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हज़रत मुहम्मद ﷺ और एक बूढ़ी औरत का वाकिया | Nabi ﷺ Ka Waqia | Story Of Hazrat Muhammad SAW | — Transcript

by Aa Noor-e-Kahani · 3,917 words · 483 segments · language en · Watch on YouTube

Full transcript

  1. 0:00सोचिए एक ऐसी बूढ़ी औरत जो हर रोज नबी
  2. 0:04करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रास्ते
  3. 0:07में कांटे बिछाती थी कूड़ा फेंकती थी और
  4. 0:10आपको तकलीफ देने का कोई मौका नहीं छोड़ती
  5. 0:12थी। फिर एक दिन वो बूढ़ी औरत अचानक बीमार
  6. 0:15पड़ गई और फिर नबी करीम उसकी खैरियत पूछने
  7. 0:19उसके घर पहुंच गए। प्यारे दोस्तों यह उस
  8. 0:22जमाने की बात है जब मक्का मुकर्रमा में एक
  9. 0:25बूढ़ी औरत रहा करती थी। उसके दिल में नबी
  10. 0:28पाक सल्लल्लाहू अलैह वसल्लम के लिए बेहद
  11. 0:31सख्त नफरत भरी हुई थी। नबी करीम
  12. 0:33सल्लल्लाहू अलैह वसल्लम हर रोज अपने
  13. 0:36मुबारक सफर के दौरान उसी रास्ते से खाना
  14. 0:39काबा की तरफ तशरीफ ले जाया करते थे जिसके
  15. 0:42करीब उस बूढ़ी औरत का घर था। जैसे ही वह
  16. 0:45आपको उस रास्ते से गुजरते हुए देखती उसके
  17. 0:48दिल में छुपी दुश्मनी और नफरत फिर से जाग
  18. 0:50उठती। कभी वह आपके ऊपर कूड़ा फेंक देती,
  19. 0:54कभी गंदा पानी डाल देती और कभी रास्ते में
  20. 0:56ऐसी चीजें रख देती जिनसे आपको तकलीफ
  21. 0:59पहुंचे। उम्र के आखिरी पड़ाव में पहुंच
  22. 1:02चुकी वह औरत इतनी कमजोर हो गई थी कि बिना
  23. 1:05लाठी के ठीक तरह चल भी नहीं सकती थी। हर
  24. 1:08कदम उसके लिए मुश्किल था। [संगीत] लेकिन
  25. 1:09इसके बावजूद वह रोज किसी ना किसी तरह नबी
  26. 1:13पाक सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम को तकलीफ देने
  27. 1:16की [संगीत] कोशिश जरूर करती। मगर दूसरी
  28. 1:18तरफ नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम का
  29. 1:22अखलाक ऐसा था कि आपकी मुबारक जुबान से
  30. 1:25[संगीत] कभी शिकायत का एक लफ्ज भी नहीं
  31. 1:26निकला। ना आपने गुस्से का इजहार किया ना
  32. 1:29किसी तरह की बद्दुआ दी और ना ही कभी बदला
  33. 1:32लेने का इरादा किया। जो भी तकलीफ आपको
  34. 1:35पहुंचाई [संगीत] जाती आप उसे सब्र हिकमत
  35. 1:37और खामोशी के साथ बर्दाश्त फरमाते रहे। एक
  36. 1:41रात उस बूढ़ी औरत ने अपने दिल में इरादा
  37. 1:43किया कि आज वह नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैह
  38. 1:47वसल्लम को ऐसी तकलीफ पहुंचाएगी जिसे वह
  39. 1:50कभी भूल नहीं [संगीत] पाएंगे। रात की
  40. 1:52तारीकी में वह चुपचाप अपने घर से निकली और
  41. 1:55उसी रास्ते पर कांटे बिछाने लगी जहां से
  42. 1:58नबी पाक सल्लल्लाहू अलैह वसल्लम हर रोज
  43. 2:01तशरीफ ले [संगीत] जाया करते थे। कांटे
  44. 2:04बिछाते हुए वह अपने दिल में सोच रही थी कि
  45. 2:06सुबह जब नबी पाक सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम
  46. 2:10इस [संगीत] रास्ते से गुजरेंगे तो यह
  47. 2:13कांटे उनके मुबारक कदमों में छुप जाएंगे
  48. 2:15और उनके पैर जख्मी हो जाएंगे। इसी ख्याल
  49. 2:18से उसके चेहरे पर खुशी दिखाई देने लगी और
  50. 2:20वह अपने घर लौट गई। जब फज्र का वक्त हुआ
  51. 2:23तो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
  52. 2:27हमेशा की तरह उसी रास्ते से तशरीफ ले जा
  53. 2:29रहे थे। जैसे ही आप आगे बढ़े रास्ते में
  54. 2:32बिछे हुए कांटे आपके मुबारक कदमों में
