श्री यंत्र का रहस्य क्या है? | #mythology #shreeyantra #tranding #viral #new #story #hindi — Transcript
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- 0:00क्या आप विश्वास करेंगे कि आज से हजारों
- 0:03वर्ष पहले रचा गया एक ज्यामतीय नक्शा आज
- 0:08के आधुनिक सुपर कंप्यूटरों के [संगीत]
- 0:10एल्गोरिदम को भी खुली चुनौती दे सकता है।
- 0:14एक ऐसा चित्र जिसमें केवल नौ त्रिकोण एक
- 0:17दूसरे को इस तरह काटते हैं कि [संगीत] ना
- 0:20एक रेखा अपनी जगह से हिल सकती है और ना
- 0:23कोई कोण 1 मिलमीटर भी झुक सकता है।
- 0:25[संगीत]
- 0:26यदि आप एक भी रेखा में सुई की नोक के
- 0:29बराबर भी विचलन लाते हैं तो पूरा ढांचा
- 0:31ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। सदियों
- 0:34से दुनिया इसे केवल एक धार्मिक प्रतीक
- 0:36मानती आई है। लेकिन गहराई से देखिए। यह
- 0:38केवल आस्था नहीं है। [संगीत] यह प्राचीन
- 0:40भारत की सबसे उन्नत, रहस्यमई और अचूक
- 0:44मेट्रोलॉजी यानी मापन विज्ञान की
- 0:46पराकाष्ठा है। इसे कहा जाता है श्री
- 0:50यंत्र। यह कोई [संगीत] काल्पनिक रचना नहीं
- 0:53है बल्कि यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति मानव
- 0:57शरीर की [संगीत] सूक्ष्म संरचना और ध्वनि
- 0:59तरंगों का एक दृश्यमान गणितीय सूत्र है।
- 1:03आखिर कैसे बिना किसी आधुनिक कंप्यूटर के
- 1:06बिना लेजर पैमानों के हमारे पूर्वजों ने
- 1:09इस असंभव ज्यामिति को सिद्ध किया। आइए
- 1:11भक्ति और गणित के इस महासंगम की परतों को
- 1:14एक-एक करके खोलते हैं। श्री यंत्र को पहली
- 1:17नजर [संगीत] में देखने पर यह केवल कई सारे
- 1:20त्रिकोणों का एक उलझा हुआ जाल प्रतीत होता
- 1:23है। परंतु इसकी पूरी नींव [संगीत]
- 1:25मात्र नौ अंतर्निहित त्रिकोणों पर टिकी
- 1:28है। ध्यान से समझिए। इन नौ में से चार
- 1:31त्रिकोण ऊपर की ओर इंगित करते हैं। इन्हें
- 1:33शिवो यानी शुद्ध चेतना का प्रतीक माना गया
- 1:36है। शेष पांच त्रिकोण [संगीत] नीचे की ओर
- 1:39मुख किए हुए हैं। जिन्हें शक्ति यानी
- 1:42सक्रिय प्रकृति का रूप कहा गया है। यह चार
- 1:45और पांच का अनुपात पुरुष और प्रकृति चेतना
- 1:48और पदार्थ के शाश्वत संतुलन को दर्शाता
- 1:51है। परंतु असली पहेली इनके मापन में है।
- 1:54आधुनिक ज्यामिति में इसे ओवरडिटरमाइंड
- 1:56सिस्टम कहा जाता है। जब यह नौ त्रिकोण एक
- 1:59दूसरे को काटते हैं, [संगीत] तो इनसे 43
- 2:01छोटे त्रिकोणों का जन्म होता है। प्रत्येक
- 2:04त्रिकोण का शीर्ष किसी न किसी दूसरी रेखा
- 2:07के बिल्कुल केंद्र या संगम बिंदु पर जाकर
- 2:09मिलता है। इसे संस्कृत में मर्म स्थान कहा
- 2:12गया है। [संगीत] आधुनिक गणितज्ञों का
- 2:14स्पष्ट मानना है कि जब आप श्री यंत्र को
- 2:16बिल्कुल सटीक रूप में हाथ से बनाने का
