Mystery of Konark Sun Temple || The Real History — Transcript
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- 0:00साल था 1903 बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर
- 0:04जे ए बर्डल अपनी टीम के साथ उड़ीसा के
- 0:07[संगीत] कोणार्क सूर्य मंदिर पहुंचे। यह
- 0:09कोई साधारण दौरा नहीं था क्योंकि उस दिन
- 0:12उन्होंने मंदिर के अंदर कुछ ऐसा [संगीत]
- 0:13देखा जिसके बाद उन्होंने मंदिर के गर्भ
- 0:17गृह को रेत और बालू से पूरी तरह भर देने
- 0:20का आदेश दे दिया और साथ ही [संगीत] इस 800
- 0:23साल से भी अधिक पुराने मंदिर को हमेशा के
- 0:25लिए बंद करने का भी निर्देश जारी किया। आज
- 0:29लगभग 123 साल [संगीत] बीत चुके हैं। लेकिन
- 0:32सवाल आज भी वही है कि आखिर गर्भगृह के
- 0:35अंदर ऐसा कौन सा खौफनाक [संगीत] मंजर या
- 0:38गहरा राज था जिसे दुनिया से छुपाना इतना
- 0:41जरूरी था। आज कोणार्क को हम खंडहर कहते
- 0:44हैं। पर कभी यही मंदिर समुद्र में सफर
- 0:47करने वाले नाविकों के लिए एक डरावना संकेत
- 0:50था। जो भी नाव इस मंदिर के पास से गुजरती
- 0:53वह या तो रास्ता भटक जाती थी या फिर
- 0:56समुद्र में डूब जाती थी। इसी कारण
- 0:58पुर्तगाली नाविकों [संगीत] ने इस मंदिर को
- 1:00ब्लैक पगोड़ा का नाम दिया था। आखिर ऐसा
- 1:03क्या था कोणार्क में जो बड़े-बड़े नावों
- 1:05को भी डूबा दे।
- 1:10उड़ीसा में समुद्र तट के पास [संगीत] बसा
- 1:13यह कोणार्क मंदिर 800 साल से भी ज्यादा
- 1:16पुराना बताया जाता है। यह मंदिर भारत की
- 1:19अद्भुत वास्तुकला का प्रमाण है कि कैसे आज
- 1:23से [संगीत] 800 साल पहले जब ना तो सीमेंट
- 1:26का आविष्कार हुआ था और ना ही कन जैसी
- 1:29मशीनें तब कैसे हमारे [संगीत] पूर्वजों ने
- 1:31अत्याधुनिक आयरन लॉक सिस्टम का उपयोग कर
- 1:35इस अकल्पनीय ढांचे को खड़ा किया और आखिर
- 1:38वो कौन सी तकनीक [संगीत] थी जिसने भगवान
- 1:41सूर्य की अष्ट धातु की मूर्ति बिना किसी
- 1:44आधार के हवा में तैरती रहती थी और क्या
- 1:47हुआ जब इस [संगीत] मंदिर के निर्माण के
- 1:49दौरान एक 12 साल के बच्चे ने अपनी जान दे
- 1:52दी और कौन था जिसने [संगीत] इस मंदिर को
- 1:54बनवाया? यह मंदिर अपने समय से कहीं आगे
- 1:57था। सूर्यदेव के रथ के आकार का बना यह
- 2:00मंदिर [संगीत] आज भी लोगों को हैरान कर
- 2:02देता है। इस रथ के पहिए आज भी बिना किसी
- 2:05घड़ी के सटीक समय बता देते हैं। आखिर यह
- 2:08सब कैसे संभव है? आखिर हमारे पूर्वजों के
- 2:12पास ऐसी कौन [संगीत] सी तकनीक थी जिसे आज
- 2:14भुला दिया गया है? और सबसे बड़ा सवाल कि
- 2:17आखिर ऐसा क्या हुआ कि इतना भव्य मंदिर
- 2:20[संगीत] खंडहर बन गया? क्या यह उस 12 साल
- 2:23के बच्चे का श्राप था या आक्रमणकारियों की
- 2:26साजिश? तो आज के इस वीडियो में हम जानेंगे
- 2:29[संगीत] उड़ीसा के कोनार्क सूर्य मंदिर के
- 2:31निर्माण की कहानी कि कैसे यह [संगीत]
- 2:34मंदिर बना। साथ ही जानेंगे इसकी अद्भुत
- 2:36तकनीकों के बारे में जो आज भी वैज्ञानिकों
- 2:39को हैरान कर देती हैं। लेकिन उससे पहले
- 2:42अगर आपको वीडियो अच्छी लग रही है तो इसे
- 2:45एक लाइक जरूर करें।
- 2:57[संगीत]
- 3:17[संगीत]
- 3:18कोणार्क की भव्यता को समझने के लिए हमें
- 3:20इतिहास के पन्नों [संगीत] से भी पीछे
- 3:23द्वापर युग के उस कालखंड में जाना जाना
- 3:25होगा। जहां इस मंदिर की नींव एक राजा
- 3:28कीत्वाकांक्षा [संगीत] से नहीं बल्कि एक
- 3:30पुत्र के पश्चाताप से पड़ी थी। यह कहानी
- 3:33है भगवान श्री कृष्ण और जामवती के पुत्र
- 3:36सांप की जो अपनी अकल्पनीय सुंदरता और
- 3:40आकर्षक व्यक्तित्व के लिए पूरे आर्यावर्त
- 3:42में प्रसिद्ध थे। लेकिन यही सुंदरता उनके
- 3:46अहंकार का कारण बन गई और वे अक्सर रेशियों
- 3:49और बड़ों का उपहास उडाया करते थे। पौराणिक
- 3:52ग्रंथों विशेषकर साम पुराण और भविष्य
- 3:56पुराण के अनुसार देवर्षि नारद साम [संगीत]
- 3:59के इस व्यवहार से क्षुब्ध थे और उन्होंने
- 4:01उन्हें सबक सिखाने की एक योजना बनाई। नारद
- 4:04[संगीत] ने साम को बहलाकर उस सरोवर के पास
- 4:07भेज दिया जहां उनकी सौतेली माताएं यानी कि
- 4:10श्री कृष्ण की अन्य रानियां स्नान कर रही
- 4:13थी। जब भगवान श्री कृष्ण ने अपने पुत्र को
- 4:15वहां देखा तो वे क्रोध से भर गए। उन्होंने
- 4:18इसे एक अक्षम्य अपराध माना और सांप को
- 4:21कुष्ठ रोग का भीषण श्राप दे दिया। क्षण भर