  55. 2:34चुभने लगे। इससे आपको शदीद तकलीफ पहुंची।
  56. 2:38लेकिन इसके बावजूद आपने सब्र का दामन नहीं
  57. 2:41छोड़ा। आप खामोशी के साथ रास्ते से कांटे
  58. 2:44हटाते हुए धीरे-धीरे अपना सफर जारी रखते
  59. 2:46रहे। दूर खड़ी वह बूढ़ी औरत यह पूरा मंजर
  60. 2:50देख रही थी। जब उसने नबी करीम सल्लल्लाहहु
  61. 2:52[संगीत] अलैहि वसल्लम के मुबारक कदमों को
  62. 2:55जख्मी होते देखा तो उसके दिल में अजीब सी
  63. 2:58खुशी पैदा हुई। लेकिन इतनी तकलीफ के
  64. 3:00बावजूद भी नबी पाक सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम
  65. 3:04के मुबारक चेहरे पर सब्र, रहमत और नरमी
  66. 3:07साफ दिखाई दे रही थी। मक्का मुकर्रमा के
  67. 3:10लोग जब यह सब देखते तो हैरान रह जाते। वह
  68. 3:13आपस में कहते कि मोहम्मद सल्लल्लाहहु
  69. 3:15अलैहि [संगीत] वसल्लम जैसा सब्र करने वाला
  70. 3:18और रहम दिल इंसान हमने कभी नहीं देखा। अगर
  71. 3:21कोई दूसरा शख्स होता तो शायद इतनी तकलीफ
  72. 3:24सहने के बाद बदला लेने की [संगीत] कोशिश
  73. 3:26जरूर करता। लेकिन नबी करीम सल्लल्लाहहु
  74. 3:30अलैह वसल्लम का अंदाज इससे [संगीत]
  75. 3:32बिल्कुल अलग था। फिर अगली सुबह आई लेकिन
  76. 3:35इस बार मंजर पहले से बिल्कुल अलग था। नबी
  77. 3:37करीम सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम रोज की तरह
  78. 3:41उसी रास्ते से गुजर रहे थे। आपने देखा कि
  79. 3:44आज ना रास्ते में कोई कांटा बिछा हुआ है।
  80. 3:46ना कहीं कूड़ा पड़ा है और ना ही कोई
  81. 3:48रुकावट दिखाई दे रही है। यह देखकर आप कुछ
  82. 3:51लम्हों के लिए वहीं ठहर गए। आपके [संगीत]
  83. 3:53मुबारक दिल में उस बूढ़ी औरत के लिए फिक्र
  84. 3:55पैदा हुई। आपने सोचा कि आज वह औरत दिखाई
  85. 3:58क्यों नहीं दे रही जो हर रोज किसी ना किसी
  86. 4:01तरह मुझे तकलीफ पहुंचाने [संगीत] की कोशिश
  87. 4:03किया करती थी। फिर आपने वहां मौजूद लोगों
  88. 4:05से पूछा क्या तुम में से कोई मुझे बता
  89. 4:08सकता है कि वह बूढ़ी औरत आज कहां है? आज
  90. 4:10वह नजर क्यों नहीं आ रही? आपका यह सवाल
  91. 4:13सुनकर वहां मौजूद लोग हैरान रह गए। वह एक
  92. 4:16दूसरे की तरफ देखने लगे और सोचने लगे कि
  93. 4:19जिस औरत ने हमेशा आपको तकलीफ दी, आपके
  94. 4:22रास्ते [संगीत] में कांटे बिछाए, आपको
  95. 4:24परेशान करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। आज
  96. 4:27आप उसी की खैरियत मालूम कर रहे हैं। लेकिन
  97. 4:29यही तो हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहहु अलैह
  98. 4:33वसल्लम का बेमिसाल अखलाक था। जो आपको
  99. 4:36तकलीफ देता आप उसके लिए भी रहमत, भलाई और
  100. 4:40खैर ही चाहते थे। वहां मौजूद लोगों ने अदब
  101. 4:43के साथ अर्ज किया या रसूल अल्लाह वह बूढ़ी
  102. 4:47औरत [संगीत] आज सुबह से दिखाई नहीं दी।
  103. 4:49मालूम होता है कि उसकी तबीयत बहुत खराब है
  104. 4:51और वह शदीद बीमारी में मुब्तला है। यह
  105. 4:54सुनते ही नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैहि
  106. 4:57वसल्लम के मुबारक दिल में उसके लिए फिक्र
  107. 4:59पैदा हुई। आपने देर किए बिना उसकी खैरियत
  108. 5:02मालूम करने का इरादा फरमाया और उसके घर की
  109. 5:05तरफ तशरीफ ले गए। जब नबी पाक सल्लल्लाहहु
  110. 5:08अलैह वसल्लम उसके दरवाजे पर पहुंचे तो
  111. 5:12बड़े नरम [संगीत] और मेहरबान लहजे में
  112. 5:13आवाज दी। अम्मा क्या आप घर में हैं? अंदर
  113. 5:17से एक बेहद कमजोर और बीमार सी आवाज सुनाई
