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| Krishna Motivational Speech | #Best Krishna Motivational Speech #krishna vani #krishna vaani — Transcript

by SHIV BHAKT OFFICIAL · 2,753 words · 420 segments · language en · Watch on YouTube

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  1. 0:00वैज्ञानिक मूवी 3 धीर व के सारे संबंधों
  2. 0:06का आधार है अपेक्षा अधिक ऐसा हो
  3. 0:10कि मेरा जीवन सुख सुविधा से भर दे पत्नी
  4. 0:14के तीनों सदैव मेरे प्रति समर्पित रहे
  5. 0:18संतान कैसी हो जो मेरी सेवा करें मेरा देश
  6. 0:22पानी में
  7. 0:25कि मनुष्य
  8. 0:29कि मनुष्य उसी को प्रेम भी कर पाता है जो
  9. 0:32उसकी अपेक्षा पूर्ण करता है
  10. 0:35है और परीक्षा की तो नियति है भंग होना
  11. 0:38कहते हैं
  12. 0:41है क्योंकि अपेक्षा मनुष्यकें मस्तिष्क
  13. 0:44में जान लेते कोई अन्य व्यक्ति उसकी
  14. 0:46अपेक्षाओं के बारे में जान ही नहीं पाते
  15. 0:50पूर्ण करने की प्रमाणिकता इच्छा हो तब भी
  16. 0:53कोई मनुष्य किसी की अपेक्षाओं को खून नहीं
  17. 0:56कर पाता है
  18. 0:58हैं और वहां से जन्म लेता है संघर्ष सारे
  19. 1:05संबंध
  20. 1:06[संगीत]
  21. 1:08इस संघर्ष में परिवर्तित हो जाते हैं
  22. 1:12यहां पर मनुष्य अपेक्षा को संबंधों का
  23. 1:16आधार ना बनाएं और स्वीकार करें केवल
  24. 1:20संबंधों का आधार
  25. 1:23है तो क्या यह जीवन सोएं में सुख-शांति से
  26. 1:28नहीं भर जाएगा तो
  27. 1:32मैं स्वयं विचार कीजिएगा और
  28. 1:35कि अ
  29. 1:37थे मीडिया हद तक
  30. 1:42[संगीत]
  31. 1:43शो मोर
  32. 1:45उस समय क्या आराम ही मनुष्य को एक प्रश्न
  33. 1:48तथा पीड़ा देता है कि वह अपने संबंधों में
  34. 1:53अधिकतम सुख और कम से कम दुख इस प्रकार
  35. 1:57प्राप्त कर सकता है
  36. 1:59[संगीत]
  37. 2:02कि क्या आपके सारे संबंध होने आपको
  38. 2:04संपूर्ण संतोष दिया है
  39. 2:08अपने पिता की 6a
  40. 2:12कि हमारा जीवन संबंधों पर आधारित हमारी
  41. 2:16सुरक्षा संबंधों पर आधारित किसी कारण
  42. 2:20हमारे जीवन के सारे सुखों का आधार भी
  43. 2:22संबंधित किंतु फिर भी हमें संबंधों में ही
  44. 2:26अधिकतर युवतियों प्राप्त होते सदा ही
  45. 2:30संघर्ष भी संबंधों से ही उत्पन्न क्यों हो
  46. 2:33जाते हैं
  47. 2:34थे तभी विचार किया
  48. 2:36[संगीत]
  49. 2:37कि जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के
  50. 2:40विचार अथवा कार्य को स्वीकार नहीं करता
  51. 2:42उसमें परिवर्तन करने का प्रयत्न करता है
  52. 2:46है तो संघर्ष चंडिका अर्थात जितना अधिक और
  53. 2:50स्वीकार उतना ही अधिकतर घर आ
  54. 2:53के पास जितना अधिक प्रकार उतना ही अधिक
  55. 2:56चुस्त
  56. 2:57को क्या यह वास्तविकता नहीं
  57. 3:01कि यदि मनुष्य स्वयं अपनी अपेक्षाओं पर
  58. 3:03अंकुश अब अपने विचारों को पर किसी अन्य
  59. 3:07व्यक्ति में परिवर्तन करने का प्रयत्न
