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श्री कृष्ण लीला | श्रीमद भगवद गीता सार | मोक्षदा एकादशी | गीता जयंती विशेष | Mahabharat | Pen Bhakti — Transcript

by Pen Bhakti · 9,885 words · 1,563 segments · language en · Watch on YouTube

Full transcript

  1. 0:12मैं अपने कुल के शवों पर अपना राजभवन नहीं
  2. 0:15खड़ा कर सकता। मैं उस राजसुख का क्या
  3. 0:17करूंगा जिससे भरतवंश के लहू की महक आ रही
  4. 0:20होगी।
  5. 0:22जिन गुरुजनों के चरणों पे सिर रखा उन्हीं
  6. 0:25का सर काट फेंकूं।
  7. 0:27जिससे जिससे इस धनुष पर वाण लगाना सीखा
  8. 0:30उसी पर बाण चलाऊं केशव।
  9. 0:33मुझे इन मूल्यों पर विजय नहीं चाहिए। केशव
  10. 0:36मुझे इन मूल्यों पर विजय नहीं चाहिए।
  11. 0:40पृथ्वी का राज्य तो फिर भी पृथ्वी का
  12. 0:42राज्य है। मुझे इन दामोद त्रिलोक का राज
  13. 0:44भी नहीं चाहिए।
  14. 0:47दुर्योधन
  15. 0:49दुर्योधन भी है तो मेरा ही भाई ना।
  16. 0:52माना कि उसने हमारे साथ कपट किया है। उसने
  17. 0:55पंचाली का अपमान करके सारे भरतवंश का
  18. 0:57अपमान किया है। किंतु है तो वो जेष्ठ पिता
  19. 1:00श्री का जेष्ठ पुत्र ही ना।
  20. 1:02यह तो बड़े खेद की बात है।
  21. 1:05कि भूमि के एक टुकड़े के लिए हम लोग कुल
  22. 1:08नाशक बनने को तैयार हो गए।
  23. 1:11हे शांतिदेव
  24. 1:13यदि सब कुछ खोकर भी मुझे शांति मिले
  25. 1:17और मैं कुल के नाश के पाप से बच जाऊं।
  26. 1:21तो यह शांति बहुत सस्ती है केशव
  27. 1:25यह शांति बहुत सस्ती है
  28. 1:30कुतस्त कश्मलमद विषम सम उपस्थितम
  29. 1:34अनार्य जुष्टम स्वर्गम अकीर्ति कर्म
  30. 1:36अर्जुन
  31. 1:38केशव मेरा नाम लेकर मुझे पुकारने से पहले
  32. 1:41यह बताओ पार्थ कि इस समय जब विनाश के बादल
  33. 1:45चारों ओर से उमड़ आए हैं और धर्म रक्षा और
  34. 1:48विजय की आस लिए तुम्हारी ओर देख रहा है।
  35. 1:51इस संकट की घड़ी में तुमने कायरता के इन
  36. 1:54हीन भावों को अपने हृदय में आने कैसे
  37. 1:56दिया?
  38. 1:59श्रेष्ठ पुरुष तो यूं विषाद में डूबा नहीं
  39. 2:01करते।
  40. 2:03धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष की इस
  41. 2:05निर्णायक घड़ी में नपुंसक ना बनो। पार्थ
  42. 2:08नपुंसक ना बनो।
  43. 2:12हे परंतप हे शत्रु संहारक हे धनंजय
  44. 2:17तुम्हारे यह भाव अनार्य हैं। यह तुम्हें
  45. 2:20स्वर्ग से गिरा देंगे और कीर्ति से भी और
  46. 2:24तुम स्वयं ही अपने तिरस्कार का कारण बनकर
  47. 2:27रह जाओगे।
  48. 2:30इसलिए हे पार्थ हृदय की इस दुर्बलता को
  49. 2:34त्यागो और युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।
  50. 2:38खड़ा कैसे हो जाऊं? मधुसूदन खड़ा कैसे हो
  51. 2:42जाऊं?
  52. 2:43पितामह का वध करने के लिए खड़ा कैसे हो
  53. 2:46जाऊं?
  54. 2:47गुरुशेष पर प्रहार करने के लिए खड़ा कैसे
  55. 2:49हो जाऊं? जो मेरे लिए पूज्यनीय है उनसे
  56. 2:53युद्ध कैसे करूं?
  57. 2:56जिन गुरुओं ने मुझे विजय का मंत्र सिखाया
  58. 3:00उन्हें पराजित करने के लिए कैसे खड़ा हो
  59. 3:02जाऊं।
  60. 3:04इन महापुरुषों पर हाथ उठाने से तो कहीं
  61. 3:06अच्छा है कि मैं यह हाथ भिक्षा के लिए
  62. 3:09फैलाऊं। भिक्षा में मिली हुई रोटी इन
  63. 3:13महापुरुषों के रक्त से सनी हुई नहीं होगी।
  64. 3:17हे ऋषिकेश मैं तो यह भी समझ नहीं पा रहा
  65. 3:20हूं कि इस युद्ध में विजय श्रेष्ठ है या
  66. 3:23पराजय।
  67. 3:25धृतराष्ट्र पुत्र शत्रुओं की भांति मेरे
  68. 3:27सामने खड़े हैं। मैं जानता हूं कि उनका वध
  69. 3:30किए बिना जीना संभव नहीं है। किंतु हे
  70. 3:34केशव उनका वध करने के उपरांत भी जीना सहज
  71. 3:37नहीं होगा। क्या वो मेरे भाई नहीं है?
  72. 3:41केशव बोलिए केशव।
  73. 3:46अवश्य हैं। बस केवल इतना ही कहना है आपको।
  74. 3:50तुमने केवल यही तो पूछा था पार्थ।
  75. 3:53किंतु यह युद्ध संबंधों और नातों की
  76. 3:56स्थापना या पहचान के लिए नहीं है। कुंती
  77. 3:59पुत्र
  78. 4:00अपने कर्तव्य को पहचानो और तब निर्णय लो।
  79. 4:04क्योंकि निर्णय तो तुम ही को लेना पड़ेगा।
  80. 4:08यदि तुम यह चाहते हो कि निर्णय मैं लूं और
  81. 4:11तुम इस युद्ध के उत्तरदायित्व से बच जाओ।
  82. 4:14तो यह नहीं होगा पार्थ कदापि नहीं होगा
  83. 4:19क्योंकि यह युद्ध भी तुम्हारा है और इस
  84. 4:22युद्ध का परिणाम भी तुम्हारा ही होगा।
  85. 4:26मुझे कर्तव्य का मार्ग ठीक से दिखाई नहीं
  86. 4:28दे रहा केशव इसलिए हे वासुदेव आप मेरी
  87. 4:31आत्मा के भी सारथी बन जाइए। मैं जानता हूं
  88. 4:35कि मैं धर्म और अधर्म के बीच में खड़ा
  89. 4:37हूं। किंतु यह निर्णय नहीं ले पा रहा हूं
  90. 4:40कि धर्म किस ओर है और अधर्म किस ओर।
  91. 4:43मेरा मार्गदर्शन कीजिए केशा
  92. 4:47इंद्रियों को सुखा देने वाले शोक से बचने
  93. 4:50का मार्ग दिखलाइए मुझे
  94. 4:53अपनी इस मानसिक अवस्था में तुम्हें युद्ध
  95. 4:57नहीं कर सकता गोविंद गोविंद मैं युद्ध
  96. 5:00नहीं कर सकता
  97. 5:02ना योत से गोविंदम
  98. 5:05ना योत से गोविंदम न योत से गोविंदम
  99. 5:08न योत से गोविंदम
  100. 5:11ना योत से गोविंदम
  101. 5:14यह कहकर कुंती पुत्र अर्जुन चुप हो गए
  102. 5:18महाराज।
  103. 5:20किंतु संजय
  104. 5:23प्रिय अर्जुन ने प्रश्न तो नितांत मालिक
  105. 5:26उठाए हैं।
  106. 5:28वो भला अपने ताश्री या आचार्यों से कैसे
  107. 5:30युद्ध कर सकता है। क्षत्रिय सभ्यता के भी
  108. 5:34तो कुछ लक्षण होते हैं।
  109. 5:37इस विषय में भला मैं क्या कह सकता हूं
  110. 5:39महाराज? मैं तो क्षत्रिय हूं ही नहीं।
  111. 5:43किंतु क्षत्रिय की भांति सोच तो सकते हो।
  112. 5:50हे संजय
  113. 5:52मुझे तो प्रिय अर्जुन की बातों से ऐसा लग
  114. 5:55रहा है कि वो अब इंद्रप्रस्थ भी नहीं
  115. 5:58मांगेगा।
  116. 6:02और यदि ऐसा हुआ
  117. 6:05तो दुर्योधन के दुराग्रह की प्यास भी बुझ
  118. 6:08जाएगी।
  119. 6:09और
  120. 6:11मैं उससे प्रिय पांडवों को पांच गांव देने
  121. 6:13के लिए भी मना लूंगा।
  122. 6:20युद्ध तो यूं समझो कि अब होगा ही नहीं।
  123. 6:26क्योंकि यदि अर्जुन युद्ध नहीं करेगा तो
  124. 6:29फिर उधर से युद्ध करेगा कौन?
  125. 6:34वो तो अब गांडीव उठाने वाला नहीं है संजय।
  126. 6:38क्योंकि जब तक उसे अपने प्रश्नों के उत्तर
  127. 6:40नहीं मिलते
  128. 6:42तब तक तो वह युद्ध के लिए तैयार नहीं होगा
  129. 6:47और उसके प्रश्नों के उत्तर तो स्वयं देवकी
  130. 6:50नंदन के पास भी नहीं हो सकते।
  131. 6:56हे संजय
  132. 6:59तनिक
  133. 7:06तनिक देखो तो
  134. 7:10कि देवकी नंदन
  135. 7:12इस समय उससे क्या कह रहे हैं
  136. 7:15जो आज्ञा
  137. 7:25हे भरत वंशज
  138. 7:28ऋषिकेश तो निद्रा को जीतने वाले गुडाकेश
  139. 7:33अर्जुन की ओर देखकर मुस्कुरा रहे हैं।
  140. 7:36अशोच नसोचम प्रज्ञा वादास भाषसे गतास
  141. 7:42नगतास
  142. 7:43नानु शोचती पंडिता
  143. 7:48हां पार्थ जो चले गए वे तो चले गए और
  144. 7:53ज्ञानी तो ना जाने वालों का शोक करते हैं
  145. 7:56और ना ही उनका जो नहीं गए।
  146. 7:59वे तो ना विगत के लिए शोक करें और ना ही
  147. 8:02अगत के लिए।
  148. 8:04तुम्हारी शैली तो ज्ञानियों की ही है।
  149. 8:07किंतु बात तुम मूर्खों जैसी कर रहे हो।
  150. 8:10शोक करने से पहले यह तो देखो कि तुम जिनके
  151. 8:13लिए शोक कर रहे हो वे तो शोक के योग्य ही
  152. 8:16नहीं है। तो क्या पितामह या गुरु श्रेष्ठ
  153. 8:19आचार्य शोक के योग्य नहीं है केशव।
  154. 8:22यदि वे शोक के योग्य होते तो मैं यह कहता
  155. 8:25ही क्यों पार्थ?
  156. 8:27तुम इस सत्य को समझ लो पार्थ कि मूल तत्व
  157. 8:32शरीर नहीं आत्मा है और मृत्यु उसकी यात्रा
  158. 8:37का अंत भी नहीं है क्योंकि उसकी यात्रा तो
  159. 8:41अनंत है
  160. 8:44मृत्यु तो केवल एक पड़ाव है पार्थ केवल एक
  161. 8:47पड़ाव
  162. 8:50सांस का अंत पवन का अंत नहीं है
  163. 8:55यूं समझो पार्थ
  164. 8:57कि प्राणी तो पहले बालक होता है। फिर वह
  165. 9:00बालक युवा हो जाता है। फिर वह युवा वृद्ध
  166. 9:04और फिर मृत्यु।
  167. 9:06किंतु यह यात्रा तो शरीर की है।
  168. 9:09आत्मा तो इससे भी आगे जाता है।
  169. 9:13वह एक शरीर को त्याग कर कोई और शरीर धारण
  170. 9:16कर लेता है।
  171. 9:19इसलिए जो यात्रा मृत्यु पर समाप्त हो जाए
  172. 9:22वह तो केवल शरीर की यात्रा है। पार्थ केवल
  173. 9:25शरीर की यात्रा है।
  174. 9:29न जायते मते वा कदाचित नाय भूत्वा भविता
  175. 9:34वान भया अजो नित शाश्वत पुराणो न हन्यते
  176. 9:40ह्यमाने शरीरे
  177. 9:46आत्मा की यात्रा तो अनंत है पार्थ
  178. 9:50और उसकी यात्रा के एक बिंदु पर शरीर पीछे
  179. 9:53छूट जाता है और यात्री आगे निकल जाता है
  180. 9:57और वह बिल्कुल वैसे ही कोई नया शरीर पहन
  181. 10:00लेता है जैसे हम पुराना वस्त्र उतार कर
  182. 10:03नया वस्त्र पहन लेते हैं।
  183. 10:06वासानसी जीर्णि यथा विहाय नवानी गहणाति
  184. 10:10नरोपराण
  185. 10:11तथा शरीरण विहाय जीर्णानी
  186. 10:14अन्यानी सयाति नवानी देह
  187. 10:20हे पार्थ
  188. 10:22विनाश तो आत्मा को छू ही नहीं सकता तो फिर
  189. 10:25शोक कैसा और किसके विनाश का क्या वस्त्र
  190. 10:29के विनाश का
  191. 10:32किंतु वस्त्र तो अमर नहीं होता वो तो
  192. 10:35त्यागे जाने जाने के लिए ही होता है
  193. 10:38और आत्मा मरता नहीं कभी नहीं मरता
  194. 10:45किंतु वे जो सामने खड़े हैं वे इस युद्ध
  195. 10:48के पश्चात सब के सब होंगे ना केशव सब के
  196. 10:51सब होंगे ना
  197. 10:53[हंसी]
  198. 10:55यह होना और ना होना क्या है पार्थ
  199. 10:58क्योंकि वो समय तो कभी था ही नहीं जब मैं
  200. 11:01नहीं था या तुम नहीं थे या यह सारे लोग
  201. 11:05नहीं नहीं थे और ना ही वह समय कभी होगा जब
  202. 11:09मैं नहीं हऊंगा या तुम नहीं होगे या यह
  203. 11:12सारे लोग भी नहीं होंगे
  204. 11:16तो फिर तुम यह किस भ्रम में पड़ रहे हो
  205. 11:18पार्थ कि वर्तमान जीवन ही संपूर्ण जीवन है
  206. 11:22वर्तमान जीवन संपूर्ण जीवन नहीं है पार्थ
  207. 11:26हम थे भी हम हैं भी और हम होंगे भी
  208. 11:32अब रहे यह सुखदख तो इनका इनका क्या है? यह
  209. 11:36तो ऋतुओं की भांति हैं। आते जाते रहते
  210. 11:39हैं।
  211. 11:41हे कुंती पुत्र, जो सुख और दुख दोनों ही
  212. 11:45को समान समझे और उनसे प्रभावित हुए बिना
  213. 11:48ही उन्हें झेल जाए वही स्थित प्रज्ञ है।
  214. 11:51और वही मोक्ष का अधिकारी भी है।
  215. 11:55मात्रा स्पर्शास्तु कौते शीतोष्ण सुख
  216. 11:59दुखदा दा आगमा नित्यान तितस भारत
  217. 12:08हे भारत
  218. 12:10मारने या मरने की आशंका से मुक्त हो जाओ।
  219. 12:14क्योंकि मृत्यु तो केवल उसी की हो सकती है
  220. 12:16ना जिसका जन्म हुआ हो।
  221. 12:20आत्मा तो कालातीत है। काल से भी परे है
  222. 12:24पार्थ।
  223. 12:27जन्म तो जीव का होता है। आत्मा का नहीं।
  224. 12:31और यदि आत्मा जन्म ही नहीं लेता तो उसकी
  225. 12:34मृत्यु कैसे हो सकती है?
