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Maulana Saad Sahab DB | Allah Par Tawakkul – Heart-Touching Bayan | Trust in Allah — Transcript

by MMF Speeches · 9,023 words · 1,096 segments · language en · Watch on YouTube

Full transcript

  1. 0:05और यह 100 के 100 बेटे ये अल्लाह के
  2. 0:07रास्ते के मुजाहिद अल्लाह के रास्ते
  3. 0:09घुड़सवार बने। आला नस्ल की बीवियां इसलिए
  4. 0:12के इस जमाने में मुसलमान ये समझता है कि
  5. 0:16जब अल्लाह ने मुझे असबाब दे दिए तो गोया
  6. 0:19अल्लाह ताला ने मेरे काम का होना तय कर
  7. 0:22दिया। सुनो तवज्जो से बात। लोग असबाब के
  8. 0:25मुहैया होने को कामयाबी समझते हैं। यूं
  9. 0:28समझते हैं जिनके पास असबाब नहीं वो नाकाम
  10. 0:31है। और जिनके पास असबाब है वो कामयाब हैं।
  11. 0:33मैं सच्ची बताऊं इस जमाने में मुसलमान
  12. 0:36जितना मायूस हो रहा सिर्फ इसलिए कि असबाब
  13. 0:39गैरों के हाथ में देखकर ये समझता है कि ये
  14. 0:41कामयाब है। हम नाकाम है। जिस किस्म के
  15. 0:45लोगों के पास भी जैसे असबाब देखता है। यूं
  16. 0:47समझ लेता है बस ये कामयाब है। हम नाकाम
  17. 0:50है। फिर ये अपनी कामयाबी के लिए उन लोगों
  18. 0:53से उन असबाब को छीनने की कोशिश करते हैं।
  19. 0:56सुनो तो सही कैसी अजीब बात है। पहले
  20. 1:00मुसलमान ने यह गलती की कि उसने यह समझा कि
  21. 1:03असबाब का मुहैया होना कामयाबी है। असबाब
  22. 1:06का मुहैया होना कामयाबी है। पहले गलती तो
  23. 1:09ये की। ये समझते हैं कि अल्लाह ने असबाब
  24. 1:12दे दिए। तो अल्लाह ने कामयाबी चाह ली। अरे
  25. 1:15सुनो तो सही। सुलेमान अल सलाम जैसा असबाब
  26. 1:18किसको मिले होंगे? किसको मिले होंगे?
  27. 1:21सुलेमान इस्लाम जैसा असबाब किसको मिले
  28. 1:24होंगे? इस जमाने में कोई मिसाल पेश कर
  29. 1:26नहीं सकता उन जैसी बादशाहत की। हम समझते
  30. 1:29हैं कि अगर अल्लाह ने असबाब दे दिए तो
  31. 1:32गोया अल्लाह ने कामयाबी चाह ली। हालांकि
  32. 1:35अल्लाह रब्बुल इज्जत असबाब जो अता फरमाते
  33. 1:38हैं वो कामयाब करने के लिए नहीं अता
  34. 1:40फरमाते। अल्लाह ताला असबाब कामयाबी के लिए
  35. 1:43नहीं देते। अल्लाह ताला असबाब जरूरत के
  36. 1:46लिए भी नहीं देते। अल्लाह ताला असबाब
  37. 1:49सिर्फ इसलिए देते हैं। चाहे वह नबी को
  38. 1:52दें, चाहे वह वली को दें, वह सहाबी को
  39. 1:55दें। वही ज़माने में आम मुसलमानों को दें।
  40. 1:58अल्लाह ताला असबाब सिर्फ आजमाइश के लिए
  41. 2:00देते हैं। सिर्फ सिर्फ आजमाइश के लिए। हम
  42. 2:03देखना चाहते हैं कि तुम इन असबाब में हमें
  43. 2:06कितना याद रखते हो। हम देखना चाहते हैं इन
  44. 2:08असबाब में तुम हमें कितना याद रखते हो।
  45. 2:11इसके अलावा कोई और वजह नहीं है मुसलमान को
  46. 2:14असबाब मिलने की। सिवाय इसके। इसलिए के
  47. 2:17यकीनी बात है कि अल्लाह कुफार को अस्बा
  48. 2:19देते हैं उनको मुतमन रखने के लिए। इसलिए
  49. 2:22काफ़िरों के पास जो असबाब हैं वो काफ़िरों
  50. 2:25के इत्मीनान के लिए है। वो काफ़िरों के
  51. 2:27इत्मीनान के लिए है। मुसलमान के असबाब
  52. 2:29इत्मीनान के लिए नहीं है। मुसलमान के जो
  53. 2:31असबाब हैं वो अमल के इम्तिहान के लिए है।
  54. 2:34अरे तवज्जो से बात सुनना। मुसलमान के पास
  55. 2:37जो असबाब है वो अमली इम्तिहान के लिए है।
  56. 2:41इन
  57. 2:46अमला हमने दुनिया को असबाब से और दुनिया
  58. 2:49को मुख्तलिफ चीजों से इसलिए भरा है ताकि
  59. 2:52हम देखें तुम में से अच्छा अमल किसका है?
  60. 2:55कुफ्फार के बाद जो असबाब हैं वो उनके
  61. 2:57इत्मीनान के लिए हैं। अब अंदाजा करो जब
  62. 3:00असबाब कुफ्फार के इत्मीनान के लिए हैं तो
  63. 3:03मुसलमान उन असबाब से मुतमईन कैसे हो सकता
  64. 3:06है? सोचो तो सही। जब मुसलमान के अपने
  65. 3:09असबाब भी इत्मीनान के लिए नहीं। तो
  66. 3:11मुसलमान को गैरों के असबाब से इत्मीनान
  67. 3:14कहां मिल सकता है? जब मुसलमान के अपने
  68. 3:16असबाब भी इत्मीनान के लिए नहीं है। हमारी
  69. 3:19बात तवज्जो चाहती है। जब मुसलमान के अपने
  70. 3:21पास जो असबाब हैं वो भी इसके इत्मीनान के
  71. 3:24लिए नहीं है। तो फिर मुसलमान जो असबाब
  72. 3:28गैरों के पास है उन असबाब से मुसलमान
  73. 3:30मुमईन कैसे हो सकता है? मैंने एक बात अर्ज
  74. 3:33की है कि जब मुसलमान यह देख लेता है कि
  75. 3:35असबाब में कामयाबी है, तो फिर यह गैरों से
  76. 3:39उन अस्बा को हासिल करने की कोशिश करता है।
  77. 3:41गैरों से उन असबाब को हासिल करने की कोशिश
  78. 3:44करता है। यह चाहता है जो असबाब इनके पास
  79. 3:47है, अगर वो असबाब हमें मिल गए, तो हम
  80. 3:49कामयाब हो जाएंगे। क्योंकि वह गैरों को
  81. 3:52उनके असबाब में गैरों को उनके असबाब में
  82. 3:54कामयाबी की नज़र से देख रहा है। जिस मुल्क
  83. 3:57में जिस इलाके में जिस जमाने में भी
  84. 3:58मुसलमान गैरों को उनके असबाब में कामयाब
  85. 4:01समझेगा। मुसलमान उन अस्बा को हासिल करने
  86. 4:05की कोशिश करेगा। मुसलमान उन्बा को हासिल
  87. 4:08करने की कोशिश करेगा। वो चाहेगा यह असबाब
  88. 4:10मुझे मिल जाए। ताकि हम भी कामयाब हो जाएं।
  89. 4:13हाय इस जमाने के मुसलमानों को शिकायत यह
  90. 4:15है कि सारे असबाब पर गैरों का कब्ज़ा है।
  91. 4:18सारे असबाब पर गैरों का कब्ज़ा है। काश यह
  92. 4:21असबाब हमें भी मिल जाते ताकि हम गलिब आ
  93. 4:25जाते। सोचो तो सही। मुसलमान की तमन्ना है
  94. 4:28ये कि सारे असबाब पर गैरों का कब्ज़ा है।
  95. 4:31हमें भी असबाब मिल जाते तो हम भी कामयाब
  96. 4:33हो जाते। बस जो शख्स गैरों को उनके असबाब
  97. 4:38में कामयाबी की नज़र से देखेगा। वो उनके
  98. 4:41असबाब को हासिल किए बगैर ना रहेगा। और जो
  99. 4:44मुसलमान गैरों को उनके असबाब में ये
  100. 4:47सोचेगा के अगर ये ईमान और इस्लाम पर ना आए
  101. 4:51तो इनकी जो हमेशा की नाकामी है वो इनकी इस
  102. 4:53वक्त कामयाबी के मुकाबले में कितनी बड़ी है
  103. 4:56कितनी खतरनाक है। खुद ब खुद दिल ये कहेगा
  104. 4:59कि नहीं। यह कामयाब नहीं है। यह बहुत
  105. 5:01नाकामी में है। हमें चाहिए बजाए इनके
  106. 5:05असबाब के हरीश होने के इन्हें हमेशा
  107. 5:07कामयाबी के असबाब पर लावें। मैंने एक बात
  108. 5:10अर्ज की है। इस जमाने मुसलमान यह तमन्ना
  109. 5:13रखता है कि काश जो असबाब इनके पास है ये
  110. 5:15असबाब हमें मिल जाते। क्या बताऊं? इस
  111. 5:19ज़माने में जिस इस ज़माने में भी मुसलमान
  112. 5:22गैरों के असबाब के मुतमनी है। जैसे हारून
  113. 5:26के माल और असबाब के उस ज़माने के मुसलमान
  114. 5:29कमज़ोर ईमान वाले वो तमन्ना करते थे। वो वो
  115. 5:33तमन्ना करते थे। उसके मुल्क माल को देखा।
  116. 5:36उसके असबाब को देखा। तो तमन्ना करने लगे
  117. 5:39या
  118. 5:41कारून काश हमारे पास ही वो होता जो कारून
  119. 5:44के पास है क्योंकि नतीजा देखे बगैर नतीजा
  120. 5:49देखे बगैर और कुफ्र का अंजाम देखे बगैर जब
  121. 5:53मुसलमान के सामने आखिरत नहीं होती जब
  122. 5:55मुसलमान के सामने आखिरत नहीं होती तो वो
  123. 5:59गैरों को कामयाबी की नज़र से देखता है। जब