- 4:24में ही सांप का वो कंचन जैसा शरीर विकृत
- 4:27हो गया। अंग शून्य पड़ने लगे और पूरा शरीर
- 4:30[संगीत] कष्टदायक फोड़ों से भर गया।
- 4:32अत्यधिक पीड़ा और ग्लानी में डूबे सांप जब
- 4:35अपने पिता के चरणों में गिरे और अपनी
- 4:38निर्दोषता की गुहार लगाई तब श्री कृष्ण को
- 4:41नारद की युक्ति का पता चला। क्योंकि श्राप
- 4:44वापस नहीं लिया जा सकता था [संगीत] इसलिए
- 4:46उन्होंने शाम को सूर्यदेव की शरण में जाने
- 4:49की सलाह दी क्योंकि केवल सूर्य ही
- 4:51आरोग्यता [संगीत] के देवता और समस्त त्वचा
- 4:54रोगों के निवारक माने जाते हैं। महर्षि
- 4:57कटक के मार्गदर्शन में सामने ओसा के
- 5:00समुद्र तट पर स्थित मित्रवण को अपनी
- 5:03तपस्थली चुना। जहां चंद्रभागा नदी का
- 5:06पवित्र संगम समुद्र से होता था। यहां शुरू
- 5:09हुआ साम का 12 वर्षों का वह कठिन संघर्ष
- 5:12जिसने उनके अस्तित्व को बदल कर रख दिया।
- 5:15अन्न जल का त्याग कर भीषण गर्मी और
- 5:18तूफानों के बीच सामने शाख द्वीपी विधि से
- 5:21[संगीत] सूर्य की कठोर आराधना की। उनकी
- 5:24तपस्या की तीव्रता इतनी अधिक थी कि अंततः
- 5:28[संगीत] सूर्य देव स्वयं प्रकट हुए और
- 5:30उन्हें रोग मुक्त होने का वरदान दिया।
- 5:33वरदान प्राप्त होते ही जैसे ही सामने ने
- 5:35चंद्रभागा के पवित्र जल में स्नान किया
- 5:38उनका शरीर पुनः पहले जैसा कांतिवान और
- 5:41स्वस्थ हो गया। कृतज्ञता के भाव से भरकर
- 5:45साम ने उसी स्थान पर सूर्यदेव का एक भव्य
- 5:47मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। लोक कथाओं
- 5:50के अनुसार स्नान के दौरान साम को नदी की
- 5:53धारा में सूर्यदेव की एक अद्भुत मूर्ति
- 5:55मिली। उन्होंने इसी मूर्ति को वहां
- 5:58स्थापित किया जिसे आज हम कोणार्क के
- 6:00[संगीत] नाम से जानते हैं। जहां कोण का
- 6:03अर्थ है दिशा या कोना और अर्क का अर्थ है
- 6:06सूर्य। इस प्रकार [संगीत] कोणार्क मात्र
- 6:09एक स्थापत्य नहीं बल्कि सांप की भक्ति और
- 6:12सूर्य की उपचारात्मक शक्ति का एक जीवित
- 6:14प्रमाण बन गया। यही कारण है कि आज भी माघ,
- 6:18शुक्ल सप्तमी या शाम, दशमी के दिन हजारों
- 6:21श्रद्धालु चंद्रभागा में डुबकी लगाकर उस
- 6:24प्राचीन परंपरा को जीवित रखते हैं। लेकिन
- 6:27यह कहानी हमें हमारे धर्म ग्रंथों [संगीत]
- 6:29में मिलती है। पर इतिहास में इसका निर्माण
- 6:33गंग वंश से जोड़ा जाता है। [संगीत] यह वही
- 6:35वंश है जिसने जगन्नाथ मंदिर का भी निर्माण
- 6:38किया था। तो चलिए [संगीत] अब जानते हैं
- 6:41कोणार्क सूर्य मंदिर का असली इतिहास और
- 6:44असली रहस्य।
- 6:52समय के साथ ओसा का यह स्थान प्रसिद्ध होने
- 6:54लगा। दूसरी शताब्दी ईस्वी [संगीत] में
- 6:57ग्रीक भूगोलवेता क्लोडियस टॉलेमी यहां आए
- 7:00थे और उन्होंने इस स्थान [संगीत] को
- 7:02कन्नागरा के नाम से एक प्रसिद्ध बंदरगाह
- 7:05बताया। उनके बाद सातवीं शताब्दी ईवी में
- 7:09चीनी यात्री हुन सांग यहां आए और उन्होंने
- 7:12यहां कई भव्य और ऊंची इमारतों का वर्णन
- 7:15किया जहां विभिन्न धर्मों के लोग रहते थे।
- 7:18लेकिन इसका असली इतिहास तो 13वीं शताब्दी
- 7:21में शुरू होता है। 13वीं शताब्दी आते-आते
- 7:25यह क्षेत्र समुद्री व्यापार, बंदरगाह
- 7:28गतिविधियों और सीमा संघर्षों सबका केंद्र
- 7:31बन [संगीत] चुका था और इस समय गंगवंश यहां
- 7:34शासन कर रहा था। इतिहासकारों और पुरातत्व
- 7:38विदों के अनुसार [संगीत] जिस मंदिर को आज
- 7:40हम देख रहे हैं, वह सूर्यदेव की आराधना का
- 7:43चौथा और सबसे विशाल स्वरूप है। इस अद्भुत
- 7:46संरचना का निर्माण पूर्वी गंग वंश के
- 7:49प्रतापी राजा लांगलू नरसिंह देव प्रथम के
- 7:53शासनकाल में हुआ था। ऐतिहासिक दस्तावेजों
- 7:56खासकर केंदू ताम्रपत्र शिलालेख के अनुसार
- 7:59इस मंदिर का निर्माण कार्य 1238 ईसवी से
- 8:031264 ईसवी के बीच [संगीत] संपन्न हुआ था।
- 8:06लेकिन इस महापरियो के पीछे एक अत्यंत
- 8:10भावनात्मक और धार्मिक प्रेरणा [संगीत]
- 8:12जुड़ी थी। और वह प्रेरणा थी राजमाता
- 8:15कस्तूरी देवी की एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक
- 8:18प्रसंग के अनुसार राजमाता ने अपने पुत्र
- 8:21नरसिंह देव को याद दिलाया था कि उनके
- 8:24पूर्वजों ने जिस [संगीत] तरह पूरी में
- 8:26भगवान जगन्नाथ का विश्व प्रसिद्ध मंदिर
- 8:28बनवाया जो आज भी करोड़ों लोगों की आस्था