  226. 12:37आत्मा तो बस है पार्थ है। वो काल के दोनों
  227. 12:43तटों पर भी है और काल की धारा में भी वो
  228. 12:48अजन्मा है, नित्य है, सनातन है, अविकारी
  229. 12:54है, अविनाशी है।
  230. 13:00इसलिए मारने या मरने के प्रश्न को लेकर
  231. 13:02चिंतित होना व्यर्थ है। पार्थ व्यर्थ है।
  232. 13:06मृत्यु तो केवल शरीर की होती है और उसकी
  233. 13:10मृत्यु के पश्चात भी आत्मा नहीं मरता
  234. 13:13क्योंकि शस्त्र उसे काट नहीं सकता। अग्नि
  235. 13:17उसे जला नहीं सकती। जल उसे गीला नहीं कर
  236. 13:20सकता और वायु उसे सुखा नहीं सकती।
  237. 13:24नैन छिंदती शस्त्राण नैन दहति पावका न चम
  238. 13:30क्लेदपो
  239. 13:32न शोष मारुता
  240. 13:38अब किस चिंता में हो पार्थ
  241. 13:42हे जनार्दन
  242. 13:44क्या मैं केवल एक आत्मा को पितामह कहता
  243. 13:46हूं मैं अपने धूल में स्नेह वस्त्र पहनकर
  244. 13:50एक आत्मा की गोद में घुस जाया करता था वो
  245. 13:53ओ वो जो श्वेत वस्त्र वाले वृद्ध योद्धा
  246. 13:56सामने अपने रथ पे खड़े हैं। क्या केवल वो
  247. 13:59एक आत्मा है? क्या उनके उस शरीर ने जिसे
  248. 14:03आप आत्मा का वस्त्र कह रहे हैं। अनेक बार
  249. 14:06मेरे शीश पर आशीर्वाद देने के लिए हाथ
  250. 14:09नहीं धरा था?
  251. 14:11क्या वो वृद्ध ब्राह्मण श्रेष्ठ केवल एक
  252. 14:14आत्मा है? जिन्होंने मुझे धनुर विद्या
  253. 14:18सिखाई है।
  254. 14:21केशव मैं आत्मा के नित्य होने, पुरातन
  255. 14:24होने, अविनाशी होने को नहीं नाकारता।
  256. 14:28पर जिन शरीरों की मैं बात कर रहा हूं।
  257. 14:32वो शरीर भी तो मेरे कुछ लगते हैं ना।
  258. 14:36आत्मा तो जन्म नहीं लेता केशव।
  259. 14:40आत्मा तो जन्म नहीं लेता।
  260. 14:43किंतु लोग तो जन्म लेते हैं केशव।
  261. 14:47लोग तो जन्म लेते हैं। हां,
  262. 14:51लोग जन्म तो अवश्य लेते हैं पार्थ।
  263. 14:55किंतु इस तर्क को तनिक आगे बढ़ाओ महापा।
  264. 14:58तनिक आगे बढ़ाओ। जो जन्म लेगा उसकी मृत्यु
  265. 15:02तो निश्चित है। तो निश्चित का शोक क्यों?
  266. 15:07जन्म लेने वाले को एक न एक दिन तो मरना ही
  267. 15:10है और यह मृत्यु भी अंत नहीं है क्योंकि
  268. 15:15मरने वाला फिर जन्म भी लेगा।
  269. 15:18यह तो एक अटल सत्य है पार्थ। और इस अटल
  270. 15:22सत्य को कोई टाल भी नहीं सकता।
  271. 15:26ना तुम ना मैं ना कोई और।
  272. 15:32गंगा पुत्र भीष्म के पास तो इच्छा मृत्यु
  273. 15:35का वरदान है। किंतु मृत्यु तो फिर भी अटल
  274. 15:40है ना पार्थ?
  275. 15:42तो जन्म मृत्यु और फिर जन्म की श्रृंखला
  276. 15:45में शोक का स्थान कहां है पार्थ? कहां है
  277. 15:49शोक का स्थान?
  278. 15:54जिन लोगों को तुम सामने खड़ा देख रहे हो
  279. 15:56ना पार्थ? वो इस जन्म से पहले भी थे। पर
  280. 16:00क्या थे यह तुम नहीं जानते।
  281. 16:04वह इस जन्म के उपरांत भी होंगे। पर क्या
  282. 16:07होंगे यह भी तुम नहीं जानते।
  283. 16:11उनका अस्तित्व तो इस जन्म और मरण के दो
  284. 16:14बिंदुओं के इधर या उधर है ही नहीं। और यदि
  285. 16:17है भी तो अज्ञात है। अव्यक्त है।
  286. 16:23अर्थात इस जन्म से पूर्व भी वह तुम्हारे
  287. 16:27लिए नहीं थे। पार्थ और इस जन्म के उपरांत
  288. 16:30भी नहीं होंगे।
  289. 16:33तो हे पार्थ
  290. 16:36जिनके जीवन का अनिवार्य अंत ही मृत्यु हो
  291. 16:40और उनके जीवन के इस अनिवार्य अंत को ना
  292. 16:43तुम टाल सकते हो और ना ही बदल सकते हो तो
  293. 16:46फिर शोक काहे का? और शोक क्यों?
  294. 16:51यह पितामह, यह गुरुजन, यह सगे संबंधी
  295. 16:55इनमें से किसी को भी तुम उनके इस जन्म से
  296. 16:58पूर्व भी नहीं जानते थे पार्थ और ना ही इस
  297. 17:01जन्म के उपरांत जानोगे।
  298. 17:05तब तो फिर इनके लिए शोक करना व्यर्थ होगा
  299. 17:08ना पार्थ? व्यर्थ होगा।
  300. 17:11अव्यक्त दीन भूतानी व्यक्त मध्यान भारत
  301. 17:16अव्यक्त निधन्यव तत्र का परदेवना ये
  302. 17:20देवकीन नंदन मेरे अनुज पुत्र अर्जुन को
  303. 17:22समझा रहा है कि भड़का रहा है।
  304. 17:31क्या
  305. 17:34अर्जुन ये मान जाएगा संजय?
  306. 17:37कि अपने जेष्ठ पिता की ओर उसका कोई
  307. 17:39दायित्व नहीं है?
  308. 17:42क्या वंश और संबंधों के महत्व को वह नकार
  309. 17:46देगा और अपने दिव्यास्त्र लेकर
  310. 17:50मेरे पुत्रों पर टूट पड़ेगा।
  311. 17:53मैं इन प्रश्नों के उत्तर कैसे दूं
  312. 17:55महाराज?
  313. 17:57इनके उत्तर या तो देव के नंदन कृष्ण दें
  314. 18:00या कुंती पुत्र अर्जार्जुन।
  315. 18:03किंतु मुझे इन प्रश्नों के उत्तर चाहिए
  316. 18:06संजय।
  317. 18:10इसलिए कान लगाकर सुनो।
  318. 18:14सुनो
  319. 18:16जो आज्ञा
  320. 18:18दुविधा में धृतराष्ट्र
  321. 18:22है
  322. 18:24युद्ध सका नहीं रोक
  323. 18:30योगेश्वर
  324. 18:32समझा
  325. 18:34रहे
  326. 18:35अर्जुन [संगीत] करो ना शोक
  327. 18:41[संगीत] अर्जुन
  328. 18:43करो ना शोक
  329. 18:46[संगीत]
  330. 18:48हे पार्थ स्वधर्म चावेक्ष न विकित मरहसी
  331. 18:54धर्मत ही युद्धा श्रेयत
  332. 18:57क्षत्रियस न विद्यते
  333. 19:00इसमें आश्चर्य की क्या बात है पार्थ जैसे
  334. 19:04फटना वस्त्र का अंतिम सत्य ठहरा है वैसे
  335. 19:07ही मृत्यु शरीर का अंतिम सत्य है तो फिर
  336. 19:10सत्य का शोक क्यों
  337. 19:13मनुष्य शरीर और आत्मा नश्वर और अनश्वर का
  338. 19:17मिश्रण नहीं है। शरीर तो केवल आत्मा का एक
  339. 19:20साधन है। इसलिए शरीर की चिंता में पड़े
  340. 19:24बिना ही अपने धर्म का पालन करते रहना
  341. 19:27चाहिए पार्थ।
  342. 19:30किंतु यदि तुम अपने क्षत्रिय धर्म के विषय
  343. 19:32में सोच रहे हो पार्थ तब भी तुम्हें युद्ध
  344. 19:35ही करना चाहिए।
  345. 19:37क्योंकि अधर्म के विरुद्ध अस्त्र और
  346. 19:39शस्त्र उठाना ही क्षत्रिय का धर्म है। और
  347. 19:43आज अधर्म धर्म के विरुद्ध शस्त्र उठाए
  348. 19:45सामने खड़ा है।
  349. 19:48इसलिए हे पार्थ अपने क्षत्रिय धर्म का
  350. 19:51पालन करो। हे केशव आपसे यही पूछने तो मैं
  351. 19:57आपको यहां लाया हूं कि मेरा कर्तव्य क्या
  352. 19:59है कि मेरा धर्म क्या है केशव? और स्वयं
  353. 20:03तुम क्या हो पार्थ? स्वयं तुम कौन हो? मैं
  354. 20:07द्रोण शिष्य अर्जुन हूं।
  355. 20:11क्या इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं हो? मैं
  356. 20:13कुंती पुत्र अर्जुन हूं। और और मैं
  357. 20:17क्षत्रिय हूं केशव। यदि तुम क्षत्रिय न
  358. 20:20रहे होते पार्थ तो द्रोण शिष्य भी ना
  359. 20:22होते। और हे कौतेय कुंती पुत्र होने के
  360. 20:26नाते भी तो तुम क्षत्रिय ही हो। तो
  361. 20:29तुम्हारी तीनों ही पहचाने क्षत्रिय पहचाने
  362. 20:32हैं। इसलिए क्षत्रिय धर्म ही तुम्हारा
  363. 20:35धर्म है। उस धर्म का पालन करो।
  364. 20:39अधर्म के विरुद्ध अस्त्र उठाना ही
  365. 20:40क्षत्रिय धर्म है। अन्याय और अनीति के
  366. 20:44विरुद्ध अस्त्र उठाना ही क्षत्रिय धर्म
  367. 20:45है।
  368. 20:47और यदि इस निर्णायक घड़ी में तुमने सत्य
  369. 20:50के पक्ष में और असत्य के विरोध में अस्त्र
  370. 20:52नहीं उठाए पार्थ तो तुम्हारे धर्म के
  371. 20:55साथ-साथ तुम्हारी उज्जवल कीर्ति भी नष्ट
  372. 20:58हो जाएगी।
  373. 20:59और यदि ऐसा हुआ पार्थ तो केवल तुम्हारे
  374. 21:02विरोधी ही नहीं बल्कि संपूर्ण समाज
  375. 21:05तुम्हें कलंकित कापुरुष कहेगा और आने वाली
  376. 21:09पीढ़ियां तुम्हें कायर और पापी मानेंगी।
  377. 21:12इसलिए हे महाबाहु विजय और पराजय जीवन और
  378. 21:16मृत्यु सुख और दुख के प्रश्नों में ना
  379. 21:18उलझो और युद्ध करो। यदि इस युद्ध में
  380. 21:22तुम्हारी विजय हुई तो पृथ्वी का राज्य और
  381. 21:25यश भोगोगे।
  382. 21:27और यदि वीर गति को प्राप्त हुए तब भी यश
  383. 21:30के साथ-साथ स्वर्ग पाओगे। इसलिए हे कौनते
  384. 21:34उठो सुखदख लाभ हानि जय पराजय सबको समान
  385. 21:38समझो और युद्ध करो कि यही तुम्हारा
  386. 21:40क्षत्रिय कर्तव्य भी है और मानव धर्म भी
  387. 21:45हतो प्राप्तसी स्वर्गम जितवा भोक्षसे महम
  388. 21:49तस्मात उत्तष् कौते योद्धा कृत निश्चय
  389. 21:55[संगीत]
  390. 21:58आत्मा तो मरता
  391. 22:02नहीं
  392. 22:03[संगीत]
  393. 22:04मर जाती है देह
  394. 22:11मन में तुम रखो नहीं
  395. 22:17दुविधा या संदेह
  396. 22:22इसलिए हे महाबाहु विजय और पराजय, जीवन और
  397. 22:26मृत्यु सुख और दुख के प्रश्नों में ना
  398. 22:29उलझो और युद्ध करो। यदि इस युद्ध में
  399. 22:33तुम्हारी विजय हुई तो पृथ्वी का राज्य और
  400. 22:35यश भोगोगे
  401. 22:37और यदि वीरगति को प्राप्त हुए तब भी यश के
  402. 22:41साथ-साथ स्वर्ग पाओगे। इसलिए हे कौनते उठो
  403. 22:45सुखदख लाभ हानि जय पराजय सबको समान समझो
  404. 22:49और युद्ध करो कि यही तुम्हारा क्षत्रिय
  405. 22:51कर्तव्य भी है और मानव धर्म भी
  406. 22:55हतो प्राप्तसी स्वर्गम जितवा भोसे महम
  407. 23:00तस्मात उत्तष् कौते योद्धा कृत निश्चया
  408. 23:09मेरा हाथ तो अभी कांडी की ओर नहीं बढ़ रहा
  409. 23:11है कि
  410. 23:13मेरी समझ में तो अब भी यह नहीं आ रहा है
  411. 23:15कि इस युद्ध से लाभ क्या होगा? लाभ हानि।
  412. 23:21[हंसी]
  413. 23:21ये दोनों ही सापेक्ष शब्द हैं। धनंजय
  414. 23:25मैं जानता हूं कि तुम्हें पृथ्वी के भोग
  415. 23:28या स्वर्ग के सुख की कामना नहीं है।
  416. 23:31इसलिए हे कौनतेय
  417. 23:34सुखद दुखे समय कृत्वा लाभा लाभौ जयाज ततो
  418. 23:39युद्धा युजस्व नम पापमवाप्ससी
  419. 23:44सुखदख लाभ हानि जय पराजय से ऊपर उठो पार्थ
  420. 23:50मुझसे तो अब भी नहीं उठा जा रहा है केशा
  421. 23:59अब तक मैं तुम्हें ज्ञान और विवेक की
  422. 24:01दृष्टि से समझा रहा था पार्थ
  423. 24:04जो जीवन के आरपार देख सकती है और सत्य की
