NCERT Class 12 History Full Book One Shot |Complete Revision (All 15 Chapters)All Competitive Exams — Transcript
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- 0:00आप सभी का स्वागत है एआई एजुकेशन बोट चैनल
- 0:03पर। आज हम क्लास 12th एनसीईआरटी हिस्ट्री
- 0:06को पूरी तरह से एक ही वीडियो में कवर करने
- 0:08वाले हैं।
- 0:09यानी एक वीडियो और पूरा इतिहास साफ।
- 0:12हां बिलकुल। चलिए क्लास स्टार्ट करते हैं।
- 0:15लेकिन क्लास शुरू करने से पहले एक बात
- 0:18समझना बहुत जरूरी है। 12वीं की जो
- 0:21हिस्ट्री है वो एक किताब में नहीं है।
- 0:24सही कहा। उसे तीन अलग-अलग किताबों मतलब
- 0:27पार्ट्स में बांटा गया है और यह तीनों भाग
- 0:30भारत के तीन अलग-अलग कालखंडों या इरास को
- 0:33दिखाते हैं।
- 0:34पहला है भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग वन
- 0:37जो एंशिएंट इंडिया पर है। इसमें हम
- 0:39हड़प्पा सभ्यता, मौर्य काल और सांची स्तूप
- 0:42जैसे शुरुआती विकास के बारे में पढ़ते
- 0:44हैं।
- 0:45हम भारत की नीव।
- 0:47फिर आता है भाग टू मीडिएबल इंडिया। इसमें
- 0:50हम यात्रियों के नजरिए, भक्ति, सूफी
- 0:52परंपराएं, विजयनगर साम्राज्य और मुगल काल
- 0:55को देखते हैं।
- 0:56हां, यह वो दौर है जब भारत में बहुत सारे
- 0:59सांस्कृतिक बदलाव हो रहे थे।
- 1:00और आखिर में है भाग तीन मॉडर्न इंडिया।
- 1:04इसका पूरा फोकस उपनिवेशवाद, 1857 का
- 1:08विद्रोह, महात्मा गांधी और हमारे संविधान
- 1:11के निर्माण पर है।
- 1:13तो ये एक पूरा सफर है प्राचीन से आधुनिक
- 1:16भारत तक का।
- 1:17बिल्कुल। तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू
- 1:19करते हैं यह शानदार सफर।
- 1:21आज हम एक ऐसी दुनिया में गोता लगाने वाले
- 1:23हैं जो आज से मतलब लगभग 4000 साल पहले
- 1:28मौजूद थी।
- 1:28हम
- 1:29एक ऐसी सभ्यता जिसके शहर मतलब पूरी तरह से
- 1:32प्लान किए हुए थे।
- 1:34बिल्कुल।
- 1:34जिनका व्यापार हजारों किलोमीटर दूर
- 1:37मेसोपोटामिया तक फैला था। लेकिन हम उनकी
- 1:40भाषा का एक शब्द भी नहीं पढ़ सकते। और यही
- 1:43यही तो सबसे बड़ा रहस्य है। हमारे पास
- 1:45उनकी कलाकृतियां हैं, उनके शहर हैं, लेकिन
- 1:47उनकी आवाज नहीं है।
- 1:48हां, आज हम एनसीआरटी की किताब और दूसरे
- 1:51स्रोतों के आधार पर हड़प्पा सभ्यता के
- 1:54इन्हीं रहस्यों की तह तक जाएंगे और समझने
- 1:57की कोशिश करेंगे कि यह लोग कौन थे? कैसे
- 2:01रहते थे? और वो सबसे बड़ा सवाल।
- 2:03कि आखिर वो गए कहां?
- 2:05आखिर वो गए कहां?
- 2:06चलिए तो शुरू करते हैं उन सुरागों से जो
- 2:09हमें सबसे पहले मिले। जब पुरातत्वविदों ने
- 2:12खुदाई शुरू की तो उन्हें सबसे अनोखी चीज
- 2:14मिली हड़प्पाई मोहर यानी उनकी स्टैंप
- 2:17सील्स।
- 2:18बिल्कुल ये मोहरे सेलखड़ी नाम के एक बहुत
- 2:21ही मुलायम पत्थर से बनी थी। मतलब इतना
- 2:23मुलायम कि उस पर आसानी से नक्काशी की जा
- 2:26सकती थी।
- 2:26अच्छा। हां
- 2:27और इन पर जानवरों के बहुत शानदार चित्र
- 2:29बने हैं। जैसे एक सींग वाला जानवर है, बैल
- 2:32है, हाथी है। लेकिन चित्रों के ऊपर कुछ
- 2:35चिन्ह भी हैं। यह उनकी लिपि है, उनकी
- 2:37लिखावट।
- 2:38और यही वो पहेली है जो आज तक कोई सुलझा
- 2:41नहीं पाया।
- 2:42क्यों?
- 2:42इसे पढ़ना इतना मुश्किल क्यों है?
- 2:44इसकी दो बड़ी वजह हैं। पहली तो यह कि हमें
- 2:46कोई भी लंबा लेख नहीं मिला है। ज्यादातर
- 2:49लिखावटें इन्हीं मोहरों पर हैं जिनमें
- 2:51मुश्किल से मतलब चार या पांच चिन्ह होते
- 2:53हैं।
- 2:53बस।
- 2:54हां, बस। और दूसरी वजह हमें कोई रोजेटा
- 2:57स्टोन जैसी चीज नहीं मिली है। यानी कोई
- 2:59ऐसा पत्थर जिस पर एक ही बात
- 3:01अच्छा मतलब एक बाइलिंगुअल टेक्स्ट जैसा
- 3:03कुछ नहीं मिला।
- 3:04हां बिल्कुल जिस पर एक ही बात हड़प्पाई
- 3:07लिपि और किसी जानी पहचानी भाषा दोनों में
- 3:10लिखी हो
- 3:10और बिना उसके इन चुनों का मतलब निकालना
- 3:13लगभग नामुमकिन है।
- 3:14तो ये मोहरे सिर्फ एक अनसुलझी पहेली ही
- 3:16नहीं है बल्कि ये इस बात का भी सबूत है कि
- 3:19यह एक बहुत ही संगठित समाज था। शायद इन
- 3:21मोहरों का इस्तेमाल व्यापार में होता था।
- 3:24सामान की पहचान के लिए।
- 3:26सही कहा। बिल्कुल। कल्पना कीजिए कि सामान
- 3:28से भरे एक थैले को रस्सी से बांधकर उस पर
- 3:31गीली मिट्टी लगाई जाती थी और फिर उस पर यह
- 3:34मोहर दबा दी जाती थी।
- 3:35हम्म।
- 3:36अगर सामान अपने ठिकाने पर मोहर के साथ सही
- 3:38सलामत पहुंचता, तो इसका मतलब था कि उसके
- 3:41साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है।
- 3:43तो यह एक तरह की टेंपर प्रूफ सीलिंग थी उस
- 3:46जमाने की।
- 3:46एक तरह से हां। यह तो सिर्फ एक छोटी सी
- 3:49मोहर की कहानी है। लेकिन जब पुरातत्वविदों
- 3:52ने और खुदाई की तो जमीन के नीचे से पूरे
- 3:55के पूरे शहर निकलने लगे और इनमें सबसे
- 3:58हैरान करने वाला था मोहनजोदाड़ो।
- 4:01मोहनजोदाड़ो सिर्फ एक शहर नहीं था। वो उस
- 4:04जमाने का एक महानगर था और उसकी प्लानिंग
- 4:07मतलब आज भी बड़े-बड़े अर्बन प्लानर्स को
- 4:09हैरान कर देती है।
- 4:10हम
- 4:11पूरा शहर दो हिस्सों में बंटा था। एक छोटा
- 4:14ऊंचा हिस्सा जिसे दुर्ग या सिटिडल कहते
- 4:17हैं और एक बड़ा निचला हिस्सा जिसे निचला
- 4:19शहर कहा जाता है।
- 4:20और कमाल की बात यह है कि ऐसा लगता है जैसे
- 4:23शहर को बसाने से पहले उसका पूरा नक्शा
- 4:26बनाया गया था। सड़कें और गलियां एक दूसरे
- 4:29को बिल्कुल सीधी काटती थी।
- 4:31हां, एक ग्रिड पैटर्न में।
- 4:33जैसे शतरंज के बिसात पर खाने बने होते
- 4:35हैं।
- 4:35बिल्कुल। और इससे भी ज्यादा एडवांस्ड बात
- 4:39यह है कि ऐसा लगता है कि उन्होंने पहले
- 4:41सड़कें और नालियां बनाई और फिर उनके
- 4:43किनारे घर बनाए।
- 4:44अच्छा।
- 4:45जरा सोचिए आज भी हमारे कई शहरों में पहले
- 4:48घर बन जाते हैं और सड़कें और नालियां बाद
- 4:50में बनती रहती हैं। वो लोग हमसे 4500 साल
- 4:54पहले ही योजना के महत्व को समझ चुके थे।
- 4:56और उनकी ईंट मुझे लगता है वो तो सबसे
- 4:58अविश्वसनीय चीजों में से एक है।
- 5:00हां वो भी।
- 5:01हर ईंट का आकार एक तय अनुपात में था।
- 5:04लंबाई ऊंचाई से चार गुना और चौड़ाई ऊंचाई
- 5:08से दो गुनी और यह अनुपात हड़प्पा से लेकर
- 5:11मोहनजोदड़ो तक मतलब सैकड़ों किलोमीटर दूर
- 5:13बसे शहरों में भी एक जैसा था।
- 5:15यह कोई छोटी बात नहीं है। यह इस ओर इशारा
- 5:18करता है कि या तो कोई एक मजबूत केंद्रीय
- 5:20सत्ता थी जो यह नियम लागू करवाती थी या
- 5:23फिर यह उनके समाज का एक साझा मानक था जिसे
- 5:26सब मानते थे। hm
- 5:28दोनों ही सूरतों में यह एक बेहद विकसित और
- 5:31संगठित समाज की निशानी है।
- 5:32चलिए अब इन प्लांट की हुई गलियों से
- 5:34गुजरते हुए उनके घरों के अंदर झांकते हैं।
- 5:37उनके घर कैसे होते थे?
- 5:39हड़प्पा के लोगों के लिए एकांतता मतलब
- 5:41प्राइवेसी बहुत जरूरी लगती है। ज्यादातर
- 5:44घरों के बीच में एक आंगन होता था और उसके
- 5:46चारों ओर कमरे बने होते थे।
- 5:48अच्छा।
- 5:48और जो ग्राउंड फ्लोर की दीवारें थी, उनमें
- 5:51कोई खिड़कियां नहीं होती थी। यहां तक कि
- 5:53मुख्य दरवाजे से आंगन भी सीधा नहीं दिखता
- 5:55था। यह तो बिल्कुल आज के घरों जैसा ही
- 5:57डिजाइन है।
- 5:58और मैंने पढ़ा है कि हर घर में अपना एक
- 6:00स्नानागार यानी बाथरूम होता था।
- 6:02हां। और वो भी ईंटों के फर्श वाला। उन
- 6:05स्नानागारों की नालियां घर की दीवार के
- 6:08जरिए बाहर सड़क की मुख्य नाली से जुड़ी
- 6:11होती थी।
- 6:11कमाल है। मोहनजोदाड़ों की जल निकास
- 6:14प्रणाली तो मतलब बेजोड़ थी। हर घर एक ढकी
- 6:18हुई नाली से जुड़ा था, जो सड़कों के नीचे
- 6:20बनी बड़ी नालियों में मिलती थी। और यह
- 6:22नालियां सफाई के लिए मैनहोल से भी ढकी
- 6:25होती थी।
- 6:25सोच कर यह अजीब लगता है कि जब दुनिया के
- 6:28कई हिस्सों में लोग ठीक से घर बनाना भी
- 6:30नहीं सीखे थे। यहां हमारे पूर्वज सीवर
- 6:33सिस्टम प्लान कर रहे थे। अच्छा अब उस ऊंचे
- 6:36टीले यानी दुर्ग की बात करते हैं। वहां
- 6:39क्या खास था?
- 6:40दुर्ग पर बनी इमारतें शायद सार्वजनिक
- 6:42इस्तेमाल के लिए थी। वहां एक विशाल गोदाम
- 6:44जैसी संरचना मिली है और सबसे प्रसिद्ध है
- 6:47विशाल स्नानागार। द ग्रेट बाथ।
- 6:49हम द ग्रेट बाथ। यह एक बड़ा आयताकार जलाशय
- 6:53है जिसके दोनों तरफ सीढ़ियां बनी थी और
- 6:55इसे वाटरप्रूफ बनाने के लिए जिप्सम के
- 6:57गारे का इस्तेमाल किया गया था।
- 6:58तो क्या यह एक तरह का स्विमिंग पूल था?
- 7:00शायद उससे कहीं ज्यादा ज्यादातर विद्वानों
- 7:04का मानना है कि इसका इस्तेमाल किसी खास
- 7:06धार्मिक अनुष्ठान के लिए होता था।
- 7:07अच्छा कोई रस्म वगैरह के लिए।
- 7:10हां, पानी और शुद्धिकरण का महत्व बाद के
- 7:13भारतीय धर्मों में भी बहुत ज्यादा रहा है।
- 7:15तो हो सकता है इसकी जड़े हमें हड़प्पा में
- 7:17ही मिल जाए। तो शहर इतने व्यवस्थित थे,
- 7:19लेकिन क्या समाज में भी सब बराबर थे? या
- 7:22वहां भी अमीर और गरीब का फर्क था?
- 7:25पुरातत्व वेद इसका पता कैसे लगाते हैं?
- 7:27इसके दो मुख्य तरीके हैं। पहला तो है
- 7:30कब्रों का अध्ययन।
- 7:31हम्म।
- 7:31हड़प्पा में ज्यादातर कब्रें साधारण
- 7:33गड्ढों में मिली है। कुछ में मिट्टी के
- 7:35बर्तन या छोटे-मोटे गहने मिले हैं। लेकिन
- 7:37मिस्र के पिरामिडों की तरह यहां कब्रों
- 7:39में बेशकीमती खजाना नहीं दफनाया जाता था।
- 7:42अच्छा।
- 7:42इससे लगता है कि वे लोग मरने के बाद की
- 7:44दुनिया के लिए कीमती चीजें देने में
- 7:46ज्यादा विश्वास नहीं करते और दूसरा तरीका
- 7:48क्या है?
- 7:48दूसरा तरीका है विलासिता की चीजों को
- 7:50खोजना। यानी ऐसी चीजें जो दुर्लभ हो,
- 7:53महंगी हो या जिन्हें बनाने में कोई खास
- 7:56तकनीक लगती हो।
- 7:56जैसे
- 7:57इसका एक बेहतरीन उदाहरण है फयांस। यह रेत,
- 8:00रंग और एक चिपचिपे पदार्थ को पका कर बनाया
- 8:02गया एक चमकीला पदार्थ था।
- 8:04फयांस?
- 8:05हां। जिससे छोटे बड़े बर्तन बनते थे।
- 8:07इन्हें बनाना बहुत मुश्किल था इसलिए ये
- 8:09कीमती माने जाते थे।
- 8:10और ये कीमती चीजें मिलती कहां थी?
- 8:12छोटी बस्तियों में ये ना के बराबर है।
- 8:14अच्छा। तो इससे साफ पता चलता है कि समाज
- 8:17में आर्थिक भिन्नताएं थी।
- 8:19बिल्कुल।
- 8:19इन चीजों को बनाने के लिए कच्चा माल तो
- 8:21चाहिए होता होगा। यह सब कहां से आता था?
- 8:24हड़प्पा एक अकेली बस्ती नहीं थी बल्कि एक
- 8:27विशाल नेटवर्क का केंद्र थी। तांबा आता था
- 8:30राजस्थान के खेत्रीय इलाके से तो सोना
- 8:33शायद दक्षिण भारत से।
- 8:34हम
- 8:35गुजरात के लोथल से सुंदर लाल रंग का
- 8:37कार्निलियन पत्थर आता था। जिससे बेहद
- 8:40खूबसूरत मनके या बीड्स बनाए जाते थे।
- 8:42चनहूदड़ो जैसी बस्तियां तो एक तरह की
- 8:45इंडस्ट्रियल टाउन थी जहां सिर्फ यही
- 8:47क्राफ्ट का काम होता था।
- 8:49और यह नेटवर्क सिर्फ भारत तक ही सीमित
- 8:51नहीं था। है ना?
- 8:52बिल्कुल नहीं। उनका व्यापार बहुत दूर तक
- 8:54फैला था। हमें पुरातात्विक सबूत मिले हैं
- 8:57कि वे ओमान से तांबा लाते थे।
- 8:59ओमान से।
- 9:00हां। ओमानी तांबे और हड़प्पाई कलाकृतियों
- 9:03दोनों में निकल धातु के अंश मिले हैं। जो
- 9:06किसी एक साझा स्रोत की ओर इशारा करते हैं।
- 9:08और मेसोपोटेमिया यानी आज के इराक से भी
- 9:11उनके संबंध थे। हां, मेसोपोटामिया के
- 9:13लेखों में मिलुआ नाम की जगह का जिक्र है।
- 9:16जहां से वे सोना, तांबा और कार्निलियन
- 9:18जैसे कीमती सामान मंगाते थे।
- 9:20[नाक से की जाने वाली आवाज़] ज्यादातर
- 9:21इतिहासकारों का मानना है कि मिलवा हड़प्पा
- 9:24क्षेत्र का ही प्राचीन नाम था।
- 9:25अच्छा। यहां तक कि मेसोपोटामिया में
- 9:27हड़प्पा की मोहरे भी मिली हैं। जिन पर
- 9:29जहाजों और नाव के चित्र बने हैं। यह उनके
- 9:32समुद्री व्यापार का पक्का सबूत है।
- 9:34तो हमारे पास एक उन्नत शहर नियोजन है। एक
- 9:37विशाल व्यापार नेटवर्क है। एक जटिल समाज
- 9:40है। लेकिन ये सब कुछ चला कौन रहा था? क्या
- 9:43वहां कोई राजा था?
- 9:44यह हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा सवाल है।
- 9:46हमें मिस्र या मेसोपोटामिया की तरह कोई
- 9:49भव्य महल या राजाओं की कब्रें नहीं मिली
- 9:51हैं।
- 9:51हम्म। इस पर पुरातत्व विधों में मतलब
- 9:53अलग-अलग राय है। कुछ मानते हैं कि यहां
- 9:56कोई शासक नहीं था और सब मिलकर फैसले लेते
- 9:58थे।
- 9:59लेकिन बिना किसी शासक के ईंटों का एक ही
- 10:02आकार, शहरों का एक जैसा नक्शा यह सब कैसे
- 10:05संभव है?
- 10:05यही दूसरा पक्ष कहता है। कुछ विद्वान
- 10:07मानते हैं कि यहां एक नहीं बल्कि कई शासक
- 10:10थे। हर बड़े शहर का अपना ही राजा होता था।
- 10:13अच्छा।
- 10:13और तीसरा मत यह है कि ये एक ही राज्य था
- 10:16जिसकी एक ही सत्ता थी जो शायद मोहनजोदड़ो
- 10:19से सब कुछ नियंत्रित करती थी। हम
- 10:21मोहनजोदड़ो से मिली एक पत्थर की मूर्ति को
- 10:23पुरोहित राजा यानी प्रीस्ट किंग कहा जाता
- 10:26है। लेकिन यह भी सिर्फ एक अंदाजा है। सच
- 10:29तो यह है कि हमें निश्चित रूप से कुछ नहीं
- 10:31पता।
- 10:32और फिर हम उस सबसे बड़े रहस्य पर आते हैं
- 10:34जिसके साथ हमने शुरुआत की थी। इस महान
- 10:37सभ्यता का अंत कैसे हुआ? यह लोग कहां चले
- 10:40गए?
- 10:41लगभग 1800 ईसा पूर्व के आसपास कुछ बड़ा
- 10:43बदलाव हुआ। मोहनजोदड़ो जैसे बड़े शहर
- 10:46वीरान होने लगे। लोगों ने गुजरात, हरियाणा
- 10:49और उत्तर प्रदेश के इलाकों में नई और छोटी
- 10:51बस्तियां बसानी शुरू कर दी।
- 10:52अच्छा।
- 10:53वो एकीकरण वाली चीजें जैसे मोहरे,
- 10:55मानकीकृत बाढ़ और वो खास लिपि सब
- 10:58धीरे-धीरे गायब हो गई।
- 11:00लेकिन हुआ क्या? क्या कोई बाढ़ आई थी या
- 11:02कोई हमला हुआ था?
- 11:04इसके पीछे कोई एक कारण नहीं है बल्कि कई
- 11:07सिद्धांत हैं। कुछ कहते हैं कि जलवायु
- 11:09परिवर्तन हुआ, मौसम सूखा हो गया और
- 11:11सरस्वती जैसी नदियां सूख गई। कुछ वनों की
- 11:14कटाई या भीषण बाढ़ को जिम्मेदार मानते
- 11:17हैं।
- 11:17हम कुछ विद्वान बाहरी आक्रमण की भी बात
- 11:20करते हैं। ज्यादातर संभावना यही है कि इन
- 11:22सभी कारणों ने मिलकर इस सभ्यता को पतन की
- 11:25ओर धकेल दिया।
- 11:26यह सोचना ही कितना अजीब है कि एक पूरी की
- 11:29पूरी शहरी सभ्यता वापस ग्रामीण जीवन की ओर
- 11:32लौट गई और फिर सदियों तक हम उन्हें भूल ही
- 11:34गए।
- 11:35हां, सदियों तक उनकी कहानी जमीन के नीचे
- 11:38दबी रही। जब अंग्रेज भारत में रेलवे लाइन
- 11:40बिछा रहे थे तो उन्हें हड़प्पा में पकी
- 11:42हुई ईंटों का खजाना मिला।
- 11:44अच्छा।
- 11:44और उन्होंने उसे रेलवे ट्रक के नीचे
- 11:47बिछाने के लिए इस्तेमाल कर लिया। बिना यह
- 11:49जाने कि वो क्या नष्ट कर रहे हैं।
- 11:51और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले
- 11:53डायरेक्टर जनरल एलेक्जेंडर कनिंघम
- 11:55हम
- 11:55वो भी हड़प्पा के महत्व को समझ नहीं पाए
- 11:58थे।
- 11:58वो इसे गंगा घाटी के प्राचीन शहरों से
- 12:01जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं। असली खोज
- 12:03तो 1920 के दशक में हुई जब दयाराम साहनी
- 12:08और राखालदास बनर्जी जैसे भारतीय
- 12:10पुरातत्वविदों ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो
- 12:13में एक जैसी मोहरे खोजी।
- 12:15हम
- 12:15और फिर 1924 में तत्कालीन डायरेक्टर जनरल
- 12:18जॉन मार्शल ने पूरी दुनिया के सामने सिंधु
- 12:22घाटी में एक नई प्राचीन सभ्यता की खोज का
- 12:25ऐलान किया। इसने भारत के इतिहास को हजारों
- 12:28साल और पीछे धकेल दिया। तो हड़प्पा की
- 12:30कहानी हमें एक जरूरी बात सिखाती है। एक
- 12:34महान सभ्यता सिर्फ ईंटों और मोहरों का ढेर
- 12:38नहीं होती बल्कि वो उन सवालों का संग्रह
- 12:40भी है जो वो अपने पीछे छोड़ जाती है।
- 12:43बिल्कुल और शायद हमें इस पर भी सोचना
- 12:45चाहिए कि जो शहर इतने योजनाबद्ध तरीके से
- 12:48बनाए गए वो आखिर वीरान क्यों हो गए? क्या
- 12:51इसके पीछे पर्यावरण का असंतुलन था? क्या
- 12:54उनके संसाधन खत्म हो गए थे? हम्म।
- 12:56यह कुछ ऐसे सवाल हैं जो आज के दौर में जब
- 12:59हम अपने शहरों को और बड़ा और जटिल बना रहे
- 13:02हैं। हमारे लिए भी बहुत मायने रखते हैं।
- 13:04आज हम भारत के इतिहास के एक ऐसे दौर में
- 13:07उतर रहे हैं जो लगभग 1200 साल लंबा है।
- 13:11हम
- 13:12सोचिए 600 ईसा पूर्व से लेकर 600 ईसवी तक
- 13:15का समय।
- 13:16जी।
- 13:16यह वो दौर था जब छोटे-छोटे कबीले और
- 13:19बस्तियां वो मिलकर बड़े-बड़े राज्यों में
- 13:22बदल रही थी और फिर एक विशाल साम्राज्य
- 13:24में। बिल्कुल।
- 13:26तो आज की हमारी पड़ताल का विषय है राजा,
- 13:29किसान और नगर।
- 13:30नमस्ते। यह वाकई एक जबरदस्त बदलाव का दौर
- 13:33था। हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद एक लंबा
- 13:37अरसा गुजरा।
- 13:38हां।
- 13:38और फिर अचानक छठी शताब्दी ईसा पूर्व के
- 13:41आसपास इतिहास ने जैसे रफ्तार पकड़ ली।
- 13:43अच्छा।
- 13:44लोहे का इस्तेमाल बढ़ रहा था। सिक्के चलन
- 13:46में आ रहे थे। नए शहर बस रहे थे। और बौद्ध
- 13:49और जैन धर्म जैसे नए विचार समाज को एक नई
- 13:52दिशा दे रहे थे। तो हमारा मिशन है इन 1200
- 13:54सालों की कहानी को समझना। हम एनसीईआरटी की
- 13:57किताब को अपना आधार बना रहे हैं। लेकिन
- 13:59हमारा मकसद सिर्फ तथ्यों को दोहराना नहीं
- 14:01है। बल्कि यह जानना है कि इन बदलावों का
- 14:04मतलब क्या था?
- 14:05सही बात है।
- 14:05तो सवाल यह है कि इतने पुराने दौर के
- 14:08इतिहास के दरवाजे को इतिहासकारों ने खोला
- 14:11कैसे? इसकी चाबी कहां से मिली?
- 14:14इसकी चाबी मिली 1830 के दशक में और कहानी
- 14:18बड़ी दिलचस्प है।
- 14:19अच्छा। ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी
- 14:21थे जेम्स प्रिंसेप। उन्होंने दो बहुत
- 14:24पुरानी लिपियों ब्राह्मी और खरोष्ठी को
- 14:27पढ़ने में कामयाबी हासिल की।
- 14:29अरे वाह!
- 14:30यह एक बहुत बड़ी सफलता थी क्योंकि यह वो
- 14:33भाषाएं थी जो ये सदियों से कोई पढ़ नहीं
- 14:35पाया था।
- 14:35तो मतलब 2000 साल से भी ज्यादा पुरानी
- 14:39लिपियों को समझना यह तो किसी जासूसी कहानी
- 14:42जैसा लगता है।
- 14:43हां, एक तरह से वैसा ही था। तो आखिरकार
- 14:45प्रिंसेसप को उन खुदे हुए पत्थरों और
- 14:48सिक्कों पर मिला क्या?
- 14:49उन्हें ज्यादातर अभिलेखों पर एक ही उपाधि
- 14:51मिली पिया दस्सी।
- 14:53पिया दस्सी।
- 14:54इसका क्या मतलब हुआ?
- 14:55इसका मतलब होता है मनोहर मुखाकृति वाला या
- 14:58देखने में सुंदर।
- 15:00हम
- 15:00कुछ अभिलेखों पर राजा का नाम अशोक भी लिखा
- 15:03था और बौद्ध ग्रंथों से पता चला कि अशोक
- 15:06एक बहुत प्रसिद्ध मौर्य शासक थे।
- 15:09तो मतलब यह कड़ी जुड़ गई। जैसे ही यह कड़ी
- 15:12जुड़ी, भारत के शुरुआती राजनैतिक इतिहास
- 15:14की पूरी तस्वीर ही साफ होने लगी। हम
- 15:17यह खोज सिर्फ अक्षरों को पढ़ना नहीं था
- 15:19बल्कि एक पूरे भूले हुए युग को उसकी आवाज
- 15:22वापस देना था।
- 15:23तो प्रिंसेप की इस खोज ने एक तरह से ताला
- 15:26खोल दिया।
- 15:27बिल्कुल।
- 15:27जब इतिहासकारों ने इस ताले के पार झांका
- 15:30तो उन्हें छठी शताब्दी ईसा पूर्व का भारत
- 15:33कैसा दिखा?
- 15:34उन्हें एक ऐसा उपमहाद्वीप दिखा जो
- 15:36राजनैतिक रूप से कई टुकड़ों में बंटा हुआ
- 15:38था। हम
- 15:39बौद्ध और जैन धर्म के शुरुआती ग्रंथों में
- 15:4216 महाजनपदों का जिक्र मिलता है। हम
- 15:44यह उस दौर की सबसे बड़ी राजनीतिक इकाइयां
- 15:47थी।
- 15:47तो महाजनपद को हम आज के दौर के राज्यों या
- 15:51प्रांतों जैसा समझ सकते हैं।
- 15:52हां काफी हद तक।
- 15:53मतलब ये सिर्फ गांव या कबीले नहीं थे
- 15:56बल्कि संगठित राजनैतिक इकाइयां थी जिनकी
- 15:59अपनी राजधानियां, अपनी सेनाएं और अपनी कर
- 16:02प्रणाली थी।
- 16:03बिल्कुल सही। हम्
- 16:04वज्जी, मगध, कौशल, कुरु, पंचाल, गांधार,
- 16:09अवंती यह उस दौर के कुछ बड़े नाम थे।
- 16:12हम्।
- 16:12ज्यादातर महाजनपदों पर एक राजा का शासन
- 16:14था। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कुछ राज्य
- 16:17ऐसे भी थे जिन्हें गण या संघ कहा जाता था।
- 16:201 मिनट रुकिए। यह गढ़ और संघ वाली बात
- 16:23बहुत दिलचस्प है। मतलब उस जमाने में भी एक
- 16:26तरह के गणतंत्र मौजूद थे।
- 16:28जी बिल्कुल।
- 16:29राजा के शासन और इस समूह के शासन में क्या
- 16:32बुनियादी फर्क था? यह बहुत बड़ा फर्क था।
- 16:34गण संघ में सत्ता किसी एक व्यक्ति के हाथ
- 16:37में नहीं बल्कि एक कह सकते हैं कि कुलीन
- 16:40समूह या परिषद के हाथ में होती थी।
- 16:42अच्छा।
- 16:42फैसले बहस और सहमति से लिए जाते थे। भगवान
- 16:45महावीर और भगवान बुद्ध दोनों ही ऐसे ही
- 16:48गणों से आते थे।
- 16:49अरे वाह।
- 16:49जो हमें बताता है कि उस समय यह व्यवस्था
- 16:51कितनी महत्वपूर्ण थी। हालांकि समय के साथ
- 16:54मगध जैसे केंद्रीयकृत राजतंत्र ज्यादा
- 16:57शक्तिशाली साबित हुए।
- 16:58ऐसा क्यों हुआ? गणतंत्र वाली व्यवस्था तो
- 17:01ज्यादा लोकतांत्रिक लगती है। फिर राजाओं
- 17:03वाले राज्य आगे कैसे निकल गए?
- 17:05देखिए इसकी मुख्य वजह थी फैसले लेने की
- 17:07रफ्तार और संसाधनों पर पूरा नियंत्रण।
- 17:10हम
- 17:10एक राजा तेजी से सेना खड़ी कर सकता था।
- 17:13हमले का आदेश दे सकता था और कर वसूल सकता
- 17:15था।
- 17:16सही बात है।
- 17:17गणसंघ में इन सब चीजों के लिए बहस करनी
- 17:19पड़ती थी। जिससे वे सैन्य रूप से थोड़े
- 17:21कमजोर पड़ जाते थे।
- 17:23और इसी दौड़ में एक महाजनपद बाकी सब पर
- 17:26भारी पड़ गया।
- 17:27जी।
- 17:27और वो था मगध। मगध
- 17:29तो इन 16 खिलाड़ियों में से मगध ही वो
- 17:32चैंपियन कैसे बना जो आखिर में सबको हराकर
- 17:35एक साम्राज्य की नीव रखेगा।
- 17:37मगध की सफलता के पीछे कोई एक कारण नहीं था
- 17:40बल्कि कई चीजों का एक बेहतरीन मेल था।
- 17:43अच्छा।
- 17:43पहली बात जमीन। यह इलाका गंगा के मैदान
- 17:47में था जो बहुत ज्यादा उपजाऊ था। यानी
- 17:50खेती से काफी आमदनी होती थी।
- 17:52ठीक है।
- 17:52दूसरा संसाधन। आज के झारखंड के इलाके में
- 17:56लोहे की खदानें थी जिससे मजबूत हथियार और
- 17:59औजार बनाना आसान था। तीसरा जंगली इलाकों
- 18:02में हाथी बहुतायत में थे।
- 18:03हाथी यह सुनने में थोड़ा अजीब लगता है।
- 18:07क्या वे सच में इतने प्रभावी थे? मेरा
- 18:09मतलब है आज के टैंकों की तरह।
- 18:11एक तरह से? हां। सोचिए सामने से आते
- 18:15हाथियों की एक दीवार किसी भी पैदल सेना का
- 18:18मनोबल तोड़ सकती थी। हम यह तो है।
- 18:20वे किलों के दरवाजे तोड़ने और दलदली
- 18:23इलाकों को पार करने में भी माहिर थे। यह
- 18:25मगध के लिए एक बहुत बड़ा सामरिक लाभ था।
- 18:28जो दूसरे महाजनपदों के पास नहीं था।
- 18:30सही।
- 18:31और आखिर में नदियां। गंगा और उसकी सहायक
- 18:34नदियां एक एक नेचुरल हाईवे की तरह थी।
- 18:37जिससे व्यापार और सेना की आवाजाही बहुत
- 18:40सस्ती और आसान हो गई थी।
- 18:42तो प्राकृतिक रूप से मगध के पास बहुत
- 18:44फायदे थे। लेकिन इसमें वहां के शासकों की
- 18:47भी तो कोई भूमिका रही होगी। बिल्कुल बौद्ध
- 18:50और जैन लेखकों के अनुसार बिंबिसार आजात
- 18:53शत्रु और महापद्मानंद जैसे शासक बहुत
- 18:56महत्वाकांक्षी और काबिल थे।
- 18:58हम
- 18:58उन्होंने इन प्राकृतिक फायदों का भरपूर
- 19:00इस्तेमाल किया। शुरू में राजधानी राजगृह
- 19:03थी जो पहाड़ों से घिरी एक सुरक्षित जगह
- 19:05थी।
- 19:06अच्छा।
- 19:06बाद में राजधानी को पाटलिपुत्र यानी आज के
- 19:09पटना ले जाया गया। जो नदियों के संगम पर
- 19:13एक रणनीतिक जगह थी। यह सारे फैसले मगध को
- 19:17अनस्टपेबल बना रहे थे।
- 19:19और इसी शक्ति का नतीजा था मौर्य साम्राज्य
- 19:21का उदय।
- 19:22जी। लगभग 321 ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त
- 19:26मौर्य ने इस साम्राज्य की नींव रखी जो मगध
- 19:28से शुरू होकर अफगानिस्तान और बलूचिस्तान
- 19:31तक फैल गया।
- 19:32यानी भारतीय उपमहाद्वीप का पहला इतना
- 19:35विशाल साम्राज्य।
- 19:36जी हां। और उनके पोते अशोक ने कलिंग यानी
- 19:40आज के उड़ीसा को जीतकर इस साम्राज्य को
- 19:42अपने चरम पर पहुंचाया।
- 19:44मौर्य साम्राज्य के बारे में जानने के लिए
- 19:46हमारे पास स्रोत क्या-क्या हैं? जाहिर है
- 19:48अशोक के अभिलेख तो हैं ही जिनके बारे में
- 19:51हमने बात की।
- 19:51अभिलेख सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में से
- 19:53हैं। अशोक पहले ऐसे सम्राट थे जिन्होंने
- 19:56सीधे अपनी प्रजा से बात करने के लिए
- 19:58पत्थरों और स्तंभों पर संदेश खुदवाए।
- 20:01हम्म।
- 20:01लेकिन इसके अलावा भी बहुत कुछ है। हमें उस
- 20:04दौर की मूर्तियां मिली हैं। चंद्रगुप्त के
- 20:06दरबार में एक यूनानी राजदूत था मेगस्थनीज।
- 20:09मेगस्थनीज
- 20:10हां।
- 20:10उसने इंडिका नाम की किताब लिखी। हालांकि
- 20:13उसका मूल रूप तो नहीं मिला लेकिन बाद के
- 20:15लेखकों ने उसके अंशों का इस्तेमाल किया है
- 20:18और फिर एक और ग्रंथ है जिसका जिक्र करना
- 20:20बहुत जरूरी है।
- 20:21आप कौटिल्य के अर्थशास्त्र की बात कर रहे
- 20:24हैं।
- 20:24यह ग्रंथ हमें मौर्य प्रशासन के बारे में
- 20:27ऐसा क्या बताता है जो अशोक के अभिलेखों से
- 20:29पता नहीं चलता।
- 20:30अर्थशास्त्र एक बहुत ही अलग तस्वीर पेश
- 20:33करता है। अशोक के अभिलेखों में हमें धम,
- 20:35नैतिकता और शांति की बातें मिलती हैं।
- 20:38हां।
- 20:38वहीं अर्थशास्त्र शासन कला पर एक बहुत ही
- 20:41व्यवहारिक यहां तक कि कुछ हद तक कठोर
- 20:44ग्रंथ है।
- 20:45अच्छा।
- 20:45यह जासूसी कैसे की जाए, कर कैसे वसूला जाए
- 20:49और राज्य को किसी भी कीमत पर कैसे मजबूत
- 20:51बनाया जाए इस पर जोर देता है। यह हमें याद
- 20:54दिलाता है कि मौर्य साम्राज्य सिर्फ धम्म
- 20:57के आदर्शों पर नहीं बल्कि एक बहुत ही
- 20:59संगठित और सख्त प्रशासनिक मशीनरी पर भी
- 21:02चलता था।
- 21:02यानी दोनों को साथ में पड़ने पर ही हमें
- 21:04पूरी तस्वीर मिलती है।
- 21:05तो इस विशाल साम्राज्य का प्रशासन चलता
- 21:08कैसे था? राजधानी पाटलिपुत्र से लेकर दूर
- 21:11अफगानिस्तान तक सब कुछ एक जैसा तो नहीं हो
- 21:13सकता?
- 21:14बिल्कुल नहीं। साम्राज्य का नियंत्रण हर
- 21:16जगह एक जैसा नहीं था। राजधानी पाटलिपुत्र
- 21:19और चार प्रांतीय केंद्रों तक्षशिला,
- 21:22उज्जैनी, तोसली और सुवर्णगिरी पर सबसे
- 21:26मजबूत पकड़ थी।
- 21:27हम
- 21:28और इन केंद्रों को बहुत सोच समझकर चुना
- 21:31गया था। तक्षशिला और उज्जैनी लंबे
- 21:34व्यापारिक रास्तों पर थे। तो वहीं
- 21:36सुवर्णगिरी जिसका मतलब ही है सोने का
- 21:38पहाड़ कर्नाटक की सोने की खदानों के पास
- 21:41था।
- 21:42अच्छा
- 21:42इन केंद्रों के बीच आवाजाही के लिए जमीनी
- 21:45और नदी दोनों मार्गों का इस्तेमाल होता
- 21:47था।
- 21:48और इतने बड़े अलग-अलग संस्कृतियों वाले
- 21:50साम्राज्य को एक साथ जोड़े रखने के लिए
- 21:53अशोक ने क्या किया? क्या सिर्फ सेना का डर
- 21:56काफी था?
- 21:57नहीं। अशोक को यह एहसास हुआ कि सिर्फ
- 21:59सैन्य ताकत से इतने बड़े साम्राज्य को
- 22:02एकजुट नहीं रखा जा सकता। इसीलिए उन्होंने
- 22:05धम्म का प्रचार किया।
- 22:06धम्म
- 22:07यह कोई नया धर्म नहीं था बल्कि एक नैतिक
- 22:10संहिता थी। हम
- 22:11इसमें बड़ों का आदर, ब्राह्मणों और
- 22:14सन्यासियों को दान देना, दासों और सेवकों
- 22:17से अच्छा व्यवहार करना और दूसरे धर्मों का
- 22:20सम्मान करना शामिल था।
- 22:21तो एक तरह का सामाजिक गोंद था यह।
- 22:24हां, कह सकते हैं जो अलग-अलग मान्यताओं
- 22:27वाले लोगों को एक साम्राज्य के नागरिक के
- 22:29रूप में एक साथ बांधने की कोशिश थी। इसके
- 22:32प्रचार के लिए उन्होंने धम्म महामात नाम
- 22:35के विशेष अधिकारी भी नियुक्त किए।
- 22:37यह तो हुई राजाओं और साम्राज्य की बात।
- 22:40लेकिन इस दौर में एक आम इंसान की एक किसान
- 22:44की जिंदगी कैसी थी? क्या साम्राज्य की चमक
- 22:46उन तक पहुंच रही थी?
- 22:48ये एक बहुत जरूरी सवाल है। और इसका जवाब
- 22:51हमें अभिलेखों में नहीं बल्कि जातक कथाओं
- 22:54जैसी कहानियों में मिलता है।
- 22:55अच्छा। एक जातक कथा में एक बहुत ही
- 22:57दिलचस्प कहानी है। एक राजा भेष बदलकर अपनी
- 23:01प्रजा से यह जानने के लिए निकलता है कि वे
- 23:03उसके बारे में क्या सोचते हैं और वह यह
- 23:05सुनकर हैरान रह जाता है कि लोग उसे डाकू
- 23:08कहते हैं। वे शिकायत करते हैं कि दिन में
- 23:11राजा के कर अधिकारियों उन्हें लूटते हैं
- 23:13और रात में चोर।
- 23:14बाप रे।
- 23:16यह हमें बताता है कि राजा और प्रजा के बीच
- 23:18संबंध अक्सर तनावपूर्ण रहते थे और आम
- 23:21लोगों के लिए जीवन कितना कठिन था। तो
- 23:23जाहिर है कि किसान ज्यादा से ज्यादा ऊपर
- 23:25जुगाना चाहते होंगे ताकि कर चुकाने के बाद
- 23:28भी उनके पास कुछ बचे। इसके लिए क्या नए
- 23:31तरीके अपनाए जा रहे थे?
- 23:32दो बड़े बदलाव हुए। पहला था लोहे के फाल
- 23:35वाले हल का इस्तेमाल जिसने गंगा और कावेरी
- 23:38जैसी उपजाऊ घाटियों में खेती को बहुत आसान
- 23:40बना दिया।
- 23:41ठीक है।
- 23:42दूसरा और शायद ज्यादा महत्वपूर्ण था धान
- 23:45की रोपाई की तकनीक।
- 23:46अच्छा यह क्या थी? इसमें पहले बीज से पौधे
- 23:49तैयार किए जाते हैं और फिर उन्हें पानी से
- 23:51भरे खेतों में लगाया जाता है। इससे
- 23:53पैदावार में जबरदस्त उछाल आया। साथ ही
- 23:57सिंचाई के लिए कुएं, तालाब और नहरे भी
- 23:59बनाई गई।
- 24:00लेकिन क्या उत्पादन बढ़ने का फायदा समाज
- 24:02में सबको बराबर मिला?
- 24:04नहीं, ऐसा नहीं हुआ। समाज में असमानता
- 24:07बढ़ने लगी।
- 24:08हम
- 24:08हमें एक तरफ भूमिहीन खेतीहर मजदूर मिलते
- 24:11हैं तो दूसरी तरफ छोटे किसान और फिर
- 24:13बड़े-बड़े जमींदार।
- 24:15अच्छा। पाली भाषा के ग्रंथों में गहपति
- 24:18शब्द मिलता है जो घर का मुखिया होता था और
- 24:21जमीन पर उसका नियंत्रण होता था। गांव में
- 24:24बड़े जमींदार और ग्राम प्रधान अक्सर बहुत
- 24:27शक्तिशाली हो जाते थे और किसानों पर अपना
- 24:29दबदबा रखते थे।
- 24:30तो उत्पादन जरूर बढ़ा लेकिन उसके साथ-साथ
- 24:34ग्रामीण समाज में अमीर और गरीब का फर्क भी
- 24:37गहरा होता गया।
- 24:38बिल्कुल।
- 24:38और गांवों से बाहर शहरों में क्या हो रहा
- 24:41था? क्योंकि इस अध्याय का नाम राजा किसान
- 24:44और नगर है।
- 24:45छठी शताब्दी ईसा पूर्व से ही नए-नए शहर
- 24:48बसने लगे थे। इनमें से कई तो महाजनपदों की
- 24:52राजधानियां ही थी। जैसे पाटलिपुत्र,
- 24:54उज्जैनी और मथुरा। हम
- 24:57इन शहरों में शासक वर्ग और अमीर लोग रहते
- 25:00थे। हमें खुदाई में शानदार मिट्टी के
- 25:02बर्तन मिले हैं जिन्हें उत्तरी कृष्ण
- 25:04मार्जित पात्र कहते हैं जो शायद अमीर लोग
- 25:07इस्तेमाल करते थे।
- 25:08अच्छा। और इन शहरों से व्यापार भी खूब
- 25:11फलता फूलता था।
- 25:12यह व्यापार कहां-कहां तक फैला हुआ था?
- 25:14यह उपमहाद्वीप के भीतर भी था और बाहर भी।
- 25:17जमीनी रास्ते मध्य एशिया तक और समुद्री
- 25:20रास्ते रोमन साम्राज्य और दक्षिण पूर्व
- 25:22एशिया तक जाते थे।
- 25:24और इस लंबे व्यापार को सिक्कों ने बहुत
- 25:26आसान बना दिया होगा।
- 25:28बिल्कुल। चीजों के बदले चीजें देने की जगह
- 25:30अब सिक्कों से लेनदेन होने लगा।
- 25:32सिक्कों का जिक्र भी दिलचस्प है। क्या
- 25:34सिक्कों की अपनी कोई कहानी है? वे हमें उस
- 25:37दौर के बारे में क्या बताते हैं?
- 25:39बिल्कुल। सिक्के इतिहास के बहुत
- 25:41महत्वपूर्ण गवाह होते हैं। सबसे पुराने
- 25:43सिक्के आहत सिक्के या पंचमार्क्ड कॉइंस
- 25:46थे।
- 25:46पंचमार्क्ड
- 25:47जी। यह चांदी और तांबे के बने होते थे। उन
- 25:50पर बस कुछ निशान ठोक दिए जाते थे। किसी
- 25:53राजा का नाम नहीं होता था।
- 25:54हम
- 25:55शासकों के नाम और उनकी तस्वीर वाले पहले
- 25:57सिक्के हिंद यूनानी राजाओं ने जारी किए।
- 25:59यह एक बड़ा बदलाव था। अब सिक्का सिर्फ
- 26:02पैसा नहीं था बल्कि राजा की शक्ति का
- 26:04प्रतीक भी था। और सोने के सिक्कों की
- 26:06शुरुआत कब हुई?
- 26:07पहले सोने के सिक्के पहली शताब्दी ईवी में
- 26:09कुषाण राजाओं ने जारी किए जो वजन और आकार
- 26:12में रोमन सिक्कों जैसे ही थे।
- 26:14अच्छा इससे तो उस दौर के अंतरराष्ट्रीय
- 26:17व्यापार का अंदाजा लगता है।
- 26:18बिल्कुल और बाद में गुप्त शासकों ने तो
- 26:21कुछ सबसे बेहतरीन सोने के सिक्के जारी किए
- 26:23हैं। इन सिक्कों की मौजूदगी या कमी हमें
- 26:26किसी राज्य की आर्थिक सेहत के बारे में
- 26:28बहुत कुछ बताती है।
- 26:29तो हमने अभिलेखों, ग्रंथों, सिक्कों और
- 26:32पुरातात्विक सबूतों की बात की। यह सब
- 26:34मिलकर हमें उस दौर की एक तस्वीर देते हैं।
- 26:38लेकिन क्या इन स्रोतों की कोई सीमाएं हैं?