  114. 5:19दी। हां मैं घर में हूं। कौन है? अंदर आ
  115. 5:23जाइए। नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम
  116. 5:26जब घर के अंदर दाखिल हुए तो वहां का मंजर
  117. 5:30देखकर आपका मुबारक दिल रहम से भर गया। वह
  118. 5:33बूढ़ी औरत शदीद बीमारी [संगीत] की हालत
  119. 5:35में बिस्तर पर पड़ी थी। कमजोरी की वजह से
  120. 5:38उसका जिस्म बिल्कुल निढ़ाल हो चुका था और
  121. 5:41उसमें उठने बैठने की भी ताकत बाकी नहीं
  122. 5:43रही थी। जैसे ही उसकी नजर नबी पाक
  123. 5:46सल्लल्लाहू अलैह वसल्लम पर पड़ी, वह हैरत
  124. 5:50से कांप उठी। उसकी आंखें खुली की खुली रह
  125. 5:52गई। कुछ लम्हों तक तो उसे अपनी आंखों पर
  126. 5:55यकीन ही नहीं हुआ कि जिस शख्स को उसने
  127. 5:58हमेशा तकलीफ [संगीत] पहुंचाई आज वही उसके
  128. 6:01सामने खड़े हैं। वह शर्मिंदगीगी और हैरत
  129. 6:03के आलम में अपने दिल में सोचने लगी। क्या
  130. 6:06यह वही मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैह वसल्लम है
  131. 6:09जिन पर मैंने कूड़ा फेंका जिनके रास्ते
  132. 6:12में कांटे बिछाए और जिन्हें परेशान करने
  133. 6:15का कोई [संगीत] मौका नहीं छोड़ा। मैंने
  134. 6:17इन्हें इतनी तकलीफें दी। फिर भी आज यह
  135. 6:19मेरी बीमारी की खबर सुनकर मेरी खैरियत
  136. 6:22पूछने मेरे घर तशरीफ लाए हैं। नबी करीम
  137. 6:25सल्लल्लाहू अलैह वसल्लम उसके करीब बैठ गए
  138. 6:29और बड़े प्यार और रहम भरे अंदाज में
  139. 6:31फरमाया अम्मा मुझे मालूम हुआ कि आपकी
  140. 6:34तबीयत खराब है। अगर आप इजाजत दें तो मैं
  141. 6:38आपकी कुछ खिदमत करना चाहता हूं। यह
  142. 6:40अल्फाज़ सुनते ही वह बूढ़ी औरत हैरत से
  143. 6:43नबी पाक सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की तरफ
  144. 6:46देखने लगी। कुछ लम्हों तक उसकी जुबान से
  145. 6:49आवाज ही ना निकली। जिस शख्स को उसने
  146. 6:51जिंदगी [संगीत] भर तकलीफ दी, जिसके साथ
  147. 6:54बुरा सुलक किया और जिसे परेशान करने की हर
  148. 6:57मुमकिन कोशिश की, आज वही नबी पाक
  149. 7:00सल्लल्लाहू अलैह वसल्लम उसकी बीमारी की
  150. 7:03हालत में उसकी खैरियत पूछने और उसकी खिदमत
  151. 7:06करने के लिए उसके घर तशरीफ लाए थे। यह सब
  152. 7:10सोचते ही उस बूढ़ी [संगीत] औरत की आंखों
  153. 7:12से आंसू बहने लगे। जिंदगी में शायद पहली
  154. 7:15बार उसे अपने किए हुए हर बुरे बर्ताव पर
  155. 7:17सच्ची शर्मिंदगीगी [संगीत] महसूस हो रही
  156. 7:19थी। उसके जेहन में एक-एक करके वह तमाम
  157. 7:22बातें घूमने लगी। जब उसने नबी [संगीत] पाक
  158. 7:25सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम को तकलीफ पहुंचाने
  159. 7:28की कोशिश की थी। कभी कूड़ा फेंका, कभी
  160. 7:31रास्ते में रुकावट डाली और कभी कांटे
  161. 7:33[संगीत] बिछाकर आपको तकलीफ देने की कोशिश
  162. 7:36की। लेकिन इसके बावजूद नबी करीम
  163. 7:38सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम ने उसके साथ
  164. 7:41हमेशा रहमत, मेहरबानी और नरमी का ही
  165. 7:44बर्ताव फरमाया। आप सल्लल्लाहहु अलैहि
  166. 7:47वसल्लम बड़े प्यार और शफकत के साथ उसकी
  167. 7:50खिदमत करते रहे। कभी उसे पानी पिलाते, कभी
  168. 7:53उसकी जरूरतों का ख्याल रखते और कभी अपने
  169. 7:55नरम लहजे में उसे तसल्ली देते। नबी करीम
  170. 7:59सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम का यह बेमिसाल
  171. 8:03अखलाक देखकर बूढ़ी औरत की आंखों से आंसू
