कहते
  727. 36:55मुझे मत छोड़ना। तुम कहते हो मेरे साथ रहो
  728. 37:00तो पूरे रहना। मैं तुम्हें बांधूंगा नहीं।
  729. 37:03तुम्हें पिंजरे में रखकर प्रेम नहीं
  730. 37:05करूंगा। तुम्हें डराकर अपने पास नहीं
  731. 37:08रखूंगा। तुम्हें दोष देकर अपने साथ नहीं
  732. 37:10रखूंगा। तुम्हें अपराध बोध देकर अपने पास
  733. 37:13नहीं रखूंगा। मैं तुम्हें स्वतंत्र देखना
  734. 37:16चाहता हूं। और जो तुम्हें स्वतंत्र देख
  735. 37:19सकता है, उसके प्रेम में शक्ति होती है।
  736. 37:23क्योंकि निर्भरता कमजोर होती है।
  737. 37:25स्वतंत्रता मजबूत होती है। तुम्हें मजबूत
  738. 37:29प्रेम चाहिए। ऐसा प्रेम जिसमें दो लोग दो
  739. 37:32कैदियों की तरह नहीं दो स्वतंत्र
  740. 37:35व्यक्तियों की तरह मिले। फिर एक दूसरे के
  741. 37:38जीवन में प्रवेश करना बोझ नहीं रहता।
  742. 37:40उत्सव बन जाता है और जब प्रेम उत्सव होता
  743. 37:44है तब उसकी सुगंध बहुत दूर तक जाती है।
  744. 37:48फिर कोई तुम्हारे पास इसलिए नहीं लौटता कि
  745. 37:50उसे दोष महसूस हो रहा है। वह लौटता है
  746. 37:53क्योंकि उसे तुम्हारी उपस्थिति की याद आती
  747. 37:56है। तुम्हारी आंखों की तुम्हारी सादगी की,
  748. 37:59तुम्हारे मौन की, तुम्हारी हंसी की,
  749. 38:02तुम्हारे साथ बिताए उन क्षणों की जहां उसे
  750. 38:06खुद को साबित नहीं करना पड़ा था। और यह
  751. 38:08बहुत बड़ी बात है। दुनिया में लगभग हर जगह
  752. 38:11तुम्हें कुछ बनने के लिए कहा जाता है।
  753. 38:14यहां सफल बनो, यहां सुंदर बनो, यहां बेहतर
  754. 38:17बनो, यहां दूसरों से आगे निकलो। यहां खुद
  755. 38:20को साबित करो। और फिर एक ऐसा मनुष्य मिलता
  756. 38:24है जो कहता है तुम जैसे हो वैसे रह सकते
  757. 38:27हो। यही सबसे बड़ा आकर्षण है। तुम लोगों
  758. 38:30को सुधारने की दुकान मत बनो। हर किसी में
  759. 38:34कमी खोजने की आदत छोड़ो। किसी को देखकर यह
  760. 38:37मत सोचो कि इसे ऐसा होना चाहिए था। यह
  761. 38:40वैसा क्यों नहीं है? जिस दिन तुम दूसरों
  762. 38:43को उनके होने की जगह देने लगते हो, उसी
  763. 38:47दिन तुम्हारे भीतर प्रेम का जन्म होता है।
  764. 38:50और प्रेम की सुगंध किसी भी कृत्रिम आकर्षण
  765. 38:54से हजार गुना अधिक शक्तिशाली है। लेकिन इस
  766. 38:57रास्ते में तुम्हें एक और परीक्षा देनी
  767. 38:59होगी। तुम्हें अपने अहंकार को देखना होगा।
  768. 39:02अहंकार चाहता है कि लोग तुम्हें याद रखें।
  769. 39:06प्रेम चाहता है कि लोग स्वयं को याद रखें।
  770. 39:09अहंकार चाहता है कि लोग तुम्हारे बिना
  771. 39:11बेचैन हो। प्रेम चाहता है कि लोग तुम्हारे
  772. 39:14साथ स्वतंत्र हो। अहंकार चाहता है कि तुम
  773. 39:17सबसे खास हो। प्रेम जानता है कि हर