- 26:40क्या कोई ऐसी चीज है जो यह हमें नहीं बता
- 26:43पाते?
- 26:43बिल्कुल। और यह समझना बहुत जरूरी है।
- 26:46हम
- 26:46अभिलेखों की ही बात करें तो कई बार अक्षर
- 26:49इतने हल्के खुदे होते हैं कि उन्हें पढ़ना
- 26:52मुश्किल होता है या समय के साथ अभिलेख
- 26:54नष्ट हो जाते हैं।
- 26:55ठीक है। यह तो तकनीकी सीमा हुई।
- 26:57जी। लेकिन एक इससे भी बड़ी वैचारिक सीमा
- 27:00है। अभिलेख हमेशा उन्हीं लोगों के विचार
- 27:03बताते हैं जो उन्हें बनवाते थे। यानी राजा
- 27:06या कोई अमीर व्यक्ति।
- 27:07मतलब हमें सिर्फ एक तरफ की कहानी पता चलती
- 27:10है।
- 27:10ठीक यही बात है। अभिलेख हमें यह बताते हैं
- 27:13कि राजा अपनी प्रजा को क्या बताना चाहता
- 27:17था या वह अपनी उपलब्धियों को कैसे देखता
- 27:19था। हम्म।
- 27:20लेकिन एक आम किसान की जिंदगी की रोजमर्रा
- 27:23की खुशियां और परेशानियां, खेती की
- 27:25तकनीकें, महिलाओं का जीवन इन सब पर अभिलेख
- 27:29पूरी तरह से खामोश हैं।
- 27:30तो इन सबका क्या अर्थ निकाला जाए? इतिहास
- 27:34को समझने के लिए हमें इन आवाजों और
- 27:37खामोशियों दोनों को कैसे देखना चाहिए?
- 27:40इसका अर्थ यह है कि इतिहासकार को एक जासूस
- 27:42की तरह काम करना पड़ता है।
- 27:44हम
- 27:44उसे हर स्रोत पर सवाल उठाना पड़ता है। उसे
- 27:47यह समझना होता है कि जो लिखा गया है वो
- 27:49क्यों लिखा गया है और किसके लिए लिखा गया
- 27:51है
- 27:51और जो नहीं लिखा गया है
- 27:53और जो नहीं लिखा गया है वो क्यों नहीं
- 27:54लिखा गया। अभिलेख हमें शासकों की दुनिया
- 27:57की झलक देते हैं। लेकिन आम जनता की दुनिया
- 27:59को समझने के लिए हमें कथाओं, लोक कथाओं और
- 28:03पुरातात्विक अवशेषों जैसे दूसरे सुरागों
- 28:05को जोड़ना पड़ता है।
- 28:06पूरी कहानी कभी भी किसी एक स्रोत में नहीं
- 28:09मिलती।
- 28:09यह एक बहुत ही दिलचस्प विरोधाभास है। अशोक
- 28:13अपने अभिलेखों में कलिंग युद्ध के बाद
- 28:16अपनी पीड़ा और पश्चाताप की बात करते हैं।
- 28:19जी। यह इतिहास के सबसे शक्तिशाली स्रोतों
- 28:22में से एक है। लेकिन उन्हीं अभिलेखों में
- 28:24हमें उन लाखों लोगों की पीड़ा के बारे में
- 28:27एक शब्द भी नहीं मिलता जो उस युद्ध में
- 28:30मारे गए या बेघर हुए।
- 28:32यही इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती है। यह
- 28:34हमें याद दिलाता है कि इतिहास अक्सर
- 28:36विजेताओं या शक्तिशाली लोगों की कलम से
- 28:38लिखा जाता है।
- 28:39हम
- 28:39उनकी आवाज पत्थरों पर हमेशा के लिए खुद
- 28:41जाती है। लेकिन उन लोगों की आवाजें जिनके
- 28:44पास लिखने के लिए पत्थर या स्तंभ नहीं थे।
- 28:46अक्सर समय के धूल में खो जाती हैं।
- 28:49तो आज की इस चर्चा के बाद सोचने के लिए एक
- 28:51बात यह भी है कि हमें इतिहास में लिखे हुए
- 28:54शब्दों के साथ-साथ उन खामोशियों को भी
- 28:57पढ़ना सीखना होगा। शायद उन लोगों की कहानी
- 29:00जो अपनी कहानी खुद नहीं लिख सके ही ज्यादा
- 29:04बड़ी और ज्यादा मानवीय कहानी है।
- 29:06बिल्कुल। हमें हमेशा यह पूछना चाहिए कि
- 29:09किसकी कहानी हमें सुनाई जा रही है और
- 29:11किसकी कहानी अनकही रह गई है।
- 29:14राजा, किसान और नगर अध्याय पर हमारी यह
- 29:18गहन चर्चा समाप्त हुई।
- 29:22हमारे आज के सोर्सेज हमें एक बहुत ही
- 29:25दिलचस्प सवाल की तरफ ले जाते हैं।
- 29:27हम
- 29:28एक तरफ है प्राचीन भारत के वो ग्रंथ जो
- 29:31समाज के लिए एकदम सटीक नियम कानून बनाते
- 29:33हैं।
- 29:34बिल्कुल।
- 29:34शादी कैसे होगी? जायदाद किसे मिलेगी,
- 29:37किसका दर्जा ऊंचा होगा और किसका नीचा? और
- 29:40दूसरी तरफ है उस समय की असली दुनिया।
- 29:42जो इन नियमों से बिल्कुल अलग कहीं ज्यादा
- 29:45उलझी हुई और अपनी धुन में चलती थी।
- 29:48हां।
- 29:49बिल्कुल। ये एक तरह की खींचतान है। मतलब
- 29:51आदर्श और वास्तविकता के बीच।
- 29:53सही।
- 29:54और इस खींचतान को समझने के लिए हमारे पास
- 29:56सबसे बड़ा और मजेदार सोर्स है महाभारत।
- 29:58हम्म। हम्म।
- 29:59ये सिर्फ कौरवों और पांडवों की लड़ाई की
- 30:01कहानी नहीं है।
- 30:02बल्कि ये उस दौर के समाज का एक आईना है।
- 30:04अच्छा।
- 30:05जिसमें नियमों को लेकर चल रही जद्दोजहद
- 30:07साफ दिखती है।
- 30:08तो आज हम इसी पर गहरी नजर डालेंगे। हम ये
- 30:11समझने की कोशिश करेंगे कि ये नियम आखिर थे
- 30:14क्या?
- 30:14इन्हें किसने बनाया और असल जिंदगी में लोग
- 30:18इन्हें कितना मानते थे।
- 30:19बिल्कुल। चलिए शुरुआत महाभारत से ही करते
- 30:22हैं। हमें बताया गया है कि 1919 में वीएस
- 30:26सुथकर नाम के एक विद्वान ने एक बहुत बड़ा
- 30:29प्रोजेक्ट शुरू किया था महाभारत का
- 30:32क्रिटिकल एडिशन तैयार करने का।
- 30:34हां।
- 30:34ये था क्या और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
- 30:37ये एक बहुत ही आप कह सकती हैं एंबिशियस
- 30:40प्रोजेक्ट था। सोचिए भारत के अलग-अलग
- 30:43कोनों से
- 30:43कहां-कहां से? कश्मीर से ले के तक संस्कृत
- 30:46में लिखी महाभारत की सैकड़ों हाथ से लिखी
- 30:49पांडुलिपियां यानी मैनुस्क्रिप्ट्स इकट्ठा
- 30:52की गई।
- 30:52अच्छा
- 30:53मकसद यह था कि इन सब में जो श्लोक कॉमन है
- 30:56उन्हें एक जगह इकट्ठा किया जाए।
- 30:58और जो अलग है
- 30:59और जो रीजनल वेरिएशंस हैं उन्हें फुटनोट्स
- 31:01में डाल लिया जाए। इस काम को पूरा होने
- 31:03में 47 साल लग गए।
- 31:0547 साल तो इससे पता क्या चला? क्या पूरे
- 31:08देश में एक ही महाभारत की कहानी चल रही
- 31:10फैसिनेटिंग बात यही है। एक तरफ तो यह दिखा
- 31:13कि कहानी का जो कोर स्ट्रक्चर था वो लगभग
- 31:16पूरे उपमहाद्वीप में एक जैसा था।
- 31:18हम्म।
- 31:19लेकिन साथ ही हजारों छोटे-छोटे अंतर भी
- 31:21सामने आए।
- 31:22अच्छा।
- 31:22और ये अंतर दिखाते हैं कि महाभारत कोई
- 31:25पत्थर की लकीर नहीं थी। यह एक डायनेमिक
- 31:28यानी एक जीवंत ग्रंथ था।
- 31:30जीवंत ग्रंथ मतलब
- 31:32मतलब जब यह कहानी एक जगह से दूसरी जगह
- 31:34जाती थी तो लोग उसमें अपनी स्थानीय
- 31:36मान्यताएं, अपनी कहानियां जोड़ देते थे।
- 31:39यह ग्रंथ लोगों के साथ सांस ले रहा था,
- 31:41बदल रहा था।
- 31:42ओके। तो इसे ऐसे समझते हैं महाभारत सिर्फ
- 31:46एक कहानी नहीं बल्कि एक तरह का सोशल
- 31:49डॉक्यूमेंट है जो हमें उस समय के समाज के
- 31:52बारे में बताता है।
- 31:53बिल्कुल।
- 31:54और इस कहानी के केंद्र में है एक परिवार
- 31:56का झगड़ा सत्ता और संपत्ति को लेकर।
- 31:59सही।
- 31:59यहीं से शायद हमें उस समय के पारिवारिक
- 32:02नियमों के बारे में कुछ पता चलता है।
- 32:03बिल्कुल सही। महाभारत की पूरी लड़ाई
- 32:06पितृवंशिकता या पैट्रिलिनी के आदर्श पर
- 32:09टिकी है।
- 32:09पितृ वंशिकता
- 32:10हां यह एक बहुत सीधा सा नियम था। पिता के
- 32:13बाद उसकी संपत्ति और पद पर उसके बेटों का
- 32:16हक होगा और फिर उनके बेटों का तो वंश
- 32:18पुरुषों के नाम से ही आगे बढ़ेगा।
- 32:20इसीलिए हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए
- 32:23कौरवों और पांडवों में युद्ध हुआ।
- 32:25एग्जैक्टली क्योंकि दोनों ही खुद को
- 32:27सिंहासन का असली वारिस मानते थे।
- 32:29लेकिन यह तो राजघरानों की बात हुई। क्या
- 32:32आम परिवारों में भी यही सिस्टम था?
- 32:34ज्यादातर मामलों में हां, यही आदर्श था।
- 32:37ग्रंथों में परिवार के लिए कुल शब्द का
- 32:39इस्तेमाल होता था और रिश्तेदारों के बड़े
- 32:41समूह के लिए जाति का।
- 32:43पितृंशिकता का आदर्श इतना मजबूत था कि जिन
- 32:46राजाओं के बेटे नहीं होते थे, वे बहुत
- 32:49चिंतित हो जाते थे। हालांकि कभी-कभी भाई
- 32:52या दूसरे रिश्तेदार भी राजा बन जाते थे।
- 32:54लेकिन पहली प्राथमिकता हमेशा बेटे को ही
- 32:56दी जाती थी।
- 32:57हां, पहली प्राथमिकता बेटे की ही थी। यह
- 32:59एग्जाम्स के लिए जरूरी है।
- 33:01तो अगर वंश बेटों से जलना है तो यह तय
- 33:04करना बहुत जरूरी हो जाता होगा कि शादी
- 33:06कैसे हो ताकि वंश की शुद्धता बनी रहे।
- 33:09यहीं पर शादी के नियम कानून आते होंगे।
- 33:12बिल्कुल। धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र जैसे
- 33:14ग्रंथों में ब्राह्मणों ने शादी के लिए
- 33:16बड़े डिटेल्ड नियम बनाए। सबसे अच्छा तरीका
- 33:19माना जाता था बहिर्विवाह यानी एग्जोगैमी।
- 33:22इसका मतलब था अपने गोत्र से बाहर शादी
- 33:24करना।
- 33:25हां, गोत्र से बाहर इसे उत्तम माना जाता
- 33:28था। गोत्र यह तो आज के बहुत सुनने में आता
- 33:31है। इसका कांसेप्ट क्या था?
- 33:33देखिए लगभग हजार ईसा पूर्व के बाद
- 33:36ब्राह्मणों ने लोगों को गोत्रों में
- 33:38बांटना शुरू किया। हर गोत्र का नाम एक
- 33:41वैदिक ऋषि के नाम पर होता था।
- 33:43अच्छा।
- 33:43और माना जाता था कि उस गोत्र के सभी सदस्य
- 33:47उसी ऋषि के वंशज हैं। तो नियम यह बनाया
- 33:49गया कि एक ही गोत्र के लोग आपस में शादी
- 33:52नहीं कर सकते। और एक और नियम था ना
- 33:54हां कि शादी के बाद औरत को अपने पिता का
- 33:57गोत्र छोड़कर पति का गोत्र अपनाना होता
- 34:00था।
- 34:00यह तो बड़ा सख्त नियम लगता है। क्या सब
- 34:02लोग इसे मानते थे? यहां भी हमें नियम बनाम
- 34:05असलियत वाली खींचतान दिखती है।
- 34:07बिल्कुल दिखती है और इसका सबसे अच्छा
- 34:09उदाहरण सातवाहन राजाओं से मिलता है।
- 34:11जो दक्कन के इलाके में राज करते थे।
- 34:13हां, उनके नामों को अगर हम देखें तो पता
- 34:15चलता है कि उन्होंने इन नियमों को पूरी
- 34:17तरह नहीं माना। कई सातवाहन रानियों ने
- 34:20शादी के बाद भी अपने पिता का ही गोत्र
- 34:23बनाए रखा। पति का नहीं अपनाया।
- 34:25यह तो ब्राह्मणों के बनाए नियमों के
- 34:27बिल्कुल खिलाफ हुआ।
- 34:28हां। और इससे भी ज्यादा दिलचस्प बात यह है
- 34:30कि कुछ सातवाहन राजाओं ने तो अंतर्विवाह
- 34:33यानी एंडोगैमी का पालन किया।
- 34:34मतलब?
- 34:35मतलब अपने ही कुल या गोत्र के अंदर शादी
- 34:38की जो कि नियमों के सख्त खिलाफ था।
- 34:40अच्छा।
- 34:41और एक और बात उनके कई राजाओं का नाम उनकी
- 34:43मां के नाम से जुड़े हैं।
- 34:45अच्छा। तो इसका मतलब यह हुआ कि सातवाहन
- 34:47समाज में माताएं बहुत महत्वपूर्ण थी। क्या
- 34:50यह समाज मातृंशिक था? मतलब जहां वंश मां
- 34:53के नाम से चलता हो?
- 34:54ये एक बहुत जरूरी सवाल है। मां का सम्मान
- 34:56तो बहुत था लेकिन सत्ता का उत्तराधिकार
- 34:58पितृवंशिक ही था।
- 34:59मतलब सिंहासन पिता के बाद बेटे को ही
- 35:02मिलता था। बेटी को नहीं।
- 35:03बिल्कुल। तो सातवाहन एक परफेक्ट एग्जांपल
- 35:06है जो दिखाते हैं कि जमीनी हकीकत कितनी
- 35:08कॉम्प्लिकेटेड थी। वे ब्राह्मणों के कुछ
- 35:10नियम मानते थे, कुछ नहीं मानते थे और अपने
- 35:12समाज में मां को बहुत ऊंचा दर्जा भी देते
- 35:15थे।
- 35:15और शादी के दूसरे तरीकों के बारे में क्या
- 35:18जैसे महाभारत में द्रोपदी के पांच पति थे।
- 35:21यह तो किसी भी नियम में फिट नहीं बैठता।
- 35:23वो बहुपति प्रथा या पॉली एंड्री का उदाहरण
- 35:26है। और यह वाकई में बहुत रेयर और
- 35:28कंट्रोवर्शियल था।
- 35:30महाभारत में भी इस पर बहुत बहस होती है कि
- 35:32यह धर्म के अनुसार है या नहीं। इससे पता
- 35:35चलता है कि समाज में ऐसी प्रथाएं मौजूद
- 35:37थी। भले ही धर्मशास्त्र लिखने वाले
- 35:39ब्राह्मण उन्हें पसंद ना करते हो
- 35:42और बहुपत्नी प्रथा
- 35:43हां बहुपत्नी प्रथा पॉलीजीनी यानी एक
- 35:46पुरुष की कई पत्नियां होना राजाओं और अमीर
- 35:49लोगों में काफी आम था।
- 35:50हम
- 35:51धर्मशास्त्रों में तो शादी के आठ प्रकार
- 35:53बताए गए हैं। जिनमें से पहले चार को अच्छा
- 35:56और बाकी को निंदित माना गया है। इसमें
- 35:58कन्यादान एक महत्वपूर्ण कर्तव्य था। ये
- 36:00एग्जाम्स के लिए जरूरी है।
- 36:02तो एक तरफ परिवार और शादी के नियम है जो
- 36:04काफी उलझे हुए हैं। लेकिन समाज को बांटने
- 36:07का एक और बड़ा सिस्टम था वर्ण व्यवस्था।
- 36:11क्या यह भी उतनी ही फ्लेक्सिबल थी?
- 36:12धर्मसूत्रों और धर्म शास्त्रों के हिसाब
- 36:15से तो बिल्कुल नहीं। उन्होंने समाज को चार
- 36:17वर्णों में बांटा और इसे एक दैय व्यवस्था
- 36:20बताया।
- 36:20देय व्यवस्था
- 36:22मतलब इसे भगवान ने बनाया है और इसे बदला
- 36:24नहीं किया जा सकता। यह जन्म पर आधारित थी।
- 36:27चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और
- 36:30शूद्र।
- 36:31सही। सबसे ऊपर ब्राह्मण जिनका काम पढ़ना,
- 36:34पढ़ाना और यज्ञ करना था। फिर क्षत्रिय जो
- 36:37शासक और योद्धा थे। तीसरे नंबर पर वैश्य
- 36:41जो किसान, व्यापारी और पशुपालक थे और सबसे
- 36:44नीचे शूद्र।
- 36:45जिनका काम सिर्फ ऊपर के तीन वर्णों की
- 36:47सेवा करना था।
- 36:48बिल्कुल।
- 36:49यह तो समाज का एक बहुत ही साफ-सुथरा एकदम
- 36:51रिजिड ढांचा लगता है। लेकिन क्या असल में
- 36:54ऐसा था? क्या सारे राजा क्षत्रिय ही होते
- 36:57थे?
- 36:57यहां पर कहानी और भी इंटरेस्टिंग हो जाती
- 36:59है। बिल्कुल नहीं।
- 37:01नहीं।
- 37:01इतिहास ऐसे राजाओं से भरा पड़ा है जो
- 37:04क्षत्रिय नहीं थे। मौर्य वंश को ही लीजिए।
- 37:06हम
- 37:06बौद्ध ग्रंथ तो कहते हैं कि वो क्षत्रिय
- 37:09थे। लेकिन ब्राह्मण ग्रंथ उन्हें निम्न
- 37:11कुल का मानते हैं।
- 37:12अच्छा।
- 37:13मध्यशिया से आए शक शासकों को ब्राह्मण
- 37:16म्लेच यानी बर्बर और बाहरी मानते थे।
- 37:19लेकिन उन्होंने भी यहां शासन किया।
- 37:20और सातवाहन राजा
- 37:22सातवाहन राजा खुद को ब्राह्मण बताते थे।
- 37:24जबकि राजा का काम तो क्षत्रिय का माना
- 37:26जाता है।
- 37:26तो इसका मतलब यह हुआ कि राजा बनने के लिए
- 37:29क्षत्रिय कुल में जन्म लेना जरूरी नहीं
- 37:31था।
- 37:31जरूरी नहीं था। ज्यादा जरूरी था समर्थन और
- 37:34संसाधन जुटाना। जो भी व्यक्ति पावर और
- 37:37रिसोर्सेज इकट्ठा कर सकता था वो राजा बन
- 37:40सकता था। चाहे वो किसी भी वर्ण में पैदा
- 37:41हुआ हो।
- 37:42तो यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि
- 37:44ग्रंथों में लिखा आदर्श अपनी जगह था और
- 37:47राजनीतिक हकीकत अपनी जगह।
- 37:49बिल्कुल। यह एग्जाम्स के लिए जरूरी है।
- 37:51वर्ण व्यवस्था के अलावा जाति का भी जिक्र
- 37:53आता है। इन दोनों में क्या फर्क था?
- 37:56यह एक बहुत जरूरी फर्क है। वर्ण सिर्फ चार
- 37:58थे लेकिन जातियां बहुत सारी थी।
- 38:00अच्छा।
- 38:01जातियां भी जन्म पर आधारित थी। लेकिन इनकी
- 38:04कोई निश्चित संख्या नहीं थी। जब भी
- 38:06अर्थव्यवस्था में कोई नया काम करने वाला
- 38:08समूह आता।
- 38:09जैसे
- 38:10जैसे कोई खास तरह के कारीगर या कोई समुदाय
- 38:13जो वर्ण व्यवस्था में फिट नहीं होता तो
- 38:15उन्हें एक अलग जाति का दर्जा दे दिया जाता
- 38:17था। जैसे जंगल में रहने वाले निषाद।
- 38:20तो क्या जातियां भी वर्णों की तरह एकदम
- 38:24फिक्स थी? क्या कोई अपना पेशा नहीं बदल
- 38:27सकता था?
- 38:27इसमें भी हमें फ्लेक्सिबिलिटी दिखती है।
- 38:29इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण मंदसौर जो मध्य
- 38:32प्रदेश में है। वहां से मिले एक अभिलेख
- 38:34में है।
- 38:35हम्म।
- 38:35यह रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी का
- 38:37अभिलेख है। वे मूल रूप से गुजरात के रहने
- 38:39वाले थे और बाद में मंदसौर आ गए।
- 38:42और वहां आकर
- 38:43वहां आकर उनमें से कुछ ने अपना पुराना
- 38:45पेशा छोड़ दिया और दूसरे काम करने लगे। यह
- 38:47सोशल मोबिलिटी यानी सामाजिक गतिशीलता को
- 38:50दिखाता है।
- 38:51लेकिन इस पूरी व्यवस्था के बाहर भी तो कुछ
- 38:54लोग थे जिन्हें अस्पृश्य या अनटचेबल कहा
- 38:57जाता था। उनकी स्थिति कैसी थी?
- 39:00उनकी स्थिति बहुत ही दयनीय थी। ब्राह्मण
- 39:03कुछ कामों को दूषित मानते थे। जैसे शवों
- 39:06को संभालना।
- 39:07हम
- 39:08इन कामों को करने वालों को चांडाल कहा
- 39:10जाता था। और उन्हें वर्ण व्यवस्था से बाहर
- 39:13सबसे निचले पायदान पर रखा जाता था।
- 39:16मनुस्मृति में उनके लिए बहुत कठोर नियम
- 39:18लिखे गए हैं।
- 39:19जैसे कि
- 39:20जैसे कि उन्हें गांव के बाहर रहना होगा।
- 39:22वे फेंके हुए बर्तनों का ही इस्तेमाल कर
- 39:24सकते थे। वे मृतकों के कपड़े और लोहे के
- 39:27आभूषण पहनते थे।
- 39:28मतलब समाज से बिल्कुल अलग थलग।
- 39:30हां। यहां तक कि पांचवी सदी में जब चीनी
- 39:33बौद्ध भिक्षु फाशियन भारत आए तो उन्होंने
- 39:36लिखा कि इन लोगों को सड़क पर चलते हुए करल
- 39:39बजानी पड़ती थी।
- 39:40करताल? क्यों?
- 39:42ताकि दूसरे लोग उन्हें देखने के दोष से बच
- 39:45जाए। यह सामाजिक भेदभाव का सबसे क्रूर रूप
- 39:48था। यह एग्जाम्स के लिए भी जरूरी है।
- 39:50यह सुनना ही कितना भयानक है। यह नियम
- 39:52संपत्ति के अधिकार पर भी लागू होते होंगे।
- 39:55बिल्कुल।
- 39:55जायदाद का बंटवारा कैसे होता था? क्या
- 39:58औरतों का कोई हक था?
- 39:59मनुस्मृति के अनुसार पिता की संपत्ति का
- 40:01बंटवारा उनकी मृत्यु के बाद सभी बेटों में
- 40:04बराबर होता था।
- 40:05बेटों में।
- 40:06हां। हालांकि कहीं-कहीं ज्येष्ठ पुत्र को
- 40:09एक विशेष हिस्सा देने की बात भी है।
- 40:11स्त्रियां पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी
- 40:13की मांग नहीं कर सकती मतलब उन्हें कुछ
- 40:15नहीं मिलता था।
- 40:16उन्हें शादी के वक्त जो उपहार मिलते थे उन
- 40:18पर उनका अधिकार होता था। इसे स्त्री धन
- 40:21कहा जाता था।
- 40:22अच्छा स्त्री धन
- 40:23इस संपत्ति को उनकी संतान विरासत में पा
- 40:25सकती थी और इस पर उनके पति का कोई हक नहीं
- 40:28होता था।
- 40:29हम
- 40:30लेकिन जाहिर है संपत्ति पर अधिकार भी वर्ण
- 40:32से जुड़ा था। शूद्रों के पास तो संपत्ति
- 40:35जमा करने के मौके ही बहुत कम थे।
- 40:37जबकि राजा और ब्राह्मण अक्सर सबसे धनी
- 40:39होते थे।
- 40:40हां। हालांकि बौद्ध धर्म जैसी परंपराओं ने
- 40:42जन्म पर आधारित इस भेदभाव का कड़ा विरोध
- 40:45किया था।
- 40:45तो हम घूम फिर कर फिर वहीं आ गए। नियम और
- 40:48उन नियमों को चुनौती देती हकीकत।
- 40:50बिल्कुल।
- 40:51अब अगर हम महाभारत को इन सब चीजों की
- 40:53रोशनी में देखें यह पितुवंशिकता, वर्ण
- 40:56व्यवस्था, संपत्ति के झगड़े तो
- 40:59इतिहासकारों के लिए यह ग्रंथ और भी ज्यादा
- 41:01महत्वपूर्ण हो जाता है।
- 41:03हां बिल्कुल।
- 41:03वे इसका विश्लेषण कैसे करते हैं? इसके
- 41:06लेखक कौन थे? यह बहुत दिलचस्प सवाल है।
- 41:08परंपरागत रूप से तो वेदव्यास को इसका
- 41:10रचयिता माना जाता है।
- 41:11लेकिन
- 41:12लेकिन ज्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि
- 41:14इसकी मूल कहानी की रचना भाट सारथियों ने
- 41:16की थी। जिन्हें सूत कहा जाता था।
- 41:18सूत
- 41:19हां यह सूत लोग योद्धाओं के साथ युद्ध के
- 41:21मैदान में जाते थे और उनकी जीत और बहादुरी
- 41:24की कविताएं रचते थे। यह कविताएं मौखिक रूप
- 41:26से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती रही।
- 41:28तो फिर ब्राह्मणों का रोल कब आया? लगभग
- 41:30पांचवी सदी ईसा पूर्व से जब कुरु और
- 41:32पांचाल जैसे राज्य मजबूत होने लगे तब
- 41:35ब्राह्मणों ने इस कथा को लिखना शुरू किया
- 41:37और इस पर अपना अधिकार जमा लिया।
- 41:38अच्छा।
- 41:39उन्होंने इसमें सामाजिक नियम, उपदेश और
- 41:41धर्म की बातें जोड़ दी।
- 41:42इसीलिए महाभारत के दो हिस्से माने जाते
- 41:44हैं। है ना?
- 41:45हां। इतिहासकार इसके कंटेंट को दो हिस्सों
- 41:48में बांटते हैं। एक है आख्यान यानी
- 41:50कहानियों वाला हिस्सा और दूसरा है
- 41:52उपदेशात्मक।
- 41:53उपदेशात्मक मतलब जिसमें सोशल नॉर्म्स और
- 41:56शिक्षा दी गई हो।
- 41:57बिल्कुल। जिसका सबसे अच्छा उदाहरण भगवत
- 42:00गीता है और यह लिखने की प्रक्रिया लगभग
- 42:021000 साल तक चलती रही।
- 42:041000 साल तो यह ग्रंथ एक सिंगल ऑथर की
- 42:07रचना नहीं बल्कि कई पीढ़ियों का मिलाजुला
- 42:10काम है।
- 42:10सही पकड़ा।
- 42:11यह तो कमाल की बात है। लेकिन क्या हमें
- 42:14जमीन पर मतलब पुरातत्व या आर्कियोलॉजी से
- 42:18भी कुछ सबूत मिलते हैं। महाभारत में
- 42:20हस्तिनापुर जैसे भव्य शहर का जिक्र है।
- 42:22हम्म।
- 42:23क्या वो सच में मौजूद था?
- 42:25यहां पर कहानी एक और दिलचस्प मोड़ लेती
- 42:27है। पुरातत्ववेत्ता बीबी लाल ने मेरठ के
- 42:30पास हस्तिनापुर नाम के एक गांव में खुदाई
- 42:32की।
- 42:32अच्छा तो क्या मिला वहां?
- 42:34उन्हें वहां आबादी के कई स्तर मिले।
- 42:36जिनमें से एक स्तर उस काल का हो सकता है
- 42:39जिसकी चर्चा महाभारत में है।
- 42:40तो क्या उन्हें वहां बड़े-बड़े महल मिले?
- 42:42नहीं। उन्हें वहां कच्ची मिट्टी की
- 42:44दीवारें और सरकंडे के बने घर मिले।
- 42:47क्या?
- 42:47घरों की बनावट बहुत साधारण थी। यह महाभारत
- 42:51में बताए गए हस्तिनापुर के भव्य और आलीशान
- 42:54चित्रण से बिल्कुल भी मेल नहीं खाता।
- 42:56एक मिनट। तो आप यह कह रहे हैं कि जिस भव्य
- 42:59राजधानी के लिए इतनी बड़ी लड़ाई लड़ी गई
- 43:01वह असल में शायद एक साधारण सा गांव था।
- 43:04पुरातात्विक सबूत तो यही इशारा करते हैं।
- 43:07यह दिखाता है कि साहित्यिक वर्णन और जमीनी
- 43:09हकीकत में कितना बड़ा अंतर हो सकता है।
- 43:12हो सकता है कि कहानी का काव्यात्मक वर्णन
- 43:14बहुत बढ़ा चढ़ाकर किया गया हो।
- 43:16बिल्कुल। यह फिर से वही बात साबित करता
- 43:18है। ग्रंथों में लिखे आदर्श और जमीन पर
- 43:21मौजूद वास्तविकता के बीच का फासला। तो
- 43:24इसका मतलब यह है कि महाभारत को एक लिटरल
- 43:27हिस्ट्री बुक की तरह नहीं पढ़ा जा सकता।
- 43:29नहीं पढ़ा जा सकता। यह एक कहानी है, एक
- 43:32महाकाव्य है जो हमें उस समय के समाज की
- 43:35चिंताओं, उसके आदर्शों और उसकी सच्चाइयों
- 43:38की एक झलक देता है।
- 43:40और यह एक गतिशील ग्रंथ है। पीके से समझा
- 43:43और उसकी पुनर्व्याख्या की। और यह सिलसिला
- 43:46आज भी जारी है। हम
- 43:47यह हमें सिखाता है कि इतिहास सिर्फ तथ्यों
- 43:49का संग्रह नहीं है बल्कि इस बात की भी
- 43:52पड़ताल है कि समाज अपने नियम कैसे बनाता
- 43:54है। उन पर कैसे सवाल उठाता है और समय के
- 43:57साथ कैसे बदलता है।
- 43:59अध्याय तीन बंधुत्व, जाति तथा वर्ग समाप्त
- 44:04हुआ।
- 44:07हम एनसीआरटी इतिहास की किताब के बहुत ही
- 44:10दिलचस्प अध्याय में उतर रहे हैं।
- 44:12हां। हां
- 44:12विचारक, विश्वास और इमारतें।
- 44:15हां।
- 44:15ये अध्याय हमें 1000 साल के लंबे सफर पर
- 44:18ले जाता है। करीब 600 ईसा पूर्व से 600
- 44:21ईसवी तक।
- 44:22बिल्कुल। और यह वो दौर था जब भारत में आप
- 44:25कह सकते हैं विचारों का एक तूफान सा आ गया
- 44:28था।
- 44:28हां। यह सिर्फ राजाओं और साम्राज्यों का
- 44:31इतिहास नहीं है।
- 44:32नहीं बिल्कुल नहीं। यह समझने की कोशिश है
- 44:34कि उस जमाने के लोग खासकर बुद्ध और महावीर
- 44:38जैसे महान विचारक जिंदगी को दुनिया को
- 44:41कैसे देखते थे।
- 44:42और उनके ये गहरे विचार सिर्फ मतलब किताबों
- 44:44में नहीं है?
- 44:45नहीं वो पत्थर की इमारतों और मूर्तियों
- 44:47में भी जिंदा है।
- 44:48और इन सबको समझने के लिए हमारे पास एक
- 44:50शानदार गाइड है सांची का स्तूप।
- 44:52हां, हम इसी स्तूप के इर्द-गिर्द घूमते
- 44:55हुए उस दौर के विश्वासों और उनकी कला को
- 44:57समझने की कोशिश करेंगे। तो चलिए इस
- 45:00वैचारिक क्रांति के दौर में चलते हैं जहां
- 45:03सोच को पत्थर में ढाला जा रहा था। [हंसी]
- 45:07तो शुरुआत सांची से ही करते हैं।
- 45:08हम एक बात मुझे हमेशा हैरान करती है।
- 45:11क्या?
- 45:12कि सांची का स्तूप आज भी इतनी अच्छी हालत
- 45:14में खड़ा है, जबकि उसी दौर का अमरावती का
- 45:18स्तूप लगभग खत्म हो चुका है।
- 45:20ऐसा क्यों?
- 45:21क्या सांची की सिर्फ किस्मत अच्छी थी? हम
- 45:23किस्मत तो थी लेकिन साथ में कुछ लोगों की
- 45:26सूझ-बूझ और दूरदृष्टि भी थी।
- 45:29अच्छा
- 45:29देखिए 19वीं सदी में यूरोप के लोगों में
- 45:33भारतीय कलाकृतियों को अपने देश ले जाने की
- 45:36एक होड़ सी लगी थी। फ्रांसीसी और अंग्रेज
- 45:39दोनों की नजर सांची के सबसे खूबसूरत
- 45:42पूर्वी तोरण द्वार पर थी।
- 45:43ओहो
- 45:44दोनों ने उसे अपने म्यूजियम में ले जाने
- 45:46की इजाजत मांगी। मतलब अगर इजाजत मिल जाती
- 45:49तो आज सांची का वो मशहूर गेटवे शायद लंदन
- 45:52या पेरिस में होता।
- 45:53हां बिल्कुल हो सकता था।
- 45:55तो फिर यह बचा कैसे? ये तो यह तो कमाल की
- 45:58बात है।
- 45:58इसका पूरा श्रेय देखिए भोपाल की दो बेगमों
- 46:01को जाता है। शाहजहां बेगम और उनकी
- 46:04उत्तराधिकारी सुल्तानजहां बेगम।
- 46:06उन्होंने क्या किया?
- 46:07उन्होंने बहुत ही क्या कहते हैं?
- 46:10चतुरकूटनीतिक रास्ता निकाला। उन्होंने
- 46:13यूरोपियों को असली तोरण द्वार की हूबहू
- 46:16नकल यानी प्लास्टर से बनी प्रतिकृतियां
- 46:18प्लास्टर कास्ट कॉपीज देकर मना लिया।
- 46:21अरे वाह!
- 46:21और वो उन प्रतियों से इतने खुश हो गए कि
- 46:24उन्होंने असली को ले जाने की जिद ही छोड़
- 46:26दी।
- 46:26ये तो किसी भी राष्ट्रीय संरक्षण नीति से
- 46:28बेहतर काम था। मतलब एक चालाक और समझदारी
- 46:31भरे फैसले ने हमारी एक अनमोल धरोहर को बचा
- 46:33लिया।
- 46:33बिल्कुल। यह स्थानीय नेतृत्व का एक
- 46:36बेहतरीन उदाहरण है। इन बेगमों ने सिर्फ
- 46:38इसे बचाया ही नहीं बल्कि इसके रखरखाव और
- 46:40यहां एक म्यूजियम और गेस्ट हाउस बनाने के
- 46:42लिए पैसा भी दिया।
- 46:43और अमरावती के साथ ऐसा कोई नहीं था।
- 46:45कोई नहीं था। इसलिए उसकी कलाकृतियां और
- 46:48पत्थर देश-विदेश के अलग-अलग म्यूजियम में
- 46:50पहुंच गए और वह जगह वीरान हो गई।
- 46:52तो अब उस दौर की पृष्ठभूमि पर आते हैं
- 46:55जहां यह नए विचार पनप रहे थे। बुद्ध और
- 46:57महावीर के आने से पहले का माहौल कैसा था?
- 47:00लोग क्या सोचते थे? किस पर विश्वास करते
- 47:02थे?
- 47:02देखिए ईसा पूर्व पहली सहस्राब्दी जिसे हम
- 47:06फर्स्ट मिलेनियम बीसीई भी कहते हैं।
- 47:09वो वो पूरी दुनिया में एक वैचारिक
- 47:12उथल-पुथल का दौर था।
- 47:14अच्छा। हां
- 47:14भारत में इससे पहले वैदिक परंपरा थी जिसका
- 47:18आधार ऋग्वेद जैसे ग्रंथ थे। इसमें इंद्र,
- 47:22अग्नि, सोम जैसे देवताओं की पूजा होती थी
- 47:24और और यज्ञों का बहुत महत्व था।
- 47:27यज्ञ मतलब सैक्रिफाइसेस
- 47:29यज्ञ बहुत बड़े पैमाने पर होते थे। जिनमें
- 47:31जानवरों की बलि भी दी जाती थी।
- 47:33ये बहुत खर्चीले और जटिल कर्मकांड थे।
- 47:37तो क्या इन्हीं जटिल कर्मकांडों के खिलाफ
- 47:39एक प्रतिक्रिया के तौर पर नए विचार सामने
- 47:41आए? मतलब लोग कुछ नया क्यों खोज रहे थे?
- 47:44आप सही कह रहे हैं। एक तबका था जो इन
- 47:47यज्ञों के औचित्य पर सवाल उठा रहा था।
- 47:49गंगा घाटी के इलाके में खासकर उपनिषदों
- 47:52में हमें इस नई सोच की झलक मिलती है।
- 47:55उपनिषद
- 47:55हां। विचारक अब बाहरी कर्मकांडों से हटकर
- 47:59कुछ गहरे सवालों में उलझे थे। जीवन का
- 48:02असली मतलब क्या है? मरने के बाद क्या होता
- 48:04है? क्या पुनर्जन्म होता है? यह सवाल किसी
- 48:07यज्ञ से हल नहीं हो सकते थे। और इन सवालों
- 48:11पर चर्चा कहां होती थी? कोई खास जगह?
- 48:13यह चर्चाएं अक्सर कुटागारशाला में होती
- 48:16थी।
- 48:17कुटागारशाला?
- 48:18हां, यह एक तरह की झोपड़ी होती थी जिसकी
- 48:21छत नुकीली होती थी। यहां अलग-अलग
- 48:23विचारधाराओं के दार्शनिक और विचारक रुकते
- 48:26थे और घंटों तक बहस करते थे।
- 48:28बड़ा खुला माहौल रहा होगा।
- 48:30बहुत। अगर कोई किसी को अपनी दलीलों से हरा
- 48:33देता था, तो वह अपने अनुयायियों के साथ
- 48:36उसका शिष्य बन जाता था। इसी बौद्धिक माहौल
- 48:39में जैन और बौद्ध धर्म जैसी परंपराओं का
- 48:42उदय हुआ।
- 48:43चलिए तो पहले जैन धर्म की बात करते हैं।
- 48:45महावीर तो 24वें तीर्थंकर थे। है ना?
- 48:48जी हां।
- 48:49इसका मतलब यह परंपरा उनसे भी बहुत पुरानी
- 48:51थी।
- 48:52जी हां। जैन परंपरा मानती है कि महावीर से
- 48:55पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे। तीर्थंकर का
- 48:59मतलब है वह गुरु जो लोगों को जीवन मृत्यु
- 49:02के चक्र यानी संसार रूपी नदी के पार ले
- 49:05जाते हैं। महावीर ने सिर्फ पहले से मौजूद
- 49:08विचारों को एक व्यवस्थित रूप दिया।
- 49:11तो जैन दर्शन का सबसे
- 49:14केंद्रीय विचार क्या है? मतलब ऐसी क्या
- 49:17चीज है जो उसे बाकी सबसे अलग करती है?
- 49:19उसका सबसे अनूठा और आप कह सकते हैं
- 49:22बुनियादी सिद्धांत यह है कि कि पूरी
- 49:25दुनिया प्राणवान है।
- 49:26प्राणवान मतलब हर चीज में जीवन है।
- 49:29हां हर चीज में सिर्फ इंसान और जानवर ही
- 49:32नहीं बल्कि पत्थर, चट्टान यहां तक कि पानी
- 49:36में भी जीवन होता है। यह एक बहुत गहरी सोच
- 49:39है।
- 49:40और इसी सोच से उनका सबसे महत्वपूर्ण
- 49:41सिद्धांत निकलता है अहिंसा।
- 49:43बिल्कुल नॉन वायलेंस। किसी भी जीव को चोट
- 49:46ना पहुंचाना। इसका मतलब जैन धर्म में
- 49:48अहिंसा सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है।
- 49:50नहीं बिल्कुल नहीं। यह पेड़-पौधों,
- 49:52कीड़े-मकोड़ों तक फैली हुई है। इसी वजह से
- 49:55जैन साधु साध्वी बहुत कठोर नियमों का पालन
- 49:59करते हैं ताकि अनजाने में भी किसी छोटे से
- 50:02छोटे जीव की हत्या ना हो।
- 50:03समझ गया।
- 50:04वे मानते हैं कि जन्म और पुनर्जन्म का जो
- 50:07चक्र है, वह हमारे कर्मों से चलता है। और
- 50:10इस कर्म के बंधन से छुटकारा पाने का एक ही
- 50:13रास्ता है त्याग और तपस्या। तो क्या मोक्ष
- 50:16के लिए संसार छोड़ना जरूरी है?
- 50:18हां, जैन मान्यता के अनुसार कर्म के चक्र
- 50:21से पूरी तरह मुक्ति तभी मिलती है जब
- 50:23व्यक्ति संसार का त्याग कर दे। इसीलिए
- 50:26विहारों में रहना मतलब एक सन्यासी का जीवन
- 50:28जीना अनिवार्य माना गया।
- 50:30और इसके लिए कुछ व्रत भी लेने पड़ते हां,
- 50:32पांच व्रत हत्या ना करना, चोरी ना करना,
- 50:36झूठ ना बोलना, ब्रह्मचर्य का पालन करना और
- 50:39धन का संग्रह ना करना जिसे अपरिग्रह कहते
- 50:42हैं।
- 50:43तो एक तरफ जैन धर्म का यह कठोर तपस्या का
- 50:46मार्ग था। लेकिन इसी दौर में एक और विचारक
- 50:49थे जो जीवन के दुखों का एक अलग समाधान
- 50:52सुझा रहे थे। सिद्धार्थ गौतम जो बाद में
- 50:54बुद्ध बने।
- 50:55सही। और उनकी कहानी बिल्कुल अलग है। वे एक
- 50:58राजकुमार थे जिन्हें दुनिया के हर सुख में
- 51:01पाला गया था। हां बिल्कुल।
- 51:02लेकिन एक दिन शहर में घूमते हुए उन्होंने
- 51:05चार चीजें देखी। एक बूढ़ा आदमी, एक बीमार
- 51:07आदमी, एक लाश और एक एक खुशहाल सन्यासी।
- 51:11और इन दृश्यों ने उन्हें हिला कर रख दिया।
- 51:13बिल्कुल उन्हें एहसास हुआ कि सुख और जवानी
- 51:16तो अस्थाई है। असली सच तो बुढ़ापा, बीमारी
- 51:19और मौत है। और यहीं से उनकी खोज शुरू हुई।
- 51:22उन्होंने महल छोड़ दिया।
- 51:23हां, सच की तलाश में निकल पड़े। उन्होंने
- 51:26बहुत कठोर तपस्या की। शरीर को बहुत कष्ट
- 51:30दिया लेकिन उन्हें जवाब नहीं मिला।
- 51:32आखिरकार बिहार के बोधगया में एक पीपल के
- 51:36पेड़ के नीचे ध्यान करते हुए उन्हें ज्ञान
- 51:38प्राप्त हुआ और तब वे बुद्धा कहलाए।
- 51:41यानी द एनलाइट वन
- 51:43हां जिसे ज्ञान मिल गया हो।
- 51:45तो ज्ञान प्राप्त करने के बाद उनकी मुख्य
- 51:48शिक्षा क्या थी? उन्होंने दुनिया को दुखों
- 51:50से निकलने का क्या रास्ता दिखाया? बुद्ध
- 51:52ने जो रास्ता दिखाया, वह जैन धर्म की कठोर
- 51:54तपस्या और आम दुनिया की सुख सुविधाओं में
- 51:57डूबने के बीच का रास्ता था।
- 52:00इसे मध्यम मार्ग या मिडिल पाथ कहा गया।
- 52:04उनका कहना था कि दुनिया लगातार बदल रही
- 52:07है। यहां कुछ भी स्थाई नहीं है। इसलिए
- 52:10किसी भी चीज से बहुत ज्यादा जुड़ाव ही दुख
- 52:13का कारण है।
- 52:13और उन्होंने आत्मा के बारे में भी कुछ कहा
- 52:15था।
- 52:15हां। उन्होंने कहा कि यहां कोई स्थाई
- 52:18आत्मा नहीं है। सब कुछ अनित्य और अनात्म
- 52:22है।
- 52:22यह अनात्म की बात तो उस समय की आत्मा
- 52:24परमात्मा की अवधारणाओं से बहुत अलग रही
- 52:26होगी। है ना?
- 52:26बहुत अलग और क्रांतिकारी थी। बुद्ध ने
- 52:30ईश्वर के होने या ना होने के सवाल को भी
- 52:33अप्रसंगिक माना।
- 52:34अच्छा।
- 52:34उनका कहना था कि यह समाज इंसानों ने बनाया
- 52:37है। ईश्वर ने नहीं। इसलिए दुनिया को बेहतर
- 52:40बनाने की जिम्मेदारी भी इंसानों की है।
- 52:43यह तो बहुत बड़ी बात है।
- 52:44उनकी सबसे बड़ी शिक्षा उनके आखिरी शब्दों
- 52:46में छिपी है। जब उन्होंने अपने शिष्यों से
- 52:49कहा तुम सब अपने लिए खुद ही रोशनी बनो
- 52:52क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का
- 52:54रास्ता ढूंढना है।
- 52:56किसी पुजारी या भगवान पर निर्भर होने के
- 52:58बजाय उन्होंने जिम्मेदारी व्यक्ति के अपने
- 53:00कंधों पर डाल दी।
- 53:02यही उनकी शिक्षा का सार था आत्मज्ञान और
- 53:05विवेक। बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं को फैलाने
- 53:07के लिए संघ की स्थापना की। इसमें कौन लोग
- 53:10शामिल हुए और यह कैसे काम करता था?