  60. 3:09मिलाकर स्वयं अपने भीतर परिवर्तन करने का
  61. 3:12प्रयास करें तो क्या संबंधों में संतोष
  62. 3:17प्राप्त करना कितना कठिन अर्थात यह
  63. 3:22स्वीकार ही संबंध का वास्तविक अर्थ नहीं
  64. 3:26है
  65. 3:28मैं स्वयं विचार कीजिए
  66. 3:31ए बुलेट
  67. 3:33[संगीत]
  68. 3:38कर दो
  69. 3:44कि जब किसी व्यक्ति को किसी घटना में
  70. 3:47अन्याय का अनुभव होता है तो वह घटना उसके
  71. 3:50अंतर को झकझोर देती समस्त जगत उसे अपना
  72. 3:55शत्रु प्रतीत होता है अन्याय लगने वाली
  73. 4:00घटना जितनी बड़ी होती है मनुष्य का हृदय
  74. 4:03भी उतना ही अधिक विरोध करता है
  75. 4:09कि उस घटना के उत्तर में
  76. 4:11कि वह न्याय मांगता है
  77. 4:15यहां पर योग्य भी वास्तव में समाज में
  78. 4:18किसी भी प्रकार का न्याय व्यक्ति की आस्था
  79. 4:22और विश्वास का नाश है
  80. 4:26है किंतु यह न्याय क्या है न्याय का अर्थ
  81. 4:33क्या है
  82. 4:34[संगीत]
  83. 4:37कि अन्याय करने वाले को अपने कार्य पर
  84. 4:39पश्चाताप और न्याय भुगतने वाले के मन में
  85. 4:43आ
  86. 4:43को फिर से विश्वास जगह समाज के प्रति इतना
  87. 4:48ही अर्थ है न्याय का किंतु जिसके हृदय में
  88. 4:51धर्म नहीं होता न्याय को छोड़कर बैरल
  89. 4:56प्रति सोच को अपनाता है इंसाफ के बदले
  90. 5:00प्रति हिंसा की भावना लेकर चलता है
  91. 5:05आप स्वयं होंगे हुई पीड़ा से कहीं अधिक
  92. 5:08पीड़ा देने का प्रयत्न करता है और इस
  93. 5:12मार्ग पर चलते अन्याय को भुगतने वाला
  94. 5:14स्वयं
  95. 5:16कि अन्याय करने लगता है
  96. 5:19कि शीघ्र ही वह अपराधी बन जाता है अर्थात
  97. 5:23न्याय और प्रतिशोध के बीच बहुत कम अंतर
  98. 5:26होता है और इसी अंतर का नाम है गैर
  99. 5:32कि क्या यह सत्य नहीं है
  100. 5:35मैं स्वयं विचार कीजिए
  101. 5:38कल सुबह वह व्यक्ति जब निकट आते हैं तो एक
  102. 5:44दूसरे के लिए सीमा ने और मर्यादाएं
  103. 5:47निर्मित करने का प्रयत्न अवश्य करते हैं
  104. 5:51कि हम यदि तारे संबंधों पर विचार करें तो
  105. 5:53देखेंगे इन सारी संबंधों का आधार
  106. 5:58तो यही सीमाएं हैं जो हम दूसरों के लिए
  107. 6:01निर्मित करते और यदि अनजाने में भी कोई
  108. 6:04अन्य व्यक्ति सीमाओं को तोड़ता है तो उसी
  109. 6:07क्षण
  110. 6:08कि हमारा हृदय क्रोध से भर जाता है इन
  111. 6:13सीमाओं का वास्तविक रूप हमने कभी विचार
  112. 6:16किया दिमाग के द्वारा हम दूसरे व्यक्ति को
  113. 6:21निर्णय करने की अनुमति नहीं दे अपना
  114. 6:24निर्णय स्पेसिफिक अर्थात किसी की
  115. 6:29स्वतंत्रता झाल स्वीकार करते हैं
  116. 6:33कि भगत व तंत्रता का आविष्कार किया जाता
  117. 6:36है तो उसका हृदय दुख से भर जाता है और जब
  118. 6:40वह मां को तोड़ता तो हमारा हृदय रोग से भर
  119. 6:45जाता है
  120. 6:46मैं जैसा नहीं होता है
  121. 6:49कर दो
  122. 6:53है पर यदि एक दूसरे की स्वतंत्रता का
  123. 6:55सम्मान किया जाए तो किसी मर्यादाओं या