  774. 39:20व्यक्ति अपने ढंग से खास है। अहंकार तुलना
  775. 39:24करता है। प्रेम अनुभव करता है। अहंकार
  776. 39:27जीतता है। प्रेम मिलाता है। तुम्हें तय
  777. 39:30करना है कि तुम किसे पालना चाहते हो। और
  778. 39:33यह चुनाव हर दिन होगा। जब कोई तुम्हें
  779. 39:36अनदेखा करेगा अहंकार कहेगा। उसे दिखा दो
  780. 39:40कि तुम कितने महत्वपूर्ण हो। प्रेम कहेगा।
  781. 39:43जाने दो। जब कोई तुम्हें छोड़ देगा।
  782. 39:46अहंकार कहेगा। उसे पछताने पर मजबूर करो।
  783. 39:50प्रेम कहेगा अपने जीवन को सुंदर बना लो।
  784. 39:54जब कोई किसी और को तुमसे अधिक महत्व देगा।
  785. 39:57अहंकार कहेगा मुकाबला करो। प्रेम कहेगा
  786. 40:02जिसे जहां आनंद मिले। उसे वहां जाने दो।
  787. 40:05और धीरे-धीरे तुम देखोगे। जो जीवन पहले
  788. 40:09दूसरों से लड़ने में बीत रहा था। वही जीवन
  789. 40:12अब खिलने लगता है। तुम्हारी ऊर्जा बचने
  790. 40:15लगती है। तुम्हारे भीतर स्थान बनने लगता
  791. 40:18है। और वही स्थान आकर्षण है। याद रखो थका
  792. 40:22हुआ मनुष्य आकर्षक नहीं होता। हर समय
  793. 40:25शिकायत करने वाला मनुष्य आकर्षक नहीं
  794. 40:28होता। हर बात पर नाराज होने वाला मनुष्य
  795. 40:30आकर्षक नहीं होता। हर व्यक्ति से तुलना
  796. 40:33करने वाला मनुष्य आकर्षक नहीं होता। हर
  797. 40:36समय स्वयं को सही सिद्ध करने वाला मनुष्य
  798. 40:38आकर्षक नहीं होता।
  799. 40:40लेकिन जो व्यक्ति स्वयं के भीतर शांत है
  800. 40:43उसके पास बैठने की इच्छा होती है क्योंकि
  801. 40:46उसकी शांति तुम्हें संक्रमित करती है।
  802. 40:49उसका संतुलन तुम्हें छूता है। उसकी आंखों
  803. 40:52का भरोसा तुम्हें अपने डर से बाहर लाता
  804. 40:54है। इसलिए अपने भीतर शांति पैदा करो। और
  805. 40:58शांति पैदा करने के लिए संसार बदलना जरूरी
  806. 41:01नहीं। सिर्फ देखने का ढंग बदलना जरूरी है।
  807. 41:04तुम्हें हर घटना के खिलाफ लड़ना बंद करना
  808. 41:07होगा। जो है पहले उसे स्वीकारो फिर देखो
  809. 41:12उसमें क्या किया जा सकता है। स्वीकार करना
  810. 41:16हार नहीं है। स्वीकार करना वास्तविकता को
  811. 41:19पहचानना है। बारिश हो रही है तो पहले
  812. 41:23स्वीकारो कि बारिश हो रही है। उसके बाद छत
  813. 41:25खोजो। बारिश से लड़कर तुम भीगने से नहीं
  814. 41:29बचोगे। जीवन में भी यही है। जो हो चुका वो
  815. 41:33हो चुका। जिसे बदला नहीं जा सकता उसके
  816. 41:37खिलाफ अपनी ऊर्जा मत बहाओ। तुम्हारे जीवन
  817. 41:40की ऊर्जा बहुत मूल्यवान है। इसे उस मनुष्य
  818. 41:42के पीछे मत गवाओ जो तुम्हें नहीं चुनता।
  819. 41:45इसे उस स्मृति पर मत खर्च करो जिसने
  820. 41:47तुम्हें छोड़ा। इसे उस व्यक्ति को
  821. 41:50प्रभावित करने में मत जला दो जिसे