  124. 6:03मुसलमान के सामने आखिरत नहीं होती, तो वह
  125. 6:05गैरों को कामयाबी की नज़र से देखता है।
  126. 6:07हालांकि अगर इनके अंजाम को ग़ौर करे, तो
  127. 6:11इनकी दुनिया से पनाह चाहेगा। इनकी दुनिया
  128. 6:13से पनाह चाहेगा। तो वो तमन्ना करने लगे या
  129. 6:18कारून जैसे जमाने के मुसलमान तमन्ना करते
  130. 6:21हैं कि सब कुछ इन्हें मिला हुआ है। हमारे
  131. 6:23पास कुछ भी नहीं है। उमर रदीज़ अल्लाहहु
  132. 6:25ताला अनू ने जब इस बात का तज़रा किया हुज़ूर
  133. 6:28अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कि या
  134. 6:30रसूल अल्लाह ये कैसर किसरा बागात में
  135. 6:34महलात में और नाज़ो नेमतों में और आप
  136. 6:39अल्लाह के नबी सैयद उल अंबिया आपके घर का
  137. 6:42साजो सामान जो कुछ है मैं देख रहा एक तरफ
  138. 6:45दबावत बगैर दबावत दी हुई खाल लटकी हुई है
  139. 6:48एक कोने में कुछ झोप पड़े हुए हैं आपका बदन
  140. 6:50भी ऐसे मोटे बा टाट पर है जिसके निशान त
  141. 6:54आपके जिस्म पर हैं। हज़त उमर रदी अल्लाहहु
  142. 6:57ताला की इस बात पर आप उठकर बैठे और दोनों
  143. 7:01मोड़े हज़त उमर के पकड़ के हिलाए। फरमाया
  144. 7:03खत्ताब के बेटे तू अभी तक इस धोखे में है।
  145. 7:06फरमाया उजबात
  146. 7:08अल्लाह ने इनको जो जो कुछ भी दिया है और
  147. 7:12जितना है अगर इससे भी ज्यादा इनके पास हो
  148. 7:14तब भी ये सब आखिरत के ऐतबार से टोटे में
  149. 7:17और नुकसान में है और वाकई काबिल रहम है।
  150. 7:21मैं तो कहा करता हूं।
  151. 7:24कि जमाने मुसलमान समझता है कि हम काबिल
  152. 7:26रहम है। क्या बताऊं? जब तक मुसलमान अपने
  153. 7:29आप को मजलूम कहता रहेगा मदद आएगी नहीं। जब
  154. 7:32तक मुसलमान अपने आपको मजलूम कहता रहेगा
  155. 7:35मदद आएगी नहीं। जब तक मुसलमान अपने आपको
  156. 7:38मज़लूम कहता रहेगा अल्लाह की मदद आएगी
  157. 7:41नहीं। क्यों? इसलिए कि मज़लूम उसको कहते
  158. 7:44हैं। मज़लूम उसको कहते हैं जो अल्लाह ताला
  159. 7:47के अहकाम और अल्लाह की चाहत को पूरा कर
  160. 7:51दे। फिर उस पर जुल्म किया जाए। तो वो है
  161. 7:53मज़लूम। मज़लूम वो है जो अल्लाह ताला की
  162. 7:56चाहत को पूरा कर दे। फिर उस पर जुल्म किया
  163. 7:58जाए। सिर्फ यही है अल्लाह की नज़र में
  164. 8:01मज़लूम। इसलिए के अल्लाह ताला की नज़र में
  165. 8:04अंबिया मज़लूम है। सहाबा मज़लूम है। अंबिया
  166. 8:08मज़लूम है। सहाबा मज़लूम है। अल्लाह ताला के
  167. 8:13अहकाम को पूरा करने के बाद जो हालात पेश
  168. 8:16आए। ये हालात इतनी ही जल्दी मदद लाएंगे।
  169. 8:19लेकिन अल्लाह के अहकाम को तोड़कर जो हालात
  170. 8:21आते हैं, अल्लाह के अहकाम को तोड़कर जो
  171. 8:24हालात आते हैं। अल्लाह के अहकाम को तोड़कर
  172. 8:27जो हालात आते हैं। उसमें
  173. 8:30बातिल की पकड़ नहीं होती। उसमें बातिल की
  174. 8:32पकड़ नहीं होती। मुसलमान इंतजार करता है कि
  175. 8:35बाततिल की पकड़ हो। इन हालात पर के नहीं।
  176. 8:38बाततिल की पकड़ उस वक़्त होगी, जब मुसलमान
  177. 8:42हुकुम पूरा करके मज़लूम बने। इसलिए कि
  178. 8:45अल्लाह के अहकाम को तोड़कर हालात में पढ़ने
  179. 8:48वाला भी जालिम है। अल्लाह के अहकाम को
  180. 8:50तोड़कर जो हालात आएंगे वह हालात वह हालात
  181. 8:54जो आएंगे वो हालात मदद नहीं लाएंगे। वो
  182. 8:57हालात मदद नहीं लाएंगे। देखो गौर से सुनो।
  183. 9:00तो मैंने अर्ज किया कि मुसलमान गैरों के
  184. 9:03माल असबाब को देखकर तमन्ना करता है। काश
  185. 9:05हमारे पास भी ये होता। क्योंकि अंजाम से
  186. 9:08वाकिफ नहीं है। अंजाम से वाकिफ नहीं है।
  187. 9:11इसलिए अल्लाह रब्बुल इज्जत ने हर ज़माने
  188. 9:14में बाततिल की नाकामी मुसलमानों को इसलिए
  189. 9:17दिखलाई थी ताकि तुम इनके अंजाम से बाखबर
  190. 9:20रहो।
  191. 9:22वरना जिनके लिए हमेशा का अज़ाब है। उनको
  192. 9:24दुनिया में अल्लाह अज़ाब नहीं देना चाहते।
  193. 9:27सुनो तवज्जो से बात। अल्लाह ताला बाततिल
  194. 9:30को दुनिया में हलाक करते हैं। मुसलमानों
  195. 9:34को जगाने के लिए। सुनो तवज्जो से बात।
  196. 9:36अल्लाह बाततिल को दुनिया में हलाक करते
  197. 9:38हैं। मुसलमानों को समझाने के लिए। अल्लाह
  198. 9:42बाततिल को हलाक करते हैं दुनिया में
  199. 9:44मुसलमानों को समझाने के लिए। कि देखो तुम
  200. 9:48जो कुछ इनके पास है। इससे तुम अपनी नाकाम
  201. 9:50अपनी कामयाबी को मत सोचना। इसलिए कि जो
  202. 9:53कुछ इनके पास है जब वो इनके लिए कामयाबी
  203. 9:56इनकी कामयाबी के लिए नहीं है। तुम्हारी
  204. 9:57कामयाबी के लिए कैसे हो जाएगा? जो कुछ
  205. 9:59इनके पास है वो इनकी कामयाबी के लिए नहीं।
  206. 10:02तो, तो सोचिए, कितनी आसान सी बात है। जो
  207. 10:04कुछ गैरो के पास है, जो वो उनकी कामयाबी
  208. 10:07के लिए नहीं, तो फिर मुसलमान उनसे कामयाबी
  209. 10:09की उम्मीद कैसे कर सकता है? तो, तो जब
  210. 10:12मुसलमान बाततिल के अंजाम से बेखबर हो जाता
  211. 10:16है, तो फिर मुसलमान इसकी तमन्ना करने लगता
  212. 10:19है। काश जो इनके पास है, हमारे पास भी हो।
  213. 10:22चुनांचे कमजोर ईमान वालों ने तमन्ना की।
  214. 10:25या इस्लामा या कारून काश हमारे पास वो
  215. 10:28होता जो कारून के पास है। तो उलमा ने कहा
  216. 10:31जिन्हें अल्लाह ने इल्म दिया था। जिन्हें
  217. 10:33अल्लाह के वादों का यकीन था। उन्होंने कहा
  218. 10:35वकुम अरे हलाकत हो तुम्हारी। तुम ये क्या
  219. 10:38तमन्ना कर रहे अल्लाह की तरफ से अमल पर
  220. 10:41मिलने वाला जो अजर है और अमल पर जो वादे
  221. 10:44हैं वो इसकी मालियत इसकी हुकूमत से कहीं
  222. 10:46ज्यादा बेहतर है।
  223. 10:49लेकिन समझ में ना आई। जैसे इस जमाने के
  224. 10:52लोग हैं। कहते हां जी ठीक है दीन अपनी जगह
  225. 10:54है। लेकिन असल तो दुनिया है। इसके बगैर
  226. 10:57गुजारा कैसे होगा? अल्लाह ताला ने जब
  227. 11:00कारून को उसके माल के साथ धसाया तो कल जो
  228. 11:03तमन्ना कर रहे थे ना कल जो लोग कल जो लोग
  229. 11:05तमन्ना कर रहे थे काश हमारे पास वो होता
  230. 11:08जो कारून के पास है वो कहने लगे लल्ला
  231. 11:12अलना खसना अगर अल्लाह ने हमें माल ना देकर
  232. 11:16अल्लाह ने अगर हमें माल ना देकर हम पर
  233. 11:19एहसान ना किया होता तो हम भी हला किए जाते
  234. 11:21हम भी दसाए जाते सोचो तो सही कल तो कह रहे
  235. 11:24थे कि अल्लाह ने एहसान इस पर किया है आज
  236. 11:26कह रहे हैं अल्लाह अल्लाह का हम पर एहसान
  237. 11:29है कि अल्लाह ने हमें माल नहीं दिया। सोचो
  238. 11:31तो सही। अंजाम को देखकर आदमी के अंदर
  239. 11:35कितनी समझ अकल आ जाती है। उसके अंजाम को
  240. 11:38देखकर कहने लगे लल्ला अलना तखस भी ना। अगर
  241. 11:43अल्लाह ने अगर एहसान ना किया होता तो हम
  242. 11:45भी हम भी दसाए जाते। मैं इसलिए अर्ज कर
  243. 11:48रहा था के इस माने मुसलमान इस उम्मीद और
  244. 11:51कोशिश में है कि जो कुछ इनके हाथ में है
  245. 11:54हमारे हाथ में कैसे आ जाए। हालांकि जो कुछ
  246. 11:58उनके पास है जब उनकी कामयाबी के लिए नहीं,
  247. 12:01तो फिर मुसलमान इससे कामयाबी की उम्मीद
  248. 12:03कैसे कर सकता है?