  424. 24:08गहराई में झांक कर उसकी अंतरात्मा का स्वर
  425. 24:11समझ लेती है
  426. 24:14किंतु कदाचित तुम उसकी अमूर्तता में उलझ
  427. 24:17गए
  428. 24:18तो व्यावहारिक कर्म की तुला में इस क्षण
  429. 24:21को तोल कर देखो पार्थ व्यावहारिक कर्म की
  430. 24:24दृष्टि से अपने कर्तव्य के विषय में
  431. 24:26निर्णय लो तब भी तुम इसी निर्णय पर
  432. 24:29पहुंचोगे कि तुम्हारे लिए इस युद्ध में
  433. 24:32भाग लेना आवश्यक है।
  434. 24:34यही निर्णय तो मैं नहीं ले पा रहा हूं
  435. 24:36केशव।
  436. 24:37नहीं ले पा रहा हूं।
  437. 24:40तुम यह निर्णय केवल इसलिए नहीं ले पा रहे
  438. 24:42हो पार्थ कि तुम इस क्षण को केवल
  439. 24:45व्यक्तिगत लाभ और व्यक्तिगत हानि की तुला
  440. 24:47में तोल रहे हो। यही तो मोह का बंधन है
  441. 24:51पार्थ। यही तो तुम्हारे शोक की जड़ है। और
  442. 24:54इसीलिए तुम्हारा यह कायर, पलाय और कलंक
  443. 24:58में डुबोने वाला शोक ना तुम्हारे हित में
  444. 25:00है और ना ही समाज के हित में। यह शोक ना
  445. 25:04वर्तमान के लिए शुभ है और ना ही भविष्य के
  446. 25:07लिए।
  447. 25:08लाभ और हानि की इस कामना में ना भटको
  448. 25:10पार्थ ना भटको केवल कर्म करो कर्म
  449. 25:17कर्म तो अपने आप ही में पुण्य है पवित्र
  450. 25:20है और समाज के लिए कल्याणकारी भी है।
  451. 25:24कर्म तो स्वयं ही अपना फल भी है। पार्थ
  452. 25:28परंतु यदि तुम समाज कल्याण के कार्य में
  453. 25:31स्वयं अपना हित मिला लोगे तो तुम्हारा वह
  454. 25:34कर्म अशुद्ध और अशुभ हो जाएगा।
  455. 25:38इसलिए हे पार्थ निष्काम कर्म के मार्ग पर
  456. 25:42चलो क्योंकि कर्म फल तो तुम्हारे वश में
  457. 25:44है ही नहीं इसलिए केवल कर्म करो और कर्म
  458. 25:50फल की इच्छा ना करो
  459. 25:52कर्मण्य वाधिकार रस्ते मा फलेशु कदाचना
  460. 25:57मा कर्म फल हेतु भू माते संगोस्तवा कर्मणी
  461. 26:02किंतु निष्काम कर्म कैसे संभव है वासुदेव
  462. 26:06फल फल का ज्ञान ही तो कर्म करवाता है। और
  463. 26:09यदि दृष्टि फल से ही हट जाए तो कोई कर्म
  464. 26:13करेगा ही क्यों? कोई कर्म इसलिए करेगा
  465. 26:15पार्थ कि कर्म के बिना तो जीवन संभव ही
  466. 26:18नहीं। कुछ तो करोगे ही या भोजन करोगे या
  467. 26:24नहीं करोगे? या भूखे को भोजन करवाओगे या
  468. 26:28नहीं करवाओगे या युद्ध करोगे या नहीं
  469. 26:31करोगे?
  470. 26:33तुम्हारे पास तो केवल यही विकल्प है कि
  471. 26:36तुम क्या करो या क्या ना करो।
  472. 26:39परंतु परिणाम तुम्हारे वश में नहीं है।
  473. 26:42पार्थ
  474. 26:43कर्म फल तुम्हारे वश में नहीं है।
  475. 26:46तुम्हारे अधिकार की सीमा इस विकल्प पर
  476. 26:49समाप्त हो जाती है कि तुम युद्ध करोगे या
  477. 26:52नहीं करोगे।
  478. 26:55किंतु युद्ध का परिणाम तुम्हारे हाथ में
  479. 26:57नहीं है।
  480. 27:00यदि तुम विजय चाहो भी तो यह आवश्यक नहीं
  481. 27:04कि विजय तुम्हारी ही हो जाए। तुम्हारी
  482. 27:07पराजय भी हो सकती है। किंतु यदि तुम विजय
  483. 27:10से मोहित नहीं होगे तो पराजय से भी नहीं
  484. 27:13घबराओगे।
  485. 27:15यदि तुम यह सोचो पार्थ कि चाहे विजय हो
  486. 27:18चाहे पराजय किंतु तुम तो केवल इसलिए युद्ध
  487. 27:22कर रहे हो कि युद्ध करना तुम्हारा कर्तव्य
  488. 27:25है तो विजय के सुख या पराजय के दुख का
  489. 27:29प्रश्न ही नहीं उठता
  490. 27:32और जो ना विजय से सुखी हो और ना पराजय से
  491. 27:35दुखी वही स्थित प्रज्ञ है। इसलिए हे पार्थ
  492. 27:40कर्म के प्रतिफल की चेष्टा ना करो। तुम तो
  493. 27:43केवल वही करो जो तुम्हारे वश में है।
  494. 27:46अर्थात अपने धर्म का पालन करो।
  495. 27:50यही कर्म योग है पार्थ। यही कर्म योग है।
  496. 27:54इस रहस्य को समझो पार्थ कि तुम्हारे पास
  497. 27:57तो केवल करने या ना करने का विकल्प है।
  498. 28:00किंतु कर्म के अंत पर मनुष्य के अधिकारों
  499. 28:03की सीमा समाप्त हो जाती है।
  500. 28:06कर्म का परिणाम मनुष्य के वश में नहीं है।
  501. 28:12तुम सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हो। परंतु यदि
  502. 28:16तुम्हारा आखेड तनिक भी इधर से उधर हो जाए
  503. 28:19तो तुम चूक जाओगे।
  504. 28:21तुम्हारा अधिकार तुम्हारे वाण संधान पर
  505. 28:23है। तुम्हारा अधिकार तुम्हारी दृष्टि पर
  506. 28:26है। परंतु उस मृग पर तुम्हारा कोई अधिकार
  507. 28:28नहीं जिसकी ओर तुम बाण चला रहे हो।
  508. 28:33हे धनंजय
  509. 28:35सत्पुरुष कभी अपने अधिकारों की सीमा का
  510. 28:38उल्लंघन नहीं करते।
  511. 28:40अर्थात अपने कर्म में स्थिर रहो। पार्थ
  512. 28:43स्थिर रहो क्योंकि कर्म की कुशलता का ही
  513. 28:47नाम योग है।
  514. 28:52और योग क्या है कि योग क्या है? वही तो
  515. 28:56बता रहा था पार्थ।
  516. 28:59योग कर्म का कौशल है। मोह का त्याग कर्म
  517. 29:02का कौशल है।
  518. 29:05मोह से मुक्त होकर अपने कर्तव्य का पालन
  519. 29:08करना कर्म का कौशल है। सफलता और असफलता
  520. 29:11दोनों ही में समान रहना कर्म का कौशल है।
  521. 29:17बुद्धि युक्त जहा उभय सुकृत दुष्कृते
  522. 29:21तस्मात योगाय युजस्व योग कर्म सु कौशलम
  523. 29:25संजय संजय
  524. 29:28आज्ञा महाराज
  525. 29:29यदि तुम्हारी वाणी वहां तक पहुंच सके तो
  526. 29:30चिल्ला कर कहो कि हे अर्जुन वासुदेव के
  527. 29:34पुत्र की बात ना सुनो वो तुम्हें बहका रहा
  528. 29:37है
  529. 29:43तनिक
  530. 29:45तनिक सोचो संजय
  531. 29:48यही कृष्ण कल शांतिदूत बनकर यहां आया था
  532. 29:51और आज
  533. 29:53आज शांति के विषय में एक शब्द नहीं बोल
  534. 29:56रहा
  535. 29:59इसका अर्थ तो यही निकला ना कि वो यहां
  536. 30:03शांति की स्थापना के लिए आया ही नहीं था।
  537. 30:06वो केवल यही चाहता था कि इतिहास मेरी
  538. 30:08दाढ़ी पकड़ कर मुझसे कहे
  539. 30:12कि धृतराष्ट्र
  540. 30:14शांति के द्वार तूने बंद किए थे।
  541. 30:21देवकी का यह पुत्र
  542. 30:25कब का बैर निकाल रहा है संजय वे बैर की
  543. 30:28बात नहीं कर रहे हैं महाराज वे तो कुंती
  544. 30:32पुत्र को धर्म और कर्म योग के रहस्य समझा
  545. 30:35रहे हैं।
  546. 30:35तुम भी उसके जैसी बातें करने लगे। क्या
  547. 30:38मेरे प्रति तुम्हारी निष्ठा भी अपने स्थान
  548. 30:40से सरक गई है?
  549. 30:48हे संजय
  550. 30:50क्या
  551. 30:51तुम भी अपनी निष्ठा में स्थिर नहीं रहोगे?
  552. 30:56मैं तो केवल वाचक हूं महाराज।
  553. 30:58और मेरा विवरण मेरी निष्ठा की कर्मभूमि
  554. 31:01नहीं है।
  555. 31:03अभी तो मैं केवल वाचक का दायित्व निभा रहा
  556. 31:05हूं।
  557. 31:06तो वाचक का दायित्व निभाओ। निभाओ वाचक का
  558. 31:09दायित्व।
  559. 31:12मुझे कृपया कृष्ण के कर्म योग का अर्थ ना
  560. 31:16समझाओ।
  561. 31:19तुम केवल उन दोनों पर दृष्टि जमाए रहो
  562. 31:24और बताए जाओ कि वहां क्या हो रहा है।
  563. 31:53हे केशव
  564. 31:55किंतु मैं मुनि या स्थित प्रज्ञ को
  565. 31:57पहचानूंगा कैसे है? उसकी पहचान क्या है?
  566. 32:01वो वो उठता बैठता कैसे है? उसकी बोलने की
  567. 32:05शैली कैसी है केशव?
  568. 32:08उसे पहचानने में तो कोई कठिनाई ही नहीं
  569. 32:11है। पार्थ
  570. 32:12प्रजा यदा काम सर्वा पार्थ मनोगतान
  571. 32:17आत्मन्यवत्मात
  572. 32:19स्थित प्रज्ञदोते
  573. 32:23उसी की भांति तुम अपनी कामनाएं त्याग दो।
  574. 32:26अपनी व्यक्तिगत अभिलाषाओं से मुक्त हो
  575. 32:29जाओ। सुखदख से परे होकर अपने स्वयं में
  576. 32:33संतुष्ट हो जाओ पार्थ तो ना तुम्हें दुख
  577. 32:36की अग्नि जला सकेगी और ना सुख की वर्षा
  578. 32:39तुम्हें भगा सकेगी।
  579. 32:42हे पार्थ स्थित प्रज्ञ वो मुनि है जो सुख
  580. 32:47और दुख दोनों ही में समान भाव रखता है और
  581. 32:50कोई उसका यह संतुलन तोड़ भी नहीं सकता।
  582. 32:54जब उसके शब्द बाहर निकलते हैं तो मन में
  583. 32:57तैरते दुख और सुख से बाहर नहीं निकलते
  584. 33:00बल्कि आत्मा की अथाह गहराइयों से बाहर
  585. 33:03निकलते हैं।
  586. 33:05वो मोह की भाषा नहीं बोलता वो निष्काम
  587. 33:08कर्म की भाषा बोलता [संगीत] है। वो जब
  588. 33:11बैठता है तो कछुए की भांति अपने भीतर सिमट
  589. 33:15कर बैठता है और अपने स्वयं ही को दुर्ग
  590. 33:18बना लेता है। अर्थात उसकी इंद्रियां उसके
  591. 33:22वश में होती हैं और अपनी इंद्रियों को
  592. 33:25केवल वही अपने वश में कर सकता है जिसका
  593. 33:28अपना मन अपने वश में हो।
  594. 33:32हे पार्थ
  595. 33:34धयतो विषय पुस संगस्ते उपजायते संगात
  596. 33:39संजायते कामात क्रोधो विजायते
  597. 33:46क्रोधा भवती सम्मोह सम्मोहात स्मृति
  598. 33:49विभ्रम स्मृति भ्रंशात बुद्धि नाशो बुद्धि
  599. 33:53नाशात प्रणश्यति
  600. 33:56हे पार्थ सामान्य पुरुष विषय का ध्यान
  601. 34:00करता
  602. 34:01और विषय का ध्यान उसे आसक्त बना देता है।
  603. 34:04इस आसक्ति या लगाव से काम का जन्म होता
  604. 34:08है। जब काम की पूर्ति नहीं होती तो क्रोध
  605. 34:11उत्पन्न होता है। जब क्रोध उत्पन्न होता
  606. 34:14है तो विषय के प्रति मोह और बढ़ जाता है।
  607. 34:19और जब मोह और बढ़ जाता है पार्थ तो सोचने
  608. 34:22की शक्ति भटक जाती है। जब सोचने की शक्ति
  609. 34:25भटक जाती है तो बुद्धि का नाश होता है। और
  610. 34:29जब बुद्धि का नाश होता है तो मनुष्य का
  611. 34:31सर्वनाश हो जाता है। और हे कुंती पुत्र
  612. 34:35तुम्हारा यह मोह तुम्हें बुद्धि के विनाश
  613. 34:37की ओर ले जा रहा है।
  614. 34:40तनिक सोचो पार्थ कि जिसके पास बुद्धि ही
  615. 34:43ना होगी उसे शांति कैसे मिल सकती है? वो
  616. 34:46तो शांति और अशांति में अंतर ही नहीं कर
  617. 34:48सकता।
  618. 34:50और जो शांति को अशांति से अलग तक नहीं कर
  619. 34:53सकता वह भला कैसे सुखी हो सकता है?