- 8:31का केंद्र है। उन्होंने आग्रह किया कि
- 8:34सूर्यदेव जिनके बिना पृथ्वी पर जीवन संभव
- 8:37नहीं है। उनके सम्मान में एक ऐसा अद्वितीय
- 8:39मंदिर बनाया जाए जो जगन्नाथ मंदिर की
- 8:42भव्यता को टक्कर दे सके और गंगवंश की
- 8:45शक्ति को पूरी दुनिया के सामने प्रदर्शित
- 8:47करें। माता के इसी संकल्प को पूरा करने के
- 8:50लिए राजा ने अपने राज्य के खजाने का एक
- 8:53बड़ा हिस्सा [संगीत] और 12 वर्षों का
- 8:56राजस्व इस मंदिर के निर्माण में लगा दिया।
- 8:59[संगीत] यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल
- 9:01नहीं बल्कि एक राजनैतिक घोषणा [संगीत] भी
- 9:04थी। क्योंकि नरसिंह देव प्रथम ने उस दौर
- 9:07में कई विदेशी आक्रमणकारियों को परास्त
- 9:09[संगीत] किया था और यह मंदिर उनकी उन
- 9:11विजयों का एक विजय स्तंभ माना जाता है।
- 9:14इतिहास के गलियारों में इस मंदिर [संगीत]
- 9:16की भव्यता का जिक्र सम्राट अकबर के दरबारी
- 9:20इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी प्रसिद्ध
- 9:23पुस्तक आईने एअ अकबरी में भी किया है।
- 9:28580 ईसवी में जब अबुल फजल ने ओसा का दौरा
- 9:32किया तो वे इस मंदिर को देखकर दंग रह गए
- 9:34थे। उन्होंने लिखा था कि इस मंदिर की
- 9:37सुंदरता और इसके निर्माण की लागत का
- 9:40अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। उनके विवरण
- 9:42से यह भी स्पष्ट होता है कि 16वीं शताब्दी
- 9:45के अंत तक यह मंदिर सुरक्षित और पूजा
- 9:48[संगीत] अर्चना के लिए सक्रिय था।
- 9:50पुरातत्वविदों का मानना है कि मंदिर की
- 9:52नियम रखने के लिए [संगीत] समुद्र के पास
- 9:54की भूमि को विशेष रूप से तैयार किया गया
- 9:57था और चंद्रभागा नदी का मार्ग इस मंदिर के
- 10:00धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व को ध्यान में
- 10:02रखकर चुना गया था। लेकिन इस मंदिर का
- 10:04निर्माण इतना भी आसान नहीं था। 12 वर्षों
- 10:08का लंबा समय 1200 से ज्यादा कारीगर और एक
- 10:1212 साल के मासूम बच्चे की आहुति इस मंदिर
- 10:15को [संगीत] इसने सदैव के लिए अमर तो बना
- 10:17दिया। लेकिन एक श्राप के साथ। तो चलिए अब
- 10:21जानते हैं मंदिर के निर्माण की कहानी।
- 10:30जब राजा नरसिंह देव प्रथम ने इस अद्भुत
- 10:32मंदिर को बनाने का संकल्प लिया तो इस
- 10:35महास्वप्न को धरातल पर उतारने के लिए
- 10:37उन्होंने उस युग के सबसे महान और अनुभवी
- 10:40वास्तुकार विषु महाराणा को मुख्य शिल्पी
- 10:42[संगीत] नियुक्त किया। बिशु महाराणा के
- 10:44नेतृत्व में पूरे आर्यावर्त से चुनकर
- 10:47[संगीत] लगभग 1200 अत्यंत कुशल कारीगर लाए
- 10:50गए। ऐतिहासिक प्रमाणों [संगीत]
- 10:52और मदाला पंजी जैसे ग्रंथों के अनुसार इस
- 10:56भव्य मंदिर के निर्माण में कुल 12 वर्षों
- 10:59का लंबा समय लगा [संगीत] जो अनुमानतः 1238
- 11:02ईसवी से 1264 ईसवी [संगीत] के बीच का
- 11:05कालखंड था। इस परियोजना की विशालता का
- 11:08अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि
- 11:10राजा ने अपने राज्य के 12 वर्षों के
- 11:13संपूर्ण राजस्व के बराबर की भारी धनराशि
- 11:16[संगीत] इस एक मंदिर पर न्योछावर कर दी
- 11:19थी। इस मंदिर की असली ताकत इसकी नक्काशी
- 11:22के पीछे छिपी व प्राचीन [संगीत]
- 11:24इंजीनियरिंग थी जो आज के आधुनिक
- 11:26वैज्ञानिकों को भी सोचने पर [संगीत] मजबूर
- 11:28कर देती है। उस दौर में जब ना तो सीमेंट
- 11:32का आविष्कार हुआ था [संगीत] और ना ही कन
- 11:34जैसी मशीनें थी तब पत्थरों को जोड़ने के
- 11:37लिए एक अद्भुत आयरन लॉक [संगीत] सिस्टम का
- 11:39विकास किया गया था। कारीगरों ने विशाल
- 11:42बलुआ पत्थरों के बीच [संगीत] लोहे की मोटी
- 11:44पट्टियों और चादरों यानी कि आयरन प्लेट्स
- 11:48और क्लैंप्स का उपयोग किया था। इन लोहे की
- 11:50[संगीत] प्लेट्स को पत्थरों के खांचों में
- 11:52इस तरह फिट किया गया था कि वे एक दूसरे
- 11:55[संगीत] को मजबूती से जकड़ लें। जिसे आज
- 11:58हम आधुनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम कहते हैं। यह
- 12:01तकनीक ना केवल मंदिर को स्थिरता प्रदान
- 12:03करती थी बल्कि समुद्री [संगीत] तट की
- 12:05नमकीन हवाओं और भूकंप के झटों से भी इस
- 12:09ढांचे की रक्षा करती थी। विषु महाराणा की
- 12:12सूक्ष्म गणना [संगीत] इतनी सटीक थी कि
- 12:14मंदिर के हर हिस्से का भार पूरी तरह