  124. 6:59सीमाओं की आवश्यकता ही नहीं होते अर्थात
  125. 7:03जिस प्रकार स्वीकार किसी संबंध का देश है
  126. 7:07या वैसे ही स्वतंत्रता किसी संबंधी की
  127. 7:11आत्मा न
  128. 7:14मैं स्वयं विचार कि अ
  129. 7:25कि पिता सदा ही अपनी संतान के सुख की
  130. 7:27कामना करते उनके भविष्य की चिंता करते
  131. 7:32रहते हैं
  132. 7:34यदि किसी कारणवश सदा ही अपने संतानों के
  133. 7:37भविष्य का मार्ग गैस व्यवस्थित करने का
  134. 7:40प्रयत्न करते रहते इस मार्ग पर स्थित
  135. 7:46आश्रम चला दो
  136. 7:48है जितना कि कंकड़ पत्थर को स्वयं देखा है
  137. 7:52को मार की छाया मां की धूप श्याम जाना है
  138. 7:55उसी मार्ग पर उसका पुत्र भी चले यहीं खड़ी
  139. 7:59रहती है हर पिता की
  140. 8:01के लिए संदेश उत्तम भावना है गीत
  141. 8:05[प्रशंसा]
  142. 8:06और पिंटू
  143. 8:08में तीन प्रश्नों के ऊपर रिचार्ज करना है
  144. 8:12कि हम भूल ही जाते हैं
  145. 8:14कौन-कौन से तांत्रिक प्रथम क्रश क्या समय
  146. 8:19के साथ प्रत्येक मार्ग बदल नहीं जाते समय
  147. 8:22सदा ही नई चुनौतियों को लेकर नहीं आता तो
  148. 8:26फिर बीते हुए समय के अनुरूप भव्य नई पीढ़ी
  149. 8:30को किस प्रकार लाभ की सकते हैं दूसरा
  150. 8:32प्रश्न क्या प्रत्येक संतान अपने
  151. 8:35माता-पिता की छवि होता संतानों को संस्कार
  152. 8:40तो व माता-पिता देते हैं किंतु भीतर
  153. 8:43क्षमता हितों की क्षमता तो इश्वर देते हैं
  154. 8:48मैं तुझे इस मार्ग पर पिता को सफलता मिली
  155. 8:51है विश्वास है कि इसी मार्ग पर उसकी
  156. 8:55संतानों को भी सफलता और सुख प्राप्त होगा
  157. 8:59है तीसरा प्रश्न क्या जीवन के संघर्ष और
  158. 9:03चुनौतियां लाभकारी नहीं होती क्या
  159. 9:06प्रतिक्रया प्रश्न के कई उत्तर का द्वार
  160. 9:09नहीं खुलता तो फिर संतानों को नए-नए
  161. 9:13प्रश्नों संघर्ष और चुनोतियो सिध्दू रखना
  162. 9:17उनके लिए लाभ करना कहलाएगा या हानि
  163. 9:22पहुंचाना तथा बात जिस प्रकार संतान के
  164. 9:26भविष्य का निर्माण करने के बदले उसके
  165. 9:28चरित्र का निर्माण करना श्रेष्ठ है वैसे
  166. 9:32संतानों के जीवन का मार्ग निश्चित करने के
  167. 9:35बदले में
  168. 9:36कि उन्हें नहीं संघर्षों के साथ जुड़ने के
  169. 9:40लिए मनोबल
  170. 9:41कि वह ज्ञान देना अधिक लाभदायक नहीं होगा
  171. 9:45अ
  172. 9:47मैं स्वयं विचार कीजिए
  173. 9:50की पूजा विशेष व्यक्ति जीवन में ऐसा
  174. 9:53प्रसंग अवश्य आता है कि सत्य कहने का विषय
  175. 9:56होता है ह्रदय ने * मुख पे सत्य निकल हित
  176. 10:03और कोई भाई मन को घेर लेता है
  177. 10:06कि किसी घटना अथवा प्रसंग के बारे में बात
  178. 10:09कर रहा या फिर तुरंत कोई भूल हो जाए उसके
  179. 10:12बारे में कुछ बोलना क्या यह सकते हैं कि
  180. 10:17नहीं यह तो केवल तथ्य अर्थात जैसा हुआ था
  181. 10:23वैसा केवल बोल दे रहा सामान्य सी बात
  182. 10:28है किंतु कभी-कभी यूज तथ्य को बोलते हुए