  249. 12:06मैंने एक बात अर्ज की है कि असबाब नबी के
  250. 12:09हाथ में हो या सहाबी के हाथ में हो या वली
  251. 12:12के हाथ में हो या इस ज़माने में मुसलमान
  252. 12:14मुसलमानों के हाथों में हो। ये सारे असबाब
  253. 12:17महज इम्तिहान के लिए हैं। ये सारे असबाब
  254. 12:19महज इम्तिहान के लिए हैं। इत्मीनान के लिए
  255. 12:22नहीं। ये सारे असबाब महज इम्तिहान के लिए
  256. 12:25हैं। चुनांचे अल्लाह ने आजमाया। खूब असबाब
  257. 12:28दिए आला नसल की बीवियां सुम सलाम को।
  258. 12:32ख्याल ये हुआ कि अपनी औलाद में से 100
  259. 12:35मुजाहिद अल्लाह के दीन की महज़ के लिए
  260. 12:37तैयार करूं। 100 औरतें सोबत की। 100 में
  261. 12:40से एक औरत को हमल ठहरा। 99 औरतों को हमल
  262. 12:43नहीं ठहरा। एक को हल ठहरा। अव्वल तो ये
  263. 12:45देख लो के 100 औरतों में से एक को हमल
  264. 12:49ठहरा। वो अमल भी वक्त से पहले अल्लाह ने
  265. 12:51ज़ाया कर दिया। वो अमल भी वक्त से पहले
  266. 12:53जाया कर दिया। यह दिखाने के लिए, कि अगर
  267. 12:57तुम किसी काम में एक फीसद कामयाब हो जाओ,
  268. 12:59तो वह 1% कामयाबी भी हमारे कब्जे में है।
  269. 13:02हम जब चाहेंगे नाकाम कर देंगे। हम जब
  270. 13:04चाहेंगे नाकाम कर देंगे। वह तो भाई आदमी
  271. 13:07परेशान यह होता है जब वो कामयाबी और
  272. 13:09नाकामी को अल्लाह के गैर में तसबुर कर
  273. 13:12लेता है। अल्लाह के गैर में तसबुर कर लेता
  274. 13:15है। इसलिए बात ज़हन में रहे सबके की अल्लाह
  275. 13:18ताला की मशीत उसकी चाहत कायनात के नक्शों
  276. 13:21में नहीं है। अल्लाह ताला की जो चाहत है
  277. 13:24उसकी रज़ा जो है और ईमान वालों के चाहत के
  278. 13:28मुताबिक फैसलों का होना है। उसका ताल्लुक
  279. 13:30महज अल्लाह के अहकाम से है असबाब से नहीं
  280. 13:32है। सुमैन अलैहिस्सलाम ने इस नाकामी को
  281. 13:35देख कर समझ लिया। इस नाकामी को देख कर समझ
  282. 13:39लिया कि हमसे कोई ग़लती हुई है। हालांकि
  283. 13:42खैर का इरादा है। हालांकि खैर का इरादा
  284. 13:45है। हालांकि खैर का इरादा है। लेकिन समझ
  285. 13:48गए कि हमसे कोई गलती हुई है। फ़रमाया हुज़ूर
  286. 13:51अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने के अगर
  287. 13:54सुलेमान अलैहिस्सलाम उस वक्त इंशाल्लाह कह
  288. 13:57लेते। उस वक्त अगर इंशाअल्लाह कह लेते तो
  289. 13:59100 की 100 बीवियों से 100 बेटे पैदा होते
  290. 14:02और सब अल्लाह के रास्ते के गुड़ सवार और
  291. 14:04मुजाहिद बनते। मगर सुमा अल सलाम इंशाल्लाह
  292. 14:08कहना भूल गए। सोचने की बात है। वो असबाब
  293. 14:12जो अल्लाह ने अंबिया अल सलाम को राजी होकर
  294. 14:14दिए हैं। वो असबाब जो अल्लाह ने अंबिया अल
  295. 14:17सलाम को राजी होकर दिए हैं। जब अंबिया अली
  296. 14:19सलाम उन असबाब में अल्लाह की चाहत के बगैर
  297. 14:23अपने इरादे से कामयाब नहीं हो सकते। तो
  298. 14:26फिर इस जमाने में जो असबाब अल्लाह ने
  299. 14:27गैरों को नाराज होकर दिए हुए हैं, मुसलमान
  300. 14:30असबाब से उम्मीद कैसे कर सकता है? सोचने
  301. 14:32की बात है। वो असबाब अल्लाह ने अंबिया
  302. 14:35सलाम को राजी होकर दिए हैं। वो उन असबाब
  303. 14:37में अल्लाह की चाहत के बगैर कामयाब नहीं
  304. 14:39हो सकते। तो फिर मुसलमान इस जमाने में
  305. 14:42गैरों के उन असबाब से कैसे उम्मीद किए हुए
  306. 14:44हैं? जो सब अल्लाह ने गैरों को नाराज होकर
  307. 14:47दिए हुए हैं।
  308. 14:49इसलिए हमें अर्ज किया अर्ज करना चाहते थे
  309. 14:52कि अल्लाह ताला की चाहत और उसकी कुदरत
  310. 14:55उसके अहकाम के साथ है। वरना कायनात की
  311. 14:58शक्लें तो महज अमल के इम्तिहान के लिए हैं
  312. 15:01कि देखिए तुम्हें अच्छा अमल करने वाला कौन
  313. 15:03है? तुम में अच्छा अमल करने वाला कौन है?
  314. 15:06इसीलिए दुनिया को मुजयन किया ताकि देखें
  315. 15:09कि तुम किसी बनी हुई चीज को देखकर बनाने
  316. 15:12वाले को भूल तो नहीं जाते। क्योंकि बना
  317. 15:14हुआ बनाने वाले के तारूफ़ के लिए है। बना
  318. 15:17हुआ बनाने वाले के
  319. 15:19बना हुआ बनाने वाले के तारुफ़ के लिए है।
  320. 15:22धोखा ये लगा मुसलमानों को कि बना हुआ
  321. 15:25बनाने वाले की जात से फायदा उठाने के लिए
  322. 15:27है। सोचो उस कितना बड़ा कितना बड़ा फर्क है।
  323. 15:30लोग समझते हैं कि बना हुआ बनाने वाले से
  324. 15:33फायदा उठाने के लिए है। ऐसा हरगिज़ नहीं
  325. 15:35है। बना हुआ बनाने वाले से फायदा उठाने के
  326. 15:37लिए नहीं है। सारी कायनात और कायनात की
  327. 15:40सारी शक्लें ये अल्लाह के ज़ात से फायदा
  328. 15:43उठाने का ज़रिया नहीं है। बल्कि बना हुआ
  329. 15:46बनाने वाले के तारूफ़ के लिए है। बना हुआ
  330. 15:49बनाने वाले के तारूफ़ के लिए है। बना हुआ
  331. 15:52बनाने वाले के तारुफ़ के लिए है। बना हुआ
  332. 15:56बनाने वाले के तारुफ़ के लिए है। बनाने
  333. 15:58वाले से फायदा उठाने के लिए नहीं है। धोखा
  334. 16:01यहां से लगा रहेगा मुसलमानों को। वह समझते
  335. 16:03हैं कि अल्लाह ने कायनात को इसलिए बनाया
  336. 16:06है ताकि इसके ज़रिए हम अपनी ज़रियात पूरी
  337. 16:09करें। और मुज़न इसलिए किया है ताकि लोग इस
  338. 16:12ज़ीनत की चीज़ से ज़ीनत हासिल करें। नहीं,
  339. 16:16बल्कि कायनात को मुज़न इसलिए किया है कि
  340. 16:19अल्लाह देखना चाहते हैं कि तुम इसमें लगकर
  341. 16:21हमें याद रखते हो या नहीं। चुनांचे अल्लाह
  342. 16:24ताला ने इधर तो आजमाया सुलेमान अल सलाम को
  343. 16:28एक खैर के इरादे में असबाब में आजमाया।
  344. 16:31इधर तो असबाब में आजमाया और उधर उधर
  345. 16:35दुनिया की मुजहियन चीजों में आजमाया। ऐसे
  346. 16:38घोड़े जो इंतहाई खूबसूरत इंतहाई खूबसूरत और
  347. 16:42उनके ऐसे पर थे कि वो उन परों के जरिए
  348. 16:45फ़िज़ा में आसानी से उड़ उ- उ- उ- उ- उ- उ-
  349. 16:46उ- उ- उ- उ- उड़ सकते थे सवारी को लेकर हवा
  350. 16:48में उड़ने वाले ज़मीन पर दौड़ने वाले और
  351. 16:52समंदरों में तैरने वाले घोड़े ऐसे नादिर
  352. 16:55नायाब अल्लाह ताला ने ऐसे घोड़े तैयार किए
  353. 16:58अपनी कुदरत से सुमाई अलैहिस्सलाम उनको
  354. 17:01देखने में मशगूल हो गए इसलिए फरमाया कि
  355. 17:04देखो जब तुम कोई चीज बनी हुई देखो तो, उस
  356. 17:07चीज़ के देखने के साथ-साथ अल्लाह का तसव्वर
  357. 17:11जरूर कर लेना। अल्लाह का तसवुर जरूर कर
  358. 17:14लेना। इसलिए है कि किसी भी चीज़ को अल्लाह
  359. 17:17के तसवुर के बगैर देखना ग़फ़लत है। किसी भी
  360. 17:20चीज़ को अल्लाह के तसवुर के बगैर देखना है।
  361. 17:24ग़फ़फ़लत है। किसी भी चीज़ को अल्लाह के तसवुर
  362. 17:27के बगैर देखना ग़फ़फ़लत है। और हर चीज़ को
  363. 17:30अल्लाह के तसबुर से देखना जिक्र है। बस
  364. 17:33याद रखो। जिस चीज़ को देख कर अल्लाह का
  365. 17:35ख्याल ना आए वो चीज़ घाफिल कर देगी। वो चीज
  366. 17:38गाफ़िल कर देगी। यहां तक के जिस चीज़ का
  367. 17:41देखना हराम है, जिस चीज़ को देखना हराम है,
  368. 17:45अगर उस चीज़ को देखने के वक़्त अल्लाह का
  369. 17:48ख्याल नहीं आया, अगर उस चीज़ को देखने के
  370. 17:50वक़्त अल्लाह का ख्याल नहीं आया, तो यह इस
  371. 17:52हराम से बच नहीं सकेगा। हराम से बच नहीं
  372. 17:55सके। क्यों? इसलिए कि उस चीज़ को देखने के
  373. 17:58वक़्त अल्लाह का ख्याल नहीं आया। जितना बना
  374. 18:01हुआ है, उस सब के देखने के वक़्त अल्लाह को
  375. 18:04तसवुर करना जरूरी है। क्योंकि आदमी जिस
  376. 18:07चीज़ को भी अल्लाह के तसवुर के बगैर
  377. 18:09देखेगा, जिस चीज़ को भी अल्लाह केव अल्लाह
  378. 18:12के तसवुर के बगैर जिस चीज़ को भी देखेगा,
  379. 18:15वह उस चीज़ की ज़ेबो ज़ीनत और उस चीज़ की
  380. 18:19खूबसूरती को देख कर अल्लाह को भूल जाएगा।
  381. 18:22चुनांचे सुलेमान अलै सलाम घोड़े देखने में
  382. 18:24मशगूल हो गए। और वह ऐसे खूबसूरत थे और ऐसे
  383. 18:28अजीबो गरीब घोड़े थे कि उनको देखतेदे वक्त
  384. 18:32का अंदाजा ना रहा कि क्या वक्त हो रहा है।
  385. 18:35इसी में सूरज गुरूब हो गया। सूरज
  386. 18:38गुरूब हो गया। अरे असर की नमाज कजा हो गई।
  387. 18:41उसी की नमाज़ असर कजा हो गई। सोचो तो सही।
  388. 18:44घोड़े देखने में असर कजा हो गई। फरमाया
  389. 18:47लाओ तलवार लाओ और ये सारे घोड़े काट कर
  390. 18:50खत्म कर दो। इसलिए कि जो चीज़ अल्लाह की
  391. 18:54याद से गाफ़िल करे वह बाक़ी रखने के काबिल
  392. 18:56नहीं है। जो चीज़ अल्लाह की याद से गाफ़िल
  393. 18:59करे। हमने दुनिया को मुज़न किया ही इसलिए
  394. 19:02है हम ये देखना चाहते हैं कि दुनिया की
  395. 19:04ज़ेबो ज़ीनत को देखने के वक़्त तुम्हें नमाज़
  396. 19:07याद रहती है या नहीं। हमारी याद आती है या
  397. 19:09नहीं। हम ये अर्ज करना चाहते हैं।
  398. 19:13अल्लाह ने आजमाया। इन घोड़ों को देखने में
  399. 19:16असर की नमाज़ कजा हो गई। घोड़े देखने में
  400. 19:20असर की नमाज़ कजा हो गई। तलवार लेकर सारे
  401. 19:24सारे घोड़े काट डाले। अल्लाह ने देख लिया
  402. 19:26कि जिन लोगों के नजदीक दुनिया की कोई
  403. 19:29हैसियत नहीं। मेरे मेरी इबादत के मुकाबले
  404. 19:32में मेरी इबादत के मुकाबले में। अल्लाह