  620. 34:57हे पार्थ जैसे पवन के झोंके नाव को भटका
  621. 35:01देते हैं वैसे ही कामनाएं बुद्धि को भटका
  622. 35:04देती हैं।
  623. 35:06इंद्रिय नाम ही चरताम यन मनो अनुधते तदस्य
  624. 35:11हरति प्रज्ञा वायुर नामवा भसी
  625. 35:18इसलिए हे महाबाहु अपनी इंद्रियों को अपने
  626. 35:21वश में रखो स्वयं ही उनके वश में ना हो
  627. 35:24जाओ
  628. 35:26पार्थ यह बात ध्यान से सुनो और समझो
  629. 35:30कि जब संसार सोता है तब मुनि जागता है और
  630. 35:35जब संसार जागता है तब मुनि सोता है।
  631. 35:38यह सोना जागना क्या है केशव? यह रात दिन
  632. 35:41कैसे हैं? रात और दिन की तो मैंने बात ही
  633. 35:44नहीं की थी पार्थ। मैंने तो केवल सोने और
  634. 35:47जागने के विषय में बात की थी।
  635. 35:50सामान्य पुरुष की जाग हर क्षण कुछ पाने और
  636. 35:53भोगने के मोह में व्यतीत होती है। यही
  637. 35:56उसकी चेतना का लक्ष्य है। यदि उसे भूख लगी
  638. 35:59तो उसे भोजन चाहिए। यदि उसे प्यास लगी तो
  639. 36:03उसे जल चाहिए। यदि उसे ऋतुओं से अपना बचाव
  640. 36:06करना है तो घर चाहिए।
  641. 36:09उसकी सोच आत्मनिष्ठ है। परंतु मुनि अर्थात
  642. 36:13स्थित प्रज्ञ की सोच वस्तुनिष्ठ है।
  643. 36:17वह व्यक्तिगत भूख और व्यक्तिगत तृष्णा के
  644. 36:20परे देखता है।
  645. 36:22वो वृक्ष से गिरे हुए फल के विषय में नहीं
  646. 36:25सोचता। वह वृक्ष के विषय में सोचता है।
  647. 36:28वनों के विषय में सोचता है।
  648. 36:31सामान्य मनुष्य को ईंधन के लिए लकड़ी
  649. 36:33चाहिए। तो वह वृक्षों को तब तक काटता चला
  650. 36:37जाएगा जब तक वन नष्ट ना हो जाए। परंतु
  651. 36:41मुनि प्रकृति में वनों के महत्व के विषय
  652. 36:44में सोचता है। प्रकृति के संतुलन के विषय
  653. 36:47में सोचता है। वनों और ऋतुओं के संबंध के
  654. 36:51विषय में सोचता है।
  655. 36:53इसलिए हे पार्थ जो सामान्य पुरुष की
  656. 36:57इंद्रियों के लिए दिन है वह मुनि के लिए
  657. 36:59रात है। क्योंकि वह तो इंद्रियों की सीमा
  658. 37:02को पार कर चुका है।
  659. 37:05और जो सामान्य पुरुष की इंद्रियों के लिए
  660. 37:07रात है वह मुनि के लिए दिन है। क्योंकि
  661. 37:11उसी सन्नाटे में मुनि की चेतना का
  662. 37:14सूर्योदय होता है।
  663. 37:17मुनि की रुचि सामने की समस्याओं के
  664. 37:19साथ-साथ उन समस्याओं के समाधान में भी है।
  665. 37:24और यही उसे सामान्य पुरुष से अलग करती है।
  666. 37:28या निशा सर्वभूत नाम तस्याम जागृति संयमी
  667. 37:33यस्याम जागृति भूतानी सान निशा पश्यतो
  668. 37:37मुनेह हे पार्थ सत्य इंद्रियों की पहुंच
  669. 37:40के बाहर है ऐसा नहीं कि मुनि को भूख नहीं
  670. 37:44लगती लगती है परंतु वह अपनी भूख के परे
  671. 37:48देखता है और यह सोचता है कि भूख का उपचार
  672. 37:52क्या है इसीलिए सामान्य मनुष्य का दिन
  673. 37:55मुनि के लिए रात रात है और जो सामान्य
  674. 37:58मनुष्य की इस रात से अपने को बचा ले वही
  675. 38:02स्थित प्रज्ञ है।
  676. 38:05सामान्य मनुष्य तो उन नदियों की भांति है
  677. 38:08जिन्हें व्याकुलता बहा ले जाती है। परंतु
  678. 38:12उन्हें अपने मार्ग का ज्ञान नहीं होता। वह
  679. 38:15तो अंधाधुंध बही जाती हैं क्योंकि वह केवल
  680. 38:19बहने ही को अपना कर्म समझती हैं और वह
  681. 38:22अपना सारा जल अपनी सारी उथल-पुथल सागर में
  682. 38:26उड़ेल देती हैं।
  683. 38:28किंतु सागर फिर भी अपने तटों की मर्यादा
  684. 38:31का उल्लंघन नहीं करता।
  685. 38:33इसी प्रकार कामनाओं की नदियां सामान्य
  686. 38:36मनुष्य को तो बहा ले जाती हैं परंतु जब वह
  687. 38:39मुनि तक आती हैं तो मुनि उन्हें समेट लेता
  688. 38:42है और अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता।
  689. 38:47हे पार्थ
  690. 38:49तुम भी सागर बनो।
  691. 38:52सागर मुनि है। सागर ज्ञानी है। तुम भी
  692. 38:57ज्ञानी बनो पार्थ। क्योंकि ज्ञान ही उत्तम
  693. 39:01है।
  694. 39:07हे ऋषिकेश
  695. 39:09हे योगेश्वर
  696. 39:11हे ज्ञान मूर्ति यदि ज्ञान कर्म से उत्तम
  697. 39:15है तो आप मुझे इस लहूलुहान कर्म में क्यों
  698. 39:18लगा रहे हैं केशव आप मुझे इस लहूलुहान
  699. 39:21कर्म में क्यों लगा रहे हैं
  700. 39:24[संगीत]
  701. 39:32हे केशव आपने तो मुझे उलझा दिया। यदि
  702. 39:37ज्ञान कर्म से उत्तम है तो फिर मैं यह
  703. 39:39भयानक कर्म करूं क्यों? क्यों युद्ध करूं
  704. 39:42केशव? क्यों ना मुनि बनकर मौन समाधि में
  705. 39:46चला जाऊं।
  706. 39:48मैं कल्याण का मार्ग पूछ रहा हूं केशव।
  707. 39:52कृपया मुझे मार्ग दिखलाइए केशव। मुझे
  708. 39:54मार्ग दिखलाइए। लोकेस्मिन द्विवधा निष्ठा
  709. 39:58पुरा प्रोक्ता मयाघ ज्ञान योगन सांख्या
  710. 40:02नाम कर्म योगन योगी नाम
  711. 40:06हे निष्पाप अर्जुन संसार में दो प्रकार के
  712. 40:09लोग होते हैं अंतर्मुखी और बहिर्मुखी
  713. 40:14जो अंतर्मुखी होते हैं वे स्वयं के भीतर
  714. 40:17जाकर ईश्वर को देखते हैं। यही ज्ञान योग
  715. 40:20है। और जो बहिर्मुखी होते हैं वे स्वयं से
  716. 40:23बाहर निकलकर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न
  717. 40:26करते हैं। किंतु कर्म से छुटकारा नहीं।
  718. 40:30क्योंकि स्वयं के भीतर जाकर उसे खोजना भी
  719. 40:32तो कर्म ही है। हे कुंती पुत्र मार्ग तो
  720. 40:37यही दो हैं। एक ज्ञान योग का और दूसरा
  721. 40:41कर्म योग का। हे केशव तो फिर मैं ज्ञान
  722. 40:45योग के ही मार्ग पर क्यों ना चलूं?
  723. 40:48[हंसी]
  724. 40:50किंतु हे पार्थ ज्ञान योग भी कर्म के
  725. 40:54त्यागने का मार्ग नहीं है। सिद्धि का
  726. 40:56मार्ग नहीं है। क्योंकि कर्म के बिना तो
  727. 40:59जीवन संभव ही नहीं। आंखें हैं तो वे अवश्य
  728. 41:03देखेंगी। पलकें हैं तो वे अवश्य झपकेंगी।
  729. 41:06कर्ण है तो वे अवश्य सुनेंगे। जो
  730. 41:09कर्मेंद्रियों के आड़े आए जो उन्हें बलपूक
  731. 41:13रोक कर उनका दमन करके विषयों का चिंतन
  732. 41:16करें वो योगी नहीं। वह ज्ञानी नहीं वह तो
  733. 41:19मिथ्याचारी है।
  734. 41:23सिद्ध पुरुष इंद्रियों को अपने वश में
  735. 41:25करता है। उनका दमन नहीं करता। पार्थ वो
  736. 41:28आंखें बंद करके नहीं जीता।
  737. 41:32कर्म बिना तो शरीर की यात्रा संभव ही
  738. 41:34नहीं।
  739. 41:36व्यक्ति सांस तो लेगा ही ना। पार्थ। यदि
  740. 41:40वातावरण में कोई सुगंध या दुर्गंध है तो
  741. 41:42वह उसका अनुभव करने के लिए भी विवश है।
  742. 41:46यदि उसके आसपास कोई नाद है, कोई ध्वनि है,
  743. 41:48कोई कोलाहल है तो उसे सुनने के लिए उसके
  744. 41:51कर्ण उसके आदेश की प्रतीक्षा तो नहीं
  745. 41:54करेंगे ना।
  746. 41:55इसलिए जो अपने इंद्रियों को नियंत्रित
  747. 41:58रखे, जो उन पर अपनी चेतना का अंकुश लगाकर
  748. 42:01उन्हें कर्मोनुख करें, उन्हें कर्म की
  749. 42:03दिशा दिखाए, वही श्रेष्ठ है। वह अपने
  750. 42:07विकल्पों को समझता है पार्थ और अपनी
  751. 42:09संकल्प शक्ति का प्रयोग करता है।
  752. 42:14और हे पार्थ
  753. 42:16अपने नियत कर्म करना कुछ ना करने से अच्छा
  754. 42:19है। अब यह भी ठीक है पार्थ की आंखें देखती
  755. 42:22हैं। किंतु वे क्या देखें और क्या ना
  756. 42:25देखें इसका निर्णय तो ज्ञानी स्वयं ही
  757. 42:28लेता है। वह आंखों को देखने की, कर्णों को
  758. 42:31सुनने की और पांव को चलने की खुली छूट
  759. 42:33नहीं देता।
  760. 42:35विकल्प के इसी मोड़ पर ज्ञानी और अज्ञानी
  761. 42:38के अंतर का भेद खुलता है। पार्थ
  762. 42:41इसलिए कर्म तो आवश्यक है क्योंकि उसके
  763. 42:44बिना तो शरीर का निर्वाह संभव ही नहीं।
  764. 42:48किंतु हे पार्थ ज्ञानी पुरुष की भांति
  765. 42:51कर्म करो। ज्ञानी पुरुष की भांति
  766. 42:55नियतम कुर कर्मत्वम कर्म जयो कर्मण शरीर
  767. 43:00यात्राप चते न प्रसिद्ध अकर्मण
  768. 43:04यज्ञार्थात कर्मणोत्र लोकोयम कर्म बंधन
  769. 43:08तदर्थम कर्म कौते मुक्त संग समाचर
  770. 43:14हे कौते कर्म ऐसे करो जैसे यज्ञ किया जाता
  771. 43:19है क्योंकि कर्म ही यज्ञ
  772. 43:22और इसका स्रोत स्वयं अविनाशी ब्रह्मा है।
  773. 43:25इसलिए कर्म का मार्ग सीधा ब्रह्मा तक जाता
  774. 43:28है।
  775. 43:30और इसीलिए जो व्यक्ति सृष्टि चक्र चलाने
  776. 43:33में योगदान नहीं करता उसका जीवन मूल्यहीन
  777. 43:36हो जाता है। तुम इस मूल्यहीनता की ओर ना
  778. 43:39जाओ। पार्थ तुम इस मूल्यहीनता की ओर ना
  779. 43:42जाओ।
  780. 43:44जो व्यक्ति केवल अपनी समस्याओं के विषय
  781. 43:46में सोचता है, वह तो पापी है।
  782. 43:49इसलिए तुम इस मोह जाल से निकलकर अपने
  783. 43:51कर्तव्यों को पहचानो पार्थ और उनका पालन
  784. 43:54करो।
  785. 43:55हे पार्थ,
  786. 43:57कर्म फल की इच्छा ही मार्ग में बाधा है।
  787. 44:02कर्म फल की इच्छा ही तो व्यक्ति के गले
  788. 44:04में बंधा हुआ वह पत्थर है जो उसे स्वयं की
  789. 44:07तहों से ऊपर उठने ही नहीं देता।
  790. 44:11यही तो व्यक्ति को समाज से काट देता है और
  791. 44:13उसे व्यक्तिगत लाभ और व्यक्तिगत हानि के
  792. 44:16दलदल में धकेल देता है।
  793. 44:20समाज तुम में नहीं है पार्थ।
  794. 44:23तुम समाज में हो।
  795. 44:26इसलिए लोक संग्रह और लोक कल्याण ही को
  796. 44:29अपना परम कर्तव्य मानो। क्योंकि जो समाज
  797. 44:32के लिए कल्याणकारी होगा वही तुम्हारे लिए
  798. 44:34भी कल्याणकारी होगा।
  799. 44:37जो कर्म लोक संग्रह के लिए होगा पार्थ उसी
  800. 44:40के द्वारा तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी।
  801. 44:44व्यक्तिगत लाभ से तो पाप की गली निकलती
  802. 44:47है। क्योंकि वह तो स्वार्थ सिद्धि के लिए
  803. 44:50व्यक्ति को भटका देता है। और हे पार्थ यह
  804. 44:55भी ना भूलो कि तुम एक महान पुरुष हो। और
  805. 44:58लोग तुम्हें दृष्टांत मानकर तुम्हारे
  806. 45:00पीछेछे काम और स्वार्थ के मार्ग पर चल
  807. 45:02पड़ेंगे। क्योंकि एक श्रेष्ठ व्यक्ति का
  808. 45:05आचरण तो दूसरों के लिए दृष्टांत बन ही
  809. 45:07जाता है।
  810. 45:10मुझे ही को लो।
  811. 45:14नमे पार्थ कर्तव्यम त्रिशु लोकशु कििंचन
  812. 45:18नावाम अवाप्तव्यम वर्त एव चक्करमणि
  813. 45:24त्रिलोक में मेरे लिए कुछ करना आवश्यक
  814. 45:26नहीं। पार्थ और त्रिलोक में ऐसा भी कुछ
  815. 45:30नहीं जिसे मैं प्राप्त करना चाहूं और
  816. 45:32प्राप्त ना कर सकूं। फिर भी मैं तुम्हारे
  817. 45:35सामने हूं। कर्म कर रहा हूं पार्थ कर्म कर
  818. 45:39रहा हूं। यह दिखला रहा हूं यह सिद्ध कर
  819. 45:42रहा हूं कि निष्काम कर्म के मार्ग पर चलते
  820. 45:45हुए जीवन व्यतीत करना संभव है।
  821. 45:48हे संजय
  822. 45:50वासुदेव ने यह क्या कहा?