  822. 41:52प्रभावित होने में कोई रुचि नहीं। अपनी
  823. 41:55ऊर्जा अपने निर्माण में लगाओ। अपने
  824. 41:58व्यक्तित्व की जड़ों में लगाओ। अपने ज्ञान
  825. 42:01में, अपने स्वास्थ्य में, अपने काम में,
  826. 42:05अपनी कला में, अपने मौन में, अपने ध्यान
  827. 42:09में, अपने प्रेम में। और फिर देखना
  828. 42:13तुम्हें अपनी ही जिंदगी इतनी सुंदर लगने
  829. 42:15लगेगी कि किसी दूसरे का आना तुम्हारी
  830. 42:18जिंदगी की आवश्यकता नहीं रहेगा। वह एक
  831. 42:20सुंदर संभावना होगा और संभावना हमेशा
  832. 42:24आकर्षक होती है। जरूरत में पकड़ होती है।
  833. 42:27संभावना में खुलापन होता है। तुम खुलापन
  834. 42:30बनो। तुम किसी एक परिणाम के पीछे मत जियो।
  835. 42:34आज यह व्यक्ति मुझे प्रेम करेगा। आज वह
  836. 42:36मुझे उत्तर देगा। आज वह लौटेगा। आज वो
  837. 42:40मुझे चुनेगा। इन सब कल्पनाओं से बाहर आओ।
  838. 42:44जीवन को पकड़ना बंद करो। जीवन को घटित
  839. 42:47होने दो। कितना अजीब है जब तुम जीवन को
  840. 42:52नियंत्रित करना छोड़ते हो तब जीवन अधिक
  841. 42:55सुंदर होने लगता है। फूल को खींचोगे तो
  842. 42:58खिल नहीं जाएगा। समय को धक्का दोगे तो
  843. 43:01जल्दी नहीं आएगा। मनुष्य को पकड़ोगे तो
  844. 43:04प्रेम पैदा नहीं होगा। प्रेम को भी जगह
  845. 43:08चाहिए। श्वास की तरह। तुम स्वास को पकड़
  846. 43:11कर नहीं रख सकते। उसे भीतर आने दो। बाहर
  847. 43:15जाने दो। इसी में जीवन है और संबंध भी ऐसे
  848. 43:18ही हैं। पास आने दो, दूर जाने दो, फिर पास
  849. 43:22आने दो। जो हवा की तरह स्वतंत्र है, वही
  850. 43:26लंबे समय तक ताजा रहता है। बासी हवा को
  851. 43:29कमरे में बंद कर दो। वह घुटन बन जाएगी।
  852. 43:33इसलिए अपने संबंधों में हवा रहने दो। अपने
  853. 43:36मन में हवा रहने दो। अपने जीवन में हवा
  854. 43:38रहने दो। तुम्हें हर चीज का मालिक बनने की
  855. 43:41जरूरत नहीं। तुम्हें केवल सहभागी बनना है।
  856. 43:44फिर जीवन में हल्कापन आएगा और हल्कापन
  857. 43:48बहुत आकर्षक है। तुम्हें गंभीर होकर महान
  858. 43:50बनने की जरूरत नहीं। तुम्हें जीवित होना
  859. 43:53है। कभी बच्चों के साथ बैठो। उनकी तरह
  860. 43:56हंसो। कभी पेड़ के नीचे चुप बैठो। कभी
  861. 44:00किसी अजनबी के लिए मन में शुभकामना करो।
  862. 44:03कभी बिना किसी उद्देश्य के आकाश को देखो।
  863. 44:06कभी अपने कमरे में अकेले मुस्कुराओ। कभी
  864. 44:09अपने ही पुराने दुख पर हंस दो। और कहना
  865. 44:13मैं कितना मूर्ख था जो इसे इतना बड़ा समझ
  866. 44:16बैठा था। जैसे ही तुम जीवन को बहुत
  867. 44:19गंभीरता से लेना छोड़ते हो। जीवन तुम्हें
  868. 44:21अपने रहस्य दिखाने लगता है। तुम्हें हर
