Jiddu Krishnamurthy (HINDI/हिंदी में) — Transcript
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- 0:04टोटल
- 0:05फ्रीडम द एसेंशियल
- 0:09कृष्णमूर्ति एक ऐसी किताब है जो हमसे कहती
- 0:12है कि असली आजादी तब मिलती है जब हम अपने
- 0:15अंदर झांकते
- 0:16हैं। इसमें कृष्णमूर्ति के चुने हुए टॉक्स
- 0:21और लिखे गए विचार हैं जो उन्होंने अलग-अलग
- 0:25जगह पर लोगों से बात करते वक्त बोले थे।
- 0:30यह किताब बताती है कि सच्चाई का कोई
- 0:32रास्ता नहीं होता। कोई धर्म या गुरु हमें
- 0:36वहां नहीं ले जा
- 0:38सकता। हर इंसान को खुद अपने अंदर देखना
- 0:41होगा बिना किसी डर के, बिना किसी बिलीफ
- 0:45के। कृष्णमूर्ति कहते हैं कि हमें किसी भी
- 0:50ऑर्गेनाइजेशन, गुरु या सिस्टम पर
- 0:53डिपेंडेंट नहीं होना चाहिए। हमें खुद अपनी
- 0:57सोच से, अपने एक्शन से जीवन को समझना
- 1:00होगा।
- 1:02इस किताब में उन्होंने अर्ली टॉक्स, डेली
- 1:06लाइफ के
- 1:07प्रॉब्लम्स, बड़े सवाल और दुनिया के साथ
- 1:11हमारे रिश्ते के बारे में बात की
- 1:14है। हर पार्ट एक अलग एंगल से लाइफ को
- 1:18देखने का नजरिया देता
- 1:22है। कृष्णमूर्ति कहते हैं कि अगर हम डर,
- 1:27दुख और कंडीशनिंग से मुक्त हो जाए
- 1:32तो हम सच में जीना शुरू करते
- 1:35हैं। कृष्णमूर्ति के वर्ड्स सिंपल हैं,
- 1:40लेकिन उनका इंपैक्ट बहुत गहरा
- 1:43है। यह किताब उन लोगों के लिए है जो सच
- 1:47में फ्रीडम, लव और अंडरस्टैंडिंग को जीवन
- 1:51में लाना चाहते हैं बिना किसी शॉर्टकट के।
- 1:57आइए इस किताब को पेज बाय पेज समझने की
- 2:02कोशिश करते हैं।
- 2:04ट्रुथ इज अ पाथलेस
- 2:07लैंड। सच्चाई एक ऐसी जमीन है जिसका कोई
- 2:11रास्ता नहीं
- 2:14होता। ऑर्डर ऑफ द स्टार इन द ईस्ट 1911
- 2:18में बनाया गया था।
- 2:22ताकि दुनिया को बताया जा सके कि एक वर्ल्ड
- 2:24टीचर आने वाला
- 2:26है। कृष्णमूर्ति को उस ऑर्डर का हेड बनाया
- 2:30गया
- 2:30था। 2 अगस्त 1929
- 2:34को हॉलैंड के ओमेन में एक कैंप के पहले
- 2:39दिन कृष्णमूर्ति ने इस ऑर्डर को 3000
- 2:43लोगों के सामने खत्म कर
- 2:45दिया। यह स्पीच उसी दिन की है।
- 2:51आज सुबह हम ऑर्डर ऑफ द स्टेट के खात्मा के
- 2:54बारे में बात करने वाले
- 2:56हैं। कुछ लोग खुश होंगे कुछ
- 3:00उदास। पर यह ना तो खुशी की बात है ना गम
- 3:03की क्योंकि यह तो होना ही था। अब मैं
- 3:06बताता हूं
- 3:07क्यों। तुम्हें एक कहानी याद होगी। शैतान
- 3:12और उसका दोस्त सड़क पर चल रहे थे।
- 3:15उन्होंने देखा एक आदमी ने जमीन से कुछ
- 3:18उठाया देखा और अपनी जेब में रख लिया।
- 3:22दोस्त ने
- 3:24पूछा उसने क्या उठाया? शैतान बोला सच का
- 3:28एक टुकड़ा। दोस्त बोला यह तो तेरे लिए
- 3:32बुरी बात है। शैतान बोला, नहीं मैं उसे
- 3:36ऑर्गेनाइज करने दूंगा।
- 3:39मैं मानता हूं कि सच्चाई का कोई रास्ता
- 3:42नहीं होता और तुम मुझ तक किसी भी रास्ते,
- 3:45किसी भी धर्म या संप्रदाय के जरिए नहीं
- 3:48पहुंच सकते। यह मेरा दृष्टिकोण है और मैं
- 3:52इसे पूरी तरह और बिना किसी शर्त के मानता
- 3:56हूं। सच्चाई इनफिनिट है। अनंत बिना किसी
- 4:00कंडीशन के और किसी भी रास्ते से उस तक
- 4:03नहीं पहुंचा जा सकता।
- 4:06उसे ऑर्गेनाइज नहीं किया जा सकता और किसी
- 4:10भी ऑर्गेनाइजेशन को यह काम नहीं करना
- 4:12चाहिए कि वह लोगों को किसी पर्टिकुलर
- 4:16रास्ते पर ले जाए या मजबूर करें।
- 4:20अगर तुम इस बात को समझोगे तो तुम देखोगे
- 4:24कि किसी भी बिलीफ को ऑर्गेनाइज करना
- 4:26नामुमकिन है। बिलीफ एक पर्सनल चीज है और
- 4:31उसे ऑर्गेनाइज नहीं किया जा सकता और करना
- 4:34भी नहीं चाहिए।
- 4:37अगर तुम ऐसा करते हो तो वह बिलीफ मर जाता
- 4:40है, पत्थर बन जाता है। फिर वह एक क्रीड,
- 4:45एक संप्रदाय, एक धर्म बन जाता है जिसे
- 4:48दूसरों पर थोपा जाता है। और यह दुनिया भर
- 4:52में हो रहा
- 4:53है। सच्चाई को छोटा कर दिया जाता है और वह
- 4:57सिर्फ उन लोगों के लिए एक खेल बन जाता है
- 4:59जो कमजोर हैं या थोड़ी देर के लिए दुखी
- 5:03हैं।
- 5:06सच्चाई को नीचे नहीं लाया जा
- 5:09सकता। इंसान को खुद ऊपर चढ़ना पड़ता
- 5:13है। तुम पहाड़ की चोटी को घाटी में नहीं
- 5:16ला
- 5:17सकते। अगर तुम चोटी तक पहुंचना चाहते हो
- 5:21तो तुम्हें घाटी से गुजरना होगा। चढ़ाई
- 5:25चढ़नी होगी। बिना डरे खतरनाक किनारों से
- 5:29गुजरते
- 5:30हुए। तुम्हें सच्चाई तक चढ़ना पड़ेगा। वह
- 5:34तुम्हारे लिए नीचे नहीं आएगी और कोई उसके
- 5:37लिए रास्ता नहीं बना
- 5:40सकता। ऑर्गेनाइजेशंस सिर्फ बाहर से
- 5:43इंटरेस्ट जगाती हैं। पर वह इंटरेस्ट का
- 5:47कोई मतलब नहीं होता अगर वह अंदर से सच्चाई
- 5:50के लिए प्रेम से नहीं आई हो।
- 5:54ऑर्गेनाइजेशन सिर्फ एक फ्रेमवर्क बन जाता
- 5:56है जिसमें लोग अपने आप को फिट कर लेते
- 6:00हैं। फिर वे लोग सच्चाई या उस चोटी तक
- 6:04पहुंचने की कोशिश नहीं करते बल्कि वह
- 6:07सिर्फ एक कंफर्टेबल जगह ढूंढ लेते हैं
- 6:10जहां वह फिट हो सके और सोच लेते हैं कि
- 6:15ऑर्गेनाइजेशन उन्हें सच्चाई तक ले जाएगी।
- 6:20यही मेरा पहला रीजन है कि मुझे लगता है कि
- 6:24ऑर्डर ऑफ द स्टार को खत्म हो जाना चाहिए।
- 6:28फिर भी मुझे पता है कि तुम लोग नए ऑर्डर्स
- 6:32बना लोगे। नए ऑर्गेनाइजेशंस ज्वाइन करते
- 6:35रहोगे जो सच्चाई ढूंढने का ड्रामा करते
- 6:40हैं। मैं किसी भी स्पिरिचुअल ऑर्गेनाइजेशन
- 6:43का हिस्सा नहीं बनना चाहता। यह बात अच्छे
- 6:47से समझ लीजिए।
- 6:49हां, मैं किसी ऐसे ऑर्गेनाइजेशन का यूज
- 6:52करूंगा जो मुझे लंदन ले जा सके। फॉर
- 6:55एग्जांपल जैसे कि ट्रेन या पोस्ट या
- 6:59टेलीग्राम। यह सब मैकेनिकल चीजें हैं।
- 7:02इनका स्पिरिचुअल लाइफ से कोई लेना देना
- 7:05नहीं। मैं फिर से कहता हूं कोई भी
- 7:09ऑर्गेनाइजेशन इंसान को स्पिरिचुअलिटी तक
- 7:12नहीं ले जा सकती।
- 7:17अगर कोई ऑर्गेनाइजेशन स्पिरिचुअलिटी के
- 7:20लिए बनाई जाती है तो वह एक लाठी बन जाती
- 7:24है। एक कमजोरी, एक
- 7:27बंधन और वह इंसान को ग्रो करने से, अपनी
- 7:32असली पहचान ढूंढने से रोक देती
- 7:36है। जिसमें उसे खुद ही उस पूरी बिना
- 7:40शर्तों वाली सच्चाई तक पहुंचना होता
- 7:43है। यह मेरा दूसरा रीजन है कि बीइंग द हेड
- 7:48ऑफ द ऑर्डर मैंने इसे खत्म करने का डिसीजन
- 7:51लिया। कोई मुझे मजबूर नहीं कर रहा
- 7:55था। यह कोई बड़ा काम नहीं है क्योंकि मुझे
- 7:58फॉलोअर्स नहीं चाहिए। और मैं यह सच में कह
- 8:02रहा
- 8:03हूं। जिस मोमेंट तुम किसी को फॉलो करते
- 8:06हो, उस मोमेंट तुम सच्चाई का फॉलो करना
- 8:10छोड़ देते हो।
- 8:13मुझे फर्क नहीं पड़ता तुम मेरी बात सुनते
- 8:15हो या नहीं। मुझे दुनिया में एक काम करना
- 8:19है और मैं उसी पर पूरी अटेंशन से फोकस कर
- 8:23रहा
- 8:24हूं। मेरा सिर्फ एक पर्पस है इंसान को
- 8:28आजाद
- 8:31करना। मैं उसे सभी पिंजरों से, सभी डर से
- 8:35छुड़ाना चाहता हूं।
- 8:37मुझे ना कोई नया धर्म बनाना है, ना कोई नई
- 8:41से शुरू करनी है, ना कोई थ्यरी या फिलॉसफी
- 8:45डेवलप करनी
- 8:46है। फिर तुम पूछोगे तो फिर तुम दुनिया भर
- 8:50में क्यों घूम-घूम के बोल रहे हो? मैं
- 8:54बताता हूं
- 8:55क्यों? ना मुझे फॉलोअर्स चाहिए। ना मुझे
- 9:00कोई स्पेशल डिसिप्लिन का ग्रुप चाहिए।
- 9:05इंसान कितना प्यार करता है खुद को अलग
- 9:07दिखाने से। चाहे वह कितना भी बेकार, बेकार
- 9:11और स्टूपिड क्यों ना
- 9:14हो। मैं उस बेकार डिफरेंशिएशन को बढ़ावा
- 9:18नहीं देना
- 9:20चाहता। मेरे पास कोई डिसाइपल नहीं है, कोई
- 9:24शिष्य नहीं है। ना जमीन पे, ना
- 9:27स्पिरिचुअलिटी की दुनिया में।
- 9:30ना तो मुझे पैसे का लालच है ना ही आराम की
- 9:33जिंदगी जीने की इच्छा खींचती
- 9:36है। अगर मुझे आराम से रहना होता तो मैं
- 9:41किसी कैंप में नहीं आता या किसी गीली ठंडी
- 9:44जगह में नहीं
- 9:46रहता। मैं सीधा बोल रहा हूं क्योंकि मैं
- 9:49चाहता हूं कि यह बात एक बार में ही क्लियर
- 9:52हो जाए। मुझे हर साल बच्चों जैसे बहस में
- 9:56नहीं पड़ना।
- 9:59एक न्यूज़ पेपर रिपोर्टर ने मुझे इंटरव्यू
- 10:02किया। उसने कहा कि इतने बड़े ऑर्गेनाइजेशन
- 10:06को तोड़ना एक बड़ा काम है जिसमें हजारों
- 10:09मेंबर्स
- 10:11थे। उसके लिए यह एक बड़ा काम था। क्योंकि
- 10:16उसने
- 10:17पूछा अब तुम क्या करोगे? कैसे
- 10:21जिओगे? तुम्हारे पास कोई फॉलोअर्स नहीं
- 10:23रहेंगे। लोग तुम्हारी बात नहीं सुनेंगे।
- 10:27अगर सिर्फ पांच लोग भी सुनने को तैयार
- 10:30हैं, जीने को तैयार हैं, जिनके चेहरे सच
- 10:34में एटरर्निटी की तरफ है, अनंत की तरफ तो
- 10:38वह काफी
- 10:39है। क्या फायदा हजारों का जो समझते ही
- 10:44नहीं।
- 10:46जो पूरी तरह पुरानी सोच में जम गए हैं। जो
- 10:51नए को चाहते ही नहीं, जो नए को सिर्फ अपने
- 10:55बेजान और बंद सोच के हिसाब से बदलना चाहते
- 11:00हैं। अगर मैं तेज
- 11:02बोलूं तो गलत मत समझना।
- 11:06यह दयालु ना होने की वजह से नहीं है। जैसे
- 11:09डॉक्टर ऑपरेशन करता है दर्द के
- 11:12बावजूद पर वह उसकी दया ही होती है। वैसे
- 11:17ही अगर मैं सीधा बोलता हूं तो वह असली
- 11:20प्रेम की वजह से है। नफरत की वजह से
- 11:25नहीं। जैसे मैंने पहले कहा मेरा सिर्फ एक
- 11:29ही मकसद है। इंसान को आजाद करना। उसे
- 11:34फ्रीडम की तरफ ले
- 11:36जाना, उसकी मदद करना ताकि वह सब बंधन तोड़
- 11:41सके। क्योंकि सिर्फ यही उसे सच्ची खुशी दे
- 11:46सकता है। बिना शर्तों वाली अपनी असली
- 11:49पहचान का एहसास दे सकता
- 11:53है। मैं खुद आजाद हूं। बिना किसी कंडीशन
- 11:57के पूरा ना थोड़ा ना आधा बल्कि पूरी
- 12:01सच्चाई जो हमेशा के लिए
- 12:04है। इसीलिए मैं चाहता हूं कि जो लोग मुझे
- 12:08समझना चाहते हैं वह भी आजाद
- 12:11हो। ना कि वह मुझे फॉलो करें। ना ही मुझे
- 12:16एक केज बनाएं जिसे बाद में रिलीजन या
- 12:19सेक्ट बना दिया जाए।
- 12:22उन्हें सब डर से आजाद होना चाहिए। धर्म का
- 12:26डर, मुक्ति का डर, स्पिरिचुअलिटी का डर,
- 12:30प्यार का डर, मौत का डर, जिंदगी का
- 12:34डर। जैसे एक आर्टिस्ट पेंटिंग करता है
- 12:38क्योंकि उससे उसमें खुशी मिलती
- 12:42है। वह उसका सेल्फ एक्सप्रेशन होता है।
- 12:46उसका सुख होता है। वैसे ही मैं यह सब कर
- 12:49रहा हूं। ना मुझे किसी से कुछ चाहिए ना
- 12:53मैं किसी के लिए कर रहा
- 12:57हूं। तुम लोग आदत डाल चुके हो अथॉरिटी की
- 13:02या उसके माहौल
- 13:04की। तुम सोचते हो कि कोई दूसरा अपनी कुछ
- 13:07अलग पावर्स के थ्रू
- 13:10एक चमत्कार करके तुम्हें एटरर्नल फ्रीडम
- 13:14के एरिया में ले जाएगा। जहां सिर्फ खुशी
- 13:18है। तुम्हारी पूरी जिंदगी की सोच इसी
- 13:22अथॉरिटी पर बेस्ड है। तुम तीन साल से मुझे
- 13:26सुन रहे हो बिना किसी बदलाव
- 13:29के। अब मेरी बात एनालाइज करो। सोचो ताकि
- 13:33तुम उसे डीपली समझ सको।
- 13:38जब तुम किसी अथॉरिटी को ढूंढते हो
- 13:40स्पिरिचुअलिटी के लिए तो तुम ऑटोमेटिकली
- 13:43एक ऑर्गेनाइजेशन क्रिएट करते हो उसके
- 13:48आसपास और जैसे तुम ऐसी ऑर्गेनाइजेशन बनाते
- 13:52हो जिसमें तुम्हारा मानना है कि वह
- 13:55तुम्हें स्पिरिचुअलिटी तक ले जाएगी। तुम
- 13:58खुद एक पिंजरे में एक केज में बंद हो जाते
- 14:02हो।
- 14:03अगर मैं खुल के बोल रहा हूं तो याद रखिए
- 14:08मैं ना क्रोध से ना कठोरता से ना किसी
- 14:11जज्बात में बोल रहा हूं बल्कि इसलिए बोल
- 14:14रहा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम
- 14:16मेरी बात को अच्छे से समझो।
- 14:20यही वजह है कि तुम यहां हो और अगर मैं
- 14:24साफ-साफ सीधे और अपना पॉइंट ऑफ व्यू ना
- 14:28बताऊं तो यह सब टाइम बर्बाद होगा।
- 14:34तुम 18 साल से इस इवेंट के लिए तैयारी कर
- 14:37रहे थे। वर्ल्ड टीचर के आने के लिए। 18
- 14:42साल से तुमने ऑर्गेनाइज किया। तुमने किसी
- 14:46ऐसे को ढूंढा जो तुम्हारे दिल और दिमाग
- 14:49में नई खुशी भर दे। तुम्हारी जिंदगी बदल
- 14:53दे। तुम्हें नया समझ
- 14:56दे। किसी ऐसे को जो तुम्हें एक नए लेवल तक
- 15:00ले जाए। नई होप दे, तुम्हें आजादी
- 15:04दे। और अब देखो क्या हो रहा
- 15:07है। अब खुद सोचो,
- 15:10समझो कि इस बिलीफ ने तुम में क्या बदलाव
- 15:14लाया
- 15:15है। बैज पहन लेने के सुपरफिशियल डिफरेंस
- 15:19से नहीं जो कि बेकार और हंसी की बात है।
- 15:24क्या इस बिलीफ ने तुम्हारी जिंदगी के सब
- 15:27बेकार चीजें हटा दी हैं?