- 2:18प्रयास करते हैं, [संगीत] तो रेखाओं के
- 2:20बीच में एक अत्यंत सूक्ष्म फासला आ जाता
- 2:23है। जिसे विज्ञान की भाषा में एरर ऑफ
- 2:25क्लोज़र कहते हैं। [संगीत] यदि नौ मूल
- 2:28त्रिकोणों के कोण सटीक दशमलव तक सही ना
- 2:30हो, तो यह 43 त्रिकोण कभी आपस में पूर्णतः
- 2:34मिल ही नहीं सकते। 1980 के दशक में जब
- 2:38आधुनिक कंप्यूटर वैज्ञानिकों ने इस आकृति
- 2:40को डिजिटल स्क्रीन पर पूरी शुद्धता के साथ
- 2:43उकेरने की कोशिश की। तो उन्हें दर्जनों
- 2:46जटिल समीकरणों [संगीत] को एक साथ हल करना
- 2:48पड़ा। प्रश्न उठता है हजारों साल पहले
- 2:52बिना किसी स्क्रीन बिना किसी कैलकुलेटर के
- 2:56प्राचीन ऋषियों ने यह सूक्ष्म कोणीय
- 2:59सटीकता कैसे प्राप्त की? श्री यंत्र केवल
- 3:01एक समतल कागज पर खींचा गया आरेख नहीं है।
- 3:04यह नौ अलग-अलग स्तरों, नौ आयामों में फैला
- 3:07हुआ एक ब्रह्मांडीय नक्शा है। दार्शनिक
- 3:09परंपरा में इसे नव आवरण कहा गया है। इसके
- 3:13बिल्कुल केंद्र में स्थित [संगीत] है
- 3:14बिंदु। यह वह सूक्ष्मतम स्थान है जहां कोई
- 3:18भौतिक विस्तार नहीं होता। ना लंबाई, ना
- 3:21चौड़ाई, [संगीत] ना मोटाई। यह आधुनिक खगोल
- 3:24भौतिकी के उस सिंगुलरिटी बिंदु के समान
- 3:26है। [संगीत] जहां से महाविफोट यानी बिग
- 3:29बैंग के समय संपूर्ण सृष्टि का जन्म हुआ
- 3:31था। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल केंद्र
- 3:34और परम चेतना का वास है। [संगीत] बिंदु के
- 3:37बाहर पहला त्रिकोण आता है त्रिकोण चक्र।
- 3:41इसके बाद क्रमशः आठ त्रिकोणों का समूह,
- 3:43फिर 10 त्रिकोणों के दो चक्र और फिर 14
- 3:46त्रिकोणों का एक विशाल चक्र बनता है।
- 3:49[संगीत] त्रिकोणों के इस गणितीय चक्रव्यूह
- 3:51के ठीक बाहर आता है। आठ पंखुड़ियों वाला
- 3:54कमल जिसे अष्टदल पद्म कहते हैं। उसके बाहर
- 3:5816 पंखुड़ियों वाला कमल खिलता है। और सबसे
- 4:01अंत में चारों दिशाओं में द्वारों वाला
- 4:04तीन समानांतर रेखाओं का एक चौकोर परकोटा
- 4:07आता है जिसे भूपुर कहा जाता है। यह भूपुर
- 4:10[संगीत] स्थूल पृथ्वी तत्व का प्रतीक है।
- 4:14इसकी मेटोलॉजी देखिए। चारों दिशाओं के
- 4:16द्वार बिल्कुल समान दूरी और अचूक अनुपात
- 4:19में विभाजित हैं। [संगीत] साधना परंपरा
- 4:22में जब कोई साधक श्री यंत्र का ध्यान करता
- 4:24है तो वह बाहर के संसार यानी भूपुर से
- 4:27[संगीत] अपनी यात्रा प्रारंभ करता है और
- 4:29धीरे-धीरे अपने मन को केंद्र के बिंदु की
- 4:31ओर समेटता जाता [संगीत] है। इसे संहार
- 4:34क्रम कहा जाता है। यानी स्थूल संसार से
- 4:37सूक्ष्म आत्म चेतना की ओर अंतर यात्रा और
- 4:40जब चेतना बिंदु से बाहर की ओर फैलती है तो
- 4:43उसे सृष्टि क्रम कहते हैं। यह मापन
- 4:45[संगीत] केवल दृष्टि को सुंदर दिखने के