- 53:12बुद्ध ने धम्म के शिक्षकों का एक संगठन
- 53:15बनाया जिसे संघ या संघा कहा गया। इसमें
- 53:19भिकु और भिकुनिया रहते थे। वो बहुत सादा
- 53:22जीवन जीते थे और भिक्षा पर निर्भर रहते
- 53:25थे।
- 53:25और इसमें कोई भी शामिल हो सकता था।
- 53:27हां, यही इसकी सबसे खास बात थी। संघ में
- 53:31हर किसी के लिए दरवाजे खुले थे। राजा हो
- 53:34या गरीब ऊंची जाति का हो या नीची जाति का
- 53:38दास हो या शिल्पती संघ में आने के बाद सब
- 53:41बराबर हो जाते थे। उनकी पुरानी पहचान मिट
- 53:45जाती थी।
- 53:45यह तो उस जमाने के हिसाब से एक बहुत बड़ी
- 53:48सामाजिक क्रांति रही होगी।
- 53:49निश्चित रूप से यह एक तरह का वैकल्पिक
- 53:52समाज था। जहां योग्यता जन्म से नहीं बल्कि
- 53:56आचरण से तय होती थी।
- 53:57एक सवाल मन में आता है। क्या महिलाओं को
- 54:00भी संघ में आने की अनुमति थी? देखिए यह एक
- 54:02दिलचस्प बात है। शुरू में बुद्ध महिलाओं
- 54:06को संघ में शामिल करने के पक्ष में नहीं
- 54:08थे।
- 54:08अच्छा ऐसा क्यों?
- 54:09शायद उन्हें डर था कि इससे संघ का अनुशासन
- 54:12बिगड़ जाएगा लेकिन उनके सबसे प्रिय शिष्य
- 54:15आनंद ने उन्हें बहुत समझाया।
- 54:17आनंद के कहने पर माने वो।
- 54:19हां, आनंद के कहने पर ही बुद्ध राजी हुए।
- 54:22और संघ में शामिल होने वाली पहली महिला
- 54:24उनकी अपनी उपमाता महाप्रजापति गौतमी थी।
- 54:28और संघ में आने के बाद महिलाओं की क्या
- 54:30भूमिका रही? कई महिलाएं बहुत बड़ी विदुषी
- 54:33और उपदेशिकाएं बनी। उन्हें थ्यरी का दर्जा
- 54:36दिया गया।
- 54:37थरी।
- 54:37हां। थरी का मतलब है ऐसी सम्मानित महिलाएं
- 54:42जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो।
- 54:44उनकी लिखी हुई कविताएं आज भी बौद्ध
- 54:47साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
- 54:49अब आते हैं उन इमारतों पर जिन्होंने इन
- 54:51विश्वासों को सदियों तक जिंदा रखा। यानी
- 54:53स्तूप। स्तूप बनाए क्यों जाते थे? इनका
- 54:56क्या महत्व था? देखिए बौद्ध परंपरा में
- 54:58कुछ जगहों को बहुत पवित्र माना जाता था।
- 55:01जैसे लुंबिनी जहां बुद्ध का जन्म हुआ।
- 55:04बोधग गया जहां उन्हें ज्ञान मिला।
- 55:07सारनाथ और कुशीनगर?
- 55:08हां। लेकिन धीरे-धीरे कुछ और जगहों को भी
- 55:11पवित्र माना जाने लगा। यह वो जगहें थी
- 55:14जहां बुद्ध के अवशेष जैसे उनकी अस्थियां
- 55:17या उनके इस्तेमाल की चीजें एक टीले के
- 55:20नीचे गाड़ दी गई थी। इन्हीं टीों को स्तूप
- 55:23कहा गया।
- 55:24अच्छा। तो अगर मैं आज से 2000 साल पहले
- 55:27किसी स्तूप को देखने जाता तो मुझे क्या
- 55:29नजर आता? आप मुझे उस अनुभव से रूबरू करा
- 55:32सकती हैं?
- 55:32जरूर। तो सोचिए सबसे पहले आपको दूर से एक
- 55:36मिट्टी का विशाल अर्ध गोलाकार टीला दिखाई
- 55:40देगा जिसे अंड कहते हैं।
- 55:42अंड
- 55:43हां। यह शांति का ब्रह्मांड का प्रतीक है।
- 55:47जैसे ही आप पास पहुंचते आपको एक पत्थर की
- 55:50बाढ़ यानी वेदिका मिलती। यह वेदिका पवित्र
- 55:54जगह को आम दुनिया से अलग करती थी
- 55:57और अंदर जाने के लिए
- 55:58अंदर जाने के लिए चारों दिशाओं में
- 56:00बड़े-बड़े खूबसूरती से सजे हुए दरवाजे
- 56:03होते थे जिन्हें तोरण द्वार कहते हैं।
- 56:07सांची के तोरण द्वार तो अपनी मूर्तिकला के
- 56:09लिए मशहूर है।
- 56:10हां वो तो है।
- 56:11अंड के ठीक ऊपर एक चौकोर छज्जे जैसी बनावट
- 56:15होती जिसे हरर्मिका कहते हैं। यह देवताओं
- 56:18का निवास मानी जाती थी। और उसी हरर्मिका
- 56:21के बीच से एक मस्त निकलता था जिसे यष्टि
- 56:25कहते हैं। जिस पर सम्मान के प्रतीक के तौर
- 56:28पर एक छतरी लगी होती थी।
- 56:30और श्रद्धालु इसकी परिक्रमा करते थे।
- 56:32बिल्कुल।
- 56:33इन विशाल स्तूपों को बनाने के लिए पैसा
- 56:35कहां से आता था? क्या यह सिर्फ राजा
- 56:36महाराजा बनवाते थे?
- 56:38इन्हें बनाने में राजाओं के साथ-साथ
- 56:41व्यापारियों, शिल्पकारों और यहां तक के आम
- 56:44स्त्री पुरुषों ने भी दान दिया था।
- 56:46अच्छा। जैसे सांची के एक तोरण द्वार का
- 56:50हिस्सा हाथी दांत का काम करने वाले
- 56:52कारीगरों ने बनवाया था। यह एक तरह का
- 56:55सामूहिक प्रोजेक्ट था।
- 56:57इन स्तूपों पर जो मूर्तियां हैं वो क्या
- 56:59दिखाती हैं? क्या उनमें बुद्ध की कहानियां
- 57:02हैं? हां, उनमें बुद्ध के जीवन से जुड़ी
- 57:05घटनाएं और जातक कथाएं हैं जो उनके पिछले
- 57:08जन्मों की कहानियां हैं। लेकिन एक बहुत ही
- 57:11रोचक बात है। शुरुआती कला में बुद्ध को
- 57:14कभी भी इंसान के रूप में नहीं दिखाया गया।
- 57:17क्या मतलब? बुद्ध की मूर्ति नहीं होती थी।
- 57:20तो उन्हें कैसे दर्शाया जाता था?
- 57:21प्रतीकों के जरिए, सिंबल्स के जरिए।
- 57:24जैसे?
- 57:24जैसे अगर उन्हें ध्यान करते हुए दिखाना
- 57:27होता, तो एक खाली सिंहासन बना दिया जाता।
- 57:31उनके पहले उपदेश को दिखाने के लिए एक चक्र
- 57:34यानी पहिया बना होता था और उनके
- 57:37महापरिनिबाण यानी निधन का प्रतीक खुद
- 57:41स्तूप ही था।
- 57:42यह तो बहुत दिलचस्प है।
- 57:43शायद उस समय कलाकार उन्हें मानवीय रूप
- 57:46देने में हिचकिचाते थे क्योंकि वे उन्हें
- 57:48एक अलौकिक शक्ति मानते थे।
- 57:50तो फिर बुद्ध की मूर्तियां बननी कब शुरू
- 57:52हुई? क्योंकि पहले तो आप कह रही थी कि
- 57:53उन्हें सिर्फ प्रतीकों से दिखाते थे।
- 57:55बिल्कुल। यह बदलाव आया समय के साथ। बौद्ध
- 57:59धर्म में एक नई धारा का विकास हुआ जिसे
- 58:02महायान कहते हैं। इस नई सोच में बुद्ध को
- 58:06एक उद्धारकर्ता एक मुक्तिदाता के रूप में
- 58:09देखा जाने लगा। अब वे सिर्फ एक शिक्षक
- 58:11नहीं थे बल्कि एक देवता समान थे।
- 58:14और इसी के साथ बोधिसत्व की अवधारणा भी
- 58:16सामने आई।
- 58:17सही कहा।
- 58:18यह बोधिसत्व कौन थे?
- 58:19बोधिसत्व वे लोग थे जो ज्ञान प्राप्त करने
- 58:22के बहुत करीब पहुंच चुके थे। लेकिन वे
- 58:25निर्वाण प्राप्त नहीं करते थे।
- 58:27क्यों? वे करुणा के कारण दुनिया में ही
- 58:30रहकर दूसरे लोगों की मदद करने का फैसला
- 58:32करते थे। यह बहुत ही दयालु और परोपकारी
- 58:35विचार था। इसी महायान परंपरा में बुद्ध और
- 58:38बोधिसत्वों की मूर्तियां बनाकर उनकी पूजा
- 58:41शुरू हुई।
- 58:42क्या ऐसा ही कोई बदलाव हिंदू धर्म में भी
- 58:44आ रहा था?
- 58:44हां बिल्कुल। उसी दौर में पौराणिक हिंदू
- 58:48धर्म का भी उदय हो रहा था। इसमें विष्णु
- 58:50को मानने वाले वैष्णव और शिव को मानने
- 58:53वाले शिव यह दो प्रमुख धाराएं थी। और यहां
- 58:56अवतारवाद का विचार बहुत लोकप्रिय हुआ।
- 58:58बिल्कुल यह माना जाने लगा कि जब भी धरती
- 59:01पर पाप बढ़ता है तो विष्णु दुनिया को
- 59:04बचाने के लिए अलग-अलग अवतार लेते हैं। इन
- 59:07अवतारों की कहानियां पुराणों में लिखी गई
- 59:09और उनकी मूर्तियां बनाकर पूजा होने लगी।
- 59:12तो अब मूर्तियां रखने के लिए पूजा की एक
- 59:14नई जगह की जरूरत पड़ी होगी। क्या यहीं से
- 59:17मंदिरों का विकास हुआ?
- 59:18एकदम सही। अब देवी देवताओं की मूर्तियों
- 59:21के लिए मंदिर बनाए जाने लगे। शुरू में
- 59:23मंदिर एक छोटा चौकोर कमरा होता था, जिसे
- 59:26गर्भ गृह कहते थे, जहां मूर्ति रखी जाती
- 59:29थी।
- 59:30और फिर धीरे-धीरे
- 59:31फिर धीरे-धीरे गर्भ गृह के ऊपर एक ऊंचा
- 59:34ढांचा बनने लगा जिसे हम शिखर कहते हैं।
- 59:37मंदिरों में बड़े-बड़े हॉल और भव्य
- 59:40दीवारें भी बनने लगी।
- 59:41इसका कोई बेहतरीन उदाहरण?
- 59:42महाराष्ट्र का कैलाशनाथ मंदिर। यह कोई ईंट
- 59:45पत्थर से बना मंदिर नहीं है।
- 59:47हां। यह एक पूरी की पूरी विशाल चट्टान को
- 59:51ऊपर से नीचे की ओर तराश कर बनाया गया है।
- 59:54यह उस दौर के कारीगरों के हुनर और उनकी
- 59:58आस्था का एक ऐसा सबूत है जिसे देखकर आज भी
- 1:00:02यकीन करना मुश्किल होता है।
- 1:00:04तो इस पूरी चर्चा में हमने एक तरह से 1000
- 1:00:06साल के सांस्कृतिक इतिहास का सफर तय किया
- 1:00:08है।
- 1:00:09हां।
- 1:00:09हमने देखा कि कैसे यज्ञों की परंपरा पर
- 1:00:11सवाल उठे और जीवन के अर्थ को लेकर नए
- 1:00:13दर्शन पैदा हुए। जैन और बौद्ध धर्म ने
- 1:00:16अहिंसा और मध्यम मार्ग जैसे विचार दिए
- 1:00:18और हमने यह भी देखा कि यह विचार सिर्फ
- 1:00:20किताबों तक सीमित नहीं रहे। इन्हें पत्थर
- 1:00:22में उतारा गया। स्तूपों और मंदिरों की
- 1:00:25शक्ल दी गई।
- 1:00:26कला, वास्तुकला और विश्वास सब एक दूसरे
- 1:00:29में घुल मिल गए।
- 1:00:30बिल्कुल उन्हें अलग करना मुश्किल है।
- 1:00:32ये सब जानने के बाद एक ख्याल मन में आता
- 1:00:34है। सांची जैसी जो कुछ जगह बच गई हैं वे
- 1:00:37तो उस दौर में जो कुछ भी बनाया गया होगा
- 1:00:38उसका एक छोटा सा हिस्सा भर है। है ना?
- 1:00:40हां बिल्कुल। ना जाने कितनी इमारतें,
- 1:00:43कितनी मूर्तियां और कितनी कलाकृतियां समय
- 1:00:46की वजह से या तोड़फोड़ के कारण हमेशा के
- 1:00:49लिए नष्ट हो गई। हम जो भी जानते हैं उस
- 1:00:51शानदार अतीत की बस एक झलक मात्र है।
- 1:00:54अध्याय चार विचारक विश्वास और इमारतें
- 1:00:58समाप्त हुआ।
- 1:01:01आज हम समय में थोड़ा पीछे जा रहे हैं। उस
- 1:01:04दौर में जब दुनिया आज जितनी जुड़ी हुई
- 1:01:08नहीं थी। हम्
- 1:01:09हम मध्यकालीन भारत को तीन बहुत ही अलग-अलग
- 1:01:12लोगों की नजरों से देखने की कोशिश करेंगे।
- 1:01:15हम्
- 1:01:15मतलब वो लोग जो हज़ारों मील का सफर तय करके
- 1:01:18यहां पहुंचे थे।
- 1:01:19और ये तीनों नजरिए एक दूसरे से बहुत अलग
- 1:01:21हैं।
- 1:01:22हां। हमारे पास उज्बेकिस्तान से आए एक
- 1:01:25विद्वान हैं।
- 1:01:26मोरक्को से एक आप कह सकते हैं दिलेर
- 1:01:29घुमक्कड़ और फ्रांस से एक आलोचक चिकित्सक।
- 1:01:33बिल्कुल। और इस चर्चा का मकसद सिर्फ यह
- 1:01:35जानना नहीं है कि उन्होंने क्या देखा
- 1:01:37बल्कि यह समझना है कि किसी बाहरी व्यक्ति
- 1:01:40की नजर हमें अपने ही समाज के बारे में
- 1:01:42क्या नया सिखा सकती है।
- 1:01:44सही बात है क्योंकि जब भी कोई यात्री कहीं
- 1:01:46जाता है तो वह अपने साथ अपनी पूरी दुनिया
- 1:01:49अपनी मान्यताएं सब कुछ लेकर आता है। है
- 1:01:51ना?
- 1:01:51हां। और आज हम इन्हीं तीन यात्रियों
- 1:01:54अलबरूनी, इब्नबतूता और फ्रांसुआ बर्नियर
- 1:01:57के वृतांतों से यह समझेंगे कि सदियों पहले
- 1:02:00का भारत इन बाहरी लोगों को कैसा दिखता था।
- 1:02:03तो चलिए सबसे पहले उस इंसान से शुरू करते
- 1:02:06हैं जो भारत को समझने के लिए मतलब पूरी
- 1:02:09तरह से किताबों और ज्ञान की दुनिया में
- 1:02:11उतर गया। 11वीं सदी के अलबेरूनी। अलबरूनी
- 1:02:15की कहानी ही अपने आप में असाधारण है। वो
- 1:02:18आज के उज़्बेकिस्तान के ख्वारिज में 973
- 1:02:21में पैदा हुए थे। और ख्वारिज्म उस समय
- 1:02:23ज्ञान का एक बहुत बड़ा केंद्र था।
- 1:02:25वो कई भाषाएं जानते थे। सीरियाई, फारसी,
- 1:02:28हब्रू। लेकिन उनकी जिंदगी तब पूरी तरह बदल
- 1:02:31गई जब 2017 में सुल्तान महमूद गजनवी ने
- 1:02:35ख्वािज्म पर हमला किया।
- 1:02:36और वह उन्हें अपने साथ गजनी ले गया एक
- 1:02:39बंधक के तौर पर।
- 1:02:40जी। और सोचिए एक बंधक के तौर पर गजनी
- 1:02:43पहुंचना और वहां से भारत के प्रति इतनी
- 1:02:46गहरी रुचि विकसित करना यह अपने आप में
- 1:02:48कमाल है।
- 1:02:49और भारत आने के बाद उन्होंने संस्कृत सीखी
- 1:02:52जो उस जमाने में किसी बाहरी व्यक्ति के
- 1:02:55लिए लगभग नामुमकिन ही माना जाता था।
- 1:02:57बिल्कुल और यही उनकी खासियत थी। वो सिर्फ
- 1:03:00एक यात्री नहीं थे। वो एक एक विद्वान थे
- 1:03:03जो चीजों की तह तक जाना चाहते थे।
- 1:03:05इसी कोशिश का नतीजा थी उनकी किताब किताबुल
- 1:03:08हिंद।
- 1:03:09हां। और यह कोई आम यात्रा वृतांत नहीं है।
- 1:03:12यह तो भारत पर लिखा एक विश्वकोष जैसा है।
- 1:03:15मतलब इसमें उन्होंने धर्म, दर्शन,
- 1:03:17विज्ञान, रीति-रिवाज हर चीज को एक बहुत ही
- 1:03:20व्यवस्थित तरीके से समझाया है।
- 1:03:22उनका तरीका भी तो बहुत अनोखा था।
- 1:03:24हां।
- 1:03:24हर अध्याय एक सवाल से शुरू होता है। फिर
- 1:03:27वो संस्कृत की परंपराओं के आधार पर उसका
- 1:03:29वर्णन करते हैं और आखिर में
- 1:03:31आखिर में उसकी तुलना दूसरी संस्कृतियों से
- 1:03:34करते हैं।
- 1:03:34यह तो आज के रिसर्च पेपर जैसा स्ट्रक्चर
- 1:03:36है।
- 1:03:36हां, वो अपने समय से बहुत आगे थे। लेकिन
- 1:03:39उनके लिए यह सब आसान बिल्कुल नहीं था।
- 1:03:41सबसे बड़ी चुनौती तो भाषा ही थी।
- 1:03:44संस्कृत।
- 1:03:45जी। उन्होंने खुद लिखा है कि संस्कृत
- 1:03:48अरेबी और फारसी से इतनी अलग है कि एक भाषा
- 1:03:51से दूसरी में अनुवाद करना बहुत ही मुश्किल
- 1:03:53काम है।
- 1:03:54तो इस दीवार को उन्होंने कैसे लांघा?
- 1:03:56उन्होंने ब्राह्मण विद्वानों के साथ सालों
- 1:03:58बिताए। उनसे सीखा और वेदों, पुराणों, भगवत
- 1:04:01गीता और मनुस्मृति जैसे ग्रंथों का अध्ययन
- 1:04:04किया। और इन्हीं ग्रंथों के आधार पर
- 1:04:06उन्होंने भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था का
- 1:04:09जिक्र किया। चार वर्ग ब्राह्मण, क्षत्रिय,
- 1:04:13वैश्य और शूद्र।
- 1:04:14हां, उन्होंने ग्रंथों में जो लिखा था उसे
- 1:04:16जस का तस बयान कर दिया। लेकिन यहां एक
- 1:04:19बहुत दिलचस्प बात सामने आती है। वो वर्ण
- 1:04:22व्यवस्था के इस विवरण को तो स्वीकार करते
- 1:04:24हैं लेकिन
- 1:04:25लेकिन
- 1:04:25लेकिन वो अपवित्रता यानी छुआछूत या जिसे
- 1:04:29पोलशन कहते हैं उस धारणा को पूरी तरह से
- 1:04:31खारिज कर देते हैं।
- 1:04:32अरे वाह यह तो बहुत बड़ी बात है। उस जमाने
- 1:04:36में इस तरह की सामाजिक मान्यता पर सवाल
- 1:04:38उठाना उन्होंने इसका क्या तर्क दिया?
- 1:04:40उनका तर्क पूरी तरह से वैज्ञानिक था।
- 1:04:42उन्होंने कहा कि प्रकृति का नियम शुद्धि
- 1:04:44का है। हर चीज जो अपवित्र होती है, वह
- 1:04:47वापस पवित्र होने की कोशिश करती है और हो
- 1:04:50भी जाती है।
- 1:04:51उन्होंने उदाहरण दिया कि सूरज हवा को साफ
- 1:04:54करता है और समुद्र का नमक पानी को गंदा
- 1:04:56होने से बचाता है। उनका मानना था कि अगर
- 1:04:59प्रकृति में ऐसा नहीं होता तो धरती पर
- 1:05:01जीवन ही संभव नहीं होता।
- 1:05:02मतलब अपवित्रता की यह धारणा प्रकृति के
- 1:05:05नियमों के ही खिलाफ है।
- 1:05:07बिल्कुल। तो [नाक से की जाने वाली आवाज़]
- 1:05:08इससे पता चलता है कि वह सिर्फ एक नकलची
- 1:05:10नहीं थे जो ग्रंथों को पढ़कर लिख रहे थे।
- 1:05:13वो एक आलोचक विचारक थे।
- 1:05:15तो अलबरूनी ने हमें भारत की एक एकेडेमिक
- 1:05:18ग्रंथों पर आधारित तस्वीर दी। लेकिन क्या
- 1:05:20होता है जब कोई ऐसा यात्री आए जिसे
- 1:05:22किताबों से ज्यादा सड़कों और बाजारों में
- 1:05:25दिलचस्पी हो।
- 1:05:26तब कहानी में एंट्री होती है 14वीं सदी के
- 1:05:28सबसे बड़े घुमक्कड़ इब्नबतूता की।
- 1:05:31और क्या कहानी है उनकी?
- 1:05:32हां। इब्नबतूता का मानना था कि असली ज्ञान
- 1:05:36किताबों में नहीं बल्कि दुनिया को अपनी
- 1:05:38आंखों से देखने में है और उन्होंने इसे
- 1:05:40जिया भी है। मोरक्को के टज़ियर से निकलकर
- 1:05:43उन्होंने लगभग पूरी इस्लामी दुनिया की
- 1:05:45यात्रा की और 1333 में वो जमीनी रास्ते से
- 1:05:49सिंध पहुंचे।
- 1:05:50और दिल्ली पहुंचते ही तो उनकी किस्मत ही
- 1:05:52चमक गई। दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन
- 1:05:55तुगलक उनकी विध्वता से इतने प्रभावित हुए
- 1:05:58कि उन्हें सीधे दिल्ली का काजी मतलब मुख्य
- 1:06:00न्यायाधीश बना दिया।
- 1:06:02जी। एक अजनबी यात्री के लिए यह किसी लॉटरी
- 1:06:05लगने जैसा ही था।
- 1:06:06लेकिन यह सफर इतना सीधा भी नहीं था है ना?
- 1:06:08नहीं बिल्कुल नहीं। बाद में सुल्तान से
- 1:06:10उनकी अनबन भी हुई। उन्हें जेल में भी डाल
- 1:06:13दिया गया। लेकिन जब मामला सुलझा तो
- 1:06:15सुल्तान ने उन्हें एक और बड़ी जिम्मेदारी
- 1:06:17दी। चीन में मंगोल शासक के पास अपना दूत
- 1:06:20बनाकर भेजा।
- 1:06:20मतलब उनका जीवन किसी रोमांचक फिल्म की
- 1:06:23स्क्रिप्ट जैसा था।
- 1:06:24बिल्कुल। और इन सभी अनुभवों को उन्होंने
- 1:06:27एक किताब में समेटा जिसे रेहला कहते हैं।
- 1:06:30रेहला जिसका मतलब ही यात्रा होता है।
- 1:06:33हां और यह किताब अलबरूनी की किताब से बहुत
- 1:06:36अलग है। वो सैद्धांतिक बातों में नहीं
- 1:06:38उलझते। वो उन चीजों के बारे में लिखते हैं
- 1:06:41जो उन्हें हैरान करती हैं जो उनके लिए
- 1:06:43नहीं है।
- 1:06:43जैसे नारियल और पान। उनका नारियल का वर्णन
- 1:06:46तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] कमाल का
- 1:06:48है।
- 1:06:48हां। ऐसा लगता है जैसे उसने पहली बार कोई
- 1:06:51एलियन फल देखा हो। वह लिखते हैं, इंसान का
- 1:06:53सिल जिसमें दो आंखें और एक मुंह हो।
- 1:06:55और पान के बारे में भी उन्होंने उतने ही
- 1:06:57आश्चर्य से लिखा है कि यह एक ऐसी बेल है
- 1:07:00जिसमें फल नहीं लगते, बस पत्तों के लिए
- 1:07:03उगाई जाती है। यह छोटी-छोटी बातें ही उनके
- 1:07:06वृतांत को इतना जीवंत बना देती हैं।
- 1:07:08उन्होंने शहरों और बाजारों के बारे में भी
- 1:07:11काफी कुछ लिखा है। वो बताते हैं कि शहर
- 1:07:14बहुत घनी आबादी वाले और अमीर थे। दिल्ली
- 1:07:17तो उन्हें एक विशाल महानगर लगा। और उनके
- 1:07:20बाजारों का वर्णन पढ़कर लगता है कि वह
- 1:07:22सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं थी। वह सामाजिक
- 1:07:25जीवन के केंद्र थे। वहां मस्जिदें और
- 1:07:27मंदिर थे। संगीत और नृत्य के सार्वजनिक
- 1:07:31प्रदर्शन होते थे। एक तरह से शहर की धड़कन
- 1:07:33थे वो।
- 1:07:34लेकिन जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा हैरान
- 1:07:37किया वो है उस जमाई की संचार प्रणाली मतलब
- 1:07:40डाक व्यवस्था।
- 1:07:42वो वाकई अविश्वसनीय थी। इब्नेबतूता खुद
- 1:07:44चकित थे। वो लिखते हैं कि सिंध से दिल्ली
- 1:07:47की यात्रा में जहां 50 दिन लगते थे
- 1:07:50सुल्तान तक गुप्तचरों की खबरें सिर्फ 5
- 1:07:52सात दिन में पहुंच जाती थी।
- 1:07:54एक मिनट यह कैसे संभव था? उस जमाने में ना
- 1:07:57टेलीफोंस थे ना इंटरनेट।
- 1:07:59इसका जवाब है एक बेहद कुशल रिले सिस्टम।
- 1:08:02दो तरह की डाक व्यवस्था थी। एक थी उलूक
- 1:08:05यानी घोड़ों वाली डाक।
- 1:08:06अच्छा।
- 1:08:07हर चार मील पर चौकियां बनी थी। जहां ताजे
- 1:08:10घोड़े तैयार रहते थे। एक घोड़सवार तेजी से
- 1:08:13आता और अगले को संदेश थमा देता। ठीक है।
- 1:08:15यह तो समझ में आता है। लेकिन इब्नबतूता तो
- 1:08:18पैदल डाक व्यवस्था से ज्यादा प्रभावित थे।
- 1:08:21हां। और वही असली कमाल था। उसे दावा कहते
- 1:08:24थे। इसमें हर मील में तीन चौकियां होती
- 1:08:27थी।
- 1:08:27हर मील में तीन
- 1:08:28जी। एक आदमी हाथ में एक लंबी छड़ी लेकर
- 1:08:31जिस पर घंटियां बंधी होती थी, पूरी रफ्तार
- 1:08:33से दौड़ता था। घंटियों की आवाज सुनकर अगली
- 1:08:36चौकी का आदमी तैयार हो जाता। जैसे ही पहला
- 1:08:38धावक पहुंचता, दूसरा तुरंत संदेश लेकर आगे
- 1:08:41दौड़ पड़ता। तो, यह एक तरह की इंसानी रिले
- 1:08:44रेस थी जो 24ों घंटे चलती रहती थी। और
- 1:08:47इब्नबतूता कहते हैं कि यह घोड़ों से भी
- 1:08:49तेज थी।
- 1:08:50हां, क्योंकि हर धावक को बस एक छोटा सा
- 1:08:52हिस्सा ही दौड़ना होता था जिससे वह अपनी
- 1:08:54अधिकतम रफ्तार बनाए रख पाता था।
- 1:08:56कमाल है। यह उस समय के संगठनात्मक कौशल का
- 1:08:59एक बेहतरीन उदाहरण है।
- 1:09:00बिल्कुल। तो हमारे पास अलबरूनी का
- 1:09:03विद्वत्तापूर्ण नजरिया है और इब्नबतूता का
- 1:09:06जमीनी अनुभव दोनों अपने-अपने तरीके से
- 1:09:08भारत को उसी की शर्तों पर समझने की कोशिश
- 1:09:11कर रहे थे।
- 1:09:12लेकिन क्या होता है जब कोई यात्री यहां
- 1:09:15सिर्फ जिज्ञासा से नहीं बल्कि एक
- 1:09:17तुलनात्मक पैमाना लेकर आए।
- 1:09:19तब आप 17वीं सदी में पहुंचते हैं और आपकी
- 1:09:21मुलाकात होती है फ्रांसवा बर्नियर से।
- 1:09:24फ्रांसवा बर्नियर
- 1:09:25बर्नियर सिर्फ एक यात्री नहीं थे। वह
- 1:09:27फ्रांस से आए एक डॉक्टर, राजनीतिक
- 1:09:29दार्शनिक और इतिहासकार थे। वह 12 साल भारत
- 1:09:32में रहे। मुगल दरबार से बहुत करीब से
- 1:09:34जुड़े। पहले वह शाहजहां के बेटे दारा
- 1:09:37शिकोह के चिकित्सक थे।
- 1:09:38और उनकी खासियत यह थी कि वो भारत में जो
- 1:09:41कुछ भी देखते उसकी तुलना सीधे यूरोप से
- 1:09:44करते और ज्यादातर मामलों में नतीजा यूरोप
- 1:09:47के पक्ष में ही होता था।
- 1:09:49बिल्कुल। उनकी किताब ट्रैवल्स इन द मुगल
- 1:09:51एंपायर इसी तुलना पर आधारित है और उनके
- 1:09:54लिए भारत और यूरोप के बीच सबसे बड़ा और
- 1:09:56बुनियादी अंतर था जमीन पर निजी मालिकाना
- 1:09:59हक का ना होना।
- 1:10:00यह उनके लिए एक जुनून जैसा लगता है। आखिर
- 1:10:03एक चीज उनके लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों
- 1:10:05थी?
- 1:10:05क्योंकि 17वीं सदी के एक यूरोपीय के लिए
- 1:10:08निजी संपत्ति ही सब कुछ थी। तरक्की, आजादी
- 1:10:12और समृद्धि की जड़। जब उन्होंने मुगल भारत
- 1:10:15को देखा और पाया कि सारी जमीन का मालिक
- 1:10:18सैद्धांतिक रूप से बादशाह है
- 1:10:20तो उन्हें इसमें सिर्फ एक अलग आर्थिक
- 1:10:22व्यवस्था नहीं दिखी।
- 1:10:23नहीं। उन्हें इसमें भारत के पिछड़ेपन,
- 1:10:26किसानों के शोषण और तानाशाही की वजह नजर
- 1:10:28आई।
- 1:10:29तो उनके हिसाब से क्योंकि अमीरों को पता
- 1:10:32था कि जमीन उनसे कभी भी छीनी जा सकती है।
- 1:10:34इसलिए वह उस पर लंबे समय के लिए निवेश
- 1:10:37नहीं करते थे। जिससे खेती बर्बाद हो रही
- 1:10:40थी।
- 1:10:40यही उनका तर्क था और यह सिर्फ एक यात्रा
- 1:10:42वृतांत में लिखा गया विचार बनकर नहीं रह
- 1:10:45गया। यह पश्चिम में बहुत बहुत प्रभावशाली
- 1:10:47साबित हुआ।
- 1:10:48कैसे? मतलब इसका क्या असर पड़ा?
- 1:10:50मॉटिस्क्यू जैसे बड़े यूरोपीय विचारकों ने
- 1:10:53बर्नियर के लेखन के आधार पर प्राच्य
- 1:10:56निरंकुशता यानी ओरिएंटल डिस्पोटिज्म का
- 1:10:58सिद्धांत कर दिया।
- 1:10:59अच्छा। हां।
- 1:11:00इस सिद्धांत ने पश्चिम में पूर्व की खासकर
- 1:11:03भारत की एक ऐसी छवि बनाई जो सदियों तक
- 1:11:07कायम रही। एक ऐसा देश जहां बादशाही सब कुछ
- 1:11:10है। प्रजा का कोई अधिकार नहीं और समाज
- 1:11:12ठहरा हुआ है।
- 1:11:13मतलब एक यात्री का नजरिया इतिहास का रुख
- 1:11:16मोड़ने वाली एक शक्तिशाली विचारधारा बन
- 1:11:18गया।
- 1:11:19हां। और बाद में इसी विचार का इस्तेमाल
- 1:11:22औनिवेशिक शासन को सही ठहराने के लिए भी
- 1:11:24किया गया कि यह लोग खुद पर शासन नहीं कर
- 1:11:27सकते। इसलिए हमें इनकी मदद करनी होगी। यह
- 1:11:29तो काफी गंभीर बात है। बर्नियर ने सामाजिक
- 1:11:32रीति रिवाजों जैसे सती प्रथा के बारे में
- 1:11:35भी लिखा है।
- 1:11:36हां और उनका वर्णन बहुत मार्मिक और दिल
- 1:11:39दहला देने वाला है। वो किसी विद्वान की
- 1:11:41तरह इसका विश्लेषण नहीं करते बल्कि एक
- 1:11:44चश्मदीद के तौर पर अपनी आंखों देखी भयावता
- 1:11:47को बयान करते हैं।
- 1:11:48उन्होंने एक युवा विधवा को जबरदस्ती चिता
- 1:11:51पर धकेले जाने का बहुत ही ग्राफिक वर्णन
- 1:11:54किया है। यह उनकी यूरोपीय सेंसिबिलिटीज के
- 1:11:56लिए एक बहुत बड़ा सदमा था। तो अगर हम इन
- 1:11:59तीनों को एक साथ देखें तो हमारे सामने
- 1:12:01भारत की तीन बिल्कुल अलग-अलग तस्वीरें
- 1:12:03उभरती हैं।
- 1:12:04बिल्कुल। एक विद्वान जो ग्रंथों में
- 1:12:06सच्चाई खोज रहा है। एक घुमक्कड़ जो सड़कों
- 1:12:10पर जिंदगी को जी रहा है और एक दार्शनिक जो
- 1:12:13हर चीज को अपने यूरोपीय पैमाने पर तौल रहा
- 1:12:16है।
- 1:12:16और यही इस पूरी चर्चा का सार है। किसी भी
- 1:12:19यात्री का वृतांत हमें उस जगह के बारे में
- 1:12:21जितना बताता है उतना ही खुद उस यात्री और
- 1:12:24उसकी दुनिया के बारे में भी बताता है।
- 1:12:26उनके पूर्वाग्रह, उनके सवाल, उनकी
- 1:12:28हैरानियां यह सब कहानी का हिस्सा हैं।
- 1:12:30सही बात है। अलबिरूनी का भारत ज्ञान और
- 1:12:34दर्शन का देश है।
- 1:12:35इब्नबतूटा का भारत चहल-पहल और अजूबों से
- 1:12:38भरा है।
- 1:12:38और बर्नियर का भारत यूरोप के मुकाबले एक
- 1:12:42पिछड़ा और निरंकुश देश है।
- 1:12:44और सच्चाई शायद इन तीनों के बीच कहीं है।
- 1:12:46उनके वृतांतों को पढ़ते हुए हमें हमेशा यह
- 1:12:50याद रखना चाहिए कि हम सिर्फ भारत को नहीं
- 1:12:53बल्कि भारत को देखती हुई एक खास नजर को भी
- 1:12:57देख रहे हैं।
- 1:12:57बिल्कुल यह वृतांत इतिहास को समझने के लिए
- 1:13:00अमूल्य हैं। लेकिन वे अपने आप में पूरा
- 1:13:02इतिहास नहीं है। वे एक पहेली के कुछ जरूरी
- 1:13:04टुकड़े हैं।
- 1:13:05जिन्हें हमें दूसरे स्रोतों के साथ जोड़कर
- 1:13:08देखना होगा ताकि एक ज्यादा मुकम्मल तस्वीर
- 1:13:10बन सके।
- 1:13:11जी।
- 1:13:11यह सब सोचने पर मजबूर करता है। यह यात्री
- 1:13:14अपनी कहानियों से दुनिया की भारत के बारे
- 1:13:17में समझ को गढ़ रहे थे। यह मुझे एक सवाल
- 1:13:19के साथ छोड़ जाता है जिस पर शायद हम सब
- 1:13:22सोच सकते हैं आज की इस हाइपर कनेक्टेड
- 1:13:25दुनिया में जहां हर कोई फोन पर अपनी कहानी
- 1:13:28कह रहा है। आज के यात्री कौन है और वे
- 1:13:31हमारी दुनिया की कौन सी कहानी सुना रहे
- 1:13:33हैं?
- 1:13:36आज हम एक नए अध्याय की गहन पड़ताल शुरू कर
- 1:13:39रहे हैं। अध्याय का नाम है भक्ति सूफी
- 1:13:42परंपराएं।
- 1:13:43धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा
- 1:13:45ग्रंथ। इसका अर्थ है भक्ति सूफी ट्रेडिशंस
- 1:13:50चेंजेस इन रिलीजियस बिलीव्स एंड डिवोशनल
- 1:13:53टेक्स्ट्स।
- 1:13:53तो मतलब इस चर्चा में हम लगभग आठवीं से
- 1:13:5618वीं सदी तक यानी 1000 साल के दौरान जो
- 1:13:59भी धार्मिक बदलाव हुए उन्हें समझने वाले
- 1:14:02हैं।
- 1:14:02बिल्कुल और यह एक बहुत ही दिलचस्प दौर था।
- 1:14:05इस समय को समझने के लिए इतिहासकार कई तरह
- 1:14:09के सोर्सेस का इस्तेमाल करते हैं।
- 1:14:11जैसे उस समय की वास्तुकला मतलब
- 1:14:12आर्किटेक्चर।
- 1:14:13हां स्तूप, विहार, मंदिर, मस्जिदें और
- 1:14:17इनसे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है संत कवियों
- 1:14:20द्वारा रची गई कविताएं और सूफियों की लिखी
- 1:14:23रचनाएं।
- 1:14:24अच्छा। हमें यह समझना होगा कि यह दौर किसी
- 1:14:27एक अकेले विश्वास का नहीं था बल्कि कई
- 1:14:30धार्मिक विश्वासों और आचरणों का एक एक
- 1:14:33मोजेक या मिश्रण था। इसमें हमें एकीकरण भी
- 1:14:37दिखता है और टकराव भी।
- 1:14:39ठीक है। तो चलिए इसे खोलते हैं। जब हम
- 1:14:42एकीकरण या इंटीग्रेशन की बात करते हैं, तो
- 1:14:45इसका क्या मतलब है? अच्छा। मतलब पुराणों
- 1:14:48जैसी रचनाओं को सरल संस्कृत छंदों में
- 1:14:50लिखा गया। जिन्हें महिलाएं और शूद्र
- 1:14:54जिन्हें पहले वेद सुनने की अनुमति नहीं थी
- 1:14:57वो भी सुन सकते थे।
- 1:14:58और दूसरी प्रक्रिया क्या थी?
- 1:14:59दूसरी प्रक्रिया थी ब्राह्मणों द्वारा
- 1:15:01अन्य सामाजिक वर्गों की आस्थाओं और आचरणों
- 1:15:04को स्वीकार करना।
- 1:15:06मतलब वो उन्हें अपना रहे थे। उन्हें एक
- 1:15:08नया रूप दे रहे थे।
- 1:15:10इसका कोई उदाहरण दे सकती हैं?
- 1:15:11हां। सबसे अच्छा उदाहरण है पूरी उड़ीसा का
- 1:15:14जगन्नाथ पंत।
- 1:15:15जगन्नाथ। हां जगन्नाथ जिसका शाब्दिक अर्थ
- 1:15:18है संपूर्ण विश्व का स्वामी।
- 1:15:21डेफिनेशन के तौर पर यह विष्णु का एक
- 1:15:24स्वरूप है।
- 1:15:25लेकिन इसमें खास क्या था?
- 1:15:26खास बात ये थी कि यहां एक स्थानीय देवता
- 1:15:29को विष्णु के रूप में प्रस्तुत किया गया।
- 1:15:31यह दिखाता है कि कैसे एक स्थानीय लिटिल
- 1:15:35ट्रेडिशन को एक बड़ी अखिल भारतीय ग्रेटर
- 1:15:39का हिस्सा बनाया गया।
- 1:15:40अच्छा। तो समाजशास्त्री इसे महान और लघु
- 1:15:43परंपराओं के बीच का संवाद कहते हैं।
- 1:15:45बिल्कुल। और हां, यह एग्जाम्स के लिए एक
- 1:15:47जरूरी कांसेप्ट है। महान परंपरा शासकों और
- 1:15:51पुरोहितों की और लघु परंपरा आम किसानों
- 1:15:54की।
- 1:15:54लेकिन जैसा आपने कहा हमेशा एकीकरण ही नहीं
- 1:15:57होता था। टकराव भी थे।
- 1:15:59हां, टकराव भी थे। वैदिक परंपरा से अलग
- 1:16:02तांत्रिक पूजा पद्धति मतलब ट्रिक
- 1:16:05प्रैक्टिसेस भी बहुत प्रचलित थी।
- 1:16:07और इसमें क्या अलग था? इसमें महिलाएं और
- 1:16:09पुरुष दोनों शामिल हो सकते थे और इसमें
- 1:16:12कर्मकांडीय सत्ता और वर्णभेद की अवहेलना
- 1:16:15की जाती थी। एक तरह से ये एस्टैब्लिश्ड
- 1:16:17सिस्टम को चुनौती थी।
- 1:16:19तो मतलब बौद्ध जैन और पौराणिक हिंदू मतों
- 1:16:22के बीच भी ये संघर्ष होता था।
- 1:16:24हां अक्सर होता था।
- 1:16:25ठीक है। अब बात करते हैं भक्ति आंदोलन की।
- 1:16:28इसकी शुरुआत तो दक्षिण भारत से हुई थी। है
- 1:16:30ना?
- 1:16:30बिल्कुल। लगभग छठी शताब्दी में तमिलनाडु
- 1:16:33में दो प्रमुख संत कवियों के समूह उभरे।
- 1:16:36अलवार और नैनार
- 1:16:37सही अलवार जो विष्णु के भक्त थे और नैनार
- 1:16:41जो शिव के भक्त थे
- 1:16:42और यह क्या करते थे?
- 1:16:43यह संत एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम
- 1:16:46में तमिल भाषा में मतलब लोगों की अपनी
- 1:16:49भाषा में अपने भगवान की स्तुति में भजन
- 1:16:52गाते थे।
- 1:16:52क्या इन आंदोलनों में समाज के सभी वर्गों
- 1:16:54के लोग शामिल थे?
- 1:16:55हां। और यही इनकी सबसे बड़ी विशेषता थी।
- 1:16:59इनमें ब्राह्मणों से लेकर शिल्पकार, किसान
- 1:17:02और कई अस्पृश्य मानी जाने वाली जातियों के
- 1:17:05लोग भी शामिल थे।
- 1:17:06तो यह जाति प्रथा और ब्राह्मणों के
- 1:17:09प्रभुत्व का खुला विरोध था।
- 1:17:10बिल्कुल। और इसमें महिलाएं भी पीछे नहीं
- 1:17:12थी। अंडाल जैसी स्त्री अलवार भक्त और
- 1:17:15कराईकाल अमियार जैसी स्त्री नयानार भक्त
- 1:17:18भी थी। वैसे ये दोनों नाम एग्जाम्स के
- 1:17:21पॉइंट ऑफ व्यू से बहुत जरूरी हैं।
- 1:17:22अच्छा तो उस समय के शासकों का उनका इन
- 1:17:25संतों के प्रति क्या रवैया था। यह बहुत
- 1:17:27दिलचस्प है। चोल सम्राटों ने इन संत
- 1:17:30कवियों का समर्थन किया। उन्होंने चिदंबरम,
- 1:17:32तंजावरुर जैसे विशाल शिव मंदिर बनवाए।
- 1:17:35मतलब उन्होंने इस आंदोलन को अपना लिया।
- 1:17:37हां। और उन्होंने नयनार संतों के भजनों का
- 1:17:40एक संकलन भी करवाया जिसे तेवरम कहा जाता
- 1:17:42है। यह भी एग्जाम्स के लिए एक महत्वपूर्ण
- 1:17:45टर्म है।
- 1:17:45ठीक है। प्रदक्षिण के बाद यह लहर कर्नाटक
- 1:17:48पहुंची। वहां क्या हुआ? 12वीं शताब्दी में
- 1:17:51कर्नाटक में एक नया आंदोलन उभरा जिसका
- 1:17:54नेतृत्व बासवन्ना नाम के एक ब्राह्मण ने
- 1:17:56किया।
- 1:17:57बासवन्ना।
- 1:17:58हां उनके अनुयाई वीर शैव यानी शिव के वीर
- 1:18:02या लिंगायत यानी लिंग धारण करने वाले
- 1:18:06कहलाए। डेफिनेशन के तौर पर यह शिव की
- 1:18:09आराधना लिंग के रूप में करते हैं।
- 1:18:11और इनकी विचारधारा क्या थी? इन्होंने जाति
- 1:18:14की अवधारणा, पुनर्जन्म के सिद्धांत और
- 1:18:17ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का जोरदार विरोध
- 1:18:21किया और तो और इन्होंने विधवा पुनर्विवाह
- 1:18:24को भी मान्यता दी।
- 1:18:26यह तो उस समय के हिसाब से बहुत
- 1:18:27क्रांतिकारी था।
- 1:18:28बहुत ज्यादा। और यह पॉइंट्स भी एग्जाम्स
- 1:18:31के लिए जरूरी हैं।
- 1:18:32ठीक है। तो इसी दौर में उपमहाद्वीप में एक
- 1:18:35और बड़ा धार्मिक बदलाव आया। इस्लाम का
- 1:18:37आगमन।
- 1:18:38हां। सातवीं शताब्दी में अरब व्यापारी
- 1:18:41समुद्र के रास्ते पश्चिमी भारत के
- 1:18:42बंदरगाहों तक आए। फिर 711 ईसवी में
- 1:18:46मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध को जीता और
- 1:18:49दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद इस्लाम
- 1:18:51का प्रभाव और तेजी से बढ़ा।
- 1:18:53आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब था?
- 1:18:55इस्लाम के मूल सिद्धांत क्या थे?
- 1:18:57सिद्धांतिक रूप से इस्लाम के अनुयायियों
- 1:19:01को पांच स्तंभों का पालन करना होता है।
- 1:19:04अल्लाह एकमात्र ईश्वर है और पैगंबर
- 1:19:07मोहम्मद उनके दूत हैं। दिन में पांच बार
- 1:19:10नमाज, खैरात या जकात पाटना, रमजान के
- 1:19:14महीने में रोजा रखना
- 1:19:15और हज के लिए मक्का जाना।
- 1:19:17बिल्कुल। लेकिन व्यवहार में इस्लाम ने भी
- 1:19:20स्थानीय प्रथाओं का अपनाया।
- 1:19:22इसका कोई उदाहरण? जैसे खोजा इस्माइली शिया
- 1:19:25समुदाय के लोगों ने स्थानीय भाषा में
- 1:19:28भक्ति गीत लिखे जिन्हें गिनान कहा जाता
- 1:19:30था। यह बहुत जरूरी है कि उस समय हिंदू और
- 1:19:34मुसलमान जैसे शब्द बहुत कम इस्तेमाल होते
- 1:19:37थे।
- 1:19:37अच्छा तो पहचान कैसे होती थी?
- 1:19:40लोगों की पहचान अक्सर उनके जन्म स्थान से
- 1:19:43होती थी। यहीं से बात और भी दिलचस्प हो
- 1:19:45जाती है क्योंकि इस्लाम के अंदर ही एक
- 1:19:48रहस्यवादी या मिस्टिकल धारा का विकास हुआ
- 1:19:51जिसे हम सूफीवाद कहते हैं।
- 1:19:53बिल्कुल सूफी लोग कुरान की अपनी व्याख्या
- 1:19:56के आधार पर ईश्वर की उपासना पर जोर देते
- 1:19:59थे। उन्होंने पैगंबर मोहम्मद को इंसान
- 1:20:02कामिल बताते हुए उनका अनुसरण करने की सीख
- 1:20:05दी।
- 1:20:05और ये सूफी संत रहते कहां थे? इनका कोई
- 1:20:08संगठन था?