  172. 8:06लगातार बहते रहे। धीरे-धीरे उसके दिल में
  173. 8:08बरसों से जमी नफरत, दुश्मनी और सख्ती
  174. 8:11पिघलने लगी। जिस दिल में पहले नफरत थी,
  175. 8:14उसी दिल में अब मोहब्बत और एहतराम पैदा
  176. 8:16होने लगा। इसके बाद कई दिनों तक नबी करीम
  177. 8:19सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम उसकी खैरियत
  178. 8:22[संगीत] पूछते रहे और उसकी देखभाल व खिदमत
  179. 8:25फरमाते रहे। फिर एक दिन जब उसकी तबीयत
  180. 8:28पहले से कुछ बेहतर हुई तो वह बड़ी खामोशी
  181. 8:30[संगीत] के साथ नबी पाक सल्लल्लाहो अलैह
  182. 8:33वसल्लम की तरफ देखने लगी। उसकी आंखें
  183. 8:36आंसुओं [संगीत] से भरी हुई थी और अब उसके
  184. 8:38दिल की हालत पूरी तरह बदल चुकी थी। कुछ
  185. 8:41लम्हों तक वह [संगीत] खामोश रही। फिर
  186. 8:43कांपती हुई और भर्राई आवाज में कहने लगी।
  187. 8:46ऐ मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम मैंने
  188. 8:49आपको कितनी तकलीफें पहुंचाई। मैंने आपको
  189. 8:52सताने में कोई कमी नहीं छोड़ी और हर रोज
  190. 8:55किसी ना किसी तरह आपको परेशान [संगीत]
  191. 8:57करने की कोशिश करती रही। इतना कहते कहते
  192. 9:00उसकी आवाज भर आई। वह रोते हुए फिर बोली
  193. 9:03लेकिन आपने कभी मुझसे बदला [संगीत] नहीं
  194. 9:05लिया। आपने मेरी किसी बुराई का जवाब बुराई
  195. 9:08से नहीं दिया। बल्कि जब मैं बीमार पड़ी तो
  196. 9:10आप मेरी खैरियत मालूम करने मेरे घर तशरीफ
  197. 9:13[संगीत] लाए। आपने मेरी खिदमत की, मेरी
  198. 9:16देखभाल की और मेरी हर जरूरत का ख्याल रखा।
  199. 9:19वह रोते हुए कहने लगी मैंने अपनी पूरी
  200. 9:22जिंदगी में आप [संगीत] जैसा रहम दिल,
  201. 9:24मेहरबान और बुलंद अखलाक वाला इंसान कभी
  202. 9:26नहीं देखा। यह कहते कहते उसकी आवाज फिर भर
  203. 9:29आई और उसकी आंखों से आंसू लगातार बहते
  204. 9:32रहे। जिस दिल में कभी नबी [संगीत] करीम
  205. 9:35सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के लिए नफरत और
  206. 9:38दुश्मनी भरी हुई थी, आज उसी दिल में आपके
  207. 9:41बेमिसाल अखलाक, सब्र और रहमत ने अपनी जगह
  208. 9:45बना ली थी। फिर वह रोते हुए कहने लगी खुदा
  209. 9:48की कसम ऐसा बेमिसाल किरदार [संगीत]
  210. 9:51और इतना बुलंद अखलाक किसी आम इंसान का
  211. 9:53नहीं हो सकता। आप यकीनन अल्लाह ताला के
  212. 9:56सच्चे रसूल हैं। इसके बाद वह कांपती हुई
  213. 9:59आवाज में बोली मुझे भी अपने दीन में शामिल
  214. 10:02कर लीजिए। मैं गवाही देती [संगीत] हूं कि
  215. 10:04अल्लाह ताला के सिवा कोई इबादत के लायक
  216. 10:07नहीं है। और मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैह
  217. 10:10वसल्लम अल्लाह ताला के सच्चे रसूल हैं। इस
  218. 10:14तरह नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैह [संगीत]
  219. 10:16वसल्लम ने अपने बेमिसाल अखलाक सब्र और
  220. 10:20रहमत के जरिए एक ऐसे दिल को जो कभी नफरत
  221. 10:23से भरा हुआ था। ईमान की रोशनी से मुनववर
  222. 10:26कर दिया। प्यारे दोस्तों, अब सुनिए एक और
  223. 10:29वाकया जो हजरत अली रज्लाहु ताला अनू और एक
  224. 10:33बेहद गरीब फकीर से जुड़ा हुआ है। यह उस
  225. 10:36दौर की बात है जब मक्का मुकर्रमा के बाहर
  226. 10:39एक [संगीत] गरीब और मजबूर फकीर अपने
  227. 10:41छोटे-छोटे बच्चों के साथ जिंदगी गुजारता
  228. 10:44था। उसके हालात इतने मुश्किल थे कि कई बार
  229. 10:47उसके [संगीत] घर में खाने के लिए एक