- 15:30यही है असली तरीका जज करने का। तुम कैसे
- 15:35ज्यादा आजाद, ज्यादा गहरे, ज्यादा खतरनाक
- 15:38बन गए हो हर उस सोसाइटी के लिए जो
- 15:43झूठ और बेकार चीजों पर बनी
- 15:47है। इस ऑर्गेनाइजेशन के मेंबर्स में क्या
- 15:51असली बदलाव आया है?
- 15:56जैसे मैंने कहा तुम लोग 18 साल से मेरी
- 16:00तैयारी कर रहे हो। मुझे कोई फर्क नहीं
- 16:03पड़ता कि तुम मानते हो या नहीं कि मैं
- 16:05वर्ल्ड टीचर हूं। यह बात बिल्कुल भी
- 16:08इंपॉर्टेंट नहीं है। क्योंकि तुम मर्डर ऑफ
- 16:12द स्टार के मेंबर हो। तुमने अपना सपोर्ट,
- 16:16अपनी एनर्जी दी। यह मानते हुए कि
- 16:19कृष्णमूर्ति वर्ल्ड टीचर है। पूरी तरह से
- 16:23उन लोगों के लिए जो सच में खोज रहे हैं और
- 16:26आधेआधे उन लोगों के लिए जो अपनी आधी अधूरी
- 16:30सच्चाइयों में ही खुश
- 16:33हैं। तुम 18 साल से तैयारी कर रहे हो और
- 16:37देखो समझने में कितनी दिक्कत आ रही है।
- 16:40कितनी उलझन, कितनी बेकार बातें।
- 16:45तुम्हारे अंदर के बायस, तुम्हारे डर,
- 16:48तुम्हारे गुरु, तुम्हारे नए पुराने मंदिर
- 16:52यह सब मैं कहता हूं समझ के रास्ते में
- 16:57रुकावट
- 16:58है। मैं इसे और क्लियर नहीं बना सकता।
- 17:02मुझे नहीं चाहिए कि तुम मुझसे एग्री करो।
- 17:05मुझे नहीं चाहिए कि तुम मुझे फॉलो करो।
- 17:08मुझे चाहिए कि तुम मेरी बात को समझो।
- 17:13यह समझना जरूरी है क्योंकि तुम्हारा बिलीफ
- 17:16ने तुम्हें बदला नहीं है। सिर्फ और उलझा
- 17:19दिया है। क्योंकि तुम चीजें जैसी हैं वैसे
- 17:25देखना ही नहीं
- 17:27चाहते। तुम्हें चाहिए अपने नए
- 17:30भगवान। पुराने की जगह नए। पुराने धर्मों
- 17:34की जगह नए
- 17:35धर्म। नए तरीके पुराने के बदले सब के सब
- 17:39बेकार। रुकावट,
- 17:42लिमिटेशन, सहारा बन चुके
- 17:45हैं। पुराने स्पिरिचुअल डिफरेंसेस की जगह
- 17:49तुमने नए बना लिए हैं। पुरानी पूजा की जगह
- 17:53नए तरीके अपना लिए हैं। तुम अपनी
- 17:56स्पिरिचुअलिटी के लिए किसी और पर
- 17:58डिपेंडेंट हो। अपनी खुशी के लिए किसी और
- 18:03पे। अपने एनलाइटनमेंट के लिए किसी और पे।
- 18:08और तुमने 18 साल मेरी तैयारी की है। फिर
- 18:12भी जब मैं कहता हूं कि यह सब जरूरी नहीं
- 18:14है। जब मैं कहता हूं कि तुम्हें सब कुछ
- 18:18छोड़ के अपने अंदर देखना चाहिए। अपनी
- 18:21रोशनी के लिए, अपने ग्लोरी के लिए, अपने
- 18:24शुद्ध होने के लिए, अपने वजूद के लिए। तब
- 18:29भी कोई तैयार नहीं है यह करने के लिए।
- 18:34शायद कुछ लोग हो पर बहुत
- 18:37कम तो फिर ऑर्गेनाइजेशन का क्या
- 18:42मतलब? ऐसे झूठे लोग मुझे फॉलो करते हैं
- 18:47जिसे तुम सच्चाई का रूप कहते हो। उनको
- 18:50फॉलो करने का क्या
- 18:52मतलब? प्लीज याद रखिए मैं कुछ कड़वा या
- 18:57बुरा नहीं बोल रहा। लेकिन अब हम उस मोड़
- 19:00पर आ गए हैं।
- 19:02जहां हमें चीजें जैसी हैं वैसी देखनी ही
- 19:07पड़गी। मैंने पिछले साल ही कहा था कि मैं
- 19:10किसी तरह का कॉम्प्रोमाइज नहीं
- 19:13करूंगा। बहुत कम लोगों ने तब मेरी बात
- 19:17सुनी। इस साल मैंने सब कुछ बिल्कुल
- 19:20साफ-साफ कह दिया
- 19:23है। मुझे नहीं पता दुनिया भर में कितने
- 19:27हजार लोग जो ऑर्डर के मेंबर हैं।
- 19:3118 साल से मेरी तैयारी कर रहे
- 19:34थे। और अब जब वक्त आया है बिना शर्त के
- 19:39मेरी बात सुनने का तब कोई तैयार ही
- 19:43नहीं। तो फिर ऑर्गेनाइजेशन का क्या
- 19:48काम? जैसे मैंने पहले कहा मेरा मकसद है
- 19:52इंसान को पूरी तरह से आजाद करना। क्योंकि
- 19:56मैं मानता हूं कि असली स्पिरिचुअलिटी वही
- 19:59है जहां सेल्फ कभी बिगड़ता नहीं जो हमेशा
- 20:03रहता है। जहां रीजन और लव का परफेक्ट
- 20:08बैलेंस होता है।
- 20:11यही है असली बिना शर्त वाली सच्चाई जो
- 20:15जिंदगी खुद
- 20:18है। इसीलिए मैं इंसान को आजाद करना चाहता
- 20:22हूं।
- 20:24जैसे एक चिड़िया खुले आसमान में उड़ती है
- 20:27बिना बोझ बिना किसी पर निर्भर हुए फुल
- 20:31फ्रीडम में
- 20:33खुश और मैं जिसके लिए तुम 18 साल से
- 20:37तैयारी कर रहे हो अब कह रहा हूं कि
- 20:40तुम्हें इन सब चीजों से आजाद होना होगा
- 20:43अपनी उलझनों से अपने जालों
- 20:47से इसके लिए तुम्हें किसी स्पिरिचुअल
- 20:51बिलीफ वाले ऑर्गेनाइजेशन की जरूरत जरूरत
- 20:53नहीं
- 20:54है। क्या जरूरत है ऑर्गेनाइजेशन की? सिर्फ
- 20:58पांच या 10 लोगों के लिए जो समझ रहे हो?
- 21:02जो स्ट्रगल कर रहे हैं जिन्होंने सारी
- 21:06बेकार चीजें छोड़ दी
- 21:10हैं। और जो कमजोर लोग हैं उनके लिए भी कोई
- 21:14ऑर्गेनाइजेशन सच्चाई नहीं ढूंढ सकती।
- 21:18क्योंकि सच्चाई हर किसी के अंदर है। ना वह
- 21:21दूर है ना
- 21:23पास। वह तो हमेशा से वही
- 21:28है। ऑर्गेनाइजेशंस तुम्हें आजाद नहीं बना
- 21:33सकती। कोई भी बाहर का इंसान तुम्हें आजाद
- 21:37नहीं कर सकता। ना कोई ऑर्गेनाइज्ड पूजा ना
- 21:42किसी कॉज के लिए अपने आप को जला देना। ना
- 21:46ऑर्गेनाइजेशन
- 21:48बनाना ना किसी काम में खो जाना तुम्हें
- 21:51आजाद
- 21:53करेगा। तुम टाइप राइटर यूज करते हो लेटर
- 21:57लिखने के
- 21:59लिए। पर उसे मंदिर में रख के पूजा नहीं
- 22:03करते। पर जब तुम ऑर्गेनाइजेशंस को सबसे
- 22:07इंपॉर्टेंट बना लेते हो तो तुम वही कर रहे
- 22:10हो।
- 22:13इसमें कितने मेंबर्स हैं?
- 22:16यही पहला सवाल होता है जो हर न्यूज़ पेपर
- 22:20रिपोर्टर मुझसे पूछता
- 22:22है। तुम्हारे कितने फॉलोअर्स हैं। उनकी
- 22:25गिनती से ही हम जज करेंगे कि तुम यह कह
- 22:30रहे हो वह सच है या
- 22:33नहीं। मुझे नहीं पता कितने हैं। मुझे उससे
- 22:37कोई मतलब नहीं।
- 22:40जैसे मैंने कहा अगर सिर्फ एक भी आदमी सच
- 22:44में आजाद हो गया तो वही काफी
- 22:51है। फिर से तुम्हारे दिमाग में यह बैठ गया
- 22:55है कि सिर्फ कुछ लोगों के पास ही खुशी की
- 22:58किंगडम की चाबी होती
- 23:01है। किसी के पास नहीं
- 23:04है। किसी के पास यह चाबी रखने का हक नहीं
- 23:08है।
- 23:10वह चाबी तुम खुद हो और सिर्फ तुम्हारे
- 23:13अंदर के विकास, डेवलपमेंट, शुद्धि और कभी
- 23:19ना बिगड़ने वाला सेल्फ में ही है। वह
- 23:21हमेशा वाला
- 23:24किंगडम। तो अब तुम देख सकते हो कितना
- 23:27बेकार है। वह पूरा स्ट्रक्चर जो तुमने
- 23:30बनाया है।
- 23:32बार-बार बाहर मदद ढूंढना। दूसरों पर
- 23:36डिपेंडेंट रहना, खुशी के
- 23:39लिए, सुकून के लिए, अपनी ताकत के
- 23:46लिए, यह सब सिर्फ तुम्हारे अंदर मिल सकता
- 23:50है। तो फिर ऑर्गेनाइजेशन का क्या
- 23:55मतलब? तुम आदत डाल चुके हो सुनने की कि
- 24:00तुम कितना ग्रो किए हो। तुम्हारा
- 24:02स्पिरिचुअल लेवल क्या है?
- 24:05कितनी बचकानी बात
- 24:08है। तुम्हारे अंदर खूबसूरती है या नहीं?
- 24:12यह तुम्हारे अलावा और कौन बता सकता है।
- 24:16तुम खुद इनकरप्टेबल हो या नहीं यह सिर्फ
- 24:21तुम्हें ही पता हो सकता
- 24:23है। तुम इन बातों में सीरियस ही नहीं
- 24:27हो। तो फिर ऑर्गेनाइजेशन का क्या मतलब?
- 24:36लेकिन जो लोग सच में समझना चाहते हैं जो
- 24:40ढूंढ रहे हैं उस चीज को जो हमेशा से है ना
- 24:44जिसका कोई शुरू है ना
- 24:47अंत वो लोग मिलके चलेंगे ज्यादा गहराई
- 24:54से वह बनेंगे खतरा हर उस चीज के लिए जो
- 24:58बेकार है जो झूठी है जो सिर्फ एक शैडो है।
- 25:03और वह लोग फोकस
- 25:05करेंगे। वह बन जाएंगे एक
- 25:08आग क्योंकि उन्हें समझ आ गया
- 25:12है। ऐसा एक ग्रुप हमें बनाना होगा और यही
- 25:16मेरा पर्पस
- 25:18है। उस असली समझ की वजह से होगी असली
- 25:23दोस्ती। और उस असली दोस्ती की वजह से जो
- 25:26तुम्हें अभी तक मालूम नहीं होगा असली साथ
- 25:30देना। असली कोऑपरेशन हर एक
- 25:34का यह किसी अथॉरिटी की वजह से नहीं किसी
- 25:38सेल्वेशन के नाम पर नहीं किसी कॉज के लिए
- 25:41खुद को जला देने की वजह से नहीं बल्कि
- 25:45इसलिए क्योंकि तुमने सच में समझा है और अब
- 25:49तुम कैपेबल हो उस हमेशा की जिंदगी जीने
- 25:53के यह हर सुख हर सैक्रिफाइस से बड़ा
- 25:57है तो यह कुछ रीजंस हैं जिनकी वजह से 2
- 26:03साल सोचने के बाद मैंने यह डिसीजन
- 26:08लिया। यह कोई इंस्टेंट इंपल्स से नहीं
- 26:12हुआ। किसी ने मुझे इसके लिए मनाया
- 26:16नहीं। मैं ऐसे डिसीजंस में किसी और की बात
- 26:20नहीं
- 26:21मानता। 2 साल तक मैंने सोचा
- 26:25धीरे-धीरे ध्यान से पेशेंस के साथ
- 26:30और अब मैंने डिसाइड कर लिया है कि आर्डर
- 26:34को बंद कर दूं क्योंकि मैं इसका हेड
- 26:38हूं। तुम चाहो तो नए ऑर्गेनाइजेशंस बना
- 26:42सकते हो। किसी और का इंतजार कर सकते हो।
- 26:46मुझे उससे कोई मतलब
- 26:48नहीं। ना मुझे नए पिंजरे बनाने में
- 26:52इंटरेस्ट है। ना उन पिंजरों के नए
- 26:55डेकोरेशन में।
- 26:59पार्ट
- 27:01वन जिदू कृष्णमूर्ति का जन्म 1895 में
- 27:06इंडिया के मदने पल्ले नाम के एक सिंपल
- 27:10ब्राह्मण घर में हुआ
- 27:12था। जब वह 10 साल के थे तब उनकी मां का
- 27:16देहांत हो गया और बचपन में उनकी तबीयत
- 27:19खराब रहती थी। वह अक्सर बीमार रहते थे।
- 27:24जब उनके पिता ने सरकारी नौकरी से
- 27:26रिटायरमेंट लिया तब उन्होंने एनी बेसेंट
- 27:29से बात की जो इंटरनेशनल थियोसोफिकल
- 27:33सोसाइटी की प्रेसिडेंट
- 27:36थी कि वह उस ऑर्गेनाइजेशन में काम करें
- 27:40जिसमें वह कुछ सालों से मेंबर
- 27:43थे। कृष्णमूर्ति उस वक्त 14 साल के थे।
- 27:4814 और वह अपने तीन भाइयों और पिता के साथ
- 27:51मद्रास के थियोसोफिकल हेड क्वार्टर्स चले
- 27:55गए। मिसेज बेसेंट और कृष्णमूर्ति के बीच
- 27:59एक गहरा और प्यार भरा रिश्ता बन गया और
- 28:03उन्होंने कृष्णमूर्ति के लीगल गार्डियन
- 28:06बनने का जिम्मा ले लिया।
- 28:08थियोसोफिस्ट लोग एक वर्ल्ड टीचर का इंतजार
- 28:12कर रहे
- 28:13थे और उसकी तैयारी के लिए उन्होंने एक
- 28:16ग्रुप बनाया था जिसका नाम था ऑर्डर ऑफ द
- 28:20स्टार इन द
- 28:21ईस्ट जिसमें कृष्णमूर्ति को हेड बनाया
- 28:26गया। 1912 में कृष्णमूर्ति को ऑफिशियली
- 28:30वर्ल्ड टीचर घोषित किया गया।
- 28:33लेकिन 1929 में उन्होंने एक स्पिरिचुअल
- 28:37तरीके से बोल्ड स्पीच ट्रुथ इज अ पाथलेस
- 28:41लैंड के जरिए इस ऑर्डर को तोड़
- 28:45दिया। ऐसा करके उन्होंने जमीन, पैसा, पावर
- 28:51और हर तरह की अथॉरिटी या गुरु होने के
- 28:54क्लेम को छोड़ दिया।
- 28:59उसके बाद अपनी पूरी जिंदगी में
- 29:02कृष्णमूर्ति ने दुनिया भर में ट्रैवल किया
- 29:05और हर उस इंसान से बात की जो सुनना चाहता
- 29:08था। यूरोप, इंडिया, यूनाइटेड
- 29:12स्टेट्स, साउथ अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और
- 29:16न्यूजीलैंड
- 29:18में। हर बैकग्राउंड के हजारों लोग उनकी
- 29:21बातें सुनने आते
- 29:24थे। इस पार्ट में कृष्णमूर्ति के कुछ
- 29:28सिलेक्टेड टॉक्स दिए गए हैं जो 1930 के
- 29:33बीच में हुए थे। इसमें एक टॉक है जो
- 29:37मेक्सिको सिटी में हुआ था और एक सीरीज जो
- 29:421934 में उजाई कैलिफोर्निया में हुई थी।
- 29:46जहां कृष्णमूर्ति ने वर्ल्ड वॉर टू 1939
- 29:51से
- 29:521945 के साल भी बिताए।
- 29:57व्हाट आई वांट टू
- 30:01डू? तुम पूछ सकते हो तुम क्या करना चाहते
- 30:05हो? अगर तुम नहीं चाहते कि हम किसी
- 30:08सोसाइटी में शामिल हो या कोई थ्योरी मान
- 30:12ले तो फिर तुम क्या करना चाहते
- 30:16हो? मैं जो करना चाहता हूं वह यह है कि
- 30:20तुम एक व्यक्ति के रूप में दुख उलझन
- 30:25और टकराओ के इस दरिया को पार कर सको। पूरे
- 30:30और गहरे फुलफिलमेंट के
- 30:33रास्ते। यह फुलफिलमेंट ना तो अपने ईगो
- 30:37वाली सेल्फ एक्सप्रेशन से आता है ना ही
- 30:40जबरदस्ती या नकल
- 30:43से। ना ही किसी फैंसी फीलिंग या कंक्लूजन
- 30:47से बल्कि साफ सोचने से, समझदारी भरे एक्शन
- 30:52से।
- 30:53हम इस दुख के दरिया को पार
- 30:58करेंगे। एक असली रियलिटी है जो सिर्फ गहरे
- 31:01और सच्चे फुलफिलमेंट से ही समझ में आती
- 31:04है। इस फुलफिलमेंट की खूबसूरती और गहराई
- 31:08को समझने से पहले दिमाग को अपने पुराने
- 31:13बैकग्राउंड, ट्रेडिशन, आदत और बायस से
- 31:17आजाद करना होगा।