  869. 44:24समय जीतना नहीं है। कभी हारो हार से सीखो।
  870. 44:28कभी असफल हो जाओ। असफलता से सीखो। कभी
  871. 44:32किसी का प्रेम ना मिले। उस कमी से अपने
  872. 44:35भीतर उतरना सीखो। कभी कोई तुम्हें छोड़
  873. 44:38दे। उस खाली जगह में स्वयं को खोजो
  874. 44:41क्योंकि जीवन तुम्हें बार-बार तुम्हारे
  875. 44:43पास वापस भेजता है। लेकिन तुम हर बार किसी
  876. 44:47और के दरवाजे पर चले जाते हो। अब लौट आओ
  877. 44:50अपने पास। तुम्हारे भीतर एक ऐसा कमरा है
  878. 44:53जहां कोई दूसरा तुम्हें छोड़कर नहीं जा
  879. 44:55सकता। वहां बैठो। वहां कुछ मत मांगो। वहां
  880. 44:59कुछ मत सिद्ध करो। बस बैठो। और देखो।
  881. 45:02तुम्हारे भीतर कितनी सुंदरता पहले से
  882. 45:04मौजूद है। तुम्हें बाहर से आकर्षण जोड़ना
  883. 45:08नहीं है। तुम्हें भीतर की धूल हटानी है।
  884. 45:11जैसे दर्पण पर धूल जम जाए तो चेहरा खराब
  885. 45:14नहीं हो जाता। दर्पण साफ करना होता है।
  886. 45:17तुम भी दर्पण हो। तुम्हारे ऊपर भय की धूल
  887. 45:20है। तुलना की धूल है। अतीत की धूल है।
  888. 45:24अपमान की धूल है। अस्वीकृति की धूल है।
  889. 45:28लालच की धूल है। और सबसे ज्यादा स्वीकृति
  890. 45:32पाने की धूल है। उसे धीरे-धीरे हटाओ। फिर
  891. 45:35एक दिन तुम्हें अपने भीतर वही चेहरा दिखाई
  892. 45:37देगा जिसे तुम संसार में खोजते रहे। और तब
  893. 45:41तुम समझोगे तुम्हें किसी के द्वारा सुंदर
  894. 45:44प्रमाणित होने की जरूरत नहीं थी। तुम्हें
  895. 45:47किसी के द्वारा चुने जाने की जरूरत नहीं
  896. 45:49थी। तुम्हें किसी के लौटने की प्रतीक्षा
  897. 45:51में अपने जीवन को रोकने की जरूरत नहीं थी।
  898. 45:54तुम्हारा जीवन स्वयं एक निमंत्रण था।
  899. 45:57तुम्हारा अस्तित्व स्वयं एक उत्सव था।
  900. 46:00तुम्हारी सांस स्वयं एक प्रार्थना थी।
  901. 46:03तुम्हारी हंसी स्वयं एक संगीत थी। बस तुम
  902. 46:07उसे किसी और की स्वीकृति में खोजते रहे।
  903. 46:10और जब यह भ्रम टूटता है तब प्रेम पहली बार
  904. 46:14सच में जन्म लेता है।
  905. 46:16अब तुम कहते हो मैं तुम्हें चाहता हूं
  906. 46:20लेकिन तुम्हें कैद नहीं करूंगा। मैं
  907. 46:22तुम्हें प्रेम करता हूं लेकिन तुम्हें
  908. 46:24अपना दास नहीं बनाऊंगा। मैं तुम्हें याद
  909. 46:27करूंगा लेकिन तुम्हारी स्वतंत्रता का
  910. 46:30सम्मान करूंगा। मैं तुम्हारे पास रहना
  911. 46:32चाहता हूं। लेकिन तुम्हारे बिना भी अपने
  912. 46:35भीतर जीवित रहूंगा। और तब प्रेम प्रार्थना
  913. 46:38बन जाता है। प्रार्थना मांगती नहीं।
  914. 46:41प्रार्थना आभार है। तुम किसी को देखकर यह
  915. 46:44नहीं कहते मुझे पूरा कर दो। तुम कहते हो
  916. 46:49तुम्हारे होने के लिए धन्यवाद। यहां से