  183. 10:31भी भय लगता है कदाचित किसी दूसरे की
  184. 10:36भावनाओं का विचार आता है मत दूसरे को दुख
  185. 10:40होगा यह भय भी शब्दों को रोकता है
  186. 10:44है तो यह सकते क्या है क्या हमने कभी
  187. 10:48विचार किया है
  188. 10:51कि जब भय रहते हुए भी कोई तथ्य बोलता है
  189. 10:56हाउ टो सकते गहराता वास्तव में तथ्य कुछ
  190. 11:02और नहीं केवल निर्भयता का दूसरा नाम है
  191. 11:06और अनिल भाई होने का कोई समय नहीं होता
  192. 11:09क्योंकि निर्भयता आत्मा का स्वभाव से
  193. 11:14अर्थात प्रत्येक क्षण सत्य बोलने का ऑप्शन
  194. 11:19नहीं होता है
  195. 11:21लुट
  196. 11:26लुट स्वयं विचार कीजिए कि
  197. 11:29कि जब भी किसी की आशा और उत्साह भंग होती
  198. 11:32है तो उसका हृदय स्त्रोत से भर जाता है
  199. 11:36जिस व्यक्ति को अपराधी समझता है उसे दंड
  200. 11:40देने का प्रयत्न करता है
  201. 11:42इस पर क्या हमारी इच्छा या आशा का भंग
  202. 11:46होना क्या सदा ही किसी का अपराध होता है
  203. 11:50इच्छाओं के अपूर्ण रहने की तो कई कारण हो
  204. 11:53सकते हैं कुछ तो संजू के कारण अधूरी रह
  205. 11:57जाती हैं और कुछ नियति के कारण और कभी-कभी
  206. 12:00इच्छाओं का स्वरूप ही ऐसा होता है कि वह
  207. 12:04पूर्ण नहीं हो पाते हैं
  208. 12:06कि बिना परिस्थिति पर विचार किए किसी को
  209. 12:09अपराधी मान लेना न्याय नहीं
  210. 12:12का प्रतिशोध न्याय का आधार तो दया करुणा
  211. 12:18का प्रतिशोध का आधार है
  212. 12:21कि फिरोज भंडार
  213. 12:24है अर्थात हृदय में करुणा धारण किए बिना
  214. 12:28किसी के अपराध के विषय में विचार करना
  215. 12:30किसी को दंड देना कि आपने आप नहीं अन्याय
  216. 12:34नहीं
  217. 12:36मैं स्वयं विचार कीजिए
  218. 12:38आज दिनांक को
  219. 12:49एक तस्वीर और पूर्व हाथों के आधार पर हम
  220. 12:52भविष्य के सुख-दुख की कल्पना करते थे
  221. 12:55भविष्य के दुख का कारण दूर करने के लिए हम
  222. 12:59आज योजना बनाते हैं
  223. 13:03और पिंटू कल की संकट को आज निर्माण करने
  224. 13:08से ए
  225. 13:09है अबे लाभ मिलता है या हानि पहुंचती है
  226. 13:13यह प्रश्न हम कभी नहीं करती तथ्य तो यह है
  227. 13:20कि संकट और उसका निवारण साथ जानते हैं
  228. 13:25एक व्यक्ति के लिए थीं और सृष्टि के लिए
  229. 13:29नहीं आप अपने भूतकाल का स्वर्ण चीजें
  230. 13:33इतिहास को देखते आप तुरंत यह जान पाएंगे
  231. 13:37कि जब जब संकट आता है तब तक उसका निवारण
  232. 13:41करने वाली शक्ति भी जन्म देगी यह तो जगह
  233. 13:46का चलन है उस पर संकट ही शक्ति क्वेश्चन
  234. 13:51का कारण है
  235. 13:52कि प्रत्येक व्यक्ति जब संकट से निकलता है
  236. 13:56तो एक पल आगे बड़ा होता है अधिक समझता
  237. 14:02आत्मविश्वास से अधिक भरा होता है ना केवल
  238. 14:04अपने लिए अपितु विश्व के लिए भी यही सत्य
  239. 14:10नहीं वास्तव में संकट का जन्म है एक ऑप्शन
  240. 14:16अध
  241. 14:17मैं अपने आप को बदलने का अपने विचारों को