- 4:47लिए नहीं बनाया गया था। यह मानव चेतना को
- 4:50एकाग्रता के सर्वोच्च आयाम तक पहुंचाने के
- 4:53लिए रचा गया एक दृश्य ज्यामतीय [संगीत]
- 4:55साधन था। जो लोग श्री यंत्र को केवल कागज
- 4:58या धातु की चादर पर खुला हुआ देखते हैं।
- 5:01वे इसके वास्तविक स्वरूप के केवल आधे भाग
- 5:04को जानते हैं। श्री यंत्र का वास्तविक मूल
- 5:07रूप त्रिआयामी है। 3D है जिसे कहा जाता है
- 5:10महामेरु। जब नौ त्रिकोणों के समतल जाल को
- 5:14ऊपर की ओर उठाया जाता है तो यह एक अत्यंत
- 5:17जटिल पिरामिड जैसी संरचना में परिवर्तित
- 5:20हो जाता है। यहां मापन विज्ञान का वह
- 5:22चमत्कार प्रकट होता है जो आज के श्रेष्ठ
- 5:25वास्तुकारों को भी चकित कर दे। महामेरु की
- 5:29प्रत्येक परत की ऊंचाई और उसके आधार का
- 5:32फैलाव एक निश्चित स्वर्णिम अनुपात से बना
- 5:35हुआ है। यदि आप इसे सीधे ऊपर से देखें तो
- 5:37[संगीत] यह बिल्कुल वही समतल श्री यंत्र
- 5:39नजर आता है। परंतु यदि आप इसे एक तरफ से
- 5:41देखें तो यह एक दिव्य पर्वत शिखर की भांति
- 5:44ऊपर उठता हुआ दिखाई देता है। प्राचीन
- 5:46ग्रंथों, सौंदर्य लहरी और काम्य कला विलास
- 5:50में इसका निर्माण [संगीत] अष्ट धातु पारे
- 5:53के मिश्रण अथवा शुद्ध स्फटिक से करने का
- 5:56स्पष्ट निर्देश मिलता है। स्फटिक यानी
- 6:00क्वार्ड्स क्रिस्टल से निर्मित महामेरु
- 6:02सबसे दुर्लभ माना गया है। विज्ञान जानता
- 6:05है कि क्वार्ड्स क्रिस्टल में
- 6:06पीजोइलेक्टिक गुण होते हैं। अर्थात
- 6:08[संगीत]
- 6:08भौतिक दबाव या सूक्ष्म कंपन मिलने पर यह
- 6:11क्रिस्टल विद्युत तरंगे और स्थिर आवृत्ति
- 6:14उत्पन्न [संगीत] करने लगता है। जब प्राचीन
- 6:16शिल्पी स्फटिक के एक ठोस टुकड़े को तराश
- 6:19कर महामेरु का रूप देते थे तो उनके पास
- 6:22चुप करने [संगीत] की कोई गुंजाइश नहीं
- 6:24होती थी। छेनी का एक गलतवार और पूरे
- 6:27स्फटिक की आंतरिक ज्यामतीय तरंगे खंडित हो
- 6:30जाती थी। महामेरु के प्रत्येक ढलान का
- 6:33झुकाव कोण लगभग 51 से 52 डिग्री के आसपास
- 6:36[संगीत] बैठता है। और सबसे बड़ा आश्चर्य
- 6:39यह है कि यही कोण मिस्र के गीजा के विशाल
- 6:42पिरामिड के ढलानों में भी हूबहू पाया जाता
- 6:45है। क्या यह महज एक इत्तेफाक था या फिर
- 6:49हमारे पूर्वजों के पास कॉस्मिक एनर्जी
- 6:52यानी ब्रह्मांडीय ऊर्जा को एक केंद्र पर
- 6:54बांधने का कोई सार्वभौमिक जमितीय रहस्य
- 6:57मौजूद था। प्राचीन भारतीय दर्शन का एक अटल
- 7:00नियम है। यथापिंडे तथा ब्रह्मांडे और नाद
- 7:03ब्रह्म अर्थात संपूर्ण सृष्टि का मूल आधार
- 7:06केवल और केवल ध्वनि कंपन है। प्रत्येक
- 7:10मंत्र का एक रूप होता है और प्रत्येक
- 7:12जमितीय रूप के पीछे एक ध्वनि तरंग छिपी
- 7:15होती है। 20वीं सदी में आधुनिक विज्ञान ने