- 1:20:09हां। यहीं पर कुछ जरूरी टर्म्स आती हैं।
- 1:20:11जैसे खानकाह जो सूफी संतों के रहने का
- 1:20:14स्थान था। एक तरह का आश्रम
- 1:20:17खानकाह। ठीक है?
- 1:20:18और फिर आता है सिलसिला। सिलसिला मतलब एक
- 1:20:21आध्यात्मिक परंपरा या चैन जो गुरु और
- 1:20:24शिष्य को जोड़ती है और गुरु को शेख या पीर
- 1:20:28कहा जाता था।
- 1:20:29भारत में कौन सा सिलसिला सबसे ज्यादा
- 1:20:30प्रभावशाली था?
- 1:20:31चिश्ती सिलसिला। इसके प्रमुख संतों में
- 1:20:34ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती जिनकी दरगाह
- 1:20:37अजमेर में है।
- 1:20:37और दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया।
- 1:20:39हां बिल्कुल। यह संत बहुत सादा जीवन जीते
- 1:20:42थे और राजनीति से दूर रहते थे। लेकिन बिना
- 1:20:46मांगे दिए गए दान को स्वीकार करते थे।
- 1:20:48उनकी उपासना का मतलब पूजा का तरीका क्या
- 1:20:51था?
- 1:20:51उनकी उपासना के दो मुख्य अंग थे। जियारत
- 1:20:55और कव्वाली।
- 1:20:56अच्छा, जियारत से आपका क्या मतलब है?
- 1:20:58ईश्वर का नाम जपने के लिए गाया जाने वाला
- 1:21:00संगीत। और एक और जरूरी बात चिश्ती संतों
- 1:21:04ने संवाद के लिए स्थानीय भाषा जैसे हिंदवी
- 1:21:07का भी प्रयोग किया जिससे वे आम लोगों में
- 1:21:10बहुत लोकप्रिय हुए।
- 1:21:11तो अब उत्तर भारत में यह सारी अलग-अलग
- 1:21:14परंपराएं आपस में मिल रही थी।
- 1:21:15जी।
- 1:21:16यहीं कबीर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो
- 1:21:18जाती है।
- 1:21:18हां। कबीर जो 14वीं 15वीं शताब्दी के संत
- 1:21:22थे वो निर्गुण भक्ति के एक प्रमुख संत थे।
- 1:21:25निर्गुण भक्ति एक बार इसे भी समझा दीजिए।
- 1:21:27निर्गुण भक्ति यानी निर्गुणा भक्ति का
- 1:21:30मतलब है निराकार ईश्वर की उपासना। बिना
- 1:21:33किसी मूर्ति या तस्वीर के।
- 1:21:35अच्छा।
- 1:21:36कबीर ने परम सत्य को अल्लाह, खुदा, हजरत,
- 1:21:39पीर, राम ऐसे कई नामों से संबोधित किया।
- 1:21:43उन्होंने हिंदू और इस्लाम दोनों धर्मों की
- 1:21:46बाहरी पूजा पद्धतियों का खंडन किया।
- 1:21:48उनकी रचनाएं कहां मिलती हैं? उनकी रचनाएं
- 1:21:51कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली और आदि ग्रंथ
- 1:21:55साहिब में संग्रहित है। और यह तीनों ही
- 1:21:58नाम एग्जाम्स के लिए बहुत जरूरी हैं।
- 1:22:01कबीर के बाद एक और महान संत हुए बाबा गुरु
- 1:22:04नानक।
- 1:22:04बाबा गुरु नानक 1469, 1539 का जन्म एक
- 1:22:09हिंदू व्यापारी परिवार में हुआ था।
- 1:22:11उन्होंने भी निर्गुण भक्ति का ही उपदेश
- 1:22:14दिया। मतलब मूर्ति पूजा कर्मकांड और जाति
- 1:22:17भेद का खंदन
- 1:22:19बिल्कुल उनके उपदेश शब्द के रूप में गाए
- 1:22:22जाते थे
- 1:22:22और सिख परंपरा की शुरुआत यहीं से हुई।
- 1:22:24हां गुरु नानक ने अपने शिष्य अंगद को अपना
- 1:22:27उत्तराधिकारी चुना और यहीं से सिख परंपरा
- 1:22:30की शुरुआत हुई। बाद में पांचवें गुरु
- 1:22:33अर्जुन देव ने बाबा नानक और उनके चार
- 1:22:36उत्तराधिकारियों बाबा फरीद, रविदास और
- 1:22:40कबीर की वाणी को आदि ग्रंथ साहिब में
- 1:22:43संकलित किया। यह तो बहुत बड़ी बात है।
- 1:22:44बिल्कुल और बाद में 10वें गुरु गोविंद
- 1:22:47सिंह ने इसे गुरु ग्रंथ साहिब का रूप
- 1:22:49दिया। यह पूरी जर्नी एग्जाम्स के लिए बहुत
- 1:22:52महत्वपूर्ण है।
- 1:22:53इस दौर में मीराबाई का भी नाम आता है। वो
- 1:22:55इनसे कैसे अलग थी?
- 1:22:56मीराबाई जो लगभग पंडली 16वीं शताब्दी में
- 1:22:59हुई। एक राजपूत राजकुमारी थी। वो सगुण
- 1:23:02भक्ति की थी। मतलब उन्होंने कृष्ण को अपना
- 1:23:05पति मानकर उनकी भक्ति में कई भजन रचे।
- 1:23:08उन्होंने तो राजमहल का ऐश्वर्य भी त्याग
- 1:23:10दिया था। हां, उन्होंने राजमहल के ऐश्वर्य
- 1:23:13को त्याग कर एक सन्यासिनी का जीवन अपनाया।
- 1:23:16यह अपने आप में एक बहुत बड़ा सामाजिक
- 1:23:18विद्रोह था।
- 1:23:18तो, हमने आज आठवीं से 18वीं सदी के एक
- 1:23:20लंबे दौर को देखा। हमने दक्षिण के अलवार
- 1:23:23और नैनार संतों से लेकर उत्तर भारत के
- 1:23:25कबीर, नानक और मीराबाई तक की यात्रा की।
- 1:23:28बिल्कुल। और इस पूरी चर्चा का सार यह है
- 1:23:31कि भक्ति और सूफी परंपराओं ने धर्म को
- 1:23:34संस्थागत ढांचों से निकालकर एक व्यक्तिगत
- 1:23:37और भावनात्मक अनुभव बनाया।
- 1:23:40इसने आम लोगों को अपनी भाषा में अपने
- 1:23:43तरीके से ईश्वर से जुड़ने का रास्ता
- 1:23:44दिखाया।
- 1:23:45सही कहा। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण सवाल भी
- 1:23:48हमारे सामने छोड़ जाता है।
- 1:23:49क्या?
- 1:23:49वो यह कि इन संतों के उपदेश ज्यादातर
- 1:23:54मौखिक थे। उन्हें लिखा तो बहुत बाद में
- 1:23:56उनके अनुयायियों ने तो सोचने वाली बात यह
- 1:24:00है कि जब किसी संत की मौखिक वाणी को लिखित
- 1:24:04ग्रंथ का रूप दिया जाता है तो क्या उसके
- 1:24:08मूल संदेश में कोई बदलाव आ जाता है?
- 1:24:11मतलब एक मौखिक परंपरा को संगठित करने की
- 1:24:13प्रक्रिया में क्या कुछ जोड़ा या हटाया
- 1:24:15जाता होगा? बिल्कुल यह एक ऐसा सवाल है जिस
- 1:24:18पर इतिहासकारों में आज भी बहस होती है।
- 1:24:21भक्ति सूफी परंपराएं धार्मिक विश्वासों
- 1:24:24में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ यह अध्याय
- 1:24:27समाप्त हुआ।
- 1:24:30आज हम एक एक ऐसे भूले-बिसरे साम्राज्य की
- 1:24:33कहानी में उतर रहे हैं जिसका नाम ही था
- 1:24:36जीत का शहर।
- 1:24:37हम
- 1:24:38एक ऐसी जगह जो अपने समय में शायद दुनिया
- 1:24:41के सबसे शानदार शहरों में से एक थी। लेकिन
- 1:24:43जिसका अंत इतिहास की सबसे विनाशकारी हार
- 1:24:46में से एक के साथ हुआ। हम बात कर रहे हैं
- 1:24:49विजयनगर साम्राज्य की।
- 1:24:50बिल्कुल। और यह सिर्फ एक साम्राज्य की
- 1:24:52कहानी नहीं है। यह कहानी है पत्थर की,
- 1:24:55पानी की, कला और और युद्ध की।
- 1:24:59सही। और इस बात की भी कि कैसे यादें
- 1:25:02खंडरों के बीच भी एक पूरी सभ्यता को जिंदा
- 1:25:05रख सकती हैं। हमारे पास जो स्रोत हैं वो
- 1:25:08हमें लगभग 14वीं से 16वीं सदी के उस दौर
- 1:25:11में ले जाते हैं।
- 1:25:11तो चलिए इस भव्य शहर की परतों को एक-एक कर
- 1:25:14खोलते हैं। विजयनगर यानी सिटी ऑफ
- 1:25:17विक्ट्री। यह नाम यह नाम अपने आप में ही
- 1:25:20कितना शक्तिशाली लगता है। पर आज दुनिया
- 1:25:23इसे एक दूसरे नाम से जानती है। हम्पी
- 1:25:25हां।
- 1:25:26यह बदलाव कैसे हुआ? यह एक बहुत दिलचस्प
- 1:25:29कहानी है। देखिए 1565 की एक लड़ाई के बाद
- 1:25:32जब यह शहर लूटा गया, तबाह कर दिया गया तो
- 1:25:35यह धीरे-धीरे वीरान होने लगा।
- 1:25:37ओके।
- 1:25:37पर वहां के जो लोग थे, उनकी यादों में यह
- 1:25:40जिंदा रहा। उन्होंने इसे हम्पी कहना शुरू
- 1:25:43कर दिया। जो वहां की स्थानीय मातृ देवी
- 1:25:46पंपा देवी के नाम से आया था।
- 1:25:48अच्छा। तो एक तरह से साम्राज्य का जो
- 1:25:50राजनीतिक नाम था वह भले ही मिट गया पर
- 1:25:54लोगों की आस्था ने शहर को एक नया एक अमर
- 1:25:57नाम दे दिया।
- 1:25:58और फिर सदियों बाद इन्हीं खंडरों से एक
- 1:26:00अंग्रेज अफसर कर्नल कॉलिन मकजी ने इस खोए
- 1:26:04हुए साम्राज्य को फिर से दुनिया के सामने
- 1:26:06रखा।
- 1:26:06हां, यह तो किसी खजाने की खोज कैसी कहानी
- 1:26:09लगती है।
- 1:26:09लगभग वैसा ही था। 1800 में जब मैकेंजी जो
- 1:26:13ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम करते थे
- 1:26:14वहां पहुंचे तो उन्होंने इन खंडरों की
- 1:26:16भव्यता को पहचाना। वो एक इंजीनियर भी थे
- 1:26:19और पुरावेद भी।
- 1:26:20अच्छा दोनों
- 1:26:20जी।
- 1:26:21उन्होंने इसका पहला सर्वे मैप तैयार किया
- 1:26:24और उनकी जो शुरुआती जानकारी थी वो स्थानीय
- 1:26:27पुरोहितों की कहानियों और यादों पर आधारित
- 1:26:31थी।
- 1:26:31मतलब मौखिक परंपराओं का।
- 1:26:32हां। यही मौखिक परंपराएं बाद में मिले
- 1:26:36पुरातात्विक सबूतों और अभिलेखों के साथ
- 1:26:39मिलकर विजयनगर की पूरी तस्वीर बनाने में
- 1:26:42बहुत मददगार साबित हुई। यानी इतिहास को
- 1:26:45फिर से जोड़ने के लिए हर तरह के धागों का
- 1:26:48इस्तेमाल किया गया। लोगों की बातें, पत्थर
- 1:26:50पर लिखे अक्षर और शायद विदेशी यात्रियों
- 1:26:53के लिखे हुए सफरनामे भी।
- 1:26:54बिल्कुल।
- 1:26:55अब जरा इस साम्राज्य की नीव पर चलते हैं।
- 1:26:57इसे शुरू किसने किया था?
- 1:26:59इसकी स्थापना हुई 1336 में।
- 1:27:02दो भाई थे हरिहर और बुक्का।
- 1:27:04हरिहर और बुक्का।
- 1:27:06जी। यह वो दौर था जब दक्कन में बहुत
- 1:27:09राजनीतिक उथर-पुथर थी। और इसी माहौल में
- 1:27:13उन्होंने तुंगभद्रा नदी के किनारे इस
- 1:27:15साम्राज्य की नींव रखी।
- 1:27:17दिलचस्प बात यह है कि इस साम्राज्य की
- 1:27:19सीमाओं में अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले और
- 1:27:22अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग रहते
- 1:27:25थे।
- 1:27:25तो मतलब यह एक बहुत ही विविध एक
- 1:27:27कॉस्मोपॉलिटन जगह रही होगी।
- 1:27:29एकदम और जाहिर है एक बढ़ते हुए साम्राज्य
- 1:27:31को अपने पड़ोसियों से लड़ना भी पड़ता
- 1:27:33होगा।
- 1:27:34हां बिल्कुल।
- 1:27:34उनका संघर्ष लगातार चलता रहा। खासकर उत्तर
- 1:27:38में दक्कन के सुल्तानों से और पूर्व में
- 1:27:41उड़ीसा के गजपति शासकों के साथ
- 1:27:43और यह लड़ाईयां यह सिर्फ जमीन के लिए थी?
- 1:27:46नहीं, सिर्फ जमीन के लिए नहीं यह नदियों
- 1:27:49के उपजाऊ डेल्टा और और जो विदेशी व्यापार
- 1:27:52से आमदनी होती थी, उस पर कब्जे के लिए भी
- 1:27:55थी।
- 1:27:55लेकिन क्या लड़ाई का कोई फायदा भी हुआ है?
- 1:27:57मेरा मतलब है विचारों के आदान-प्रदान के
- 1:27:59लिहाज से?
- 1:28:00यह बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है। लड़ाई के
- 1:28:02साथ-साथ विचारों और तकनीकों का भी लेनदेन
- 1:28:05होता है।
- 1:28:06अच्छा। विजयनगर के शासकों ने खासकर
- 1:28:08वास्तुकला मतलब आर्किटेक्चर के क्षेत्र
- 1:28:11में दक्खन की सल्तनतों से बहुत कुछ सीखा।
- 1:28:14उन्होंने मेहराब यानी आर्च और गुंबद डोम
- 1:28:18जो इस्लामिक स्थापत्य की पहचान है।
- 1:28:19हां। उन विशेषताओं को न सिर्फ अपनाया
- 1:28:22बल्कि उन्हें अपने मंदिरों और महलों की
- 1:28:25डिजाइन में मिलाकर एक नया एक बहुत ही
- 1:28:28अनूठा स्टाइल तैयार किया।
- 1:28:29तो इस साम्राज्य पर कई राजवंशों ने राज
- 1:28:33किया। संगम सालूव तुलुव यह सत्ता का बदलना
- 1:28:38किसी अस्थिरता का संकेत था।
- 1:28:40हम्
- 1:28:40कुछ हद तक कह सकते हैं यह दोनों का मिश्रण
- 1:28:42था। सत्ता परिवर्तन अक्सर अंदरूनी खींचतान
- 1:28:45का नतीजा होता था। संगम वंश के बाद
- 1:28:48सालूवाय और फिर तुलुव और तुलु वंश में ही
- 1:28:51विजयनगर को अपना सबसे महान शासक मिला।
- 1:28:54कृष्णदेव राय
- 1:28:54हां कृष्णदेव राय
- 1:28:56इनका नाम तो आज भी दक्षिण भारत में बहुत
- 1:28:58सम्मान से लिया जाता है। इनका दौर विजयनगर
- 1:29:00का स्वर्णकाल माना जाता है ना? बिलकुल।
- 1:29:021509 से 1529 तक का उनका जो शासन काल था,
- 1:29:06वह विस्तार और स्थायित्व का दौर था।
- 1:29:09उन्होंने अपने सभी दुश्मनों को हराया।
- 1:29:11चाहे वह उड़ीसा के शासक हो या बीजापुर के
- 1:29:14सुल्तान
- 1:29:14और उन्होंने तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों
- 1:29:17के बीच का वो बेहद उपजाऊ इलाका, रायचूर
- 1:29:20दआब उस पर भी कब्जा किया।
- 1:29:22लेकिन, वह सिर्फ एक योद्धा नहीं थे। उनके
- 1:29:24राज में शांति और समृद्धि थी।
- 1:29:26और उन्होंने निर्माण भी बहुत करवाया।
- 1:29:28खासकर वो विशाल गोपुरम यह गोपुरम क्या थे
- 1:29:31और इतने भव्य क्यों बनाए जाते थे?
- 1:29:33गोपुरम का मतलब है राजकीय प्रवेश द्वार
- 1:29:36मतलब मंदिरों के मुख्य गेट। कृष्णदेव राय
- 1:29:39ने कई पुराने मंदिरों में भी नए और बहुत
- 1:29:42ऊंचे गोपुरम बनवाए।
- 1:29:43कितने ऊंचे?
- 1:29:44इतने ऊंचे कि वह मंदिर के मुख्य शिखर से
- 1:29:47भी ज्यादा नजर आते थे। यह एक तरह से राजा
- 1:29:50की ताकत, उसकी धर्म परायणता और साम्राज्य
- 1:29:53की समृद्धि का ऐलान करते थे। आप दूर से ही
- 1:29:56इन गोपुरम को देखकर समझ सकते थे कि आप एक
- 1:30:00शक्तिशाली साम्राज्य के इलाके में हैं।
- 1:30:02वाह!
- 1:30:02उन्होंने अपनी मां के नाम पर नगलापुरम नाम
- 1:30:05का एक नया शहर भी बसाया था।
- 1:30:07लेकिन फिर इतने महान राजा और इतने मजबूत
- 1:30:10साम्राज्य का पतन कैसे हो गया? कृष्णदेव
- 1:30:12राय की मृत्यु के बाद क्या हुआ?
- 1:30:14उनकी मृत्यु के बाद ही साम्राज्य के अंदर
- 1:30:16तनाव बढ़ने लगा। उनके जो उत्तराधिकारी थे,
- 1:30:19वह उतने काबिल नहीं थे और उन्हें अपने ही
- 1:30:22नायकों यानी सैन्य कमांडरों से चुनौती
- 1:30:24मिलने लगी। अच्छा।
- 1:30:25सत्ता धीरे-धीरे अरावेदुर राजवंश के हाथों
- 1:30:28में चली गई और फिर आया साल 1565
- 1:30:32तालीकोटा का युद्ध
- 1:30:33यह है।
- 1:30:33यह तो अविश्वसनीय लगता है। मतलब एक लड़ाई
- 1:30:36ने 200 साल पुराने इतने भव्य साम्राज्य को
- 1:30:40कुछ ही सालों में खंडर बना दिया।
- 1:30:42हां, इसे राक्षसी तांगड़ी का युद्ध भी
- 1:30:45कहते हैं। इसमें विजयनगर की सेना का सामना
- 1:30:48बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुंडा की संयुक्त
- 1:30:51सेनाओं से हुआ। विजयनगर की बहुत बुरी तरह
- 1:30:54हार हुई हम
- 1:30:56और इसके बाद जो हुआ वो एक त्रासदी थी।
- 1:30:59विजय सेनाओं ने राजधानी में घुसकर कई
- 1:31:02महीनों तक लूटपाट की। इमारतों को तोड़ा,
- 1:31:06आग लगा दी। वो शहर जो कभी जीत का शहर था
- 1:31:10वो पूरी तरह वीरान हो गया।
- 1:31:12यह सुनकर ही सेहरन होती है। चलिए अब
- 1:31:14साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर आते
- 1:31:16हैं। आपने नायकों का जिक्र किया था।
- 1:31:19विजयनगर की एक खास राजनीतिक खोज अमरनायक
- 1:31:22प्रणाली थी। यह क्या थी?
- 1:31:24यह एक तरह की आप कह सकती हैं सैन्य
- 1:31:27प्रशासनिक व्यवस्था थी। इसके कुछ तत्व
- 1:31:30दिल्ली सल्तनत की इख्तता प्रणाली से
- 1:31:33मिलते-जुलते थे। अमरनायक असल में सैनिक
- 1:31:36कमांडर होते थे। जिन्हें राजा प्रशासन के
- 1:31:39लिए कुछ इलाके दे देता था।
- 1:31:41तो ये एक तरह के गवर्नर या सामंत हुए।
- 1:31:44इनका काम क्या होता था? हां कह सकते हैं
- 1:31:47वे अपने इलाके के किसानों, शिल्पकारों और
- 1:31:50व्यापारियों से टैक्स वसूलते थे।
- 1:31:53ओके।
- 1:31:54इस टैक्स का एक हिस्सा वो अपने निजी खर्च
- 1:31:57और अपनी सेना जिसमें घोड़े और हाथी होते
- 1:32:00थे उसके रखरखाव के लिए रखते थे। और यही
- 1:32:04सेना जरूरत पड़ने पर राजा के काम आती थी।
- 1:32:07मतलब राजा को एक बड़ी स्थाई सेना रखने की
- 1:32:09जरूरत नहीं थी। उसे यह नायक सेना मुहैया
- 1:32:12कराते थे। पर राजा इन ताकतवर नायकों पर
- 1:32:15नियंत्रण कैसे रखता था? कहीं वह खुद ही
- 1:32:17बगावत ना कर दें।
- 1:32:18बहुत अच्छा सवाल है। नियंत्रण के कई तरीके
- 1:32:21थे। इन नायकों को साल में एक बार राजा को
- 1:32:23कीमती भेंट देनी पड़ती थी और अपनी वफादारी
- 1:32:26साबित करने के लिए दरबार में हाजिर होना
- 1:32:29पड़ता था।
- 1:32:30हम
- 1:32:30साथ ही राजा समय-समय पर उनका एक इलाके से
- 1:32:33दूसरे इलाके में तबादला भी करता रहता था।
- 1:32:36ताकि वो किसी एक जगह पर बहुत ज्यादा
- 1:32:37शक्तिशाली ना हो जाए।
- 1:32:38बिल्कुल। लेकिन 17वीं शताब्दी आते-आते जब
- 1:32:42केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई, तो इनमें से कई
- 1:32:45नायकों ने खुद को स्वतंत्र राजा घोषित कर
- 1:32:47दिया। जिससे साम्राज्य का विघटन और तेज हो
- 1:32:50गया।
- 1:32:51तो यह एक ऐसी व्यवस्था थी जो साम्राज्य के
- 1:32:53मजबूत होने पर तो काम करती थी, लेकिन
- 1:32:56कमजोर होने पर उसी के टूटने का कारण बन
- 1:32:59गई। चलिए अब उस शानदार शहर की बनावट पर
- 1:33:02चलते हैं।
- 1:33:02किसी भी शहर के लिए सबसे जरूरी चीज होती
- 1:33:04है पानी। विजयनगर ने इसका इंतजाम कैसे
- 1:33:07किया था? विजयनगर की जल प्रबंधन प्रणाली
- 1:33:10उसकी सबसे बड़ी खूबियों में से एक थी। शहर
- 1:33:13तुंगभद्रा नदी के किनारे एक प्राकृतिक
- 1:33:15बेसिन में बसा था जिसके चारों ओर ग्रेनाइट
- 1:33:18की पहाड़ियां थी।
- 1:33:19तो यह एक चुनौती भी थी और एक मौका भी।
- 1:33:22हां, मौका कैसे? क्योंकि इन पहाड़ियों से
- 1:33:25कई छोटी-छोटी धाराएं निकल कर नदी में
- 1:33:28मिलती थी। हम
- 1:33:28तो विजयनगर के इंजीनियरों ने लगभग हर धारा
- 1:33:32पर बांध बनाकर पानी को रोकने के लिए
- 1:33:34अलग-अलग आकार के हौज या जलाशय बना दिए।
- 1:33:37अच्छा।
- 1:33:38इससे उन्हें साल भर पानी मिलता था। इनमें
- 1:33:41सबसे मशहूर है कमलापुरम जलाशय। और एक
- 1:33:44हिरिया नहर का भी जिक्र मिलता है। हां,
- 1:33:46हिरिया नहर तो इंजीनियरिंग का एक चमत्कार
- 1:33:48है। यह तुंगभद्रा नदी पर बने एक बांध से
- 1:33:52पानी लेती थी और शहर के धार्मिक केंद्र और
- 1:33:55शहरी केंद्र के बीच की घाटी को सींचती थी।
- 1:33:58मतलब वो लोग पानी की हर बूंद की कीमत
- 1:34:00समझते थे।
- 1:34:01तो उन्होंने पानी का इतना शानदार इंतजाम
- 1:34:03तो कर लिया। पर इतने अमीर शहर को दुश्मनों
- 1:34:06से बचाने का क्या बंदोबस्त था?
- 1:34:07सुरक्षा अभूतपूर्व थी। फारस से आए एक दूत
- 1:34:12अब्दुल रजाक ने लिखा है कि शहर सात परतों
- 1:34:16वाली किलेबंदी से घिरा था।
- 1:34:17सात परतें?
- 1:34:18जी। और सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि
- 1:34:22इन दीवारों के अंदर सिर्फ शहर ही नहीं
- 1:34:24बल्कि खेत और जंगल भी थे।
- 1:34:26वाह, यह तो बहुत दूर की सोच है। मतलब
- 1:34:29दुश्मन बाहर महीनों डेरा डाले बैठा रहे और
- 1:34:32शहर के अंदर अपनी खेतीबाड़ी चल रही है।
- 1:34:34हां, यह सिर्फ एक दीवार नहीं थी। यह एक
- 1:34:37पूरा सर्वाइवर प्लान था। क्या ऐसा उस दौर
- 1:34:39में आम था?
- 1:34:40नहीं, बिल्कुल नहीं। यह एक असाधारण और
- 1:34:43बहुत ही समझदारी भरी रणनीति थी। घेराबंदी
- 1:34:47महीनों कभी-कभी सालों तक चलती थी। ऐसे में
- 1:34:50दुश्मन का सबसे बड़ा हथियार होता है शहर
- 1:34:53की रसद काट देना।
- 1:34:54ताकि लोग भूख से हार मान लें।
- 1:34:57सही। विजयनगर ने इस रणनीति को ही फेल कर
- 1:35:00दिया। वो आत्मनिर्भर थे।
- 1:35:02और यह दीवारें बनी कैसे थी? बिना गारे या
- 1:35:05सीमेंट के। हां, पत्थर के टुकड़ों को
- 1:35:07फन्नी के आकार में तराशा जाता था और
- 1:35:10उन्हें एक दूसरे में ऐसे फंसाया जाता था
- 1:35:13कि वह अपने वजन से ही टिके रहते थे। शहर
- 1:35:16के प्रवेश द्वारों पर हमें इंडोइस
- 1:35:18इस्लामिक शैली का प्रभाव भी दिखता है।
- 1:35:21जहां मेहराब और गुंबद का इस्तेमाल किया
- 1:35:23गया है।
- 1:35:23अब शहर के दिल में चलते हैं राजकीय
- 1:35:25केंद्र। यहां क्या-क्या था?
- 1:35:27यह शहर के दक्षिण पश्चिमी हिस्से में था।
- 1:35:30इसमें 60 से भी ज्यादा मंदिर थे जो दिखाता
- 1:35:33है कि राजा के लिए धर्म और सत्ता आपस में
- 1:35:37कितने जुड़े हुए थे
- 1:35:38और इमारतें
- 1:35:39यहां की सबसे प्रभावशाली संरचनाओं में से
- 1:35:42दो हैं सभा मंडप और महानमी डिब्बा।
- 1:35:45यह महानवमी डिब्बा नाम से तो लगता है कोई
- 1:35:49त्यौहार मनाने की जगह होगी। पर इतनी विशाल
- 1:35:51संरचना क्या यह सिर्फ धार्मिक कारणों से
- 1:35:54थी या इसका कोई राजनीतिक महत्व भी था।
- 1:35:56बिल्कुल। इसका राजनीतिक महत्व बहुत ज्यादा
- 1:35:59था। यह सिर्फ एक मंच नहीं था। यह सत्ता का
- 1:36:03रंगमंच था। यहां महानवमी यानी दशहरा का
- 1:36:06त्यौहार मनाया जाता था। और इस 10 दिन के
- 1:36:09उत्सव में राजा अपनी प्रजा और अपने नायकों
- 1:36:13के सामने अपनी ताकत, अपनी दौलत और अपने
- 1:36:16रुतबे का प्रदर्शन करता था।
- 1:36:17किस तरह का प्रदर्शन? क्या होता था इन
- 1:36:19कार्यक्रमों में?
- 1:36:20इसमें धार्मिक अनुष्ठान होते थे। जैसे
- 1:36:23मूर्ति पूजा, राज्य के घोड़े की पूजा,
- 1:36:26जानवरों की बलि साथ ही नृत्य, कुश्ती और
- 1:36:30भव्य शोभा यात्राएं निकलती थी।
- 1:36:32अच्छा।
- 1:36:32नायक राजा के लिए उपहार लाते थे और राजा
- 1:36:35भी उन्हें सम्मानित करता था। त्यौहार के
- 1:36:38आखिरी दिन राजा अपनी और अपने नायकों की
- 1:36:41पूरी सेना का एक खुले मैदान में निरीक्षण
- 1:36:43करता था।
- 1:36:43तो यह एक तरह से सबको याद दिलाने का तरीका
- 1:36:45था कि इस साम्राज्य का असली बॉस कौन है?
- 1:36:48एकदम। इस केंद्र में कमल महल और हजार राम
- 1:36:51मंदिर जैसी खूबसूरत इमारतें भी थी।
- 1:36:53हां, कमल महल नाम तो बाद में अंग्रेजों ने
- 1:36:56दिया शायद। इसकी मेहराबों की बनावट कमल की
- 1:36:59पंखुड़ियों जैसी होने के कारण और हजार राम
- 1:37:02मंदिर तो एक कलाकृति है। यह शायद शाही
- 1:37:05परिवार का निजी मंदिर था जिसकी दीवारों पर
- 1:37:08रामायण की पूरी कहानी पत्थर में उकेरी गई
- 1:37:11है।
- 1:37:12अद्भुत राजकीय केंद्र से अब हम चलते हैं
- 1:37:15शहर के धार्मिक केंद्र की ओर। इसका चुनाव
- 1:37:18तुंगभद्रा नदी के किनारे चट्टानी
- 1:37:19पहाड़ियों के बीच क्यों किया गया?
- 1:37:21इस जगह का चुनाव पौराणिक कथाओं से प्रेरित
- 1:37:24था। स्थानीय मान्यता है कि यहीं पर रामायण
- 1:37:27के बाली और सुग्रीव का वानर राज्य था।
- 1:37:31ओ
- 1:37:31और एक और कहानी यह है कि यहीं पर देवी
- 1:37:34पंपा देवी ने भगवान शिव के एक रूप
- 1:37:37विरुपाक्ष से विवाह करने के लिए तपस्या की
- 1:37:40थी। और विरुपाक्ष विजयनगर साम्राज्य के
- 1:37:43संरक्षक देवता भी थे। तो यह भूमि पहले से
- 1:37:46ही पवित्र मानी जाती थी
- 1:37:47और विजयनगर के शासकों ने इस विरासत को और
- 1:37:50आगे बढ़ाया।
- 1:37:51हां, उन्होंने यहां मंदिर निर्माण की
- 1:37:53सदियों पुरानी परंपरा को नई ऊंचाइयों पर
- 1:37:56पहुंचा दिया। उन्होंने विशाल गोपुरम और
- 1:37:59स्तंभों वाले बड़े-बड़े सभागार जिन्हें
- 1:38:01मंडप कहते हैं बनवाए।
- 1:38:03जैसे कि विरुपाक्ष मंदिर और विट्ठल मंदिर।
- 1:38:06हां, यह इसके सबसे अच्छे उदाहरण है।
- 1:38:09कृष्णदेव राय ने अपने राज्यारोहण की याद
- 1:38:11में विरुपाक्ष मंदिर में एक बहुत ही भव्य
- 1:38:14मंडप बनवाया था।
- 1:38:15और विट्ठल मंदिर सुना है वह बहुत अनूठा
- 1:38:17है।
- 1:38:18विट्ठल मंदिर वाकई में अद्भुत है। इसके
- 1:38:20मुख्य देवता विट्ठल है जो महाराष्ट्र में
- 1:38:23पूजे जाने वाले विष्णु का एक रूप है।
- 1:38:26अच्छा। यह दिखाता है कि विजयनगर कैसे
- 1:38:28अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराओं को अपने में
- 1:38:30समाहित कर रहा था। सही बात है। और इस
- 1:38:32मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है पत्थर से
- 1:38:35बना रथ जो असल में एक छोटा मंदिर है और
- 1:38:38इसकी एक और विशेषता है रथ गलियां।
- 1:38:40रथ गलियां?
- 1:38:41हां, यह मंदिर के गोपुरम से निकलने वाली
- 1:38:44चौड़ी सड़कें थी जिनके दोनों तरफ स्तंभों
- 1:38:47वाले मंडप थे जहां व्यापारी अपनी दुकानें
- 1:38:50लगाते थे। मतलब एक तरह से मंदिर और बाजार
- 1:38:54का संगम था।
- 1:38:55तो यह थी विजयनगर की कहानी। एक शहर जो जीत
- 1:38:58के लिए बना जिसने पानी को साधा, पत्थरों
- 1:39:01को कला में बदला और सत्ता को भव्य
- 1:39:04प्रदर्शनों में ढाला। एक ऐसा साम्राज्य जो
- 1:39:06अपनी बुलंदी पर एक मिसाल था और जिसका पतन
- 1:39:10एक चेतावनी है।
- 1:39:11हां, हमने देखा कि कैसे एक खोए हुए शहर को
- 1:39:14यादों और विज्ञान ने मिलकर फिर से खोज
- 1:39:17निकाला। कैसे शासकों ने धर्म, कला और
- 1:39:20सैन्य शक्ति का इस्तेमाल कर एक विशाल
- 1:39:22साम्राज्य खड़ा किया और कैसे एक हार ने सब
- 1:39:25कुछ मलबे में बदल दिया। एक साम्राज्य की
- 1:39:28राजधानी विजयनगर समाप्त हुआ।
- 1:39:33तो आज हम एक तरह से जासूस बनने वाले हैं।
- 1:39:36हां।
- 1:39:37हमारी मंजिल है 16वीं और 17वीं सदी का
- 1:39:40हिंदुस्तान और हमें समझना है एक आम किसान
- 1:39:44की जिंदगी को।
- 1:39:45अच्छा। लेकिन एक बहुत बड़ी मुश्किल है। उस
- 1:39:48किसान ने अपने बारे में कोई चिट्ठी, कोई
- 1:39:50डायरी, कुछ भी नहीं छोड़ा।
- 1:39:52सही बात है।
- 1:39:53हमारे पास सुराग के तौर पर हैं सिर्फ शाही
- 1:39:56दस्तावेज, सरकारी खाते और जमींदारों के
- 1:40:00कागजात। तो चलिए, आज इन्हीं सुरागों को
- 1:40:03जोड़कर उस भूली बिसरी दुनिया की एक तस्वीर
- 1:40:06बनाने की कोशिश करते हैं।
- 1:40:07यह बहुत दिलचस्प शुरुआत है क्योंकि यही इस
- 1:40:09पूरे विषय की सबसे बड़ी चुनौती है और सबसे
- 1:40:12बड़ा रोमांच भी।
- 1:40:13हां। हम उन लोगों की कहानी जानने की कोशिश
- 1:40:16कर रहे हैं जिनकी आवाज आप कह सकते हैं
- 1:40:18इतिहास के पन्नों में लगभग घूम है। हमें
- 1:40:21उनकी दुनिया को उनके मालिकों और शासकों की
- 1:40:23नजरों से देखना पड़ता है।
- 1:40:25तो हमारा सबसे बड़ा सुराग क्या है? वो कौन
- 1:40:28सा दस्तावेज है जिसे इतिहासकार बार-बार
- 1:40:30देखते हैं।
- 1:40:31वो है अबुल फजल की लिखी आईने-अबरी।
- 1:40:34आईने-अबरी।
- 1:40:35जी। यह अकबर के शासनकाल का एक विशाल
- 1:40:38दस्तावेज है जिसमें साम्राज्य के प्रशासन,
- 1:40:42समाज और सबसे जरूरी खेतीबाड़ी और लगान
- 1:40:45व्यवस्था का ब्यौरा है। इसे मुगल
- 1:40:47साम्राज्य का गजेटियर भी कह सकते हैं।
- 1:40:50एक मिनट लेकिन ये तो एक दरबारी इतिहासकार
- 1:40:53ने लिखी है। वो भी बादशाह के कहने पर।
- 1:40:56हम्म।
- 1:40:56तो क्या हम इस पर पूरी तरह भरोसा कर सकते
- 1:40:58हैं? इसमें तो सब कुछ बहुत अच्छा अच्छा ही
- 1:41:01लिखा होगा। है ना? हम्म।
- 1:41:02कि साम्राज्य में सब कुछ व्यवस्थित है। सब
- 1:41:05खुश हैं।
- 1:41:05बिल्कुल सही सवाल और यही एक इतिहासकार का
- 1:41:08पहला काम है। अपने स्रोत पर सवाल उठाना।
- 1:41:11आईने-अबरी हमें ऊपर से नीचे का नजरिया
- 1:41:14यानी अ टॉप डाउन पर्सपेक्टिव देती है।
- 1:41:17ओके।
- 1:41:17यह बताती है कि राज्य समाज को कैसे देखता
- 1:41:20था और कैसे चलाना चाहता था। लेकिन इसके
- 1:41:23अलावा हमारे पास गुजरात, महाराष्ट्र और
- 1:41:26राजस्थान से मिले दूसरे दस्तावेज भी हैं।
- 1:41:29अच्छा। जैसे सरकारी हुक्मनामे, जमीन के
- 1:41:32सौदे, झगड़ों के रिकॉर्ड जो इस शाही
- 1:41:35तस्वीर में कुछ और रंग भरते हैं। इन सबको
- 1:41:38मिलाकर ही हम एक ज्यादा सच्ची तस्वीर के
- 1:41:40करीब पहुंच सकते हैं।
- 1:41:42ठीक है। तो इन दस्तावेजों में किसानों के
- 1:41:46लिए क्या शब्द इस्तेमाल हुए हैं? क्या
- 1:41:48किसान को किसान ही कहते थे?
- 1:41:50आमतौर पर उनके लिए रयत या आसामी जैसे शब्द
- 1:41:54मिलते हैं। और दिलचस्प बात यह है कि सारे
- 1:41:56किसान एक जैसे नहीं थे।
- 1:41:58अच्छा। मोटे तौर पर दो तरह के किसान थे।
- 1:42:00ये तो बड़ी कमाल की बात है। मुझे तो लगता
- 1:42:02था कि किसान मतलब किसान यह बंटवारा क्यों
- 1:42:06था? क्या यह अमीर और गरीब किसान जैसा कुछ
- 1:42:09था?
- 1:42:09हां, आप इसे कुछ हद तक वैसा समझ सकती हैं।
- 1:42:12पहले थे खुद काश्त।
- 1:42:14खुद काश्त।
- 1:42:15खुद यानी अपना। काश्त यानी खेती। यह वो
- 1:42:18किसान थे जो उसी गांव में रहते थे जहां
- 1:42:20उनकी जमीन थी और उस जमीन पर उनका मालिकाना
- 1:42:23हक था। यह गांव के रसूखदार लोग और दूसरे
- 1:42:26दूसरे थे पाही काश्त। यह वह किसान थे जो
- 1:42:29दूसरे गांव से ठेके पर यानी कॉन्ट्रैक्ट
- 1:42:31पर खेती करने आते थे।
- 1:42:33तो यह एक तरह से उस जमाने के माइग्रेंट
- 1:42:35वर्कर्स हुए
- 1:42:36जो बेहतर मौकों या शायद किसी मजबूरी में
- 1:42:39अपना गांव छोड़कर कहीं और खेती कर रहे थे।
- 1:42:41बिल्कुल। अक्सर अकाल या भुखमरी जैसी
- 1:42:44आपदाओं के बाद लोग पाई काश्त बन जाते थे।
- 1:42:47जाहिर है गांव के समाज में उनका दर्जा खुद
- 1:42:49काश्त किसानों जैसा नहीं था। तो हां गांव
- 1:42:52के अंदर एक साफ सामाजिक और आर्थिक सीढ़ी
- 1:42:55बनी हुई थी।
- 1:42:55अब जरा खेतों की तरफ चलते हैं। उस दौर में
- 1:42:58तकनीक कैसी थी? क्या बड़े-बड़े आविष्कार
- 1:43:01हो रहे थे या सब कुछ मतलब सदियों पुराने
- 1:43:04ढर्रे पर ही चल रहा था?
- 1:43:05देखिए आज के जमाने जैसी मशीनी क्रांति तो
- 1:43:08नहीं थी। लेकिन तकनीक स्थिर भी नहीं थी।
- 1:43:11खेती का आधार था लकड़ी का हल जिसके आगे
- 1:43:14लोहे की फाल लगी होती थी। और साथ में
- 1:43:17बैलों की एक जोड़ी।
- 1:43:18हां। मेहनत का काम था। हां बहुत। लेकिन
- 1:43:21सिंचाई के मामले में काफी इंजीनियटी यानी
- 1:43:24जुगाड़ और तकनीक का इस्तेमाल होता था।
- 1:43:26जैसे कि
- 1:43:27खेती बहुत हद तक मानसून पर निर्भर थी।
- 1:43:30लेकिन जहां पानी की कमी थी, वहां इंसान ने
- 1:43:32रास्ते निकाले। कुओं से पानी निकालने के
- 1:43:35लिए राहत का इस्तेमाल होता था।
- 1:43:36राहत
- 1:43:37जिसे हम पर्शियन व्हील के नाम से भी जानते
- 1:43:40हैं। और यह रहट उस जमाने की एक कमाल की
- 1:43:42इंजीनियरिंग थी। सोचिए, बिना बिजली के
- 1:43:46सिर्फ बैलों की ताकत से कुएं से लगातार
- 1:43:48पानी खींचना। हां, इसने तो उन इलाकों की
- 1:43:51पूरी तस्वीर बदल दी होगी जहां बारिश कम
- 1:43:53होती थी।
- 1:43:54बिल्कुल यही तकनीक तय करती थी कि साल में
- 1:43:57एक फसल होगी या दो। राज्य भी नहरे खुदवाने
- 1:44:00में दिलचस्पी लेता था।
- 1:44:01और फसलों में कितनी वैरायटी थी? क्या
- 1:44:03किसान बस अपनी जरूरत के लिए गेहूं चावल
- 1:44:06उगाते थे?
- 1:44:06नहीं नहीं। फसलों में बहुत जबरदस्त
- 1:44:09विविधता थी। साल में दो मुख्य फसलें होती
- 1:44:11थी। पतझड़ में खरीफ और बसंत में रबी।
- 1:44:14ज्यादातर किसान साल में दो फसलें तो उगा
- 1:44:16ही लेते थे।
- 1:44:17ओके। लेकिन सबसे दिलचस्प बात है कुछ खास
- 1:44:20फसलों की जिन्हें मुगल दस्तावेजों में
- 1:44:23जिं्स ए कामिल कहा गया है।
- 1:44:25जिं्स ए कामिल इसका मतलब क्या हुआ?
- 1:44:27इसका शाब्दिक अर्थ है उत्तम फसलें या
- 1:44:29परफेक्ट क्रॉप्स। यह वो फसलें थी जिन्हें
- 1:44:32बेचकर अच्छा पैसा कमाया जा सकता था।
- 1:44:34अच्छा तो जिनसे कामिल एक तरह से मुगल
- 1:44:38सरकार की कैश काउस थी। वो फसलें जिन पर
- 1:44:41सरकार ज्यादा टैक्स लगाकर अपनी तिजोरी
- 1:44:44भरती थी।
- 1:44:45एकदम सही पकड़ा आपने। जैसे कि कपास या
- 1:44:48गन्ना।
- 1:44:49कपास और गन्ना इसके बेहतरीन उदाहरण हैं।
- 1:44:51मुगल राज्य किसानों को ऐसी फसलें उगाने के
- 1:44:53लिए बढ़ावा भी देता था क्योंकि इससे राज्य
- 1:44:55को नकद में ज्यादा राजस्व मिलता था।
- 1:44:58हम
- 1:44:58इसी दौर में एक और बड़ी मजेदार चीज हुई।
- 1:45:01खाने की थाली में क्रांति आ गई।
- 1:45:03वो कैसे?
- 1:45:04इसी दौर में मक्का, टमाटर, आलू और मिर्च
- 1:45:07जैसी फसलें नई दुनिया यानी अमेरिका से
- 1:45:10भारत पहुंची।
- 1:45:10क्या बात कर रही है?
- 1:45:11हां। और तंबाकू भी पुर्तगालियों के जरिए
- 1:45:14धक्कन आया और इतनी तेजी से फैला कि
- 1:45:16जहांगीर को उस पर पाबंदी लगाने की सोचनी
- 1:45:19पड़ी।
- 1:45:19मतलब टमाटर, आलू और मिर्च यह सब भारत में
- 1:45:22हमेशा से नहीं थे। तो मुगल काल से पहले
- 1:45:25हमारी सब्जियों और करी का स्वाद कितना अलग
- 1:45:28होता होगा यह सोचना भी मुश्किल है। है ना?
- 1:45:31बिल्कुल। यह दिखाता है कि उस दौर का कृषि
- 1:45:34समाज कितना डायनामिक और दुनिया से जुड़ा
- 1:45:36हुआ था।
- 1:45:36तो हमने खेतों की बात कर ली, फसलों की बात
- 1:45:39कर ली। अब जरा गांव के अंदर चलते हैं। इन
- 1:45:42खुदकाश्त और पाए काश्त किसानों का समाज
- 1:45:45कैसा था? क्या वहां कोई व्यवस्था थी? कोई
- 1:45:48कानून था?
- 1:45:49हां। गांव अपने आप में एक छोटी सी दुनिया
- 1:45:52थे। जाति व्यवस्था समाज का एक अहम आधार
- 1:45:55थी।
- 1:45:56ओके।
- 1:45:56जो लोग खेती करते थे, वह कई जातियों से
- 1:45:59आते थे। लेकिन खेतों में मजदूरी करने वाले
- 1:46:02या दूसरे छोटे-मोटे सेवा वाले काम करने
- 1:46:04वाले लोग अक्सर उन जातियों से होते थे,
- 1:46:07जिन्हें नीची जाति समझा जाता था। हम उनके
- 1:46:10साथ भेदभाव होता था।
- 1:46:11हां। और वह सबसे गरीब तबके में आते थे।
- 1:46:14और इन गांव में लड़ाई झगड़े या दूसरे मसले
- 1:46:16कौन सुलझाता था? क्या कोई अदालत होती थी?