  230. 10:49निवाला तक मौजूद नहीं होता था। फाका और
  231. 10:52तंगदस्ती ने पूरे घर को अपनी गिरफ्त में
  232. 10:54ले रखा था। उसके मासूम बच्चे कई-कई वक्त
  233. 10:57तक भूखे रहने पर मजबूर हो जाते थे। जब वह
  234. 11:01अपने बच्चों को भूख की वजह से तड़पते हुए
  235. 11:03देखता तो उसका दिल दर्द से भर जाता। लेकिन
  236. 11:06उसकी मजबूरी ऐसी [संगीत] थी कि चाहकर भी
  237. 11:08वह उनके लिए खाने का इंतजाम नहीं कर पाता
  238. 11:11था। उसकी बेबसी हर गुजरते दिन के साथ और
  239. 11:15ज्यादा बढ़ती चली जा रही थी। एक दिन वह
  240. 11:17गरीब फकीर अपने भूखे बच्चों के लिए मदद की
  241. 11:20तलाश में मक्का मुकर्रमा पहुंचा। उसकी
  242. 11:23हालत बेहद [संगीत] खराब थी। कई दिनों की
  243. 11:25भूख और तंगदस्ती उसके चेहरे से साफ झलक
  244. 11:29रही थी। सबसे पहले वह अब्बू झहल के घर के
  245. 11:31दरवाजे पर पहुंचा। वहां खड़े होकर उसने
  246. 11:34बड़ी बेबसी के साथ कहा, "मैं बहुत गरीब और
  247. 11:37मजबूर इंसान हूं। मेरे छोटे-छोटे बच्चे
  248. 11:40भूख से परेशान हैं। अल्लाह के नाम पर मेरी
  249. 11:43कुछ मदद कर दीजिए।" अबू जहल ने उस फकीर की
  250. 11:46तरफ गौर से देखा। फिर उसके चेहरे पर एक
  251. 11:49चालाक मुस्कुराहट दिखाई दी। उसने कहा मैं
  252. 11:52तुम्हें खुद कुछ देने के बजाय एक ऐसे शख्स
  253. 11:54का पता बताता हूं जो अगर चाहे तो तुम्हारी
  254. 11:57ऐसी मदद करेगा कि तुम्हारी गरीबी हमेशा के
  255. 12:00लिए खत्म हो जाएगी। यह सुनते ही उस फकीर
  256. 12:03के दिल में उम्मीद की एक किरण जाग उठी।
  257. 12:06उसने खुशी से कहा अगर ऐसा है तो मुझे फौरन
  258. 12:09[संगीत] उस शख्स का पता बता दीजिए। तब
  259. 12:11अब्बू जहल ने कहा तुम अली के पास चले जाओ।
  260. 12:14इतना सुनते ही वह फकीर बड़ी उम्मीद के साथ
  261. 12:17वहां से रवाना हो गया। लेकिन उसके जाते ही
  262. 12:20अब्बू, झल और उसके [संगीत] साथ बैठे लोग
  263. 12:22जोर-जोर से हंसने लगे। उनमें से एक ने
  264. 12:25हैरानी से पूछा, तुमने यह क्या किया? अली
  265. 12:28के पास तो खुद कोई [संगीत] दौलत नहीं है।
  266. 12:30वह तो रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के
  267. 12:34साथ रहते हैं। अगर खाने को मिल जाए तो खा
  268. 12:36लेते हैं और अगर ना मिले तो सब्र के साथ
  269. 12:39भूखे रह जाते हैं। यह सुनकर अब्बू झल फिर
  270. 12:42हंस पड़ा और कहने लगा यही तो मेरी चाल है।
  271. 12:45जब अली उस फकीर की मदद नहीं कर [संगीत]
  272. 12:47पाएंगे तब हम पूरे मक्का में यह बात
  273. 12:49फैलाएंगे कि देखो मोहम्मद सल्लल्लाहहु
  274. 12:52अलैहि वसल्लम के साथ ही खुद इतने गरीब हैं
  275. 12:55कि एक जरूरतमंद की मदद भी नहीं कर सकते।
  276. 12:58फिर उसने अपनी मंशा जाहिर करते हुए कहा इस
  277. 13:01तरह हम लोगों के दिलों में नबी करीम
  278. 13:03सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम और उनके [संगीत]
  279. 13:06दीन के बारे में शक और नफरत पैदा कर
  280. 13:08देंगे। उधर वह गरीब फकीर दिल में उम्मीद
  281. 13:12लिए हजरत अली रज्लाहु ताला अनू के पास
  282. 13:15पहुंच गया। उसने अदब [संगीत] के साथ अर्ज
  283. 13:17किया ए अली मैं बहुत गरीब और मजबूर हूं।
  284. 13:21मेरे छोटे-छोटे बच्चे कई वक्त से भूखे
  285. 13:24हैं। मुझे बताया गया है कि आप बहुत सखी
  286. 13:26हैं और जरूरतमंदों की मदद करने वाले हैं।
  287. 13:29अल्लाह के लिए मेरी कुछ मदद कर दीजिए।
  288. 13:31हजरत अली रज अल्लाहहु ताला अनू ने उसकी