  242. 14:21ऊंचाई पर करने का आदत अपनी आत्मा को बलवान
  243. 14:25और ज्ञान मंदिर बनाने का
  244. 14:28युकी
  245. 14:30कि वे कर पाता है उसे कोई संकट नहीं होता
  246. 14:33किंतु जो यह नहीं कर पाता वह तो स्वयं एक
  247. 14:38संघर्ष है विश्व के लिए अ
  248. 14:40यह विचार पीछे से
  249. 14:46कि वीरवार परंपरा में धर्म बचता है और
  250. 14:53परंपराएं ही धर्म को संभालने का कार्य
  251. 14:55करती हैं यह सत्य पर क्या केवल परंपरा ही
  252. 15:00धर्म है
  253. 15:02यह विचार कीजिए
  254. 15:04कर दो
  255. 15:06यह तथ्य तो यह है कि जिस प्रकार पाषाण
  256. 15:09शिल्प होता है उसी प्रकार परंपरा में धर्म
  257. 15:13होता है इस पत्थर मे सिर्फ है यह पत्थर
  258. 15:18सिर्फ नहीं सिर्फ उजागर करने के लिए उसे
  259. 15:22तोड़ना पड़ता है अनावश्यक विचारों को दूर
  260. 15:26करना पड़ता है ठीक उसी प्रकार परंपराओं
  261. 15:30में धर्म ढूंढना पड़ता है
  262. 15:34कि जिस प्रकार इंद्र पूजा की परंपरा को
  263. 15:37तोड़कर गोवर्धन पूजा का धर्म ढूंढा जाता
  264. 15:41तो यादवों को उनकी मुक्ति का मार्ग नहीं
  265. 15:44मिल पाता अर्थात परंपरा को पूर्णता छोड़
  266. 15:49देने वाला
  267. 15:50के निधन से वंचित रह जाता है
  268. 15:53की परंपरा का अनुसरण करने वाला भी धर्म को
  269. 15:58प्राप्त नहीं कर पाता है
  270. 16:02वो कहते हैं हंस के पास नीर-क्षीर विवेक
  271. 16:05होता है दूध में मिले पानी को छोड़कर केवल
  272. 16:09दूध ही ग्रहण करता है तो क्या सच्चा धन
  273. 16:13प्राप्त करने के लिए हृदय में ज्ञान से
  274. 16:16जन्मा विवेक आवश्यक है
  275. 16:19है और ऐसे विवेक के बिना जूते धर्म मान भी
  276. 16:23लिया जाए कि वास्तव में धर्म ना भी हो
  277. 16:28कि ऐसा भी तो हो सकता है स्वयं विचार
  278. 16:32कीजिएगा है
  279. 16:42झाल धूम
  280. 16:45लुट
  281. 16:46लुट
  282. 16:54लुट
  283. 16:56इस वीडियो में
  284. 17:01कि अभिषेक के आधार पर सब आज का निर्णय
  285. 17:04लेना चाहते हैं
  286. 17:06कि भविष्य में सुख मिले भविष्य सुरक्षित
  287. 17:10हो ऐसे निर्णय आज लेने का प्रयत्न रहता है
  288. 17:13सबका
  289. 17:15कि आप अपने जीवन को देखिए क्या आपके
  290. 17:18अधिकतर निर्णय के पीछे भविष्य का विचार
  291. 17:21नहीं होता
  292. 17:22है और हो भी क्यों ना अपने जीवन को सरल और
  293. 17:27सुखमय बनाने का प्रयत्न करने का अधिकार
  294. 17:30सबका पर भविष्य तो कोई नहीं जानता केवल
  295. 17:37कल्पना ही की जा सकती है तो जीवन के सारे
  296. 17:41महत्वपूर्ण निर्णय कल्पनाओं के आधार पर ही
  297. 17:45करते हैं हम क्या निर्णय करने का कोई
  298. 17:49तीसरा मार्ग हो सकता है
  299. 17:54का विचार कीजिए सारे सुखों का आधार धर्म
  300. 18:01है और धर्म मनुष्य के हृदय में बसता है
  301. 18:08कि प्रत्येक निर्णय से पूर्व
  302. 18:11मैं स्वयं अपने हृदय से प्रश्न अवश्य पूछ
  303. 18:14लेना कि यह निर्णय स्वार्थ से जन्मा है या