- 7:18एक नया क्षेत्र खोजा जिसे सिमेटिक्स कहा
- 7:21गया। यानी ध्वनि तरंगों का दृश्य आकारों
- 7:23में रूपांतरण। वैज्ञानिकों ने प्रयोगों
- 7:27में पाया कि जब [संगीत] किसी धातु की पतली
- 7:30सतह पर बारीक कण फैलाकर उन पर विभिन्न
- 7:34आवृत्तियों [संगीत] की ध्वनियां प्रवाहित
- 7:37की जाती हैं तो वे कण अपने आप सुंदर
- 7:40[संगीत] ज्यामतीय डिजाइनों में व्यवस्थित
- 7:43होने लगते हैं। 1960 के दशक में स्विस
- 7:47वैज्ञानिक हेंस जेनी ने जब टोनोस्कोप
- 7:49[संगीत] नामक उपकरण से विभिन्न ध्वनियों
- 7:51के कंपनों का परीक्षण किया, तो एक
- 7:53विस्मयकारी दृश्य सामने आया। जब उन्होंने
- 7:56ओंकार यानी ओ की मूल वैदिक ध्वनि को उस
- 8:00यंत्र में प्रवाहित किया तो उस कंपन से
- 8:03प्लेट पर बिखरे हुए कणों ने बिल्कुल
- 8:05[संगीत] वही संरचना बनानी शुरू कर दी जो
- 8:07श्री यंत्र के केंद्रीय त्रिकोणों में पाई
- 8:09जाती है। इसने आधुनिक विज्ञान के सामने यह
- 8:12प्रमाणित कर दिया कि श्री यंत्र किसी
- 8:15कलाकार की कल्पना नहीं है। यह ओ के
- 8:18सार्वभौमिक नाद का [संगीत] भौतिक और दृश्य
- 8:21रूप है। जिस प्रकार किसी विशेष सिग्नल को
- 8:24पकड़ने के लिए एक एंटीना को बेहद सटीक कोण
- 8:27और लंबाई में काटा जाता है, ठीक उसी तरह
- 8:30श्री यंत्र को एक आध्यात्मिक एंटीना बनाया
- 8:33गया था। इसका मापन इसलिए बाल बराबर भी गलत
- 8:37नहीं होना चाहिए था। क्योंकि जब इसके
- 8:39सम्मुख वैदिक मंत्रों का उच्चारण होता था
- 8:42तो वे ध्वनि तरंगे उस धातु की ज्यामिति से
- 8:45टकराकर एक विशेष प्रकार का अनुनाद यानी
- 8:48एकॉस्टिक रेजोनेंस उत्पन्न करती थी। यदि
- 8:51रेखाओं के कोण में जरा सा भी अंतर आ जाए
- 8:54तो वह कंपन वह ऊर्जा का केंद्र कभी जागृत
- 8:58नहीं हो सकता था। [संगीत] यही कारण था कि
- 9:00श्री यंत्र का निर्माण करने वाले शिल्पी
- 9:03केवल मूर्तिकार नहीं थे। [संगीत] वे उच्च
- 9:05कोटि के गणितज्ञ, खगोल शास्त्री और गहन
- 9:09साधक हुआ करते थे। आधुनिक तंत्रिका
- 9:11विज्ञान यानी न्यूरोसाइंस ने जब श्री
- 9:13यंत्र का मस्तिष्क पर प्रभाव जां तो
- 9:16परिणाम अत्यंत चौंकाने वाले थे। जब कोई
- 9:18व्यक्ति शांत बैठकर श्री यंत्र के केंद्र
- 9:21बिंदु पर अपनी दृष्टि स्थिर करता है जिसे
- 9:24त्राटक कहा जाता है तो उसके मस्तिष्क में
- 9:26एक विशिष्ट परिवर्तन दर्ज होता है। शोध
- 9:29बताते हैं कि श्री यंत्र की पूर्ण समरूपता
- 9:32मानव मस्तिष्क के दोनों हिस्सों को
- 9:34[संगीत] बाएं मस्तिष्क जो तर्क और
- 9:36विश्लेषण करता है और दाएं मस्तिष्क
- 9:39[संगीत]
- 9:39जो भावना और अंतर्ज्ञान का केंद्र है
- 9:42दोनों को एक ही समय में संबित कर देती है।
- 9:45[संगीत] इसकी जटिल रेखाओं को देखते ही
- 9:48मस्तिष्क की तनावपूर्ण बीटा तरंगे शांत