  917. 46:51संबंध दिव्य हो जाता है। और जो संबंध
  918. 46:55तुम्हें अपने भीतर बड़ा करे वही संबंध
  919. 46:58रखने योग्य है। जिसके कारण तुम्हारी आंखों
  920. 47:01की रोशनी बुझने लगे उससे थोड़ी दूरी जरूरी
  921. 47:04है। जिसके कारण तुम लगातार स्वयं को छोटा
  922. 47:07समझने लगो वहां रुक कर सोचो। जिसके साथ
  923. 47:11रहकर तुम्हें हर समय डर लगे कि वह छोड़
  924. 47:13देगा वहां प्रेम से ज्यादा भय हो सकता है।
  925. 47:17और जहां भय प्रेम का रूप ले ले वहां
  926. 47:20आकर्षण भी धीरे-धीरे जहर बन जाता है।
  927. 47:23इसलिए अपनी आत्मा की रक्षा करना सीखो।
  928. 47:26अपने दिल को कठोर मत बनाओ। लेकिन अपने
  929. 47:29दरवाजे पर विवेक जरूर रखो। हर आने वाले को
  930. 47:33घर का मालिक मत बना दो। हर मुस्कुराने
  931. 47:36वाले को अपना मत समझो। हर मीठी बात को
  932. 47:39सत्य मत मानो। प्रेम करो लेकिन जागरूक
  933. 47:42होकर करुणा रखो लेकिन स्वयं के प्रति भी।
  934. 47:47तुम्हें स्वयं से प्रेम करने का अर्थ
  935. 47:50अहंकारी होना नहीं है। स्वयं से प्रेम
  936. 47:53करने का अर्थ है स्वयं के साथ हिंसा बंद
  937. 47:56करना। हर दिन अपने आप को दोष देना बंद
  938. 47:59करो। हर गलती को अपने चरित्र का प्रमाण मत
  939. 48:02बनाओ। गलती हुई है सुधारो। गिरे हो उठो
  940. 48:07टूटे हो स्वयं को समेटो। किसी ने तुम्हें
  941. 48:10छोड़ा है अपने जीवन को मत छोड़ो। किसी ने
  942. 48:13तुम्हें नकारा है स्वयं को मत नकारो। किसी
  943. 48:17ने तुम्हें कम समझा है स्वयं को कम मत
  944. 48:19समझो। क्योंकि सबसे खतरनाक क्षण वो नहीं
  945. 48:22होता जब कोई दूसरा तुम्हें छोड़ता है।
  946. 48:25सबसे खतरनाक क्षण वो होता है जब दूसरे के
  947. 48:27जाने के बाद तुम भी स्वयं को छोड़ देते
  948. 48:30हो। वो मत करना। कभी मत करना। तुम्हें
  949. 48:34वापस लौटना है अपने भीतर की उस आग के पास
  950. 48:38जो अब भी जल रही है। शायद राख बहुत है।
  951. 48:42शायद दर्द बहुत है। शायद आंसू बहुत हैं।
  952. 48:46लेकिन आग अभी भी है। उसे हवा दो। अपने
  953. 48:49जीवन को फिर से उठाओ। सुबह उठो और स्वयं
  954. 48:52से कहो। आज मैं किसी को प्रभावित करने
  955. 48:55नहीं निकलूूंगा। आज मैं जीने निकलूूंगा।
  956. 48:59आज मैं किसी को पाने नहीं निकलूूंगा। आज
  957. 49:02मैं स्वयं को खोने से बचाऊंगा। आज मैं
  958. 49:05किसी की स्वीकृति मांगने नहीं निकलूूंगा।
  959. 49:07आज मैं अपने सत्य के साथ चलूंगा। और जब
  960. 49:10तुम्हारे दिन ऐसे होने लगेंगे तब तुम्हारा
  961. 49:14चेहरा बदलने लगेगा। तुम्हें पता भी नहीं
  962. 49:16चलेगा। लोग कहेंगे तुम्हारे भीतर कुछ बदल
  963. 49:20गया है। तुम पहले जैसे नहीं रहे। तुम्हारी