- 1:46:19गांव की अपनी अदालत और सरकार होती थी जिसे
- 1:46:22पंचायत कहते थे। पंचायत में गांव के बड़े
- 1:46:25बुजुर्ग और सम्मानित लोग होते थे। आमतौर
- 1:46:28पर खुद काशस्त वर्ग के।
- 1:46:29अच्छा।
- 1:46:30पंचायत का एक मुखिया होता था जिसे मुकद्दम
- 1:46:33या मंडल कहा जाता था।
- 1:46:34तो यह मुकद्दम आज के सरपंच जैसा हुआ।
- 1:46:37काफी हद तक। उसका काम गांव में शांति बनाए
- 1:46:40रखना, झगड़े सुलझाना और यह देखना था कि सब
- 1:46:43अपनी जाति के नियमों का पालन करें।
- 1:46:45तो पंचायत के पास पावर भी थी।
- 1:46:47बड़ी ताकत थी। वह जुर्माना लगा सकती थी और
- 1:46:50किसी को जाति या गांव से बाहर निकालने
- 1:46:52जैसा सख्त दंड भी दे सकती थी। गांव के
- 1:46:54साझा खर्चे का हिसाब किताब भी यही पंचायत
- 1:46:57रखती थी।
- 1:46:57इस पूरी कहानी में हमने पुरुषों की तो
- 1:47:00बहुत बात की। खेतों में, पंचायतों में,
- 1:47:03लेकिन इस कृषि समाज में महिलाओं की क्या
- 1:47:06जगह थी? यह एक बहुत जरूरी सवाल है।
- 1:47:09महिलाएं इस कृषि अर्थव्यवस्था की रीड थी।
- 1:47:12हम
- 1:47:12वह पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर
- 1:47:14खेतों में काम करती थी। बुवाई से लेकर
- 1:47:17निराई और कटाई तक। कुछ काम तो खासतौर पर
- 1:47:21महिलाओं के ही जिम्मे थे। जैसे सूत काटना,
- 1:47:24मिट्टी के बर्तन के लिए मिट्टी गूंथना या
- 1:47:26कपड़ों पर कढ़ाई करना। उनके श्रम के बिना
- 1:47:29यह पूरी व्यवस्था चल ही नहीं सकती थी।
- 1:47:31लेकिन क्या काम में इस बराबरी का मतलब?
- 1:47:34समाज में भी बराबरी था? खासकर जमीन और
- 1:47:37संपत्ति के मामले में
- 1:47:38दुर्भाग्य से नहीं समाज पितृवंशीय था यानी
- 1:47:42पैट्रिलिनियल इसलिए जमीन का मालिकाना हक
- 1:47:45पुरुषों के पास ही रहता था और विरासत पिता
- 1:47:48से बेटे को मिलती थी
- 1:47:49तो महिलाओं को कोई अधिकार नहीं था
- 1:47:51बहुत कम हालांकि बंगाल जैसे कुछ इलाकों
- 1:47:54में हमें ऐसी विधवा महिलाओं के उदाहरण
- 1:47:56मिलते हैं जिन्हें जमींदारी विरासत में
- 1:47:58मिली और उन्होंने उसे बेचा भी लेकिन यह
- 1:48:01अपवाद थे नियम नहीं
- 1:48:03तो उनकी हालत अच्छी नहीं थी नहीं समाज का
- 1:48:06उन पर कड़ा नियंत्रण था और उन्हें कुपोषण
- 1:48:09और बच्चे को जन्म देते समय होने वाली मौत
- 1:48:12का खतरा भी ज्यादा झेलना पड़ता था।
- 1:48:14तो गांव का समाज तो बहुत व्यवस्थित था।
- 1:48:16पंचायतें थी, नियम कानून थे। लेकिन क्या
- 1:48:19हर कोई इसी व्यवस्था का हिस्सा था? मतलब
- 1:48:22उस समय भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा तो
- 1:48:24जंगलों से ढका था। वहां कौन लोग रहते थे?
- 1:48:27बिल्कुल। यह एक और दिलचस्प दुनिया है। उस
- 1:48:30समय भारत का करीब 40% हिस्सा जंगलों,
- 1:48:33झाड़ियों और पहाड़ों से ढका था। इन जंगलों
- 1:48:36में रहने वाले लोगों के लिए फारसी
- 1:48:38दस्तावेजों में जंगली जंगली शब्द का
- 1:48:41इस्तेमाल होता है।
- 1:48:42जंगली, आज तो इस शब्द का मतलब असभ्य या
- 1:48:45अनसिविलाइज्ड निकाला जाता है। क्या तब भी
- 1:48:48इसका यही मतलब था?
- 1:48:49नहीं बिल्कुल नहीं। उस समय जंगली होने का
- 1:48:52मतलब असभ्य होना नहीं था। इसका सीधा सा
- 1:48:55मतलब था वो इंसान जिसका गुजारा जंगल के
- 1:48:58उत्पादों, शिकार और स्थानांतरणीय खेती
- 1:49:01यानी शिफ्टिंग एग्रीकल्चर पर निर्भर हो।
- 1:49:03अच्छा।
- 1:49:04यह लोग जंगल के मौसम के हिसाब से अपनी
- 1:49:06जिंदगी जीते थे? बसंत में शहद और मोम
- 1:49:09इकट्ठा करना, गर्मियों में मछली पकड़ना,
- 1:49:11मानसून में खेती करना।
- 1:49:12तो राज्य मतलब मुगल सरकार इन्हें कैसे
- 1:49:15देखती थी? क्या वो उन्हें उनके हाल पर
- 1:49:17छोड़ देती थी?
- 1:49:18राज्य उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकता था।
- 1:49:21जंगल से शहद, मोम और लाख जैसी कीमती चीजें
- 1:49:24मिलती थी।
- 1:49:25हम
- 1:49:26और सेना के लिए सबसे जरूरी चीज हाथी भी
- 1:49:28जंगलों से ही आते थे। लेकिन जंगल राज्य के
- 1:49:32लिए एक सिरदर्द भी थे।
- 1:49:33सिरदर्द क्यों?
- 1:49:34यह वो वाइल्ड वैस था जहां अक्सर बागी और
- 1:49:36विद्रोही शरण लेते थे। इसलिए राज्य के
- 1:49:39हमेशा कोशिश रहती थी कि इन कबीलों पर किसी
- 1:49:41तरह नियंत्रण रखा जाए। उन्हें अपनी सेना
- 1:49:44में शामिल किया जाए या उनसे टैक्स वसूला
- 1:49:46जाए। चलिए अब उस किरदार की बात करते हैं
- 1:49:49जिसका नाम इस कहानी के शीर्षक में है
- 1:49:52जमींदार। यह कौन लोग थे? क्या यह किसानों
- 1:49:55के दोस्त थे या दुश्मन?
- 1:49:57यह ग्रामीण समाज के सबसे ताकतवर लोग थे।
- 1:50:01जमींदार वो वर्ग था जिसकी आमदनी खेती से
- 1:50:04नहीं बल्कि जमीन पर उनके मालिकाना हक से
- 1:50:07आती थी।
- 1:50:07अच्छा तो वो खुद खेती नहीं करते थे।
- 1:50:10नहीं। उनकी अपनी निजी जमीनें होती थी
- 1:50:12जिन्हें मिल्कियत कहते थे। जिन पर मजदूर
- 1:50:15काम करते थे। तो उनका असली काम क्या था?
- 1:50:18उनका सबसे बड़ा काम था राज्य के लिए
- 1:50:20किसानों से लगान वसूलना। इस सेवा के बदले
- 1:50:23राज्य उन्हें मुआवजा देता था। लेकिन
- 1:50:25जमींदारों की ताकत सिर्फ यहीं तक सीमित
- 1:50:28नहीं थी।
- 1:50:28और क्या था?
- 1:50:29उनके पास अपनी छोटी-मोटी सेनाएं होती थी।
- 1:50:32घुड़सवार, पैदल सिपाही और यहां तक कि छोटे
- 1:50:34किले भी जिन्हें किलाचा कहा जाता था। इसी
- 1:50:37सैन्य ताकत के दम पर वो ग्रामीण इलाकों पर
- 1:50:40अपना दबदबा बनाए रखते थे। तो यह जमींदार
- 1:50:43सरकार और किसान के बीच एक बिचौलिए की तरह
- 1:50:45थे।
- 1:50:46और [गला साफ़ करने की आवाज़] इसी से जुड़ा
- 1:50:47है पूरा भू-राजस्व का सिस्टम।
- 1:50:49यह काम कैसे करता था?
- 1:50:51बिल्कुल। भू-राजस्व यानी लैंड रेवेन्यू
- 1:50:54मुगल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद थी और
- 1:50:56इसे इकट्ठा करने का एक बड़ा व्यवस्थित
- 1:50:58तंत्र था जिसकी देखरेख दीवान का दफ्तर
- 1:51:01करता था।
- 1:51:02ओके।
- 1:51:02इस प्रक्रिया में दो अहम शब्द हैं। जमा और
- 1:51:06हासिल।
- 1:51:06जमा और हासिल।
- 1:51:08इनमें क्या फर्क था? जमा वो रकम थी जो
- 1:51:10सरकार निर्धारित करती थी। अ काइंड ऑफ
- 1:51:13असेस्ड अमाउंट और हासिल वो रकम थी जो असल
- 1:51:16में वसूली जाती थी। दी एक्चुअल कलेक्टेड
- 1:51:19अमाउंट।
- 1:51:19तो यह हमेशा बराबर नहीं होते थे?
- 1:51:22नहीं। कभी फसल खराब हो गई या कोई और
- 1:51:24मुसीबत आ गई तो असल वसूली निर्धारित रकम
- 1:51:26से कम रह जाती थी।
- 1:51:28और इसी दौर में एक और बड़ी घटना हो रही
- 1:51:31थी। पूरी दुनिया से चांदी भारत की तरफ
- 1:51:34बहकर आ रही थी। इसका इस लगान व्यवस्था पर
- 1:51:37क्या असर पड़ा? इसका बहुत गहरा असर पड़ा।
- 1:51:40यूरोप के साथ व्यापार बढ़ने की वजह से
- 1:51:42भारत में बड़े पैमाने पर चांदी आई। इससे
- 1:51:45मुगल टसालों में सिक्कों की ढलाई बढ़ गई।
- 1:51:48नतीजा यह हुआ कि अर्थव्यवस्था ज्यादा
- 1:51:50मोनेटाइज्ड हो गई।
- 1:51:52मतलब अब नकद में लेनदेन ज्यादा होने लगा।
- 1:51:55हां, अब राज्य के लिए नकद में लगान वसूलना
- 1:51:58और किसान के लिए नकद में लगान चुकाना
- 1:52:01दोनों आसान हो गया। इसने भारतीय गांव को
- 1:52:04पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था से जोड़
- 1:52:06दिया। तो घूम फिर कर हम फिर वहीं आ गए
- 1:52:08जहां से हमने शुरू किया था आईने-अबरी।
- 1:52:12अब जबकि हम किसानों, पंचायतों, जमींदारों
- 1:52:16और जंगलों की दुनिया को थोड़ा समझ चुके
- 1:52:18हैं तो इस किताब को हम कैसे देखें? आईन
- 1:52:21अकबरी अबुल फजल के एक और बड़े ग्रंथ
- 1:52:24अकबरनामा का ही हिस्सा है। आइन को पांच
- 1:52:27किताबों यानी दफ्तर में बांटा गया है।
- 1:52:30पांच दफ्तर
- 1:52:31संघ की बात करते हैं। इनमें से तीसरी
- 1:52:34किताब मुल्क आबादी हमारे लिए सोने की खान
- 1:52:37है।
- 1:52:37मुल्क आबादी में ऐसा क्या खास है? इसमें
- 1:52:40पूरे साम्राज्य के वित्तीय पहलू और जमीन
- 1:52:43से मिलने वाले लगान की दरों का एक-एक सूबे
- 1:52:46एक-एक परगने का हिसाब दिया गया है। यह उस
- 1:52:49समय की कृषि दुनिया को समझने के लिए एक
- 1:52:51बेजोड़ स्रोत है।
- 1:52:52हम
- 1:52:53यह हमें बताता है कि राज्य क्या-क्या
- 1:52:55जानकारी इकट्ठा कर रहा था और किस चीज को
- 1:52:57जरूरी समझता था।
- 1:52:59लेकिन इसकी सीमाएं क्या हैं? जो सवाल
- 1:53:01मैंने शुरू में उठाया था कि यह एक शाही
- 1:53:04नजरिया है।
- 1:53:05वही इसकी सबसे बड़ी सीमा है। पहली बात तो
- 1:53:07यह कि इसमें दिए गए आंकड़ों को जोड़ने में
- 1:53:10कई जगह इंसानी भूल हुई है। लेकिन ज्यादा
- 1:53:12बड़ी बात यह है कि यह हमें सिर्फ केंद्र
- 1:53:15का यानी दिल्ली और आगरा के सिंहासन का
- 1:53:17नजरिया दिखाती है।
- 1:53:18तो यह किसानों की आवाज नहीं है।
- 1:53:20बिल्कुल नहीं। यह हमें यह नहीं बताती कि
- 1:53:23एक आम किसान लगान के बोझ के बारे में क्या
- 1:53:26सोचता था या एक पाहे कास्ट किसान अपनी
- 1:53:29जिंदगी कैसे देखता था। उनकी खुशी, उनके
- 1:53:31गम, उनकी शिकायतें यह सब आइन के पन्नों से
- 1:53:34गायब हैं।
- 1:53:34तो यह एक ऐसी तस्वीर है जिसमें रंग तो
- 1:53:37बहुत है लेकिन आवाजें सिर्फ बादशाह और
- 1:53:40उसके दरबारियों की हैं।
- 1:53:42बिल्कुल। यह एक शानदार लेकिन अधूरी तस्वीर
- 1:53:44है।
- 1:53:45आज हमने शाही दस्तावेजों के जरिए एक ऐसी
- 1:53:48दुनिया को समझने की कोशिश की जिसके लोगों
- 1:53:50ने अपनी कोई कहानी नहीं छोड़ी। हमने देखा
- 1:53:53कि गांव सिर्फ खेत नहीं थे बल्कि एक जटिल
- 1:53:56समाज थे। जमींदार सिर्फ टैक्स वसूलने वाले
- 1:53:59नहीं थे बल्कि अपनी ताकत के केंद्र थे।
- 1:54:02हम
- 1:54:03और मुगल साम्राज्य सिर्फ किलों और महलों
- 1:54:05से नहीं बल्कि किसानों के पसीने से पैदा
- 1:54:08हुए राजस्व से चलता था। हां
- 1:54:10और यह सोचते हुए इस बातचीत को खत्म करना
- 1:54:12शायद दिलचस्प होगा कि हमने यह पूरी कहानी
- 1:54:14आईने-अबरी और सरकारी दस्तावेजों से बनाई।
- 1:54:17हां।
- 1:54:18अगर हमें कहीं से 17वीं शताब्दी के किसी
- 1:54:20पाही काष्ट किसान की लिखी एक चिट्ठी मिल
- 1:54:23जाती तो वो हमें इस दुनिया के बारे में
- 1:54:25ऐसा क्या बता सकती थी जो ये बड़े-बड़े
- 1:54:28ग्रंथ कभी नहीं बता पाए।
- 1:54:32तो आज हम मुगल दरबार की दुनिया में उतरने
- 1:54:35वाले हैं।
- 1:54:36जी। हमारे पास जो स्रोत है वह एनसीईआरटी
- 1:54:38के इतिहास की किताब से हैं। पर हम इसे
- 1:54:41सिर्फ मतलब दोहराएंगे नहीं। हम इसके पीछे
- 1:54:44के क्यों और कैसे को समझने की कोशिश
- 1:54:46करेंगे। और पहली बात जो मुझे बहुत दिलचस्प
- 1:54:49लगी वो ये है कि मुगल नाम
- 1:54:52हां
- 1:54:52जिसे हम और आप इस्तेमाल करते हैं वो असल
- 1:54:54में उन्होंने खुद के लिए कभी इस्तेमाल ही
- 1:54:56नहीं किया।
- 1:54:56यह बिल्कुल सही बात है। यह एक बहुत बड़ा
- 1:54:58मतलब मिथक कह सकते हैं।
- 1:55:01अच्छा। मुगल नाम असल में मंगोल से निकला
- 1:55:04है और मुगल शासक खुद को चंगेज़ खान के वंश
- 1:55:07से जोड़े जाने पर ज्यादा गर्व महसूस नहीं
- 1:55:10करते थे।
- 1:55:10तो वो खुद को क्या कहते थे?
- 1:55:12वे खुद को तैमूरी कहलाना पसंद करते थे।
- 1:55:14तैमूरी
- 1:55:15जी। क्योंकि वे पितृ पक्ष से तुर्क शासक
- 1:55:18तैमूर के वंशज थे। तो एक तरह से उनका वंश
- 1:55:21दो महान लेकिन बहुत अलग एशियाई योद्धा
- 1:55:24परंपराओं का संगम था। तो इस साम्राज्य की
- 1:55:27शुरुआत कैसे हुई? मतलब बाबर जो पहले मुगल
- 1:55:30शासक थे उनकी कहानी क्या है?
- 1:55:33देखिए बाबर की कहानी एक सर्वाइवर की कहानी
- 1:55:36है। उन्हें मशिया में उनके दुश्मनों मतलब
- 1:55:39उज़्बेको ने
- 1:55:39हां उज़बेको ने
- 1:55:40उन्होंने उनके घर से ही खदेड़ दिया था। कई
- 1:55:43साल भटकने के बाद उन्होंने पहले काबुल में
- 1:55:45अपनी सत्ता स्थापित की।
- 1:55:46और फिर भारत आए।
- 1:55:47जी। और फिर 1526 में दिल्ली के सुल्तान
- 1:55:51इब्राहिम लोदी को हराकर भारत में एक नए
- 1:55:54अध्याय की शुरुआत की। यह सिर्फ एक लड़ाई
- 1:55:57नहीं थी। यह एक नए साम्राज्य की नींव थी।
- 1:55:59और बाबर के बाद जो शासक आए उनका क्रम भी
- 1:56:02बहुत दिलचस्प है। बाबर, फिर हुमायूं, फिर
- 1:56:05अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब।
- 1:56:08जी।
- 1:56:09लेकिन इन सब में अकबर को ही सबसे महान
- 1:56:11क्यों माना जाता है? मतलब उन्होंने ऐसा
- 1:56:13क्या अलग किया जो उनके दादा बाबर या
- 1:56:16परपोते औरंगजेब ने नहीं किया।
- 1:56:18ये बहुत अच्छा सवाल है। देखिए बाबर ने
- 1:56:21साम्राज्य की नींव रखी। पर उसे असल में
- 1:56:24मजबूत और एक भारतीय साम्राज्य का रूप अकबर
- 1:56:26ने दिया।
- 1:56:27अच्छा।
- 1:56:27उन्होंने प्रशासन, धर्म और संस्कृति में
- 1:56:30ऐसे प्रयोग किए जो उस समय के लिए मतलब
- 1:56:33क्रांतिकारी थे। जहांगीर और शाहजहां ने उस
- 1:56:36विरासत को आगे बढ़ाया। लेकिन औरंगजेब के
- 1:56:38समय में वह नीतियां कुछ हद तक बदल गई। और
- 1:56:41शायद इसीलिए
- 1:56:42हां और शायद इसीलिए 1707 में उनकी मृत्यु
- 1:56:46के बाद साम्राज्य का पतन भी तेजी से शुरू
- 1:56:48हो गया।
- 1:56:49तो अकबर की इस सोच को उनके शासन के तरीकों
- 1:56:52को हम आज समझते कैसे हैं? यहीं पर शायद
- 1:56:55इतिवृत्त या क्रॉनिकल्स की भूमिका आती है।
- 1:56:58बिल्कुल।
- 1:56:59यह क्या थे? क्या यह सिर्फ राजा की डायरी
- 1:57:02जैसा कुछ थे?
- 1:57:02उससे कहीं ज्यादा। यह इतिवृत्त या
- 1:57:05क्रॉनिकल्स उस दौर के सबसे महत्वपूर्ण
- 1:57:08दस्तावेज थे। यह सिर्फ घटनाओं का
- 1:57:10लेखा-जोखा नहीं थे।
- 1:57:11तो फिर क्या थे?
- 1:57:12यह एक तरह से प्रोपेगेंडा और पीआर
- 1:57:14मैनेजमेंट के टूल भी थे।
- 1:57:16अच्छा।
- 1:57:17इन्हें बहुत सावधानी से लिखवाया जाता था
- 1:57:19ताकि यह साबित हो सके कि बादशाह का राज
- 1:57:22करना ईश्वर की मर्जी है और जो भी उनका
- 1:57:24विरोध करेगा, वह नाकाम होगा। यह आने वाली
- 1:57:27पीढ़ियों के लिए एक तरह का ब्लूप्रिंट भी
- 1:57:29थे।
- 1:57:30और इन्हें लिखने के लिए फारसी भाषा को
- 1:57:32चुना गया। जबकि मुगलों की अपनी मातृभाषा
- 1:57:35तुर्की थी।
- 1:57:36जी। यह सिर्फ भाषा का बदलाव था या इसके
- 1:57:39पीछे कोई गहरी रणनीति थी?
- 1:57:41यह एक बहुत बड़ा और सोचा समझा रणनीतिक
- 1:57:44फैसला था।
- 1:57:45वो कैसे?
- 1:57:46उस समय मध्य और पश्चिम एशिया में फारसी,
- 1:57:48संस्कृति, साहित्य और कूटनीति की भाषा थी।
- 1:57:52जैसे आज के दौर में अंग्रेजी है।
- 1:57:54अच्छा तो एक तरह से इंटरनेशनल लैंग्वेज।
- 1:57:56बिल्कुल। फारसी को अपनाकर अकबर मुगल दरबार
- 1:58:00को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच से जोड़ रहे
- 1:58:02थे। इससे ईरान और मध्य एशिया से बेहतरीन
- 1:58:05कवियों, विद्वानों और अधिकारियों को भारत
- 1:58:08आने का न्योता मिला।
- 1:58:09और इसने एक कॉमन भाषा भी दी होगी प्रशासन
- 1:58:12के लिए।
- 1:58:12सही कहा। इसने एक ऐसी प्रशासनिक भाषा भी
- 1:58:15दी जो भारत की स्थानीय भाषाओं से तटस्थ
- 1:58:18थी।
- 1:58:18और इन इतिवृत्तों को बनाया कहा जाता था।
- 1:58:21हमारे स्रोतों में किताबखाना का जिक्र है।
- 1:58:25यह किसी आम लाइब्रेरी जैसा तो नहीं लगता?
- 1:58:28बिल्कुल नहीं। किताबखाना को आप एक शाही
- 1:58:30प्रोडक्शन हाउस या स्टूडियो समझिए।
- 1:58:33प्रोडक्शन हाउस।
- 1:58:34हां, यह एक शांत पुस्तकालय नहीं बल्कि एक
- 1:58:36व्यस्त जगह थी। जहां पांडुलिपियां तैयार
- 1:58:39होती थी। यहां कागज बनाने वाले सुलेखक
- 1:58:42यानी कैलीग्राफर
- 1:58:43जो हाथ से लिखते थे।
- 1:58:45जी। और चित्रकार जो घटनाओं को तस्वीरों
- 1:58:47में ढालते थे और जिल्द साज जो इन पन्नों
- 1:58:50को एक खूबसूरत किताब की शक्ल देते थे। ये
- 1:58:53सब एक साथ काम करते थे। एक-एक पांडुलिपि
- 1:58:56एक कलाकृति होती थी। आपने चित्रकारों का
- 1:58:58जिक्र किया तो यह इतिवृत्त सिर्फ शब्द
- 1:59:01नहीं थे। इनमें तस्वीरें भी थी। यह मुगल
- 1:59:04मिनिएचर पेंटिंग्स तो बहुत मशहूर है।
- 1:59:07हां। लेकिन यहां एक दिलचस्प वैचारिक टकराव
- 1:59:10भी था।
- 1:59:10कैसा टकराव?
- 1:59:11इस्लाम के कुछ रूढ़िवादी धर्म गुरु
- 1:59:13जिन्हें उलेमा कहा जाता था। मानते थे कि
- 1:59:16किसी भी जीवित चीज का चित्र बनाना
- 1:59:18ईश्वर के काम में दखल देना है।
- 1:59:20बिल्कुल। दखल देने जैसा है और यह इस्लाम
- 1:59:23के खिलाफ है।
- 1:59:24तो फिर बादशाहों ने खासकर अकबर ने इस
- 1:59:27विरोध के बावजूद चित्रकला को इतना बढ़ावा
- 1:59:30कैसे दिया?
- 1:59:31यहीं पर अकबर की चतुराई दिखती है। उनके
- 1:59:33दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने लिखा है कि
- 1:59:36बादशाह का मानना था कि जब एक चित्रकार
- 1:59:39किसी की तस्वीर बनाता है तो उसे यह गहरा
- 1:59:42एहसास होता है कि वह सिर्फ बाहरी रूप बना
- 1:59:45सकता है।
- 1:59:46उसमें जान नहीं डाल सकता।
- 1:59:47सही। जान डालने की शक्ति तो सिर्फ ईश्वर
- 1:59:50के पास है। इस तरह उन्होंने चित्रकला को
- 1:59:53ईश्वर की शक्ति को समझने का एक जरिया
- 1:59:56बताकर इसे सही ठहराया।
- 1:59:58कमाल है और ऐसे दो सबसे मशहूर इतिव्रत है
- 2:00:01अकबरनामा और बादशाहनामा।
- 2:00:03जी अकबरनामा जैसा नाम से ही जाहिर है।
- 2:00:06अकबर के शासन का इतिहास है जिसे अबुल फजल
- 2:00:09ने लिखा था। इसकी तीसरी जिल्द आईने-अबरी।
- 2:00:12हां, उसके बारे में तो सुना है।
- 2:00:14वह तो अपने आप में एक खजाना है। वह सिर्फ
- 2:00:16इतिहास नहीं बल्कि अकबर के साम्राज्य का
- 2:00:19पूरा प्रशासनिक, सामाजिक और भौगोलिक सर्वे
- 2:00:22है।
- 2:00:22और बादशाहनामा
- 2:00:24बादशाहनामा जो शाहजहां के दौर का इतिहास
- 2:00:26है। उसे अबुल फजल के ही एक शिष्य अब्दुल
- 2:00:29हमीद लाहौरी ने लिखा था।
- 2:00:30तो इन इतिव्रत्तों ने एक आदर्श राजा की
- 2:00:33छवि बनाई। लेकिन इस आदर्श के पीछे की
- 2:00:36विचारधारा क्या थी? वो कौन से विचार थे जो
- 2:00:39इस विशाल साम्राज्य को एक साथ जोड़े हुए
- 2:00:42थे?
- 2:00:42इसका सबसे बड़ा आधार था एक विचार जिसे
- 2:00:45फर्रे इजादी कहा गया।
- 2:00:47फर्रे इजादी
- 2:00:48जी जिसका मतलब है दैय प्रकाश। इस ईरानी
- 2:00:51विचार के अनुसार राजा को अपनी शक्ति सीधे
- 2:00:53ईश्वर से मिलती है। वह धरती पर ईश्वर का
- 2:00:56प्रतिनिधि है। यह प्रकाश पीढ़ी दर पीढ़ी
- 2:00:58हस्तांतरित होता था।
- 2:00:59तो यह सिर्फ एक राजनैतिक विचार नहीं था।
- 2:01:01नहीं बिल्कुल नहीं। यह राजा को एक
- 2:01:03आध्यात्मिक गुरु का दर्जा भी देता था। और
- 2:01:05इसी दैय शक्ति को जमीन पर उतारने के लिए
- 2:01:08अकबर ने सुलह कुल की नीति अपनाई। इसका
- 2:01:12शाब्दिक अर्थ है पूर्ण शांति।
- 2:01:14जी।
- 2:01:14यह सुनने में बहुत आदर्शवादी लगता है।
- 2:01:17लेकिन इसका असली मतलब क्या था?
- 2:01:19सुलह कुल अकबर की सबसे बड़ी राजनीतिक और
- 2:01:23दार्शनिक देन थी। यह सिर्फ सहिष्णुता नहीं
- 2:01:26थी बल्कि यह मानती थी कि राज्य का कर्तव्य
- 2:01:29है कि वह सभी धर्मों को फलने फूलने का
- 2:01:31मौका दे।
- 2:01:32लेकिन एक शर्त पर
- 2:01:34हां। बशर्त वे एक दूसरे से ना लड़े और
- 2:01:37राज्य के खिलाफ ना जाएं। यह उस जमाने के
- 2:01:39लिए क्रांतिकारी विचार था जब यूरोप में
- 2:01:42धर्म के नाम पर युद्ध हो रहे थे।
- 2:01:43तो अकबर समझ गए थे कि हिंदुस्तान पर राज
- 2:01:46करने के लिए सबको साथ लेकर चलना ही
- 2:01:49एकमात्र रास्ता है।
- 2:01:51बिल्कुल।
- 2:01:51और इस नीति को उन्होंने लागू कैसे किया?
- 2:01:54मतलब जमीन पर कैसे उतारा?
- 2:01:56उन्होंने दो बहुत बड़े कदम उठाए। 1563 में
- 2:01:59उन्होंने तीर्थ यात्रा कर खत्म कर दिया।
- 2:02:01अच्छा। और 1564 में जजिया को समाप्त कर
- 2:02:04दिया। जजिया एक ऐसा टैक्स था जो सिर्फ गैर
- 2:02:07मुस्लिम प्रजा को देना पड़ता था।
- 2:02:09तो इन दोनों करों को हटाकर अकबर ने एक साफ
- 2:02:12संदेश दिया।
- 2:02:13जी एक साफ संदेश दिया कि उनका साम्राज्य
- 2:02:16धर्म के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं
- 2:02:18करेगा। यह सुलह कुल की नीति का मतलब
- 2:02:22व्यावहारिक रूप था।
- 2:02:23अबुल फजल ने इसे एक सामाजिक अनुबंध या
- 2:02:26सोशल कॉन्ट्रैक्ट का भी नाम दिया है।
- 2:02:28हां। और यह भी अपने समय से बहुत आगे की
- 2:02:31सोच थी। इस अनुबंध के अनुसार बादशाह अपनी
- 2:02:34प्रजा की चार सबसे कीमती चीजों की रक्षा
- 2:02:36करने का वादा करता है। जीवन यानी जान, धन
- 2:02:40यानी माल, सम्मान यानी नामोस और धर्म यानी
- 2:02:43दीन।
- 2:02:44और बदले में
- 2:02:45और इस सुरक्षा के बदले में प्रजा बादशाह
- 2:02:48की आज्ञा का पालन करती है और टैक्स के रूप
- 2:02:50में राज्य के संसाधनों में अपना हिस्सा
- 2:02:52देती है। यह एक तरह का सौदा था जिसमें
- 2:02:54दोनों पक्षों की जिम्मेदारियां तय थी। यह
- 2:02:56तो हुई विचारधारा की बात। अब जरा उस जगह
- 2:02:59चलते हैं जहां से यह सब नियंत्रित होता
- 2:03:02था। मुगल राजधानी और दरबार।
- 2:03:04जी।
- 2:03:05यह राजधानियां भी बदलती रहीं। आगरा से
- 2:03:07फतेहपुर सीकरी, फिर लाहौर और फिर
- 2:03:10शाहजहानाबाद यानी दिल्ली।
- 2:03:12राजधानियों का बदलना भी रणनीतिक होता था।
- 2:03:14लेकिन राजधानी चाहे कोई भी हो, साम्राज्य
- 2:03:16का दिल बादशाह का दरबारी होता था।
- 2:03:18और दरबार का मतलब सिर्फ एक बैठक की जगह
- 2:03:21नहीं।
- 2:03:22नहीं। वो शक्ति का एक रंगमंच था। हर चीज
- 2:03:25का अपना एक खास मतलब था।
- 2:03:27[नाक से की जाने वाली आवाज़] बादशाह का
- 2:03:28सिंहासन या तख्त केंद्र में होता था। कोई
- 2:03:31व्यक्ति सिंहासन के कितने पास या दूर बैठा
- 2:03:34है, इसी से दरबार में उसका रुतबा तय होता
- 2:03:36था।
- 2:03:36और अभिवादन के तरीके भी बहुत खास थे। जैसे
- 2:03:40सिजदा करना या जमीन बोस यानी जमीन चूमना।
- 2:03:43यह सब तरीके बादशाह की सर्वोच्चता को
- 2:03:45स्थापित करने के लिए थे। यह जताने के लिए
- 2:03:48कि बादशाह आम इंसान नहीं है।
- 2:03:50और बादशाह की दिनचर्या
- 2:03:51वो भी इसी शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा थी।
- 2:03:53सुबह झरोखा दर्शन से दिन शुरू होता था।
- 2:03:56जहां बादशाह अपनी प्रजा को दर्शन देते थे।
- 2:03:58एक तरह का कनेक्शन बनाने के लिए।
- 2:04:00हम यह राजा और प्रजा के बीच एक भरोसे का
- 2:04:03रिश्ता बनाता था। इसके बाद दीवान-ए-आम में
- 2:04:06आम लोगों की समस्याएं सुनी जाती थी और
- 2:04:08दीवान खास में खास सलाहकारों के साथ
- 2:04:10गोपनीय मंत्रणा होती थी।
- 2:04:12दरबार के इस औपचारिक माहौल के पीछे एक और
- 2:04:16दुनिया थी। शाही परिवार की, जिसे हरम कहा
- 2:04:19जाता है।
- 2:04:20पत्नियों के रहने की जगह नहीं थी। तो वहां
- 2:04:22कौन-कौन रहता था?
- 2:04:24इसमें बादशाह की मां, बहनें, बच्चे, अन्य
- 2:04:27रिश्तेदार और उनकी सेवा करने वाली महिलाएं
- 2:04:30और दास दासियां रहती थी। यह अपने आप में
- 2:04:33एक छोटा सा शहर था जिसका अपना एक
- 2:04:35पदानुक्रम और अपनी राजनीति थी।
- 2:04:38और शाही परिवार की महिलाएं सिर्फ घरेलू
- 2:04:40मामलों तक सीमित नहीं थी। उनका राजनीति और
- 2:04:43प्रशासन में भी काफी दखल था।
- 2:04:45बिल्कुल। जहां आरा और रोशन आरा जैसी
- 2:04:48शाहजहां की बेटियों के पास बड़े-बड़े
- 2:04:51मनसबदारों के बराबर की संपत्ति और शक्ति
- 2:04:54थी।
- 2:04:54अच्छा
- 2:04:55जी वे वास्तुकला की संरक्षक थी। व्यापार
- 2:04:58में निवेश करती थी और राजनीतिक फैसलों को
- 2:05:00भी प्रभावित करती थी।
- 2:05:02और गुलबदन बेगम को भी नहीं भूलना चाहिए।
- 2:05:04हां बिल्कुल नहीं। उन्होंने हुमायूंनामा
- 2:05:07लिखा। यह हमें मुगल हरम की दुनिया की एक
- 2:05:09अंदरूनी और दुर्लभ झलक देता है। जो किसी
- 2:05:12पुरुष दरबारी इतिहासकार के लिए लिखना संभव
- 2:05:15नहीं था। तो यह विशाल साम्राज्य सिर्फ
- 2:05:18बादशाह और उनके परिवार से तो नहीं चल सकता
- 2:05:20था।
- 2:05:21नहीं, इसके पीछे एक पूरी प्रशासनिक मशीनरी
- 2:05:24होगी। यहीं पर अभिजात वर्ग या नोबिलिटी की
- 2:05:27भूमिका आती है।
- 2:05:28यह अभिजात वर्ग या नोबिलिटी साम्राज्य की
- 2:05:31रीड की हड्डी थी। अकबर की एक और बड़ी
- 2:05:33कामयाबी यह थी कि उन्होंने इस वर्ग को
- 2:05:36किसी एक जातीय समूह तक सीमित नहीं रखा।
- 2:05:39मतलब
- 2:05:40यह एक गुलदस्ते की तरह था जिसमें ईरानी
- 2:05:44तुरानी यानी मध्य एशियाई अफगान और भारतीय
- 2:05:48मुसलमान तो थे ही।
- 2:05:49साथ में राजपूत और मराठा भी।
- 2:05:52जी साथ ही राजपूत और मराठा जैसे हिंदू
- 2:05:55सरदारों को भी बड़े सम्मान के साथ शामिल
- 2:05:57किया गया। इसका फायदा यह हुआ कि कोई एक
- 2:06:00गुट इतना ताकतवर नहीं हो पाया कि वो
- 2:06:02बादशाह को चुनौती दे सके।
- 2:06:04और इस पूरे सिस्टम को चलाने के लिए
- 2:06:06मनसबदानी प्रणाली बनाई गई। यह क्या थी?
- 2:06:09इसे समझना थोड़ा मुश्किल लगता है।
- 2:06:11इसे एक आधुनिक कॉर्पोरेट और मिलिट्री रैंक
- 2:06:14के मिलेजुले रूप में समझिए।
- 2:06:16अच्छा।
- 2:06:16हर बड़े अधिकारी को एक मंसब यानी रैंक
- 2:06:20दिया जाता था। इस रैंक के दो हिस्से थे।
- 2:06:23जात और सवार।
- 2:06:25जात और सवार जात आपकी सीनियोरिटी थी। जैसे
- 2:06:29आज के समय में आप वाइस प्रेसिडेंट हैं या
- 2:06:32जनरल मैनेजर। इससे आपकी तनख्वाह और दरबार
- 2:06:35में आपकी हैसियत तय होती थी। और सवार
- 2:06:38सवार आपकी ऑपरेशनल जिम्मेदारी थी। यानी
- 2:06:42आपको लड़ाई के मैदान में कितने घुड़सवार
- 2:06:44सैनिक लाने होंगे?
- 2:06:45तो ऐसा हो सकता था कि किसी की जात ऊंची हो
- 2:06:48पर सवार रैंक कम हो।
- 2:06:50बिल्कुल। इसका मतलब वो एक महत्वपूर्ण
- 2:06:52सलाहकार या ब्यूरोक्रेट है। लेकिन बड़ा
- 2:06:55मिलिट्री कमांडर नहीं। यह एक बहुत ही
- 2:06:57अनोखी और कारगर प्रणाली थी। जिसने नागरिक
- 2:07:01और सैन्य प्रशासन को एक साथ जोड़ दिया और
- 2:07:03एक वफादार अधिकारी वर्ग तैयार किया। और
- 2:07:05केंद्र में कुछ बड़े अधिकारी थे जो इस
- 2:07:08मशीनरी को चलाते थे जैसे मीर बख्शी और
- 2:07:11दीवान-ए-आला।
- 2:07:12हां, मीर बक्शी को आप रक्षा मंत्री और
- 2:07:15सेना प्रमुख का मिलाजुला रूप समझ सकते
- 2:07:17हैं। वही सेना की भर्ती, वेतन और खुफिया
- 2:07:20जानकारी के लिए जिम्मेदार था।
- 2:07:22और दीवाने-ए-आला
- 2:07:23वो वित्त मंत्री था जो साम्राज्य की पूरी
- 2:07:25अर्थव्यवस्था और टैक्स प्रणाली को देखता
- 2:07:27था। इनके नीचे एक विशाल सूचना तंत्र था।
- 2:07:31वाकया नवीस जैसे लेखक जो दरबार की हर
- 2:07:33कार्यवाही को दर्ज करते थे। अंत में इस
- 2:07:36साम्राज्य का बाहरी दुनिया से क्या रिश्ता
- 2:07:38था? खासकर पश्चिम में ईरान के सफी शासकों
- 2:07:41से।
- 2:07:42मुगलों और ईरान के सफविवियों के बीच एक
- 2:07:44सम्मानजनक लेकिन प्रतिस्पर्धी रिश्ता था।
- 2:07:47प्रतिस्पर्धी क्यों?
- 2:07:48दोनों के बीच अक्सर कंधार के किले को लेकर
- 2:07:50तनाव रहता था। क्योंकि वह भारत और मध्य
- 2:07:53एशिया के बीच व्यापार और सैन्य मार्ग पर
- 2:07:55एक बहुत ही रणनीतिक जगह थी।
- 2:07:57लेकिन रिश्ते बने हुए थे?
- 2:07:59हां बिल्कुल। साथ ही दोनों दरबारों के बीच
- 2:08:02राजदूतों और उपहारों का आना-जाना भी लगा
- 2:08:04रहता था।
- 2:08:05और इसी बाहरी दुनिया से जेसुएट मिशनरी
- 2:08:08यानी ईसाई धर्म प्रचारक भी अकबर के दरबार
- 2:08:11तक पहुंचे।
- 2:08:11हां। और अकबर ने उनका खुले दिल से स्वागत
- 2:08:14किया। वह हर धर्म के बारे में जानने को
- 2:08:16उत्सुक थे।
- 2:08:16और इसी वजह से उन्होंने इबादतखाना बनवाया।
- 2:08:19जी। इसी उत्सुकता के कारण उन्होंने
- 2:08:22फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना या पूजा गृह
- 2:08:25बनवाया। शुरुआत में यहां सिर्फ इस्लामी
- 2:08:28विद्वानों के बीच बहस होती थी। लेकिन जल्द
- 2:08:30ही अकबर उनकी आपसी लड़ाईयों से तंग आ गए।
- 2:08:33तो उन्होंने क्या किया?
- 2:08:34उन्होंने इबादतखाना के दरवाजे सभी धर्मों
- 2:08:37के लिए खोल दिए।
- 2:08:38सबके लिए?
- 2:08:39हां। अब वहां हिंदू पंडित, जैन, मुनि,
- 2:08:42पारसी धर्मगुरु और ईसाई पादरी भी आकर
- 2:08:45अपने-अपने धर्म और दर्शन पर चर्चा करते
- 2:08:47थे।
- 2:08:48और इन बहसों का नतीजा क्या निकला? इन
- 2:08:50बहसों को सुनकर ही अकबर इस नतीजे पर
- 2:08:53पहुंचे कि हर धर्म में कुछ सच्चाई है।
- 2:08:55लेकिन कट्टरता हमेशा विभाजन और नफरत पैदा
- 2:08:58करती है।
- 2:08:59और यहीं से सुलह एक कुल का विचार और मजबूत
- 2:09:02हुआ।
- 2:09:03बिल्कुल। यहीं से उनके सुलह एक कुल के
- 2:09:05विचार को असली मजबूती मिली। यह एक शासक की
- 2:09:08व्यक्तिगत आध्यात्मिक यात्रा थी जिसने
- 2:09:10उसके साम्राज्य की सबसे महत्वपूर्ण नीति
- 2:09:13को जन्म दिया। तो कुल मिलाकर मुगल
- 2:09:15साम्राज्य सिर्फ सैन्य शक्ति पर नहीं
- 2:09:18बल्कि एक गहरी विचारधारा, एक कुशल
- 2:09:21प्रशासनिक मशीनरी और सबको साथ लेकर चलने
- 2:09:25की एक असाधारण सोच पर टिका था।
- 2:09:27बिल्कुल। उनकी सफलता का राज सिर्फ
- 2:09:29लड़ाईयां जितना नहीं बल्कि एक ऐसी
- 2:09:31व्यवस्था बनाना था जिसमें अलग-अलग
- 2:09:34संस्कृतियों और धर्मों के लोग एक साथ रह
- 2:09:36सकें और साम्राज्य की तरक्की में योगदान
- 2:09:39दे सकें। उनके बनाए इतिवृत्त, उनकी कला और
- 2:09:43उनकी इमारतें आज भी उसी महान विरासत की
- 2:09:46कहानी कहती हैं।
- 2:09:47आज की इस पूरी बातचीत के बाद एक सवाल
- 2:09:50सोचने पर मजबूर करता है। सुलहे कुल जैसी
- 2:09:54नीति जो 16वीं सदी में एक विशाल और विविध
- 2:09:57साम्राज्य को चलाने के लिए बनाई गई थी।
- 2:10:00क्या आज की दुनिया के लिए भी उतनी ही
- 2:10:02प्रासंगिक है? इस पर विचार जरूर कीजिएगा।
- 2:10:07एनसीआरटी इतिहास कक्षा 12वीं का 10वां
- 2:10:10अध्याय है उपनिवेशवाद और देहात यानी
- 2:10:13कॉलोनियलिज्म एंड द कंट्रीसाइड। आज हम इसी
- 2:10:16पर बात करेंगे।
- 2:10:17और यह अध्याय सिर्फ मतलब तारीखों और
- 2:10:20घटनाओं का लेखाजोखा नहीं है।
- 2:10:21नहीं।
- 2:10:22यह एक कहानी है इस बात की कि अंग्रेजों के
- 2:10:25बनाए गए आर्थिक सिस्टम भारत के गांव में
- 2:10:28असल में कैसे काम करते थे? और अक्सर कैसे
- 2:10:31वह यू नो बुरी तरह से फेल हो जाते थे। हां
- 2:10:34और एक दिलचस्प बात जो बार-बार सामने आएगी
- 2:10:36वो यह है कि हम यह सारा इतिहास अंग्रेजों
- 2:10:38की ही लिखी रिपोर्टों से जान रहे हैं।
- 2:10:40तो हमारा मिशन यह भी समझना होगा कि क्या
- 2:10:42हम इन रिपोर्टों पर आंख बंद करके भरोसा कर
- 2:10:45सकते हैं। चलिए शुरू करते हैं बंगाल से
- 2:10:47जहां अंग्रेजों ने अपना शासन सबसे पहले
- 2:10:49जमाया था।
- 2:10:49बिल्कुल और इसकी शुरुआत एक बहुत ही जैसे
- 2:10:52नाटक जैसे सीन से होती है। साल था 1797
- 2:10:56जगह थी बर्दवान जो आज का बर्दवान है। वहां
- 2:10:59एक बड़ी नीलामी हो रही थी। एक राजा की
- 2:11:01पूरी जमींदारी नीलाम हो रही थी।
- 2:11:03एक राजा की जमींदारी नीलाम हो रही थी।
- 2:11:05मतलब यह नौबत क्यों आई?
- 2:11:06यही तो कहानी की जय है। ईस्ट इंडिया कंपनी
- 2:11:09ने एक नियम बनाया था कि हर जमींदार को एक
- 2:11:13तय रकम यानी राजस्व सरकार को देना होगा।
- 2:11:17ओके।
- 2:11:17और जो भी जमींदार यह रकम चुका नहीं पाता
- 2:11:20था, उसकी पूरी जायदाद नीलाम कर दी जाती
- 2:11:23थी।
- 2:11:23तो क्या इसका मतलब यह है कि जमींदार अपनी
- 2:11:25पुश्तों की जमीनें ऐसी मतलब खो देते थे?
- 2:11:28हमेशा नहीं। यहीं पर एक मजेदार मोड़ आता
- 2:11:31था कहानी में।
- 2:11:32अच्छा।
- 2:11:33नीलामी में बोली लगाने वाले ज्यादातर लोग
- 2:11:35वो जमींदार के अपने ही नौकर या एजेंट होते
- 2:11:38थे।
- 2:11:38अरे वाह।
- 2:11:39वो जमीन खरीद लेते लेकिन पैसा कभी चुकाते
- 2:11:42नहीं थे।
- 2:11:43अच्छा।
- 2:11:43यह तो सिस्टम के साथ ही खिलवाड़ हो गया।
- 2:11:46इसे क्या कहते थे?
- 2:11:47इसे बेनामी खरीद कहते थे। नाम किसी और का
- 2:11:49पर मालिक वही पुराना जमींदार।
- 2:11:51हम आपको पता है वर्धमान की उस नीलामी में
- 2:11:5495% से ज्यादा बिक्री फर्जी थी। 95%
- 2:11:59हां यह जमींदारों का अपने राज को बचाने का
- 2:12:01एक तरीका था।
- 2:12:02पर सवाल वही है इतने बड़े-बड़े जमींदार वो
- 2:12:05पैसा चुका क्यों नहीं पा रहे थे?
- 2:12:07इसकी जड़ में खा 1793 का इस्तमरारी
- 2:12:10बंदोबस्त या जिसे हम परमानेंट सेटलमेंट
- 2:12:14कहते हैं।
- 2:12:14परमानेंट सेटलमेंट।
- 2:12:15हां। इसे ऐसे समझिए कि कंपनी ने जमींदारों
- 2:12:18से कहा देखो हमें हर साल तुमसे एक फिक्स्ड
- 2:12:22रकम चाहिए। मान लो ₹100। ठीक है।
- 2:12:25अब तुम्हारी खेती से ₹120 की कमाई हो या
- 2:12:28200 की हमें 100 ही मिलेंगे। बाकी सब
- 2:12:31तुम्हारा।
- 2:12:32सुनने में तो जमींदार के लिए अच्छा लगता
- 2:12:34है कि ज्यादा कमाई पर टैक्स नहीं बढ़ेगा।
- 2:12:35हां लेकिन इसमें एक पेंच था। कंपनी ने यह
- 2:12:39जो फिक्स्ड रकम थी ना
- 2:12:41हम
- 2:12:41वो इतनी ज्यादा रखी थी कि उसे चुकाना ही
- 2:12:44लगभग नामुमकिन हो गया था।
- 2:12:46अच्छा।
- 2:12:46ऊपर से यह नियम तब आया जब खेती की पैदावार
- 2:12:49की कीमतें बहुत कम थी। तो किसान जमींदार
- 2:12:52को पैसे नहीं दे पाते थे और जमींदार आगे
- 2:12:55कंपनी को
- 2:12:56और अगर फसल खराब हो गई तब क्या होता था?