  823. 45:54महाराज
  824. 45:56यहां पर तो वासुदेव कृष्ण के स्वर ही बदले
  825. 45:58हुए हैं। जैसे स्वयं वो नहीं बल्कि कोई और
  826. 46:03बोल रहा है। और कौन?
  827. 46:08महाराज
  828. 46:10कुंती पुत्र अर्जुन क्या समझे यह तो मैं
  829. 46:13नहीं जानता।
  830. 46:15किंतु स्वयं नारायण के अतिरिक्त तो कोई और
  831. 46:18इस शैली में बोल ही नहीं सकता।
  832. 46:20कोई और तो यह कह ही नहीं सकता कि त्रिलोक
  833. 46:23में कोई ऐसी वस्तु है ही नहीं जिसे वह
  834. 46:26प्राप्त करना चाहे और प्राप्त ना कर सकें।
  835. 46:30वो कह रहे हैं कि त्रिलोक में उनके करने
  836. 46:33योग्य कुछ है ही नहीं। फिर भी फिर भी वह
  837. 46:36कर्म कर रहे हैं
  838. 46:38कि यदि वह कर्म नहीं करेंगे तो संसार
  839. 46:42उन्हें दृष्टांत मानकर कर्म को त्याग देगा
  840. 46:45और कर्मचक्र ठहर जाएगा
  841. 46:49और उसके ठहर जाने से समाज नष्ट हो जाएगा
  842. 46:54और इस सर्वनाश का कारण
  843. 46:56वही ठहराए जाएंगे।
  844. 46:58संजय
  845. 46:59यह तो कोई साधारण या असाधारण पुरुष कह ही
  846. 47:03नहीं सकता।
  847. 47:04और यह वाक्य तो यदि किसी ब्रह्म ऋषि के भी
  848. 47:08हो तब भी यह अहंकार का प्रदर्शन माना
  849. 47:11जाएगा। किंतु वासुदेव के उच्चारण में तो
  850. 47:14अहंकार की झलक भी नहीं थी महाराज।
  851. 47:17इसी ने तो मुझे भी भयभीत कर दिया है। संजय
  852. 47:22यदि वो इस स्वर में मुझसे भी धनुष उठाने
  853. 47:25को कहें तो अपनी नेत्रहीनता भूलकर मैं भी
  854. 47:28धनुष उठा लूंगा।
  855. 47:33संजय
  856. 47:36तो क्या अर्जुन उठा लेगा?
  857. 47:41इस प्रश्न का उत्तर मैं दे सकता हूं
  858. 47:43महाराज।
  859. 47:45किंतु भविष्यवाणी मेरे कर्म क्षेत्र के
  860. 47:47बाहर है।
  861. 47:49यदि भगवान यह चाहते कि मनुष्य को भविष्य
  862. 47:53का ज्ञान होना चाहिए तो वह स्वयं उसे यह
  863. 47:56ज्ञान दे देते।
  864. 47:58इसलिए अपने भविष्य को अपने वर्तमान से
  865. 48:01निकलने का समय दीजिए महाराज।
  866. 48:07यह प्रतीक्षा भी आपके कर्म क्षेत्र के
  867. 48:10भीतर है।
  868. 48:15कदाचित
  869. 48:19तुम
  870. 48:20ठीक ही कह रहे हो संजय।
  871. 48:26और कदाचित मैं यह जानता भी हूं
  872. 48:30कि इस युद्ध का परिणाम क्या होगा।
  873. 48:34फिर भी चाहता यह हूं
  874. 48:38कि इस युद्ध का परिणाम वो ना हो
  875. 48:42जो होने वाला है।
  876. 48:47कल तक मैं यह सोचा करता था
  877. 48:51कि मैं शत पुत्रों का पिता हूं।
  878. 48:54इसलिए मैं तो कभी अकेला हो ही नहीं सकता।
  879. 49:01किंतु अब लगता है
  880. 49:04कि मैं अकेला होने वाला हूं। संजय
  881. 49:10अकेला होने वाला हूं।
  882. 49:17इसलिए मुझे अब अपनी आंखों की उंगली पकड़ाकर
  883. 49:22कुरुक्षेत्र ले चलो।
  884. 49:38स करण्य विद्वान सो यथा कुर्वती भारत
  885. 49:43कुर्यात विद्वान तथा चिकशुर लोक संग्रहम
  886. 49:49हे भारत
  887. 49:50कर्म तो अज्ञानी भी करते हैं परंतु केवल
  888. 49:54अपने निहित स्वार्थ की दृष्टि से ज्ञानी
  889. 49:57का कर्म तो निस्वार्थ होता है। संसार के
  890. 50:01संतुलन को स्थिर बनाए रखने के लिए होता
  891. 50:03है। लोक कल्याण के लिए होता है। इसलिए हे
  892. 50:06पार्थ अपने मन पर कोई बोझ ना लो। अपना
  893. 50:10कर्म मुझे अर्पण कर दो और यह धर्म युद्ध
  894. 50:13करो।
  895. 50:14कर्तव्य पालन के मार्ग पर तो मृत्यु भी
  896. 50:17कल्याणकारी हो जाती है।
  897. 50:20यदि पितामह, गुरुजनों और सगे संबंधियों का
  898. 50:23तुम्हें वध भी करना पड़े तब भी तुम्हें
  899. 50:25पाप नहीं लगेगा। क्योंकि कर्तव्य पालन पाप
  900. 50:28रहित होता है। पार्थ कर्तव्य पालन पाप
  901. 50:32रहित होता है।
  902. 50:35यदि वे वीरगति को प्राप्त हुए तो उनकी
  903. 50:38मृत्यु कल्याणकारी हो जाएगी और यदि तुम
  904. 50:41वीरगति को प्राप्त हुए तो तुम्हारी मृत्यु
  905. 50:43भी इसलिए हे पार्थ युद्ध करो क्योंकि धर्म
  906. 50:48का मार्ग पाप का मार्ग नहीं हो सकता। पाप
  907. 50:51की बात निकल आई है तो यह बताइए किशा कि
  908. 50:55कभी-कभी मनुष्य पाप करने के लिए इतना विवश
  909. 50:57क्यों हो जाता है? उसे कौन विवश करता है?
  910. 51:00उसे विवश करती है उसकी वासना। उसे विवश
  911. 51:03करता है उसका निहित स्वार्थ। उससे पाप
  912. 51:06करवाता है उसका क्रोध, उसका मोह। इन
  913. 51:10शत्रुओं को पहचानो पार्थ।
  914. 51:13जैसे धुआं अग्नि को ढक देता है या धूल
  915. 51:17दर्पण को या झिल्ली गर्भ को वैसे ही ज्ञान
  916. 51:20को ढक देते हैं काम मोह और वासना
  917. 51:25आवृतम ज्ञान मेतेन ज्ञानिनो नित्य वरणा
  918. 51:30काम रूपेण कौते दुष्पूरेणा नले नच
  919. 51:36काम और मोह की अग्नि ज्ञान को नष्ट कर
  920. 51:39देती है और इसीलिए ज्ञानी की वैरी
  921. 51:43हे कौतेय अग्नि को स्वच्छ बनाओ दर्पण को
  922. 51:47परिशुद्ध करो और अपनी इंद्रियों को सौम्य
  923. 51:50बनाकर ज्ञान और विवेक के नाशकों का वध करो
  924. 51:54इंद्रियण पराण्य इंद्रियभ्य परम मनः
  925. 51:58मनसस्तु परा बुद्धि यो बुद्ध परतस्तु स हे
  926. 52:04पार्थ
  927. 52:06जड़ पदार्थ से इंद्रियां श्रेष्ठ है और
  928. 52:09इंद्रियों से श्रेष्ठ है मन मन से
  929. 52:12श्रेष्ठतर है बुद्धि और बुद्धि से भी
  930. 52:15श्रेष्ठ है आत्मा।
  931. 52:17तो आत्मा की चिंता करो पार्थ। आत्मा की
  932. 52:20चिंता करो और देह, इंद्रियों, मन और
  933. 52:24बुद्धि से ऊपर उठने का प्रयत्न करो।
  934. 52:27हे पार्थ,
  935. 52:29तुम तो मेरे भक्त भी हो और मेरे मित्र भी।
  936. 52:33इसलिए मैं तुम्हें वह योग बताने जा रहा
  937. 52:36हूं जो बहुत समय से लुप्त है। परंतु
  938. 52:40सृष्टि के आरंभ में इसे मैंने ही सूर्य को
  939. 52:44दिया था और सूर्य से यह मनु को मिला और
  940. 52:47मनु से एक श्वाकु तक पहुंचा। सूर्य को
  941. 52:50दिया था। आपने यह योग सूर्य को दिया था।
  942. 52:56परंतु हे केशव
  943. 52:58आपने आधुनिक काल में जन्म लिया है और
  944. 53:02सूर्य देव प्राचीन है तो मैं यह कैसे मान
  945. 53:05लूं कि सृष्टि के आरंभ में ही आपने यह योग
  946. 53:09सूर्यदेव को दिया होगा। बोलिए केशा
  947. 53:15बहु में व्यतीतानी जन्मानी तव चार्ज तान्य
  948. 53:20वेद सर्वाण नतम वे परंतप
  949. 53:26हां पार्थ
  950. 53:28मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके
  951. 53:30हैं।
  952. 53:32मुझे वो सारे जन्म याद हैं। परंतु तुम्हें
  953. 53:35याद नहीं है। हे परंतप
  954. 53:39वैसे तो मैं अजन्मा हूं अविनाशी हूं और
  955. 53:43समस्त प्राणियों का स्वामी हूं। परंतु मैं
  956. 53:47अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी ही योग
  957. 53:50माया से प्रकट होता रहता हूं।
  958. 53:55यदा यदा ही धर्मस्य ग्ला भवती भारत
  959. 53:59अभ्यत्थान अधर्मस्य तदात्मानम सजाम्यम
  960. 54:05परित्राणाय साधु नाम विनाशाय च दुष्कताम
  961. 54:10धर्म संस्थापनार्थाय
  962. 54:12संभवामि युगे युगे
  963. 54:18हां पार्थ मैं प्रकट होता हूं मैं आता हूं
  964. 54:23हूं।
  965. 54:25जबजब धर्म की हानि होती है तबतब मैं आता
  966. 54:28हूं। जब जब अधर्म बढ़ता है तबतब मैं आता
  967. 54:31हूं। सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मैं आता
  968. 54:34हूं। दुष्टों का विनाश करने के लिए मैं
  969. 54:36आता हूं। धर्म की स्थापना के लिए मैं आता
  970. 54:39हूं और युग युग में जन्म लेता हूं।
  971. 54:44किंतु हे केशव धर्म की हानि होती ही क्यों
  972. 54:47है?
  973. 54:49धर्म की हानि इसलिए होती है पार्थ कि
  974. 54:52मनुष्य मोह के बंधन को नहीं तोड़ पाता कि
  975. 54:55वह अपने स्वयं से नाता तोड़कर समाज से
  976. 54:58नाता नहीं जोड़ पाता। हे पार्थ यदि ऐसा ना
  977. 55:02हुआ होता तो लाक्षाग्रह दुर्घटना ना हुई
  978. 55:05होती। द्रोपदी वस्त्र हरण ना हुआ होता और
  979. 55:08कौरव और पांडव सेनाएं यूं आज एक दूसरे के
  980. 55:11सामने नहीं खड़ी होती। तो क्या द्रोपदी
  981. 55:13वस्त्र हरण पर मुझे क्रोध नहीं आना चाहिए
  982. 55:16था केशव। यह निर्णय तो स्वयं तुम्हें लेना
  983. 55:19है पार्थ। किंतु द्रोपदी वस्त्र हरण केवल
  984. 55:22तुम्हारी व्यक्तिगत समस्या नहीं है। पार्थ
  985. 55:25जो समाज इंद्रप्रस्थ की पटरानी महाराज
  986. 55:28द्रुपद की पुत्री और पांडवों की पत्नी
  987. 55:30द्रौपदी के वस्त्र हरण पर चुप रह गया वो
  988. 55:33समाज भला किसी साधारण नारी के मान सम्मान
  989. 55:36की क्या रक्षा करेगा?