  405. 19:35ताला ऐसे लोगों के अमल को जाया नहीं करते।
  406. 19:38अल्लाह ने फ़रमाया, सूरज को वापस लाओ।
  407. 19:40हुकुम दिया सूरज वापस निकले। सूरज वापस
  408. 19:43निकले। सूरज वापस निकले ताकि आज की असर
  409. 19:47पड़े। मुझे ऐ अल्लाह मुझे आज की असर चाहिए
  410. 19:50और कुछ नहीं चाहिए। सारी बादशाहत एक तरफ
  411. 19:52और घोड़े का नुकसान हो हुआ करे। मुझे आज की
  412. 19:55असर चाहिए। मुझे आज की असर चाहिए। अल्लाह
  413. 19:58ताला ने सूरज को वापस निकाला।
  414. 20:02दिन वापस आया। दिन
  415. 20:04वापस आया
  416. 20:04दिन वापस आया और वाकई जिन्हें अपने अमल के
  417. 20:08जाया होने का जिन्हें अपने अमल से
  418. 20:10मुनासिबत होती है। और जिन्हें वाकई अपने
  419. 20:12अमल से मोहब्बत होती है ना वो अमल के
  420. 20:15मुकाबले में किसी चीज़ की परवाह नहीं करते।
  421. 20:17यहां तो एक छोटी सी दुकान लिए बैठा है।
  422. 20:20अल्लाह ने मुझे रिज़्क़ देने के लिए दुकान
  423. 20:22दी है। अल्लाह ने मुझे रिज़्क़ देने के लिए
  424. 20:26दुकान दी है। छोटी सी दुकान लिए बैठा है।
  425. 20:28इस दुकान के मुकाबले में अगर नमाज़ आ गई।
  426. 20:32इस दुकान के मुक़ाबिले में अगर नमाज़ आ गई,
  427. 20:34फ़र्ज़ नमाज़ दुकान के मुक़ाबिल आ गई, तो यह
  428. 20:37सोचेगा के क्या करूं? ग्राहक को माल दूं
  429. 20:40या नमाज़ के लिए जाऊं। और वहां 50 हज़ार का
  430. 20:44बाग़। बाग़ भी ऐसी चीज़ है के जो इंसान के
  431. 20:48माश और दुनिया में गुजारे के लिए है। बाग़
  432. 20:51भी ऐसी चीज़ जो इंसान के माश और गुजारे के
  433. 20:54लिए है। वहां तो घोड़े दिखलाए अल्लाह ने।
  434. 20:57सुबाल सलाम को तो घोड़े दिखलाए। वो घोड़े
  435. 21:00देखने में असर भूल गए। हालांकि घोड़े माश
  436. 21:03के लिए नहीं थे। वो घोड़े वो तो दिलगी के
  437. 21:07लिए या ये कहा जाए के ज़बो ज़ीनत के लिए जी
  438. 21:12हां कहने के लिए ज़बो ज़ीनत के लिए फलक जमाल
  439. 21:17तो ये जमाल और फक्र के लिए भी होते हैं।
  440. 21:21सुनो तवज्जो से बात। वहां तो असर की नमाज़
  441. 21:24कजा हुई। सिर्फ घोड़े देखने की वजह से
  442. 21:27फरीदा कजा हुआ। मैं अर्ज कर रहा के सहाबी
  443. 21:32बाग में नमाज़ पढ़ रहे हैं। वही एक आमदनी का
  444. 21:35जरिया, वही एक
  445. 21:36आमदनी का जरिया। घोड़े तो आमदनी के लिए
  446. 21:40नहीं थे। लेकिन बाग के बाग आमदनी का ज़रिया
  447. 21:43है। पूरे साल का खर्च बाग से निकलता है।
  448. 21:45पूरे साल का खर्च
  449. 21:46बाग।
  450. 21:47बाग से निकलता है। वहां नफिल नमाज़ पढ़ रहे
  451. 21:50थे। सहाबी बाग में नफिल नमाज़ पढ़ रहे थे।
  452. 21:53जाहिर बात है कि वो मुमकिन ही नहीं था कि
  453. 21:56फर्ज नमाज़ बाग में पढ़ें। फ़र्ज़ नमाज़ बाग
  454. 21:58में पढ़ें। मुमकिन ही नहीं था कि भाई नमाज़
  455. 22:00तो मस्जिद में पढ़ी जाती है। यह जाहिर बात
  456. 22:02है के वह फ़र्ज़ नमाज़ बाग में क्या पढ़ते?
  457. 22:05नफिली पढ़ रहे थे। नमाज़ के दौरान नज़र पड़ी।
  458. 22:10अंगूर का खौशा लटका हुआ था। उस पर परिंदा
  459. 22:13बैठकर अंगूर खा रहा था। वह मंज़र इतना
  460. 22:16खूबसूरत लगा। उस परिंदे की खूबसूरती और
  461. 22:19लटका हुआ खौशा अंगूर का। एक रिवायत में है
  462. 22:22उस अंगूर के खोसे पर नजर पड़ी पर याद ना
  463. 22:25रहा कि रकात कौन सी है। हालांकि नफिल नमाज़
  464. 22:28है। नफिल नफिल नमाज़ है। फर्ज तो नहीं था।
  465. 22:33या आप गुमान कर लेते जो गालिब गुमान होता
  466. 22:36कि भाई अगर गालिब गुमान ये है कि तीन रकात
  467. 22:39हुई तो एक और पढ़ लेते। गालिब गुमान ये कि
  468. 22:42एक रकात हुई तो एक और पढ़ लेते। जो गालिब
  469. 22:44गुमान उसप अमल कर लेते। लेकिन, जब यह देखा
  470. 22:47कि इस अंगूर पर परिंदे के बैठने का मंज़र
  471. 22:50यही है कि उस परिंदे को बाग़ से निकलने का
  472. 22:53रास्ता ना मिला। इतना घना बाग़ था। इतना
  473. 22:57घना बाग़ था कि परिंदा उसके अंदर उड़ता रहा।
  474. 23:00लेकिन, पत्तों की ज़्यादती और दरख्तों के
  475. 23:03घने होने की वजह से परिंदे को बाग से
  476. 23:05निकलने का रास्ता नहीं मिला। थोड़ी देर ज़हन
  477. 23:08इस पे रहा जिससे याद ना रहा कि नफिल की
  478. 23:11रकात कौन सी? अल्लाहू अकबर। जिन्हें नफिल
  479. 23:15नमाज़ में बाप की वजह से खलील पैदा हो,
  480. 23:18उन्होंने उस बाग को फ़ौरन सदका कर दिया। उस
  481. 23:22बाप को फ़ौरन सबका कर दिया कि जो बाग
  482. 23:26जो सबब हालांकि बाप कोई दिलगी के लिए नहीं
  483. 23:29बल्कि माश के लिए है। माज़ के लिए है। इसी
  484. 23:31पर मज़दार है। पूरे साल के खर्चे से निकलता
  485. 23:34है। जो नवाफ़िल को में खलब पैदा होने की
  486. 23:37वजह से हज़ार के बाप को फ़ौरन जुक्ता कर दे।
  487. 23:40यह कहकर कि इस बाप की वजह से नफील नमाज़
  488. 23:42ख़राब हुई है। उनके यहां फ़राइज़ का एहतमाम
  489. 23:45कितना होगा? उनके लिए फ़राइज़ का एहतमाम
  490. 23:48कितना होगा जो नफिल के लिए? हैं? नफ़िल के
  491. 23:51लिए बाक़ छोड़ दे। के नफिल नवाफ़िल
  492. 23:56ज़माने में तो। लोग नवाफ़िल को ज़ायद चीज़
  493. 23:59समझते हैं। हालांकि नफिल ज़ायद नहीं है।
  494. 24:02बल्कि नवाफ़िल मज़ीद है। नवाफ़िल मज़ीद है।
  495. 24:05जायद नहीं। जायद तो कहते हैं फज़ूल को नाउ।
  496. 24:08ज़ायद तो कहते हैं ऐसी चीज़ जिसका करना कोई
  497. 24:11ज़रूरी नहीं है। यह ज़ायद है। नवाफ़िल जायद
  498. 24:14नहीं है। बल्कि नवाफ़िल मज़ीद है। जी हां।
  499. 24:17नवाफ़िल मज़ीद। नवाफ़िल मज़ीद है। वहाबहु इसाक
  500. 24:22व याकूब नाफ़िला। नाफ़िल नफ़िल कहते हैं मज़द
  501. 24:25को कि हमने इतने इनामात तो किए लेकिन
  502. 24:28इब्राहिम को इसक और याकूब और मज़द दिए। जी
  503. 24:30हां। नाफिल नफिल कहते हैं मज़द को। जायद को
  504. 24:33नहीं। लोग नवाफिल को जायद चीज समझते हैं।
  505. 24:35हालांकि नवाफिल फ़राइज की तकमील और अल्लाह
  506. 24:39के कुर्ब का जरिया है। तो मैंने अर्ज किया
  507. 24:41कि सबब किस लिए होता है? महज अमल को परखने
  508. 24:45के लिए। हम देखना चाहते हैं। तुम में
  509. 24:47अच्छा अमल किसका है? तुम में देखना अच्छा
  510. 24:50अमल किसका है? तो दोस्तों, अजीजो बादशाह,
  511. 24:52खुलासा यह हुआ कि कायनात की जितनी भी
  512. 24:55शक्लें हैं, यह सारी शक्लें सिर्फ अल्लाह
  513. 24:58के तारुफ़ के लिए है। बना हुआ बनाने वाले
  514. 25:01के तारुफ़ के लिए है। बना हुआ बनाने वाले
  515. 25:03से फायदा उठाने के लिए नहीं है। जो लोग
  516. 25:06समझते हैं कि बना हुआ बनाने वाले से फायदा
  517. 25:09उठाने के लिए है। वो तो शक्लें बनाकर
  518. 25:12अल्लाह के सामने पेश करते हैं। शक्लें
  519. 25:14बनाकर अल्लाह के सामने पेश करते हैं।
  520. 25:16तिजारत की शक्ल, जरात की शक़ल, हुकूमत की
  521. 25:19शक़ल, शकल बनाते हैं। हर शक्ल को बनाकर
  522. 25:22अल्लाह के सामने पेश करते हैं। के ए
  523. 25:25अल्लाह तू इस शक्ल पर यह कर दे। मैं किस
  524. 25:28तरह समझाऊं? इस जमाने के मुसलमान बिचारे
  525. 25:31वह अल्लाह के सामने ये भी पेश कर दें कि ऐ
  526. 25:34अल्लाह ये हुकूमत की शक्ल है। तू इस शक्ल
  527. 25:37को के जरिए हमारा काम कर दे। जो ताजिर हैं
  528. 25:40वो दुकान की शक्ल को जो सियासत में है वह
  529. 25:43हुकूमत की शक्ल को जो जरा में है वो जरा
  530. 25:46की शक्ल को जो मुलाजमत में है मुलाजमत की
  531. 25:48शक्ल को जितने भी मुसलमान इस जमाने में
  532. 25:51हैं वो शक्लें बनाकर अल्लाह को पेश करते
  533. 25:53हैं अल्लाह से मदद लेने के लिए हालांकि
  534. 25:56कितनी आसान बात है कि जिस चीज पर अल्लाह
  535. 25:59का वादा नहीं जिस पर अल्लाह का वादा नहीं
  536. 26:03अल्लाह को वो चीज पेश क्यों कर रहे हैं
  537. 26:04कैसी आसान बात जिस पर अल्लाह का
  538. 26:07वादा नहीं तुम अल्लाह अल्लाह को वो चीज
  539. 26:09पेश क्यों कर रहे हैं? अल्लाह को वो चीज
  540. 26:11पेश करो जिस पर उसका वादा है। अल्लाह को
  541. 26:13वो चीज पेश करो। जिस पर उसका वादा है।
  542. 26:15अल्लाह को वो चीज पेश करो जिसप उसका वादा
  543. 26:18है। वो चीज क्यों पेश कर रहा है जिस पर
  544. 26:20उसका वादा नहीं।
  545. 26:22अगर ज़मीन से लेकर आसमान तक के खले को सोने
  546. 26:24से भर दिया जावे और कोई शख्स अल्लाह के
  547. 26:27सामने ये सब कुछ पेश कर दे जहन्नुम के आग
  548. 26:30से बचने के लिए तो कबूल नहीं किया जाएगा।
  549. 26:33सोचो तो सही। फिर क्या हैसियत रह गई? इन अ
  550. 26:37अस्बा की जो हम तैयार करके बनाकर अल्लाह
  551. 26:40से कहते हैं कि ऐ अल्लाह मैंने तो ये बना
  552. 26:42लिया है। मैंने तो ये
  553. 26:44बना लिया है। अब तू इसमें कामयाबी डाल दे।
  554. 26:47अरे सोचो तो सही। कितनी उल्टी सोच है
  555. 26:50मुसलमानों की। मैंने तो जमींदारा कर लिया
  556. 26:52है। ऐ अल्लाह अब तू इसमें गल्ला तू उगा
  557. 26:55दे। मैंने तो दुकान लगा ली है। ऐ अल्लाह
  558. 26:57तू इसमें आमदनी तू करा दे। कितने बे-
  559. 27:00बेक़्ली की सोच है। कितनी बेकली की सोच है।
  560. 27:03कि यूं कहते हैं कि कोशिश करना बंदे के
  561. 27:05जिम्मे है। कामयाबी का कामयाब करना अल्लाह
  562. 27:08के जिम्मे है। कितनी गलत सोच है। कितनी?