- 12:17संतुलित था। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी
- 12:20कि इन लोहे की परतों [संगीत] का इस्तेमाल
- 12:22सिर्फ मजबूती के लिए ही नहीं बल्कि एक
- 12:25विशाल चुंबकीय क्षेत्र तैयार करने के लिए
- 12:28भी किया गया था। जो आगे चलकर भगवान सूर्य
- 12:31की मूर्ति को हवा में स्थिर रखने का आधार
- 12:33बनी। लेकिन उसको जानने से पहले हम यह जान
- 12:36लेते हैं कि क्यों एक 12 वर्ष के बालक ने
- 12:39मंदिर के निर्माण के लिए अपनी जान दी।
- 12:41माना जाता है कि जब मंदिर का निर्माण अपने
- 12:44अंतिम चरण में था तब एक ऐसी चुनौती सामने
- 12:48आई जिसने 1200 अनुभवी कारीगरों [संगीत] की
- 12:50नींद उड़ा दी थी। मंदिर का मुख्य ढांचा तो
- 12:53तैयार हो गया था लेकिन उसके शिखर पर कलश
- 12:56स्थापित नहीं हो पा रहा था। जिसे कुछ
- 12:59जगहों [संगीत] पर एक भारी 52 टन का चुंबक
- 13:02यानी कि मैग्नेट बताया जाता है जो इस
- 13:04मंदिर की मुख्य प्रतिभा थी। क्योंकि इसके
- 13:07बिना मंदिर अधूरी थी। कई प्रयासों के बाद
- 13:10भी जब कारीगर कलश [संगीत] को स्थिर करने
- 13:12में विफल रहे तो राजा नरसिंह देव प्रथम का
- 13:15धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने मुख्य
- 13:18वास्तुकार बिशु महाराणा और उनकी टीम को यह
- 13:21कठोर चेतावनी दी कि यदि अगले दिन सूर्योदय
- 13:24से पहले [संगीत] शिखर पर कलश स्थापित नहीं
- 13:26हुआ तो सभी 1200 कारीगरों का सिर कलम कर
- 13:30दिया जाएगा। निर्माण स्थल पर मौत का
- 13:32सन्नाटा पसर [संगीत] गया था। क्योंकि
- 13:34सदियों पुरानी इंजीनियरिंग की समझ उस एक
- 13:37बिंदु पर आकर हार मान चुकी थी। ठीक उसी
- 13:40समय विषु महाराणा का 12 वर्षीय पुत्र
- 13:43धर्मपद जिसे धर्मपद भी कहा जाता है वहां
- 13:46पहुंचा जिसने जन्म के बाद से अपने पिता का
- 13:49चेहरा कभी नहीं देखा था। बालक धर्मपद अपनी
- 13:52मां से अनुमति लेकर अपने पिता [संगीत] से
- 13:54मिलने आया था। लेकिन वहां का माहौल देखकर
- 13:56वह दंग रह गया। जब उसे पता चला कि उसके
- 13:59[संगीत] पिता और 1200 कारीगरों की जान
- 14:02खतरे में है तो उसने अपनी असाधारण मेधा और
- 14:05इंजीनियरिंग सूझबूझ [संगीत] का परिचय
- 14:07दिया। धर्मपथ को पता था कि मंदिर के
- 14:09चुंबकीय क्षेत्र में तीसरे मैग्नेट को किस
- 14:12तरह संतुलित किया जाता है। पिता की अनुमति
- 14:14लेकर वह नन्हा बालक अंधेरी रात में मंदिर
- 14:18के विशाल शिखर पर चढ़ा और कुछ ही घंटों
- 14:21में उसने कलश को पूरी [संगीत] निपुणता के
- 14:23साथ स्थापित कर दिया। वो कार्य जिसे
- 14:26दिग्गज शिल्पकार 12 वर्षों में भी नहीं कर
- 14:28पाए थे। सुबह जब सूरज की [संगीत] पहली
- 14:30किरण ने मंदिर के शिखर को छुआ तो राजा और
- 14:34सभी कारीगर [संगीत] यह चमत्कार देखकर दंग
- 14:36रह गए। लेकिन यह जीत एक बड़े संकट की आहट
- 14:40भी थी। कारीगरों के बीच यह डर फैल गया कि
- 14:43जब राजा को पता चलेगा कि 1200 अनुभवी
- 14:46शिल्पकार जो नहीं [संगीत] कर सके वह एक 12
- 14:49साल के बालक ने कर दिखाया तो राजा उन सभी
- 14:52को अयोग्य मानकर दंडित कर सकता है। अपने
- 14:55पिता के सम्मान और 1200 कारीगरों की जान
- 14:58बचाने के लिए धर्मपद ने एक ऐसा फैसला लिया
- 15:01जिसे सुनकर आज भी आंखें नम हो जाती हैं।
- 15:04अपनी सफलता का जश्न मनाने [संगीत] के बजाय
- 15:07उस वीर बालक ने मंदिर के शिखर से
- 15:10चंद्रभागा [संगीत] नदी में छलांग लगा दी
- 15:12और अपने प्राणों की आहुति दे दी। लेकिन
- 15:15उसका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। जिसे आज
- 15:18दुनिया [संगीत]
- 15:18डायमैग्नेटिक फील्ड कहती है उसे हमारे
- 15:21भारत में 800 साल पहले ही निर्माण कर दिया
- 15:24गया था। जो यहां की उड़ती हुई सूर्यदेव
- 15:26[संगीत] की मूर्ति का आधार शिला बनी। साथ
- 15:30ही सूर्यदेव के रथ के वो सात घोड़े जो
- 15:33महान वैज्ञानिक आइजक [संगीत] न्यूटन की
- 15:35थ्योरी को भी पहले से बताती है और साथ ही
- 15:38इन रथों पर लगे पहिए जो आज भी सटीक समय
- 15:42बता देते हैं जो हैरान करने वाला है। इस
- 15:45मंदिर के इन रहस्यों को जानकर आप भी चौंक
- 15:48जाएंगे। तो चलिए अब हम इन रहस्यों को
- 15:51जानते हैं। लेकिन उससे पहले अगर आपको
- 15:54वीडियो अच्छी लग रही है तो इसे अपने
- 15:56मित्रों और [संगीत] रिश्तेदारों को भी
- 15:58जरूर शेयर करें ताकि वे भी हमारे भारत के