- 31:20जैसे अगर तुम किसी पर्टिकुलर पॉलिटिकल
- 31:22पार्टी से हो तो तुम हर पॉलिटिकल बात को
- 31:26उसी पार्टी के छोटी और लिमिटेड नजरिए से
- 31:30देखोगे। अगर तुम किसी रिलीजन में पले बड़े
- 31:34हो तो तुम जिंदगी को उस धर्म के
- 31:38अंधविश्वास और अंधेरे के चश्मे से देखोगे।
- 31:43यह बैकग्राउंड, यह ट्रेडिशन तुम्हें
- 31:46जिंदगी को पूरे तरीके से समझने से रोकता
- 31:50है। और इसी वजह से कंफ्यूजन और दुख होता
- 31:55है। मैं तुमसे हाथ जोड़ के कह रहा हूं कि
- 31:59मेरी बात ध्यान से सुनो। कम से कम इस घंटे
- 32:04के लिए अपने पुराने बैकग्राउंड, ट्रेडिशन
- 32:07और बायस से आजाद हो जाओ। और इंसान के
- 32:11प्रॉब्लम्स के बारे में सिंपल और सीधा
- 32:16सोचो। सच्चा क्रिटिकल होना मतलब हमेशा
- 32:20अपोज करना नहीं
- 32:22होता। ज्यादातर लोगों को सिर्फ अपोज करना
- 32:26सिखाया गया है। क्रिटिसाइज करना नहीं।
- 32:31जब कोई सिर्फ अपोज करता है तो अक्सर उसका
- 32:35मतलब होता है कि उसका कोई पर्सनल फायदा है
- 32:39जिसे वह बचाना चाहता
- 32:41है और यह सच्ची समझ वाली क्रिटिसिज्म नहीं
- 32:46होती। सच्ची क्रिटिसिज्म तब होती है जब
- 32:50तुम किसी वैल्यू के पूरे मतलब को समझने की
- 32:53कोशिश करते हो। बिना किसी सेल्फ डिफेंस
- 32:57के।
- 33:01पूरी दुनिया में हम देखते हैं एक्सट्रीम
- 33:04गरीबी और अमीरी। एक तरफ भरपूरता है और
- 33:08दूसरी तरफ
- 33:10भुखमरी। हम देखते हैं क्लास का भेद, जाति
- 33:14का नफरत, नेशनलिज्म की बेवकूफी और युद्ध
- 33:19की डरावनी
- 33:22हिंसा। एक इंसान दूसरे इंसान का शोषण कर
- 33:26लेता है। एक्सप्लइटेशन।
- 33:29धर्म अपने पर्सनल फायदे के लिए एक
- 33:32एक्सप्लइटेशन का जरिया बन गया है और इंसान
- 33:36को इंसान से अलग भी कर रहा
- 33:39है। चिंता है, कंफ्यूजन है, निराशा है,
- 33:44फ्रस्ट्रेशन
- 33:45है। हम यह सब देख रहे हैं। यह हमारी रोज
- 33:50की जिंदगी का हिस्सा
- 33:52है। इस दुख के चक्रव्यूह में फंसा हुआ
- 33:56आदमी अगर जरा भी सोचने वाला हो तो उसने यह
- 34:01जरूर सोचा होगा कि इन ह्यूमन प्रॉब्लम्स
- 34:04का स्यूशन क्या हो सकता
- 34:07है? या तो तुम इस दुनिया की गड़बड़ हालत
- 34:12से वाकिफ हो या फिर पूरी तरह सोए हुए हो।
- 34:16एक सपनों की दुनिया में जी रहे हो। एक
- 34:19इल्ल्यूजन
- 34:21में अगर तुम जाग रहे हो तो तुम जरूर इन
- 34:25प्रॉब्लम से जूझ रहे
- 34:27हो। इनका स्यूशन ढूंढने के चक्कर में कुछ
- 34:31लोग एक्सपर्ट्स के पास जाते हैं। उनकी
- 34:34आइडियाज और थरीज फॉलो करते हैं।
- 34:38धीरे-धीरे यह लोग एक अलग ग्रुप बन जाते
- 34:41हैं और फिर उनका कॉन्फ्लिक्ट हो जाता है
- 34:44दूसरे एक्सपर्ट्स और उनके ग्रुप से।
- 34:48और फिर एक व्यक्ति सिर्फ एक टूल बन जाता
- 34:51है किसी ग्रुप या एक्सपर्ट के हाथ
- 34:55में या फिर तुम कोई सिस्टम फॉलो करते हो
- 34:58जिसे अगर ध्यान से देखा जाए तो वह सिर्फ
- 35:01एक और तरीका बन जाता है व्यक्ति का
- 35:04एक्सप्लइटेशन करने का। व्यक्ति का
- 35:08शोषण। या तुम सोचते हो कि सारी हिंसा और
- 35:13हॉरर को बदलने के लिए एक मास मूवमेंट
- 35:16चाहिए। एक कलेक्टिव एक्शन।
- 35:19पर अगर तुम जो खुद एक मास का पार्ट हो
- 35:24अपना असली रोल ही नहीं समझते तो फिर यह
- 35:27मास यह भीड़ मूवमेंट सिर्फ एक फैंसी वर्ड
- 35:31बन के रह जाता
- 35:34है। एक सच्चा एक ट्रू कलेक्टिव एक्शन तभी
- 35:39हो सकता है जब तुम एक व्यक्ति के रूप में
- 35:43जो कि भीड़ का हिस्सा भी है जाग जाए और
- 35:46अपने एक्शन की पूरी जिम्मेदारी ले बिना
- 35:50किसी मजबूरी
- 35:51के प्लीज याद रखो मैं तुम्हें कोई ऐसी
- 35:56फिलॉसफी नहीं दे रहा हूं जिसे तुम
- 36:00अंधाधुंध फॉलो करो।
- 36:03मैं तो सिर्फ तुम्हारे अंदर एक डिजायर
- 36:06जगाना चाहता हूं। एक सच्ची और समझदारी
- 36:11वाली फुलफिलमेंट का। जो अकेली चीज है जो
- 36:15दुनिया में खुशी, ऑर्डर और पीस ला सकती
- 36:20है। दुनिया में असली और परमानेंट बदलाव
- 36:24तभी आएगा। प्यार और समझदारी का फुलफिलमेंट
- 36:28तभी होगा जब तुम जाग जाओगे।
- 36:32और अपने दिमाग में बनी हुई इल्ल्यूजंस के
- 36:35जाल से आजाद होने
- 36:37लगोगे जो तुमने खुद बनाई है डर के चलते।
- 36:44जब दिमाग इन सब रुकावट से आजाद हो जाता
- 36:47है। जब अंदर से गहरा अपना और अपने मर्जी
- 36:52से बदलाव आता है। तभी असली लंबे समय तक
- 36:55चलने वाला सच्चा कलेक्टिव एक्शन पॉसिबल
- 36:59है। जिसमें कोई जबरदस्ती नहीं
- 37:04होती। समझो कि मैं तुमसे एक व्यक्ति के
- 37:07रूप में बात कर रहा हूं। किसी ग्रुप या
- 37:10पार्टी से नहीं।
- 37:12अगर तुम अपनी पूरी जिम्मेदारी और अपने
- 37:15फुलफिलमेंट के लिए नहीं झांकते तो समाज
- 37:18में एक इंसान के रूप में तुम्हारा काम
- 37:21अधूरा छोटा रह जाएगा और इसी में छुपी है
- 37:26दुख की
- 37:28जड़ तो सवाल
- 37:30है कैसे हो सकती है यह गहरी और पर्सनल
- 37:37क्रांति अगर एक इंसान के अंदर यह सच्ची
- 37:41बच्ची अपनी मर्जी से होने वाली बदलाव आती
- 37:45है तो तुम सबके लिए एक सही माहौल बनाओगे
- 37:50बिना किसी जात या रेस के फर्क
- 37:53के फिर पूरी दुनिया एक ही इंसानी फैमिली
- 37:57बन
- 37:58जाएगी पर तुम कैसे
- 38:01जागोगे एक व्यक्ति के रूप में इस गहरी
- 38:05क्रांति के
- 38:07लिए अब जो मैं बोलने वाला हूं वह मुश्किल
- 38:10नहीं है सिंपल है और क्योंकि यह इतना
- 38:14सिंपल है। मुझे डर है तुम इसे इग्नोर कर
- 38:18दोगे। यह कहकर कि यह क्लियर या पावरफुल
- 38:22नहीं
- 38:23है। तुम जिसे पावरफुल कहते हो, जिसे
- 38:27पॉजिटिव कहते हो, वह होता है एक फिक्स
- 38:31प्लान का मिलना। बताया जाए कि एग्जजेक्टली
- 38:34क्या करना है।
- 38:38लेकिन अगर तुम खुद समझ पाओ कि क्या चीजें
- 38:41तुम्हारा सच्चा और गहरा फुलफिलमेंट रोकती
- 38:44हैं तो तुम किसी के फॉलोअर नहीं
- 38:48बनोगे और कोई तुम्हारा फायदा नहीं उठा
- 38:51पाएगा।
- 38:54किसी भी तरह का फॉलो करना तुम्हारे पूरे
- 38:57होने के अगेंस्ट
- 38:59है। इस गहरी क्रांति के लिए तुम्हें पूरी
- 39:02तरह अवेयर होना होगा उस स्ट्रक्चर का जो
- 39:06तुमने अपने आसपास बना लिया है। जिसमें अब
- 39:10तुम फंस चुके हो।
- 39:14मतलब हमारे पास कुछ वैल्यूस, कुछ
- 39:18आइडियल्स, कुछ बिलीव्स हैं जो एक जाल की
- 39:22तरह दिमाग को पकड़ के रखते
- 39:25हैं। और जब तुम उन सब का मतलब पूरी तरह
- 39:28समझने लगते हो तो तुम्हें दिखाई देगा कि
- 39:32यह सब कैसे बने।
- 39:36तुम जब तक फुल्ली और सच्चे तरीके से एक्शन
- 39:39नहीं ले सकते, जब तक तुम यह नहीं जानते कि
- 39:43तुम किस जेल में रह रहे हो और यह जेल कैसे
- 39:48बनी। और जब तुम इसे बिना किसी सेल्फ
- 39:51डिफेंस के देखोगे तब तुम खुद समझोगे इसका
- 39:55असल मतलब जो कोई दूसरा तुम्हें समझा नहीं
- 39:59सकता।
- 40:03तुम्हारी अपनी इंटेलिजेंस के जागने से
- 40:07तुम्हारे अपने दर्द के थ्रू तुम्हें
- 40:09मिलेगा सच्चा फुलफिलमेंट का
- 40:13रास्ता। हम सब अपने ईगो के थॉट और एक्शन
- 40:18के जरिए सिक्योरिटी और सर्टेनिटी ढूंढते
- 40:21हैं। बाहर भी और अंदर भी।
- 40:26अगर तुम अपनी सोच को ध्यान से देखोगे तो
- 40:30तुम्हें दिखेगा कि तुम अपने ईगो के लिए ही
- 40:32सेफ्टी और श्योरिटी ढूंढ रहे हो अंदर भी
- 40:36और बाहर
- 40:39भी। असल में
- 40:42लाइफ का ऐसा कोई फिक्स डिवीजन नहीं है
- 40:45जैसे ऑब्जेक्टिव और सब्जेक्टिव
- 40:47वर्ल्ड। मैं यह सिर्फ समझाने के लिए
- 40:51डिवाइड कर रहा
- 40:52हूं। बाहर के लेवल पर
- 40:55ईगो वाली सेफ्टी की यह खोज फैमिली के थ्रू
- 40:59दिखती
- 41:00है जो बन जाती है एक एक्सप्लइटेशन का
- 41:04सेंटर जो पोजीशन पर बेस्ड होती
- 41:08है। अगर तुम इसे ध्यान से
- 41:11देखो तो तुम पाओगे कि जिसे तुम फैमिली का
- 41:15प्यार कहते हो वह सिर्फ पोज़ेसिवनेस
- 41:21है। वही सेफ्टी की खोज फिर क्लास डिवाइड
- 41:26बन जाती है जो बदल जाती है नेशनलिज्म और
- 41:31इंपीरियलिज्म की बेवकूफी
- 41:35में जहां से नफरत जाति भेद और आखिर में
- 41:40युद्ध की हिंसा पैदा होती
- 41:43है। तो अपने ही ईगो वाले डिजायर्स के थ्रू
- 41:47हमने एक दुनिया बना दी है। नेशनलिटीज की,
- 41:52अलग-अलग गवर्नमेंट्स
- 41:55की। जिनका काम ही है वॉर की तैयारी करना
- 42:00और आदमी को आदमी के अगेंस्ट खड़ा
- 42:03करना। फिर आती है ईगो वाली सिक्योरिटी और
- 42:07श्योरिटी की तलाश धर्म के थ्रू।
- 42:12तुम खुशी-खुशी यह मानना पसंद करते हो कि
- 42:16किसी डिवाइन पावर ने यह ऑर्गेनाइज्ड
- 42:19बिलीव्स बनाए हैं जिन्हें तुम रिलीजन कहते
- 42:22हो।
- 42:25लेकिन असली में तुमने खुद ही यह रिलीजंस
- 42:28बनाए हैं अपनी सुविधा के
- 42:31लिए। सदियों के बाद यह सेक्रेट बन गए हैं
- 42:34और तुम अब इनके गुलाम बन चुके हो।
- 42:39कभी भी कोई आइडियल रिलीजन नहीं हो सकता।
- 42:43इसलिए चलो हम अपना वक्त इन पर बहस में
- 42:47बर्बाद ना
- 42:49करें। चलो हम देखें कि हमने रिलीजन कैसे
- 42:53बनाया और हम कैसे इनके स्लेव बन
- 42:57गए। अगर तुम इन रिलीजंस को वैसे ही देखो
- 43:01जैसे यह हैं बिना मेकअप के।
- 43:04तो तुम देखोगे कि यह सिर्फ ऑर्गेनाइज्ड
- 43:07बिलीफ का एक बिजनेस है जो इंसान को पकड़ता
- 43:12है, अलग करता है और उसे एक्सप्लइट करता
- 43:17है। जैसे तुम बाहर की दुनिया में
- 43:20सिक्योरिटी ढूंढते हो, वैसे ही तुम अंदर
- 43:24भी एक अलग तरह की सेफ्टी ढूंढते हो। जिसे
- 43:29तुम कहते हो इमोर्टिटी।
- 43:33तुम चाहते हो कि तुम्हारा ईगो मरने के बाद
- 43:36भी जिंदा रहे और इसी को तुम इमोर्टिटी का
- 43:42नाम देते
- 43:44हो। आगे आने वाले टॉक्स में मैं बताऊंगा
- 43:48कि मेरे लिए क्या है सच्ची
- 43:53इमोर्टिटी। तुम जब अपनी सिक्योरिटी ढूंढते
- 43:56हो तो उसी सर्च में डर पैदा होता है और
- 44:01फिर तुम खुद को किसी और के हवाले कर देते
- 44:05हो। जो तुमसे वादा करता है कि वह तुम्हें
- 44:08इमोर्टिटी
- 44:11देगा। इस डर के चलते तुम एक स्पिरिचुअल
- 44:14अथॉरिटी बना लेते हो।
- 44:17और इस अथॉरिटी को चलाने के लिए होते हैं
- 44:20पंडित जो तुम्हारा फायदा उठाते हैं।
- 44:24तुम्हारे बिलीव्स डॉग्मा और क्रीड के थ्रू
- 44:30शो दिखावा और शान शौकत के थ्रू जो दुनिया
- 44:36भर में रिलीजन के नाम से जानी जाती
- 44:40है। यह सब डर पर बेस्ड होता है।
- 44:45फियर चाहे तुम इसे गॉड का प्यार या ट्रुथ
- 44:49क्यों ना कहो।
- 44:52अगर तुम इसको ध्यान से समझदारी से देखो तो
- 44:56यह सिर्फ डर का रिजल्ट
- 44:58है और इसी वजह से यह इंसान के
- 45:01एक्सप्लइटेशन इंसान के शोषण का एक जरिया
- 45:05बन जाता
- 45:08है। तुम्हारी अपनी डिजायर के चलते
- 45:12इमोर्टिटी के लिए ईगो के सर्वाइव करने के
- 45:15लिए तुमने यह इल्लुजन खुद बनाया है जिसे
- 45:18तुम रिलीजन कहते हो।
- 45:21और तुम इसमें या तो कॉन्शियसली या
- 45:26अनकॉन्शियसली फंसे हुए
- 45:29हो या हो सकता है तुम किसी रिलीजन के
- 45:32मेंबर ना हो। लेकिन तुम किसी ऐसे ग्रुप या
- 45:36सेक्ट का हिस्सा हो जो एक सल रिवॉर्ड का
- 45:39प्रॉमिस करता हो। एक छुपा हुआ ईगो का
- 45:42बूस्ट मरने के बाद के लिए।
- 45:47या तुम किसी ग्रुप या सेट में भी नहीं हो।
- 45:51पर तुम्हारे अंदर एक छुपी हुई इच्छा हो
- 45:54सकती है अपने इमोर्टिटी को ढूंढने
- 45:57की। जब तक तुम्हारे अंदर किसी भी फॉर्म
- 46:00में सेल्फ कंटिन्यूस की डिजायर है तब तक
- 46:05डर होगा। और यह डर ही अथॉरिटी बनाता है।
- 46:10और फिर उससे पैदा होती है एक छुपी हुई
- 46:14हिंसा और
- 46:16बेवकूफी जो तुम्हें एक्सप्लइटेशन के लिए
- 46:19तैयार कर देती
- 46:21है। यह एक्सप्लॉयटेशन इतना सटल, इतना
- 46:25महीन, इतना रिफाइंड होता है कि आदमी उसे
- 46:30प्यार करने लगता है और उसे कहता है
- 46:33स्पिरिचुअल प्रोग्रेस या परफेक्शन की तरफ
- 46:38बढ़ना। अब तुम एक व्यक्ति के रूप में इस
- 46:42पूरे कॉम्प्लेक्स स्ट्रक्चर को समझना
- 46:45होगा।
- 46:49डर के सोर्स को देखना होगा।
- 46:52और उसे हटा देने के लिए तैयार रहना होगा।
- 46:56चाहे जो भी अंजाम