  289. 13:34पूरी बात बड़े गौर से सुनी। फिर बड़े
  290. 13:36इत्मीनान के साथ मुस्कुराते हुए पूछा,
  291. 13:39"तुम्हें यह किसने बताया कि मैं बहुत
  292. 13:40मालदार हूं?" फकीर ने दूर खड़े एक बड़े घर
  293. 13:43की तरफ इशारा करते हुए कहा, उस बड़े घर के
  294. 13:46मालिक ने मुझे [संगीत] आपके पास भेजा है।
  295. 13:48जैसे ही अबू जहल का जिक्र हुआ, हजरत अली
  296. 13:51रजिलाहु ताला अनू फौरन समझ गए कि यह कोई
  297. 13:55साधारण बात नहीं है। बल्कि नबी करीम
  298. 13:58सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम और दीन [संगीत]
  299. 14:01इस्लाम की शान को लोगों की नजरों में कम
  300. 14:04करने की एक सोची समझी साजिश है। लेकिन
  301. 14:07इसके बावजूद आपके मुबारक चेहरे पर जरा सी
  302. 14:10भी परेशानी या बेचैनी दिखाई नहीं दी। आपने
  303. 14:13उस गरीब फकीर की तरफ रहम भरी नजर से देखा
  304. 14:16और बड़े इत्मीनान के साथ फरमाया फिक्र मत
  305. 14:19करो तुम यहां से हरगिज़ खाली हाथ [संगीत]
  306. 14:21वापस नहीं लौटोगे। यह फरमाने के बाद हजरत
  307. 14:24अली रजिलाहु ताला अनू कुछ लम्हों के लिए
  308. 14:27खामोश हो गए। फिर हजरत अली रजिलाहु
  309. 14:30[संगीत] ताला अनू ने अपनी नजर जमीन की तरफ
  310. 14:33झुकाई। आप नीचे बैठे और अपनी मुट्ठी में
  311. 14:36थोड़ी सी रेत उठा ली। वह गरीब फकीर यह सब
  312. 14:39[संगीत] बड़े हैरत भरे अंदाज में देख रहा
  313. 14:40था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इस
  314. 14:43मुट्ठी भर रेत का क्या किया जाएगा। हजरत
  315. 14:46अली रजिलाहु ताला अनू ने उस रेत को अपने
  316. 14:49मुबारक हाथ में रखा। फिर दिल ही दिल में
  317. 14:52अल्लाह ताला से दुआ की। इसके बाद आपने वह
  318. 14:56रेत उस फकीर की झोली में डाल दी और बड़े
  319. 14:58इत्मीनान से फरमाया भाई इसे संभाल कर रखना
  320. 15:02और [संगीत] जिसने तुम्हें मेरे पास भेजा
  321. 15:04है सबसे पहले उसी के पास जाना लेकिन एक
  322. 15:07बात याद रखना रास्ते में अपनी झोली हरगिज़
  323. 15:10मत खोलना जब उसके पास पहुंच जाओ तभी इसे
  324. 15:13खोलना [संगीत] यह सुनकर फकीर ने अदब के
  325. 15:15साथ अर्ज किया जैसा आप हुक्म फरमाएं फिर
  326. 15:18उसने अपनी झोली को अच्छी तरह [संगीत] बांध
  327. 15:20लिया और अब्बू जहल के घर की तरफ रवाना हो
  328. 15:23रास्ते में चलते-चलते उसे एक अजीब [संगीत]
  329. 15:26सा एहसास होने लगा। उसे महसूस हुआ कि उसकी
  330. 15:29झोली धीरे-धीरे पहले से ज्यादा भारी होती
  331. 15:31जा रही है। वह बार-बार हैरत के साथ अपनी
  332. 15:34झोली [संगीत] की तरफ देखता और अपने दिल
  333. 15:36में सोचता आखिर इसमें ऐसा क्या है? क्या
  334. 15:39इसमें वाकई सिर्फ रेत ही है? एक लम्हे के
  335. 15:42लिए उसके दिल में ख्याल आया कि क्यों ना
  336. 15:45झोली खोल कर देख ली जाए? लेकिन उसी वक्त
  337. 15:48उसे हजरत [संगीत] अली रज़ अल्लाहु ताला अनू
  338. 15:50की नसीहत याद आ गई। इसीलिए उसने [संगीत]
  339. 15:53रास्ते में झोली खोलने की हिम्मत नहीं की
  340. 15:55और खामोशी के साथ अपना सफर जारी रखा। कुछ
  341. 15:58देर बाद वह अब्बू झहल के घर पहुंच गया।
  342. 16:01जैसे ही अब्बू जहल ने उसे वापस आते देखा,
  343. 16:03उसके चेहरे पर एक चालाक मुस्कुराहट फैल
  344. 16:06गई। उसे पूरा यकीन था कि वह फकीर खाली हाथ
  345. 16:09लौट कर आया होगा। अबू जहल ने ताना मारते
  346. 16:12हुए पूछा, "ए फकीर, अली ने तुम्हें क्या
  347. 16:15दिया?"