- 9:50पड़ने लगती [संगीत] हैं और मस्तिष्क तुरंत
- 9:52अल्फा तरंगों की गहरी शांत अवस्था में
- 9:55प्रवेश कर जाता है। अल्फा तरंगे वही
- 9:58मानसिक स्थिति है [संगीत] जहां भय समाप्त
- 10:00होता है। रचनात्मकता का उदय होता है और
- 10:02अंतः प्रज्ञा जागती है और यदि आप इसके
- 10:06गणित के और भीतर उतरेंगे तो आपको दिखाई
- 10:08देगा प्रकृति का सबसे गहरा रहस्य गोल्डन
- 10:11रेशियो यानी 1.618 [संगीत]
- 10:14वही स्वर्णिम अनुपात जिससे डीएनए की सीढ़ी
- 10:17बनी है जिससे दूर स्थित आकाशगंगाओं के
- 10:20भंवर घूमते हैं जिससे समुद्र का शंख आकार
- 10:22लेता है और [संगीत] जिससे आपके अपने शरीर
- 10:24के अंग गड़े गए हैं। श्री यंत्र उस
- 10:27संपूर्ण सृष्टि के स्वर्णिम अनुपात का एक
- 10:31सजीव ज्यमतीय प्रमाण है। आज 21वीं सदी में
- 10:35जब हम मापन विज्ञान और मेटोलॉजी का नाम
- 10:37लेते हैं तो हमारा ध्यान लेजर बीम्स,
- 10:40एटॉमिक [संगीत] क्लॉक्स और डिजिटल
- 10:42माइक्रोमीटर्स की ओर जाता है। लेकिन
- 10:44हजारों वर्ष पूर्व बिना किसी आधुनिक उपकरण
- 10:48के इस स्तर की ज्यामतीय पूर्णता हासिल
- 10:50करना केवल बुद्धिमत्ता नहीं थी। इस बात का
- 10:53जीवन प्रमाण था कि [संगीत] हमारे पूर्वजों
- 10:56ने केवल पत्थरों और रेखाओं को नहीं नापा
- 10:58था। उन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड के आंतरिक
- 11:00नियमों को नाप लिया था। श्री यंत्र केवल
- 11:02तांबे पर खोदी हुई लकीरें नहीं है। यह वह
- 11:06अंतिम बिंदु है जहां विज्ञान की सारी
- 11:08सीमाएं समाप्त हो जाती हैं और परम चेतना
- 11:11का अनुभव आरंभ होता है। यह हमें स्मरण
- 11:14कराता है कि [संगीत] सनातन परंपरा में
- 11:16ज्ञान और भक्ति दो विपरीत किनारे कभी नहीं
- 11:19थे। सत्य की तार्किक खोज का नाम विज्ञान
- 11:22था और [संगीत] उसी सत्य के समक्ष मौन हो
- 11:24जाने का नाम भक्ति था। अगली बार जब आपकी
- 11:27दृष्टि किसी श्री यंत्र पर पड़े तो उसे
- 11:30केवल एक साधारण धार्मिक प्रतीक समझकर
- 11:32अनदेखा मत कीजिएगा। कुछ क्षण रुकिएगा।
- 11:34गहरी दृष्टि से उस ज्यामिति को देखिएगा और
- 11:37महसूस कीजिएगा कि आप इस चित्र को नहीं
- 11:40[संगीत] बल्कि स्वयं ब्रह्मांड के उस अगाध
- 11:42अचूक रहस्य को देख रहे हैं जो हजारों
- 11:45वर्षों से समय के सीने पर अपनी पूर्णता की
- 11:48गवाही दे रहा है। अगर आपको भारतीय पौराणिक
- 11:50ज्ञान को आधुनिक विज्ञान की [संगीत]
- 11:52दृष्टि से समझना पसंद है तो हमारे साथ
- 11:55जुड़े रहिए। सब्सक्राइब कीजिए [संगीत]
- 11:58क्योंकि यहां हर परंपरा के पीछे छिपे
- 12:00ज्ञान को तर्क, विज्ञान [संगीत]
- 12:03और इतिहास के आईने में समझने की कोशिश
- 12:05होती है।
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