  990. 55:38द्रौपदी वस्त्र हरण एक सामाजिक समस्या है।
  991. 55:40पार्थ एक सामाजिक समस्या है और यह
  992. 55:43तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम उन शक्तियों
  993. 55:46को नष्ट करने के लिए युद्ध करो जो किसी
  994. 55:48द्रौपदी का वस्त्र हरण कर सकती हैं।
  995. 55:51यह शक्तियां समाज के शत्रु हैं पार्थ।
  996. 55:55और जो महापुरुष इस युद्ध में उन शक्तियों
  997. 55:58के पक्ष में हैं, उनके पक्ष में युद्ध
  998. 56:00करने आए हैं, उनसे युद्ध करने में भी
  999. 56:02संकोच ना करो।
  1000. 56:04अपने व्यक्तिगत क्रोध और व्यक्तिगत मोह के
  1001. 56:07बंधनों से मुक्त होकर लोक कल्याण के लिए
  1002. 56:10युद्ध करो। पार्थ। यही तुम्हारा परम
  1003. 56:12कर्तव्य है। मुझे देखो पार्थ।
  1004. 56:16इस समाज और उसके वर्णों को गुणों और
  1005. 56:19कर्मों के आधार पर स्वयं मैंने रच तो दिया
  1006. 56:23परंतु इस समाज रचना का फल मैंने कभी नहीं
  1007. 56:25चाहा।
  1008. 56:27इसीलिए कर्ता होते हुए भी मैं अकर्ता हूं।
  1009. 56:31और जो इस रहस्य को समझे पार्थ वह कभी अपने
  1010. 56:34कर्मों में लिप्त नहीं होगा।
  1011. 56:37नमाम कर्माण लिंपती नमे कर्म फले प्रहा
  1012. 56:42इति माम यो भी जानाति कर्म भी न सध्यते
  1013. 56:48मुझे कर्म फल की इच्छा नहीं है। जभी तो
  1014. 56:51कर्म मुझे दूषित नहीं कर पाते। तुम भी
  1015. 56:54निष्काम कर्म करो पार्थ और अपने कर्म पर
  1016. 56:57अपने निहित स्वार्थ की छाया ना पड़ने दो।
  1017. 57:02हे भारत
  1018. 57:05कर्म अकर्म और विकर्म के अंतर को समझो
  1019. 57:11और कर्म अकर्म और विकर्म में क्या अंतर है
  1020. 57:15किश
  1021. 57:17कर्म तो कर्म है ही किंतु जो कर्म कर्म फल
  1022. 57:21की आशा से मुक्त होकर किया जाए वह अकर्म
  1023. 57:24है और जो कर्म व्यक्ति और समाज के हित में
  1024. 57:28ना हो वह विकर्म निषिद्ध है। कर्म अकर्म
  1025. 57:33से श्रेष्ठ है। कर्ता अकर्ता से श्रेष्ठ
  1026. 57:36है। और हे पार्थ जो अकर्ता है जो कर्म फल
  1027. 57:41की इच्छा से मुक्त है वही ज्ञानी है। वही
  1028. 57:45बुद्धिमान है और वही कर्म योगी है।
  1029. 57:49उसके लिए उसका कर्म ही कर्म फल भी है। और
  1030. 57:53इसीलिए वह एक कर्म के पालन के उपरांत कर्म
  1031. 57:57फल की प्रतीक्षा में नहीं ठहरता।
  1032. 57:59बल्कि दूसरे कर्म की ओर बढ़ जाता है। उसके
  1033. 58:04ज्ञान की अग्नि, मोह, क्रोध, द्वेष,
  1034. 58:08आकांक्षा, लाभ, हानि, सुख और दुख के मैल
  1035. 58:12को जलाकर उसके कर्म को शुद्ध कर देती है।
  1036. 58:16और उसका कर्म अकर्म बन जाता है। और वह
  1037. 58:19कर्ता से अकर्ता
  1038. 58:22और यह अकर्ता यह ज्ञानी जीवन के आवश्यक
  1039. 58:26साधन जुटाने के अतिरिक्त अपने लिए और कुछ
  1040. 58:30नहीं करता।
  1041. 58:32उसके शेष कर्म समाज कल्याण के लिए होते
  1042. 58:35हैं।
  1043. 58:36यह मनुष्य कर्म करते हुए भी पाप से दूषित
  1044. 58:40नहीं होता।
  1045. 58:41उसका जीवन तो स्वयं ही समाज के लिए
  1046. 58:44कल्याणकारी हो जाता है।
  1047. 58:47हे निष्पाप अर्जुन ऐसे ही व्यक्ति का जीवन
  1048. 58:52यज्ञ है। तुम भी अपने जीवन को यज्ञ बना लो
  1049. 58:56और उसके हवन कुंड में अपने कर्म फल की
  1050. 58:59इच्छा मोह और क्रोध को आहुतियों की भांति
  1051. 59:03जला डालो।
  1052. 59:07और यज्ञ क्या है केशव?
  1053. 59:11अलग-अलग लोग यज्ञ की परिभाषा भी अलग-अलग
  1054. 59:15करते हैं। पार्थ कुछ लोगों के लिए यज्ञ
  1055. 59:18ब्रह्म का स्वरूप है। उनके लिए सब कुछ
  1056. 59:21ब्रह्म है। कुछ लोग देवताओं को प्रसन्न
  1057. 59:25करने के लिए यज्ञ करते हैं। तो उनके लिए
  1058. 59:28पूजा ही यज्ञ है। कुछ साधक आत्मा को
  1059. 59:32परमात्मा से मिलाने की साधना को यज्ञ कहते
  1060. 59:34हैं। इन्हीं यज्ञों की भांति इनमें दी
  1061. 59:38जाने वाली आहुतियां भी अलग-अलग प्रकार की
  1062. 59:41हैं। कोई धन की आहुति देता है तो कोई कर्म
  1063. 59:45की। किंतु वास्तव में यज्ञ चार प्रकार के
  1064. 59:49हैं। पहला द्रव्य यज्ञ है। इसमें अर्जित
  1065. 59:55द्रव्य और धन को समाज कल्याण के कार्यों
  1066. 59:58में लगाया जाता है। अर्थात यह लोक सेवा
  1067. 1:00:01यज्ञ है। दूसरा तपो यज्ञ है।
  1068. 1:00:05जब कोई अपने कर्म को अपनी तपस्या बना लेता
  1069. 1:00:09है तो उसका जीवन तपोयज्ञ बन जाता है। हे
  1070. 1:00:13पार्थ अपने धर्म का पालन भी यज्ञ है।
  1071. 1:00:18किंतु यह धर्म सांप्रदायिक नहीं सनातन है।
  1072. 1:00:22यह व्यक्ति और समाज दोनों ही के लिए
  1073. 1:00:24कल्याणकारी है।
  1074. 1:00:27तीसरा यज्ञ योग यज्ञ है। इसमें अष्टांग
  1075. 1:00:32योग की साधना की जाती है।
  1076. 1:00:35और इसमें लोग ध्यान और समाधि का मार्ग
  1077. 1:00:38अवलंब करते हैं।
  1078. 1:00:41प्राणों का प्राणों में हवन किया जाता है।
  1079. 1:00:45चौथा यज्ञ है ज्ञान यज्ञ।
  1080. 1:00:50यूं तो पार्थ चारों ही यज्ञ महत्वपूर्ण
  1081. 1:00:53है। परंतु श्रेष्ठतम है ज्ञान यज्ञ।
  1082. 1:00:58क्योंकि ज्ञान ही तो अच्छे और बुरे में
  1083. 1:01:00अंतर करता है और अपनी अग्नि में तपाकर
  1084. 1:01:03कर्म को शुद्ध करता है और शुभ बनाता है।
  1085. 1:01:09ज्ञान ही तो कर्म के उत्कर्ष का चरम बिंदु
  1086. 1:01:12है।
  1087. 1:01:14और ज्ञान ही तो तुम्हें मोह बंधनों से
  1088. 1:01:17मुक्त कराएगा। पार्थ
  1089. 1:01:19हे पार्थ
  1090. 1:01:21पाप के सागर को केवल
  1091. 1:01:24ज्ञान की नौका ही पार कर सकती है।
  1092. 1:01:29[संगीत]
  1093. 1:01:31कर्म करो तुम ज्ञान से
  1094. 1:01:36[संगीत]
  1095. 1:01:38श्रेष्ठ ज्ञान है धर्म
  1096. 1:01:44कर्म योग ही धर्म है
  1097. 1:01:51धर्म योग ही कर्म
  1098. 1:01:55अपचेस पापे
  1099. 1:01:57सर्वे पाप कृतम सर्वम ज्ञान प्लवे वृजनम
  1100. 1:02:03संतरेश
  1101. 1:02:05तो तुम भी ज्ञान की नौका में बैठकर पाप के
  1102. 1:02:08सागर को पार कर जाओ। यह समझ लो पार्थ कि
  1103. 1:02:12जैसे अग्नि सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है,
  1104. 1:02:15वैसे ही ज्ञान की अग्नि, कर्म फल की
  1105. 1:02:18इच्छा, फल की प्राप्ति ना होने पर आने
  1106. 1:02:21वाले क्रोध और उस क्रोध के सहारे आगे
  1107. 1:02:23बढ़ने वाले मोह को जलाकर भस्म कर देती है।
  1108. 1:02:27हे पार्थ इस मंत्र को सदैव याद रखो कि
  1109. 1:02:31संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाली
  1110. 1:02:34ना ही कोई वस्तु है और ना ही कोई तत्व।
  1111. 1:02:38ज्ञान ही सर्वोत्तम है। अज्ञस श्रद्धान नस
  1112. 1:02:43संशयात्मा विनश्यति नायम लोकोस्त न पर न
  1113. 1:02:48सुखम संशयात्म
  1114. 1:02:52जो अज्ञानी हैं जिनमें श्रद्धा भाव नहीं
  1115. 1:02:55है जो बात पर शंका करते हैं संशय युक्त
  1116. 1:02:59हैं वे तो नष्ट हो ही जाते हैं और उन्हें
  1117. 1:03:03ना इस लोक में सुख मिलता है और ना ही
  1118. 1:03:06परलोक में
  1119. 1:03:08इसलिए हे भारत संशय को त्यागो और तुम्हारे
  1120. 1:03:12भीतर जो मुनि बैठा है उसे जगाओ।
  1121. 1:03:16ज्ञान योगी बनो पार्थ ज्ञान योगी बनो और
  1122. 1:03:20समझ लो कि ज्ञान की चरम सीमा ही कर्म
  1123. 1:03:24सन्यास है। आप कर्म सन्यास और कर्म योग
  1124. 1:03:28दोनों ही की प्रशंसा कैसे कर सकते हैं
  1125. 1:03:30केशव? [हंसी]
  1126. 1:03:33ये दोनों एक दूसरे को काटते नहीं बंधु और
  1127. 1:03:36कल्याणकारी तो यह दोनों ही हैं। किंतु इन
  1128. 1:03:39दोनों में श्रेष्ठ है कर्म योग। वो क्यों?
  1129. 1:03:43और वो कैसे? जो द्वेष और आकांक्षा से ऊपर
  1130. 1:03:46उठकर कर्म करता है वह तो नित्य सन्यासी है
  1131. 1:03:50ही। और वह द्वंद्वों से रहित होकर
  1132. 1:03:53सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है।
  1133. 1:03:57इसलिए जो कर्म सन्यास को कर्म योग से अलग
  1134. 1:04:00समझता है वह तो मूर्ख है ही। ज्ञानी ऐसा
  1135. 1:04:05कभी नहीं समझते।
  1136. 1:04:08कर्म त्याग तो वास्तव में निहित स्वार्थ
  1137. 1:04:10के त्याग का नाम है पार्थ। इसलिए कर्म योग
  1138. 1:04:14के बिना कर्म सन्यास की प्राप्ति हो ही
  1139. 1:04:16नहीं सकती।
  1140. 1:04:19कर्म योगी को तत्वों का ज्ञान होता है और
  1141. 1:04:23उसका देखना ना देखना सुनना ना सुनना चखना
  1142. 1:04:27ना चखना जागना ना जागना लेना ना लेना
  1143. 1:04:31छोड़ना ना छोड़ना और उसका हर कर्म लोक
  1144. 1:04:35कल्याण के लिए होता है और इसीलिए वह पाप
  1145. 1:04:38से बिल्कुल वैसे ही अलग रहता है जैसे कमल
  1146. 1:04:42जल में रहकर भी जल से अलग रहता है।
  1147. 1:04:47ब्रह्मण्य धाय कर्माण संगम तक्त्वा करोति
  1148. 1:04:51यह लिपते नस पापेन पद्म पत्रम इवांम भसा
  1149. 1:04:58हे धनंजय
  1150. 1:05:00कर्म योगी कर्म फल को त्याग कर परम शक्ति
  1151. 1:05:04को प्राप्त होता है। और नौ द्वारों वाले
  1152. 1:05:07शरीर रूपी घर में सुखी रहता है।
  1153. 1:05:11शरीर में ये नौ द्वार कहां से आ गए?
  1154. 1:05:15महाराज वासुदेव कृष्ण दो आंखों, दो
  1155. 1:05:20कर्णों, दो नथनों, एक मुंह और उत्सर्जन
  1156. 1:05:24तथा प्रजनन की एक-एक इंद्रिय की बात कर
  1157. 1:05:28रहे हैं।
  1158. 1:05:30उनके कहने का तात्पर्य यह है कि केवल
  1159. 1:05:33निष्काम कर्म करने वाले ही का आत्मा उसके
  1160. 1:05:37शरीर में सुखी रह सकता है। क्योंकि आत्मा
  1161. 1:05:41मोह के धुंधले वातावरण में सुखी नहीं रह
  1162. 1:05:44सकता।
  1163. 1:05:46इस ओर तो कभी
  1164. 1:05:48ध्यान गया ही नहीं था संजय।
  1165. 1:05:50यदि मनुष्य ने यह सोचना छोड़ ना दिया होता
  1166. 1:05:52महाराज तो वासुदेव कृष्ण को बताने की
  1167. 1:05:56आवश्यकता ही क्यों होती?