- 46:59हो। इसका मतलब है तुम्हें अपने अंदर से
- 47:02टकराना होगा एकिस्टिंग आइडियल्स और
- 47:05वैल्यूस
- 47:06से। और जब दिमाग झूठ से आजाद होता है। तभी
- 47:12तुम एक सही माहौल बना सकते हो सबके लिए।
- 47:17तुम्हारा पहला काम यह है कि तुम समझो कि
- 47:20तुम एक जेल में हो और फिर तुम देखो कि
- 47:24तुम्हारा अपना सोच हर वक्त उस जेल के
- 47:28वैल्यू से टकराव से बचने की कोशिश करता
- 47:31है।
- 47:33यही स्केप तुम्हें आइडियल्स देता है। जो
- 47:37चाहे कितने भी खूबसूरत क्यों ना लगते हो
- 47:41पर असली में वह भी एक इल्यूजन ही होते
- 47:44हैं।
- 47:47दिमाग की एक पुरानी चाल है आइडियल में भाग
- 47:52जाना। क्योंकि अगर वह भागता
- 47:55नहीं तो उसे डायरेक्टली उस जेल उस
- 47:59एनवायरमेंट से टकराना पड़ता।
- 48:03मतलब दिमाग एक इल्लुजन में भाग जाता है
- 48:06क्योंकि उसे पता है कि अगर वह सच्चाई से
- 48:10टकराएगा तो तकलीफ जरूर आएगी।
- 48:14जब वह जेल के वैल्यूस, मोरालिटी और रिलीजन
- 48:18को क्वेश्चन करेगा।
- 48:22इसलिए असली बात यह है कि तुम्हें टकराना
- 48:26होगा उन ट्रेडिशंस और वैल्यूस से जो
- 48:29सोसाइटी और धर्म ने तुम पर थोपी
- 48:34है। और तुम्हें आइडियल के थ्रू
- 48:37इंटेलेक्चुअली भागना नहीं
- 48:41है। जब तुम इन वैल्यूस को क्वेश्चन करना
- 48:44स्टार्ट करते हो तब तुम्हारे अंदर वह असली
- 48:48इंटेलिजेंस जागती है।
- 48:51जो अकेली चीज है जो इंसानी प्रॉब्लम्स का
- 48:54स्यूशन दे सकती
- 48:58है। जब तक दिमाग झूठी वैल्यूस में फंसा
- 49:02हुआ है तब तक कोई फुलफिलमेंट नहीं हो
- 49:06सकती।
- 49:08सिर्फ पूर्णता ही सच्चाई को दिखाती है।
- 49:12कंप्लीटनेस ही ट्रुथ को दिखाता है। जो है
- 49:17एटरर्नल लाइफ की मूवमेंट
- 49:23डेटेड अक्टूबर 20
- 49:261935 मेक्सिको
- 49:31सिटी। व्हाट आर यू सीकिंग? तुम क्या ढूंढ
- 49:36रहे
- 49:38हो? मेरा मकसद इन टॉक्स में तुम्हें कोई
- 49:41थिंकिंग का सिस्टम देना नहीं
- 49:44है। बल्कि तुम्हारे सोचने की शक्ति को
- 49:47जगाना है। और इसके लिए मैं कुछ बातें
- 49:51बोलूंगा। यह कोई फाइनल बातें नहीं होंगी।
- 49:56पर मैं चाहता हूं कि तुम इन्हें ध्यान से
- 50:00सोचो। जब तुम सोचोगे तो कई सवाल उठेंगे।
- 50:05अगर तुम मुझसे वह सवाल पूछो तो मैं उनका
- 50:08जवाब देने की कोशिश
- 50:10करूंगा और फिर हम और गहरा बात कर
- 50:14सकेंगे। मुझे सोचना पड़ता है तुम में से
- 50:18ज्यादा लोग यहां क्यों आए
- 50:20हो? शायद तुम कुछ ढूंढने आए हो लेकिन तुम
- 50:24क्या ढूंढ रहे हो? तुम इस सवाल का आसानी
- 50:28से जवाब नहीं दे सकते।
- 50:31क्योंकि तुम्हारा सर्च बार-बार बदलता रहता
- 50:35है। जो चीज तुम ढूंढ रहे हो, वह लगातार
- 50:38बदलती जा रही है। इसलिए तुम्हें सच में
- 50:42पता ही नहीं होता कि तुम क्या चाहते हो,
- 50:46क्या ढूंढ रहे हो।
- 50:49लेकिन तुमने एक आदत बना ली है। एक टीचर से
- 50:52दूसरे टीचर के पास जाने की, अलग-अलग
- 50:56सोसाइटीज, ऑर्गेनाइजेशंस जॉइ करने की,
- 50:59अलग-अलग सिस्टम्स फॉलो करने की।
- 51:03असल में तुम बस यह देख रहे हो कि तुम्हें
- 51:06सबसे ज्यादा सेटिस्फेक्शन या एक्साइटमेंट
- 51:10किस चीज से मिलती
- 51:12है। एक सिस्टम से दूसरे सिस्टम एक टीचर से
- 51:16दूसरे टीचर के पास जाना तुम इस प्रोसेस को
- 51:19ट्रुथ की सर्च कहते
- 51:22हो। असल में तुम बस एक आईडिया से दूसरे
- 51:25आईडिया में जा रहे हो। एक थॉट सिस्टम से
- 51:28दूसरे में सब कुछ इकट्ठा करते जा रहे हो।
- 51:33उम्मीद में कि तुम लाइफ को समझ जाओगे।
- 51:36उसका मतलब पकड़ लोगे। उसकी स्ट्रगल्स को
- 51:39समझ लोगे और हर बार यह कहते हो कि हां अब
- 51:44मिला। पर मैं चाहता हूं कि जब मेरी बातें
- 51:48खत्म हो तो तुम यह ना कहो कि हां अब मुझे
- 51:52कुछ मिल गया। क्योंकि जिस मोमेंट तुम कह
- 51:56देते हो कि कुछ मिला उसी वक्त तुम खो जाते
- 52:00हो।
- 52:01वह एक एंकर बन जाता है जिसे दिमाग पकड़ के
- 52:04बैठ जाता है और फिर वह जो असली एटरर्नल
- 52:09मूवमेंट है वह रुक जाता है और ज्यादातर
- 52:13दिमाग एक क्लियर गोल ढूंढते हैं एक पक्की
- 52:17इच्छा के साथ कि मुझे कुछ पाना है और जब
- 52:22यह इच्छा बन जाती है तो तुम्हें कुछ मिलता
- 52:25जरूर है लेकिन वह जीता हुआ नहीं होता वह
- 52:29डेड होता है
- 52:30और फिर तुम उसे छोड़कर दूसरे के पीछे भाग
- 52:34जाते हो। और यह बार-बार छूने और छोड़ने का
- 52:38प्रोसेस तुम कहते हो विज़डम, एक्सपीरियंस
- 52:42या ट्रुथ का मिलना
- 52:45है। शायद तुम में से ज्यादा लोग इसी
- 52:49एटीट्यूड के साथ यहां आए हैं। चाहे
- 52:52तुम्हें पता हो या ना पता हो।
- 52:56तुम्हारा सोचना सिर्फ स्कीम्स और
- 52:58कंफर्मेशन ढूंढने में लग जाता है।
- 53:01मूवमेंट्स या ग्रुप्स ज्वाइन करने की
- 53:03इच्छा में। बिना इस बात को समझे कि जिंदगी
- 53:07के बेसिक ट्रुथ्स क्या है? जैसे मैंने
- 53:11कहा। मैं तुम्हें कोई आइडियल नहीं दे रहा
- 53:14जिसे तुम कॉपी
- 53:15करो। ना ही कोई गोल दे रहा हूं जिसे तुम
- 53:19ढूंढो। मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि
- 53:22तुम्हारा दिमाग खुद ही इन चीजों से आजाद
- 53:25होने लगे जो हमने बनाई है और जिन्हें हमने
- 53:31बिना सोचे समझे सच मान लिया
- 53:35है। अब हर आदमी कोशिश करता है अपने
- 53:38एनवायरमेंट के प्रोडक्ट को इमोर्टल बनाने
- 53:41की।
- 53:42जो चीज तुम्हारे एनवायरमेंट का रिजल्ट है,
- 53:46तुम उसे ही इटरनल बनाने की कोशिश करते हो।
- 53:51तुम्हारे डर, उम्मीदें, चाहतें, लाइक्स,
- 53:55डिसलाइक्स जो तुम अपना टेंपरामेंट कहते
- 53:58हो, वह सब असल में सिर्फ एनवायरमेंट के
- 54:01रिजल्ट्स हैं। और इन्हीं सबका बंडल बन
- 54:05जाता है तुम्हारा आई, तुम्हारी
- 54:08कॉन्शियसनेस।
- 54:10क्या यह सच नहीं
- 54:13है? पूरा स्ट्रगल होता है इस आई और
- 54:16एनवायरमेंट के बीच। वह आई जिसे तुमने अपने
- 54:20दिमाग से पकड़ा हुआ है। वह एनवायरमेंट का
- 54:23ही रिजल्ट है। और स्ट्रगल चलता रहता है उस
- 54:27आई और एनवायरमेंट के कांस्टेंट बदलाव के
- 54:31बीच। तुम लगातार इस आई के लिए इमोर्टिटी
- 54:36ढूंढ रहे हो।
- 54:38आसान शब्दों में झूठ अपने आप को सच और
- 54:42एटरर्नल बनाना चाहता है। जब तुम
- 54:44एनवायरमेंट का असल मतलब समझ लेते हो तब
- 54:47कोई रिएक्शन नहीं
- 54:50होती और इसलिए कोई टकराव भी नहीं होता उस
- 54:54रिएक्शन और उसके क्रिएटर यानी एनवायरमेंट
- 54:57के बीच।
- 54:59तो यह जो इमोटिटी का ढूंढना है, यह जो
- 55:03सर्टेनिटी और लास्टिंग बनने की इच्छा है,
- 55:06तुम इसे कहते हो इवोल्यूशन का प्रोसेस।
- 55:10ट्रुथ या गॉड या लाइफ को समझने का
- 55:13प्रोसेस। और कोई भी जो तुम्हारी मदद करता
- 55:16है इस आई को इमोर्टल बनाने में, तुम उसे
- 55:20बना लेते हो अपना सेवियर, अपना गुरु, अपना
- 55:22मास्टर।
- 55:26तुम उसका सिस्टम फॉलो करते हो। कभी दिमाग
- 55:29से तो कभी बिना दिमाग
- 55:31लगाए। जब दिमाग लगाकर फॉलो करते हो तो तुम
- 55:35सोचते हो कि तुम स्मार्ट
- 55:37हो। क्योंकि तुम्हें लगता है कि वह
- 55:40तुम्हें इमोर्टिटी तक ले जाएगा।
- 55:45मतलब तुम चाहते हो कोई और तुम्हारे लिए उस
- 55:49रिएक्शन को इमोर्टल बना दे जो कि
- 55:52एनवायरमेंट का रिजल्ट है जो कि असली में
- 55:55झूठ है। इस झूठ को एटरर्नल बनाने की इच्छा
- 55:59से ही तुम रिलीजन बनाते हो। सोसाइटीज,
- 56:03पॉलिटिक्स, इकोनॉमिक सिस्टम्स, मोरल रूल्स
- 56:07बनाते हो। और ऐसे
- 56:08ही जब तुम एक सिस्टम बनाते हो किसी
- 56:11इंडिविजुअल को इमोर्टल बनाने के लिए तो उस
- 56:14प्रोसेस में तुम खुद खो जाते
- 56:17हो और फिर तुम उसी चीज से टकराते हो जो
- 56:21तुमने खुद बनाई होती
- 56:23है जो तुम्हारे अपने सिक्योरिटी की इच्छा
- 56:26से पैदा होती है और जिसे तुम इमोर्ट कह
- 56:30देते
- 56:33हो आफ्टर ऑल व्हाई शुड रिलीजंस एक्सिस्ट
- 56:37आखिर धर्मों का होना क्यों जरूरी
- 56:41है? रिलीजन एक सोच का डिवीजन बन गया है।
- 56:47यह ग्रो हुआ
- 56:49है। इसे बढ़ाया चढ़ाया गया
- 56:53है। और उसमें जान डाली गई है अलग-अलग
- 56:56बिलीव्स के
- 56:58थ्रू। क्योंकि तुम्हारे अंदर यह इच्छा है
- 57:02कि तुम रियलाइज करो कि तुम कुछ पाओ कि तुम
- 57:05अमर बन जाओ।
- 57:08और जो मोरल स्टैंडर्ड्स हैं, वह भी सिर्फ
- 57:11सोसाइटी ने बनाए हैं ताकि एक इंसान उसके
- 57:14कंट्रोल में रहे। मेरे लिए मोरालिटी को
- 57:19स्टैंडर्डाइज नहीं किया जा
- 57:23सकता। एक ही वक्त में मोरालिटी और
- 57:26स्टैंडर्ड्स दोनों नहीं हो सकते। सिर्फ
- 57:28इंटेलिजेंस हो सकती है जो ना तो स्टैंडर्ड
- 57:32है ना हो सकती है। पर इस पर हम आगे बात
- 57:38करेंगे। अब यह जो लगातार ढूंढने का
- 57:41प्रोसेस है खुशी का, सच का, रियलिटी का,
- 57:45हेल्थ का यह डिजायर हर एक के अंदर है।
- 57:49ताकि उसे सेफ्टी मिले, परमानेंस
- 57:54मिले। और इसी सर्च फॉर
- 57:58परमानेंस के अंदर होता है
- 58:01कॉन्फ्लिक्ट जो होता है एनवायरमेंट के
- 58:04रिजल्ट मतलब आई और खुद एनवायरमेंट के
- 58:07बीच। अब अगर तुम थोड़ा सोचो तो यह आई क्या
- 58:11है? जब तुम कहते हो मैं
- 58:16मेरा मेरा हाउस, मेरी वाइफ, मेरा चाइल्ड,
- 58:20मेरा प्यार, मेरा टेंपरामेंट वो सब क्या
- 58:24है?
- 58:25वह सिर्फ एनवायरमेंट का रिजल्ट
- 58:28है और उसी रिजल्ट आई और एनवायरमेंट के बीच
- 58:33ही कॉन्फ्लिक्ट होता
- 58:35है। कॉन्फ्लिक्ट सिर्फ और सिर्फ तभी हो
- 58:39सकता है जब दोनों तरफ झूठ
- 58:42हो। सच और झूठ के बीच कभी कॉन्फ्लिक्ट
- 58:46नहीं हो सकता। है ना?
- 58:49तो जो झूठ चीजों के बीच की टकराव होती है
- 58:54दो अलग-अलग लेवल्स ऑफ झूठ के
- 58:57बीच। तो यह जो स्ट्रगल तुम करते हो अपने
- 59:00और एनवायरमेंट के बीच जिसे तुम सच्चा
- 59:03स्ट्रगल कहते हो वह सच्चा नहीं है।
- 59:07तुम्हारे अंदर हर वक्त स्ट्रगल चल रहा है।
- 59:10तुम्हारे और तुम्हारे सराउंडिंग्स के बीच।
- 59:14तुम्हारे पति, तुम्हारी पत्नी, बच्चे,
- 59:18पड़ोसी, समाज, पॉलिटिकल ग्रुप्स सबके
- 59:24बीच। और तुम सोच रहे हो कि यह बैटल
- 59:28इंपॉर्टेंट है ताकि तुम खुशी, सच,
- 59:31इमोर्टिटी या एक्सटसी पा सको। आसान शब्दों
- 59:36में जिसे तुम ट्रुथ कहते हो वह सिर्फ एक
- 59:39सेल्फ कॉन्शियस आई है जो हमेशा इमोर्टल
- 59:43बनने की कोशिश में लगा रहता है और
- 59:47एनवायरमेंट एक लगातार बदलती हुई झूठ है वो
- 59:51मूवमेंट ऑफ फाल्स तुम्हारे लिए एनवायरमेंट
- 59:54बन जाता है जिसे तुम प्रोग्रेस इवोल्यूशन
- 59:58कहते
- 59:59हो मेरे लिए खुशी सच या गॉड यह ये सब नहीं
- 1:00:05मिलते आई से जो एक चेंजिंग एनवायरमेंट का
- 1:00:08रिजल्ट
- 1:00:11है। चलो एक और तरीके से समझाता
- 1:00:15हूं। तुम सबको पता है कि तुम्हारे और
- 1:00:18एनवायरमेंट के बीच कॉन्फ्लिक्ट है। तुम
- 1:00:22सोचते हो अगर मैं एनवायरमेंट को हरा दूं
- 1:00:25उसे कंट्रोल कर लूं तब मैं सच समझूंगा।
- 1:00:30इसलिए कास्टेंट बैटल चलती रहती है
- 1:00:33तुम्हारे और एनवायरमेंट के बीच। पर यह तुम
- 1:00:37क्या हो? तुम भी तो सिर्फ एनवायरमेंट का
- 1:00:40रिजल्ट हो। तो क्या कर रहे हो तुम? एक झूठ
- 1:00:44चीज से दूसरी झूठ चीज से लड़ रहे हो। और
- 1:00:48जब तक तुम एनवायरमेंट को समझ नहीं लेते तब
- 1:00:50तक वह भी झूठ ही रहेगा।
- 1:00:54तो वह एनवायरमेंट ही उस कॉन्शियसनेस को
- 1:00:56बनाता है जिसे तुम आई कहते
- 1:01:00हो जो हमेशा इमोर्टल बनने की कोशिश करता
- 1:01:06है और उस आई को इमोर्टल बनाने के लिए तुम
- 1:01:09बनाते हो रिलीजंस सिस्टम्स
- 1:01:13फिलॉसफीस यह सब बंधन और बैरियर बन जाते
- 1:01:18हैं। इसी वजह से हमेशा कॉन्फ्लिक्ट होता
- 1:01:21है। आई और एनवायरमेंट के बीच और जैसे
- 1:01:25मैंने
- 1:01:26कहा सच और झूठ के बीच कभी कॉन्फ्लिक्ट
- 1:01:30नहीं होता। सिर्फ दो झूठों के बीच होता
- 1:01:34है।
- 1:01:35लेकिन तुम्हारे दिमाग में यह बात बैठ गई
- 1:01:38है कि यह स्ट्रगल आई और एनवायरमेंट के बीच
- 1:01:42यही तुम्हें पावर, विडम, एटरर्निटी,
- 1:01:46रियलिटी, ट्रुथ और हैप्पीनेस तक ले जाएगा।