  964. 49:23आंखों में कुछ अलग है। तुम्हारे बोलने में
  965. 49:26कुछ अलग है। तुम्हारी चुप्पी भी अब खाली
  966. 49:28नहीं लगती। वह भरी हुई लगती है। क्या भरा
  967. 49:32हुआ है? जीवन, स्वयं की संगति, अंदर का
  968. 49:36भरोसा। और यही भरोसा तुम्हें इतना आकर्षक
  969. 49:39बना देता है कि किसी दिन कोई तुम्हारे पास
  970. 49:41आने के लिए कारण नहीं खोजेगा। उसे बस
  971. 49:44तुम्हारी उपस्थिति की जरूरत महसूस होगी।
  972. 49:47और शायद तब बहुत देर के बाद कोई तुम्हारे
  973. 49:52बारे में सोचते हुए अपने भीतर एक
  974. 49:54प्रार्थना करेगा। तुमसे मिलने की,
  975. 49:56तुम्हारे पास बैठने की, तुम्हारी आंखों
  976. 49:59में फिर से वही शांति देखने की। लेकिन उस
  977. 50:02समय तक तुम्हें समझ आ चुका होगा कि असली
  978. 50:04जीत यह नहीं कि कोई तुम्हारे लिए दुआ करे।
  979. 50:07असली जीत यह है कि तुम स्वयं अपने जीवन के
  980. 50:10लिए दुआ बन जाओ। तुम अपने जीवन को ऐसा बना
  981. 50:13दो कि हर सुबह तुम्हें उठने का आनंद हो।
  982. 50:16हर सांस तुम्हें धन्यवाद लगे। हर कठिनाई
  983. 50:19तुम्हें मजबूत करे। हर विदाई तुम्हें भीतर
  984. 50:22ले जाए। हर मुलाकात तुम्हें कुछ सिखाए, हर
  985. 50:25प्रेम तुम्हें विस्तृत करे और हर अकेलापन
  986. 50:28तुम्हें स्वयं से मिला दे। तब तुम किसी के
  987. 50:31आने का इंतजार नहीं करोगे। तुम जीवन का
  988. 50:34इंतजार भी नहीं करोगे। तुम जीवन में उतर
  989. 50:37जाओगे। पूरे निर्भय, स्वतंत्र और प्रेम से
  990. 50:43भरे हुए। फिर शायद कोई आएगा। शायद नहीं भी
  991. 50:47आएगा। लेकिन अब यह प्रश्न तुम्हारे लिए
  992. 50:50इतना बड़ा नहीं रहेगा क्योंकि तुम्हें मिल
  993. 50:53गया होगा वह जिसे पाने के लिए तुमने पूरी
  994. 50:55दुनिया में भटकना शुरू किया था। तुम्हें
  995. 50:58तुम मिल गए हो और जिस मनुष्य को स्वयं मिल
  996. 51:01गया उसे संसार से बहुत कुछ मिलता है।
  997. 51:05लेकिन उसकी प्रसन्नता किसी चीज पर निर्भर
  998. 51:07नहीं रहती। अब वो प्रेम करता है मगर
  999. 51:11मांगता नहीं। वो देता है मगर हिसाब नहीं
  1000. 51:15रखता। वह मिलता है मगर चिपकता नहीं। वह
  1001. 51:19विदा करता है मगर श्राप नहीं देता। वह याद
  1002. 51:23करता है मगर अपने वर्तमान को नहीं जलाता।
  1003. 51:26और यही मनुष्य सबसे सुंदर है क्योंकि उसके
  1004. 51:30पास केवल चेहरा नहीं एक चेतना है। उसके
  1005. 51:33पास केवल शब्द नहीं एक मौन है। उसके पास
  1006. 51:37केवल प्रेम नहीं एक स्वतंत्रता है। और
  1007. 51:40जहां प्रेम और स्वतंत्रता मिलते हैं, वहां
  1008. 51:43एक ऐसी सुगंध पैदा होती है जिसे दूर से भी
  1009. 51:46महसूस किया जा सकता है। फिर तुम्हें किसी
  1010. 51:49को आकर्षित करने की जरूरत नहीं। तुम स्वयं