  563. 27:11गलत सोच है। कोशिश करना बंदे के ज़िम्मे
  564. 27:14कामयाब करना।
  565. 27:15अल्लाह के जिम्मे। कितनी गलत सोच है।
  566. 27:17मुसलमान की। हालांकि यह मामला अल्लाह के
  567. 27:20गैरों के साथ है। यह मामला अल्लाह के
  568. 27:23गैरों के साथ है। सच्ची सच्ची बात है। इस
  569. 27:25जमाने में समझ में आनी मुश्किल है। यह
  570. 27:27मामला अल्लाह के गैरों के साथ है कि तुम
  571. 27:29कोशिश करो। मैं तुम्हें कामयाब करूंगा।
  572. 27:31तुम कोशिश करो। मैं तुम्हें बिलकुल पक्की
  573. 27:34बात है। यह मामला अल्लाह का
  574. 27:36गैरों के साथ है। ये मामला अल्लाह का
  575. 27:38गैरों के साथ है। तुम कोशिश करो। मैं
  576. 27:40तुम्हें कामयाब करूंगा। मामला यह अल्लाह
  577. 27:42का मुसलमानों के साथ नहीं है। मुसलमान गलत
  578. 27:45सोच रहा है कि जरा तिजारत मुलाजिमत इस पर
  579. 27:48हम कोशिश करेंगे। कामयाब अल्लाह करने वाले
  580. 27:51हैं। नहीं। देखो मेरे दोस्तों अज़ीज़ों
  581. 27:54अल्लाह की मशीत को अस्बा में तलाश मत करो।
  582. 27:57जब अस्बा पर वादे नहीं तो असबाब के साथ
  583. 28:00अल्लाह की चाहत क्यों होगी? अल्लाह की
  584. 28:01कुदरत वादों के साथ है ना? और वादे जो है
  585. 28:04वह हुक्मों के साथ हैं। वादे हुक्मों के
  586. 28:07साथ हैं। शक्लों के साथ नहीं है। शक्लों
  587. 28:10के साथ है। खूब समझ लो अच्छी तरह से। किसी
  588. 28:14गलत खयाल में मत जाना। जो मैं कह रहा हूं
  589. 28:16उसको समझना जरूरी है। लोग इस रुख पर चल
  590. 28:19रहे हैं। की कोशिश करना हमारे जिम्मे
  591. 28:22कामयाबी। अल्लाह के जिम्मे।
  592. 28:25तो खैर तो इसका मतलब यह हुआ के कायनात
  593. 28:29जाब्ता बन जाएगी। लोग कायनात पर मेहनत
  594. 28:32करेंगे, अल्लाह से उम्मीद करेंगे। हालांकि
  595. 28:35कितनी साफ़ बात है कि कायनात पर मेहनत करने
  596. 28:38वाले से, कायनात में मेहनत करने वाले को
  597. 28:40अल्लाह से उम्मीद करने का कोई हक़ नहीं।
  598. 28:42कायनात से मेहनत करने वाले को अल्लाह से
  599. 28:44उम्मीद करने का कोई हक़ नहीं। कायनात पे
  600. 28:48मेहनत करने वाले को, अल्लाह से उम्मीद
  601. 28:50करने का कोई हक़ नहीं। कायनात पर मेहनत
  602. 28:53करके तो, वही उम्मीद कर सकता है ना अल्लाह
  603. 28:55से, जिससे अल्लाह ने कायनात पर वादा किया
  604. 28:58हो। हमारी बात तवज्जो से सुनो। कायनात में
  605. 29:00मेहनत करके तो अल्लाह से उम्मीद वही करेगा
  606. 29:02ना जिससे अल्लाह ने कायनात पर वादा किया
  607. 29:06है। इसी आसान बात है। कायनात में मेहनत
  608. 29:09करके तो अल्लाह से उम्मीद उसको करनी चाहिए
  609. 29:12जिससे अल्लाह ताला ने कायनात पर वादा किया
  610. 29:15है। जिनसे कायनात पर वादा नहीं किया।
  611. 29:18जिनसे अल्लाह ने कायनात पर वादा नहीं
  612. 29:20किया। वो कायनात पर कायनात पर मेहनत करके
  613. 29:23अल्लाह से उम्मीद क्यों करें? है। हम ये
  614. 29:25अर्ज करना चाहते हैं। जब मुसलमान से
  615. 29:27अल्लाह का वादा कायनात पर नहीं तो फिर
  616. 29:29मुसलमान कायनात की शक्लें बनाकर अल्लाह से
  617. 29:32उम्मीद क्यों करता है? मुसलमान कायनात
  618. 29:34बनाकर अल्लाह से उम्मीद क्यों करता है? ये
  619. 29:36मैं समझाना चाहता हूं। लोग कहते हैं दुकान
  620. 29:39करो अल्लाह से उम्मीद रखो। जमींदारा करो,
  621. 29:42अल्लाह से अल्लाह की उम्मीद रखो। दवा खाओ,
  622. 29:45अल्लाह से शिफा की उम्मीद रखो। मुलाजमत
  623. 29:48करो, अल्लाह से तनख्वाह मिलने की उम्मीद
  624. 29:50करो। लाखों मुलाजमीन मुल्कों से वापस कर
  625. 29:52दिए गए हिंदुस्तान। जी हां। कितने? लाखों
  626. 29:55मुलाजमी मुल्कों से वापस कर दिया। लाखों
  627. 29:57की तादाद जाओ वापस। क्यों भाई? हम मुलाजमत
  628. 30:01करते हैं हमें तनख्वाह दो के नहीं।
  629. 30:02तनख्वाह देने को नहीं है। वापस जाओ। मैं
  630. 30:05क्या बताऊं? मुसलमान
  631. 30:09असबाब बदलता है। कामयाबी हासिल करने के
  632. 30:12लिए। अगर असबाब में कामयाबी का वादा होता,
  633. 30:15तो लोग अपने असबाब क्यों तब्दील करते? लोग
  634. 30:17अपने असबाब तब्दील क्यों करते? आप देखिए
  635. 30:20तो सही। तिजारत में नाकाम होते गए, होते
  636. 30:22गए, होते गए। यहां तक के तय कर लिया कि अब
  637. 30:25तिजारत करनी ही नहीं, मुलाजमत करनी है। जी
  638. 30:27हां। जमींदारे में नाकाम होते गए, होते
  639. 30:29गए, होते गए। फिर यह तय किया कि नहीं अब
  640. 30:31ज़मीदारा करना ही नहीं है। अब तो तिजारत
  641. 30:34करनी है। जी हां। मैं सोचता हूं के अगर
  642. 30:37सबब पर वादा हो तो लोग दवाई क्यों बदल
  643. 30:39देते हैं? दवाई क्यों क्यों तब्दील करते
  644. 30:42हैं? लोग दवाई तब्दील क्यों करते हैं?
  645. 30:44डॉक्टर बदल देते हैं, दवाएं बदल देते हैं।
  646. 30:46देखो दोस्तों, अजीजों
  647. 30:48फरमाते थे असबाब में कामयाबी का नजर आना
  648. 30:52कामयाबी का धोखा है। इस बात को बहुत गौर
  649. 30:55से तवज्जो से समझना पड़ेगा कि लोग यह कहते
  650. 30:58हैं कि मेहनत करना, कोशिश करना हमारे
  651. 31:00जिम्मे है। कामयाब करना अल्लाह के जिम्मे
  652. 31:03है। बस ये मामला, ये जाब अल्लाह ताला का
  653. 31:07गैरों के साथ है। तुम शक्लें बनाओ। तुम
  654. 31:10शक्लें बनाओ। मैं हर शक्ल में तुम्हारे
  655. 31:12लिए कामयाबी का फैसला करूंगा। ये अल्लाह
  656. 31:15का वादा कुरान में है। किनसे?