  348. 16:16फकीर ने जवाब दिया, उन्होंने मुझे कुछ
  349. 16:19दिया है और खासतौर पर यह हिदायत दी है कि
  350. 16:23सबसे पहले आपके पास आकर ही इसे खोलूं। यह
  351. 16:26सुनते ही अब्बू झलजोर से हंस पड़ा और उसके
  352. 16:29साथ बैठे लोग भी उसका मजाक उड़ाते हुए
  353. 16:31हंसने लगे। उन सबको पूरा यकीन था कि उस
  354. 16:34झोली में रेत या मिट्टी के अलावा कुछ भी
  355. 16:37नहीं होगा। अबू जहल ने मजाक उड़ाते हुए
  356. 16:39कहा, "अच्छा, तो जल्दी से अपनी झोली खोलो।
  357. 16:42हम भी देखें कि आखिर अली ने तुम्हें कौन
  358. 16:45सा खजाना देकर भेजा है। फकीर ने [संगीत]
  359. 16:47धीरे-धीरे अपनी झोली की गांठ खोली। लेकिन
  360. 16:49जैसे ही झोली का मुंह खुला, वहां मौजूद हर
  361. 16:52शख्स की आंखें हैरत से खुली [संगीत] की
  362. 16:54खुली रह गई। जिस झोली में पहले सिर्फ रेत
  363. 16:57थी, अब उसमें चमचमाते हुए कीमती जवाहरात
  364. 17:00मौजूद थे। पूरी झोली मोतियों, हीरों और
  365. 17:03[संगीत] बेशकीमत नगीनों से भरी हुई थी। यह
  366. 17:06मंजर देखकर वह फकीर खुद भी गहरे हैरत में
  367. 17:09पड़ गया। उसके हाथ कांपने लगे और कुछ
  368. 17:12लम्हों तक उसे [संगीत] अपनी आंखों पर यकीन
  369. 17:15ही नहीं हुआ कि यह सब उसके सामने कैसे हो
  370. 17:17गया। उधर अब्बू जहल की आंखें [संगीत] भी
  371. 17:20हैरत से फैल गई। कुछ देर तक उसकी जुबान से
  372. 17:23एक लफ्ज भी नहीं निकला। वह कभी उन चमकते
  373. 17:26[संगीत] हुए जवाहरात को देखता और कभी फकीर
  374. 17:28की तरफ नजर उठाता। फिर अचानक वह गुस्से और
  375. 17:31बेचैनी में चिल्ला [संगीत] कर बोला। नहीं
  376. 17:34यह हरगिज़ नहीं हो सकता। अली तुम्हें इतना
  377. 17:37कीमती खजाना कैसे दे सकते हैं? उनके पास
  378. 17:39तो खुद इतनी दौलत नहीं है। जरूर यह चोरी
  379. 17:42का माल होगा। अबू जहल के चेहरे पर गुस्सा
  380. 17:45साफ [संगीत] दिखाई दे रहा था। वह तैश में
  381. 17:47आकर बोला, "मैं अभी मोहम्मद सल्लल्लाहू
  382. 17:50अलैह वसल्लम के पास जाता हूं। आज मैं अली
  383. 17:53की शिकायत करूंगा। अगर यह जवाहरात चोरी के
  384. 17:56हैं, तो इसका फैसला जरूर होना चाहिए। यह
  385. 17:58कहते ही अब्बू जहल फौरन [संगीत] अपनी जगह
  386. 18:00से उठ खड़ा हुआ। उसने उस गरीब फकीर को
  387. 18:03अपने साथ लिया और तेज कदमों से चलते हुए
  388. 18:06नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम की
  389. 18:09खिदमत में पहुंच गया। वहां पहुंचते ही
  390. 18:11[संगीत] उसने ऊंची आवाज में कहना शुरू
  391. 18:13किया। ऐ मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
  392. 18:17आपके साथ [संगीत] ही अली ने चोरी की है।
  393. 18:19उन्होंने चोरी के हीरे और कीमती जवाहरात
  394. 18:22इस फकीर को दे दिए हैं। उसका यह इल्जाम
  395. 18:25[संगीत] सुनते ही वहां मौजूद लोगों के बीच
  396. 18:27हलचल पैदा हो गई। हर शख्स की निगाह अब्बू
  397. 18:30जहल की तरफ उठ गई। लेकिन नबी करीम
  398. 18:33सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम ने हमेशा की तरह
  399. 18:36पूरे सब्र और इत्मीनान के साथ उसकी बात
  400. 18:38सुनी। जब वह अपनी बात पूरी कर [संगीत]
  401. 18:40चुका तो आपने निहायत नरम लहजे में फरमाया
  402. 18:44अब्बू जहल तुम्हारे पास अपने इस इल्जाम का
  403. 18:47क्या सबूत है? अब्बू जहल बिना देर किए
  404. 18:49बोला, सबूत बिल्कुल साफ है। अली खुद गरीब
  405. 18:53हैं। जिनके पास अपने लिए भी कुछ नहीं है,
  406. 18:55वह एक फकीर को इतने कीमती हीरे और जवाहरात
  407. 18:58कैसे दे सकते हैं? यह माल जरूर चोरी का
  408. 19:01है। नबी पाक सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने
  409. 19:04उसकी बात सुनी और बड़े इत्मीनान के साथ
  410. 19:06फरमाया, अच्छा अली को बुला लिया जाए। कुछ
  411. 19:10ही देर बाद हजरत अली रजिलाहु ताला अनू
  412. 19:13वहां तशरीफ लाए। आपने अदब के साथ सलाम
  413. 19:16अर्ज किया और नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैह
  414. 19:18वसल्लम के सामने बैठ गए। फिर नबी पाक