  1168. 1:06:02नवद्वार वाले इस घर से अब आगे चलो संजय।
  1169. 1:06:13वासुदेव कह रहे हैं मनुष्य के भ्रमित होने
  1170. 1:06:16का कारण यह है पार्थ कि उसका अज्ञान उसके
  1171. 1:06:20ज्ञान को ढक देता है और जब आत्मज्ञान
  1172. 1:06:24अज्ञान को नष्ट कर देता है तो ज्ञान उस
  1173. 1:06:28परम तत्व को सूर्य की भांति प्रकाशित कर
  1174. 1:06:31देता है
  1175. 1:06:33और ज्ञानी इस नश्वर जीवन ही में परम सत्य
  1176. 1:06:36को प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें जन्म पर
  1177. 1:06:39जन्म नहीं लेना पड़ता।
  1178. 1:06:42वह इसी नश्वर जीवन में मोक्ष को प्राप्त
  1179. 1:06:45कर लेते हैं।
  1180. 1:06:47तो हे पार्थ यह नश्वर जीवन बहुत ही
  1181. 1:06:50महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसके उपरांत
  1182. 1:06:53तुम्हारा आत्मा तो अवश्य होगा किंतु तुम
  1183. 1:06:56नहीं होगे।
  1184. 1:06:59तो इस नश्वर जीवन काल को अर्थपूर्ण और
  1185. 1:07:02समाज के लिए कल्याणकारी बनाओ। पार्थ
  1186. 1:07:05ज्ञान प्रकाश है तो इस प्रकाश को प्राप्त
  1187. 1:07:09करो और यदि तुमने ऐसा कर लिया तो इन
  1188. 1:07:12भ्रमों में भटकने से बच जाओगे जिनमें आज
  1189. 1:07:15भटक रहे हो और यदि भटकने से बच जाओगे
  1190. 1:07:18पार्थ तो तुम्हें शांति मिलेगी
  1191. 1:07:22हे धनंजय
  1192. 1:07:24शांति का सीधा मार्ग मैं हूं
  1193. 1:07:29जो मुझे हर यज्ञ का लक्ष्य हर लोक का
  1194. 1:07:33स्वामी स्वामी और हर प्राणी का हितैषी
  1195. 1:07:35मानते हैं। वही शांति पाते हैं।
  1196. 1:07:40यदि तुम मुझे अपना हितषी समझते हो पार्थ
  1197. 1:07:43तो मेरा कहा मानो और युद्ध करो। क्योंकि
  1198. 1:07:46यह युद्ध किए बिना तुम्हें शांति नहीं मिल
  1199. 1:07:48सकती।
  1200. 1:07:49अपने धर्म से भागने का मार्ग शांति की
  1201. 1:07:52प्राप्ति का मार्ग नहीं है। पार्थ
  1202. 1:07:55यह युद्ध तुम्हारा धर्म है। तो अपने इस
  1203. 1:07:58धर्म का पालन करो पार्थ और उसके परिणाम के
  1204. 1:08:01विषय में ना सोचो। कौन मरेगा या कौन जिएगा
  1205. 1:08:04यह तुम्हारी समस्या नहीं है।
  1206. 1:08:08हे पांडव
  1207. 1:08:10लोग जिसे सन्यास कहते हैं उसे तुम योग
  1208. 1:08:13मानो और संशय, द्वेष और आकांक्षा से मुक्त
  1209. 1:08:17होकर युद्ध करो। क्योंकि इन्हें त्यागे
  1210. 1:08:20बिना तो कोई योगी हो ही नहीं सकता।
  1211. 1:08:26उरेत आत्मना आत्मानम न आत्मान अवसाद
  1212. 1:08:32आत्मवत्मनो
  1213. 1:08:33बंधु आत्मवर पुरातत्मनान
  1214. 1:08:38मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह अपना पतन
  1215. 1:08:41ना होने दे और स्वयं ही अपना उद्धार करें।
  1216. 1:08:45मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र भी है और अपना
  1217. 1:08:48शत्रु भी।
  1218. 1:08:50जिसने अपने अहम, अपने मन और अपनी
  1219. 1:08:53इंद्रियों को अपने वश में कर लिया हो, वह
  1220. 1:08:56स्वयं ही अपना मित्र है। और जो इनके वश
  1221. 1:08:59में हो गया पार्थ, वह स्वयं ही अपना शत्रु
  1222. 1:09:02है।
  1223. 1:09:04जो शीतकाल और ग्रीष्म काल सुख और दुख मान
  1224. 1:09:08और अपमान में शांत रहे और संतुलन रखे वो
  1225. 1:09:12जितेंद्रिय पुरुष सदैव परमात्मा में लीन
  1226. 1:09:16रहता है।
  1227. 1:09:18किंतु हे पार्थ बहुत खाने वाले या बिल्कुल
  1228. 1:09:22ही ना खाने वाले या अधिक सोने वाले या
  1229. 1:09:25बिल्कुल ही ना सोने वाले को यह योग सिद्ध
  1230. 1:09:28नहीं होता।
  1231. 1:09:30जीवन संतुलन का नाम है पार्थ और संतुलित
  1232. 1:09:33ढंग से जीने वाले मनुष्य का योग उसके
  1233. 1:09:36दुखों को हर लेता है। जैसे वायु रहित
  1234. 1:09:40स्थान पर दीपक की ज्योति निश्चल रहती है
  1235. 1:09:43वैसे ही मोह रहित योगी भी निश्चल [संगीत]
  1236. 1:09:46रहता है। चंचल मन को मनमानी ना करने दो
  1237. 1:09:50पार्थ। उसे रोको और उसे अपने आत्मा का
  1238. 1:09:53अधीन बनाओ। तुम्हारी उलझनों का यही उपचार
  1239. 1:09:57है।
  1240. 1:09:59मेरी ओर देखो पार्थ मेरी ओर देखो
  1241. 1:10:03जिसे हर दिशा और हर वस्तु में केवल मैं ही
  1242. 1:10:06दिखाई दूं वो तो कभी भटक ही नहीं सकता
  1243. 1:10:11जो मुझे नहीं भूलता पार्थ मैं भी उसे नहीं
  1244. 1:10:14भूलता वो तो सांसारिक जीवन व्यतीत करते
  1245. 1:10:17हुए भी संसार से अलग और मेरे भीतर रहता
  1246. 1:10:21है। हे अर्जुन जो योगी सबके सुखदख को अपना
  1247. 1:10:26सुखदख माने वही परम श्रेष्ठ है।
  1248. 1:10:30आत्मा उपम्यन सर्वत्र समम पश्यतिर्जुन
  1249. 1:10:34सुखम वा यदिवा दुखम सयोगी परमो मतः
  1250. 1:10:41किंतु योग मार्ग पे चलते-चलते मन भटक तो
  1251. 1:10:44सकता है। भटक क्यों नहीं सकता? अवश्य भटक
  1252. 1:10:48सकता है केशव।
  1253. 1:10:51तो फिर ब्रह्म की प्राप्ति के मार्ग में
  1254. 1:10:53इस भटकन का परिणाम क्या होता है? भटक जाने
  1255. 1:10:57वाला बादल की भांति छिन्न-भिन्न होकर कहीं
  1256. 1:11:00नष्ट तो नहीं हो जाता। केशव वो चाहे लोक
  1257. 1:11:03हो चाहे परलोक
  1258. 1:11:05कल्याणकारी शुभ कार्य करने वालों की
  1259. 1:11:07दुर्गति तो हो ही नहीं सकती। हे कुंती
  1260. 1:11:10पुत्र मुझ में मन लगाओ। मुझ पर निर्भर
  1261. 1:11:14होकर योग करो। तुम्हें मेरा संशय रहित
  1262. 1:11:17पूर्ण ज्ञान मिल जाएगा। हे धनंजय
  1263. 1:11:22सबसे बड़ा सत्य तो मैं ही हूं।
  1264. 1:11:26मैं ही वह धागा हूं जिसमें यह सारी
  1265. 1:11:30प्रकृति मणियों की भांति पिरोई हुई है। हे
  1266. 1:11:34कौते
  1267. 1:11:36जल में रस मैं हूं। सूर्य और चंद्रमा में
  1268. 1:11:40प्रकाश मैं हूं।
  1269. 1:11:43वेदों में ओमकार मैं हूं। आकाश में शब्द
  1270. 1:11:46भी मैं ही हूं।
  1271. 1:11:49मैं ही पृथ्वी में पवित्र सुगंध हूं। मैं
  1272. 1:11:53ही अग्नि में तेज हूं। प्राणियों में जीवन
  1273. 1:11:56शक्ति मैं हूं। तपस्वीयों का तप मैं हूं।
  1274. 1:12:01हे पार्थ
  1275. 1:12:03प्रारंभिक बीज मैं हूं।
  1276. 1:12:07बुद्धिमानों की बुद्धि मैं तेजस्वीियों का
  1277. 1:12:11तेज मैं।
  1278. 1:12:13बलवानों में काम रहित बल भी मैं ही हूं और
  1279. 1:12:16प्राणियों में धर्म के विरुद्ध न जाने
  1280. 1:12:19वाला काम भी मैं ही हूं।
  1281. 1:12:21मैं सब में हूं पार्थ किंतु सबसे अलग भी
  1282. 1:12:26हूं।
  1283. 1:12:28मैं अविनाशी हूं। मैं निर्गुण हूं।
  1284. 1:12:32हे पार्थ
  1285. 1:12:34मैं बीते हुए सारे कालों, इस बीतते हुए
  1286. 1:12:38आधुनिक काल और आने वाले सारे कालों के
  1287. 1:12:41सारे प्राणियों को जानता हूं। परंतु मुझे
  1288. 1:12:45कोई नहीं जानता।
  1289. 1:12:47मैं ही जगत का पिता भी हूं, माता भी और
  1290. 1:12:51पोषक भी।
  1291. 1:12:54मैं ही ऋग्वेद हूं और मैं ही सामवेद।
  1292. 1:12:58मैं ही स्वामी हूं और मैं ही शरण, मैं ही
  1293. 1:13:02सृजन हूं और मैं ही विलोपन।
  1294. 1:13:06मैं ही सबका आधार हूं पार्थ। मैं ही सब
  1295. 1:13:10कुछ हूं। सब कुछ
  1296. 1:13:14ग्रीष्म भी मैं और वर्षा भी मैं हूं।
  1297. 1:13:19और हे पार्थ मैं ही संसार का अविनाशी बीज
  1298. 1:13:24भी हूं।
  1299. 1:13:25मैं सबका अति प्रिय मित्र हूं किंतु सबके
  1300. 1:13:29लिए एक जैसा हूं। ना कोई मुझे प्रिय है और
  1301. 1:13:33ना ही अप्रिय।
  1302. 1:13:36परंतु जो मुझे श्रद्धा से पूजते हैं मित्र
  1303. 1:13:39वे मुझ में है और मैं उनमें
  1304. 1:13:43समोह सर्वभूते
  1305. 1:13:46नमे द्वेष न प्रिय ये भजंत तुम भक्त मते
  1306. 1:13:52ते चाप्यम
  1307. 1:14:02हे कृष्ण
  1308. 1:14:04आप परम ब्रह्म हैं। परम शोधक हैं। आप
  1309. 1:14:08शाश्वत हैं। दिव्य तत्वज्ञ हैं। आप ईश्वर
  1310. 1:14:12हैं। आप अजन्मा है।
  1311. 1:14:16हे गिरिधर केवल आप ही को आपका ज्ञान है।
  1312. 1:14:21तो हे योगेश्वर हे ज्ञान मूर्ति मैं आपको
  1313. 1:14:25जानू कैसे आपको पहचानू कैसे कृपया विस्तार
  1314. 1:14:29से मुझे बताइए कृपया विस्तार से मुझे
  1315. 1:14:32बताइए माधव
  1316. 1:14:35हे गुरु श्रेष्ठ
  1317. 1:14:39मेरे विस्तार का तो कोई अंत ही नहीं है।
  1318. 1:14:43फिर भी सुनो
  1319. 1:14:45मैं प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा
  1320. 1:14:48हूं।
  1321. 1:14:50अहम आत्मा गुणाेश सर्वभूताशस्थिता
  1322. 1:14:55अहम आदिश मध्यंच भूत नाम अंत एवच
  1323. 1:15:01हे गुकेश
  1324. 1:15:03मैं ही आरंभ भी हूं मध्य भी और अंतिम का
  1325. 1:15:07अंतिम छोर भी
  1326. 1:15:10मैं आदित्यों में विष्णु हूं मरुतों में
  1327. 1:15:13मरीच ज्योतियों में सूर्य और नक्षत्रों
  1328. 1:15:17में चंद्र हूं
  1329. 1:15:20वेद नाम सामवेदोस्म
  1330. 1:15:23दे नाम अस्म वासवा इंद्रिय नाम मनस्म
  1331. 1:15:28भूत नाम अस्म चेतना
  1332. 1:15:31मैं वेदों में सामवेद हूं देवों में इंद्र
  1333. 1:15:35हूं इंद्रियों में मन हूं और प्राणियों
  1334. 1:15:38में चेतना हूं मैं रुद्रों में शंकर हूं
  1335. 1:15:43यक्षों और राक्षसों में कुबेर हूं वसुओं
  1336. 1:15:46में अग्नि हूं और पर्वतों में सुमेरू हूं।
  1337. 1:15:50पुरोहितों में मैं बृहस्पति हूं।
  1338. 1:15:53सेनापतियों में कार्तिकेय और जलाशयों में
  1339. 1:15:57महासागर।
  1340. 1:15:59महर्षियों में मैं भृगु हूं। वाणी में
  1341. 1:16:02ओमकार।
  1342. 1:16:04यज्ञों में जय यज्ञ और अिगों में हिमालय
  1343. 1:16:08हूं। मैं वृक्षों में पीपल हूं। और देव
  1344. 1:16:12ऋषियों में नारद हूं।
  1345. 1:16:15मैं गंधर्वों में चित्ररथ हूं और सिद्धों
  1346. 1:16:18में कपिल मुनि।
  1347. 1:16:20हे महारथी
  1348. 1:16:22मैं अश्वों में अमृत से उत्पन्न होने वाला
  1349. 1:16:25उच्च श्रवा हूं। मैं गजों में ऐरावत हूं