  657. 31:16गैरों से।
  658. 31:17गैरों से। जी हां। ये वादा अल्लाह का
  659. 31:19कुरान में गैरों से है। जी हां। कि हम
  660. 31:22तुम्हें दुनिया के ऐतबार से जर्रा बराबर
  661. 31:26भी नुकसान में नहीं रखेंगे। इन
  662. 31:30दुनिया
  663. 31:32के जो हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते हैं
  664. 31:34और आखिरत का इंकार करते हैं। वो दुनिया के
  665. 31:38दुनिया के असबाब से राजी हो गए। और
  666. 31:40मुतमाइन हो गए दुनिया से। वह दुनिया से
  667. 31:42मुतईन हो गए। मुसलमान के लिए कायनात के
  668. 31:45नक्से सबब नहीं। मुसलमान के लिए कायनात के
  669. 31:48नक्सेशे सबब नहीं। मुसलमान के लिए अल्लाह
  670. 31:52का अमल और अहकाम और आमाल यही असबाब हैं।
  671. 31:55इसका मतलब हरगिज़ यह नहीं की मुसलमान अस्बा
  672. 31:58इख्तियार ना करे। क्योंकि अगर मुसलमान
  673. 32:00असबाब इख्तियार नहीं करेगा। तवज्जो से
  674. 32:03सुनना बात। अगर मुसलमान अस्बा इख्तियार
  675. 32:05नहीं करेगा तो मैं ये नहीं कहता के हाजत
  676. 32:07पूरी नहीं होगी। बल्कि मैं ये कहता हूं कि
  677. 32:10अगर मुसलमान असबाब इख्तियार नहीं करेगा तो
  678. 32:12फिर मुसलमान इम्तिहान से नहीं गुजरेगा।
  679. 32:15दूसरा इम्तिहान से नहीं गुजरेगा। अल्लाह
  680. 32:17ताला ने असबाब रखे हैं इम्तिहान के लिए।
  681. 32:20असबाब रखे हैं इम्तिहान के लिए। हम
  682. 32:23तुम्हें तिजारत से गुजारेंगे। और ऐसा
  683. 32:26लाजिम और जरूरी होगा तुम्हारे लिए तिजारत
  684. 32:28करना। क्योंकि अल्लाह ताला ने तुम्हारी
  685. 32:31फितरत में तिजारत की जरूरत रखी है।
  686. 32:33फरिश्तों में नहीं रखी। ना सोने की, ना
  687. 32:36बीवी की, ना तजारत की, ना भूख प्यास की।
  688. 32:39वो रोजा रखें तो उनका रोजा क्या? वो जागते
  689. 32:42रहे तो उनका जागना क्या? जी हां। लेकिन
  690. 32:46मुसलमान को जो अहकाम दिए हैं वो सारे
  691. 32:49अहकाम इसकी तबियत और फितरत के खिलाफ दिए
  692. 32:53हैं। देखो, सुनो। नींद का तकाजा दिया,
  693. 32:56नमाज़ फर्ज कर दी। नींद का तक़ाज़ा, नमाज़ फ़ज़
  694. 32:58दी। नहीं, नींद से उठकर नमाज़ पढ़ो। ये नहीं
  695. 33:01कि जब आंख खुले पढ़ लो। यह तो वह लोग करते
  696. 33:03हैं अल्लाह मुझे माफ फरमावें। जिनके नजदीक
  697. 33:06नमाज की कोई अहमियत नहीं होती, वह तो यह
  698. 33:08तो वह करते हैं। के भाई जब आंख खुले पढ़
  699. 33:10लिया करो नहीं, हराम है। नमाज को कजा करना
  700. 33:14हराम है। अगर नींद की वजह से क्यों ना हो,
  701. 33:16हालांकि नींद मौत की बहन है। नींद मौत की
  702. 33:18बहन है। लेकिन नमाज को कजा करना अगर सोने
  703. 33:22की वजह से भी हो तब भी हराम है। ये नहीं।
  704. 33:24आजकल मिजाज ये बन गया कि वो तो सो रहे थे
  705. 33:27ना? हां हां। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि
  706. 33:30वसल्लम की एक मर्तबा सोने में नमाज़ कजा
  707. 33:33हुई। वो भी अल्लाह ने इसलिए की ताकि आप इस
  708. 33:36बात की तालीम दे सके लोगों को कि अगर नमाज़
  709. 33:38कजा हो जाए तो उसको कैसे पढ़ा जाए? नमाज़ की
  710. 33:41कजा कैसे हो? सिर्फ इसलिए सिर्फ इसलिए कि
  711. 33:46लोगों को कजा नमाज़ के पढ़ने का मसला बता
  712. 33:48बतलाने के लिए अल्लाह ने नमाज़ आपकी कजा
  713. 33:51कराई। मैंने अर्ज किया के नींद का तकाजा
  714. 33:56रखा। नमाज़ फर्ज कर दी। भूख का तकाजा रखा,
  715. 33:59रोजा फर्ज़ कर दिया। भूख का तकाजा, रोजा
  716. 34:02फर्ज़। माल का तकाजा रखा, जकात फर्ज़ कर दी।
  717. 34:05तो, मैं अर्ज करता हूं कि अगर माल का
  718. 34:08तक़ाज़ा ना रखते, तो ज़कात देना कोई कमाल
  719. 34:10होता।
  720. 34:12अगर माल का तक़ाज़ा ना रखते, तो जकात देना
  721. 34:15कोई कमाल होता। अगर दीन का तकाजा ना रखते,
  722. 34:18तो नमाज़ पढ़ना कोई कमाल होता। अगर ख्वाहिश
  723. 34:21का तकाजा ना रखते, तो जिना से बचना कोई
  724. 34:23कमाल होता। समझ में आई ना बात? अगर
  725. 34:25ख्वाहिश का तकाजा ना रखते इंसान के अंदर,
  726. 34:28तो जिनाह से बचना कोई कमाल होता। इधर
  727. 34:30ख्वाहिश का तकाजा रखा इंसान के बदन में और
  728. 34:33जिना को हराम किया। इसी तरह तिजारत भी है।
  729. 34:36ऐसे ही ऐसे ही तिजारत भी है। ये हम अर्ज
  730. 34:39करना है। ऐसे ही तिजारत भी है। कि कमाने
  731. 34:41का तक़ा रखा और कमाई के लाइन का हुकुम दिया
  732. 34:44कि ऐसे कमाओ।
  733. 34:47इसलिए तिजारत असल नहीं है। तिजारत में जो
  734. 34:49हुकुम है वो असल है। उस हुकुम की वजह से
  735. 34:52तिजारत से गुजार रहे हैं। जैसे नमाज़ फर्ज
  736. 34:54की है और नींद मुसल्लत कर दी कि इस नींद
  737. 34:58को छोड़ो नमाज़ के लिए। नींद को छोड़ो नमाज़
  738. 35:01के लिए। पानी को छोड़ो रोज़े के लिए। पानी
  739. 35:03को छोड़ो रोज़े के लिए। ये थी बात। ऐसे ही
  740. 35:08जैसे ये सारे अहकाम हैं। इन अहकाम के
  741. 35:10खिलाफ इंसान के अंदर तकाज़े हैं। बस इसी
  742. 35:13तरह तिजारत भी है। इसी तरह
  743. 35:15तिजारत भी है। समझ में आ गई ना बात? तो
  744. 35:19मैंने अर्ज ये करना है कि तिजारत से
  745. 35:22गुजारेंगे इसलिए ताकि देखें कि ये इस
  746. 35:25तिजारत में हलाल कमाता है या हराम। और जब
  747. 35:28इसकी तिजारत, इसकी जरूरत के मुकाबले में
  748. 35:30नमाज़ आती है तो ये तिजारत को नमाज़ के लिए
  749. 35:32छोड़ता है या नहीं। तिजारत को नमाज़ के लिए।
  750. 35:35अब क्या? अब बतलाओ, नमाज़ सबब हुई या
  751. 35:38तिजारत सबब हुआ? तिजारत सबब हुई या तिजारत
  752. 35:41में सच्चाई और तिजारत में हुकुम को पूरा
  753. 35:45करना सबब हुआ? तिजारत सबब नहीं है बल्कि
  754. 35:47तिजारत में हुक्म सबब है। जैसे नमाज़ और
  755. 35:51मुकाबले में तिजारत, तो नमाज़ सबब है,
  756. 35:53तिजारत सबब नहीं है। हम ये अर्ज करना
  757. 35:56चाहते हैं। तो, बात साफ़ हो गई। बात यह साफ़
  758. 35:59हो गई कि मुसलमान यह ना कहे। मुसलमान ये
  759. 36:02ना कहे कि भाई हम कोशिश तो कर रहे हैं
  760. 36:04तिजारत में। कामयाबी अल्लाह के हाथ में
  761. 36:06है।
  762. 36:08यूं कहे कि हम कोशिश करते हैं। हम कोशिश
  763. 36:11करते हैं हलाल कमाने की। कामयाबी फिर भी
  764. 36:14अल्लाह के हाथ में है। जी हां। और हलाल
  765. 36:16कमा कर भी अल्लाह ताला माल ना दें। तो
  766. 36:19अल्लाह के जिम्मे लाजिम नहीं कि हलाल
  767. 36:21कमाने वाले को अल्लाह ताला माल दे दे।
  768. 36:23सुनो तो सही। हलाल कमा कर भी अल्लाह माल
  769. 36:26ना दें। तो हम अल्लाह ताला के इस फैसले से
  770. 36:28राजी हैं क्योंकि मुसलमान दुनिया में
  771. 36:31मुसलमान का हिस्सा नहीं है। दुनिया तो
  772. 36:34गैरों का हिस्सा है। हमारा हिस्सा तो
  773. 36:36आखिरत में है। जितने सहाबा मालदार गुजरे
  774. 36:40हैं। एक सहाबी भी मालदार सहाबी दुनिया से
  775. 36:42खुश नहीं गया। हालांकि अल्लाह उनको माल
  776. 36:44राजी हो कर दिया। ऐसी अजीब बात है। अल्लाह
  777. 36:47ने सहाबा को माल राजी हो कर दिया है।
  778. 36:50अल्लाह ने सहाबा को माल। अल्लाह ने सहाबा
  779. 36:53को माल राज़ी हो कर दिया है। मगर कोई सहाबी
  780. 36:55ऐसा नहीं है जो दुनिया से खुश गया हो।
  781. 36:58मालदार सहाबा में। हर एक को इस बात का
  782. 37:00फ़िक्र था कि शायद अल्लाह ने दुनिया में
  783. 37:02देकर निपटा दिया। आख़िरत में नहीं मिलेगा।
  784. 37:04जी हां। अब आस रदी अल्लाह ताला मौत का
  785. 37:07वक़्त करीब आया तो दिमाग की तरह मुंह करके
  786. 37:09कर रोने लगे। लोगों ने कारनामे याद दिलाए।
  787. 37:11अजी आप क्यों परेशान हो रहे? आपने तो ये
  788. 37:14किया, ये किया, ये किया, ये किया। फरमाने
  789. 37:16लगे कि तुम हमें आखिरत के ऐतबार से
  790. 37:19मुतमाइन कर रहे। हम पर तीन दौर गुजरे हैं।
  791. 37:21एक जमाना गुजरा है कुफ्र का। उसमें मर
  792. 37:24जाते तो सीधे जहन्नुम में जाते। फिर जमाना
  793. 37:26गुजरा इस्लाम में इब्तदा इस्लाम का फकर्र
  794. 37:29का जमाना। इस्लाम और फ़्र इस्लाम और
  795. 37:33फ़ाका। उसमें मर जाते तो सीधे जन्नत में
  796. 37:36जाते। फिर जब मेहनत करते-करते अल्लाह के
  797. 37:39वादे हमारे लिए पूरे हुए और फुतोहात होने
  798. 37:41लगी। अब पता नहीं आखिरत में क्या होगा।
  799. 37:44अल्लाह यूं कहेंगे आखिरत में कि तुम्हें
  800. 37:46दुनिया में तुम्हारी मेहनत का बदला मिल
  801. 37:48चुका है। तुम्हारी मेहनत का बदला दुनिया
  802. 37:50में मिल चुका है। सोचो तो सही। हाय हाय
  803. 37:53जिन्होंने अल्लाह को राजी करके कुछ हासिल
  804. 37:55किया दुनिया में वो तो समझते थे कि अल्लाह
  805. 37:58नाराज है। और अल्लाह ने दुनिया में देकर
  806. 38:00निपटा दिया है। और जो लोग अल्लाह को नाराज
  807. 38:03करके कमा रहे हैं। वो कहते हां जी हमें
  808. 38:05आखिरत में ही मिलेगा। सुनो तो सही।
  809. 38:08बस इस बात को अच्छी तरह समझ लो कि अब आखिर
  810. 38:13जब ये बात समझ में आ गई कि मुसलमान के लिए
  811. 38:16मुसलमान का रास्ता ये नहीं कि सब पर मेहनत
  812. 38:19करके अल्लाह से उम्मीद करे तो फिर मुसलमान
  813. 38:22के लिए क्या रास्ता है? उस्मान का रास्ता
  814. 38:23ये है कि वो मेहनत करे अमलों पर। मेहनत
  815. 38:27करे अमलों पर और अल्लाह के सामने अमल पेश
  816. 38:31करे। अल्लाह के सामने
  817. 38:33अमल पेश करे। अल्लाह के सामने अमल पेश
  818. 38:36करे। अल्लाह के सामने अमल पेश करें। ऐ
  819. 38:39अल्लाह, यह मेरा अमल है। यह तेरा वादा है।
  820. 38:44वरना अल्लाह के सामने अपनी कोशिश पेश करना
  821. 38:48यह सब पेश करना यह तो गैर मुस्लिम भी करते
  822. 38:50थे। दिमाग जिसने हुजूर अकरम सल्ला वसल्लम
  823. 38:53के बारे में सुना कि आप बुतों का इंकार
  824. 38:55करते हैं। तो दिमाद आपके इलाज के लिए आया
  825. 38:57और ये कहा मैं आपका इलाज करूंगा। आप ठीक
  826. 38:59हो जाएंगे। आप पर ऊपर असर है कि आप का
  827. 39:02इंकार करते हैं। आपने कोई जवाब नहीं दिया
  828. 39:04कि नहीं पागल मैं नहीं हूं तो आप हैं नहीं
  829. 39:06कुछ नहीं। इसलिए के आप सल्लल्लाह वसल्लम
  830. 39:09ऐसा एतराज करने वालों के एतराज पर सबर
  831. 39:12करते थे। चुनांचे दिमाद ने कहा कि मैं
  832. 39:14आपका इलाज करूंगा आप ठीक हो जाएंगे। कोशिश
  833. 39:17करना तो मेरे मेरे जिम्मे है मगर शिफा
  834. 39:19अल्लाह के हाथ में है। कौन कह रहा है?