- 1:01:52पर असली बात यह है कि हमें अपना ध्यान
- 1:01:55रखना चाहिए एनवायरमेंट
- 1:01:58पर ना कि स्ट्रगल पे ना उसे कैसे जीतेंगे
- 1:02:03ना उससे कैसे
- 1:02:05भागेंगे अगर तुम एनवायरमेंट को क्वेश्चन
- 1:02:08करो और उसका मतलब समझने की कोशिश करो तो
- 1:02:12तुम उसकी असली वैल्यू समझोगे है
- 1:02:15ना ज्यादा लोग तो बस भागने में लगे हैं
- 1:02:19सरकमस्टेंससेस से सिचुएशन से एनवायरमेंट
- 1:02:23से वो यह नहीं देख रहे कि इसका मीनिंग
- 1:02:26क्या है? इसका कॉज क्या है? इसका सच क्या
- 1:02:32है? जब तुम एनवायरमेंट का सच देखते हो तब
- 1:02:36वह तुम्हारी लाइफ में एक बड़ा बदलाव लाता
- 1:02:39है। एक कंप्लीट अपविवल एक पूरा आईडिया का
- 1:02:44तूफान जिसमें ना अथॉरिटी होती है ना
- 1:02:47इमिटेशन।
- 1:02:50पर बहुत कम लोग तैयार हैं उस सच को देखने
- 1:02:54के लिए क्योंकि उसका मतलब होता है चेंज एक
- 1:02:58रियल डीप
- 1:03:01रिवोल्यूशन और बहुत कम लोग बदलाव चाहते
- 1:03:05हैं इसलिए ज्यादातर लोग सिर्फ एनवायरमेंट
- 1:03:09से बचने में लगे होते
- 1:03:11हैं। वह उससे छुपते हैं या नए
- 1:03:14सब्स्टट्यूट्स ढूंढते
- 1:03:16हैं। जैसे जीसस को हटाकर नए सेवियर बना
- 1:03:20लेते हैं। पुराने टीचर्स की जगह नए टीचर्स
- 1:03:24ले आते
- 1:03:26हैं। पर यह कभी नहीं सोचते कि क्या उन्हें
- 1:03:29किसी गाइड की जरूरत भी है या नहीं। अगर
- 1:03:34सिर्फ यही पूछ लें तो वह काफी होगा। वही
- 1:03:39तुम्हारे डिमांड का असली मतलब समझा देगा।
- 1:03:44जहां भी तुम किसी सब्सीट्यूशन की तलाश
- 1:03:46करते हो, वहां अथॉरिटी जरूर होती है। किसी
- 1:03:51लीडर को फॉलो करना पड़ता है और इसलिए एक
- 1:03:55इंसान सिर्फ एक छोटा सा पार्ट बन जाता है
- 1:03:59सोसाइटी और रिलीजन के मशीन जैसे सिस्टम
- 1:04:03का। अगर तुम ध्यान से
- 1:04:05देखो तो तुम्हारी जो तलाश है वह सिर्फ
- 1:04:10कंफर्ट, सिक्योरिटी और भागने का रास्ता
- 1:04:14ढूंढने की तलाश
- 1:04:16है। वह ना समझने की तलाश है ना सच की। वो
- 1:04:21बस एक एस्केप
- 1:04:23है। और इसलिए वह हर ऑब्सकल को जीतने की
- 1:04:27कोशिश
- 1:04:28है। पर जीतने का मतलब होता है बस एक चीज
- 1:04:32के बदले दूसरी चीज रख
- 1:04:34देना। और सब्सीट्यूशन में कभी भी समझ नहीं
- 1:04:38होती।
- 1:04:40लोग रिलीजन के थ्रू भागते हैं। उनके
- 1:04:44रूल्स, मोरली स्टैंडर्ड्स, डर, अथॉरिटीज
- 1:04:49के थ्रू। और लोग भागते हैं अपने सेल्फ
- 1:04:52एक्सप्रेशन के नाम पर भी।
- 1:04:57जो तुम सेल्फ एक्सप्रेशन कहते हो, जो
- 1:05:00ज्यादातर लोग सेल्फ एक्सप्रेशन कहते हैं,
- 1:05:04वह सिर्फ एनवायरमेंट के खिलाफ एक रिएक्शन
- 1:05:06होता
- 1:05:07है। अपने आप को एक्सप्रेस करने की कोशिश
- 1:05:11होती है उस एनवायरमेंट के
- 1:05:13अगेंस्ट। आर्ट के थ्रू, साइंस के थ्रू,
- 1:05:16अलग-अलग एक्शंस के थ्रू।
- 1:05:19मैं यहां उन असली और स्पॉनटेनियस
- 1:05:21एक्सप्रेशनंस की बात नहीं कर रहा जो
- 1:05:24ब्यूटी, आर्ट या साइंस से नेचुरली निकलते
- 1:05:28हैं। वह तो अपने आप में पूरे होते
- 1:05:32हैं। मैं उन लोगों की बात कर रहा हूं जो
- 1:05:35इन चीजों का यूज करते हैं। सिर्फ अपने आप
- 1:05:37को एक्सप्रेस करने के
- 1:05:40लिए। एक रियल आर्टिस्ट अपने आर्ट को सेल्फ
- 1:05:43एक्सप्रेशन कहकर शो नहीं करता। वह बस वह
- 1:05:47चीज फील करता है और एक्सप्रेस करता
- 1:05:50है। पर दुनिया में बहुत सारे फेक आर्टिस्ट
- 1:05:54होते हैं। जैसे फेक स्पिरिचुअल लोग भी
- 1:05:57होते हैं जो सिर्फ सेल्फ एक्सप्रेशन के
- 1:06:00जरिए कुछ पाना चाहते
- 1:06:02हैं। वो सेटिस्फेक्शन जो उन्हें उनके
- 1:06:06एनवायरमेंट में नहीं मिल रहा।
- 1:06:09इसी सर्च फॉर सिक्योरिटी और परमानेंसी के
- 1:06:13चक्कर
- 1:06:14में हमने बनाई है रिलीजंस जिसमें है
- 1:06:18स्टूपिडिटी डिवाइड करना
- 1:06:21एक्सप्लइटेशन और यह सब बन गए हैं एक भाग
- 1:06:25जाने का रास्ता और यह एस्केप के रास्ते
- 1:06:28इतने स्ट्रांग और इंपॉर्टेंट बन गए
- 1:06:32हैं क्योंकि एनवायरमेंट से टकराना मतलब जो
- 1:06:36कंडीशंस हमारे आसपास हैं उनसे डील
- 1:06:39करना। उसमें लगता है बहुत बड़ा एक्शन
- 1:06:42चाहिए। एक वेंटरी और पावरफुल
- 1:06:47एक्शन। और बहुत कम लोग उसके लिए रेडी होते
- 1:06:50हैं। उल्टा तुम एनवायरमेंट के फोर्स से ही
- 1:06:54काम करने के लिए रेडी हो जाते हो।
- 1:06:57जैसे अगर कोई आदमी डिप्रेशन के चलते अच्छा
- 1:07:01और मोरल बन जाए तो तुम कहते हो क्या अच्छा
- 1:07:05इंसान है। कितना बदल
- 1:07:08गया। पर उस बदलाव का बेस भी एनवायरमेंट
- 1:07:12है। और जब तक तुम राइटियस एक्शन के लिए
- 1:07:17एनवायरमेंट पर डिपेंडेंट
- 1:07:20हो। तब तक तुम्हें एस्केप चाहिए ही।
- 1:07:24चाहे उसे रिलीजन बोलो या कुछ और
- 1:07:29लेकिन जो सच्चा आर्टिस्ट होता है, जो
- 1:07:32सच्चा स्पिरिचुअल होता है, उसकी
- 1:07:34एक्सप्रेशन स्पॉनटेनियस होती है। और वह
- 1:07:38काफी होती है, पूरी होती है, कंप्लीट होती
- 1:07:42है। तो अब तुम क्या कर रहे हो? तुम्हारी
- 1:07:47लाइफ में क्या हो रहा है? तुम क्या करने
- 1:07:49की कोशिश में हो? तुम ढूंढ रहे हो पर क्या
- 1:07:54ढूंढ रहे
- 1:07:56हो? एक स्ट्रगल चल रहा है तुम्हारे और
- 1:07:59कास्टेंटली बदलते एनवायरमेंट के
- 1:08:02बीच। तुम ढूंढ रहे हो एक ऐसा रास्ता जिससे
- 1:08:06तुम एनवायरमेंट को हरा सको।
- 1:08:10ताकि तुम अपने आप को बना सको जो कि खुद
- 1:08:13एनवायरमेंट का रिजल्ट
- 1:08:15है। या हो सकता है कि तुम्हारा एनवायरमेंट
- 1:08:19बार-बार तुम्हारे सेल्फ एक्सप्रेशन को
- 1:08:22रोकता आया है। और इसी वजह से तुम नए तरीके
- 1:08:26ढूंढते हो अपने आप को एक्सप्रेस करने के।
- 1:08:30जैसे ह्यूमैनिटी की सेवा, इकोनॉमिक
- 1:08:32सिस्टम्स और और भी बहाने।
- 1:08:36हर किसी को यह समझना होगा कि वह असल में
- 1:08:39क्या ढूंढ रहा है और अगर वह कुछ ढूंढ नहीं
- 1:08:42रहा तो उसका मतलब है वह सेटिस्फाइड है और
- 1:08:46डीके शुरू हो गया
- 1:08:49है और अगर स्ट्रगल है तो इच्छा है उस
- 1:08:53स्ट्रगल को जीतने की या उससे भागने की या
- 1:08:57उस पर राज करने की पर जैसे मैंने
- 1:09:01कहा कॉन्फ्लिक्ट सिर्फ तब होता है जब दो
- 1:09:05झूठ टकराते हैं। एक तरफ वह आई जिसे तुम
- 1:09:10रियल कहते हो जो मेरे लिए सिर्फ
- 1:09:13एनवायरमेंट का रिजल्ट है और दूसरी तरफ खुद
- 1:09:18एनवायरमेंट। अगर तुम्हारा दिमाग सिर्फ इस
- 1:09:21स्ट्रगल को जीतने में लगा हुआ है तो तुम
- 1:09:25सिर्फ झूठ को और बढ़ा रहे हो और इसलिए और
- 1:09:29ज्यादा कॉन्फ्लिक्ट आएगा और ज्यादा दुख।
- 1:09:34लेकिन अगर तुम एनवायरमेंट का असली मतलब
- 1:09:36समझने लग जाओ जैसे पैसा, गरीबी,
- 1:09:41एक्सप्लइटेशन, दबाव, जाति,
- 1:09:44रिलीजन और मॉडर्न जिंदगी की सब बेकार
- 1:09:48चीजें। अगर तुम इन्हें जीतने की नहीं
- 1:09:51बल्कि समझने की कोशिश करो तो फिर आएगा
- 1:09:54इंडिविजुअल एक्शन और एक कंप्लीट
- 1:09:57रिवोल्यूशनरी बदलाव सोच में।
- 1:10:03तब स्ट्रगल नहीं होगा। बस रोशनी अंधेरे को
- 1:10:06मिटा
- 1:10:07देगी। रोशनी और अंधेरे के बीच कभी
- 1:10:11कॉन्फ्लिक्ट नहीं होता। सच और झूठ के बीच
- 1:10:14कॉन्फ्लिक्ट नहीं होता।
- 1:10:18कॉन्फ्लिक्ट सिर्फ तब होता है जब दो
- 1:10:22अपोजिट्स टकराते हैं।
- 1:10:27ओजाई
- 1:10:29कैलिफोर्निया जून 16
- 1:10:391934 द सिग्निफिकेंस ऑफ एनवायरमेंट।
- 1:10:44एनवायरमेंट का असली
- 1:10:48मतलब शायद तुम्हें याद हो कल मैंने बात की
- 1:10:52थी कॉन्फ्लिक्ट के जन्म के बारे
- 1:10:55में और कैसे दिमाग उसका स्यूशन ढूंढने
- 1:10:58लगता
- 1:11:00है हर सुबह मैं पूरी बात करना चाहता हूं
- 1:11:05कॉन्फ्लिक्ट और डिसहार्मोनी के कांसेप्ट
- 1:11:10पर और दिखाना चाहता हूं कि कितना इतना
- 1:11:13बेकार है यह ट्राई करना कि दिमाग उसका
- 1:11:16स्यूशन
- 1:11:18ढूंढे क्योंकि सिर्फ स्यूशन ढूंढने से
- 1:11:21कॉन्फ्लिक्ट खत्म नहीं
- 1:11:24होता। जब तुम स्यूशन ढूंढते हो कोई रास्ता
- 1:11:29कॉन्फ्लिक्ट को खत्म करने
- 1:11:31का तो तुम सिर्फ एक नए आइडिया एक नई
- 1:11:35थ्योरी को उस जगह पर ला रहे होते हो।
- 1:11:40या तुम कॉन्फ्लिक्ट से पूरी तरह भाग जाते
- 1:11:44हो। जब लोग अपने कॉन्फ्लिक्ट का स्यूशन
- 1:11:47चाहते हैं तो वही करते हैं। अगर तुम ध्यान
- 1:11:52से
- 1:11:53देखो तो जब भी कॉन्फ्लिक्ट होता है तुम
- 1:11:57तुरंत उसका स्यूशन ढूंढने लगते
- 1:12:00हो। तुम उससे निकलने का रास्ता चाहते हो
- 1:12:04और ज्यादातर केसेस में तुम्हें कोई रास्ता
- 1:12:07मिल भी जाता है।
- 1:12:10लेकिन तुमने कॉन्फ्लिक्ट सॉल्व नहीं किया
- 1:12:15होता। तुमने बस उसे शिफ्ट कर दिया होता है
- 1:12:20एक नए एनवायरमेंट नए कंडीशन के
- 1:12:23थ्रू। और वह नए कंडीशन भी फिर नए
- 1:12:27कॉन्फ्लिक्ट लाता
- 1:12:29है। तो चलो इस पूरे कॉन्फ्लिक्ट की बात
- 1:12:34करें। वह आता कहां से है और हम
- 1:12:38उसका क्या कर सकते
- 1:12:41हैं? अब कॉन्फ्लिक्ट एनवायरमेंट का रिजल्ट
- 1:12:45है। है
- 1:12:47ना? एक और तरीके से बोलो तो एनवायरमेंट
- 1:12:51क्या होता
- 1:12:53है? तुम एनवायरमेंट को कब महसूस करते हो?
- 1:12:58सिर्फ तब जब तुम उससे टकराते हो या उसे
- 1:13:02रेजिस्ट करते हो।
- 1:13:05अगर तुम अपनी जिंदगी को देखो तो तुम पाओगे
- 1:13:10कि कॉन्फ्लिक्ट बार-बार तुम्हारी लाइफ को
- 1:13:12घुमाता है। उसे तोड़ता है। उसके शेप को
- 1:13:16चेंज करता है। और
- 1:13:20इंटेलिजेंस जो दिमाग और दिल का परफेक्ट
- 1:13:23बैलेंस होता है, उसका तुम्हारी लाइफ में
- 1:13:26कोई रोल ही नहीं बचा होता।
- 1:13:29मतलब एनवायरमेंट बार-बार तुम्हारी लाइफ को
- 1:13:33धक्का देता
- 1:13:35है। उसे एक्शन में लाता है। उसे मोल्ड
- 1:13:39करता
- 1:13:40है। और इस चलते फिरते तोड़ने, मोड़ने,
- 1:13:45घुमाने के प्रोसेस से ही कॉन्फ्लिक्ट पैदा
- 1:13:48होता
- 1:13:49है। तो जहां यह कास्टेंट कॉन्फ्लिक्ट होता
- 1:13:53है, वहां इंटेलिजेंस हो ही नहीं सकती।
- 1:13:58फिर भी हम सोच लेते हैं कि कॉन्फ्लिक्ट के
- 1:14:01थ्रू ही हम इंटेलिजेंट
- 1:14:04बनेंगे, फुलफिलमेंट पाएंगे और अल्टीमेट
- 1:14:07हैप्पीनेस या एक्सटसी तक पहुंच
- 1:14:12जाएंगे। पर कॉन्फ्लिक्ट इकट्ठा करके तुम
- 1:14:15कभी समझदारी से जीना नहीं सीख सकते।
- 1:14:20समझदारी से जीना तभी सीखोगे जब तुम उस
- 1:14:24एनवायरमेंट को समझोगे जो कॉन्फ्लिक्ट
- 1:14:27क्रिएट कर रहा
- 1:14:29है और सिर्फ नए कंडीशंस लाके सब्सीट्यूशन
- 1:14:33करके तुम कुछ सॉल्व नहीं कर रहे हो लेकिन
- 1:14:38अगर तुम ऑब्जर्व
- 1:14:40करो तो जब भी कॉन्फ्लिक्ट होता है दिमाग
- 1:14:43तुरंत सब्सीट्यूशन ढूंढता है। हम कहते हैं
- 1:14:47यह तो हेरिडिटी की वजह से है। यह इकोनॉमिक
- 1:14:51प्रॉब्लम है या पास्ट का एनवायरमेंट
- 1:14:54रिस्पांसिबल
- 1:14:55है। या फिर हम कर्म, पुनर्जन्म या
- 1:14:59इवोल्यूशन पर भरोसा करते
- 1:15:02हैं। हम सिर्फ रीजन देते रहते हैं उस
- 1:15:05कॉन्फ्लिक्ट के लिए जिसमें दिमाग फंसा हुआ
- 1:15:09है। पर हम यह देखते ही नहीं कि
- 1:15:12कॉन्फ्लिक्ट आया कहां से। मतलब
- 1:15:16एनवायरमेंट का असली मतलब समझने की कोशिश
- 1:15:19ही नहीं करते। तो कॉन्फ्लिक्ट सिर्फ तब तक
- 1:15:23है जब तक एनवायरमेंट और आई के बीच रिएक्शन
- 1:15:26है। यह आई भी तो एनवायरमेंट का रिजल्ट ही
- 1:15:31है। एनवायरमेंट हो सकता है इकोनॉमिक या
- 1:15:35सोशल कंडीशन, पॉलिटिक्स,
- 1:15:39पड़ोसी और आई भी वहीं से बना
- 1:15:43है। ज्यादा लोगों को इस कॉन्फ्लिक्ट का
- 1:15:46पता ही नहीं होता।
- 1:15:49जो आई बना है एनवायरमेंट के कारण और
- 1:15:52एनवायरमेंट खुद दोनों के बीच चल रहा होता
- 1:15:55है कास्टेंट
- 1:15:58स्ट्रगल पर लोग इस कंटीन्यूअस फाइट को
- 1:16:01महसूस ही नहीं करते सिर्फ कुछ ही लोग इस
- 1:16:05टकराव डिसहार्मनी और स्ट्रगल को समझते
- 1:16:08हैं। और वह भी तब जब दर्द बहुत गहरा हो
- 1:16:13जाता है। है ना?