  415. 19:21सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम ने फरमाया ऐ अली
  416. 19:25अबू जहल का कहना है कि तुमने इस फकीर को
  417. 19:27जो कीमती जवाहरात दिए हैं वह चोरी के हैं।
  418. 19:31क्या यह बात सही है? हजरत अली रजिलाहु
  419. 19:34ताला अनू ने बड़े अदब के साथ अर्ज किया या
  420. 19:37रसूल अल्लाह यह इल्जाम बिल्कुल बेबुनियाद
  421. 19:40है। मैंने किसी तरह की कोई चोरी नहीं की।
  422. 19:43इसके बाद आपने पूरा मामला बयान करते हुए
  423. 19:45अर्ज किया या रसूल अल्लाह यह गरीब फकीर
  424. 19:49सबसे पहले अबू जहल के पास मदद मांगने गया
  425. 19:51था लेकिन उसने जानबूझकर [संगीत] इसे मेरे
  426. 19:53पास भेज दिया उसका मकसद इस जरूरतमंद की
  427. 19:57मदद करना नहीं था बल्कि वह चाहता था कि
  428. 19:59आपके मुबारक दीन और आपकी शान को [संगीत]
  429. 20:02लोगों की नजरों में कम किया जाए। आपने आगे
  430. 20:04अर्ज किया उसकी मंशा यह [संगीत] थी कि अगर
  431. 20:07मैं इस फकीर की मदद ना कर सकूं तो वह पूरे
  432. 20:10मक्का में यह बात फैला दे कि नबी करीम
  433. 20:12सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम के साथी खुद इतने
  434. 20:16गरीब हैं कि एक जरूरतमंद की मदद भी नहीं
  435. 20:18कर सकते। यह सुनकर पूरी मजलिस [संगीत] में
  436. 20:21गहरी खामोशी छा गई। वहां मौजूद सभी लोग
  437. 20:24बड़ी तवज्जो के साथ हजरत अली रज अल्लाहहु
  438. 20:27ताला अनू की बातें सुन रहे थे। फिर आपने
  439. 20:29अर्ज किया जब मैं उसकी चाल और उसके इरादे
  440. 20:32को समझ गया तब मैंने जमीन से एक मुट्ठी
  441. 20:35रेत उठाई उसके बाद मैंने अल्लाह ताला की
  442. 20:38बारगाह में दुआ की कि ऐ अल्लाह अपने
  443. 20:41प्यारे हबीब नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि
  444. 20:44वसल्लम की इज्जत शान और दीन की हिफाजत
  445. 20:47फरमा। आपने आगे फरमाया [संगीत] उसके बाद
  446. 20:50मैंने वही मुट्ठी भर रेत इस फकीर की झोली
  447. 20:53में डाल दी। लेकिन उसके बाद क्या हुआ इसका
  448. 20:56मुझे भी कोई इल्म नहीं था। अभी आप सब की
  449. 20:58बातों से मुझे मालूम हुआ कि वह रेत अल्लाह
  450. 21:00ताला के हुक्म से कीमती हीरे और जवाहरात
  451. 21:03में बदल गई। यह सुनते ही वहां मौजूद लोग
  452. 21:06हैरत में डूब गए। हर तरफ सन्नाटा छा गया।
  453. 21:09हर शख्स इस अजीब वाक्य पर गहरी हैरत का
  454. 21:12इजहार कर रहा था। लेकिन इस पूरे मंजर का
  455. 21:15सबसे ज्यादा असर उस गरीब फकीर के दिल पर
  456. 21:18हुआ। उसकी आंखों से बेख्तियार आंसू बहने
  457. 21:21लगे। वह कांपती हुई आवाज में [संगीत] अर्ज
  458. 21:23करने लगा। या रसूल अल्लाह मैंने अपनी
  459. 21:26आंखों से देखा था कि हजरत अली रज्लाहु
  460. 21:29ताला अनू ने मेरी झोली में सिर्फ एक
  461. 21:31मुट्ठी रेत डाली थी। लेकिन जब [संगीत]
  462. 21:33मैंने झोली खोली तो उसमें रेत नहीं बल्कि
  463. 21:36चमचमाते हुए हीरे और बेशकीमत जवाहरात
  464. 21:40मौजूद थे। वह रोते हुए कहने लगा मैंने जो
  465. 21:43कुछ अपनी आंखों से देखा है उसके बाद मैं
  466. 21:46इस हकीकत का इंकार नहीं कर सकता। फिर उसकी
  467. 21:49आवाज भर आई और उसने अर्ज किया या रसूल
  468. 21:52अल्लाह अब मुझे पूरा यकीन हो गया है कि आप
  469. 21:54अल्लाह ताला के सच्चे रसूल हैं और आपका
  470. 21:57दीन ही हक का दीन है। मैं अब और देर नहीं
  471. 22:00करना चाहता। मुझे कलमा पढ़ा दीजिए। मैं
  472. 22:03इस्लाम कबूल करना चाहता हूं। यह सुनते ही
  473. 22:06वहां मौजूद [संगीत] सहाबा ए इकराम
  474. 22:08रज़्लाहु ताला अनम के चेहरों पर खुशी की
  475. 22:11लहर दौड़ गई। उस गरीब फकीर की आंखों से भी
  476. 22:14खुशी के आंसू बह रहे थे। कुछ ही देर पहले
  477. 22:17जो दिल बेबसी, मायूसी और परेशानी से भरा
  478. 22:20हुआ था, अब वही दिल ईमान [संगीत] की रोशनी
  479. 22:23से मुनव्ववर हो चुका था। प्यारे दोस्तों,
  480. 22:26अगर आपको यह वाकया अच्छी लगी हो, तो इस
  481. 22:29वीडियो को लाइक करें और हमारे चैनल को
  482. 22:32सब्सक्राइब करके कमेंट [संगीत] में आमीन
  483. 22:34जरूर लिखें। यह

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