- 16:00अद्भुत और रहस्यमई मंदिरों के बारे में
- 16:03जान सकें।
- 16:10कोनार्क का यह मंदिर केवल पत्थरों का एक
- 16:13विशाल ढांचा नहीं है बल्कि यह सनातन धर्म
- 16:17के वेदों में वर्णित सूर्यदेव की उस
- 16:19कल्पना का भौतिक स्वरूप है जिसे राजा
- 16:22नरसिंह देव प्रथम ने [संगीत] कलिंग
- 16:25वास्तुकला शैली के शिखर पर पहुंचाया था।
- 16:28पूरे मंदिर को एक भव्य और विशाल रथ के
- 16:30आकार में डिजाइन किया गया है। इस रथ के
- 16:33आधार पर पत्थरों को काटकर 12 जोड़ी
- 16:35[संगीत] यानी कुल 24 पहिए बनाए गए हैं। यह
- 16:3824 पहिए साल के 12 महीनों के प्रतीक हैं
- 16:41और इनमें से प्रत्येक पहिया समय के चक्र
- 16:44को दर्शाता है। आश्चर्य की बात यह है कि
- 16:47यह केवल [संगीत] सजावटी पहहिए नहीं है
- 16:50बल्कि यह एक सटीक समय यंत्र की तरह काम
- 16:53करते हैं। हर पहिए में [संगीत] 16 तीलियां
- 16:56हैं। आठ बड़ी और आठ छोटी। इन तीलियों के
- 16:59बीच का अंतराल और उनकी छाया [संगीत] आज भी
- 17:02दिन के आठ प्रहर और 24 घंटों का सटीक
- 17:05विवरण दे सकती है। इन आठ बड़ी तीलियों
- 17:08[संगीत] के बीच 3 घंटे का गैप होता है जो
- 17:11इसे पूरा 24 घंटे का एक चक्र बनाती है।
- 17:14इसे एंटीक्लॉकवाइज [संगीत] पढ़ा जाता है।
- 17:16यानी कि अगर ऊपर की बड़ी तीली को 12 माने
- 17:19तो एंटीक्लॉकवाइज उसके पहले वाली छोटी
- 17:22तीली पर 1:30 बज रहे होंगे। साथ इन दोनों
- 17:25के गैप के बीच और भी छोटी-छोटी तीलियां
- 17:27हैं। और हर एक तीली 3 मिनट के अंतराल को
- 17:30दर्शाती [संगीत] है। यानी अगर कोई व्यक्ति
- 17:32इस रथ के पहिए के बीच में उंगली रखे तो वह
- 17:36उसकी परछाई को देखकर आराम [संगीत] से सटीक
- 17:38समय बता सकता है। इस दिव्य रथ को खींचने
- 17:41के लिए सामने की
- 17:42[संगीत]
- 17:42ओर सात शक्तिशाली घोड़े बनाए गए हैं। यह
- 17:45सात घोड़े सप्ताह के सात दिनों और खासकर
- 17:49सूर्य के प्रकाश में मौजूद सात [संगीत]
- 17:51रंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहां
- 17:53विज्ञान और इतिहास का एक बड़ा विरोधाभास
- 17:56सामने आता है। जहां आधुनिक विज्ञान मानता
- 17:58है कि आइज़क न्यूटन ने 1666 [संगीत]
- 18:01में प्रिज्म के जरिए रोशनी के सात रंगों
- 18:04की खोज की थी। [संगीत] वहीं 13वीं सदी में
- 18:07बना यह मंदिर चीख-चीख कर कह रहा है कि
- 18:10हमारे पूर्वज न्यूटन से 400 साल पहले ही
- 18:12इन वैज्ञानिक सत्यों [संगीत] से परिचित
- 18:14थे। मंदिर के मुख्य तीन भाग हैं। विमान
- 18:18यानी कि वह स्थान जहां मूर्ति रखी गई थी।
- 18:21जगमोहन यानी कि प्रार्थना हॉल और नट मंदिर
- 18:24यानी [संगीत] कि नृत्य का हॉल और माना
- 18:27जाता है कि विमान यानी कि मुख्य हॉल में
- 18:29सूर्यदेव की हवा में तैरती मूर्ति थी। तो
- 18:32आखिर इसका क्या रहस्य [संगीत] है? दरअसल
- 18:35प्राचीन भारतीय ग्रंथों और स्थानीय
- 18:37जनश्रतियों के अनुसार इस मंदिर के [संगीत]
- 18:40गर्भ गृह में स्थापित सूर्य देव की अष्ट
- 18:43धातु की विशाल मूर्ति बिना किसी आधार या
- 18:46स्टैंड के शून्य में लटकी रहती थी। यह कोई
- 18:49जादू नहीं बल्कि भौतिक विज्ञान यानी कि
- 18:52फिजिक्स [संगीत] का एक ऐसा अद्भुत चमत्कार
- 18:54था जिसे मैग्नेटिक लेविटेशन कहा जाता है।
- 18:57इस असंभव कार्य को अंजाम [संगीत] देने के
- 18:59लिए मंदिर के शिखर पर 52 टन का एक विशाल
- 19:03चुंबकीय पत्थर लगाया गया था। शिल्पकारों
- 19:06ने मंदिर के ऊपरी हिस्से में लगे उस
- 19:08महाचुंबक [संगीत] के साथ तालमेल बिाने के
- 19:11लिए नीचे की परतों में लोहे की भारी
- 19:13चादरें और पत्थरों को जोड़ने के लिए लोहे
- 19:16के क्लैंप्स का इस्तेमाल किया था। इन
- 19:18दोनों [संगीत] के बीच एक शक्तिशाली खिंचाव
- 19:20और संतुलन तैयार हुआ जिसे विज्ञान की भाषा
- 19:24में डायमैग्नेटिक फील्ड कहते हैं। मुख्य
- 19:27वास्तुकार [संगीत] बिशु महाराणा के 12
- 19:29वर्षीय पुत्र धर्मपद के बारे में कहा जाता
- 19:32है [संगीत] कि वह जानता था कि दो
- 19:34मैग्नेट्स से बनी इस फील्ड में किस तरह एक
- 19:38तीसरे मैग्नेट यानी अष्ट धातु की [संगीत]
- 19:40मूर्ति को संतुलित किया जाता है। मूर्ति
- 19:43को मंदिर के शिखर और आधार से बिल्कुल समान
- 19:46दूरी [संगीत] पर स्थापित किया गया था।
- 19:48जिससे वह गुरुत्वाकर्षण को मात देकर हवा