- 1:16:17सिर्फ जब दर्द ज्यादा इंटेंस हो तभी
- 1:16:20तुम्हें अपने अंदर का कॉन्फ्लिक्ट दिखाई
- 1:16:22देता
- 1:16:26है। पर जब तुम इस कॉन्फ्लिक्ट को महसूस
- 1:16:30करते
- 1:16:31हो जब तुम दर्द के उस गहरे मोमेंट में
- 1:16:35फुल्ली अवेयर हो जाते हो तब ज्यादा लोग
- 1:16:38तुरंत एक स्यूशन चाहते हैं। एक तुरंत
- 1:16:41रिलीफ, एक तुरंत
- 1:16:44आंसर। वह दर्द से बचने के लिए हर तरह के
- 1:16:47एस्केप ढूंढने लगते हैं। जैसे रिलीजन,
- 1:16:51एक्साइटमेंट, मीनिंगलेस
- 1:16:54चीजें। और वह सब छुपी हुई स्केप के रास्ते
- 1:16:58जो हमने बनाए हैं अपने आप को बचाने के
- 1:17:01लिए।
- 1:17:02दर्द तुम्हें इस कॉन्फ्लिक्ट के बारे में
- 1:17:04जगाता
- 1:17:06है। पर सिर्फ दर्द से तुम उस फुलफिलमेंट
- 1:17:10तक नहीं पहुंचते।
- 1:17:12क्योंकि दर्द सिर्फ दिमाग को ज्यादा शार्प
- 1:17:16बनाता है। और जब दिमाग शार्प हो जाता है
- 1:17:20तो वह सवाल करना शुरू करता
- 1:17:23है अपने एनवायरमेंट से, अपनी कंडीशन से और
- 1:17:29इसी क्वेश्चनिंग में इंटेलिजेंस कम करने
- 1:17:32लगता
- 1:17:33है। और सिर्फ वही इंटेलिजेंस तुम्हें ले
- 1:17:37जा सकती है उस
- 1:17:39फुलनेस उस लाइफ के सच्चे टेस्ट तक और दर्द
- 1:17:43के असली मतलब तक।
- 1:17:46इंटेलिजेंस तभी काम करती है जब दर्द इतना
- 1:17:49गहरा हो जाता है कि दिमाग और दिल दोनों
- 1:17:53भागना बंद कर देते
- 1:17:55हैं। उन सब रास्ते से भागना बंद जो तुमने
- 1:17:59बड़ी चालाकी से बनाए
- 1:18:02हैं। जो दिखते हैं लॉजिकल, रियल, सच्चे।
- 1:18:09अगर तुम बिना बायस के ध्यान से देखो तो
- 1:18:13तुम देखोगे कि जब तक तुम भाग रहे हो तब तक
- 1:18:18तुम कॉन्फ्लिक्ट का सामना नहीं कर
- 1:18:20रहे और तब तक तुम्हारा दर्द सिर्फ
- 1:18:24इग्नोरेंस को और बड़ा कर रहा है
- 1:18:28मतलब जब तुम इन सब जाने पहचाने रास्ते से
- 1:18:33भागना बंद कर देते हो तब उस दर्द के गहरे
- 1:18:37मोमेंट में इंटेलिजेंस काम करना शुरू करती
- 1:18:43है। प्लीज मैं तुम्हें कोई एग्जांपल
- 1:18:47या सिमली नहीं देना
- 1:18:50चाहता क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम खुद
- 1:18:55सोचो। अगर मैं एग्जांपल दूं तो सारा सोचना
- 1:19:00मैं ही कर लेता हूं और तुम सिर्फ सुनते
- 1:19:02हो।
- 1:19:04लेकिन अगर तुम सोचना शुरू करो जो मैं कह
- 1:19:07रहा
- 1:19:08हूं तो तुम देख पाओगे समझ पाओगे कि दिमाग
- 1:19:14जो इतना आदत में पड़ चुका है सब्सीट्यूशन
- 1:19:18अथॉरिटी और एस्केप की वह कभी भी उस गहरे
- 1:19:22दर्द के पॉइंट तक नहीं
- 1:19:24पहुंचता जहां इंटेलिजेंस को काम करना
- 1:19:27पड़ता
- 1:19:29है और सिर्फ तभी जब इंटेलिजेंस पूरी तरह
- 1:19:33से काम करता है तभी कॉन्फ्लिक्ट के कॉज का
- 1:19:37पूरा खात्मा हो सकता
- 1:19:40है। जब तक हम एनवायरमेंट को समझते नहीं तब
- 1:19:44तक कॉन्फ्लिक्ट हमेशा
- 1:19:47रहेगा। एनवायरमेंट कॉन्फ्लिक्ट को जन्म
- 1:19:50देता है। और जब तक हम एनवायरमेंट
- 1:19:54कंडीशंस सराउंडिंग्स को समझे
- 1:19:57बिना सिर्फ उनके लिए नए सब्सीट्यूट्स
- 1:20:01ढूंढते हैं। तब तक हम एक कॉन्फ्लिक्ट से
- 1:20:05भागकर दूसरे में जा रहे हैं।
- 1:20:09लेकिन अगर उस गहरे दर्द के मोमेंट में
- 1:20:13जहां कॉन्फ्लिक्ट अपने प्योर फॉर्म में
- 1:20:16सामने आता
- 1:20:18है। अगर उस मोमेंट में हम एनवायरमेंट को
- 1:20:22क्वेश्चन करते हैं तो हम एनवायरमेंट की
- 1:20:26असली वैल्यू समझने लगते हैं। और तब
- 1:20:29इंटेलिजेंस नेचुरली काम करता
- 1:20:33है। अब तक दिमाग ने खुद को कॉन्फ्लिक्ट,
- 1:20:37एनवायरमेंट और एस्केप से जोड़ लिया था।
- 1:20:41इसलिए दर्द भी लगातार चलता
- 1:20:45रहा। तुम कहते हो मैं सफर कर रहा हूं।
- 1:20:50लेकिन जब दर्द इतना गहरा हो जाता है कि
- 1:20:53एस्केप का कोई रास्ता नहीं बचा। तभी दिमाग
- 1:20:57खुद इंटेलिजेंस बन जाता
- 1:20:59है। एक और सिंपल तरीके से बोलो।
- 1:21:04तो जब तक हम स्यूशन ढूंढ रहे हैं,
- 1:21:07सब्सीटशंस चाह रहे हैं, अथॉरिटी को फॉलो
- 1:21:11कर रहे हैं कॉन्फ्लिक्ट के रीजन और उससे
- 1:21:14बचने के लिए तब तक दिमाग किसी एक चीज से
- 1:21:18चिपका रहता है।
- 1:21:21लेकिन अगर दिमाग उस इंटेंस सफरिंग में हो
- 1:21:24जहां हर एस्केप का रास्ता बंद हो चुका हो
- 1:21:28तब इंटेलिजेंस अपने आप जाग जाती है। और
- 1:21:32नेचुरली बिना फोर्स के काम करती
- 1:21:37है। अगर तुम इस बात को खुद टेस्ट करो तो
- 1:21:41तुम देखोगे कि मैं तुम्हें थ्यरी नहीं दे
- 1:21:44रहा बल्कि एक ऐसी बात बताता हूं जिसे तुम
- 1:21:48खुद यूज कर सकते हो। एक प्रैक्टिकल
- 1:21:52बात तुम्हारे ऊपर बहुत सारे एनवायरमेंट्स
- 1:21:55थोपे गए हैं। सोसाइटी, रिलीजन, इकोनॉमिक
- 1:22:00कंडीशंस, सोशल डिवाइड, एक्सप्लइटेशन और
- 1:22:04पॉलिटिक्स के थ्रू।
- 1:22:08आई जो है तुम्हारे अंदर वह सब इसी फोर्स
- 1:22:12और प्रेशर से बना है। और अब वही आई उस
- 1:22:16एनवायरमेंट से लड़ रहा है। इसलिए
- 1:22:18कॉन्फ्लिक्ट
- 1:22:20है। नए एनवायरमेंट बनाने का कोई फायदा
- 1:22:24नहीं। क्योंकि वही पुरानी चीज फिर से वापस
- 1:22:28आएगी।
- 1:22:30पर अगर उस कॉन्फ्लिक्ट के अंदर एक
- 1:22:32कॉन्शियस दर्द हो और हमेशा कॉन्फ्लिक्ट
- 1:22:36में दर्द होता ही है।
- 1:22:41लेकिन इंसान उससे भाग जाता है और
- 1:22:43सब्स्टट्यूट ढूंढने लगता
- 1:22:45है। अगर उस इंटेंस दर्द के मोमेंट में तुम
- 1:22:50सब्स्टट्यूट ढूंढना बंद कर दो और सच का
- 1:22:53सामना करो। तो तुम देखोगे कि दिमाग जो
- 1:22:58इंटेलिजेंस का टोटल होता है वह एनवायरमेंट
- 1:23:01की असली वैल्यू को देखना शुरू करता
- 1:23:05है और तब तुम समझोगे कि दिमाग कॉन्फ्लिक्ट
- 1:23:09से फ्री हो गया है। उस गहरे दर्द के
- 1:23:13मोमेंट में ही उसका अपना खात्मा छुपा होता
- 1:23:16है। यही कॉन्फ्लिक्ट के कॉज को समझने का
- 1:23:20असली रास्ता
- 1:23:21है। एक बात और याद रखनी
- 1:23:25चाहिए जो हम कहते हैं सौरों का इकट्ठा
- 1:23:30होना वह इंटेंसिटी नहीं लाता ना ही सफरिंग
- 1:23:34का बढ़ जाने से वह अपने आप खत्म होती है।
- 1:23:38दर्द के वक्त दिमाग तभी शार्प होता है जब
- 1:23:41वह भागना बंद कर देता है और जब तक दिमाग
- 1:23:45भाग रहा है तब तक कोई कॉन्फ्लिक्ट उसे
- 1:23:49जगाती नहीं।
- 1:23:52क्योंकि एस्केप में कभी इंटेलिजेंस नहीं
- 1:23:54होती। एक और शॉर्ट में बोलूं तो सब लोग
- 1:23:58सफरिंग और क्फ्लिक्ट में फंसे हुए हैं। पर
- 1:24:02ज्यादा लोगों को उसका पता ही नहीं। वह
- 1:24:05सिर्फ स्यूशन, सब्स्टट्यूट और एस्केप ढूंढ
- 1:24:08रहे हैं।
- 1:24:11लेकिन अगर वह एस्केप ढूंढना बंद कर दें और
- 1:24:14उस एनवायरमेंट को क्वेश्चन करना शुरू कर
- 1:24:16दें जो कॉन्फ्लिक्ट ला रहा है तो दिमाग
- 1:24:20शार्प हो जाता है, जिंदा हो जाता है,
- 1:24:23इंटेलिजेंट हो जाता
- 1:24:25है। उस इंटेंसिटी में ही दिमाग बन जाता है
- 1:24:28इंटेलिजेंस।
- 1:24:30और तब वह देख पाता है एनवायरमेंट की असली
- 1:24:34वैल्यू और
- 1:24:35मीनिंग जो कॉन्फ्लिक्ट को क्रिएट कर रहा
- 1:24:39था। मुझे पता है आधे लोग यह बात नहीं समझे
- 1:24:43होंगे लेकिन कोई बात
- 1:24:46नहीं। तुम इतना कर सकते हो कि इस बात पे
- 1:24:49सीरियसली सोचो। सच्चे दिल से सोचो और देखो
- 1:24:55कि जो मैं कह रहा हूं वह सच है या नहीं।
- 1:25:00लेकिन सोचने का मतलब यह नहीं कि तुम बस
- 1:25:03दिमाग से घूमते रहो और बात को खत्म कर
- 1:25:08दो। अगर तुम सच में समझना चाहते हो कि यह
- 1:25:11बात सच है या नहीं तो तुम्हें इसे एक्शन
- 1:25:16में लाना
- 1:25:17होगा। और एक्शन में लाने के लिए तुम्हें
- 1:25:20एनवायरमेंट को क्वेश्चन करना होगा।
- 1:25:24मतलब अगर तुम कॉन्फ्लिक्ट में हो तो
- 1:25:28तुम्हें नेचुरली अपने एनवायरमेंट को देखना
- 1:25:30होगा।
- 1:25:32लेकिन ज्यादा लोगों के दिमाग इतने उल्टे
- 1:25:35हो गए हैं कि उन्हें पता ही नहीं कि वह
- 1:25:37स्यूशन एस्केप और थरीज के पीछे भाग रहे
- 1:25:42हैं। वह बिल्कुल परफेक्ट लॉजिक लगाते हैं।
- 1:25:46पर वह लॉजिक भी बस एस्केप ढूंढने के लिए
- 1:25:50होता है और उन्हें इसका पता भी नहीं
- 1:25:54होता। तो अगर कॉन्फ्लिक्ट है और अगर तुम
- 1:25:58उस कॉन्फ्लिक्ट का रीजन समझना चाहते हो
- 1:26:01तो दिमाग को नेचुरली उसे ढूंढना होगा
- 1:26:06शार्प थिंकिंग के
- 1:26:07थ्रू और इसलिए तुम्हें क्वेश्चन करना
- 1:26:11पड़ेगा उन सब चीजों को जो एनवायरमेंट ने
- 1:26:15तुम्हारे आसपास रखा है जैसे तुम्हारा
- 1:26:19परिवार तुम्हारे पड़ोसी तुम्हारा धर्म
- 1:26:23तुम्हारी पॉलिटिकल
- 1:26:26अथॉरिटी और जब तुम इन सबको क्वेश्चन करोगे
- 1:26:29तब एनवायरमेंट के अगेंस्ट एक्शन
- 1:26:32होगा। परिवार है, पड़ोसी है और स्टेट है।
- 1:26:37और जब तुम उनका मतलब क्वेश्चन करते हो तब
- 1:26:41तुम देखते हो कि इंटेलिजेंस एकदम नेचुरल
- 1:26:44होती है। ना उसे सीखना पड़ता है ना बनाना
- 1:26:49पड़ता
- 1:26:50है। जब तुम अवेयर होते हो तो वही अवेयरनेस
- 1:26:54इंटेलिजेंस का फूल बन जाती है।
- 1:27:00सवाल करने
- 1:27:02वाले आप कहते हैं कि आई एनवायरमेंट का
- 1:27:05रिजल्ट है। क्या आपका मतलब है कि अगर
- 1:27:08परफेक्ट एनवायरमेंट हो तो आई का
- 1:27:11कॉन्शियसनेस डेवलप नहीं होगा। अगर हां तो
- 1:27:14जो परफेक्ट फ्रीडम की बात आप करते हैं वह
- 1:27:17सिर्फ सही एनवायरमेंट बनाने की बात बन
- 1:27:19जाती है। क्या यह सही है?
- 1:27:28रुको
- 1:27:30जरा। क्या कभी परफेक्ट एनवायरमेंट हो सकता
- 1:27:34है? नहीं हो
- 1:27:36सकता। तो चलो इस बात को मिलके समझते हैं।
- 1:27:39पूरा एक्सप्लोर करते हैं। एनवायरमेंट क्या
- 1:27:43है? यह पूरा ह्यूमन स्ट्रक्चर बना है
- 1:27:47इंसान के डर, चाह, उम्मीद, इच्छा और
- 1:27:52सक्सेस से।
- 1:27:54अब तुम एक परफेक्ट एनवायरमेंट नहीं बना
- 1:27:57सकते क्योंकि हर आदमी अपनी इच्छा और सोच
- 1:28:01के हिसाब से नए कंडीशंस क्रिएट करता रहता
- 1:28:04है। लेकिन अगर तुम्हारा दिमाग इंटेलिजेंट
- 1:28:07है तो तुम इन सब
- 1:28:12झूठी एनवायरमेंट्स के पार देख सकते
- 1:28:17हो। और इसलिए तुम आई के कॉन्शियसनेस से
- 1:28:21फ्री हो जाते हो।
- 1:28:24देखो आई कॉन्शियसनेस यानी मेरा
- 1:28:29सोचना। वह एनवायरमेंट का रिजल्ट ही तो है।
- 1:28:32है ना?
- 1:28:35मुझे नहीं लगता इस बात पर ज्यादा डिस्कशन
- 1:28:38की जरूरत
- 1:28:39है क्योंकि यह बिल्कुल साफ है। अगर स्टेट
- 1:28:44तुम्हें घर दे दे और तुम्हारी सब जरूरत की
- 1:28:47चीजें दे दे तो मेरा घर वाली फीलिंग की
- 1:28:51जरूरत नहीं होती। हो सकता है कोई और मेरा
- 1:28:55का सेंस आए।
- 1:28:58लेकिन अब हम यहां एक पर्टिकुलर चीज की बात
- 1:29:01कर रहे हैं। अभी तुम्हारे केस में ऐसा
- 1:29:04नहीं हुआ।
- 1:29:06इसलिए मेरा का सेंस है, पोजेसिवनेस
- 1:29:10है और यह एनवायरमेंट का रिजल्ट है। वो आई
- 1:29:15सिर्फ एनवायरमेंट का झूठा रिएक्शन है।
- 1:29:22लेकिन अगर दिमाग एनवायरमेंट को क्वेश्चन
- 1:29:25करना शुरू करे तो फिर रिएक्शन ही नहीं
- 1:29:28होता एनवायरमेंट के साथ।
- 1:29:31इसलिए हमें यह सोचने की जरूरत नहीं है कि
- 1:29:34कोई परफेक्ट एनवायरमेंट बन सकता है या
- 1:29:38नहीं।
- 1:29:40देखो परफेक्ट एनवायरमेंट होता क्या है? हर
- 1:29:44आदमी तुम्हें अलग जवाब देगा। आर्टिस्ट कुछ
- 1:29:47और बोलेगा, बिजनेसमैन कुछ और, एक्ट्रेस
- 1:29:51कुछ
- 1:29:52और। हर आदमी के लिए परफेक्ट एनवायरमेंट
- 1:29:56वही है जो उसे सेटिसफाई करें।
- 1:30:00जो उसके अंदर कॉन्फ्लिक्ट ना
- 1:30:03बनाए। तो परफेक्ट एनवायरमेंट का मतलब ही
- 1:30:06हर किसी के लिए अलग होता है। इसीलिए
- 1:30:10परफेक्ट एनवायरमेंट पॉसिबल ही नहीं। लेकिन
- 1:30:13अगर इंटेलिजेंस हो तो एनवायरमेंट की कोई
- 1:30:17वैल्यू ही नहीं बची। क्योंकि इंटेलिजेंस
- 1:30:20फिर फ्री होता है हर कंडीशन से। वह पूरी
- 1:30:24तरह काम करता है। सवाल यह नहीं है कि हम
- 1:30:28परफेक्ट एनवायरमेंट बना सकते हैं या नहीं।
- 1:30:32सवाल यह है कि हम कैसे उस इंटेलिजेंस को
- 1:30:36जगाएं जो एनवायरमेंट से बिल्कुल फ्री हो।
- 1:30:40चाहे वह परफेक्ट हो या
- 1:30:43इंपपरफेक्ट। मैं कहता हूं तुम इस
- 1:30:46इंटेलिजेंस को तब जगा सकते हो जब तुम उस
- 1:30:50एनवायरमेंट की पूरी वैल्यू को क्वेश्चन
- 1:30:52करो। जिसमें तुम्हारा दिमाग फंसा हुआ
- 1:30:57है। तब तुम देखोगे कि तुम किसी पर्टिकुलर
- 1:31:01एनवायरमेंट से फ्री हो गए हो। क्योंकि अब
- 1:31:04तुम इंटेलिजेंटली फंक्शन कर रहे हो।
- 1:31:08एनवायरमेंट तुम्हें ट्विस्ट या शेप नहीं
- 1:31:11कर रहा।
- 1:31:16सवाल आप जो कह रहे हैं क्या आप सच में वही
- 1:31:21मतलब निकाल रहे हैं जब मैं दुनिया में
- 1:31:24इतनी बुराई देखता हूं तो मेरे अंदर एक
- 1:31:27स्ट्रांग इच्छा होती है उसके खिलाफ लड़ने
- 1:31:29की और उस दुख के खिलाफ जो वह इंसानों की
- 1:31:32जिंदगी में लाती है इसका मतलब होता है
- 1:31:35बड़ा
- 1:31:38कॉन्फ्लिक्ट क्योंकि जब मैं हेल्प करता
- 1:31:40हूं तो लोग मुझे फोर्सफुली अपोज करते हैं
- 1:31:43तो फिर आप कैसे कह सकते
- 1:31:45हैं कि सच और झूठ के बीच कोई कॉन्फ्लिक्ट
- 1:31:49नहीं होता।
- 1:31:56मैंने कल कहा था कि स्ट्रगल सिर्फ दो झूठ
- 1:32:00चीजों के बीच होता
- 1:32:03है। कॉन्फ्लिक्ट होता है एनवायरमेंट और
- 1:32:06एनवायरमेंट के
- 1:32:08रिजल्ट यानी आई के बीच और इन दोनों के बीच
- 1:32:13आई ने बनाई है कई स्केप के रास्ते जिसे हम
- 1:32:17कहते हैं वाइस गुडनेस मोरलिटी मोरलील
- 1:32:22स्टैंडर्ड्स डर और और भी बहुत सारे
- 1:32:27अपोजिट्स तो स्ट्रगल सिर्फ इन दोनों के
- 1:32:30बीच होता है एनवायरमेंट के झूठे क्रिएशन
- 1:32:34यानी आई और खुद एनवायरमेंट के बीच।
- 1:32:40लेकिन सच और झूठ के बीच कभी स्ट्रगल नहीं
- 1:32:43होता। यह बात तो बिल्कुल साफ है। है
- 1:32:47ना? हो सकता है तुम्हें लोग बुरी तरीके से
- 1:32:51अपोज करें। क्योंकि वह आदमी इग्नोरेंट है।
- 1:32:56इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हें फाइट नहीं
- 1:32:59करनी चाहिए। पर तुम यह मत समझना कि
- 1:33:02तुम्हारा फाइट करना राइट है। देखो हर काम
- 1:33:07का एक नेचुरल तरीका होता
- 1:33:10है। एक स्पॉनटेनियस और मीठा तरीका बिना उस
- 1:33:15अग्रेसिव वायलेंट मैं सही हूं के एटीट्यूड
- 1:33:21के। सबसे पहले अगर तुम्हें फाइट करनी है
- 1:33:25तो तुम्हें यह समझना होगा कि तुम किस चीज
- 1:33:27से लड़ रहे हो।
- 1:33:30इसका मतलब है तुम्हें बेसिक फंडामेंटल बात
- 1:33:34समझनी होगी ना कि दो झूठ चीजों के बीच के
- 1:33:38डिवाइड को।
- 1:33:40अभी हम इतने ज्यादा कॉन्शियस हैं। इतने
- 1:33:45अवेयर हैं इन झूठी चीजों के बीच के
- 1:33:47डिफरेंस को, एनवायरमेंट और उसके रिजल्ट के
- 1:33:51बीच कि हम उनसे लड़ते हैं। और इसलिए हम
- 1:33:54रिफॉर्म चाहते हैं, बदलाव चाहते हैं।
- 1:33:58लेकिन बिना पूरे इंसानी जिंदगी के
- 1:34:01स्ट्रक्चर को बदले।
- 1:34:04मतलब हम आई कॉन्शियसनेस को बचाए रखना
- 1:34:08चाहते हैं जो कि एनवायरमेंट का एक झूठा
- 1:34:12रिएक्शन है और फिर भी दुनिया को बदलना
- 1:34:16चाहते हैं। सीधी बात यह है कि तुम चाहते
- 1:34:20हो तुम्हारा अपना बैंक अकाउंट हो। अपनी
- 1:34:23चीजें हो। तुम मेरा का फीलिंग रखना चाहते
- 1:34:27हो। और फिर भी चाहते हो कि दुनिया ऐसी हो
- 1:34:30जहां मेरा और तेरा का कांसेप्ट ही ना
- 1:34:34हो। तो असली काम यह है देखना कि क्या तुम
- 1:34:38बेसिक बात से डील कर रहे हो या सिर्फ ऊपर
- 1:34:42ऊपर की बातों
- 1:34:44से। मेरे लिए ऊपर ऊपर की बात तब तक रहेगी
- 1:34:48जब तक तुम सिर्फ एनवायरमेंट को चेंज करके
- 1:34:52कॉन्फ्लिक्ट को कम करने की सोच में हो।
- 1:34:56मतलब तुम अभी भी आई को पकड़े हुए हो। पर
- 1:35:00चाहते हो कि कंडीशंस ऐसे हो जाए कि वह आई
- 1:35:04कॉन्फ्लिक्ट फील ना
- 1:35:07करें। मैं इसे कहता हूं सुपरफिशियल
- 1:35:12सोच। और इससे ही आता है सुपरफिशियल एक्शन।
- 1:35:18लेकिन अगर तुम बेसिक लेवल पर
- 1:35:20सोचो मतलब तुम खुद एनवायरमेंट के रिजल्ट
- 1:35:23को यानी आई को क्वेश्चन
- 1:35:26करो और इसलिए खुद एनवायरमेंट को क्वेश्चन
- 1:35:29करो तो फिर तुम फंडामेंटली काम कर रहे हो
- 1:35:34और वही काम रियल होता है लास्टिंग होता है
- 1:35:38और उसमें एक आनंद होता है एक जॉय जो अभी
- 1:35:42तुम नहीं जानते क्योंकि तुम बेसिक तरीके
- 1:35:46से एक्ट करना करने से डरते
- 1:35:49हो।
- 1:35:52सवाल कल आपने कहा था कि एनवायरमेंट एक
- 1:35:55झूठी मूवमेंट है। क्या आप नेचर के सब
- 1:35:58क्रिएशन को भी एनवायरमेंट में इंक्लूड
- 1:36:00करते हैं? जैसे ह्यूमन
- 1:36:08फॉर्म। क्या एनवायरमेंट लगातार चेंज नहीं
- 1:36:12होता? होता है ना? ज्यादा लोगों के लिए तो
- 1:36:16नहीं होता क्योंकि चेंज का मतलब होता है
- 1:36:19कास्टेंटली एडजस्ट करना और इसलिए दिमाग का
- 1:36:24हमेशा अवेयर रहना।
- 1:36:27पर ज्यादा लोग बस स्टेबल एनवायरमेंट में
- 1:36:29जीना चाहते हैं। लेकिन एनवायरमेंट तो चल
- 1:36:33ही रहा होता है क्योंकि वह आपके कंट्रोल
- 1:36:37के बाहर है और जब तक आप उसका मतलब नहीं
- 1:36:41समझते तब तक वह झूठा ही होता
- 1:36:46है। क्या एनवायरमेंट में ह्यूमन फॉर्म्स
- 1:36:49आते हैं? तो फिर तुम उन्हें नेचर से अलग
- 1:36:52क्यों करते हो?