  304. 18:20धर्म से इतना पर्याप्त नहीं हैं
  305. 18:25कि भविष्य के बदले धर्म का विचार करने से
  306. 18:29क्या भविष्य अधिक सुख पूर्ण नहीं होगा अ
  307. 18:35कि स्वयं विचार कीजिए
  308. 18:38एक व्यक्ति को जब उसके अपराध का दंड मिलता
  309. 18:42है तब कभी-कभी उसने आए को देख कर मन
  310. 18:46कचोटता है
  311. 18:47और वेस्ट होता है विदेश में कि जब वह
  312. 18:50अपराध हुआ था तब व्यक्ति अभिनय तथा
  313. 18:54और उसके पश्चात उसने इतने पश्चात देखिए तो
  314. 18:58यह में इतना परिवर्तन किया
  315. 19:00और फिर उसे दंड क्यों मिले पर यह घास होता
  316. 19:07है वहां
  317. 19:09कि प्रत्याघात ही होता जैसा कर्म वैसा फल
  318. 19:14कि यदि किसी को प्रेम दोगे तो सुख प्राप्त
  319. 19:17होगा
  320. 19:18कि यदि किसी की हत्या करोगे तो मृत्यु दंड
  321. 19:20मिलेगा
  322. 19:22है जैसा कार्य वैसा ही न्याय तो फिर
  323. 19:26राष्ट्रीय स्वच्छता का कोई मूल्य नहीं है
  324. 19:31अवश्य मूल्य राष्ट्रीय पश्चाताप मनुष्य की
  325. 19:35आत्मा को भगवान करता है
  326. 19:38में आने वाले धन को स्वीकार करने के लिए
  327. 19:41मनुष्य को तैयार करता है
  328. 19:44है अर्थात बिना प्लास्टिक के दंड स्वीकार
  329. 19:46करने का कोई मूल्य है
  330. 19:50कि वह मे चाहिए
  331. 19:55वसुंधरा सुनो
  332. 19:57कि मुझे
  333. 20:01कि जब अपने किसी अच्छे कार्य के उत्तर में
  334. 20:03दुख प्राप्त होता है
  335. 20:05है अथवा किसी को उसके दुष्ट कार्य में सुख
  336. 20:08मिलता है तो मन अवश्य विचार करता है कि
  337. 20:12अच्छा कार्य करने का धर्म के मार्ग पर
  338. 20:15चलने का तात्पर्य क्या है
  339. 20:20हैं पर दुष्ट आत्मा को क्या प्राप्त होता
  340. 20:22है यह भी देखिए दोस्तों करने वाला हृदय
  341. 20:25सदा चंचल रहता अकुलाता रहता मन में सदा
  342. 20:30नए-नए संघर्ष उत्पन्न होते अविश्वास उसे
  343. 20:35जीवन हर दौड़ाता है
  344. 20:39कि क्या इस दुख जब ईंधन से चलने वाला
  345. 20:43अच्छा कार्य करने वाले सच्चरित्र व्यक्ति
  346. 20:46का हृदय अशांत रहता है परिस्थितियों के
  347. 20:49जीवन के सुख में बाधा नहीं बनती समाज में
  348. 20:53सम्मान और मन में संतोष देता है सदा
  349. 20:57अर्थात अच्छा बर्ताव भविष्य में किसी रुख
  350. 21:02का मार्ग नहीं अच्छा बर्ताव आप स्वयं कुएं
  351. 21:07में
  352. 21:08है अथवा बुरा बर्ताव भविष्य में किसी
  353. 21:11उत्सुकता मार्ग नहीं अलार्म सी चार्ट सूख
  354. 21:16उत्पन्न करता है
  355. 21:18कि हर मुद्दे सुख नहीं पिघली है
  356. 21:30कि सत्ता की लालसा सबके विरुद्ध को घेरे
  357. 21:33रहती है प्रत्येक व्यक्ति अपना एक राष्ट्र
  358. 21:36निर्मित करने का प्रयत्न अवश्य करता है
  359. 21:38फिर राष्ट्र पुरुष की भांति बहुत बड़ा हो
  360. 21:43या फिर अपने परिवार तक सीमित हो वह सत्ता
  361. 21:48प्राप्त करने का प्रयास अवश्य करता है
  362. 21:51किंतु सत्ता का वास्तविक रूप क्या है