- 2:12:58तब भी कोई रियायत नहीं थी। रकम उतनी ही
- 2:13:01देनी पड़ती थी।
- 2:13:02अरे
- 2:13:02और सबसे क्रूर थी सूर्यास्त विधि यानी
- 2:13:06सनसेट लॉ।
- 2:13:07सनसेट लॉ। यह क्या था?
- 2:13:09सोचिए एक तय तारीख है और सूरज ढलने से
- 2:13:13पहले अगर आपका पैसा कलेक्टर के दफ्तर नहीं
- 2:13:16पहुंचा
- 2:13:17तो
- 2:13:17तो बस खेल खत्म। आपके पुश्तों की जमींदारी
- 2:13:20नीलाम हो जाएगी। कोई सुनवाई नहीं, कोई
- 2:13:23मोहलत नहीं।
- 2:13:24वाह! मतलब एक तरफ तो जमींदार से पैसा भी
- 2:13:26वसूल रहे हैं और दूसरी तरफ उसकी पूरी ताकत
- 2:13:28ही छीन ली।
- 2:13:29बिल्कुल। उनकी फौज भंग कर दी। टैक्स
- 2:13:32वसूलने का अधिकार छीन लिया। कचहरी पर
- 2:13:35कलेक्टर बिठा दिया। जमींदार को बस एक मतलब
- 2:13:38ग्लोरिफाइड टैक्स कलेक्टर बनाकर छोड़ दिया
- 2:13:41था।
- 2:13:41वो अपने ही इलाके में कमजोर हो गया था। तो
- 2:13:44अगर गांव में जमींदार कमजोर हो रहे थे तो
- 2:13:47फिर उनकी जगह कौन ले रहा था? जाहिर है कोई
- 2:13:49तो ताकतवर बन रहा होगा।
- 2:13:50बिल्कुल। और गांव में जोतदारों का उदय हो
- 2:13:54रहा था।
- 2:13:54जोतदार
- 2:13:55हां यह अमीर किसानों का एक वर्ग था जिनके
- 2:13:59पास हजारों एकड़ जमीन होती थी और वो सिर्फ
- 2:14:02खेती नहीं करते थे बल्कि गांव में व्यापार
- 2:14:05और लेनदेन पर भी उन्हीं का कब्जा था।
- 2:14:07और इन हजारों एकड़ जमीन पर खेती कौन करता
- 2:14:09था?
- 2:14:10उनकी जमीन पर खुद जोतदार खेती नहीं करते
- 2:14:13थे। बल्कि बटाईदार करते थे।
- 2:14:15बटाईदार मतलब जो फसल की बंटाई पर काम
- 2:14:18करें।
- 2:14:18एग्जैक्टली हल उनका मेहनत उनकी लेकिन फसल
- 2:14:22कटने के बाद आधा हिस्सा सीधे जोतदार की
- 2:14:25तिजोरी में।
- 2:14:25तो गांव के अंदर असल शक्ति तो इन जोतदारों
- 2:14:28के हाथ में आ गई थी।
- 2:14:29हां। और वो इस शक्ति का इस्तेमाल जमींदार
- 2:14:32के खिलाफ करते थे। वो जानबूझकर किसानों को
- 2:14:35जमींदार का राजस्व चुकाने से रोकते थे।
- 2:14:37अच्छा।
- 2:14:38मकसद साफ था। जमींदार कंगाल हो, उसकी जमीन
- 2:14:42नीलाम हो और उस जमीन को जोतदार खुद खरीद
- 2:14:45ले।
- 2:14:45यानी अंग्रेजों के बनाए एक सिस्टम ने गांव
- 2:14:48के अंदर ही एक लड़ाई छेड़ दी थी पुराने
- 2:14:49जमींदार और नए जोदार के बीच। कमाल है। पर
- 2:14:52यह सब जानकारी हमें मिलती कहां से है?
- 2:14:54इसका एक बहुत बड़ा स्रोत है पांचवी
- 2:14:56रिपोर्ट। द फिफ्थ रिपोर्ट। ये 1813 में
- 2:15:00ब्रिटिश संसद में पेश की गई एक रिपोर्ट
- 2:15:02थी।
- 2:15:02फिफ्थ रिपोर्ट।
- 2:15:03हां। इसमें भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी
- 2:15:06कैसे काम कर रही है उसका पूरा कच्चा
- 2:15:08चिट्ठा था। यह हजार पन्नों से भी मोटी
- 2:15:11रिपोर्ट थी।
- 2:15:12तो ये तो खजाना हुआ इतिहासकारों के लिए।
- 2:15:14खजाना तो है लेकिन इसमें भी एक पेज है।
- 2:15:17हमें इसे सावधानी से पढ़ना पड़ता है।
- 2:15:20क्यों?
- 2:15:20क्योंकि यह रिपोर्ट उन लोगों ने तैयार
- 2:15:22करवाई थी जो ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ
- 2:15:25थे। ब्रिटेन में कई लोग कंपनी के व्यापार
- 2:15:28के एकाधिकार यानी मोनोपोली से यू नो जलते
- 2:15:31थे। अच्छा वो चाहते थे कि कंपनी का राज
- 2:15:33खत्म हो।
- 2:15:34बिल्कुल। तो इस रिपोर्ट में कंपनी की
- 2:15:36नाकामियों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया गया था।
- 2:15:39मतलब ये रिपोर्ट खुद एक राजनीतिक हथियार
- 2:15:41थी।
- 2:15:41बिल्कुल।
- 2:15:42यह सिर्फ सच नहीं बता रही थी बल्कि खास
- 2:15:44तरह का सच गढ़ रही थी।
- 2:15:45बिल्कुल। और यही इतिहासकारों के लिए सबसे
- 2:15:48बड़ी चुनौती है। इन सरकारी दस्तावेजों को
- 2:15:50सच की तरह नहीं बल्कि सबूत के एक टुकड़े
- 2:15:54की तरह देखना पड़ता है। जिसे दूसरी
- 2:15:56जानकारियों के साथ जोड़कर पूरी तस्वीर
- 2:15:58बनानी पड़ती है।
- 2:15:59तो बंगाल में हमने देखा कि कैसे अंग्रेजों
- 2:16:01के बनाए सिस्टम ने पुराने जमींदारों और नए
- 2:16:04जोतदारों के बीच एक लड़ाई छेड़ दी। लेकिन
- 2:16:06यह कहानी उन इलाकों की थी जहां खेतीबाड़ी
- 2:16:09पहले से हो रही थी। अब सवाल यह उठता है कि
- 2:16:11अंग्रेजों ने उन लोगों के साथ क्या किया
- 2:16:13जो जंगलों में रहते थे? इसके लिए हमें
- 2:16:15राजमहल की पहाड़ियों का रुख करना होगा।
- 2:16:18वहां पहाड़ियां लोग रहते थे।
- 2:16:20पहाड़ियां
- 2:16:21हां उनकी पूरी जिंदगी जंगल पर ही निर्भर
- 2:16:24थी। वो शिकार करते थे। जंगल के फल फूल
- 2:16:27इकट्ठा करते थे और झूम खेती करते थे।
- 2:16:31झूम खेती ये क्या होती है?
- 2:16:33इसमें मतलब जंगल के एक छोटे से हिस्से को
- 2:16:35साफ करके वहां की झाड़ियों को जलाकर जमीन
- 2:16:39तैयार की जाती है। राख से जमीन उपजाऊ हो
- 2:16:42जाती है।
- 2:16:43अच्छा। कुछ साल वहां खेती करने के बाद उस
- 2:16:46जगह को खाली छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं ताकि
- 2:16:49जमीन अपनी ताकत वापस पा सके। वे खेती के
- 2:16:52लिए फावड़े की तरह कुदाल हो का इस्तेमाल
- 2:16:55करते थे। कुदाल ही उनकी पहचान थी।
- 2:16:58और उनका मैदानी दुनिया से क्या रिश्ता था?
- 2:17:00वो मैदानों में बसे गांवों पर अक्सर हमले
- 2:17:03करते थे, और उनसे अपनी सुरक्षा के बदले एक
- 2:17:06तरह का टैक्स यानी खिराज वसूलते थे। हम
- 2:17:10व्यापारी भी उनके इलाके से गुजरने के लिए
- 2:17:12उन्हें पैसे देते थे।
- 2:17:13तो फिर कहानी में हल कहां से आया?
- 2:17:15हल लेकर आए संथाल।
- 2:17:17संथाल।
- 2:17:18हां। अंग्रेज चाहते थे कि जंगल साफ हो और
- 2:17:23स्थाई खेती का इलाका बढ़े। ताकि उन्हें और
- 2:17:26ज्यादा राजस्व मिले। उन्होंने पहाड़ियां
- 2:17:29लोगों को एक जगह बसकर खेती करने के लिए
- 2:17:31कहा। लेकिन वह अपनी आजाद जिंदगी छोड़ने को
- 2:17:34तैयार नहीं थे। तो फिर
- 2:17:36तब अंग्रेजों की नजर संथालों पर पड़ी
- 2:17:39और संथालों में उन्हें क्या खास दिखा?
- 2:17:41संथाल मेहनती थे। वह जंगलों को साफ करके
- 2:17:45हल चलाकर स्थाई खेती करने को तैयार थे।
- 2:17:48अंग्रेजों को लगा कि यह आदर्श बाशिंदे
- 2:17:51हैं।
- 2:17:51अच्छा।
- 2:17:52उन्होंने संथालों को राजमहल की पहाड़ियों
- 2:17:55के निचले हिस्से में बसने के लिए जमीनें
- 2:17:57दे दी।
- 2:17:58तो अंग्रेजों ने संथालों का इस्तेमाल
- 2:17:59पहाड़ियां लोगों को हटाने के लिए किया।
- 2:18:01एक तरह से हां। 1832 तक सरकार ने एक बहुत
- 2:18:06बड़े इलाके की घेराबंदी कर दी और उसे नाम
- 2:18:09दिया दामिने कोह।
- 2:18:11दामिनेको
- 2:18:12हां उन्होंने कहा यह संथालों की जमीन है।
- 2:18:15एक तरह से यह उनका अपना रिजर्व एरिया बन
- 2:18:18गया।
- 2:18:18और इसका नतीजा
- 2:18:20इसका नतीजा यह हुआ कि पहाड़िया लोग और
- 2:18:23पीछे पहाड़ों में सिमटने को मजबूर हो गए।
- 2:18:26यह कुदाल पर हल की जीत थी।
- 2:18:28तो अंग्रेजों ने संथालों को जमीन दी।
- 2:18:31उन्हें बसाया। एक तरह से यह तो संथालों के
- 2:18:34लिए फायदे का सौदा लग रहा है। उन्हें अपनी
- 2:18:36जमीन मिल रही थी। फिर गड़बड़ कहां हुई?
- 2:18:38गड़बड़ उस सिस्टम में ही छिपी थी। जमीन तो
- 2:18:41मिली लेकिन उसके साथ आए भारी भरकम टैक्स,
- 2:18:45साहूकार और जमींदार
- 2:18:46हम
- 2:18:47संथालों ने जिस जमीन को जंगल साफ करके
- 2:18:50सोना बनाया था, वो धीरे-धीरे उनके हाथ से
- 2:18:53रेत की तरह फिसलने लगी।
- 2:18:55कैसे? सरकार का टैक्स इतना ज्यादा था कि
- 2:18:58उसे चुकाने के लिए उन्हें साहूकारों से
- 2:19:00कर्ज लेना पड़ता था और साहूकार जिन्हें वह
- 2:19:03दिकु यानी बाहरी लोग कहते थे वो बहुत ऊंची
- 2:19:06ब्याज दर वसूलते थे।
- 2:19:08ओह!
- 2:19:08कर्ज ना चुका पाने पर साहूकार उनकी जमीन
- 2:19:11पर ही कब्जा कर लेते थे। संथालों को लगा
- 2:19:14कि उनके साथ धोखा हुआ है।
- 2:19:16और इसकी प्रतिक्रिया क्या हुई?
- 2:19:1718556
- 2:19:19में सिद्धू मांझी और कानू मांझी के
- 2:19:22नेतृत्व में संथालों ने विद्रोह कर दिया।
- 2:19:25संथाल विद्रोह।
- 2:19:26हां, यह संथाल विद्रोह साहूकारों,
- 2:19:28जमींदारों और अंग्रेजी राज तीनों के खिलाफ
- 2:19:32था। वो अपना राज स्थापित करना चाहते थे।
- 2:19:34इस विद्रोह को बहुत बेरहमी से कुचल दिया
- 2:19:37गया। लेकिन इसने सरकार को एक सबक सिखाया।
- 2:19:40इसके बाद सरकार ने संथाल परगना नाम से एक
- 2:19:44अलग जिला बनाया और वहां कुछ खास कानून
- 2:19:47लागू किए ताकि संथालों की जमीनों की रक्षा
- 2:19:50की जा सके। यह एक तरह का डैमेज कंट्रोल
- 2:19:52था। हमने बंगाल में जमींदार और जोरदार का
- 2:19:55संघर्ष देखा और राजमहल की पहाड़ियों में
- 2:19:58पहाड़ियां और संथाल का। अब भारत के
- 2:20:00पश्चिमी हिस्से यानी बॉम्बे दक्कन की तरफ
- 2:20:02चलते हैं। वहां क्या अलग हो रहा था?
- 2:20:04वहां एक बिल्कुल नया संघर्ष सामने आया और
- 2:20:07यह कहा किसानों और साहूकारों के बीच सीधा
- 2:20:11टकराओ।
- 2:20:11अच्छा।
- 2:20:12इसकी शुरुआत 1875 में हुई जिसे दक्कन दंगा
- 2:20:16कहते हैं। पुणे के पास सूपा नाम के एक
- 2:20:19गांव से शुरू हुआ।
- 2:20:20किसानों ने इस बार क्या किया? उन्होंने
- 2:20:22साहूकारों के घरों पर हमला किया लेकिन
- 2:20:24उनका मकसद लूटपाट नहीं था।
- 2:20:27तो फिर क्या था?
- 2:20:27वो साहूकारों के वही खाते, अकाउंट बुक्स
- 2:20:30और ऋण पत्र, डेट बॉन्ड्स ढूंढ-ढूंढ कर जला
- 2:20:33रहे थे।
- 2:20:33वो सिर्फ कागज क्यों जला रहे थे? यह तो
- 2:20:35बड़ा अजीब है।
- 2:20:36अजीब नहीं बहुत सोचा समझा कदम था। वो उन
- 2:20:40कागजों को जला रहे थे जो उनकी गुलामी का
- 2:20:42सबूत थे।
- 2:20:43अच्छा।
- 2:20:44वो कर्ज के उस जाल को ही खत्म कर देना
- 2:20:46चाहते थे जिसमें वो फंसे हुए थे। यह हिंसा
- 2:20:49के साथ-साथ एक नैतिक विद्रोह भी था।
- 2:20:52यहां राजस्व की व्यवस्था क्या बंगाल जैसी
- 2:20:54थी?
- 2:20:54नहीं। यहां रयतवाड़ी बंदोबस्त था। इस
- 2:20:57सिस्टम में कंपनी जमींदार के बजाय सीधे
- 2:21:00किसान यानी रयत से चुगती करती थी।
- 2:21:03सीधे किसान से?
- 2:21:04हां, हर खेत की मिट्टी और उपज का अंदाजा
- 2:21:07लगाकर 30 साल के लिए राजस्व तय कर दिया
- 2:21:10जाता था।
- 2:21:11सुनने में तो यह व्यवस्था जमींदारी से
- 2:21:12बेहतर लगती है। फिर विद्रोह क्यों हुआ?
- 2:21:14कागज पर बेहतर थी, लेकिन जमीन पर नहीं।
- 2:21:18यहां भी राजस्व की दर बहुत ज्यादा थी।
- 2:21:21और जब फसलें खराब होती या बाजार में अनाज
- 2:21:24का भाव गिर जाता तो किसानों के लिए इसे
- 2:21:26चुकाना नामुमकिन हो जाता था। नतीजा उन्हें
- 2:21:29फिर साहूकार के पास जाना पड़ता था।
- 2:21:31मैंने सुना है कि इस कहानी में अमेरिका से
- 2:21:33भी एक कनेक्शन जुड़ता है। कपास की कोई
- 2:21:35भूमिका थी?
- 2:21:36बहुत बड़ी भूमिका थी। 1861 में अमेरिका
- 2:21:39में गृह युद्ध यानी अमेरिकन सिविल वॉर छड़
- 2:21:42गया।
- 2:21:42राइट? इससे हुआ यह कि ब्रिटेन की कपड़ा
- 2:21:45मिलों को अमेरिका से आने वाली कपास मिलनी
- 2:21:48बंद हो गई।
- 2:21:49तो उन्होंने भारत की तरफ देखा होगा।
- 2:21:51बिल्कुल। अचानक भारत के कपास की मांग
- 2:21:53आसमान छू गई। दक्कन की काली मिट्टी कपास
- 2:21:57के लिए बेहतरीन थी। साहूकारों ने किसानों
- 2:22:00को कपास उगाने के लिए हाथों हाथ कर्ज देना
- 2:22:03शुरू कर दिया।
- 2:22:04हम तो यह तो किसानों के लिए अच्छा समय रहा
- 2:22:06होगा।
- 2:22:06हां, यह दक्कन के किसानों के लिए एक
- 2:22:08सुनहरा दौर था। कपास की कीमतें दोगुनी
- 2:22:11तिगनी हो गई। लेकिन यह ज्यादा दिन चला
- 2:22:13नहीं होगा।
- 2:22:14नहीं चला। 1865 में अमेरिकी गृह युद्ध
- 2:22:17खत्म हो गया। ब्रिटेन ने वापस अमेरिका से
- 2:22:20कपास खरीदना शुरू कर दिया और भारत से कपास
- 2:22:23का निर्यात ठप हो गया
- 2:22:24और कीमतें गिर गई।
- 2:22:25कीमतों में भारी गिरावट आई। जिन साहूकारों
- 2:22:28ने कल तक आसानी से कर्ज दिया था। अब वो
- 2:22:31अपना पैसा ब्याज समेत वापस मांगने लगे।
- 2:22:34किसान एक झटके में अर्श से फर्श पर आ गए।
- 2:22:37इस कर्ज की जाल में एक कानूनी पेच भी था
- 2:22:39ना। यह बहुत दिलचस्प है। 1859 में
- 2:22:43अंग्रेजों ने एक परिसीमन कानून लिमिटेशन
- 2:22:46लॉ बनाया।
- 2:22:47लिमिटेशन लॉ।
- 2:22:48इसके मुताबिक कोई भी कर्ज का दस्तावेज
- 2:22:51सिर्फ 3 साल के लिए ही मान्य होगा। इसका
- 2:22:54मकसद था कि ब्याज सालों साल बढ़ता ना जाए।
- 2:22:57लेकिन साहूकारों ने इसका भी कोई तोड़
- 2:22:59निकाल लिया होगा।
- 2:22:59बिल्कुल। उन्होंने एक नई चालाकी शुरू की।
- 2:23:02हर 3 साल बाद वो किसान को बुलाते और एक नए
- 2:23:06दस्तावेज पर अंगूठा लगवा लेते।
- 2:23:08अच्छा। इस नए दस्तावेज में पुराना मूलधन
- 2:23:11और उस पर लगा सारा ब्याज दोनों को जोड़कर
- 2:23:15नया मूलधन बना दिया जाता था।
- 2:23:16अरे बाप रे।
- 2:23:17किसान ज्यादातर अनपढ़ थे। उन्हें पता ही
- 2:23:20नहीं चलता था कि वो किस जाल में फंस रहे
- 2:23:22हैं। यह कानूनी धोखाधड़ी उनके गुस्से का
- 2:23:25एक बहुत बड़ा कारण बनी।
- 2:23:27तो फिर से एक विद्रोह और मुझे लगता है कि
- 2:23:29इसके बाद फिर से एक सरकारी रिपोर्ट आई
- 2:23:31होगी इसकी जांच के लिए।
- 2:23:32आप बिल्कुल सही समझे। सरकार ने विद्रोह को
- 2:23:35दबाने के लिए सेना भेजी लेकिन साथ ही
- 2:23:37दक्कन दंगा आयोग डेक्कन राइट्स कमीशन का
- 2:23:40गठन भी किया। इस आयोग को दंगों के कारणों
- 2:23:43की जांच करने का काम सौंपा गया।
- 2:23:45तो यह रिपोर्ट भी बंगाल की पांचवी रिपोर्ट
- 2:23:47की तरह आई ही है। जानकारी का खजाना लेकिन
- 2:23:49एक सरकारी नजरिए के साथ।
- 2:23:51एकदम सही। इस आयोग ने बहुत मेहनत की।
- 2:23:53गांव-गांव जाकर किसानों, साहूकारों,
- 2:23:56गवाहों के बयान लिए, आंकड़े इकट्ठे किए।
- 2:23:59यह रिपोर्ट आज हमारे लिए बहुत कीमती स्रोत
- 2:24:02है। लेकिन इसका एक छुपा हुआ मकसद भी था।
- 2:24:04वो क्या?
- 2:24:05वो मकसद था यह साबित करना कि इन दंगों के
- 2:24:08लिए सरकार की ऊंची राजस्व दरे नहीं बल्कि
- 2:24:11लालची साहूकार जिम्मेदार थे।
- 2:24:12अच्छा मतलब अपनी गलती नहीं माननी थी।
- 2:24:14हां, यह औपनिवेशिक सरकार की अपनी छवि को
- 2:24:17बचाने की एक कोशिश थी। वो यह दिखाना चाहते
- 2:24:20थे कि समस्या सिस्टम में नहीं बल्कि कुछ
- 2:24:22बुरे लोगों में है।
- 2:24:24तो आज हमने देखा कि कैसे अंग्रेजों की
- 2:24:26नीतियां चाहे वो बंगाल का परमानेंट
- 2:24:28सेटलमेंट हो या मुंबई का रायतवारी कागज पर
- 2:24:30कुछ और थी और जमीन पर कुछ और
- 2:24:32हम
- 2:24:32हर नीति का मकसद था ज्यादा से ज्यादा
- 2:24:34राजस्व वसूलना लेकिन हर बार इसके कुछ ऐसे
- 2:24:37नतीजे निकले जिनकी उन्होंने उम्मीद नहीं
- 2:24:39की थी।
- 2:24:39बिल्कुल हर नीति ने एक नए तरह का संघर्ष
- 2:24:42पैदा किया। जमींदार बनाम जोतदार,
- 2:24:45पहाड़ियां बनाम संथाल और किसान बनाम
- 2:24:48साहूकार। यह अनरपेक्षित परिणामों की एक
- 2:24:52पूरी श्रृंखला थी।
- 2:24:53और जो बात सबसे ज्यादा सोचने पर मजबूर
- 2:24:55करती है वो यह है कि यह सरकारी रिकॉर्ड्स
- 2:24:58जिन पर आज हमारा इतिहास आधारित है, वह खुद
- 2:25:01उस कहानी का एक हिस्सा थे जिसे वह बताने
- 2:25:03का दावा करते हैं।
- 2:25:04सही बात है।
- 2:25:05वो सिर्फ सच्चाई नहीं बता रहे थे बल्कि एक
- 2:25:07खास तरह की सच्चाई गढ़ रहे थे। यह हमें
- 2:25:09सोचने पर मजबूर करता है कि कानूनी
- 2:25:11दस्तावेजों की पंक्तियों के बीच और कितने
- 2:25:13इतिहास छुपे होंगे।
- 2:25:17तो आज हम जिनके सोर्सेस पर गौर करने जा
- 2:25:20रहे हैं उनका विषय है 1857 का आंदोलन।
- 2:25:24हमारे पास एनसीईआरटी का चैप्टर है
- 2:25:26विद्रोही और राज 1857 का आंदोलन और उसके
- 2:25:30व्याख्यान।
- 2:25:31जी। यहां सिर्फ घटनाओं की एक लिस्ट नहीं
- 2:25:33है बल्कि इस बात की भी पड़ताल है कि उस
- 2:25:36दौर को अलग-अलग लोगों ने कैसे देखा और
- 2:25:39कैसे पेश किया।
- 2:25:41बिल्कुल इसका टाइटल ही बड़ा दिलचस्प है।
- 2:25:43रेबल्स एंड द राज मतलब एक ही कहानी के दो
- 2:25:46अलग-अलग किरदार। दो अलग नजरिए।
- 2:25:48सही कहा। एक के लिए जो विद्रोही है वो
- 2:25:51दूसरे के लिए शायद आजादी के सिपाही थे।
- 2:25:54बिल्कुल हमारी कोशिश रहेगी कि हम इन दोनों
- 2:25:56नजरियों को समझें और देखें कि यह ऐतिहासिक
- 2:25:59दस्तावेजों में कैसे झलकता है।
- 2:26:01चलिए फिर इस कहानी को शुरू से शुरू करते
- 2:26:04हैं। 1857 की गर्मियों में आखिर ऐसा क्या
- 2:26:08हुआ कि पूरे उत्तर भारत में एक आग सी लग
- 2:26:11गई। इस विद्रोह का पैटर्न क्या था?
- 2:26:15इसकी शुरुआत एक चिंगारी से हुई। 10 मई
- 2:26:171857 को मेरठ छावनी में वहां सिपाहियों की
- 2:26:21एक पैदल टुकड़ी मनी इन्फेंट्री ने विद्रोह
- 2:26:24कर दिया।
- 2:26:25अच्छा।
- 2:26:25लेकिन यह सिर्फ उन तक सीमित नहीं रहा।
- 2:26:27देखते ही देखते घुड़सवार फौज भी उनसे आ
- 2:26:30मिली और फिर?
- 2:26:31फिर यह आग पूरे शहर में फैल गई।
- 2:26:33और उनका प्लान बिल्कुल साफ लगता है।
- 2:26:35उन्होंने सबसे पहले उस जगह पर हमला किया
- 2:26:38जहां अंग्रेजों के सारे हथियार और गोला,
- 2:26:40बारूद रखे थे। मतलब उनका शस्त्रागार।
- 2:26:42हां, आमरी।
- 2:26:44पर, मतलब साफ था। पहले दुश्मन को निहत्ता
- 2:26:46करो।
- 2:26:47बिल्कुल।
- 2:26:48हथियार कब्जाने के बाद उन्होंने अंग्रेज
- 2:26:50अफसरों पर हमला किया। उनके बंगले जला दिए।
- 2:26:53लेकिन यहां एक बात गौर करने वाली है।
- 2:26:55क्या?
- 2:26:55उनका गुस्सा सिर्फ अंग्रेजों पर नहीं था।
- 2:26:57उन्होंने सरकारी इमारतें भी नहीं छोड़ी।
- 2:27:00रिकॉर्ड दफ्तर, जेल, अदालत, डाकखाने,
- 2:27:03सरकारी खजाने सबको जला दिया।
- 2:27:05तो, यह सिर्फ मारकाट नहीं थी। यह एक तरह
- 2:27:08का ऐलान था। यह हर उस चीज पर हमला था जो
- 2:27:11ब्रिटिश शासन या फिरंगी राज की निशानी थी।
- 2:27:15एकदम सही। रिकॉर्ड दफ्तर जलाकर वो शायद
- 2:27:17अपने कर्जों और अंग्रेजों के बनाए कानूनों
- 2:27:19के सबूत मिटा देना चाहते थे।
- 2:27:21अच्छा।
- 2:27:22और मेरठ में यह सब करने के बाद वो रुके
- 2:27:24नहीं। अगली सुबह तक उनका एक जज था दिल्ली
- 2:27:26के लाल किले के दरवाजे पर खड़ा था।
- 2:27:28और उनका मकसद साफ था। वो मुगल सम्राट
- 2:27:31बहादुर शाह जफर से मिलना चाहते थे।
- 2:27:34हां, यह कमाल का स्ट्रेटेजिक मूव था।
- 2:27:36लेकिन क्यों बहादुर शाह जफर उस वक्त तक तो
- 2:27:39सिर्फ नाम के बादशाह रह गए थे। असली ताकत
- 2:27:41तो अंग्रेजों के पास थी।
- 2:27:43क्योंकि उन्हें एक चेहरे की एक प्रतीक की
- 2:27:45जरूरत थी। बहादुर शाह जफर भले ही कमजोर थे
- 2:27:48लेकिन वो उस मुगल सल्तनत के वारिस थे
- 2:27:50जिसके नीचे हिंदुस्तान कभी एक था।
- 2:27:52मतलब उनके नाम से इस विद्रोह को एक
- 2:27:55लेजिटिमेसी मिल जाती।
- 2:27:56बिल्कुल। यह सिर्फ सिपाहियों का गुस्सा ना
- 2:27:58रहकर पूरे हिंदुस्तान की लड़ाई बन सकती
- 2:28:00थी।
- 2:28:01सुना है बादशाह पहले तैयार नहीं थे?
- 2:28:03हां। वो हिचकिचाए। उन्हें अंग्रेजों की
- 2:28:05ताकत का अंदाजा था। लेकिन जब विद्रोही
- 2:28:07सिपारी किले के अंदर घुस आए और दिल्ली के
- 2:28:10आम लोग भी उनके साथ जुड़ने लगे। सही कहा।
- 2:28:12उनके पास उनकी बात मानने के अलावा कोई
- 2:28:14चारा नहीं बचा। और उनके एक हां ने पूरा
- 2:28:17मंजर बदल दिया। अब यह लड़ाई मुगल बादशाह
- 2:28:21के झंडे तले लड़ी जा सकती थी।
- 2:28:23और इस खबर का असर तो मतलब एक धमाके जैसा
- 2:28:26हुआ होगा।
- 2:28:27बिल्कुल। जैसे ही खबर फैली कि दिल्ली अब
- 2:28:29विद्रोहियों के कब्जे में है और उन्हें
- 2:28:31मुगल सम्राट का आशीर्वाद भी मिल गया है।
- 2:28:34गंगा घाटी से लेकर मध्य भारत तक एक के बाद
- 2:28:37एक छावनी में विद्रोह की आग भड़क उठी।
- 2:28:39इससे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। जिस तेजी
- 2:28:43से यह सब फैला क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक
- 2:28:46था या इसके पीछे कोई प्लानिंग, कोई
- 2:28:48कम्युनिकेशन चल रहा था?
- 2:28:49इसके सबूत मिलते हैं। अलग-अलग छावनियों के
- 2:28:51सिपाही आपस में बात कर रहे थे। एक उदाहरण
- 2:28:54है कि जब सेवंथ अवध केवलरी ने नए कारतूस
- 2:28:57इस्तेमाल करने से मना कर दिया तो उन्होंने
- 2:29:0048 नेटिव इनफेंट्री को लिखा।
- 2:29:02क्या लिखा?
- 2:29:02उन्होंने लिखा कि हमने अपने धर्म के लिए
- 2:29:05यह किया है और अब आपके हुक्म का इंतजार कर
- 2:29:08रहे हैं। यह साफ इशारा है कि वह मिलकर कदम
- 2:29:10उठा रहे थे।
- 2:29:11मतलब छावनियों में रात को पंचायतें जुड़
- 2:29:14रही थी। आगे क्या करना है इस पर बहस हो
- 2:29:16रही थी और जब विद्रोह शुरू हुआ तो नेता भी
- 2:29:19सामने आने लगे। और यहां एक दिलचस्प बात यह
- 2:29:21है कि नेता हर तरह के थे। एक तरफ कानपुर
- 2:29:23में नाना साहेब थे जो पेशवा बाजीराव 2 के
- 2:29:26उत्तराधिकारी थे
- 2:29:27और अपनी पेंशन और पदवी छीन जाने से नाराज
- 2:29:30थे।
- 2:29:30बिल्कुल झांसी में रानी लक्ष्मीबाई थी
- 2:29:32जिनकी सल्तनत अंग्रेजों ने हड़प ली थी। तो
- 2:29:35यह शाही लोग थे जिनकी लड़ाई अपनी इज्जत और
- 2:29:37हक की थी।
- 2:29:38लेकिन सभी नेता शाही खानदान से तो नहीं
- 2:29:40थे।
- 2:29:40सही बात। बिहार के आरा में कुंवर सिंह थे।
- 2:29:44एक बुजुर्ग जमींदार। फैजाबाद में मौलवी
- 2:29:46अहमदुल्लाह शाह जैसे धार्मिक नेता थे।
- 2:29:48जिनको लग रहा था कि उनका धर्म खतरे में
- 2:29:50है।
- 2:29:50और फिर इन सबसे अलग उत्तर प्रदेश के बड़ौत
- 2:29:53में शाहमल जैसे एक आम आदमी ने गांव वालों
- 2:29:57को इकट्ठा करके अंग्रेजों से टक्कर ली।
- 2:29:59हां। इससे साफ पता चलता है कि यह सिर्फ
- 2:30:02राजाओं या सिपाहियों की लड़ाई नहीं थी।
- 2:30:04इसमें हर तबके का गुस्सा, हर तरह की
- 2:30:06परेशानी शामिल थी।
- 2:30:08लेकिन इतना सारा गुस्सा एक साथ एक ही वक्त
- 2:30:10पर कैसे फटा? मतलब इस आग को हवा किसने दी?
- 2:30:14इसके पीछे चिंगारी का काम किया अफवाहों और
- 2:30:17भविष्यवाणियों ने। खासकर जब लोगों के मन
- 2:30:20में पहले से ही डर और शक हो तो अफवाहें
- 2:30:23पेट्रोल की तरह काम करती हैं।
- 2:30:24और सबसे बड़ी अफवाह थी उन चर्बी वाले
- 2:30:26कारतूसों की।
- 2:30:27जी, ग्रीस्ड कार्ट्रेजेस की।
- 2:30:29यह खबर फैल गई थी कि जो नई एनफील्ड राइफल
- 2:30:32आई है, उसके कारतूस पर गाय और सूअर की
- 2:30:35चर्बी लगी है जिसे दांत से काटना पड़ता
- 2:30:37है। यह हिंदू और मुसलमान दोनों सिपाहियों
- 2:30:40के लिए उनका धर्म भ्रष्ट करने जैसा था।
- 2:30:42अंग्रेज अफसर चीखते रह गए कि यह झूठ है
- 2:30:45लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं मानी।
- 2:30:46क्यों?
- 2:30:47क्योंकि इसके पीछे एक ठोस वजह थी। लोगों
- 2:30:49ने सोचा यह अंग्रेज हमारे धर्म के मामलों
- 2:30:51में इतना दखल क्यों दे रहे हैं?
- 2:30:53और बात सिर्फ कारतूस की नहीं थी।
- 2:30:55अच्छा। उसी दौरान एक और अफवाह फैली कि
- 2:30:58बाजार में बिकने वाले आटे में अंग्रेजों
- 2:31:00ने गाय और सूअर की हड्डियों का चूरा मिलवा
- 2:31:03दिया है। ओहो जब आप इन दोनों अफवाहों को
- 2:31:06जोड़कर देखते हैं तब समझ आता है कि लोगों
- 2:31:09को यह एक सूची समझी साजिश क्यों लगी होगी।
- 2:31:12हां और फिर वो चपातियों वाली रहस्यमई घटना
- 2:31:15गांव में रात को एक चौकीदार दूसरे गांव
- 2:31:18में जाकर पांच चपातियां दे आता और कहता कि
- 2:31:20आगे पांच और बनाकर बांट दो। इसका मतलब
- 2:31:23क्या था? कोई नहीं जानता। पर इसने एक
- 2:31:25अनजाने खतरे का माहौल जरूर बना दिया।
- 2:31:28और इन सबके बीच एक पुरानी भविष्यवाणी भी
- 2:31:30जोर पकड़ रही थी।
- 2:31:31हां, कि प्लासी की लड़ाई के ठीक 100 साल
- 2:31:34बाद यानी 23 जून 1857 को फिरंगी राज का
- 2:31:38अंत हो जाएगा।
- 2:31:39यह सब चीजें मिलकर लोगों को विद्रोह के
- 2:31:41लिए तैयार कर रही थी।
- 2:31:42लेकिन लोग इन अफवाहों पर इतना जल्दी
- 2:31:44विश्वास क्यों कर रहे थे? जरूर अंग्रेजों
- 2:31:47ने पहले कुछ ऐसा किया होगा जिससे लोगों का
- 2:31:50उन पर से भरोसा उठ गया था।
- 2:31:52बिल्कुल। 1820 के बाद से ब्रिटिश ने भारत
- 2:31:55में तेजी से बदलाव लाने शुरू कर दिए थे।
- 2:31:57उन्होंने सती प्रथा पर रोक लगाई। हिंदू
- 2:32:00विधवाओं को दोबारा शादी करने का कानून
- 2:32:02बनाया।
- 2:32:02भले ही यह सुधार के काम थे, लेकिन बहुत से
- 2:32:05भारतीयों को लगा कि अंग्रेज हमारे रीति
- 2:32:08रिवाजों को खत्म करना चाहते हैं।
- 2:32:10सही कहा। इसके साथ ही उन्होंने अंग्रेजी
- 2:32:13स्कूल खोले। के क्रिश्चियन मिशनरीज को काम
- 2:32:14करने की आजादी दी।
- 2:32:15और जमीन और राज्यों को हड़पने की नीतियां
- 2:32:18तो थी ही। सहायक संधि यानी सब्सिडियरी
- 2:32:21अलायंस, विलय की नीति यानी डॉक्ट्रिन ऑफ
- 2:32:24लैप्स।
- 2:32:25बिल्कुल। इनके जरिए एक के बाद एक सतारा,
- 2:32:28झांसी, नागपुर जैसी रियासतें अंग्रेजी
- 2:32:31साम्राज्य में मिला ली गई। और इन सब
- 2:32:33पॉलिसीज का सबसे बुरा और गहरा असर शायद
- 2:32:36अवध पर पड़ा।
- 2:32:37अवध?
- 2:32:37हां। अवध की कहानी इस विद्रोह को समझने के
- 2:32:40लिए बहुत जरूरी है क्योंकि वहां गुस्सा कई
- 2:32:42सालों से उबल रहा था। गवर्नर जनरल लॉर्ड
- 2:32:45डलहौजी ने तो 1851 में ही अवध के लिए कह
- 2:32:48दिया था यह चेरी का फल एक दिन हमारे ही
- 2:32:51मुंह में आ गिरेगा।
- 2:32:52उन्होंने इसकी शुरुआत 1801 में ही कर दी
- 2:32:55थी। जब अवध पर सहायक संधि थोप दी गई।
- 2:32:58हां। सब्सिडरी अलायंस इसका मतलब था कि
- 2:33:02नवाब अपनी सेना नहीं रख सकते थे। उनकी
- 2:33:04सुरक्षा की जिम्मेदारी ब्रिटिश सेना की थी
- 2:33:07जिसका सारा खर्चा नवाब को ही उठाना पड़ता
- 2:33:10था।
- 2:33:10यह एक मीठा जहर था जिसने अवध को अंदर से
- 2:33:14खोखला कर दिया।
- 2:33:15और आखिरकार 1856 में नवाब वाजिद अली शाह
- 2:33:19पर कुशासन का इल्जाम लगाकर उन्हें गद्दी
- 2:33:22से उतार दिया गया और कलकत्ता भेज दिया
- 2:33:24गया।
- 2:33:24अंग्रेजों ने कहा कि हम अवध की जनता को
- 2:33:27नवाब के बुरे शासन से आजाद करा रहे हैं।
- 2:33:30लेकिन हुआ इसका उल्टा। अवध के लोग अपने
- 2:33:32नवाब से प्यार करते थे। उनके जाने का मातम
- 2:33:35पूरे अवध ने मनाया। एक शख्स ने लिखा, शहर
- 2:33:38से जान जा चुकी थी, जिस्म बेजान था।
- 2:33:41और इसके बाद अंग्रेजों ने वहां के
- 2:33:43ताल्लुकदारों पर भी हमला किया। यह
- 2:33:45ताल्लुकदार कौन थे?
- 2:33:46ताल्लुकदार वहां के बड़े जमींदार थे,
- 2:33:48जिनकी पीढ़ियां उस जमीन पर राज करती आ रही
- 2:33:51थी। उनके अपने किले थे। अपनी छोटी-मोटी
- 2:33:54सेनाएं थी। वो उस इलाके के मालिक थे।
- 2:33:56अच्छा।
- 2:33:57अंग्रेजों ने आते ही उनकी ताकत खत्म करनी
- 2:33:59शुरू कर दी। उनके किले तोड़ दिए। उनकी
- 2:34:01सेनाएं भंग कर दी।
- 2:34:03और फिर आया 1856 का एक मुश्त बंदोबस्त
- 2:34:07यानी समरी सेटलमेंट।
- 2:34:08हां, इस पॉलिसी के तहत उनकी जमीनें उनसे
- 2:34:12छीन ली गई। सोच कर देखिए यह तालूकदारों के
- 2:34:14लिए सिर्फ जमीन का नुकसान नहीं था। यह
- 2:34:17उनकी इज्जत, उनकी पीढ़ियों की विरासत का
- 2:34:19अपमान था।
- 2:34:20मतलब जो लोग कल तक राजा थे, वो एक झटके
- 2:34:24में बेजमीन हो गए।
- 2:34:25बिल्कुल। यह सिर्फ एक फाइनेंशियल पॉलिसी
- 2:34:28नहीं थी। यह एक सोशल अटैक था
- 2:34:30और इसका असर सिपाहियों पर भी पड़ा होगा
- 2:34:32क्योंकि सुना है बंगाल आर्मी में ज्यादातर
- 2:34:35सिपाही अवध से ही आते थे।
- 2:34:36बिल्कुल सही। इसीलिए अवध को बंगाल आर्मी
- 2:34:40की पौधशाला यानी नर्सरी ऑफ द बंगाल आर्मी
- 2:34:44कहा जाता था। हर किसान परिवार से कोई ना
- 2:34:46कोई फौज में था।
- 2:34:48तो जब उन्होंने देखा कि उनके गांव में
- 2:34:50तालुकदार का अपमान हो रहा है। उनके
- 2:34:52परिवारों पर लगान बढ़ता जा रहा है। तो
- 2:34:54उनका गुस्सा भी बढ़ गया।
- 2:34:56हां। अब सिपाही का गुस्सा और किसान का
- 2:34:58गुस्सा एक हो चुका था।
- 2:35:00इतना सब कुछ हो रहा था। हमले, अफवाहें,
- 2:35:03संगठन मुझे यह जानने की उत्सुकता हो रही
- 2:35:06है कि इन सबके पीछे उनका अंतिम लक्ष्य
- 2:35:08क्या था? व्हाट वास द एंड गेम फॉर द
- 2:35:11रेबल्स? आखिर वो चाहते क्या थे?
- 2:35:13इसका जवाब हमें उन इश्तहारों या ऐलानों
- 2:35:16में मिलता है जो विद्रोहियों ने जारी किए
- 2:35:18थे। उनका सबसे पहला और सबसे जरूरी मकसद था
- 2:35:21एकता।
- 2:35:22यूनिटी।
- 2:35:23जी। हर ऐलान में चाहे वह हिंदुओं के नाम
- 2:35:26हो या मुसलमानों के जाति और धर्म से ऊपर
- 2:35:29उठकर साथ आने की अपील की गई।
- 2:35:31आजमगढ़ प्रोक्लेमेशन इसका एक बेहतरीन
- 2:35:34उदाहरण है।
- 2:35:35हां, 25 अगस्त 1857 को जारी हुए इस ऐलान
- 2:35:38में समाज के हर तबके से वादा किया गया था।
- 2:35:41जमींदारों से कहा गया कि उनकी जमीन उन्हें
- 2:35:43वापस मिलेगी। व्यापारियों से कहा गया कि
- 2:35:46उन्हें ब्रिटिश टैक्स से आजादी मिलेगी। और
- 2:35:48सरकारी नौकरी करने वाले पंडितों और
- 2:35:50मौलवियों से
- 2:35:51उनसे कहा गया कि उनके धर्म और इज्जत की
- 2:35:53रक्षा की जाएगी। यह सबको साथ लाने की एक
- 2:35:56कोशिश थी।
- 2:35:57तो वह अंग्रेजों को हटाकर उस पुरानी
- 2:35:59दुनिया को वापस लाना चाहते थे जो
- 2:36:02अंग्रेजों के आने से पहले थी। उनका विज़न
- 2:36:05मतलब पिछले दौर से जुड़ा था।
- 2:36:07बिल्कुल। उनके लिए मुगल साम्राज्य एकता का
- 2:36:10प्रतीक था। एक ऐसा हिंदुस्तान जहां
- 2:36:12अलग-अलग समुदाय एक साथ रहते थे। इसीलिए
- 2:36:15उन्होंने बहादुर शाह जफर को अपना नेता
- 2:36:18माना
- 2:36:18और उन्होंने दिल्ली, लखनऊ और कानपुर में
- 2:36:21अंग्रेजों के शासन के बदले अपना एक अलग
- 2:36:24सिस्टम बनाने की कोशिश भी की थी।
- 2:36:26हां बिल्कुल। पुराने मुगल दरबार की तरह
- 2:36:28ओहदे बांटे, एडमिनिस्ट्रेशन खड़ा करने का
- 2:36:30प्रयास किया।
- 2:36:31लेकिन इतना बड़ा और फैला हुआ विद्रोह आखिर
- 2:36:34दबा कैसे दिया गया? अंग्रेजों ने इस आग को
- 2:36:37कैसे बुझाया?
- 2:36:38शुरुआत में तो अंग्रेज बौखला गए थे। उनके
- 2:36:40पास विद्रोहियों के मुकाबले सैनिक कम थे।
- 2:36:43लेकिन उन्होंने इसे कुचलने के लिए अपनी
- 2:36:45पूरी ताकत झोंक दी। सबसे पहले उन्होंने
- 2:36:48कठोर कानून बनाए।
- 2:36:49जैसे कि
- 2:36:50मई और जून 1857 में पूरे उत्तर भारत में
- 2:36:53मार्शल लॉ लगा दिया गया।
- 2:36:55इसका क्या मतलब था आम लोगों के लिए?
- 2:36:57इसका मतलब था कि अब मिलिट्री ऑफिसर भी
- 2:36:59किसी भी हिंदुस्तानी पर सिर्फ शक के आधार
- 2:37:02पर मुकदमा चला सकते थे और सजा दे सकते थे।
- 2:37:05और सजा सिर्फ एक थी मौत। सारे कानूनी
- 2:37:08प्रोसेस खत्म कर दिए गए।
- 2:37:10और फिर सेना की कारवाई शुरू हुई।
- 2:37:12हां। ब्रिटेन से नई फौज की टुकड़ियां
- 2:37:14मंगवाई गई। उनका पहला लक्ष्य था दिल्ली पर
- 2:37:17दोबारा कब्जा करना क्योंकि दिल्ली विद्रोह
- 2:37:20का दिल बन चुका था।
- 2:37:21तो उन्होंने दो तरफ से हमला किया।
- 2:37:23जी एक फौज कोलकाता से आई दूसरी पंजाब से।
- 2:37:27दिल्ली पर कब्जा करना आसान नहीं रहा होगा?
- 2:37:30नहीं बिल्कुल नहीं। लंबी और खूनी लड़ाई के
- 2:37:33बाद सितंबर 1857 में अंग्रेज दिल्ली पर
- 2:37:37कब्जा कर पाए। लेकिन इसके बाद जो दमन का
- 2:37:40दौर शुरू हुआ वो बेहद क्रूर था।
- 2:37:43अंग्रेजों ने बदले की भावना से काम किया।
- 2:37:45किस तरह की क्रूरता थी?