- 1:36:54देखो हम नेचर से ज्यादा कंसर्न नहीं है
- 1:36:59क्योंकि हमने उस पर लगभग कंट्रोल पा लिया
- 1:37:02है।
- 1:37:04लेकिन हमने जो ह्यूमन एनवायरमेंट बनाया है
- 1:37:08उसे हम समझ नहीं पाए हैं।
- 1:37:11सोचो इंसान और इंसान के बीच के रिलेशन को
- 1:37:16और वह सब कंडीशन जो इंसान ने बनाई है
- 1:37:20उन्हें हम अभी तक नहीं समझ पाए। चाहे हमने
- 1:37:23साइंस से नेचर को काफी हद तक समझ लिया
- 1:37:28हो तो हम उस एनवायरमेंट के स्टेबिलिटी से
- 1:37:31कंसर्न नहीं है जो हम समझ गए
- 1:37:35हैं क्योंकि जैसे ही तुम उसे समझ लेते
- 1:37:41हो कॉन्फ्लिक्ट खत्म हो जाता है हम चाहते
- 1:37:46हैं सिक्योरिटी इमोशनल और
- 1:37:49मेंटल और जब तक वह सिक्योरिटी बनी रहती है
- 1:37:53तब तक हम खुश रहते हैं। इसलिए हम कभी
- 1:37:57एनवायरमेंट को क्वेश्चन ही नहीं करते।
- 1:38:00इसलिए एनवायरमेंट का कांस्टेंट चेंज एक
- 1:38:03झूठ बन जाता है जो हर एक के अंदर
- 1:38:07डिस्टरबेंस क्रिएट करता
- 1:38:11है। जब तक कॉन्फ्लिक्ट है इसका मतलब हमने
- 1:38:15अपने आसपास की कंडीशंस को नहीं समझा है।
- 1:38:19और जब तक हम एनवायरमेंट का मतलब नहीं
- 1:38:22समझते तब तक वह मूवमेंट झूठा रहेगा।
- 1:38:26और उसका असली मतलब सिर्फ तब समझ में आता
- 1:38:29है जब दर्द बहुत गहरा हो जाता है और तुम
- 1:38:34उस पेन में फुल्ली अवेयर हो जाते
- 1:38:38हो।
- 1:38:41सवाल मुझे बिल्कुल क्लियर है कि आई
- 1:38:44कॉन्शियसनेस एनवायरमेंट का रिजल्ट है। पर
- 1:38:47क्या आप नहीं देखते कि यह आई इस लाइफ में
- 1:38:50फर्स्ट टाइम स्टार्ट नहीं हुआ।
- 1:38:53आपके कहने से लगता है कि आई पास्ट में भी
- 1:38:56था और फ्यूचर में भी
- 1:39:01रहेगा। मुझे पता है तुम यह सवाल पुनर्जन्म
- 1:39:05पर लाना चाहते हो।
- 1:39:08लेकिन चलो इसे समझते
- 1:39:10हैं। सबसे
- 1:39:13पहले अगर तुम थोड़ा सोचो तो तुम मानोगे कि
- 1:39:18आई एनवायरमेंट का रिजल्ट है। मेरे लिए यह
- 1:39:22इंपॉर्टेंट नहीं है कि वह पास्ट
- 1:39:24एनवायरमेंट हो या
- 1:39:27प्रेजेंट। एनवायरमेंट हमेशा पास्ट का भी
- 1:39:30होता
- 1:39:31है। तुमने कुछ किया जो तुम समझ नहीं पाए।
- 1:39:35कल तुमने कुछ किया जो तुमसे क्लियर नहीं
- 1:39:38हुआ और जब तक तुम उसे समझते नहीं वह
- 1:39:42तुम्हें फॉलो करता
- 1:39:44रहेगा। तुम पास्ट एनवायरमेंट को सॉल्व
- 1:39:47नहीं कर सकते। जब तक तुम प्रेजेंट में
- 1:39:49पूरी तरह अवेयर नहीं हो तो पास्ट या
- 1:39:53प्रेजेंट कंडीशन से दिमाग कितना भी बर्डन
- 1:39:57हो फर्क नहीं पड़ता।
- 1:40:01जो जरूरी है वह यह है कि तुम एनवायरमेंट
- 1:40:04को समझो और तभी दिमाग कॉन्फ्लिक्ट से फ्री
- 1:40:07हो जाता
- 1:40:10है। कुछ लोग मानते हैं कि आई का जन्म बहुत
- 1:40:14पुराने समय में हुआ था और वह आगे फ्यूचर
- 1:40:17में भी चलता
- 1:40:19रहेगा। मेरे लिए यह बात बिल्कुल बेकार है।
- 1:40:23इसका कोई मतलब नहीं। मैं तुम्हें बताता
- 1:40:26हूं क्यों।
- 1:40:29अगर आई एनवायरमेंट का रिजल्ट है। अगर आई
- 1:40:33सिर्फ कॉन्फ्लिक्ट का एसेंस
- 1:40:36है तो दिमाग को यह देखना चाहिए कि कैसे उस
- 1:40:40कॉन्फ्लिक्ट से फ्री हुआ जाए ना कि उस
- 1:40:44कॉन्फ्लिक्ट को बनाए रखने का सोचना।
- 1:40:48इसलिए यह इंपॉर्टेंट नहीं है कि पास्ट
- 1:40:50एनवायरमेंट ने दिमाग को तोड़ दिया है या
- 1:40:54प्रेजेंट उसे बिगाड़ रहा है या आई का जन्म
- 1:40:58बहुत पहले हुआ
- 1:41:01था। जो मैटर करता है वह यह है कि जब तुम
- 1:41:06दर्द में होते हो जब तुम उस सफरिंग को
- 1:41:10पूरी तरह से महसूस करते हो। उस इंटेंस
- 1:41:13सफरिंग के मोमेंट में ही आई का खात्मा
- 1:41:17होता है। यहीं से कर्म का आईडिया आता
- 1:41:21है। तुम जानते हो कर्म का मतलब कि तुम आज
- 1:41:26अपने पास्ट का बोझ ले जी रहे
- 1:41:28हो। मतलब तुम पास्ट का एनवायरमेंट लेकर
- 1:41:32प्रेजेंट में आए हो। और उस बर्डन के चलते
- 1:41:35तुम फ्यूचर को कंट्रोल करते हो। फ्यूचर को
- 1:41:38शेप देते हो।
- 1:41:43अगर तुम थोड़ा सोचो तो यह बात ऑब्वियस है।
- 1:41:46अगर तुम्हारा दिमाग पास्ट के कारण बिगड़
- 1:41:50गया है तो नेचुरली तुम्हारा फ्यूचर भी
- 1:41:52बिगड़ जाएगा। क्योंकि अगर तुमने कल के
- 1:41:56एनवायरमेंट को नहीं समझा तो वह आज भी चलता
- 1:42:00रहेगा। और अगर तुम आज को नहीं समझ पा रहे
- 1:42:04हो तो कल को भी नहीं समझ पाओगे।
- 1:42:08मतलब अगर तुमने किसी एनवायरमेंट या एक्शन
- 1:42:11का पूरा मतलब नहीं देखा तो वह तुम्हारी आज
- 1:42:16की सोच को बिगाड़ता
- 1:42:19है। और आज का एक्शन फिर से कल को बिगाड़
- 1:42:23देगा। इस तरह तुम एक वियस सर्कल में फंसे
- 1:42:27जाते हो।
- 1:42:30और इसी वजह से लोग कहते हैं रिब्थ या
- 1:42:34यादों का
- 1:42:35पुनर्जन्म या दिमाग का रिब्थ एनवायरमेंट
- 1:42:39के थ्रू होता
- 1:42:40है। पर मैं कहता हूं दिमाग पास्ट से फ्री
- 1:42:44हो सकता है। पास्ट के एनवायरमेंट और
- 1:42:48रुकावटों से आजाद हो सकता है और इसीलिए
- 1:42:51तुम फ्यूचर से भी फ्री हो सकते हो क्योंकि
- 1:42:55तब तुम प्रेजेंट में जिंदा हो।
- 1:42:59पूरे स्ट्रेंथ के साथ इंटेंस तरीके से
- 1:43:03एकदम अलाइव
- 1:43:05होकर प्रेजेंट में ही एटरर्निटी छुपी है
- 1:43:11और इसे समझने के लिए दिमाग को पास्ट के
- 1:43:15बोझ से फ्री करना होगा और पास्ट से फ्री
- 1:43:19होने के लिए तुम्हें प्रेजेंट को इंटेंसली
- 1:43:23क्वेश्चन करना होगा ना कि यह सोचना होगा
- 1:43:26कि आई फ्यूचर में कैसे
- 1:43:30चलेगा उजाई
- 1:43:34कैलिफोर्निया जून 17
- 1:43:421934 अ डायनेमिक सोसाइटी एक जिंदा
- 1:43:48समाज आज हम कुछ और सवालों के जवाब
- 1:43:52देंगे
- 1:43:54सवाल सेल्फ डिसिप्लिन और सप्रेशन में क्या
- 1:43:58फर्क
- 1:44:02है? मुझे नहीं लगता कि इन दोनों में
- 1:44:05ज्यादा फर्क
- 1:44:07है क्योंकि दोनों ही इंटेलिजेंस को मना
- 1:44:10करते
- 1:44:11हैं। सप्रेशन एक ज्यादा हार्ड फॉर्म है
- 1:44:15सेल्फ डिसिप्लिन का। जो कि एक सल तरीका है
- 1:44:20रिप्रेशन का।
- 1:44:22मतलब सप्रेशन और सेल्फ डिसिप्लिन दोनों ही
- 1:44:26सिर्फ एनवायरमेंट के हिसाब से एडजस्ट करने
- 1:44:29की कोशिश
- 1:44:30है। एक बड़ा विजिबल एडजस्टमेंट होता है
- 1:44:35सप्रेशन और दूसरा थोड़ा सॉफ्ट फॉर्म में
- 1:44:38होता है सेल्फ डिसिप्लिन।
- 1:44:42दोनों का बेस डर होता है। सप्रेशन एक
- 1:44:47ऑब्वियस डर पर बेस्ड होता है। और सेल्फ
- 1:44:50डिसिप्लिन एक ऐसे डर से आता है जो या तो
- 1:44:53कुछ खो देने का डर होता है या कुछ पाने की
- 1:44:57इच्छा के थ्रू दिखता
- 1:44:59है। जो तुम सेल्फ डिसिप्लिन कहते हो वह
- 1:45:04सिर्फ एक ऐसे एनवायरमेंट के साथ एडजस्ट
- 1:45:06करना है जिसे तुमने पूरी तरह से समझा
- 1:45:09नहीं।
- 1:45:11और जब एडजस्टमेंट बिना समझ के होती है तो
- 1:45:15उसमें इंटेलिजेंस मर जाता
- 1:45:18है। किसी को खुद को डिसिप्लिन करने की
- 1:45:21जरूरत क्यों पड़ती है? क्या जरूरत है कि
- 1:45:25कोई खुद को किसी पैटर्न के अनुसार ढालने
- 1:45:28पर मजबूर करें।
- 1:45:31लोग अलग-अलग स्कूल्स ऑफ डिसिप्लिन में
- 1:45:33क्यों जाते
- 1:45:34हैं? जो कहते हैं कि वह स्पिरिचुअलिटी तक
- 1:45:38ले जाएंगे।
- 1:45:41ज्यादा समझ देंगे या सोच को अनफोल्ड
- 1:45:46करेंगे। तुम देखोगे कि जितना ज्यादा तुम
- 1:45:49दिमाग को डिसिप्लिन करते हो उतना ही
- 1:45:52ज्यादा उसकी लिमिट बन जाती
- 1:45:55है। प्लीज इस बात को ध्यान से सोचना। बिना
- 1:46:00किसी और बात को बीच में लाए।
- 1:46:03यहां मैं सेल्फ डिसिप्लिन का मतलब वही ले
- 1:46:05रहा हूं जो सवाल में है। मतलब खुद को एक
- 1:46:09फिक्स पैटर्न के अनुसार
- 1:46:13चलाना जो पहले से ही डिसाइड किया गया है।
- 1:46:16जिसमें कुछ पाने की इच्छा होती है। पर
- 1:46:20मेरे लिए यह पूरा
- 1:46:23प्रोसेस जिसमें दिमाग को बार-बार एक सेट
- 1:46:26पैटर्न में ट्विस्ट किया जाता है। वह आखिर
- 1:46:29में दिमाग को तोड़ देता है।
- 1:46:32जो दिमाग सच में इंटेलिजेंट होता है, वह
- 1:46:35सेल्फ डिसिप्लिन से फ्री होता
- 1:46:37है। क्योंकि इंटेलिजेंस का जन्म तभी होता
- 1:46:41है जब तुम एनवायरमेंट को क्वेश्चन करते हो
- 1:46:44और उसका असली मतलब समझते
- 1:46:49हो। उस समझ में ही रियल एडजस्टमेंट होती
- 1:46:53है ना कि किसी फिक्स पैटर्न या कंडीशन के
- 1:46:56हिसाब से।
- 1:46:58सोचो एक प्रिमिटिव आदमी को वह क्या करता
- 1:47:01है? उसमें ना डिसिप्लिन होता है, ना
- 1:47:04कंट्रोल, ना
- 1:47:06सप्रेशन। वह जो चाहता है वह करता है।
- 1:47:11लेकिन एक इंटेलिजेंट आदमी भी वही करता है
- 1:47:14जो वह चाहता है। पर इंटेलिजेंस के
- 1:47:17साथ। इंटेलिजेंस कभी सेल्फ डिसिप्लिन या
- 1:47:21सप्रेशन से पैदा नहीं होती।
- 1:47:25प्रिमिटिव आदमी सिर्फ अपनी इच्छा के पीछे
- 1:47:28भागता
- 1:47:29है। लेकिन इंटेलिजेंट आदमी डिजायर का मतलब
- 1:47:33समझता है। वह कॉन्फ्लिक्ट को देखता है।
- 1:47:37प्रिमिटिव आदमी नहीं देखता। वह बस डिजायर
- 1:47:40के पीछे जाता है और दर्द और तकलीफ बनाता
- 1:47:43है। इसलिए मेरे लिए सेल्फ डिसिप्लिन और
- 1:47:47सप्रेशन दोनों सेम है। दोनों ही
- 1:47:49इंटेलिजेंस को रोक देते हैं।
- 1:47:53इस बात को अपनी लाइफ में टेस्ट करिए।
- 1:47:56डिसिप्लिन और सेल्फ डिसिप्लिन को ले। उसे
- 1:48:00तुरंत रिजेक्ट मत करिए। यह मत बोलिए कि
- 1:48:03सेल्फ डिसिप्लिन होना जरूरी है। वरना
- 1:48:06दुनिया में केओस हो
- 1:48:08जाएगा। जैसे अभी दुनिया में केओस नहीं है।
- 1:48:11और दूसरी
- 1:48:13तरफ सिर्फ मेरे कहने से एग्री भी मत हो
- 1:48:17जाओ। मैं तुमसे एक ऐसी बात कह रहा हूं
- 1:48:20जिसका मैंने खुद अनुभव किया है। और जो
- 1:48:23मैंने सच पाई
- 1:48:25है। साइकोलॉजिकली मुझे यह सच लगता है
- 1:48:29क्योंकि सेल्फ डिसिप्लिन का मतलब होता है
- 1:48:31एक ऐसा दिमाग जो किसी एक थॉट, बिलीफ या
- 1:48:35आइडियल से बंधा हुआ
- 1:48:37है। एक ऐसा दिमाग जो किसी कंडीशन से बनता
- 1:48:41है। जैसे एक जानवर को रस्सी से बांध दिया
- 1:48:44जाए। वह सिर्फ उसी डिस्टेंस तक जा सकता
- 1:48:48है। वही हालत होती है एक दिमाग की जो किसी
- 1:48:51बिलीव से बंधा हुआ हो। वह दिमाग सिर्फ उस
- 1:48:55लिमिटेशन के अंदर ही सोचता
- 1:48:58है। इसलिए ऐसा दिमाग असल में सोच ही नहीं
- 1:49:02सकता। वह सिर्फ लिमिटेड एडजस्टमेंट कर
- 1:49:06सकता है उस रस्सी के रेंज के अंदर। पर ऐसा
- 1:49:11दिमाग, ऐसा
- 1:49:12दिल ना सच में सोच सकता है, ना महसूस कर
- 1:49:16सकता है। दिमाग और दिल दोनों डिसिप्लिन से
- 1:49:20टूट जाते हैं, बिगड़ जाते हैं। क्योंकि वह
- 1:49:23थॉट और लव दोनों से इंकार करते हैं।
- 1:49:27इसीलिए तुम्हें ऑब्जर्व करना होगा। खुद
- 1:49:31देखना होगा कि तुम्हारा थॉट और फीलिंग
- 1:49:33कैसे काम कर रहे हैं। बिना उन्हें किसी
- 1:49:36डायरेक्शन में ले जाने की कोशिश
- 1:49:40किए। सबसे पहले ले जाने से पहले यह समझो
- 1:49:45कि वह कैसे काम कर रहे हैं। सोच और फीलिंग
- 1:49:49को बदलने से पहले देखो कि वह चल कैसे रहे
- 1:49:53हैं। और तुम देखोगे कि वह लगातार एडजस्ट
- 1:49:56हो रहे हैं उस लिमिटेशन के अंदर।
- 1:50:00जो डिजायर और उसके फुलफिलमेंट ने सेट की
- 1:50:03है। अवेयरनेस में कभी कोई डिसिप्लिन नहीं
- 1:50:07होता। चलो एक एग्जांपल लेते
- 1:50:11हैं। मानो तुम क्लास माइंडेड हो। क्लास
- 1:50:16कॉन्शियस हो। थोड़े स्नोबिश
- 1:50:19हो। तुम्हें पता नहीं कि तुम स्नोबिश हो।
- 1:50:22पर तुम यह जानना चाहते हो कि क्या तुम
- 1:50:25वैसे हो या नहीं। तो तुम कैसे पता लगाओगे?