  1011. 51:52आकर्षण बन जाते हो। और शायद यही वह अवस्था
  1012. 51:55है जहां तुम्हारे जीवन की सबसे सुंदर
  1013. 51:57कहानी शुरू होती है। क्योंकि अब कोई
  1014. 51:59तुम्हें खोजे या ना खोजे। तुम स्वयं को
  1015. 52:02खोगे नहीं। कोई तुम्हारे लिए रोए या ना
  1016. 52:05रोए। तुम्हारी आंखों में जीवन का जल
  1017. 52:08सूखेगा नहीं। कोई तुम्हारे पास लौटे या ना
  1018. 52:11लौटे। तुम्हारे भीतर प्रेम का द्वार बंद
  1019. 52:14नहीं होगा। और तब तुम पहली बार समझोगे कि
  1020. 52:17प्रेम किसी व्यक्ति का नाम नहीं है। प्रेम
  1021. 52:20तुम्हारी अवस्था है। आकर्षण किसी चेहरे की
  1022. 52:23ताकत नहीं है। आकर्षण तुम्हारे अस्तित्व
  1023. 52:25की सुगंध है। और प्रार्थना यह नहीं कि कोई
  1024. 52:28तुम्हें चाहे। प्रार्थना यह है कि तुम
  1025. 52:30इतने सच हो जाओ कि जहां भी जाओ वहां जीवन
  1026. 52:34थोड़ा और सुंदर हो जाए। फिर जो तुम्हारे
  1027. 52:37जीवन में आएगा वो केवल तुम्हें पाने नहीं
  1028. 52:41आएगा। वह तुम्हारे साथ जीवन को महसूस करने
  1029. 52:44आएगा और जो नहीं आएगा उसके लिए भी
  1030. 52:48तुम्हारे भीतर शुभकामना रहेगी क्योंकि अब
  1031. 52:51तुम्हारा हृदय छोटा नहीं रहा। अब तुम्हें
  1032. 52:54केवल एक व्यक्ति नहीं चाहिए। तुम्हारे
  1033. 52:56भीतर पूरा आकाश है। और आकाश किसी एक पक्षी
  1034. 53:00को पकड़ कर नहीं रखता। वह सबको उड़ने देता
  1035. 53:03है। फिर भी सब उसी की ओर देखते हैं। इसी
  1036. 53:07तरह तुम भी अपने भीतर आकाश पैदा करो। इतने
  1037. 53:10खुले हो जाओ कि कोई तुम्हारे पास आए तो
  1038. 53:12उसे स्वतंत्रता मिले। इतने गहरे हो जाओ कि
  1039. 53:16वह तुम्हारे पास बैठकर स्वयं को सुन सके।
  1040. 53:18इतने शांत हो जाओ कि तुम्हारे मौन में
  1041. 53:21किसी की बेचैनी पिघल जाए। इतने आनंदित हो
  1042. 53:24जाओ कि तुम्हारी हंसी किसी की सुबह बन
  1043. 53:26जाए। इतने सच्चे हो जाओ कि तुम्हारे जाने
  1044. 53:30के बाद तुम्हारी याद किसी के भीतर कोई
  1045. 53:32सुंदर दीप जला दे। और तब बहुत संभव है
  1046. 53:37किसी दिन कहीं कोई मनुष्य अपने दोनों हाथ
  1047. 53:41जोड़कर बिना किसी दिखावे के तुम्हारे
  1048. 53:45मिलने की दुआ करे लेकिन उस समय तुम
  1049. 53:48मुस्कुराना क्योंकि तुम्हें पता होगा
  1050. 53:51तुम्हें किसी की दुआ ने आकर्षक नहीं
  1051. 53:53बनाया। तुम्हारे भीतर जगा हुआ प्रेम
  1052. 53:57तुम्हें आकर्षक बना गया और यही जीवन की
  1053. 54:01सबसे बड़ी सुंदरता है। तुम्हें किसी का
  1054. 54:03पीछा नहीं करना। तुम्हें किसी को मजबूर
  1055. 54:06नहीं करना। तुम्हें किसी को पछताना नहीं
  1056. 54:09सिखाना। तुम्हें केवल इतना करना है कि तुम