  1350. 1:16:29और मनुष्यों में नरपति मैं शस्त्रों में
  1351. 1:16:32वज्र धेनुओं में कामधेनु जनकों में कामदेव
  1352. 1:16:37और नागों में शेषनाग हूं।
  1353. 1:16:40प्रह्लादस्म दैत्य नाम काल कलताम
  1354. 1:16:45मृग नाम च मृग्देंद्रोहम वते यश्च पक्षणाम
  1355. 1:16:51मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूं गणको में
  1356. 1:16:54काल हूं वनचरों में सिंह हूं और पक्षियों
  1357. 1:16:59में विष्णु वाहन गरुड़ हूं और हे धनुर्धर
  1358. 1:17:04मैं शस्त्र धारियों में राम हूं
  1359. 1:17:07अक्षरों में अकार हूं मैं कभी ना समाप्त
  1360. 1:17:11होने वाला समय हूं। मैं चहुमुखी सृष्टा
  1361. 1:17:14हूं पार्थ।
  1362. 1:17:17मैं ही मृत्यु हूं पार्थ। और मैं ही उन सब
  1363. 1:17:20का आरंभ हूं जो आने वाले कालों में जन्म
  1364. 1:17:23लेने वाले हैं। और अभी तक जिनके आरंभ का
  1365. 1:17:26आरंभ ही नहीं हुआ है।
  1366. 1:17:34मृत्यु सर्व हरसहम उद्भवस भविष्यता कीर्ति
  1367. 1:17:39श्री वाक्य नारी स्मृति मेधा धतमा
  1368. 1:17:45मैं स्त्रियों में कीर्ति श्रीवाक स्मृति
  1369. 1:17:49मेधा, धृति और क्षमा हूं। मैं ऋतुओं में
  1370. 1:17:53ऋतुराज हूं और तेजस्वीयों का तेज हूं। मैं
  1371. 1:17:58गुण हूं। मैं विजय हूं। मैं प्रयत्न हूं।
  1372. 1:18:03मैं यादवों में वासुदेव हूं और पांडवों
  1373. 1:18:06में अर्जुन।
  1374. 1:18:08मैं मुनियों में व्यास हूं और कवियों में
  1375. 1:18:10शुक्राचार्य।
  1376. 1:18:13यप सर्वभूत नाम बीजम तद अर्जुन न तद विना
  1377. 1:18:19यस्या मया भूतम चराचरम
  1378. 1:18:23मैं ही तो उत्पत्ति का बीज हूं पार्थ वो
  1379. 1:18:27चाहे चर हो चाहे अचर मेरे बिन तो हो ही
  1380. 1:18:31नहीं सकता
  1381. 1:18:33मैं प्राणों का प्राण और जीवन का जीव हूं
  1382. 1:18:42हे कमल नैन मेरी आंखें खुल चुकी है।
  1383. 1:18:46दुविधा और आशंका के बादल छट चुके हैं।
  1384. 1:18:50आपने जो कहा वही सत्य है और उसके अतिरिक्त
  1385. 1:18:54कोई सत्य नहीं।
  1386. 1:18:56किंतु हे परमेश्वर
  1387. 1:18:59मैं आपके ईश्वरीय रूप के दर्शन करना चाहता
  1388. 1:19:01हूं। हे निष्पाप अर्जुन
  1389. 1:19:05अपनी इन आंखों से तुम मेरा वो स्वरूप नहीं
  1390. 1:19:07देख सकते।
  1391. 1:19:10इसके लिए तुम्हें दिव्य दृष्टि की
  1392. 1:19:12आवश्यकता होगी।
  1393. 1:19:17नत माम शक्य से दृष्टुम अने स्वचक्षुष
  1394. 1:19:22दिव्यम ददामते चक्षु पश्यमे योगमेश्वरम
  1395. 1:19:30[संगीत]
  1396. 1:19:37[संगीत]
  1397. 1:19:44[संगीत]
  1398. 1:19:52[संगीत]
  1399. 1:19:59[संगीत]
  1400. 1:19:59ओम
  1401. 1:20:10ओम
  1402. 1:20:16[संगीत]
  1403. 1:20:24[संगीत]
  1404. 1:20:31ओम
  1405. 1:20:33[संगीत]
  1406. 1:20:39[संगीत]
  1407. 1:20:41ओम
  1408. 1:20:48[संगीत]
  1409. 1:20:54[संगीत]
  1410. 1:20:59[संगीत]
  1411. 1:21:05[संगीत]
  1412. 1:21:12ओम
  1413. 1:21:17[संगीत]
  1414. 1:21:22ओम
  1415. 1:21:29[संगीत]
  1416. 1:21:41[संगीत]
  1417. 1:21:48[संगीत]
  1418. 1:21:57[संगीत]
  1419. 1:22:06[संगीत]
  1420. 1:22:12[संगीत]
  1421. 1:22:19[संगीत]
  1422. 1:22:28[संगीत]
  1423. 1:22:37[संगीत]
  1424. 1:22:46[संगीत]
  1425. 1:22:56ओम
  1426. 1:22:58[संगीत]
  1427. 1:23:05[संगीत]
  1428. 1:23:06ओम
  1429. 1:23:16[संगीत]
  1430. 1:23:17ओम
  1431. 1:23:24[संगीत]
  1432. 1:23:30[संगीत]
  1433. 1:23:38[संगीत]
  1434. 1:23:45[संगीत]
  1435. 1:23:51अदृष्ट पूर्वम ऋषितोसमी [संगीत] दृष्ट्वा
  1436. 1:23:56भये प्रथितम मनो मेंदेव
  1437. 1:24:01में दर्श देव रूपम
  1438. 1:24:04प्रसिद्ध देवेश जगन निवास
  1439. 1:24:08[संगीत]
  1440. 1:24:12हे नाथ
  1441. 1:24:15पहले ना देखे हुए आपके इस अद्भुत विराट
  1442. 1:24:18रूप के दर्शन से मैं हर्षित हो रहा हूं।
  1443. 1:24:23किंतु मेरा चित्त भय से व्याकुल हो रहा
  1444. 1:24:26है। इसलिए हे देवेश
  1445. 1:24:30हे जगन निवास मुझ पर प्रसन्न होकर अपने
  1446. 1:24:35उसी दिव्य मनोज रूप को फिर से प्रकट
  1447. 1:24:38कीजिए।
  1448. 1:24:44[संगीत]
  1449. 1:24:52[संगीत]
  1450. 1:25:03ये ये
  1451. 1:25:05कैसा रूप है संजय?
  1452. 1:25:10मैं आपके लिए उनके विराट रूप का वर्णन
  1453. 1:25:13नहीं कर सकता महाराज।
  1454. 1:25:17यह रूप तो केवल दिव्य दृष्टि वालों के लिए
  1455. 1:25:20है।
  1456. 1:25:21हे राजन
  1457. 1:25:23यदि आपने महर्षि व्यास से दिव्य दृष्टि ले
  1458. 1:25:27ली होती तो यह विराट रूप देखकर आप धन्य हो
  1459. 1:25:30गए होते। मुझे मेरे दुर्भाग्य के आंकड़े
  1460. 1:25:34बताने की आवश्यकता नहीं है। संजय
  1461. 1:25:37यह बताओ कि वहां क्या हो रहा है?
  1462. 1:25:41जो आज्ञा महाराज
  1463. 1:25:53[संगीत]
  1464. 1:26:00[संगीत]
  1465. 1:26:06[संगीत]
  1466. 1:26:15[संगीत]
  1467. 1:26:21[संगीत]
  1468. 1:26:31[संगीत]
  1469. 1:27:00क्षमा प्रभु
  1470. 1:27:02क्षमा
  1471. 1:27:06हे विश्व मूर्ति
  1472. 1:27:09हे अनंत
  1473. 1:27:10हे नारायण हे दयासागर
  1474. 1:27:14जैसे मित्रमित्र को पिता पुत्र को और
  1475. 1:27:19भगवान अपने भक्त को क्षमा करते हैं। प्रभु
  1476. 1:27:22वैसे ही आप मुझे क्षमा कीजिए प्रभु आप
  1477. 1:27:26मुझे क्षमा कीजिए।
  1478. 1:27:32हे कुंती नंदन
  1479. 1:27:34मित्र और मित्र पिता और पुत्र भगवान और
  1480. 1:27:39भक्त के बीच क्षमा का तो स्थान ही नहीं
  1481. 1:27:43है।
  1482. 1:27:45इन संबंधों का आधार है स्नेह, श्रद्धा
  1483. 1:27:50और भक्ति।
  1484. 1:27:53मैया वेश मनोमा
  1485. 1:27:56नित्य युक्त उपासते
  1486. 1:27:59श्रद्धया परता
  1487. 1:28:02ते युक्त तमाम मता
  1488. 1:28:06जो मेरा भक्त है जो मुझ में ध्यान भी
  1489. 1:28:10लगाता है और मन भी जो सदैव मुझे ही में
  1490. 1:28:15लीन रहता है और जो पूरी श्रद्धा के साथ
  1491. 1:28:19मेरी उपासना करता है वही उत्तम योगी है।
  1492. 1:28:31इसलिए हे पार्थ
  1493. 1:28:34मेरी भक्ति श्रेष्ठ है।
  1494. 1:28:37जो भक्त हैं वे ही संसार में नहीं उलझते।
  1495. 1:28:42क्योंकि हे पार्थ
  1496. 1:28:45उध्व मूलम अध शाखम अश्वत्थम प्राहुरव्ययम
  1497. 1:28:51छंदसी यस परानी यस्तम वेद सवेद विद
  1498. 1:28:58हे पार्थ
  1499. 1:29:00यह संसार तो मानो पीपल का वृक्ष है
  1500. 1:29:04जिसकी जड़े ऊपर की ओर हैं और शाखाएं नीचे
  1501. 1:29:08की ओर
  1502. 1:29:10वेद इसी वृक्ष के पत्ते हैं। जो यह जानता
  1503. 1:29:14है वो यह समझो पार्थ कि वेदों का अर्थ भी
  1504. 1:29:18जानता है।
  1505. 1:29:21इस वृक्ष की शाखाएं ऊपर नीचे सारी ओर फैली
  1506. 1:29:26हुई हैं।
  1507. 1:29:28जिनका परिपोषण किया है प्रकृति के तीनों
  1508. 1:29:32गुणों ने।
  1509. 1:29:34सतोगुण,
  1510. 1:29:36रजोगुण और तमोगुण।
  1511. 1:29:40इसकी जड़े मानव समाज में बहुत गहराई तक
  1512. 1:29:43फैली हुई हैं।
  1513. 1:29:46इस वृक्ष के वास्तविक रूप की अनुभूति इस
  1514. 1:29:50संसार में संभव नहीं पार्थ क्योंकि यह तो
  1515. 1:29:53कोई देख ही नहीं सकता कि इस वृक्ष का आदि
  1516. 1:29:57अंत और आधार क्या और कहां है।
  1517. 1:30:02किंतु मनुष्य इस संसार रूपी वृक्ष को
  1518. 1:30:06वैराग्य की कुल्हाड़ी से काटकर उस परम पद
  1519. 1:30:10को प्राप्त कर सकता है जहां पहुंचकर उसे
  1520. 1:30:14फिर लौटना नहीं पड़ता।
  1521. 1:30:18और हे पार्थ
  1522. 1:30:20वैराग्य निहित स्वार्थ के त्याग का नाम
  1523. 1:30:23है।
  1524. 1:30:25इसलिए सोचना हो तो केवल मेरे विषय में
  1525. 1:30:29सोचो।
  1526. 1:30:30पूजना हो तो केवल मुझे पूजो।
  1527. 1:30:34अपने आप को मुझे अर्पण कर दो। सर्वश्रेष्ठ
  1528. 1:30:37धनुर्धर।
  1529. 1:30:39मेरी शरण में आ जाओ।
  1530. 1:30:42मैं तुम्हें पाप रहित कर दूंगा।
  1531. 1:30:46मन मना भव मद भक्तो मद्या जी माम नमरु
  1532. 1:30:51मामे वैश्य सत्यम ते प्रति जाने प्रियोस
  1533. 1:30:56सर्व धर्मान परित्यज मामेकम शरणमज
  1534. 1:31:02अहम त्वा सर्व पापेभ्यो
  1535. 1:31:05मोक्ष्यामि
  1536. 1:31:06माशुच
  1537. 1:31:09मुझ में मन लगाओ पार्थ मेरे भक्त हो जाओ
  1538. 1:31:14और मुझे मुझे नमस्कार करो।
  1539. 1:31:18यदि तुम ऐसा करोगे तो मैं प्रतिज्ञा करता
  1540. 1:31:21हूं कि तुम संपूर्ण रूप से मुझे प्राप्त
  1541. 1:31:24कर लोगे।
  1542. 1:31:28सारे धर्मों को त्यागो पार्थ और मेरी शरण
  1543. 1:31:32में आ जाओ।
  1544. 1:31:39मैं तुम्हें सारे पापों से मुक्त कर
  1545. 1:31:41दूंगा।
  1546. 1:31:43इसलिए शोक ना करो धनंजय शोक ना करो
  1547. 1:31:48हे प्रिय हे भक्त
  1548. 1:31:52मैं ही कर्म योग भक्ति और ज्ञान का चरम
  1549. 1:31:56बिंदु और परम लक्ष्य हूं।
  1550. 1:32:00इसलिए योगी की भांति निष्काम कर्म करो।
  1551. 1:32:03चिंता ना करो पार्थ। चिंता ना करो। मुझ
  1552. 1:32:07में विश्वास रखो।
  1553. 1:32:11हे महाबाहु
  1554. 1:32:14अपना गांडीव उठाओ और युद्ध करो।
  1555. 1:32:25[संगीत]
  1556. 1:32:30[संगीत]
  1557. 1:32:39[संगीत]
  1558. 1:32:48[संगीत]
  1559. 1:32:56महाभारत
  1560. 1:32:59महाभारत
  1561. 1:33:01महाभारत
  1562. 1:33:07हो
  1563. 1:33:08महाभारत

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This page contains the full transcript of श्री कृष्ण लीला | श्रीमद भगवद गीता सार | मोक्षदा एकादशी | गीता जयंती विशेष | Mahabharat | Pen Bhakti by Pen Bhakti, generated from the public captions YouTube serves with the video. The transcript has 9,885 words across 1,563 segments, with the original timestamps preserved so you can click any line to jump to that moment in the embedded player.

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