  835. 39:22हम्? मुशरिक कह रहा दिमाग कि मैं आपके
  836. 39:24राजी कोशिश करूंगा मगर शिफा अल्लाह के हाथ
  837. 39:27में है। लोग भी यह कहते हैं कि जी हम तो
  838. 39:29दवा खा रहे हैं। वाकई शिफा अल्लाह के हाथ
  839. 39:32में है। सोचो तो सही।
  840. 39:36हम नहीं कहते दवा इस्तेमाल ना करो। बल्कि
  841. 39:38यूं कहो कि नहीं, अल्लाह का वादा दवा पर
  842. 39:41नहीं है। दवा इस इम्तिहान के लिए है कि
  843. 39:43अल्लाह कभी-कभी अपनी कुदरत से दवा के जरिए
  844. 39:47शिफा दे देंगे ये देखने के लिए कि मेरा
  845. 39:49बंदा शिफा के निस्बत दवा की तरफ करता है,
  846. 39:52मेरी तरफ करता है। अगर दवा से शिफा कभी ना
  847. 39:55होती, तो बंदा ये कहता नहीं अल्लाह ही
  848. 39:57शिफा देते हैं। कभी-कभी दवा के जरिए शिफा
  849. 40:00दे देंगे। कभी दुकान पर आमदनी दे देंगे।
  850. 40:03कभी जमींदारों में गल्ला अच्छा हो जाएगा।
  851. 40:05तो यूं कहेगा ज़मीदार आपकी खाद अच्छी लग
  852. 40:08गई। अल्लाह का जिक्र ही नहीं करेगा। आपकी
  853. 40:11खाद अच्छी मिल गई। मैं मैं ये कहना चाहता
  854. 40:14हूं कि जितने भी अस्बा हैं उन असबाब में
  855. 40:16अल्लाह ताला अपनी कुदरत से कामयाबी सिर्फ
  856. 40:19ये देखने के लिए डालते हैं। कि मेरा बंदा
  857. 40:21इस कामयाबी को सबों से जोड़ता है या मेरी
  858. 40:24जात से जोड़ता है। ये थी बात। तो गल्लाह
  859. 40:26अच्छा हो गया। जमींदार कहेगा हां खाद
  860. 40:29अच्छी मिल गई।
  861. 40:31मैं क्या बताऊं यह तुम्हें क़सम खाकर कहता
  862. 40:33हूं यह इस वक़्त की सूरत हाल मुसलमानों की
  863. 40:36है। अगर एक सबब में किसी को कामयाब होते
  864. 40:39हुए देख लेंगे ना, तो खुद भी कोशिश करेंगे
  865. 40:41मैं भी यही कर लूं। हां, जी हां। अरे,
  866. 40:43ऐसे-ऐसे ठोकरे खाते हैं और ऐसी-ऐसी
  867. 40:46परेशानी में मुब्तला होते हैं। एक काम कर
  868. 40:49रहे थे, दूसरे का देखा। अरे कपड़े की
  869. 40:51तिजारत में बड़ा कामयाब हो गया। फ़ौरन अपना
  870. 40:54काम छोड़ कपड़ा शुरू कर दिया। हां, लोग
  871. 40:57सुबह-शाम असला बदलते हैं। बिचारे किसी एक
  872. 41:00रास्ते पर टिक टिकते ही जमते ही नहीं है।
  873. 41:03यूं समझते हैं कि इसमें है कामयाबी। देखो
  874. 41:06इसने यह किया तो यह कामयाब हो गया। मैं भी
  875. 41:08यही कर लूं। जी हां, बाल लोगों को समझ में
  876. 41:10नहीं आता कि करूं क्या? इसलिए के जो
  877. 41:13अल्लाह ताला की ज़ से फायदा उठाने के लिए
  878. 41:15अस्बा को असल समझेंगे। वो मुसलमान ऐसे
  879. 41:18असबाब में बिचारे ठोकरे खाते रहेंगे।
  880. 41:21असबाब बदलते रहेंगे। उन्हें किसी भी तरह
  881. 41:23कहीं कामयाबी नज़र आएगी नहीं। हम इसलिए
  882. 41:26अर्ज कर रहे हैं। अगर अल्लाह ताला असबाब
  883. 41:29में कामयाबी डालते ही ना, फिर ये कहना कोई
  884. 41:31कमा अल्लाह करने वाले हैं। वो तो तुम्हें
  885. 41:34असबाब में कामयाबी दिखलावेंगे। फिर
  886. 41:36देखेंगे कि बंदा इस कामयाबी को किधर मंसूब
  887. 41:39करता है। अमल की तरफ मंसूब करता है या सब
  888. 41:42किधर मंसूब करता है। यूं कहो कि अल्लाह ने
  889. 41:44किया था इस अमल पर किया है। हज़त फरमाते
  890. 41:47थे, जब भी मुसलमान अपनी कामयाबी को किसी
  891. 41:50अमल से जोड़ेगा, तो इससे अमल का यकीन
  892. 41:52बढ़ेगा। इससे अमल का यकीन बढ़ेगा। और जब भी
  893. 41:55किसी कामयाबी को असब से जोड़ देगा, तो इसको
  894. 41:58उम्मीद और इसका यकीन सबब से बढ़ जाएगा।
  895. 42:01किसी आसान बात है। जो नताज को असबाब से
  896. 42:04जोड़ते हैं उनमें अस्बा का यकीन बढ़ता है।
  897. 42:07जो नताज को हुकाम से जोड़ते हैं उन्हें
  898. 42:09हुकाम से यकीन बढ़ता है। जो नताज को आमाल
  899. 42:12से जोड़ते हैं उन्हें आमाल का यकीन बढ़ता
  900. 42:14है। इतनी आसान बात है। जब कहीं कामयाबी
  901. 42:17मिल जाती है ना? ख्याल भी नहीं आता कि
  902. 42:19मैंने आज 24 घंटे में कौन सा अमल खैर किया
  903. 42:22था जिसकी वजह से यह कामयाबी हुई है।
  904. 42:26जी हां। असबाब का ऐसा पर्दा पड़ा हुआ है
  905. 42:28हम पर कि जो भी कामयाबी आती है उस कामयाबी
  906. 42:32को सबब से नहीं जोड़ते। रात तहज्जुद पढ़ी
  907. 42:35थी। अल्लाह से दुआ की थी। रात तहज्जुद पढ़ी
  908. 42:38थी। अल्लाह से दुआ की थी। पूरा दिन गुज़र
  909. 42:41गया। रात को जाकर एक कामयाबी आई। और आएगी
  910. 42:44वो कामयाबी। किसी न किसी सबब के ज़रिए से
  911. 42:47कामयाबी आएगी किसी ना किसी सबब के रास्ते
  912. 42:49से। बस अल्लाह ये देखेंगे कि ये सुबह रात
  913. 42:52के क़याम रात की तहज्जुद की दुआ को इस
  914. 42:55वक्त इस कामयाबी को उस दुआ से जोड़ता है या
  915. 42:58कामयाबी को किसी वकील से या किसी वजीर से
  916. 43:01या किसी सबब से जोड़ता है। अगर यूं कहे
  917. 43:04अल्लाह ने उस अमल पर उस दुआ पर यह कामयाबी
  918. 43:06दी है। तो खुद ब खुद रोजाना इसका यकीन अमल
  919. 43:10पर बढ़ता रहेगा। हम ये अर्ज करना चाहते
  920. 43:12हैं। इसलिए ये बात तो आज साफ हो गई। ये
  921. 43:15बात तो आज साफ हो गई कि मुसलमान के लिए
  922. 43:17इसकी गुंजाइश नहीं है कि वो सब पर कोशिश
  923. 43:20करके ये कहे कि मुझे उम्मीद अल्लाह से है।
  924. 43:22के ना ये अल्लाह से उम्मीद करने में झूठा
  925. 43:24है। अल्लाह से उम्मीद करने में झूठा है।
  926. 43:28ये अल्लाह से उम्मीद करने में झूठा है।
  927. 43:30सच्चा तो वो है जो अमल पर मेहनत करके कहे
  928. 43:33कि मुझे अल्लाह की जात से उम्मीद है कि
  929. 43:35अल्लाह मुझे इस अमल पर कामयाब कर देंगे।
  930. 43:37जी हां। हदीस में है ना के वह शख्स आजिज
  931. 43:40है जो अपने नफ्स की ख्वाहिश के पीछे पड़ा
  932. 43:42हुआ है और अल्लाह से लंबी-लंबी उम्मीदें
  933. 43:44किए हुए हैं। अल्लाह यह कर देंगे अल्लाह
  934. 43:46यह कर देंगे अल्लाह यह कर देंगे जी।
  935. 43:48कामयाब वो है जो आखिरत वाले आमाल की फ़िकर
  936. 43:51करे। वह अकलमंद है। वह अकलमंद है। तो,
  937. 43:55मैंने अर्ज किया कि ये इस चीज को समझने के
  938. 43:58लिए सहाबा इकराम और पिछली उम्मतों की
  939. 44:02कामयाबी के वाकयात सुना करो। तब मालूम
  940. 44:04होगा कि अमल और सबब में क्या फर्क है। मैं
  941. 44:08अर्ज करता हूं। तीन आदमी गार में दाखिल
  942. 44:10हुए। तीन आदमी गार में दाखिल हुए। चट्टान
  943. 44:13सर की रास्ता बंद हो गया। किसी ने ये नहीं
  944. 44:16कहा ऐ अल्लाह, किसी फ़रिश्ते के ज़रिए, किसी
  945. 44:19जिन के ज़रिए, कोई ताकत हो ऐसी
  946. 44:22जिसके जरिए चट्टान यहां से हटा दे। हर एक
  947. 44:25ने यह कहा कि देखो तुम्हारी कामयाबी और
  948. 44:28यहां से इस चट्टान से निकलने और जान बचाने
  949. 44:30के लिए और कोई ज़रिया नहीं है सिवाय इसके
  950. 44:34कि तुम अल्लाह के सामने वह आमाल पेश करो
  951. 44:36जो आमाल तुमने दूसरों के नफे के लिए और
  952. 44:40दूसरों को फायदा पहुंचाने के लिए किए हैं।
  953. 44:42यही तो है। इस वाकई में हर एक ने अपना अमल
  954. 44:45पेश किया। एक ने वालिदैन के साथ एहसान का।
  955. 44:49एक ने चाचा की लड़की के साथ एहसान का। एक
  956. 44:52ने मजदूर के साथ एहसान का अमल पेश किया।
  957. 44:55जी हां। तीनों ने अपना-अपना अमल पेश किया
  958. 44:59अल्लाह को। ए अल्लाह हमने यह अमल किया है
  959. 45:01तेरी रज़ा के लिए। तू चट्टान हटा दे। किसी
  960. 45:03ने ये नहीं कहा फ़रिश्ते को भेज दे। किसी
  961. 45:06जिन को भेज दे या कोई जलजिला ले आ। इस
  962. 45:09झटका ले आ कोई पहाड़ में जिससे ये चट्टान
  963. 45:11सरक जावे। या कोई पानी का धारा हो जो
  964. 45:13चट्टान के को सरका दे। नहीं। यह वाकयात यह
  965. 45:18समझाने के लिए हैं कि मोमिन के पास अल्लाह
  966. 45:20को पेश करने के लिए अमल है। मैं सारी बात
  967. 45:23समझाने की अर्ज कर रहा था। वमा तशा इला
  968. 45:25इंशा अल्लाह कि अल्लाह की चाहत के बगैर
  969. 45:28तुम तुम्हारी चाहत से कुछ ना होगा। खैर,
  970. 45:30अब सवाल यह है कि अल्लाह की चाहत किस में