- 2:37:47विद्रोहियों को सार्वजनिक तौर पर फांसी दी
- 2:37:49गई। उन्हें तोप के मुंह से बांधकर उड़ा
- 2:37:51दिया गया। यह सिर्फ सजा नहीं थी। यह दहशत
- 2:37:54फैलाने का एक तरीका था।
- 2:37:56ताकि आगे से कोई ऐसी हिम्मत ना करें।
- 2:37:58तस्वीरें बनाई गई जिसमें अंग्रेज अफसर
- 2:38:01विद्रोहियों को पैरों तले रौंद रहे हैं।
- 2:38:03गांव के गांव जला दिए गए। उनका मकसद सिर्फ
- 2:38:06विद्रोह को दबाना नहीं था बल्कि उसे पूरी
- 2:38:08तरह से कुचलना था।
- 2:38:09तो इस तरह से यह लड़ाई मैदान में तो खत्म
- 2:38:12हुई लेकिन एक और लड़ाई शुरू हुई। यादों
- 2:38:15की, तस्वीरों की
- 2:38:16बिल्कुल।
- 2:38:17इस पूरी घटना को चित्रकारों ने, लेखकों ने
- 2:38:20कैसे पेश किया।
- 2:38:22यही इस चैप्टर का सबसे दिलचस्प हिस्सा है
- 2:38:24कि कैसे इस विद्रोह की अलग-अलग तस्वीरें
- 2:38:26बनाई गई। अंग्रेजों की तस्वीरों में एक
- 2:38:28अलग कहानी है और भारतीयों की कल्पना में
- 2:38:31बिल्कुल अलग। पहले अंग्रेजों की बात करते
- 2:38:33हैं। उनके चित्रों में क्या दिखता था?
- 2:38:36उनके चित्रों में कुछ खास थीम्स बार-बार
- 2:38:38आते हैं। पहला ब्रिटिश नायकों का गुणगान।
- 2:38:40कई पेंटिंग्स बनी जिसमें अंग्रेज अफसर
- 2:38:43घिरे हुए अंग्रेजों को बचाते हुए दिखाए
- 2:38:45गए।
- 2:38:45जैसे रिलीफ ऑफ लखनऊ। हां, थॉमस जॉन्स बाकर
- 2:38:48की रिलीफ ऑफ लखनऊ इसका बड़ा उदाहरण है।
- 2:38:51इसमें ब्रिटिश सेना के कमांडर कैंबल
- 2:38:53हैवलॉक और आउट्रम को हीरों की तरह दिखाया
- 2:38:56गया है जो अपनी शक्ति से सब पर काबू पा
- 2:38:58रहे हैं।
- 2:38:58और एक थीम यह भी था कि विद्रोही बहुत
- 2:39:00जालिम थे। खासकर अंग्रेज औरतों और बच्चों
- 2:39:04के प्रति। हां जोसेफ नोएल पैटर्न की
- 2:39:06पेंटिंग इन मेमोरियम इसका प्रतीक है।
- 2:39:08इसमें मासूम अंग्रेज औरतें और बच्चे एक
- 2:39:11घेरे में डरे सहमे बैठे हैं और उन्हें
- 2:39:13देखकर लगता है कि विद्रोही उन पर अत्याचार
- 2:39:15करने वाले हैं।
- 2:39:16इन तस्वीरों का मकसद क्या था?
- 2:39:18इनका मकसद ब्रिटिश जनता में गुस्सा और
- 2:39:20बदले की भावना पैदा करना था ताकि अंग्रेज
- 2:39:23सेना जो क्रूरता कर रही थी उसे आम जनता का
- 2:39:25समर्थन मिले।
- 2:39:26मतलब यह तस्वीरें एक तरह का प्रोपेगेंडा
- 2:39:29थी।
- 2:39:29बिल्कुल। पंच मैगजीन के कार्टूनस में तो
- 2:39:31यह और साफ दिखता है। एक कार्टून में
- 2:39:33ब्रिटिश शेर को एक भारतीय बाघ पर हमला
- 2:39:35करते दिखाया गया है जो सीधे-सीधे बदले का
- 2:39:37संदेश देता है।
- 2:39:38और इसके बिल्कुल विपरीत भारतीय
- 2:39:40राष्ट्रवादियों ने इस विद्रोह को कैसे याद
- 2:39:42किया?
- 2:39:43भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए यह घटना
- 2:39:45अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ाई की सबसे
- 2:39:47बड़ी मिसाल बन गई। इसे भारत का प्रथम
- 2:39:50स्वतंत्रता संग्राम यानी फर्स्ट वॉर ऑफ
- 2:39:52इंडिपेंडेंस का दर्जा दिया गया।
- 2:39:54और इस नई कहानी के नायक और नायिकाएं भी नए
- 2:39:57थे।
- 2:39:57बिल्कुल। इस राष्ट्रवादी कल्पना में रानी
- 2:40:00लक्ष्मीबाई वीरता का सबसे बड़ा प्रतीक बन
- 2:40:03गई। उनकी छवि बनाई गई एक ऐसी वीरांगना जो
- 2:40:06घोड़े पर सवार है। पीठ पर अपने बच्चे को
- 2:40:09बांधे हाथ में तलवार लिए।
- 2:40:11अपने देश की आजादी के लिए लड़ रही है।
- 2:40:13जी। और इस छवि को अमर कर दिया सुभद्रा
- 2:40:16कुमारी चौहान की कविता ने।
- 2:40:17खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी
- 2:40:20थी।
- 2:40:20सही कहा। यह कविताएं, लोकगीत और तस्वीरें
- 2:40:24इन सब ने मिलकर 1857 के नेताओं को हमारे
- 2:40:27राष्ट्रीय नायकों के रूप में स्थापित कर
- 2:40:29दिया। यह दिखाता है कि इतिहास सिर्फ वो
- 2:40:32नहीं जो हुआ बल्कि वह भी है जिसे हम याद
- 2:40:35रखना चुनते हैं।
- 2:40:36विद्रोही ओहियाज 1857 का आंदोलन और उसके
- 2:40:40व्याख्यान इस पर हमारी यह गहरी चर्चा
- 2:40:43समाप्त हुई। हमने देखा कि कैसे अंग्रेजों
- 2:40:46और भारतीयों ने इस विद्रोह को अलग-अलग
- 2:40:48तरीके से पेश किया। जी और यह हमें एक बड़े
- 2:40:52सवाल पर लाकर छोड़ता है। आज 150 साल से भी
- 2:40:55ज्यादा समय बाद जब हम इस घटना के बारे में
- 2:40:57सोचते हैं तो हमारे ज़हन में कौन सी तस्वीर
- 2:41:00उभरती है? क्या वह अंग्रेजों की बनाई हुई
- 2:41:02विद्रोहियों की तस्वीर है या
- 2:41:03राष्ट्रवादियों की बनाई हुई स्वतंत्रता
- 2:41:05सेनानियों की? और हमारी यह पसंद हमारे आज
- 2:41:08के बारे में क्या बताती है?
- 2:41:12तो आज हम एक बहुत ही दिलचस्प अध्याय शुरू
- 2:41:16करने वाले हैं। अध्याय 12 औपनिवेशिक शहर।
- 2:41:20हां औपनिवेशिक शहर मतलब वो शहर जो
- 2:41:23अंग्रेजों के शासनकाल में विकसित हुए।
- 2:41:26इसमें हम तीन मुख्य चीजों पर ध्यान देंगे।
- 2:41:29नगरीकरण यानी अर्बनाइजेशन।
- 2:41:31अर्बनाइजेशन। ठीक है?
- 2:41:32फिर नगर योजना मतलब टाउन प्लानिंग और
- 2:41:35स्थापत्य यानी आर्किटेक्चर। और इस अध्याय
- 2:41:38में हम एनसीईआरटी के हिसाब से सभी जरूरी
- 2:41:41पॉइंट्स को एक-एक करके समझेंगे। देखेंगे
- 2:41:43कि मद्रास, कोलकाता और बंबई जैसे शहर यह
- 2:41:46औपनिवेशिक भारत के सबसे अहम केंद्र कैसे
- 2:41:50बन गए।
- 2:41:50बिल्कुल। तो सबसे पहले यह समझते हैं कि
- 2:41:53अंग्रेजों के आने से पहले यानी पूर्व
- 2:41:56औपनिवेशिक काल में भारत के कस्बे और शहर
- 2:41:59कैसे थे?
- 2:41:59हां, यह जानना जरूरी है।
- 2:42:01देखिए मुगल काल में जो शहर थे जैसे दिल्ली
- 2:42:04या आगरा वो शाही सत्ता और समृद्धि के
- 2:42:08केंद्र थे। इनकी पहचानी महलों, किलों और
- 2:42:11बड़ी-बड़ी मस्जिदों से होती थी।
- 2:42:13और दक्षिण भारत में
- 2:42:14दक्षिण भारत में तस्वीर थोड़ी अलग थी।
- 2:42:16वहां शहर अक्सर मंदिरों के आसपास विकसित
- 2:42:19होते थे।
- 2:42:19अच्छा यहां एक शब्द आता है किला बंद।
- 2:42:23फर्टिफाइड।
- 2:42:24इसका क्या मतलब है?
- 2:42:25किला बंद का मतलब है वो शहर या बस्ती जो
- 2:42:29सुरक्षा के लिए दीवारों से घिरी हो।
- 2:42:31हम
- 2:42:32यह पुराने शहरों की एक बहुत आम पहचान थी।
- 2:42:34हम
- 2:42:35और हां, यह एग्जाम्स के लिए एक जरूरी टर्म
- 2:42:37है।
- 2:42:38ठीक है। तो फिर 18वीं सदी में क्या हुआ?
- 2:42:41जब मुगल साम्राज्य कमजोर होने लगा
- 2:42:43तो जैसे-जैसे मुगल सत्ता कमजोर हुई,
- 2:42:46पुराने शाही शहरों का पतन होने लगा और
- 2:42:48उनकी जगह लखनऊ, हैदराबाद जैसे नए
- 2:42:51क्षेत्रीय केंद्र उभर कर सामने आए।
- 2:42:53और ठीक इसी समय यूरोपीय कंपनियां भी आ रही
- 2:42:55थी।
- 2:42:56एकदम सही। और उन्होंने अपने केंद्र
- 2:42:58स्थापित किए जिससे मद्रास, कोलकाता और
- 2:43:00मुंबई जैसे बंदरगाह शहर, पोर्ट सिटीज
- 2:43:03उभरे। तो यह शहर बन तो गए लेकिन हमें इनके
- 2:43:06बारे में पता कैसे चलता है? मतलब
- 2:43:09औपनिवेशिक शहरों की पड़ताल कैसे की जाती
- 2:43:11है?
- 2:43:12देखिए अंग्रेज हर चीज का रिकॉर्ड रखने के
- 2:43:14लिए जाने जाते थे।
- 2:43:15हम्म।
- 2:43:15उन्होंने शासन चलाने के लिए बहुत बड़े
- 2:43:17पैमाने पर आंकड़े और रिकॉर्ड्स इकट्ठा
- 2:43:19किए।
- 2:43:20हम
- 2:43:20शहरों के नक्शे बनाए, सर्वेक्षण किए और
- 2:43:24सबसे जरूरी उन्होंने नियमित रूप से जनगणना
- 2:43:27करवानी शुरू की।
- 2:43:28जनगणना सेंसेस।
- 2:43:29हां। द सेंसेस इसका मतलब है जनसंख्या की
- 2:43:32आधिकारिक गिनती। एन ऑफिशियल काउंट ऑफ द
- 2:43:35पपुलेशन।
- 2:43:36और ये कब शुरू हुई?
- 2:43:37भारत में पहली अखिल भारतीय जनगणना 1872
- 2:43:41में हुई और फिर 1881 से यह हर 10 साल में
- 2:43:44होने लगी। यह रिकॉर्ड्स शहरीकरण के
- 2:43:46ट्रेंड्स को समझने के लिए बहुत जरूरी हैं।
- 2:43:48और ये डेट भी एग्जाम्स के लिए जरूरी हैं।
- 2:43:50तो इन आंकड़ों से क्या पता चला? क्या भारत
- 2:43:53बहुत तेजी से शहरी बन रहा था?
- 2:43:55नहीं, हैरानी की बात है कि ऐसा नहीं था।
- 2:43:5719 सेंचुरी में शहरी आबादी का हिस्सा बहुत
- 2:44:00धीरे-धीरे बढ़ा। लेकिन
- 2:44:02लेकिन कोलकाता, बंबई और मद्रास जैसे शहर
- 2:44:05हां, यह औपनिवेशिक शहर बहुत तेजी से बढ़
- 2:44:07रहे थे। यह शहर भारत से कच्चा माल जैसे
- 2:44:10कपास और नील इंग्लैंड भेजने के मुख्य
- 2:44:12केंद्र बन गए थे। और 1853 में जब रेलवे आई
- 2:44:15तो इस प्रक्रिया में और तेजी आ गई।
- 2:44:17अच्छा, अब आते हैं इन शहरों की एक बहुत
- 2:44:20खास बात पर। पृथक्करण, सेग्रगेशन। हां, ये
- 2:44:24औपनिवेशिक शहरों की सबसे, आप कह सकते हैं
- 2:44:27सबसे कड़वी सच्चाई थी। अंग्रेजों ने अपने
- 2:44:30शहरों को साफ-साफ दो हिस्सों में बांट
- 2:44:32दिया था।
- 2:44:32दो हिस्से
- 2:44:34कौन-कौन से?
- 2:44:35पहला था वाइट टाउन, जहां सिर्फ यूरोपीय
- 2:44:37लोग रहते थे और दूसरा था ब्लैक टाउन, जहां
- 2:44:40भारतीय आबादी रहती थी।
- 2:44:42और ये बंटवारा सिर्फ मतलब रहने की जगह का
- 2:44:45नहीं था। इसके पीछे एक सोच थी।
- 2:44:47बिल्कुल। यह नस्लीय श्रेष्ठ था। रेशल
- 2:44:51सुपीरियरिटी की भावना पर आधारित था। वह
- 2:44:53ब्लैक टाउन को ना सिर्फ भीड़भाड़ वाला और
- 2:44:56गंदा मानते थे बल्कि उसे अराजकता और
- 2:44:58बीमारी का केंद्र भी समझते थे।
- 2:45:00यह पॉइंट एग्जाम्स के लिए बहुत-बहुत जरूरी
- 2:45:03है। और इसी सोच ने शायद उन्हें हिल स्टेशन
- 2:45:06बनाने के लिए भी प्रेरित किया होगा।
- 2:45:08हां, हिल स्टेशन जैसे शिमला। इन्हें शुरू
- 2:45:10में तो सेना को ठहराने और सीमा की निगरानी
- 2:45:12के लिए बनाया गया था। लेकिन इनकी ठंडी
- 2:45:15जलवायु यूरोप जैसी थी। तो यह अंग्रेजों के
- 2:45:17लिए गर्मियों में एक आकर्षक जगह बन गई। एक
- 2:45:20तरह का एस्केप।
- 2:45:21हां। और यहां उन्होंने सेनेटोरियम भी
- 2:45:23बनाए। सेनेटोरियम मतलब स्वास्थ्य लाभ के
- 2:45:26लिए बनाए गए स्थान। यह बीमार सैनिकों के
- 2:45:28लिए बहुत काम आते थे।
- 2:45:30शहरों में सामाजिक जीवन भी तो बदल रहा
- 2:45:32होगा।
- 2:45:32बहुत बदल रहा था। ट्रम और बसें जैसे नए
- 2:45:35परिवहन के साधन आए। पार्क, थिएटर और क्लब
- 2:45:38जैसे सार्वजनिक स्थान बने। महिलाओं के लिए
- 2:45:41शिक्षा और रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए।
- 2:45:43हालांकि उन पर सामाजिक नियंत्रण भी मजबूत
- 2:45:46था। चलिए अब बात करते हैं नगर नियोजन और
- 2:45:49भवन निर्माण की। टाउन प्लानिंग एंड
- 2:45:51आर्किटेक्चर। पहले मद्रास को देखते हैं।
- 2:45:53मद्रास का जो केंद्र था वो था फोर्ट सेंट
- 2:45:56जॉर्ज।
- 2:45:56यह अंग्रेजों का किला था।
- 2:45:58हां। और इसी किले के अंदर वाइट टाउन बसा
- 2:46:01था। और किले के बाहर ब्लैक टाउन था जो
- 2:46:03बिल्कुल एक पारंपरिक भारतीय शहर जैसा लगता
- 2:46:06था।
- 2:46:06अब कोलकाता की बात करते हैं। वहां तो 1757
- 2:46:10के प्लासी के युद्ध के बाद सब कुछ बदल
- 2:46:12गया।
- 2:46:13बिल्कुल। उस युद्ध के बाद अंग्रेजों ने एक
- 2:46:15नया किला बनाया फोर्ट विलियम और सुरक्षा
- 2:46:18के लिए उन्होंने किले के चारों ओर एक बहुत
- 2:46:20बड़ा खाली मैदान छोड़ दिया
- 2:46:22जिसे मैदान कहते हैं।
- 2:46:24हां मैदान जो आज भी कोलकाता का एक बहुत
- 2:46:27प्रमुख स्थल है।
- 2:46:28और कोलकाता की प्लानिंग के लिए क्या किया
- 2:46:30गया?
- 2:46:301803 में गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेसली ने
- 2:46:34कोलकाता के नगर नियोजन पर बहुत जोर दिया।
- 2:46:36इसके बाद एक लॉटरी कमेटी बनाई गई।
- 2:46:39लॉटरी कमेटी यह कैसा नाम है? मजेदार बात
- 2:46:42यह है कि इसका नाम इसलिए लॉटरी कमेटी था
- 2:46:44क्योंकि शहर के विकास का पैसा पब्लिक
- 2:46:47लॉटरी से इकट्ठा किया जाता था।
- 2:46:49क्या बात है मतलब लोगों के लॉटरी के पैसे
- 2:46:52से शहर बन रहा था।
- 2:46:53हां। और इस कमेटी ने शहर का नक्शा बनाने,
- 2:46:57सड़कें बनाने और भारतीय बस्तियों जिन्हें
- 2:47:00बस्ती कहते थे उनको साफ करने का काम किया।
- 2:47:02मकसद था शहर को स्वास्थ्य की दृष्टि से
- 2:47:05बेहतर और शासन करने में आसान बनाना। यह
- 2:47:08कमेटी एग्जाम्स के लिए जरूरी है।
- 2:47:10चलिए अब बॉम्बे की तरफ चलते हैं। बॉम्बे
- 2:47:12कपास के व्यापार का एक बहुत बड़ा केंद्र
- 2:47:14था।
- 2:47:15हां। और अंग्रेजों ने यहां अपनी शक्ति और
- 2:47:17अधिकार को दिखाने के लिए बहुत भव्य
- 2:47:20सार्वजनिक इमारतें बनवाई। इन इमारतों में
- 2:47:22मुख्य रूप से तीन स्थापत्य शैलियों का
- 2:47:25इस्तेमाल हुआ।
- 2:47:26तीन शैलियां। अच्छा कौन-कौन सी?
- 2:47:28पहली शैली थी नवशास्त्रीय
- 2:47:30नियो क्लासिकल।
- 2:47:31नियो क्लासिकल ये कैसी होती थी?
- 2:47:34इसमें बड़े-बड़े स्तंभ होते थे। इसकी
- 2:47:37प्रेरणा प्राचीन यूनान और रोम की इमारतों
- 2:47:40से ली गई थी। जैसे मुंबई का टाउन हॉल
- 2:47:43तो मतलब वह अपनी तुलना रोमन साम्राज्य से
- 2:47:45कर रहे थे।
- 2:47:46बिल्कुल यह शैली ब्रिटिश साम्राज्यवाद को
- 2:47:49प्राचीन रोम के गौरव से जोड़ती थी।
- 2:47:52और दूसरी शैली
- 2:47:53दूसरी थी नवगोथिक नियोगथिक। इसकी खासियत
- 2:47:57थी ऊंची उठी हुई छतें, नोकदार मेहराबें और
- 2:48:01बहुत बारीक साज सज्जा। जैसे कि
- 2:48:04जैसे बंबई विश्वविद्यालय, सचिवालय और उच्च
- 2:48:07न्यायालय और इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है
- 2:48:10विक्टोरिया टर्मिनस रेलवे स्टेशन। यह नाम
- 2:48:14एग्जाम्स के लिए बहुत जरूरी है।
- 2:48:15विक्टोरिया टर्मिनस जिसे आज छत्रपति
- 2:48:18शिवाजी महाराज टर्मिनस कहते हैं।
- 2:48:20हां वही। और तीसरी और सबसे दिलचस्प शैली
- 2:48:23थी इंडोसारासेसैनिक।
- 2:48:24इंडोसारसेसनिक यह तो नाम से ही मिश्रण लग
- 2:48:27रहा है।
- 2:48:28हां। यह भारतीय खासकर मुगल और यूरोपीय
- 2:48:31शैलियों का मिश्रण था। इसमें गुंबद,
- 2:48:34छतरियां, जालियां और मेहराब जैसे भारतीय
- 2:48:38तत्व इस्तेमाल होते थे।
- 2:48:39लेकिन ऐसा क्यों मतलब वो भारतीय शैली
- 2:48:42क्यों अपना रहे थे?
- 2:48:43इसका मकसद एक ऐसी शैली बनाना था जो दिखने
- 2:48:45में भारतीय हो लेकिन स्वभाव में ब्रिटिश।
- 2:48:48यह दिखाने के लिए कि वही भारत के असली
- 2:48:51शासक हैं। बॉम्बे का गेटवे ऑफ इंडिया और
- 2:48:53ताजमहल होटल इसके बेहतरीन उदाहरण हैं।
- 2:48:56तो आखिर में यह इमारतें और ये स्थापत्य
- 2:49:00शैलियां
- 2:49:00ये हमें क्या बताती हैं?
- 2:49:02ये सिर्फ इमारतें नहीं थी। यह शाही ताकत,
- 2:49:05राष्ट्रवाद और धार्मिक गौरव के प्रतीक थी।
- 2:49:09ये शासकों और शासितों के बीच के फर्क को
- 2:49:12साफ दिखाती थी।
- 2:49:13बिल्कुल। और भारतीयों पर अंग्रेजी शासन के
- 2:49:16अधिकार और शक्ति का प्रभाव डालती थी।
- 2:49:18तो यह थी कहानी औपनिवेशिक शहरों की।
- 2:49:20नगरीकरण, नगर योजना, स्थापत्य यह अध्याय
- 2:49:25समाप्त हुआ।
- 2:49:28आज हमारे पास जो दस्तावेज हैं, वह हमें
- 2:49:31भारत के इतिहास के एक ऐसे दौर में ले जा
- 2:49:34रहे हैं, जिसने देश की किस्मत ही तय कर
- 2:49:36दी। हम
- 2:49:36यह एनसीईआरटी की 12वीं कक्षा के इतिहास की
- 2:49:39किताब से जुड़े कुछ नोट्स और लेख हैं और
- 2:49:42इनका केंद्र है महात्मा गांधी और
- 2:49:44राष्ट्रीय आंदोलन।
- 2:49:45हमारी आज की इस गहन चर्चा का मकसद सिर्फ
- 2:49:48घटनाओं की एक लिस्ट बनाना नहीं है।
- 2:49:50बल्कि ये समझना है कि 1915 में जब गांधी
- 2:49:54भारत आए तो कैसे उन्होंने स्वतंत्रता
- 2:49:56संग्राम का चेहरा मतलब हमेशा के लिए बदल
- 2:49:59दिया।
- 2:49:59हां। जो आंदोलन पहले कुछ पढ़े-लिखे लोगों
- 2:50:02तक ही सीमित था, उसे उन्होंने करोड़ों
- 2:50:04लोगों का आंदोलन कैसे बना दिया?
- 2:50:06बस यही सवाल है।
- 2:50:07तो चलिए इसी सवाल के साथ शुरू करते हैं।
- 2:50:09गांधी जी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत
- 2:50:12लौटते हैं। वहां वो नस्लभेदी सरकार के
- 2:50:14खिलाफ अपने तरीकों को आजमा चुके थे।
- 2:50:17हम्म।
- 2:50:17पर भारत में उनकी असली शुरुआत कहां से
- 2:50:20होती है?
- 2:50:20देखिए उनकी जो पहली बड़ी सार्वजनिक
- 2:50:22उपस्थिति थी और मेरे हिसाब से सबसे
- 2:50:25धमाकेदार एंट्री वो फरवरी 1916 में हुई।
- 2:50:28बनारस
- 2:50:29हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह
- 2:50:31में
- 2:50:31हां बीएचयू के उद्घाटन में मंच पर देश के
- 2:50:34बड़े-बड़े राजे महाराजे अमीर लोग
- 2:50:37राष्ट्रवादी नेता सब मौजूद थे माहौल बहुत
- 2:50:40भव्य था
- 2:50:41और गांधी जी ने उस मौके का इस्तेमाल उन
- 2:50:43सबकी आलोचना करने के लिए किया है ना
- 2:50:45बिल्कुल उन्होंने अपने भाषण में सीधे-सीधे
- 2:50:48वहां बैठे सजेधजे अमीर भारतीयों की तरफ
- 2:50:50इशारा किया
- 2:50:51अच्छा
- 2:50:52उन्होंने कहा कि हम स्वराज की बात करते
- 2:50:54हैं लेकिन भारत के करोड़ों गरीब किसान और
- 2:50:56मजदूर वो तो इस चर्चा चर्चा से गायब हैं।
- 2:50:59हम्म।
- 2:50:59उन्होंने कहा भारत के लिए मुक्ति तब तक
- 2:51:01संभव नहीं है जब तक आप खुद को इन अलंकरणों
- 2:51:04से मुक्त नहीं कर लेते।
- 2:51:05वाह मतलब पहले ही भाषण में उन्होंने यह
- 2:51:08साफ कर दिया कि उनका राष्ट्रवाद ड्राइंग
- 2:51:10रूम की बहसों वाला नहीं होगा।
- 2:51:12हां बल्कि खेतों और फैक्ट्रियों से जुड़ा
- 2:51:14होगा। यह एक बहुत ही साहसी कदम था।
- 2:51:16बहुत ज्यादा। इसने उन्हें बाकी
- 2:51:18राष्ट्रवादी नेताओं से बिल्कुल अलग खड़ा
- 2:51:20कर दिया।
- 2:51:21और इसके बाद उन्होंने अपनी बातों को अमल
- 2:51:23में लाना शुरू किया। वह बड़े शहरों में
- 2:51:25भाषण देने के बजाय भारत के असली मुद्दों
- 2:51:27को पकड़ने लगे। 1917 में वह बिहार के
- 2:51:30चंपारण पहुंचे।
- 2:51:31चंपारण जहां नील की खेती करने वाले
- 2:51:34किसानों पर बहुत अत्याचार हो रहा था।
- 2:51:37हां, उन्हें अपनी जमीन के एक हिस्से पर
- 2:51:39जबरन नील उगाना पड़ता था जिसे ब्रिटिश
- 2:51:42बागान मालिक बहुत कम कीमत पर खरीदते थे।
- 2:51:44अच्छा।
- 2:51:45गांधी जी ने वहां जाकर किसानों की
- 2:51:47समस्याओं को सुना। उनका पक्ष लिया और एक
- 2:51:50शांतिपूर्ण विरोध का नेतृत्व किया। यह
- 2:51:53उनका भारत में पहला सत्याग्रह था
- 2:51:55और यहीं पर हमें उनके सबसे शक्तिशाली
- 2:51:57हथियार सत्याग्रह को समझना होगा। यह सिर्फ
- 2:52:01एक मतलब शांतिपूर्ण प्रदर्शन तो नहीं था
- 2:52:03है ना?
- 2:52:04नहीं बिल्कुल नहीं। सत्याग्रह का शाब्दिक
- 2:52:06अर्थ है सत्य के लिए आग्रह। यह निष्क्रिय
- 2:52:09प्रतिरोध नहीं बल्कि एक सक्रिय अहिंसक
- 2:52:12अवज्ञा थी।
- 2:52:13सक्रिय।
- 2:52:14हां। इसका मूल विचार था कि आप अन्यायपूर्ण
- 2:52:17कानून का शांति से उल्लंघन करें। उसके लिए
- 2:52:19मिलने वाली सजा को स्वीकार करें और
- 2:52:22ऐसा करके आप शासक की नैतिक सत्ता को
- 2:52:25चुनौती देते हैं।
- 2:52:26हां, आप उसे एक तरह से आईना दिखाते हैं।
- 2:52:28मतलब यह एक किस्म का नैतिक युद्ध था।
- 2:52:31और चंपारण में यह सफल रहा।
- 2:52:33हां, सरकार को झुकना पड़ा और किसानों को
- 2:52:35राहत मिली। इसके ठीक बाद 1918 में
- 2:52:38उन्होंने गुजरात में दो और आंदोलन किए।
- 2:52:40एक अहमदाबाद में कपड़ा मिल मजदूरों के लिए
- 2:52:43और दूसरा खेड़ा में जहां फसल खराब होने के
- 2:52:46बावजूद किसानों से लगान वसूला जा रहा था।
- 2:52:48तो चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा यह गांधी जी
- 2:52:52के प्रयोगशाला की तरह थे।
- 2:52:54बिल्कुल। यहां उन्होंने अपने तरीकों को
- 2:52:56आजमाया और यह साबित किया कि वो काम करते
- 2:52:58हैं।
- 2:52:58सही कहा। इन तीन स्थानीय जीतों ने गांधी
- 2:53:01को गरीबों के नेता के रूप में स्थापित कर
- 2:53:03दिया।
- 2:53:04अब बड़ा सवाल यह था कि क्या यह तरीका पूरे
- 2:53:06देश के स्तर पर ब्रिटिश साम्राज्य की पूरी
- 2:53:08ताकत के खिलाफ काम कर सकता था?
- 2:53:10और इसका मौका उन्हें जल्द ही मिला। 1919
- 2:53:14के रेलेट एक्ट के साथ। हां, यह एक बहुत ही
- 2:53:16दमनकारी कानून था। इसने ब्रिटिश सरकार को
- 2:53:19सिर्फ शक के आधार पर
- 2:53:20बिना कोई मुकदमा चलाए
- 2:53:22किसी को भी गिरफ्तार करने और जेल में
- 2:53:24डालने का अधिकार दे दिया। ना कोई अपील, ना
- 2:53:26कोई दलील, ना कोई वकील।
- 2:53:28मतलब नागरिक आजादी पर सीधा हमला।
- 2:53:30बिल्कुल। गांधी जी ने इसके खिलाफ
- 2:53:32देशव्यापी सत्याग्रह का आह्वान किया और
- 2:53:35यहीं से असहयोग आंदोलन की नींव पड़ी।
- 2:53:37रलेट सत्याग्रह पहला अखिल भारतीय आंदोलन
- 2:53:40था, लेकिन पंजाब में इसका विरोध बहुत
- 2:53:43तीव्र था। हां और सरकार ने इसे बर्बरता से
- 2:53:46कुचलने का फैसला किया। इसी के चलते 13
- 2:53:49अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग का वो
- 2:53:52भयानक हत्याकांड हुआ।
- 2:53:53उस घटना ने तो पूरे देश को हिला कर रख
- 2:53:55दिया था
- 2:53:56और इसने गांधी जी को और भी दृढ़ बना दिया
- 2:53:58कि ब्रिटिश शासन शैतानी है और इसके साथ
- 2:54:01असहयोग मतलब नॉन कोऑपरेशन ही एकमात्र
- 2:54:04रास्ता है।
- 2:54:05किसी भी तरह का सहयोग ना करना।
- 2:54:08इसी बीच एक और बड़ा मुद्दा सामने आया
- 2:54:10खिलाफत आंदोलन। यह आंदोलन तो तुर्की के
- 2:54:12खलीफा के पद को बचाने के लिए था। इसका
- 2:54:15भारत की आजादी से क्या लेना देना था?
- 2:54:17यह गांधी जी की राजनीतिक दूरदर्शिता का
- 2:54:20सबसे बड़ा उदाहरण है कह सकते हैं।
- 2:54:21अच्छा।
- 2:54:22पहले विश्व युद्ध में तुर्की हार गया था।
- 2:54:25और ब्रिटिश तुर्की के सुल्तान जिन्हें
- 2:54:28दुनिया भर के मुसलमान अपना खलीफा मानते
- 2:54:30थे।
- 2:54:31उनके पद को खत्म करने वाले थे।
- 2:54:32हां।
- 2:54:33और इससे भारतीय मुसलमान बहुत नाराज थे।
- 2:54:36गांधी जी ने इसमें हिंदू मुस्लिम एकता का
- 2:54:38एक सुनहरा मौका देखा। मतलब उन्होंने
- 2:54:40असहयोग को खिलाफत के मुद्दे से जोड़ दिया।
- 2:54:43हां और यह एक मास्टर स्ट्रोक था। इसने
- 2:54:46लाखों मुसलमानों को स्वतंत्रता संग्राम
- 2:54:48में शामिल कर लिया और आंदोलन को एक
- 2:54:50जबरदस्त जनाधार दिया।
- 2:54:52और आंदोलन का कार्यक्रम क्या था?
- 2:54:54कार्यक्रम साफ था। छात्र स्कूल कॉलेज छोड़
- 2:54:56दें, वकील अदालतें छोड़ दें, सरकारी
- 2:54:58उपाधियां लौटा दी जाएं
- 2:54:59और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार हो।
- 2:55:01हां। और लोगों ने ऐसा किया भी यह आंदोलन
- 2:55:04जंगल की आग की तरह फैल गया। हम्म।
- 2:55:06पर फरवरी 1922 में संयुक्त प्रांत के
- 2:55:09चौरीचौरा नाम की जगह पर एक हिंसक घटना हो
- 2:55:11गई।
- 2:55:11प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने एक पुलिस थाने
- 2:55:15में आग लगा दी थी।
- 2:55:16हां, जिसमें कई पुलिसकर्मी मारे गए।
- 2:55:18और गांधी जी जो अहिंसा को लेकर इतने सख्त
- 2:55:21थे, उन्होंने इस एक घटना के कारण पूरा
- 2:55:24आंदोलन वापस ले लिया। यह फैसला तो बहुत
- 2:55:28विवादस्पद रहा होगा।
- 2:55:29बहुत ज्यादा। जवाहरलाल नेहरू और सुभाष
- 2:55:31चंद्र बोस जैसे कई बड़े नेता इस फैसले से
- 2:55:33नाराज थे। उन्हें लगा होगा कि जब आंदोलन
- 2:55:36अपने चरम पर था तब उसे वापस लेना एक
- 2:55:39एक बहुत बड़ी गलती थी।
- 2:55:40लेकिन गांधी जी के लिए साधन और साध्य
- 2:55:42दोनों ही पवित्र होने चाहिए थे।
- 2:55:44उनकी नजर में एक हिंसक आंदोलन से मिली
- 2:55:47आजादी सच्ची आजादी नहीं हो सकती थी।
- 2:55:50आंदोलन वापस लेने के बाद मार्च 1922 में
- 2:55:54उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला और उन्हें 6
- 2:55:57साल की सजा हुई।
- 2:55:58उस मुकदमे की एक बात बहुत दिलचस्प है। जज
- 2:56:00ब्रूमफील्ड ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा,
- 2:56:02क्या कहा? उन्होंने कहा, यह तथ्य है कि आप
- 2:56:05लाखों देशवासियों की दृष्टि में एक महान
- 2:56:07देशभक्त और नेता हैं। यहां तक कि राजनीति
- 2:56:10में आपसे अलग मत रखने वाले लोग भी आपको एक
- 2:56:12पवित्र जीवन वाले व्यक्ति के रूप में
- 2:56:14देखते हैं।
- 2:56:15वाह!
- 2:56:15फिर भी उन्होंने कहा कि कानून के तहत
- 2:56:17उन्हें सजा देना उनकी मजबूरी है। और जेल
- 2:56:21से छूटने के बाद गांधी जी ने अपना ध्यान
- 2:56:23रचनात्मक कार्यों पर लगाया। इसी दौरान वह
- 2:56:26एक नेता से महात्मा बनने के सफर पर आगे
- 2:56:28बढ़े।
- 2:56:29और इसमें उनकी वेशभूषा का बहुत बड़ा हाथ
- 2:56:31था। 1921 तक वह सूट बूट छोड़कर सिर्फ एक
- 2:56:35धोती पहनने लगे थे।
- 2:56:36यह सिर्फ कपड़े बदलना नहीं था। यह एक गहरा
- 2:56:39राजनीतिक बयान था।
- 2:56:41यह भारत के सबसे गरीब व्यक्ति के साथ खुद
- 2:56:44को पहचानने का एक तरीका था। यह सादगी और
- 2:56:46त्याग का प्रतीक बन गया।
- 2:56:48और दूसरा प्रतीक था चरखा।
- 2:56:50हां। चरखा तो मानो राष्ट्रवाद का इंजन बन
- 2:56:52गया। वो सिर्फ सूत काटने की मशीन नहीं थी।
- 2:56:55वो आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। बिल्कुल कि
- 2:56:58हम अपने कपड़े खुद बना सकते हैं। हमें
- 2:57:01मैनचेस्टर की मिलों की जरूरत नहीं। यह
- 2:57:03शारीरिक श्रम की गरिमा का प्रतीक था।
- 2:57:05और अंग्रेजों की आर्थिक कमर तोड़ने का एक
- 2:57:08जरिया भी था।
- 2:57:09हां। गांधी जी ने आजादी की लड़ाई को एक
- 2:57:13अमूर्त विचार से निकाल कर लोगों के दैनिक
- 2:57:15जीवन का हिस्सा बना दिया। हर कोई चरखा
- 2:57:18चलाकर इस लड़ाई में शामिल हो सकता था।
- 2:57:20बिल्कुल। और ग्रामीण भारत में तो गांधी जी
- 2:57:23की छवि, किसी चमत्कारी पुरुष, किसी गांधी
- 2:57:26बाबा की बन गई थी। उनके बारे में तरह-तरह
- 2:57:29की अफवाहएं फैलने लगी।
- 2:57:30हां, जैसे कि जो लोग गांधी जी की आलोचना
- 2:57:33करते हैं, उनके घर रहस्यमय तरीके से गिर
- 2:57:36जाते हैं
- 2:57:36या उनकी फसलें खराब हो जाती हैं।
- 2:57:38हां। और जो उनके समर्थक हैं, उन पर दैय
- 2:57:41कृपा होती है। यह अफवाहें दिखाती हैं कि
- 2:57:43आम लोग उन्हें किस नजर से देखते थे। एक
- 2:57:46रक्षक, एक संत। इन सब ने मिलकर गांधी को
- 2:57:49एक जन नेता बना दिया और फिर कई सालों की
- 2:57:52खामोशी के बाद 1928 में साइमन कमीशन के
- 2:57:56विरोध के साथ राजनीति फिर गमा गई।
- 2:57:59और दिसंबर 1929 में कांग्रेस का लाहौर
- 2:58:02अधिवेशन हुआ। जहां जवाहरलाल नेहरू की
- 2:58:05अध्यक्षता में पहली बार पूर्ण स्वराज यानी
- 2:58:08कंप्लीट इंडिपेंडेंस का प्रस्ताव पास हुआ।
- 2:58:11अब लक्ष्य सिर्फ ज्यादा अधिकार पाना नहीं
- 2:58:14बल्कि पूरी आजादी था। बिल्कुल और तय हुआ
- 2:58:18कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में
- 2:58:21स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा।
- 2:58:23इसके बाद गांधी जी ने अपने अगले बड़े
- 2:58:25आंदोलन सविनय अवज्ञा सिविल डिसओबिडियंस की
- 2:58:29घोषणा की।
- 2:58:30हां।
- 2:58:30और इसकी शुरुआत हुई एक बहुत ही साधारण सी
- 2:58:33चीज से नमक।
- 2:58:34हां। और यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि
- 2:58:37आखिर नमक ही क्यों? मुझे लगता है कि यह
- 2:58:40गांधी जी की प्रतिभा का सबसे बड़ा उदाहरण
- 2:58:42है। उन्होंने एक ऐसा मुद्दा उठाया जो देश
- 2:58:46के हर इंसान, अमीर, गरीब, हिंदू मुसलमान
- 2:58:49सबसे जुड़ा था।
- 2:58:50बिल्कुल सही। नमक हर घर की जरूरत थी लेकिन
- 2:58:53सरकार ने इसके बनाने और बेचने पर अपना
- 2:58:55एकाधिकार अपनी मोनोपोली कर रखी थी और उस
- 2:58:58पर टैक्स भी लगाया था।
- 2:58:59यह औपनिवेशिक शासन का सबसे घृणित और लालची
- 2:59:02चेहरा था। गांधी जी ने नमक कानून को जुल्म
- 2:59:04का प्रतीक बनाया। और फिर शुरू हुई वह
- 2:59:07ऐतिहासिक दांडी यात्रा। 12 मार्च 1930 को
- 2:59:11गांधी जी ने साबरमती आश्रम से अपनी यात्रा
- 2:59:14शुरू की।
- 2:59:14यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी। यह एक
- 2:59:17ब्रिलियंटली कोरियोग्राफ्ड पॉलिटिकल थिएटर
- 2:59:20था।
- 2:59:20हां।
- 2:59:21गांधी जी 78 अनुयायियों के साथ निकले थे।
- 2:59:24लेकिन जैसे-जैसे वो आगे बढ़ते गए, हजारों
- 2:59:27लोग जुड़ते गए। पूरी दुनिया की मीडिया की
- 2:59:29नजरें इस पर थी। 24 दिनों में 240 मील
- 2:59:33चलकर 6 अप्रैल को वे दांडी पहुंचे।
- 2:59:36हां।
- 2:59:36और वहां उन्होंने बस एक मुट्ठी नमक उठाकर
- 2:59:39ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दे दी।
- 2:59:41हां। उन्होंने समुंदर के पानी से नमक
- 2:59:43बनाकर कानून तोड़ा। यह एक छोटा सा काम था
- 2:59:47लेकिन इसका सांकेतिक महत्व बहुत बड़ा था।
- 2:59:49और इस एक घटना ने पूरे देश में सविनय
- 2:59:52अवज्ञा की लहर पैदा कर दी।
- 2:59:54हर जगह लोगों ने नमक कानून तोड़े, विदेशी
- 2:59:56सामानों का बहिष्कार किया और टैक्स देना
- 2:59:59बंद कर दिया। सरकार ने फिर दमन का रास्ता
- 3:00:01अपनाया होगा।
- 3:00:02हां, करीब 60 हजार लोगों को गिरफ्तार किया
- 3:00:05गया। लेकिन आंदोलन इतना बड़ा था कि सरकार
- 3:00:08को बातचीत की मेज पर आना ही पड़ा।
- 3:00:10हम
- 3:00:11जनवरी 1931 में गांधी जी को रिहा किया गया
- 3:00:14और वायसराय इरविन के साथ एक समझौता हुआ
- 3:00:16जिसे गांधी-इरविन समझौता कहते हैं।
- 3:00:18इसके तहत आंदोलन वापस लिया गया और गांधी
- 3:00:21जी दूसरे गोल में सम्मेलन राउंड टेबल
- 3:00:25कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए लंदन
- 3:00:27गए। पर वह सम्मेलन नाकाम रहा और फिर कई
- 3:00:30सालों के बाद दूसरे विश्व युद्ध के दौरान
- 3:00:331942 में क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद
- 3:00:36गांधी जी ने अपना अंतिम और सबसे बड़ा
- 3:00:38आंदोलन छेड़ने का फैसला किया।
- 3:00:40भारत छोड़ो आंदोलन क्विट इंडिया मूवमेंट।
- 3:00:43हां, अगस्त 1942 में गांधी जी ने
- 3:00:46अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया और
- 3:00:49भारतीयों से कहा करो या मरो। यह एक सीधी
- 3:00:52और खुली चुनौती थी।
- 3:00:54सरकार ने भी तुरंत जवाबी कार्रवाई की।
- 3:00:56गांधी जी समेत सभी बड़े नेताओं को रात भर
- 3:00:59में गिरफ्तार कर लिया गया।
- 3:01:00सरकार को लगा कि नेताओं को गिरफ्तार करके
- 3:01:02वे आंदोलन को कुचल देंगे।
- 3:01:04लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार आंदोलन
- 3:01:07खुद ब खुद आम लोगों और युवा कार्यकर्ताओं
- 3:01:10ने संभाल लिया। यह एक लीडरलेस रिवोल्ट बन
- 3:01:12गया।
- 3:01:12और यह आंदोलन पिछले आंदोलनों से कहीं
- 3:01:15ज्यादा हिंसक भी था।
- 3:01:16हां, क्योंकि अब लोगों का सब्र जवाब दे
- 3:01:18चुका था। कई जगहों पर हड़तालें हुई,
- 3:01:21सरकारी इमारतों पर हमले हुए। सतारा और
- 3:01:23मेदनीपुर जैसी जगहों पर तो लोगों ने अपनी
- 3:01:26स्वतंत्र सरकारें भी बना ली थी।
- 3:01:28हां, जिन्हें प्रति सरकार कहा जाता था। इस
- 3:01:31आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला कर
- 3:01:33रख दी।
- 3:01:34इसके बाद सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया
- 3:01:36शुरू हुई। लेकिन यह बहुत दर्दनाक साबित
- 3:01:39हुई क्योंकि आजादी के साथ-साथ विभाजन भी
- 3:01:42आया।
- 3:01:42यह गांधी जी के जीवन का सबसे दुखद दौर था।
- 3:01:4515 अगस्त 1947 को जब दिल्ली में आजादी का
- 3:01:48जश्न मनाया जा रहा था।
- 3:01:49गांधी जी वहां नहीं थे।
- 3:01:50वो कोलकाता में थे। जहां वो हिंदुओं और
- 3:01:52मुसलमानों के बीच फैले दंगों की आग बुझाने
- 3:01:54की कोशिश कर रहे थे।
- 3:01:55वो आजादी जिसके लिए उन्होंने पूरी जिंदगी
- 3:01:58लड़ाई की वो उन्हें इस रूप में मिली।
- 3:02:01हां। और आजादी के बाद भी वो शांति स्थापना
- 3:02:03के काम में लगे रहे। लेकिन 30 जनवरी 1948
- 3:02:07को दिल्ली में एक प्रार्थना सभा में उनकी
- 3:02:09हत्या कर दी गई। इस पूरी कहानी को सुनने
- 3:02:11के बाद एक बात दिमाग में आती है। हम गांधी
- 3:02:14को एक संत या महात्मा के रूप में देखते
- 3:02:16हैं। लेकिन इन स्रोतों से यह साफ है कि वह
- 3:02:18एक बहुत ही चतुर और रणनीतिक राजनीतिक नेता
- 3:02:22भी थे।
- 3:02:22बिल्कुल। उनकी धोती, उनका चरखा, उनका नमक
- 3:02:26उठाना यह सब गहरे राजनीतिक प्रतीक थे।
- 3:02:29हम्म।
- 3:02:29वो जानते थे कि एक बड़े साम्राज्य से
- 3:02:32लड़ने के लिए सिर्फ नैतिक बल काफी नहीं
- 3:02:34है। आपको ऐसे प्रतीक चाहिए जो लोगों को
- 3:02:37जोड़ सकें, उन्हें प्रेरित कर सकें। तो
- 3:02:39शायद सोचने वाली बात यह है कि आज के दौर
- 3:02:42में जब राजनीतिक संवाद इतना जटिल और अक्सर
- 3:02:45विभाजनकारी हो गया है। क्या गांधी के
- 3:02:48तरीकों से कुछ सीखा जा सकता है?