- 19:51में स्थिर हो गई थी। लेकिन इस मंदिर का
- 19:53स्वर्णकाल ज्यादा समय तक नहीं चला। 16वीं
- 19:56शताब्दी में काला पहाड़ द्वारा इसे नष्ट
- 19:59[संगीत] किया गया। और ऐसा क्या था यहां के
- 20:01बंदरगाह में जो यहां आते ही नाव [संगीत]
- 20:04रास्ता भटक जाते थे और क्यों अंग्रेजों ने
- 20:07इसे रेत में दबा दिया। जब मैं आपको इन सब
- 20:10की सच्चाई बताऊंगा [संगीत]
- 20:11तो आप भी चौंक जाएंगे कि आखिर ऐसा कैसे हो
- 20:14सकता है। तो चलिए अब इन चौंकाने वाले
- 20:17रहस्यों को जानते हैं जिन्हें इतिहास ने
- 20:19भुला दिया और दुनिया से छिपाया गया।
- 20:28कोणार्क की भव्यता और विज्ञान की अजय
- 20:31शक्ति पर ग्रहण तब लगा जब 16वीं शताब्दी
- 20:34में विदेशी आक्रमण की काली आंधी ओसा के तट
- 20:38तक पहुंची। इतिहासकारों और प्राचीन
- 20:41अभिलेखों के अनुसार मंदिर के पतन की सबसे
- 20:44विनाशकारी घटना बंगाल सल्तनत के सुल्तान
- 20:47सुलेमान खान करानी के जनरल काला पहाड़ के
- 20:51आक्रमण से जुड़ी है। साल 1568 के आसपास
- 20:55काला पहाड़ ने ओसा के कई प्रमुख मंदिरों
- 20:58को निशाना बनाया। जिनमें जगन्नाथ पुरी और
- 21:00कामाख्या देवी मंदिर के साथ-साथ कोणार्क
- 21:03का सूर्य मंदिर भी शामिल था। जगन्नाथ
- 21:06मंदिर के ऐतिहासिक वृतांत मदाला पंजी में
- 21:10इस हमले का रोंगटे खड़े [संगीत] कर देने
- 21:12वाला विवरण मिलता है। कहा जाता है कि काला
- 21:15पहाड़ मूल रूप से एक पवित्र वैष्णव
- 21:17[संगीत] ब्राह्मण था जिसका नाम राजीव लोचन
- 21:21रॉय या कालाचंद राय था। सुल्तान की बेटी
- 21:25गुलनाथ से प्रेम और उसे पाने के लिए
- 21:27इस्लाम स्वीकार करने के बाद वह हिंदू
- 21:29मंदिरों का कट्टर शत्रु बन गया था। जब
- 21:32काला पहाड़ की सेना ने कोणार्क मंदिर में
- 21:35प्रवेश किया तो वे वहां के अद्भुत दृश्य
- 21:38[संगीत] को देखकर दंग रह गए। मंदिर के
- 21:40गर्भ गृह में भगवान सूर्य की विशाल मूर्ति
- 21:44बिना किसी [संगीत] सहारे के हवा में तैर
- 21:46रही थी। काला पहाड़ ने मंदिर को तोड़ने की
- 21:49कोशिश की [संगीत] पर इसके अद्भुत आयरन,
- 21:51लॉक सिस्टम और गहन कारीगरी के चलते वह उसे
- 21:55पूरी तरह नहीं तोड़ पाया। फिर भी माना
- 21:58जाता है कि काला पहाड़ ने मंदिर को अच्छा
- 22:00खासा नुकसान पहुंचाया। [संगीत]
- 22:02लेकिन इतिहास के पन्नों में कोणार्क के
- 22:04पतन की कहानी केवल जमीनी आक्रमणों तक
- 22:07सीमित नहीं है। बल्कि इसका एक गहरा और
- 22:10रहस्यमई संबंध विशाल समुद्र और उन विदेशी
- 22:14नाविकों से भी है जो बंगाल की खाड़ी से
- 22:17होकर गुजरते थे। 16वीं और 17वीं शताब्दी
- 22:21के दौरान पुर्तगाली नाविकों और यूरोपीय
- 22:24व्यापारियों के बीच यह मंदिर ब्लैक पगोड़ा
- 22:27के नाम से कुख्यात हो गया था। लेकिन
- 22:29कोणार्क को काला या ब्लैक कहने के पीछे
- 22:32इसका गहरा रंग नहीं था। बल्कि वह डर था जो
- 22:35इस मंदिर से जुड़े चुंबकीय रहस्यों के
- 22:38कारण समुद्र में फैला हुआ था। जैसा कि
- 22:41मैंने आपको पहले बताया कि मंदिर के शिखर
- 22:44पर लगा 52 टन का विशाल चुंबकीय पत्थर लगा
- 22:48था जो इतना शक्तिशाली था कि उसका प्रभाव
- 22:51कई किलोमीटर दूर समुद्र तक महसूस किया
- 22:54जाता था। उस दौर के पुर्तगाली नाविकों के
- 22:57वृतांतों और समुद्री डायरियों में यह दर्ज
- 23:00है कि जब भी उनके जहाज कोणार्क के तट के
- 23:03पास से गुजरते थे तो उनके नेविगेशन कंपास
- 23:06अचानक काम करना बंद कर देते थे। कंपास की
- 23:09सुई चुंबकीय खिंचाव के कारण पागलों की तरह
- 23:12घूमने लगती थी। जिससे जहाज अपनी सही दिशा
- 23:15भटक जाते थे। इतना ही नहीं यह चुंबकीय बल
- 23:19जहाजों के लोहे के हिस्सों को अपनी ओर इस
- 23:22कदर खींचता था कि कई जहाज अनियंत्रित होकर
- 23:25तट की चट्टानों से टकरा जाते थे और
- 23:28दुर्घटनाग्रस्त होकर डूब जाते थे। समुद्री
- 23:31व्यापार में हो रहे इस भारी नुकसान और
- 23:34लगातार होते जहाज हादसों ने [संगीत]
- 23:37विदेशी व्यापारियों और नागरिकों के मन में
- 23:40इस मंदिर के प्रति एक खौफ पैदा कर दिया
- 23:43था। अपनी सुरक्षा और नेविगेशन सिस्टम को
- 23:46बचाने के लिए पुर्तगाली नाविकों ने एक
- 23:49दुस््साहसी कदम उठाने का फैसला किया।
- 23:52ऐतिहासिक दावों के अनुसार उन्होंने मंदिर
- 23:54पर धावा बोला और इसके शीर्ष पर लगे
- 23:57[संगीत] उस विनाशकारी शक्तिशाली चुंबक को