  971. 45:32है? लोग अल्लाह की चाहत को असबाब में तलाश
  972. 45:35कर रहे हैं। हम तियारत कर रहे हैं। अल्लाह
  973. 45:37चाहेंगे तो नफा दे देंगे। हम जरा कर रहे
  974. 45:40हैं। अल्लाह चाहेंगे तो गल्ला दे देंगे।
  975. 45:41नहीं, यह नहीं। यह नहीं। बल्कि हमने
  976. 45:45अल्लाह का अमल पेश किया है। अल्लाह
  977. 45:47चाहेंगे तो मुझे इस अमल से कामयाब कर
  978. 45:49देंगे। बस यह है बात। तो आसान बात यह है
  979. 45:52कि अल्लाह की कुदरत वादों के साथ वादे
  980. 45:55अमलों के साथ। असबाब के साथ कुदरत भी
  981. 45:57नहीं। अस्बा के साथ वादा भी नहीं। वरना
  982. 46:00अगर अल्लाह का एक वादा भी होता ना सब
  983. 46:02तिजारत में कामयाब करने का। दुनिया का कोई
  984. 46:05ताजिर नाकाम ना होता। दुनिया का कोई ताजिर
  985. 46:09नाकाम ना होता। क्योंकि अल्लाह वादा खिलाफ
  986. 46:11नहीं है। तिजारत में नाकामी बता रही है कि
  987. 46:13तिजारत पर वादा नहीं है। जमींदारे में
  988. 46:15नाकामी बता रही है के ज़मींदारे पर वादे
  989. 46:18नहीं है। अच्छा जी! सारे हुक्म पूरे किए
  990. 46:21सारे आकाम पूरे किए फिर भी नाकामी आ गई। ओ
  991. 46:24हो सुन ले मेरी बात तवज्जो से। सारे आमाल
  992. 46:26किए, सारे हुक्म पुरे किए फिर भी नाकामी आ
  993. 46:29गई। फिर भी नाकामी आ गई। मुसलमान ये सोचता
  994. 46:33है कि जब मैंने सारे अल्लाह के अकाम पूरे
  995. 46:35किए फिर नाकामी क्यों आई है? के नहीं। ये
  996. 46:37नाकामी नहीं है। ये तो नबियों की लाइन की
  997. 46:40कामयाबी है। के ओह होत फरमाते थे कि हाजत
  998. 46:45का पूरा होना हाजिद का पूरा होना कामयाबी
  999. 46:48नहीं है। हाजत का पूरा होना बस जब मुसलमान
  1000. 46:51ये समझ लेगा कि हाजत का पूरा होना कामयाबी
  1001. 46:55है। तो हाजिद के पूरा होने पर मुतमाइन और
  1002. 46:57ना पूरा पूरी-पूरी हाजत पूरी ना हो तो
  1003. 47:00परेशान। हालांकि हाजिद का पूरा होना
  1004. 47:03कामयाबी
  1005. 47:04नहीं है। हाजिद का पूरा होना कामयाबी नहीं
  1006. 47:07है। हुकुम का पूरा होना कामयाबी है। हुकुम
  1007. 47:09का हुकुम का पूरा होना कामयाबी है। हाजिद
  1008. 47:12का पूरा होना कामयाबी नहीं है। ऐ अल्लाह
  1009. 47:15मैंने हुकुम पूरा कर दिया। एक साहब बीमार
  1010. 47:17हो गए। एक साहब बीमार हो गए। मौलाना साहब
  1011. 47:20रहमतुल्लाह उनकी अद्जत के लिए गए। हज ने
  1012. 47:23पढ़कर दम किया तो एक मेवात के साथ साथी वह
  1013. 47:28दो रकात नमाज पढ़ के दुआ मांग के उन्होंने
  1014. 47:32भी उसपे दम कर दिया तो एक साहब कहने लगे
  1015. 47:34कि भाई तुम्हारे दम करने से क्या होगा तो
  1016. 47:37देखो मेरे दम करने से क्या होगा क्या नहीं
  1017. 47:40होगा तो अल्लाह जाने मैंने तो अल्लाह का
  1018. 47:42हुकुम पूरा किया है मैंने तो अल्लाह का
  1019. 47:44पूरा किया क्या होगा शिफा होगी नहीं होगी
  1020. 47:47अल्लाह जाने मैंने तो हुकुम पूरा किया है
  1021. 47:50मैंने तो हुक्म पूरा किया है कि अल्लाह का
  1022. 47:52हुक्म है सब्र व सला के लो अल्लाह ताला की
  1023. 47:56मदद सब्र नमाज़ के जरिए मैंने तो हुकुम
  1024. 47:58पूरा किया है। बाकी अल्लाह ताला जाने कि
  1025. 48:02इसको बीमार रखने में मसलहत है। इसको मौत
  1026. 48:04देने में उसकी मसलहत है। हम परेशान जब
  1027. 48:06होते हैं जब हमारी चाहत के मुताबिक काम
  1028. 48:09नहीं होता। जी हां। अमल भी किया, दुआ भी
  1029. 48:12की, सदका भी किया, सब कुछ किया। लेकिन इस
  1030. 48:15तरह चाह रहे थे इस तरह नहीं हुआ। जी हां।
  1031. 48:18जिस तरह चाह रहे थे इस तरह नहीं हुआ। तो
  1032. 48:21यूं सोचेगा के अमल भी जाया हो गया, दुआ भी
  1033. 48:24क़ुबूल नहीं हुई। हालांकि, जब हुकुम पूरा
  1034. 48:27कर दिया, तो अब यह 100 फीसद मुतमाइन है।
  1035. 48:30100 फीसद मुतमाइन है। क्योंकि इसे नहीं
  1036. 48:32मालूम कि अल्लाह रब्बुल इज्ज़त मेरी सोच के
  1037. 48:35मुकाबले में अपनी कुदरत से इससे ज्यादा
  1038. 48:38बेहतर करने वाले हैं। जो मैं चाह रहा था,
  1039. 48:40जो मैं चाह रहा था, अल्लाह उसे बेहतर करने
  1040. 48:42वाले हैं। सुनो तो सही। जितने भी हालात
  1041. 48:44मुसलमानों पर हैं वह मायूसी का शिकार जब
  1042. 48:47होते हैं जब उनसे दो गलतियां होती हैं। एक
  1043. 48:49गलती तो यह के पहले अल्लाह का हुकुम
  1044. 48:52तोड़ते हैं। फिर अल्लाह ताला नक्शे तोड़ते
  1045. 48:54हैं। अगर हुक्म पूरा करते हुए नक्शे टूट
  1046. 48:56रहा है, फिर तो बहुत बड़ी नेमत है अल्लाह
  1047. 48:58की तरफ से। मुसलमान हुकुम पूरा करे और गैर
  1048. 49:01इन नक्शे को तोड़ें तो अल्लाह ताला की मदद
  1049. 49:04इतनी ही जल्दी आवेगी। वह तो असल में
  1050. 49:06मुसलमानों ने ही मदद को पीछे किया हुआ है।
  1051. 49:09मुसलमान मदत को पीछे कर रहे हैं। मुसलमान
  1052. 49:12मदद को पीछे कर रहे हैं। मुसलमान मदत को
  1053. 49:14पीछे कर रहे हैं। वरना अगर मुसलमान हुकुम
  1054. 49:17पूरा करने पर आ जावे तो फिर मुसलमान पर
  1055. 49:20जुल्म अल्लाह बर्दाश्त नहीं। अल्लाह के
  1056. 49:22यहां फिर इसकी इसकी गुंजाइश नहीं है।
  1057. 49:24अल्लाह ताला फ़ौरन मदद ले आते हैं। अल्लाह
  1058. 49:26मदद फ़ौरन ले आते हैं। अल्लाह मदद फ़ौरन ले
  1059. 49:28आते हैं। तो मैंने अर्ज़ किया कि सारी बात
  1060. 49:31का खुलासा ये है कि अल्लाह ताला की मशत
  1061. 49:34उसकी चाहत को उसके अहकाम में तलाश करो।
  1062. 49:37उसके अहकाम में तलाश करो। असबाब में नहीं।
  1063. 49:40अल्लाह की मशीत को अल्लाह के अहकाम में
  1064. 49:42तलाश करो। अस्बा में नहीं। इसलिए के
  1065. 49:45कायनात अल्लाह का जाप्ता नहीं है। कायनात
  1066. 49:48अल्लाह का जाबता नहीं है। अल्लाह का जाबता
  1067. 49:51अल्लाह का दीन है। अल्लाह का जाबता अल्लाह
  1068. 49:53का दीन अल्लाह का जाबता है। कायनात जाब्ता
  1069. 49:55नहीं है। अल्लाह ताला ने जो नुसरत का वादा
  1070. 49:58किया है। अल्लाह ने नुसरत का वादा किया
  1071. 50:01है। वो नुसरत का वादा दो चीजों पर किया
  1072. 50:04है। नुसरत का वादा दो चीजों पर किया है।
  1073. 50:07दावत और इबादत को जमा करने। दावत और इबादत
  1074. 50:12दोनों को जमा करने। मुसलमान अगर दावत
  1075. 50:15इबादत दोनों को जमा कर ले तो अल्लाह
  1076. 50:17रब्बुल इज्जत की तरफ से यकीनी तौर पर मदद
  1077. 50:19का वादा है। अगर मुसलमान दावत इबादत दोनों
  1078. 50:22को जमा कर ले।
  1079. 50:25क्योंकि अल्लाह ताला ने शर्त लगाई है
  1080. 50:26कुरान में इन तंसुल्लाह यस वदामकुम
  1081. 50:31के अगर तुम अल्लाह के दीन के मददगार हो तो
  1082. 50:34अल्लाह तुम्हारी मदद करने वाले हैं। और
  1083. 50:36तुम्हारे कदमों को दीन पर जमाने वाले हैं।
  1084. 50:38क्या मतलब कदमों के जमाने का? देखो, इसका
  1085. 50:40मतलब यह है कि जब सारा बातिनल जमा होकर
  1086. 50:43तुम्हें अल्लाह के एक हुक्म से रोकना
  1087. 50:46चाहेगा, तो सारा बातति मिलकर तुम्हें
  1088. 50:49अल्लाह के हुकुम से हटा नहीं सकता। यह
  1089. 50:51मतलब है कदम के जमने का। क्योंकि
  1090. 50:54इस्तेकामत ही यही है कि आदमी अल्लाह के
  1091. 50:56अहकाम पर जमेल के मुकाबले में। यह नहीं कि
  1092. 51:00जितने नीर चलने का मौका मिला चल दिए।
  1093. 51:02जितना कदी मौका ना मिला छोड़ दिया उसको।
  1094. 51:05अल्लाह ताला की तरफ से दीन पर कदमों के
  1095. 51:08जमने का वादा और नुसरत का वादा इस पर है
  1096. 51:12कि तुम उसके दीन के नासिर मददगार बनो।

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This page contains the full transcript of Maulana Saad Sahab DB | Allah Par Tawakkul – Heart-Touching Bayan | Trust in Allah by MMF Speeches, generated from the public captions YouTube serves with the video. The transcript has 9,023 words across 1,096 segments, with the original timestamps preserved so you can click any line to jump to that moment in the embedded player.

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