- 3:02:50हम
- 3:02:51क्या आज भी नमक जैसे सरल लेकिन शक्तिशाली
- 3:02:54प्रतीक ढूंढे जा सकते हैं जो लोगों को
- 3:02:57बड़े मुद्दों के लिए एकजुट कर सकें। यह एक
- 3:02:59बहुत ही प्रासंगिक सवाल है। गांधी जी
- 3:03:01दिखाते हैं कि सबसे बड़े बदलाव की शुरुआत
- 3:03:04अक्सर सबसे सरल कामों से होती है। बशर्ते
- 3:03:07उसके पीछे एक बड़ा और सच्चा विचार हो।
- 3:03:09महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन पर
- 3:03:11हमारी यह चर्चा समाप्त हुई।
- 3:03:16तो चलिए इस बार हम एक ऐसे विषय की गहराई
- 3:03:19में उतरते हैं जिसके बारे में हम सब ने
- 3:03:21सुना है लेकिन शायद पूरी तरह समझा नहीं
- 3:03:24है। हम बात कर रहे हैं एनसीईआरटी के
- 3:03:27अध्याय 14 विभाजन को समझना राजनीति,
- 3:03:31स्मृति और अनुभव की।
- 3:03:32बिल्कुल और ये तीन शब्द राजनीति, स्मृति
- 3:03:35और अनुभव। यही इस पूरी चर्चा की आप कह
- 3:03:39सकते हैं चाबी है।
- 3:03:40हम सिर्फ ये नहीं देखेंगे कि 1947 में
- 3:03:43क्या हुआ था।
- 3:03:44बल्कि हम यह भी समझेंगे कि उसके पीछे की
- 3:03:47पॉलिटिक्स क्या थी। लोगों की यादों ने उस
- 3:03:49घटना को कैसे जिंदा रखा है और जमीन पर
- 3:03:52मतलब आम इंसानों का अनुभव कैसा था।
- 3:03:55सही कहा। तो मिशन साफ है। इन स्त्रोतों से
- 3:03:58सिर्फ तथ्य नहीं बल्कि उनके पीछे की कहानी
- 3:04:02और उनका असली मतलब निकालना। चलिए शुरू
- 3:04:05करते हैं इस कहानी के सबसे मुश्किल सबसे
- 3:04:08इंसानी पहलू से। जब हम पार्टीशन के बारे
- 3:04:11में सोचते हैं तो अक्सर दिमाग में नेताओं
- 3:04:14और नक्शों पर खींची गई लकीरों की तस्वीर
- 3:04:17आती है।
- 3:04:17जी।
- 3:04:18लेकिन सच तो यह है कि यह एक भयानक मानव
- 3:04:21त्रासदी थी। दिल्ली या लंदन में लिए गए
- 3:04:23फैसलों की कीमत करोड़ों आम लोगों ने चुकाई
- 3:04:26जो रातोंरात अपने ही घरों में शरणार्थी बन
- 3:04:29गए।
- 3:04:30हां। और इन अनुभवों को समझने के लिए
- 3:04:33सरकारी फाइलें और रिपोर्टें काफी नहीं है।
- 3:04:36इसीलिए इतिहासकार मौखिक इतिहास यानी ओरल
- 3:04:40हिस्ट्री का सहारा लेते हैं।
- 3:04:41ओरल हिस्ट्री
- 3:04:42जी। इसका मतलब सिर्फ लोगों का इंटरव्यू
- 3:04:45लेना नहीं है। इसका असली मकसद उन
- 3:04:47खामोशियों को सुनना है जो किताबों में
- 3:04:50दर्ज नहीं है।
- 3:04:51खामोशियां यह तो काफी दिलचस्प है। कैसी
- 3:04:53खामोशियां? वो खामोशियां जो बताती हैं कि
- 3:04:55कैसे सदियों से साथ रह रहे पड़ोसियों ने
- 3:04:58एक दूसरे पर हथियार उठा लिए। सरकारी
- 3:05:01रिपोर्ट आपको बताएगी कि एक गांव में कितने
- 3:05:03लोग मारे गए।
- 3:05:04हां आंकड़े।
- 3:05:05बिल्कुल। लेकिन मौखिक इतिहास आपको वो
- 3:05:08कहानी सुनाएगा कि उस गांव के राम और रहमान
- 3:05:11जो बचपन से साथ खेले थे, उनके बीच ऐसी
- 3:05:13नफरत की दीवार कैसे खड़ी हो गई? यह उस
- 3:05:16सामाजिक और मनोवैज्ञानिक टूट को समझाता
- 3:05:18है।
- 3:05:18सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
- 3:05:20स्रोतों में एक शब्द का इस्तेमाल हुआ है
- 3:05:23जो इसकी भयानकता को दिखाता है। महाध्वंस
- 3:05:26होलोकॉस्ट। क्या इस शब्द का प्रयोग करना
- 3:05:29ठीक है?
- 3:05:30देखिए ये एक बहुत गंभीर सवाल है।
- 3:05:32होलोकॉस्ट शब्द आमतौर पर नाजी जर्मनी
- 3:05:34द्वारा यहूदियों के नरसंहार से जुड़ा है।
- 3:05:37हां।
- 3:05:37लेकिन कुछ विद्वान पार्टीशन की हिंसा के
- 3:05:39लिए इसका इस्तेमाल इसलिए करते हैं ताकि वह
- 3:05:41उसकी विशालता और क्रूरता को बयान कर सकें।
- 3:05:44अनुमान के मुताबिक 2 से 5 लाख लोग मारे गए
- 3:05:46और लगभग डेढ़ करोड़ लोग बेघर हुए।
- 3:05:49डेढ़ करोड़।
- 3:05:50जी। यह आजाद दुनिया के इतिहास का सबसे
- 3:05:53बड़ा विस्थापन था। सरहदें इतनी अचानक और
- 3:05:55बेदर्दी से खींची गई कि एक लेखक ने इसे
- 3:05:58शैडो लाइंस कहा है। ऐसी लकीरें जो दिखती
- 3:06:00नहीं थी, पर जिन्होंने जिंदगियां चीर कर
- 3:06:02रख दी।
- 3:06:03और इस नफरत की आग को भड़काने में रूढ़
- 3:06:06छवियों, स्टीरियोटाइप्स का बहुत बड़ा हाथ
- 3:06:08था। लेकिन यह स्टीरियोटाइप्स अचानक तो
- 3:06:11पैदा नहीं हुए होंगे। इनके पीछे कोई
- 3:06:13राजनैतिक या सामाजिक वजह भी काम कर रही
- 3:06:15थी?
- 3:06:16बिल्कुल। ये स्टीरियोटाइप्स हवा में नहीं
- 3:06:18बने। दशकों से कुछ संगठन इनको बढ़ावा दे
- 3:06:21रहे थे। एक तरफ यह धारणा बनाई जा रही थी
- 3:06:24कि मुसलमान क्रूर, कट्टर और गंदे होते
- 3:06:27हैं।
- 3:06:27अच्छा। और दूसरी तरफ यह प्रचार था कि
- 3:06:29हिंदू कायर, कंजूस और कमजोर हैं।
- 3:06:32जब राजनीति में धर्म घुल जाता है तो ऐसी
- 3:06:36गलत धारणाएं नफरत का हथियार बन जाती हैं।
- 3:06:39और 1947 में इसी हथियार का इस्तेमाल हुआ।
- 3:06:42तो चलिए इसी राजनीतिक पहलू को ही कुरेदते
- 3:06:45हैं। यह देश को दो टुकड़ों में बांटने का
- 3:06:47विचार आखिर शुरू कहां से हुआ? यह इतना
- 3:06:50बड़ा कदम लगता है।
- 3:06:51इसकी जड़े काफी गहरी हैं। सबसे पहले आता
- 3:06:54है द्वराष्ट्र सिद्धांत। टू नेशन थ्योरी
- 3:06:58यह विचार कि हिंदू और मुसलमान दो अलग कौमे
- 3:07:02हैं जिनका साथ रहना नामुमकिन है।
- 3:07:06लेकिन इस विचार को जमीन मिली 1909 में जब
- 3:07:10अंग्रेजों ने पृथक निर्वाचिका सेपरेट
- 3:07:13इलेक्टोरेट्स की व्यवस्था शुरू की।
- 3:07:151 मिनट इसको थोड़ा साफ करते हैं। पृथक
- 3:07:18निर्वाचिका का मतलब सिर्फ मुस्लिम
- 3:07:20उम्मीदवारों के लिए सीटें रिजर्व करना
- 3:07:21नहीं था। इससे कहीं ज्यादा कुछ था। है ना?
- 3:07:24बहुत ज्यादा। इसका मतलब था कि मुस्लिम
- 3:07:26सीटों पर खड़े उम्मीदवार को वोट भी सिर्फ
- 3:07:29मुस्लिम लोग ही दे सकते थे।
- 3:07:31अच्छा।
- 3:07:32इस एक कानून ने भारतीय समाज में राजनीतिक
- 3:07:35तौर पर एक दीवार खड़ी कर दी। अब नेताओं को
- 3:07:38सबके वोट नहीं चाहिए थे। एक मुस्लिम नेता
- 3:07:40को सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक को खुश करना था
- 3:07:42और एक हिंदू नेता को हिंदू वोट बैंक को।
- 3:07:45इसने धर्म को राजनीति का केंद्र बना दिया।
- 3:07:48और इसी माहौल में फिर यह संगठन भी बने
- 3:07:51होंगे।
- 3:07:51बिल्कुल। इसी माहौल में मुस्लिम लीग जो
- 3:07:541906 में बनी और हिंदू महासभा जो 1915 में
- 3:07:57बनी जैसे संगठनों को पनपने का मौका मिला।
- 3:08:00इसके बावजूद स्रोतों में एक बहुत हैरान
- 3:08:03करने वाली बात है। 1937 के प्रांतीय चुनाव
- 3:08:07में मुस्लिम लीग का प्रदर्शन बेहद खराब
- 3:08:09रहा था। तो सिर्फ 10 साल के अंदर वह
- 3:08:12पाकिस्तान बनाने की स्थिति में कैसे पहुंच
- 3:08:14गए?
- 3:08:14यह एक टर्निंग पॉइंट था। 1937 के चुनाव
- 3:08:17में मुस्लिम लीग को कुल मुस्लिम वोट का
- 3:08:20सिर्फ 4.4% मिला।
- 3:08:21सिर्फ 4.4%?
- 3:08:23जी। उनके इस दावे की हवा निकल गई कि वो ही
- 3:08:26मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि हैं।
- 3:08:28कांग्रेस ने 11 में से सात प्रांतों में
- 3:08:30सरकार बनाई। इस हार ने मुस्लिम लीग के
- 3:08:32नेतृत्व को यह एहसास दिलाया कि एक आजाद
- 3:08:35संयुक्त भारत में वो कभी सत्ता में नहीं आ
- 3:08:37पाएंगे।
- 3:08:38अच्छा, तो ये उनके लिए एक अस्तित्व का
- 3:08:40संकट बन गया।
- 3:08:42मतलब हार के डर ने उन्हें और कट्टर बना
- 3:08:45दिया।
- 3:08:46बिल्कुल। यहां से उनकी रणनीति पूरी तरह से
- 3:08:48बदल गई। अब उनका फोकस कांग्रेस के साथ
- 3:08:50सत्ता साझा करने पर नहीं बल्कि एक अलग देश
- 3:08:53की मांग को मजबूत करने पर हो गया।
- 3:08:55और फिर पाकिस्तान का प्रस्ताव आया।
- 3:08:57जी। इसी सोच का नतीजा था 1940 का मशहूर
- 3:09:00लाहौर प्रस्ताव, लाहौर रेज़ोल्यूशन। इससे
- 3:09:02पहले 1933 के दौरान कैंब्रिज के एक
- 3:09:05स्टूडेंट चौधरी रहमत अली ने पाकिस्तान नाम
- 3:09:07का एक पैंट जारी किया था।
- 3:09:09हां, मैंने पढ़ा है इसके बारे में। पर तब
- 3:09:11उसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया था।
- 3:09:13लेकिन 1940 तक हालात बदल चुके थे। लीग ने
- 3:09:17अपने लाहौर अधिवेशन में भारत के उत्तर
- 3:09:20पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों को मिलाकर
- 3:09:22स्वतंत्र राज्य यानी इंडिपेंडेंट स्टेट्स
- 3:09:25बनाने की मांग कर दी।
- 3:09:27तो मांग मेज पर रख दी गई थी। क्या इसके
- 3:09:30बाद संयुक्त भारत को बचाने की कोई आखिरी
- 3:09:32गंभीर कोशिश हुई?
- 3:09:33हां। आखिरी कोशिश 1946 में कैबिनेट मिशन
- 3:09:37कैबिनेट मिशन के रूप में हुई। ब्रिटेन से
- 3:09:40तीन कैबिनेट मंत्री आए। उन्होंने
- 3:09:41पाकिस्तान की मांग को साफ खारिज कर दिया।
- 3:09:44तो उन्होंने क्या प्रस्ताव रखा?
- 3:09:45उन्होंने एक ऐसे संयुक्त भारत का फार्मूला
- 3:09:48दिया जिसमें केंद्र कमजोर होता और
- 3:09:50प्रांतों को बहुत ज्यादा अधिकार मिलते।
- 3:09:52प्रांतों को तीन ग्रुप में बांटा जाना था।
- 3:09:54शुरुआत में तो कांग्रेस और लीग दोनों इस
- 3:09:56पर सहमत हो गए थे। फिर बात कहां बिगड़ी?
- 3:09:59सिर्फ यह कहना कि इंटरप्रिटेशन पर मतभेद
- 3:10:02था काफी नहीं लगता। असल मतभेद इसी बात पर
- 3:10:05था कि प्रांतों के ग्रुप बनाना अनिवार्य
- 3:10:07होगा या वैकल्पिक मतलब कंपलसरी होगा या
- 3:10:10ऑप्शनल।
- 3:10:11अच्छा।
- 3:10:11मुस्लिम लीग का मानना था कि प्रांतों को
- 3:10:13ग्रुप में शामिल होना ही पड़ेगा। वो इसमें
- 3:10:16भविष्य के पाकिस्तान की नींव देख रहे थे।
- 3:10:19दो मुस्लिम बहुल ग्रुप बन जाते।
- 3:10:21और कांग्रेस
- 3:10:22वहीं कांग्रेस को डर था कि इससे केंद्र
- 3:10:24बेहद कमजोर हो जाएगा और देश टूट जाएगा। वो
- 3:10:27चाहते थे कि प्रांतों के पास ग्रुप में
- 3:10:30शामिल नल होने का विकल्प हो। इसी एक
- 3:10:32व्याख्या पर पूरा प्लान आकर अटक गया।
- 3:10:34तो संयुक्त भारत का आखिरी मौका एक शब्द की
- 3:10:37व्याख्या पर कुर्बान हो गया और इसके बाद
- 3:10:39जो हुआ वो शायद सबसे बड़ा टिपिंग पॉइंट
- 3:10:42था।
- 3:10:42हां। जब कैबिनेट मिशन फेल हो गया तो
- 3:10:45मुस्लिम लीग ने अपनी मांग मनवाने के लिए
- 3:10:47सड़कों पर उतरने का फैसला किया। उन्होंने
- 3:10:4916 अगस्त 1946 को प्रत्यक्ष कारवाई दिवस
- 3:10:53डायरेक्ट एक्शन डे का ऐलान किया।
- 3:10:54और इसका नतीजा
- 3:10:55उस दिन कोलकाता जिसे अब कोलकाता कहते हैं
- 3:10:57में भयानक दंगे शुरू हो गए। जो कई दिनों
- 3:11:00तक चले हजारों लोग मारे गए। कोलकाता की आग
- 3:11:03देखते ही देखते पूरे देश में बिहार,
- 3:11:06यूनाइटेड प्रोविंसेस और पंजाब तक फैल गई।
- 3:11:09जब कोलकाता की सड़कों पर हिंसा का तांडव
- 3:11:12हो रहा था और प्रशासन लगभग नाकाम हो चुका
- 3:11:15था तब एक 77 साल का आदमी शांति की अपील
- 3:11:20लेकर उन दंगाग्रस्त इलाकों में पैदल चल
- 3:11:23रहा था। महात्मा गांधी
- 3:11:24सही कहा। उन्हें उस दौर के वायसरॉय ने वन
- 3:11:28मैन आर्मी कहा था।
- 3:11:29अच्छा।
- 3:11:29जब बड़े-बड़े नेता दिल्ली में सत्ता के
- 3:11:31बंटवारे पर बहस कर रहे थे। गांधी बंगाल के
- 3:11:34नवाखली के गांव में घूम रहे थे। लोगों के
- 3:11:37आंसू पोंछ रहे थे।
- 3:11:38हम
- 3:11:39उन्होंने बिहार का दौरा किया। और दिल्ली
- 3:11:41में शांति के लिए अनशन रखा। उनकी मौजूदगी
- 3:11:45ने जहां भी वह गए, हिंसा की आग को कम करने
- 3:11:48में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।
- 3:11:50हमने राजनीति और बड़े पैमाने पर हुई हिंसा
- 3:11:52की बात की। लेकिन स्रोत इस कहानी के एक और
- 3:11:56बेहद दर्दनाक पहलू पर रोशनी डालते हैं।
- 3:11:58औरतों के अनुभव।
- 3:12:00यह विभाजन का सबसे अंधेरा सच है। उस समय
- 3:12:03औरत के शरीर को समुदाय की इज्जत का प्रतीक
- 3:12:06माना जाता था।
- 3:12:06अच्छा।
- 3:12:07इसलिए एक समुदाय को नीचा दिखाने के लिए
- 3:12:10उसकी औरतों को निशाना बनाया जाता था।
- 3:12:13उनका अपहरण किया गया। उनके साथ बलात्कार
- 3:12:16हुआ। उन्हें जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करने
- 3:12:19पर मजबूर किया गया। और स्रोतों में
- 3:12:21बरामदगी अभियान का जिक्र है। यह सुनने में
- 3:12:24तो एक अच्छा कदम लगता है। लेकिन क्या सच
- 3:12:27में ऐसा था?
- 3:12:28यह बरामदगी भी अपने आप में एक और त्रासदी
- 3:12:31थी।
- 3:12:31हां।
- 3:12:31भारत और पाकिस्तान दोनों सरकारों ने मिलकर
- 3:12:34एक समझौता किया कि अपहरित औरतों को ढूंढकर
- 3:12:37उनके मूल परिवारों को लौटाया जाएगा।
- 3:12:39हम तो इसमें दिक्कत क्या थी?
- 3:12:41कागज पर यह ठीक लगता है।
- 3:12:43हम
- 3:12:43लेकिन सोचिए जिस औरत को अगवा किया गया
- 3:12:46उसने शायद एक नई जिंदगी शुरू कर ली हो।
- 3:12:49हम्म।
- 3:12:49उसके बच्चे हो गए हो। अब उसे जबरदस्ती
- 3:12:52बचाकर उसके पुराने परिवार के पास लाया
- 3:12:54गया। जहां कई बार उसके अपने ही परिवार ने
- 3:12:57उसे अपित्र मानकर स्वीकार करने से इंकार
- 3:13:00कर दिया।
- 3:13:00ओह!
- 3:13:01वो ना इधर की रही ना उधर की। यह उनके लिए
- 3:13:04एक दूसरा विस्थापन था। एक दूसरा आघात
- 3:13:07दूसरा ट्रोमा था।
- 3:13:08यह सुनना ही कितना भयावह है। यह हमें यह
- 3:13:11भी सोचने पर मजबूर करता है कि क्या विभाजन
- 3:13:14का अनुभव हर जगह एक जैसा था। स्रोतों में
- 3:13:18क्षेत्रीय विभिन्नताओं रीजनल वेरिएशंस का
- 3:13:20जिक्र है।
- 3:13:21यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। हम पार्टीशन
- 3:13:24को एक घटना की तरह देखते हैं। लेकिन पंजाब
- 3:13:26का अनुभव बंगाल से बहुत अलग था।
- 3:13:29कैसे?
- 3:13:29पंजाब में हिंसा बहुत ज्यादा तेज और क्रूर
- 3:13:33थी। वहां आबादी का लगभग पूरी तरह से
- 3:13:35स्थानांतरण हुआ। मतलब पश्चिमी पंजाब से
- 3:13:38लगभग सारे हिंदू और सिख पूर्वी पंजाब आ गए
- 3:13:42और यहां से लगभग सारे मुसलमान उधर चले गए।
- 3:13:45और बंगाल में
- 3:13:46बंगाल में भी हिंसा हुई लेकिन वहां लोगों
- 3:13:48का पलायन यानी माइग्रेशन इतना अचानक और
- 3:13:52पूरा नहीं था। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे कई
- 3:13:55सालों तक चलती रही।
- 3:13:56अच्छा।
- 3:13:57इसीलिए 1947 के बाद भी पश्चिम बंगाल में
- 3:14:00एक बड़ी मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी बनी
- 3:14:03रही। और पूर्वी पाकिस्तान जो अब
- 3:14:05बांग्लादेश है में एक बड़ी हिंदू
- 3:14:07अल्पसंख्यक आबादी। दोनों जगहों की राजनीति
- 3:14:11समाज और यादें इस वजह से अलग-अलग हैं।
- 3:14:13तो हमने देखा कि विभाजन कोई एक घटना नहीं
- 3:14:16थी। यह एक ऐसी आंधी थी जो दशकों की
- 3:14:19राजनीति से उठी जिसमें सामाजिक नफरत ने
- 3:14:22हवा भरी और आखिर में इसने करोड़ों
- 3:14:25जिंदगियों को उजाड़ दिया। यह एक कहानी है
- 3:14:28फैसलों और उनके अंजामों की।
- 3:14:30बिल्कुल। राजनीति ने सीमाएं खींची। लेकिन
- 3:14:34इसका असली दर्द लोगों की यादों और उनके
- 3:14:36अनुभवों में जिंदा है। यह समझना हमें
- 3:14:39सिखाता है कि इतिहास सिर्फ तारीखों का खेल
- 3:14:41नहीं बल्कि इंसानी जज्बातों और कहानियों
- 3:14:44का समंदर है।
- 3:14:45आज इस विषय की गहराई में उतर कर एक बात
- 3:14:48साफ होती है। जब हम इतिहास को सिर्फ
- 3:14:50राजनीतिक घटनाओं की एक श्रृंखला के रूप
- 3:14:53में पढ़ते हैं, तो हम आघात और हिम्मत की
- 3:14:55कितनी ही निजी कहानियों को नजरअंदाज कर
- 3:14:58देते हैं। और यह सोचना जरूरी है कि एक
- 3:15:00इतने गहरे ना भरे घाव पर बने देशों का
- 3:15:03वर्तमान और भविष्य कैसा होता है?
- 3:15:05अध्याय 14 विभाजन को समझना समाप्त हुआ।
- 3:15:11आज हम भारतीय इतिहास के उस पन्ने को पलट
- 3:15:13रहे हैं जहां जहां एक नए मुल्क की तकदीर
- 3:15:16लिखी जा रही थी।
- 3:15:17हम
- 3:15:18हमारे आज के विश्लेषण का विषय है संविधान
- 3:15:21का निर्माण एक नए युग की शुरुआत।
- 3:15:24बिल्कुल। और हमारे पास जो स्रोत हैं, वह
- 3:15:26एनसीआरटी की गहन सामग्री पर आधारित हैं।
- 3:15:29हमारा मकसद है इस पूरी प्रक्रिया के पीछे
- 3:15:31की बहसों और चुनौतियों को गहराई से समझना।
- 3:15:34जी। जब हम 26 जनवरी 1950 को लागू हुए अपने
- 3:15:39संविधान के बारे में सोचते हैं तो हमें
- 3:15:41अक्सर बस एक दस्तावेज नजर आता है।
- 3:15:44हां, एक किताब।
- 3:15:45लेकिन यह सिर्फ एक किताब नहीं है। इसे
- 3:15:48बनाने में आप देखिए दिसंबर 1946
- 3:15:52से नवंबर 1949
- 3:15:55मतलब लगभग 3 साल लगे।
- 3:15:573 साल?
- 3:15:58हां। और संविधान सभा की 165 दिनों तक बैठ
- 3:16:02के चली। यह आंकड़े ही उस दौर की गंभीरता
- 3:16:07को दिखाते हैं। जब भारत एक तरफ आजाद हो
- 3:16:10रहा था, तो दूसरी तरफ बंटवारे का जख्म भी
- 3:16:13झेल रहा था। और यही बात इस कहानी को इतना
- 3:16:15नाटकीय बना देती है। मतलब एक तरफ उम्मीद
- 3:16:18और दूसरी तरफ तबाही। चलिए सबसे पहले उसी
- 3:16:21माहौल में चलते हैं जिसमें इस महान
- 3:16:24दस्तावेज ने आकार लिया। तो 15 अगस्त 1947
- 3:16:28को भारत आजाद हुआ।
- 3:16:29जी।
- 3:16:30लेकिन यह आजादी अपने साथ बंटवारे की एक
- 3:16:32भयानक हिंसा लेकर आई। और इससे पहले का दौर
- 3:16:35भी कुछ शांत तो था नहीं।
- 3:16:37बिल्कुल नहीं। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन
- 3:16:40फिर 1946 में शाही भारतीय नौसेना का
- 3:16:43विद्रोह और जगह-जगह होते हिंदू-मुस् दंगे
- 3:16:46माहौल में एक अजीब सा तनाव था
- 3:16:48और बंटवारे ने तो उस आग में घी का काम
- 3:16:51किया। लाखों लोग बेघर हुए, मारे गए।
- 3:16:54इंसानियत पर से भरोसा उठने लगा था।
- 3:16:56हम
- 3:16:57इसी माहौल के बीच दिल्ली में संविधान सभा
- 3:17:00के सदस्य एक नए भारत का भविष्य लिखने के
- 3:17:03लिए इकट्ठे हुए थे।
- 3:17:04सोचकर भी अजीब लगता है।
- 3:17:06बिल्कुल। 14 अगस्त 1947 की आधी रात को जब
- 3:17:09जवाहरलाल नेहरू ने अपना वो मशहूर भाषण
- 3:17:12ट्विस्ट विद डेस्टिनी
- 3:17:13नियति से साक्षात्कार हां नियति से
- 3:17:16साक्षात्कार दिया तो वह सिर्फ आजादी का
- 3:17:18ऐलान नहीं कर रहे थे। वो उस अंधेरे में
- 3:17:21उम्मीद की एक किरण जगा रहे थे। तो एक तरफ
- 3:17:24इतनी हिंसा और नफरत का माहौल और दूसरी तरफ
- 3:17:27एक एकजुट लोकतांत्रिक देश बनाने की
- 3:17:30जिम्मेदारी यह तो लगभग नामुमकिन सा लगता
- 3:17:32है।
- 3:17:32लगता है।
- 3:17:33और सिर्फ बंटवारा ही नहीं एक और बड़ी
- 3:17:35चुनौती थी रियासतों की।
- 3:17:37हां, यह एक बहुत बड़ा खतरा था। अंग्रेजों
- 3:17:40ने लगभग 565 रियासतों को आजाद छोड़ दिया
- 3:17:43था।
- 3:17:44मतलब उन्हें विकल्प दे दिया।
- 3:17:45जी कि वे चाहे तो भारत में मिले,
- 3:17:47पाकिस्तान में या फिर आजाद रहें। यह तो
- 3:17:50भारत के सैकड़ों टुकड़े हो जाने जैसा था।
- 3:17:52तो इसे संभाला किसने?
- 3:17:54यहां पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने पर्दे के
- 3:17:56पीछे एक मास्टर रणनीतिकार की भूमिका
- 3:17:59निभाई। उन्होंने बड़ी सूझबूझ और कहीं-कहीं
- 3:18:03सख्ती से इन सभी रियासतों को भारत में
- 3:18:05शामिल किया।
- 3:18:06अच्छा।
- 3:18:06तो आप समझ सकते हैं कि संविधान सभा के
- 3:18:09सामने चुनौती सिर्फ कानून बनाने की नहीं
- 3:18:12थी बल्कि एक बिखरते हुए देश को एक सूत्र
- 3:18:14में पिरोने की थी। तो ऐसे टूटे हुए माहौल
- 3:18:18में जो लोग एक साथ आए यानी हमारी संविधान
- 3:18:21सभा वो खुद कितने एकजुट थे इन सदस्यों को
- 3:18:24चुना कैसे गया था?
- 3:18:25यह एक दिलचस्प सवाल है। देखिए इन सदस्यों
- 3:18:29को सीधे जनता ने नहीं चुना था।
- 3:18:31अच्छा।
- 3:18:311945-46
- 3:18:33में प्रांतीय चुनाव हुए थे और उन्हीं के
- 3:18:36चुने हुए सदस्यों ने फिर संविधान सभा के
- 3:18:38सदस्यों को चुना। तो यह एक तरह से
- 3:18:41अप्रत्यक्ष चुनाव था। और मैंने पढ़ा है कि
- 3:18:44इस सभा में कांग्रेस पार्टी का दबदबा था।
- 3:18:46लगभग 82% सदस्य।
- 3:18:48हां, यह सच है।
- 3:18:50तो क्या इसका मतलब यह था कि संविधान पर
- 3:18:52सिर्फ एक ही पार्टी की छाप पड़ने वाली थी?
- 3:18:54ऊपर से देखने पर ऐसा लग सकता है। लेकिन
- 3:18:57असल में कांग्रेस उस समय एक पार्टी से
- 3:19:00ज्यादा एक आंदोलन थी।
- 3:19:01एक आंदोलन?
- 3:19:02आप यूं समझिए कि वो एक छाते की तरह थी।
- 3:19:05जिसके नीचे हर विचारधारा के लोग थे। उसमें
- 3:19:09समाजवादी भी थे तो जमींदारों के हिमायती
- 3:19:11भी। सेकुलर सोच वाले भी थे तो परंपरावादी
- 3:19:14भी।
- 3:19:15तो बहसें पार्टी के अंदर ही होती थी।
- 3:19:17बिल्कुल। इसलिए जब सभा में बहस होती थी तो
- 3:19:20वह सिर्फ कांग्रेस बनाम अन्य नहीं होती थी
- 3:19:23बल्कि कांग्रेस के भीतर की अलग-अलग आवाजों
- 3:19:26के बीच होती थी। हां, यह बात सही है कि
- 3:19:29शुरुआत में मुस्लिम लीग ने इसका बहिष्कार
- 3:19:31किया जिससे एक दल का प्रभुत्व और ज्यादा
- 3:19:34दिखा।
- 3:19:35और इन सभी आवाजों के बीच कुछ चेहरे ऐसे थे
- 3:19:37जो पूरी बहस को दिशा दे रहे थे। जैसे
- 3:19:40नेहरू, पटेल और राजेंद्र प्रसाद इनका क्या
- 3:19:43रोल था?
- 3:19:44देखिए इन तीनों की तड़ी अद्भुत थी।
- 3:19:46जवाहरलाल नेहरू एक आदर्शवादी थे। वह विज़न
- 3:19:49देते थे। उन्होंने ही उद्देश्य प्रस्ताव
- 3:19:52पेश किया जो एक तरह से संविधान की आत्मा
- 3:19:55बना।
- 3:19:55तो वो विज़न तय करते थे।
- 3:19:57जी। दूसरी तरफ वल्लभ भाई पटेल जमीन से
- 3:20:00जुड़े एक यथार्थवादी थे। जहां नेहरू
- 3:20:03आदर्शों की बात करते वहीं पटेल उसे हकीकत
- 3:20:06में कैसे बदला जाए इस पर काम करते। वो एक
- 3:20:09प्रैक्टिकल इंजीनियर की तरह थे
- 3:20:11और डॉ. राजेंद्र प्रसाद
- 3:20:13वो एक कुशल संचालक थे। संविधान सभा के
- 3:20:16अध्यक्ष के तौर पर उनका काम था इस विशाल
- 3:20:19समूह को एक साथ लेकर चलना। वो सुनिश्चित
- 3:20:22करते थे कि बह से भटके नहीं और हर किसी को
- 3:20:25अपनी बात रखने का मौका मिले।
- 3:20:27हम एक कप्तान की तरह
- 3:20:29बिल्कुल।
- 3:20:30और इस तगड़ी के अलावा एक नाम जो शायद सबसे
- 3:20:33ज्यादा महत्वपूर्ण है वो है डॉक्टर बी आर
- 3:20:35अंबेडकर का।
- 3:20:36बिल्कुल। अगर नेहरू, पटेल और प्रसाद
- 3:20:39संविधान के दिल, दिमाग और संयम थे तो डॉ.
- 3:20:42अंबेडकर उसकी कलम और तर्क थे। वो प्रारूप
- 3:20:46समिति यानी ड्राफ्टिंग कमिटी के अध्यक्ष
- 3:20:48थे।
- 3:20:49राइट।
- 3:20:49संविधान का पूरा ढांचा तैयार करने, दुनिया
- 3:20:52भर के संविधानों से सही चीजें चुनने और
- 3:20:55फिर सभा के हर सवाल का तर्कपूर्ण जवाब
- 3:20:58देने का जिम्मा उन्हीं पर था। उनका योगदान
- 3:21:01असाधारण है।
- 3:21:02तो चलिए इस उद्देश्य प्रस्ताव पर आते हैं।
- 3:21:05यह सुनने में तो एक फॉर्मल डॉक्यूमेंट
- 3:21:07लगता है। लेकिन क्या हम कह सकते हैं कि यह
- 3:21:09संविधान की आत्मा की पहली झलक थी?
- 3:21:11बिल्कुल। इसे आप संविधान का मिशन
- 3:21:14स्टेटमेंट समझ सकते हैं। 13 दिसंबर 1946
- 3:21:17को नेहरू ने इसके जरिए सिर्फ यह नहीं
- 3:21:20बताया कि हम क्या कानून बनाएंगे। हम
- 3:21:23बल्कि यह बताया कि हम एक देश के तौर पर
- 3:21:26क्या बनना चाहते हैं। उन्होंने भारत को एक
- 3:21:29स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य यानी
- 3:21:32इंडिपेंडेंट सोवरन रिपब्लिक घोषित किया।
- 3:21:35संप्रभु यानी सोवरन। ये सुनने में बड़ा
- 3:21:37भारी शब्द लगता है। आम भाषा में इसका मतलब
- 3:21:40क्या हुआ?
- 3:21:40देखिए इसका सीधा सा मतलब है कि अब भारत
- 3:21:43अपने फैसले खुद लेगा। अपने आंतरिक और
- 3:21:46बाहरी मामलों में वो किसी भी बाहरी ताकत
- 3:21:48के अधीन नहीं होगा। और हां यह शब्द
- 3:21:51संप्रभु या सोवरन एग्जाम्स के लिए भी बहुत
- 3:21:54जरूरी है।
- 3:21:54मतलब अब लंदन से कोई आदेश नहीं आएगा।
- 3:21:57बिल्कुल इस प्रस्ताव में आगे नागरिकों को
- 3:22:00न्याय, बराबरी और आजादी का भरोसा दिया
- 3:22:02गया। और सबसे जरूरी बात अल्पसंख्यकों,
- 3:22:06पिछड़े और आदिवासी इलाकों के लोगों के लिए
- 3:22:09विशेष सुरक्षा, एडिक्वेट सेफ गार्ड्स का
- 3:22:11वादा किया गया।
- 3:22:12अपने भाषण में नेहरू ने एक बड़ी दिलचस्प
- 3:22:14बात कही थी। उन्होंने कहा कि हम सिर्फ
- 3:22:17दूसरों की नकल नहीं कर रहे हैं।
- 3:22:19हां।
- 3:22:19मतलब कॉट कॉपी पेस्ट नहीं बल्कि
- 3:22:22इंस्पिरेशन एंड कस्टमाइजेशन का फार्मूला
- 3:22:24अपना रहे हैं।
- 3:22:25एकदम सही।
- 3:22:26उनका कहना था कि हम अमेरिकी और फ्रांसीसी
- 3:22:28क्रांति से सीखेंगे जरूर लेकिन अपने
- 3:22:30संविधान को भारतीय मिट्टी और यहां के
- 3:22:33लोगों के स्वभाव के हिसाब से ढालेंगे। वो
- 3:22:36लोकतंत्र के पश्चिमी मॉडल को हूबहू भारत
- 3:22:38पर थोपना नहीं चाहते थे। तो जब इस विज़न को
- 3:22:41जमीन पर उतारने की बात आई यानी नागरिकों
- 3:22:44के अधिकारों को तय करने की तो यकीनन सबसे
- 3:22:47ज्यादा बहस हुई होगी।
- 3:22:48हां बिल्कुल और इसमें सबसे बड़ा कांटा था
- 3:22:51पृथक निर्वाचिका यानी सेपरेट इलेक्टोरेट्स
- 3:22:54का मुद्दा।
- 3:22:55हां, यह मुद्दा बहसों के केंद्र में था।
- 3:22:58पृथक निर्वाचिका। यह शब्द एग्जाम्स के
- 3:23:01लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है।
- 3:23:02इसका मतलब था कि एक मुस्लिम उम्मीदवार के
- 3:23:05लिए सिर्फ मुस्लिम वोटर ही वोट डाल सकते
- 3:23:07थे। अरे यह तो एक ही देश के अंदर राजनीतिक
- 3:23:10रूप से अलग-अलग द्वीप बनाने जैसा हुआ।
- 3:23:12बिल्कुल इसीलिए ज्यादातर राष्ट्रवादी नेता
- 3:23:15इसके खिलाफ थे। गोविंद वल्लभ पंत ने इसे
- 3:23:19राष्ट्र के लिए एक जहर बताया।
- 3:23:21जहर
- 3:23:22जी सरदार पटेल ने तो साफ-साफ कहा अंग्रेज
- 3:23:25तो चले गए मगर जातेजाते शरारत का बीज बो
- 3:23:29गए हैं। उनका तर्क था कि यह व्यवस्था
- 3:23:32अल्पसंख्यकों को हमेशा के लिए अलग-थलग कर
- 3:23:35देगी। तो क्या सभा में सभी लोग इसके खिलाफ
- 3:23:37थे या कुछ समर्थन में भी थे?
- 3:23:39नहीं। कुछ मुस्लिम सदस्य इसके पक्ष में
- 3:23:42थे। लेकिन बंटवारे की हकीकत देखने के बाद
- 3:23:45ज्यादातर लोगों को समझ आ गया था कि यह
- 3:23:48रास्ता देश को और तोड़ेगा।
- 3:23:50हम
- 3:23:50इसलिए सभा ने इस मांग को खारिज कर दिया।
- 3:23:53लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उन्होंने
- 3:23:55अल्पसंख्यकों या दबे कुचले वर्गों की
- 3:23:58चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया।
- 3:24:00तो फिर समाधान क्या निकला?
- 3:24:01समाधान था सकारात्मक कार्यवाही का। सभा ने
- 3:24:05दमित जातियों यानी डिप्रेस्ड कास्ट के लिए
- 3:24:08विधायिका और सरकारी नौकरियों में आरक्षण
- 3:24:10का प्रावधान किया जिसे रिजर्वेशन कहते
- 3:24:13हैं।
- 3:24:13एक ऐतिहासिक कदम
- 3:24:15बिल्कुल इसके साथ ही छुआछूत अनटचेबिलिटी
- 3:24:18को कानूनी तौर पर खत्म किया गया और
- 3:24:21मंदिरों के दरवाजे सभी जातियों के लिए खोल
- 3:24:24दिए गए। मतलब सभा ने अलगाव पैदा करने वाले
- 3:24:27रास्ते को ठुकराकर सबको साथ लेकर चलने
- 3:24:30वाले रास्ते को चुना।
- 3:24:32और यह व्यक्तिगत अधिकार तभी सुरक्षित रह
- 3:24:34सकते हैं जब सरकार की बनावट सही हो।
- 3:24:36जी।
- 3:24:37इसी से जुड़ा हुआ बड़ा सवाल भी था कि आखिर
- 3:24:39भारत में शक्ति का केंद्र कहां होगा
- 3:24:41दिल्ली में या राज्यों की राजधानियों में?
- 3:24:43यह उस समय का सबसे बड़ा संरचनात्मक सवाल
- 3:24:46था। इस गु्थी को सुलझाने के लिए संविधान
- 3:24:49में तीन सूचियां बनाई गई।
- 3:24:51हां, संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती
- 3:24:53सूची। यह तीनों सूचियां यूनियन लिस्ट,
- 3:24:56स्टेट लिस्ट और ककरेंट लिस्ट एग्जाम्स के
- 3:24:58लिए बहुत जरूरी है।
- 3:24:59बिल्कुल। संघ सूची में रक्षा, मुद्रा जैसे
- 3:25:02विषय रखे गए जिन पर सिर्फ केंद्र कानून
- 3:25:05बना सकता था। राज्य सूची में पुलिस, कृषि
- 3:25:08जैसे स्थानीय विषय थे। और एक तीसरी थी
- 3:25:11समवर्ती सूची, जिसमें शिक्षा, वन जैसे
- 3:25:14विषय थे, जिन पर दोनों कानून बना सकते थे।
- 3:25:17लेकिन एक सवाल मन में आता है। जिस
- 3:25:20शक्तिशाली केंद्र सरकार यानी अंग्रेजों के
- 3:25:24खिलाफ आजादी की इतनी लंबी लड़ाई लड़ी,
- 3:25:27आजाद होते ही वैसी ही एक शक्तिशाली केंद्र
- 3:25:30सरकार बनाने की वकालत क्यों?
- 3:25:32यह बहुत ही जरूरी सवाल है। और इसका जवाब
- 3:25:35एक शब्द में है। विभाजन।
- 3:25:38विभाजन।
- 3:25:38हां, नेताओं ने अपनी आंखों से देश को
- 3:25:41टूटते और जलते देखा था। उन्हें डर था कि
- 3:25:45अगर राज्यों को बहुत ज्यादा ताकत दे दी गई
- 3:25:47तो देश फिर से बिखर सकता है। उस वक्त देश
- 3:25:51की एकता किसी भी चीज से ज्यादा जरूरी थी।
- 3:25:54इसीलिए नेहरू अंबेडकर जैसे नेताओं ने एक
- 3:25:58शक्तिशाली केंद्र की पुरजोर वकालत की।
- 3:26:01पर क्या सभी इस बात से सहमत है?
- 3:26:03नहीं बिल्कुल नहीं। मद्रास के संधानम जैसे
- 3:26:07सदस्यों ने चेतावनी दी कि एक जरूरत से
- 3:26:09ज्यादा शक्तिशाली केंद्र राज्यों की सारी
- 3:26:12ताकत खींच लेगा और उन्हें खोखला कर देगा।
- 3:26:15तो बहस दोनों तरफ से मजबूत थी।
- 3:26:17तो आखिर में क्या तय हुआ?
- 3:26:19आखिरकार एक बीच का रास्ता अपनाया गया।
- 3:26:22केंद्र को शक्तिशाली बनाया गया लेकिन
- 3:26:24राज्यों को भी उनके अपने क्षेत्र में
- 3:26:26महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए।
- 3:26:28और अब उस मुद्दे पर आते हैं जिसने सभा में
- 3:26:30शायद सबसे ज्यादा भावनात्मक चिंगारियां
- 3:26:33पैदा की। राष्ट्र की भाषा यह सिर्फ एक
- 3:26:35प्रशासनिक सवाल तो नहीं था?
- 3:26:37बिल्कुल नहीं था। यह लोगों की पहचान से
- 3:26:40जुड़ा था। बहुत ही संवेदनशील और विस्फोटक
- 3:26:43मुद्दा था। कई सदस्य खासकर उत्तर भारत से
- 3:26:47चाहते थे कि हिंदी को राष्ट्रभाषा का
- 3:26:49दर्जा दिया जाए। आरवी धुलेकर ने तो यहां
- 3:26:52तक कह दिया कि जिन्हें हिंदुस्तानी नहीं
- 3:26:54आती उन्हें सभा में रहने का कोई हक नहीं
- 3:26:57है।
- 3:26:58यह तो बहुत ही तीखी बात कह दी। इस पर तो
- 3:27:00हंगामा हो गया होगा।
- 3:27:01जबरदस्त हंगामा हुआ। डॉ. राजेंद्र प्रसाद
- 3:27:04को बीच बचाव करना पड़ा। मद्रास की सदस्य
- 3:27:07श्रीमती जी दुर्गाबाई ने बहुत ही मजबूती
- 3:27:10से इसका जवाब दिया। उन्होंने चेतावनी दी
- 3:27:12कि दक्षिण में हिंदी का विरोध बहुत ज्यादा
- 3:27:15है। उन्होंने महात्मा गांधी के विचार का
- 3:27:17समर्थन किया जो हिंदुस्तानी को
- 3:27:19राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे।
- 3:27:21हिंदुस्तानी यह भी एक महत्वपूर्ण शब्द है।
- 3:27:24इसका मतलब है हिंदी और उर्दू के मिश्रण से
- 3:27:26बनी भाषा है ना।
- 3:27:27जी जिसे आम लोग आसानी से समझते थे। गांधी
- 3:27:31जी का मानना था कि यही वह भाषा है जो सबको
- 3:27:34जोड़ सकती है। लेकिन तब तक राजनीति ने इन
- 3:27:37दोनों भाषाओं को भी एक दूसरे से दूर कर
- 3:27:39दिया था।
- 3:27:40तो महीनों तक चलिए इस खींचतान का हल कैसे
- 3:27:42निकला?
- 3:27:43आखिरकार एक बहुत ही समझदारी भरा समझौता
- 3:27:46हुआ। यह तय हुआ कि हिंदी भारत की
- 3:27:49राष्ट्रभाषा यानी नेशनल लैंग्वेज नहीं
- 3:27:52बल्कि राजभाषा यानी ऑफिशियल लैंग्वेज
- 3:27:54होगी। अच्छा यह फर्क है।
- 3:27:56जी यह बहुत बड़ा फर्क है। देवनागरी लिपि
- 3:27:59में लिखी हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया
- 3:28:01गया। पर साथ में यह भी तय हुआ कि अगले 15
- 3:28:05सालों तक सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का
- 3:28:08इस्तेमाल भी जारी रहेगा और हर राज्य को
- 3:28:11अपने काम के लिए अपनी क्षेत्रीय भाषा
- 3:28:13चुनने का अधिकार होगा।
- 3:28:15तो एक तरह से सबको कुछ ना कुछ मिला।
- 3:28:17बिल्कुल। यह भारतीय लोकतंत्र की समझौता
- 3:28:20करने की अद्भुत क्षमता का एक बेहतरीन
- 3:28:22उदाहरण है।
- 3:28:23तो इन तमाम असहमतियों, तूफानी बहसों और
- 3:28:26आखिर में हुए समझौतों के बाद वो दस्तावेज
- 3:28:29तैयार हुआ जिसे हम भारत का संविधान कहते
- 3:28:32हैं।
- 3:28:32जी।
- 3:28:33इसने हर वयस्क नागरिक को वोट का अधिकार
- 3:28:36दिया। जो उस समय के कई विकसित देशों में
- 3:28:38भी नहीं था।
- 3:28:39और इसने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों
- 3:28:42के अधिकारों को अपने मूल सिद्धांतों में
- 3:28:45जगह दी। यह उस दौर के लिहाज से एक असाधारण
- 3:28:49रूप से प्रगतिशील और साहसी दस्तावेज था।
- 3:28:52यह उन सभी सदस्यों की दूरदर्शिता और मेहनत
- 3:28:55का सबूत है।
- 3:28:56बिल्कुल। और अंत में एक विचार जिस पर सोचा
- 3:28:59जा सकता है। संविधान बनाने वालों ने अपने
- 3:29:02समय की चुनौतियों का जवाब एक मजबूत, एकजुट
- 3:29:06और समावेशी भारत की कल्पना के साथ दिया।
- 3:29:08हम
- 3:29:09आज 75 से ज्यादा वर्षों के बाद जब हम नई
- 3:29:12चुनौतियों का सामना कर रहे हैं तो क्या
- 3:29:14संविधान के वे मूल सिद्धांत जैसे
- 3:29:16धर्मनिरपेक्षता,
- 3:29:18संघवाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता आज भी
- 3:29:21उतने ही प्रासंगिक हैं या फिर उन्हें आज
- 3:29:23के भारत के संदर्भ में नए सिरे से समझने
- 3:29:26और लागू करने की जरूरत है।
- 3:29:28संविधान का निर्माण एक नए युग की शुरुआत
- 3:29:32समाप्त हुआ।
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