  1057. 54:11अपने भीतर इतने जीवित हो जाओ कि तुम्हारे
  1058. 54:14पास से गुजरने वाला मनुष्य थोड़ी देर के
  1059. 54:16लिए अपने जीवन की धूल भूल जाए। और अगर वह
  1060. 54:19लौटना चाहे लौट आए। अगर मिलना चाहे मिल ले
  1061. 54:25अगर तुम्हारे लिए दुआ करना चाहे करने दो
  1062. 54:29लेकिन तुम तुम अपने रास्ते पर चलते रहो
  1063. 54:33प्रेम के साथ मौन के साथ स्वतंत्रता के
  1064. 54:37साथ और उस गहरी समझ के साथ कि जीवन में
  1065. 54:41पाने लायक सबसे बड़ी चीज कोई दूसरा मनुष्य
  1066. 54:44नहीं सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि तुम्हारे
  1067. 54:47भीतर ऐसा हृदय जन्म ले जो किसी के आने से
  1068. 54:51खिलता हो लेकिन किसी के जाने से मरता ना
  1069. 54:54हो। ऐसी आंखें जन्म ले जो प्रेम से भरी हो
  1070. 54:59लेकिन भीख ना मांगती हो। ऐसी आत्मा जन्म
  1071. 55:03ले जो जुड़ती हो लेकिन बंधती ना हो। और
  1072. 55:08ऐसा जीवन जन्म ले जिसे देखकर तुम स्वयं कह
  1073. 55:12सको। अब मैं किसी के मिलने की प्रतीक्षा
  1074. 55:14में नहीं हूं। अब मैं स्वयं एक मिलन बन
  1075. 55:17चुका हूं। अब मैं किसी की दुआ का इंतजार
  1076. 55:20नहीं करता। अब मेरा पूरा अस्तित्व ही एक
  1077. 55:23दुआ है। और जब तुम उस जगह पहुंचते हो तब
  1078. 55:27संसार तुम्हारे पीछे नहीं भागता। संसार बस
  1079. 55:31तुम्हारी ओर देखता है और तुम्हें देखकर
  1080. 55:33उसके भीतर एक सवाल उठता है। आखिर इसके
  1081. 55:36भीतर ऐसा क्या है? और उस प्रश्न का उत्तर
  1082. 55:40किसी शब्द में नहीं होता। उत्तर होता है
  1083. 55:43तुम्हारी उपस्थिति तुम्हारा मौन तुम्हारी
  1084. 55:47स्वतंत्रता
  1085. 55:49तुम्हारा प्रेम तुम्हारी हंसी तुम्हारी
  1086. 55:52आंखों की गहराई और वह जीवन जो किसी को
  1087. 55:57पाने के लिए नहीं स्वयं में पूर्ण होकर बह
  1088. 56:01रहा है। यही आकर्षण है। यही सुंदरता है।
  1089. 56:05यही प्रेम है। और शायद यही वह अवस्था है
  1090. 56:11जहां किसी को तुम्हें देखने के लिए बुलाना
  1091. 56:13नहीं पड़ता। वह स्वयं चला आता है तुम्हारे
  1092. 56:17पास तुम्हारी ओर तुमसे मिलने और शायद भीतर
  1093. 56:23ही भीतर तुम्हारे लिए दुआ करते

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This page contains the full transcript of इतने आकर्षित बनो, कि वो तुमसे मिलने की दुआ करे! || OSHO HINDI SPEECH || #OSHO by DHYAN SAGAR, generated from the public captions YouTube serves with the video. The transcript has 8,584 words across 1,093 segments, with the original timestamps preserved so you can click any line to jump to that moment in the embedded player.

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