  363. 21:56और क्या हमने कभी विचार किया है एक मनुष्य
  364. 22:01जितने अधिक लोगों के जीवन को प्रभावित कर
  365. 22:04सके जितने अधिक लोगों के जीवन की
  366. 22:07स्वतंत्रता पर अंकुश लग सके उतनी ही अधिक
  367. 22:10क्षमता का अनुभव करता है वह तथा वास्तविक
  368. 22:14रूप ही है अन्य के जीवन पर स्वयं का
  369. 22:17प्रभाव है
  370. 22:21है किंतु क्या वास्तविक प्रभाव प्रेम दया
  371. 22:26करुणा और धर्म से निर्मित नहीं होता जब भी
  372. 22:31मनुष्य कठोरता और अधर्म से सत्ता प्राप्त
  373. 22:33करने का प्रयत्न करता है तब वह दूसरों के
  374. 22:37हृदय में विरोध अथवा विद्रोह को जन्म देता
  375. 22:40है और परिणाम परिणाम कुछ इस प्रकार हां
  376. 22:47कुछ समय के लिए वह स्वयं को प्रभावी और
  377. 22:51शक्तिशाली अवश्य पाता है किंतु वास्तविकता
  378. 22:54नहीं
  379. 22:56है यही कारण है कि गुरु और वशिष्ठ जैसे
  380. 22:59विषयों की या आज भी पूजा की जाती है
  381. 23:02कि रावण और हिरण्यकशिपु कि नहीं इस पर तो
  382. 23:07आप विचार अवश्य करें सत्य कहा न
  383. 23:12[संगीत]
  384. 23:16लुट इस संसार में आने वाला प्रत्येक बालक
  385. 23:20संपूर्ण तरह संस्कार रहित होता है उस के
  386. 23:23अंतर पर ना किसी अच्छे संस्कार के चिन्ह
  387. 23:26अंकित होते हैं ना ही बुरे संस्कार के
  388. 23:28अर्थात जन से बालों में ना कोई गुण होता
  389. 23:33है और ना ही कोई योजना है
  390. 23:36है तो यह दोष अथवा गुण किस प्रकार प्राप्त
  391. 23:39होते हैं
  392. 23:41और क्या हमने कभी विचार किया है
  393. 23:44मैं जो बात माता-पिता के मुख से निरंतर
  394. 23:48सुनी जाती है वही बात उनकी संतानों के
  395. 23:52हृदय का संस्कार बनती है जैसे किसी गांव
  396. 23:56में नदी तट तक एक पगडंडी बन जाती है केवल
  397. 23:59उस मार्ग पर बार-बार चलने के कारण अर्थात
  398. 24:03माता-पिता के हृदय की इच्छाएं उनकी
  399. 24:07संतानों के हृदय का दोष अथवा गुण बनकर
  400. 24:10जन्म लेते हैं
  401. 24:12कि क्या यह सत्य नहीं है
  402. 24:18हैं पर फिर भी जब उनकी संतानों में कोई
  403. 24:22दोष दिखाई देता है तो माता-पिता आश्चर्य
  404. 24:26और दुख से भर जाते हैं
  405. 24:29कि माता-पिता का हृदय भी प्रश्न करता है
  406. 24:31कि उनकी संतानों में यह कुसंस्कार हाय
  407. 24:35कहां से हो
  408. 24:38मैं सत्य तो यही है कि माता-पिता अपनी
  409. 24:41संतानों को अनजाने में ही कुछ संस्कार के
  410. 24:44बीच देते जो उनके संतानों की हृदय भूमि पर
  411. 24:48को संस्कार का वृक्ष बनकर उठता है अर्थात
  412. 24:52अपनी संतानों को सुसंस्कारी और धर्म मैं
  413. 24:56बनाने की आशा रखने वाले प्रत्येक
  414. 24:58माता-पिता को प्रथम
  415. 25:01को अपने हृदय की इच्छाओं पर अंकुश रखना
  416. 25:04अनिवार्य नहीं है
  417. 25:07कर दो
  418. 25:09[हंसी]
  419. 25:12कि प्रत्येक माता-पिता इस पर विचार अवश्य
  420. 25:15कीजिए का या

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