- 24:00निकाल लिया। उनका मानना था कि इस चुंबक को
- 24:03हटा देने से समुद्र में उनके जहाज
- 24:05सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने इस चुंबक को
- 24:08अपने जहाज में लादकर अपने देश ले जाने की
- 24:10कोशिश की। लेकिन इस एक घटना ने कोनार्क के
- 24:14भविष्य को हमेशा के लिए बदल दिया। जैसे ही
- 24:16वह केंद्रीय चुंबकीय पत्थर हटाया गया।
- 24:19पूरे मंदिर की संरचना का संतुलन बिगड़
- 24:22गया। पत्थरों को थामे हुए आयरन लॉक सिस्टम
- 24:25ने अपनी पकड़ खो दी और देखते ही देखते वह
- 24:29भव्य ढांचा अपनी स्थिरता खोकर क्षतिग्रस्त
- 24:32होने लगा। जब मंदिर की संरचना कमजोर होने
- 24:36लगी और आक्रमणकारियों [संगीत] का खतरा बढ़
- 24:38गया। तब मंदिर की पवित्रता को बचाने के
- 24:41लिए वहां के पुजारियों ने एक साहसी कदम
- 24:43उठाया। विनाश से बचाने के लिए पुजारियों
- 24:46ने सूर्यदेव की मुख्य मूर्ति को मंदिर से
- 24:49निकाल लिया और कई वर्षों तक उसे रेत के
- 24:52नीचे छिपा कर रखा। जैसे ही मंदिर से मुख्य
- 24:55मूर्ति हटाई गई वहां श्रद्धालुओं और
- 24:57भक्तों का आना बंद हो गया। जिससे रखरखाव
- 25:00के अभाव में मंदिर धीरे-धीरे एक वीरान
- 25:03खंडहर में बदल गया। कालांतर में सुरक्षा
- 25:06की दृष्टि से इस दिव्य मूर्ति को पूरी ले
- 25:09जाया [संगीत] गया और वहां जगन्नाथ मंदिर
- 25:12के प्रांगण में स्थित इंद्र मंदिर में
- 25:14स्थापित [संगीत] कर दिया गया। हालांकि आज
- 25:16भी यह बहस का विषय है कि क्या नई दिल्ली
- 25:18[संगीत] के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी
- 25:20सूर्य प्रतिमा ही कोणार्क की असली मुख्य
- 25:23मूर्ति है। 18वीं शताब्दी के अंत तक सूर्य
- 25:27भगवान का यह भव्य धाम एक घने जंगल में
- 25:30तब्दील हो गया था। जहां दिन के उजाले में
- 25:32भी इंसान जाने से कतराते थे और यह उस
- 25:35गौरवशाली मंदिर का अंत था। पर फिर ब्रिटिश
- 25:38[संगीत] इंडिया में आए और उन्होंने इस
- 25:40खंडहर हो चुके कोणार्क मंदिर को खोज
- 25:42निकाला। पर फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने
- 25:45फिर से बंद करने का निश्चय लिया और क्यों
- 25:48इस मंदिर को रेत और बालू से दबा दिया गया?
- 25:50तो चलिए अब इस रहस्य को भी जान लेते हैं।
- 25:59कई 100 सालों तक घने जंगलों में खंडहर की
- 26:02तरह पड़े रहने के बाद साल 1837 [संगीत]
- 26:05में एक स्कॉटिश इतिहासकार जेम्स फर्गुसन
- 26:09यहां आए। जिन्होंने अपनी खोज और अद्भुत
- 26:12रेखा चित्रों के जरिए इस भूले-बिसरे
- 26:15चमत्कार को फिर से दुनिया के नक्शे पर
- 26:17लाया। फिर आया साल 1903 एक ऐसा साल जिसने
- 26:21कोणार्क सूर्य मंदिर के भाग्य को अगले
- 26:24सवा5 सालों के लिए एक गहरे अंधकार और
- 26:27सन्नाटे में धकेल दिया। बंगाल के तत्कालीन
- 26:30लेफ्टिनेंट गवर्नर [संगीत] जिम ए बलन अपनी
- 26:33विशेषज्ञ टीम के साथ इस भव्य मंदिर का
- 26:36मुआयना करने पहुंचे थे। मंदिर की जजर हालत
- 26:39और गिरते हुए पत्थरों [संगीत] को देखकर
- 26:41उन्होंने एक ऐसा ऐतिहासिक और चौंकाने वाला
- 26:44फैसला लिया जिसने इतिहासकारों को आज भी
- 26:47सोचने [संगीत] पर मजबूर कर दिया है।
- 26:49उन्होंने आदेश दिया कि मंदिर के मुख्य सभा
- 26:52स्थल जिसे असेंबली हॉल यानी कि जगमोहन कहा
- 26:55जाता है। उसके चारों द्वारों को हमेशा के
- 26:58लिए पत्थर की दीवारों से सील कर दिया जाए
- 27:00और इसके भीतर के विशाल खाली हिस्से को
- 27:03लाखों टन रेत और बालू से पूरी तरह भर दिया
- 27:06जाए। माना जाता है कि उन्होंने मंदिर को
- 27:09टूटने से [संगीत] बचाने के लिए ऐसा किया।
- 27:11पर यह कोई साधारण मरम्मत का काम नहीं था।
- 27:13बल्कि एक चलती फिरती [संगीत] ऐतिहासिक
- 27:15संरचना को जीवित दफन करने जैसा फैसला था।
- 27:19सवाल आज भी बना हुआ है कि क्या यह निर्णय
- 27:22वाकई केवल मंदिर को गिरने से बचाने के लिए
- 27:25लिया गया था? या फिर [संगीत] गवर्नर ने उस
- 27:27अंधेरे के भीतर कुछ ऐसा देख लिया था जिससे
- 27:30वह भयभीत हो गए थे। इस फैसले के बाद शुरू
- 27:33हुई 120 [संगीत] से भी अधिक वर्षों की एक
- 27:36ऐसी लंबी खामोशी जिसने कोणार्क को भारत के
- 27:40सबसे रहस्यमई सील्ड मोन्यूमेंट्स की सूची
- 27:43में सबसे ऊपर खड़ा कर दिया। 1903 के बाद
- 27:46से आज तक दुनिया का कोई भी इंसान चाहे वह
- 27:50बड़ा वैज्ञानिक हो या इतिहासकार उस गर्भ
- 27:53गृह की चौखट को पार नहीं कर पाया है।
- 27:56पिछले 123 वर्षों से यह मंदिर अपने भीतर
- 28:00के रहस्यों को रेत की परतों के नीचे दबाए
- 28:03हुए खड़ा है। लोग अक्सर पूछते हैं कि आखिर
- 28:06दुनिया की इतनी बड़ी और [संगीत] आधुनिक
- 28:08तकनीक होने के बावजूद क्या हम सवा5 साल
- 28:11में एक बार भी उस दरवाजे [संगीत] को खोलने
- 28:13की हिम्मत नहीं जुटा पाए? क्या यह महज एक
- 28:17तकनीकी रुकावट है? या फिर कोई ऐसा डर जो
- 28:20आज भी पुरातत्व विदों को अंदर जाने से
- 28:22रोकता है। लेकिन फिर आया साल 2022 भारत
- 28:27सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी
- 28:30कि एएसआई ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए
- 28:34इस मंदिर के गर्भ गृह से रेत निकालने और
- 28:37इसके बंद दरवाजों को खोलने की योजना बनाई।
- 28:40इस प्रोजेक्ट का [संगीत] मुख्य उद्देश्य
- 28:42मंदिर की आंतरिक संरचना की जांच करना और
- 28:45उन रहस्यों से [संगीत] पर्दा उठाना है जो
- 28:48सदियों से अंधेरे में दफन है। हालांकि यह
- 28:51कार्य अत्यंत चुनौतीपूर्ण है क्योंकि रेत
- 28:54निकालने से मंदिर के संतुलन पर क्या
- 28:56प्रभाव पड़ेगा। यह आज भी शोध का विषय है।
- 29:00विशेषज्ञ उम्मीद कर रहे हैं कि जल्द ही
- 29:02आधुनिक इंजीनियरिंग की मदद से हम उस गर्भ
- 29:05गृह के भीतर कदम रख पाएंगे जहां कभी
- 29:08सूर्यदेव की मूर्ति हवा में तैरा करती थी
- 29:11और आज भी [संगीत] इसकी रेत को हटाने का
- 29:13काम किया जा रहा है। यह काम धीरे-धीरे और
- 29:16सावधानी से किया जा रहा है। क्योंकि किसी
- 29:18को नहीं पता कि रेत को हटाने के [संगीत]
- 29:20बाद क्या होगा। लेकिन फिर आज के टाइम में
- 29:22यानी कि दिसंबर 2025 में एएसआई ने उसी बंद
- 29:27हिस्से के भीतर की स्थिति [संगीत] समझने
- 29:29और भविष्य में सुरक्षित तरीके से सैंड
- 29:32इवाकुएशन की दिशा में सबसे सेंसिटिव काम
- 29:34शुरू [संगीत] किया। यानी कि कोर ड्रिलिंग
- 29:37हिंदू स्टैंड टाइम्स के अनुसार एएसआई के
- 29:40सुपरिइटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट डीबी गणनायक
- 29:43ने बताया कि कोर ड्रिल का उद्देश्य दीवार
- 29:47की स्ट्रेंथ और थिकनेस समझना है ताकि उसी
- 29:50के आधार पर आगे स्ट्रक्चर को स्ट्रेंथन
- 29:53करने के स्टेप्स तय किए जा सकें।
- 29:55टेलीग्राफ की रिपोर्ट बताती है कि एएसआई
- 29:58ने आईआईटी मद्रास के साथ मिलकर एक डिटेल्ड
- 30:02स्ट्रक्चरल असेसमेंट शुरू किया है। यानी
- 30:04रेत निकालने से पहले क्या निकालना [संगीत]
- 30:06सेफ है यह वैज्ञानिक तरीके से तय किया जा
- 30:09रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्टिंग
- 30:12इस [संगीत] रहस्य में एक और कंक्रीट डाटा
- 30:15जोड़ती है कि हाल की ड्रिलिंग में यह
- 30:17संकेत मिला कि जो सैंड कभी टॉप तक भरी हुई
- 30:20मानी जाती थी वह अब बैठकर लगभग 13.5
- 30:24मीटर नीचे सेटल हो चुकी है। कोणार्क का
- 30:27सूर्य मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल या
- 30:30प्रार्थना घर नहीं था। यह प्राचीन भारत का
- 30:33एक जीवंत विश्वविद्यालय और ज्ञान का
- 30:35इनसाइक्लोपीडिया था। जहां आज के मंदिरों
- 30:38में अक्सर केवल आस्था और व्यापार दिखाई
- 30:40देता है। वहीं 800 साल पहले बना यह मंदिर
- 30:44विज्ञान, खगोल [संगीत] शास्त्र, गणित और
- 30:46कला का एक ऐसा केंद्र था जहां हर धर्म और
- 30:50संप्रदाय के लोग आकर शिक्षित हो सकते थे।
- 30:52यह मंदिर हमारे पूर्वजों के उस उन्नत
- 30:55विज्ञान का प्रमाण है जो आज के दौर से
- 30:58कहीं आगे था। कोणार्क की यह दीवारें आज भी
- 31:01हमें पुकार रही हैं कि हम अपनी गौरवशाली
- 31:04विरासत को पहचाने और उस ज्ञान को फिर से
- 31:07जीवित करें जिसे समय की रेत ने ढंग दिया
- 31:10है। और अगर आपको इस मंदिर [संगीत] के
- 31:12रहस्यों और इतिहास ने चौंकाया है तो ओसा
- 31:15के जगन्नाथ मंदिर का रहस्य तो आपको हिला
- 31:17कर रख देगा। तो अगर आप जगन्नाथ मंदिर के
- 31:20बारे [संगीत] में भी जानना चाहते हैं तो
- 31:22हमारे चैनल पर जाकर यह वीडियो जरूर देखें
- 31:24और अगर आप इसी तरह के डॉक्यूमेंट्री
- 31:27वीडियो देखना चाहते हैं तो हमारे चैनल को
- 31:29सब्सक्राइब जरूर करें। बाकी इस वीडियो को
- 31:32अंत तक देखने के लिए आपका धन्यवाद।
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