- 1:50:30अपने थॉट्स और इमोशंस के प्रति अवेयर होकर
- 1:50:33फिर क्या होता है? मानो तुमने जान लिया कि
- 1:50:36तुम स्नोबिश हो तो उस समझने से एक
- 1:50:40डिस्टरबेंस पैदा होती है। एक
- 1:50:43कॉन्फ्लिक्ट और वही कॉन्फ्लिक्ट उस
- 1:50:46स्नोबिशनेस को डिॉल्व कर देता
- 1:50:50है। जबकि अगर तुम सिर्फ दिमाग को
- 1:50:53डिसिप्लिन करते हो कि स्नोबिश ना हो तो
- 1:50:57तुम एक नया कैरेक्टर डेवलप कर रहे हो जो
- 1:51:00स्नोब के अपोजिट है। और क्योंकि वह
- 1:51:04डेलीबेट है इसलिए वह भी झूठा और हार्मफुल
- 1:51:07है। हमने अलग-अलग पैटर्न्स, गोल्स और
- 1:51:11टूल्स बना लिए हैं। जिनको हम कॉन्शियसली
- 1:51:14या अनकॉन्शियसली फॉलो करते
- 1:51:18हैं। इसलिए हम अपने माइंड और हार्ट को
- 1:51:21उनकी तरफ डिसिप्लिन करते हैं और तब
- 1:51:25कंट्रोल और प्रोवर्जन जरूरी हो जाता है।
- 1:51:30लेकिन अगर तुम उन कंडीशंस को क्वेश्चन
- 1:51:32करना शुरू करो जो कॉन्फ्लिक्ट क्रिएट करते
- 1:51:36हैं और इससे तुम्हारी इंटेलिजेंस जागती है
- 1:51:40तो वह इंटेलिजेंस इतनी ज्यादा होती है कि
- 1:51:42वह हमेशा मूव करती रहती है और इसलिए कभी
- 1:51:47भी कोई फिक्स्ड पॉइंट नहीं बनता जहां
- 1:51:50कॉन्फ्लिक्ट हो।
- 1:51:54सवाल मान लें कि आई एनवायरमेंट के रिएक्शन
- 1:51:58का बना हुआ
- 1:52:00है तो कौन से मेथड से हम उसकी लिमिटेशन से
- 1:52:04बाहर आ सकते हैं या कैसे हम रीओरिएंटेशन
- 1:52:08का प्रोसेस शुरू करें ताकि दो झूठ चीजों
- 1:52:12के बीच का कॉन्फ्लिक्ट ना हो।
- 1:52:19सबसे पहले तुम मेथड ढूंढना चाहते हो
- 1:52:22लिमिटेशन से बचने के लिए। पर
- 1:52:26क्यों? क्या तुम्हें कभी लगा है कि तुम
- 1:52:29हमेशा मेथड एक सिस्टम क्यों मांगते
- 1:52:33हो? यह मेथड चाहने की इच्छा क्या दिखाती
- 1:52:36है? हर मेथड चाहने का मतलब है एस्केप
- 1:52:40चाहना। तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिए
- 1:52:42एक सिस्टम सेट कर दूं जिसे तुम फॉलो कर
- 1:52:47सको। सीधी बात यह है कि तुम चाहते हो कोई
- 1:52:50ऐसा सिस्टम हो जिसे तुम उन कंडीशंस पर
- 1:52:54इंपोज कर सको जो कॉन्फ्लिक्ट क्रिएट कर
- 1:52:57रही हैं।
- 1:53:00ताकि तुम कॉन्फ्लिक्ट से बच जाओ।
- 1:53:04मतलब तुम सिर्फ एक पैटर्न के हिसाब से खुद
- 1:53:07को एडजस्ट करना चाहते हो ताकि कॉन्फ्लिक्ट
- 1:53:10या एनवायरमेंट से बच जाओ। इसी इच्छा में
- 1:53:13ही छुपी होती है मेथड की डिमांड। तुम
- 1:53:17जानते हो जिंदगी कोई पल्मेनिज्म का कोर्स
- 1:53:20नहीं है। मेथड मांगने का मतलब होता है
- 1:53:23एस्केप चाहना। तुमने पूछा कि कैसे
- 1:53:27रीओरिएंटेशन करें ताकि दो झूठ चीजों के
- 1:53:30बीच बार-बार कॉन्फ्लिक्ट ना हो।
- 1:53:33सबसे पहले क्या तुम्हें पता है कि तुम
- 1:53:36कॉन्फ्लिक्ट में हो? पहले यह तो समझो या
- 1:53:40फिर क्या तुम बस एक ऐसी जगह ढूंढना चाहते
- 1:53:43हो जहां और कॉन्फ्लिक्ट ना
- 1:53:46हो। तो यह डिसाइड करो क्या तुम एक सेफ जोन
- 1:53:50चाहते हो एक ऐसी कंडीशन जहां कॉन्फ्लिक्ट
- 1:53:53ना
- 1:53:54हो। या तुम्हें यह भी नहीं पता कि तुम
- 1:53:57कॉन्फ्लिक्ट में हो। अगर तुम्हें
- 1:53:59कॉन्फ्लिक्ट का पता ही नहीं तो फिर तुम
- 1:54:01सलूशन क्यों ढूंढ रहे हो? उस कंडीशन को
- 1:54:05कॉन्फ्लिक्ट पैदा करने दो बिना तुम्हारे
- 1:54:08उसमें इंटरफेयर किए और अगर तुम खुद से
- 1:54:11आर्टिफिशियली कॉन्फ्लिक्ट क्रिएट कर रहे
- 1:54:14हो तो सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम्हें डर है
- 1:54:17कि तुम कुछ मिस कर रहे हो। जिंदगी तुम्हें
- 1:54:21मिस नहीं करेगी। अगर तुम्हें लगता है ऐसा
- 1:54:25हो रहा है तो कुछ गड़बड़ है तुम्हारे
- 1:54:29अंदर। शायद तुम नॉर्मल नहीं हो। अगर तुम
- 1:54:32सच में कॉन्फ्लिक्ट में हो तो तुम मुझसे
- 1:54:35मेथड नहीं मांगोगे। अगर मैं तुम्हें मेथड
- 1:54:38दूं तो तुम सिर्फ उस मेथड के हिसाब से खुद
- 1:54:41को डिसिप्लिन करोगे। एक आइडियल एक पैटर्न
- 1:54:45को कॉपी करोगे जो मैंने दिया। और इससे
- 1:54:48तुम्हारी अपनी इंटेलिजेंस खत्म हो जाएगी।
- 1:54:52लेकिन अगर तुम कॉन्फ्लिक्ट के प्रति अवेयर
- 1:54:55हो तो उस अवेयरनेस में दर्द गहरा होता है
- 1:54:58और उस इंटेंसिटी में ही तुम सफरिंग का
- 1:55:01असली कॉज डिॉल्व कर
- 1:55:04दोगे जो है एनवायरमेंट का समझ ना
- 1:55:09होना। तुम जानते हो हमने नॉर्मल तरीके से
- 1:55:13जीना ही भूल गए
- 1:55:15हैं। सीधा सिंपल डायरेक्ट
- 1:55:18तरीका वापस उस सिंपलीसिटी में जाने के लिए
- 1:55:21तुम मेथड फॉलो नहीं कर सकते। तुम मशीन
- 1:55:24बनके नहीं जी सकते।
- 1:55:27लेकिन मुझे लगता है हम सब मेथड ढूंढते
- 1:55:29हैं। क्योंकि हम सोचते हैं उनसे हमें
- 1:55:33फुलनेस, स्टेबिलिटी और सेफ्टी मिलेगी।
- 1:55:37पर मेरे लिए मेथड सिर्फ धीरे-धीरे सड़ने
- 1:55:41का रास्ता
- 1:55:42है और उनका रियल स्पिरिचुअलिटी से कोई
- 1:55:45लेना देना
- 1:55:47नहीं। स्पिरिचुअलिटी मतलब होता है
- 1:55:50इंटेलिजेंस का
- 1:55:54टोटल।
- 1:55:56सवाल आप कहते हैं कि एक बड़े लेवल का
- 1:55:59बदलाव जरूरी है इंसान की जिंदगी में। अगर
- 1:56:02कोई आदमी अपने फैमिली या दोस्तों को तकलीफ
- 1:56:04ना देने के लिए अपने आउटर एनवायरमेंट में
- 1:56:07बदलाव नहीं लाना चाहता तो क्या अंदर का
- 1:56:10बदलाव उसे कॉन्फ्लिक्ट से आजादी दे सकता
- 1:56:16है? पहले यह
- 1:56:19देखो। क्या तुम्हें भी नहीं लगता कि एक
- 1:56:22बड़ा बदलाव जरूरी है इंसान की जिंदगी में
- 1:56:26या तुम बस सेटिस्फाइड हो जैसे चीजें चल
- 1:56:30रही हैं।
- 1:56:32अपने प्रोग्रेस के आइडियाज, इवोल्यूशन,
- 1:56:35सक्सेस की
- 1:56:36चाह और कभी-कभी आने वाली खुशियों के
- 1:56:41साथ जब तुम सच में सोचना शुरू करते हो, सच
- 1:56:45में महसूस करना शुरू करते हो तो एक
- 1:56:48स्ट्रांग इच्छा जागती है। एक बड़े बदलाव
- 1:56:51की, एक टोटल चेंज की। अगर तुम्हें लगता है
- 1:56:55कि यह जरूरी है तो फिर ना फैमिली रुकावट
- 1:56:58बनेगी ना दोस्त।
- 1:57:01तब ना अंदर का बदलाव होता है ना बाहर
- 1:57:06का। सिर्फ बदलाव होता है। रिवोल्यूशन होती
- 1:57:12है। लेकिन जैसे ही तुम कहते हो मैं अपने
- 1:57:16परिवार को दुख नहीं देना चाहता। अपने
- 1:57:19दोस्तों या किसी सिस्टम को हर्ट नहीं करना
- 1:57:21चाहता। तब तुम्हें असली बदलाव की जरूरत
- 1:57:24महसूस ही नहीं होती।
- 1:57:27तुम सिर्फ एनवायरमेंट को चेंज करना चाहते
- 1:57:30हो और यह सिर्फ लेजीनेस होती है जो एक और
- 1:57:35झूठा एनवायरमेंट बनाती है और कॉन्फ्लिक्ट
- 1:57:38को चलने देती
- 1:57:40है। मुझे लगता है हम एक झूठा बहाना देते
- 1:57:44हैं कि हमें अपने परिवार और दोस्तों को
- 1:57:47हर्ट नहीं करना चाहिए।
- 1:57:50पर जब तुम्हें कोई जरूरी काम करना होता
- 1:57:54है तो तुम उसे कर लेते हो। चाहे फैमिली या
- 1:57:58दोस्तों को बुरा लगे या नहीं। है
- 1:58:02ना? तब तुम यह नहीं सोचते कि उन्हें दुख
- 1:58:05होगा। वह तुम्हारे कंट्रोल से बाहर होता
- 1:58:08है। तुम्हारा फील इतना स्ट्रांग होता है।
- 1:58:12तुम्हारा सोचना इतना साफ होता है कि वह
- 1:58:16तुम्हें फैमिली के दायरे, रिश्तों और
- 1:58:18बंधनों से परे ले जाता है।
- 1:58:22लेकिन तुम फैमिली, दोस्तों, आइडियल्स,
- 1:58:25बिलीव्स,
- 1:58:27ट्रेडिशंस और जो चीजें सोसाइटी ने बना रखी
- 1:58:30हैं उन सबको तभी सोचना शुरू करते हो जब
- 1:58:35तुम किसी सेफ्टी को पकड़े हुए होते
- 1:58:38हो। जब तुम्हारे अंदर वह असली रिचनेस नहीं
- 1:58:43होती। और तुम बाहर से स्टिमुलेशन लेकर
- 1:58:46अंदर की रिचनेस बनाना चाहते हो।
- 1:58:49पर अगर तुम्हें अपने दर्द का पूरा एहसास
- 1:58:52हो जो कॉन्फ्लिक्ट के कारण आया हो तो तुम
- 1:58:57किसी भी ऑर्थोडॉक्सी दोस्ती या फैमिली के
- 1:59:01बंधन में नहीं
- 1:59:02पड़ते। तुम सिर्फ यह समझना चाहते हो कि
- 1:59:05दर्द या कारण क्या है?
- 1:59:09तुम एनवायरमेंट का मतलब समझना चाहते हो जो
- 1:59:12यह कॉन्फ्लिक्ट क्रिएट करता
- 1:59:15है और तब वहां कोई पर्सनालिटी नहीं बची ना
- 1:59:19ही आई का लिमिटेड थॉट होता
- 1:59:22है लेकिन जब तक तुम उस आई को पकड़े रहते
- 1:59:26हो तभी तुम्हें सोचना पड़ता है कि तुम
- 1:59:28कितना आगे जा सकते हो और कहां रुकना
- 1:59:31चाहिए।
- 1:59:33सच या अंडरस्टैंडिंग का जो गॉड हेड है वह
- 1:59:37तो नहीं मिलता जब तुम फैमिली ट्रेडिशन या
- 1:59:40हैबिट से चिपके होते हो। वह तब मिलता है
- 1:59:44जब तुम पूरी तरह से नंगे होते हो। अपनी
- 1:59:46इच्छाओं, उम्मीदों और सिक्योरिटी से
- 1:59:49बिल्कुल फ्री। और उस डायरेक्ट सिंपलीसिटी
- 1:59:52में ही जिंदगी की असली रिचनेस होती
- 1:59:57है।
- 1:59:59सवाल क्या आप बता सकते हैं कि एनवायरमेंट
- 2:00:03झूठा क्यों बन गया? ये सब प्रॉब्लम्स की
- 2:00:05शुरुआत कहां से
- 2:00:14हुई? तुम्हें क्या लगता है? एनवायरमेंट
- 2:00:18किसने बनाया?
- 2:00:20किसी चमत्कारी भगवान
- 2:00:22ने जरा रुक जाओ सोचो किसने बनाया यह
- 2:00:26एनवायरमेंट यह सोशल सिस्टम इकोनॉमिक और
- 2:00:30रिलीजियस स्ट्रक्चर हमने तुमने और
- 2:00:34मैंने हर एक इंसान ने थोड़ा-थोड़ा
- 2:00:37कंट्रीब्यूट किया जब तक वह कलेक्टिव बन
- 2:00:41गया और अब वही इंडिविजुअल जो इस कलेक्टिव
- 2:00:44सिस्टम को बनाने का हिस्सा था वही उसमें
- 2:00:47खो गया है।
- 2:00:49क्योंकि वही अब उसका मोल्ड उसका
- 2:00:51एनवायरमेंट बन चुका है। सिक्योरिटी की
- 2:00:54इच्छा चाहे फाइनेंशियल हो, मोरल हो या
- 2:00:59स्पिरिचुअल। उसके चक्कर में तुमने एक
- 2:01:01कैपिटलिस्ट एनवायरमेंट बनाया जिसमें
- 2:01:04नेशनलिटी है, क्लास डिवाइड है और
- 2:01:07एक्सप्लइटेशन
- 2:01:09है। इस सबको हमने बनाया है तुम और मैं। यह
- 2:01:14कोई मिरेकल से नहीं हुआ।
- 2:01:17और जब तक तुम सिक्योरिटी ढूंढते रहोगे तब
- 2:01:20तक तुम फिर से एक नए
- 2:01:23कैपिटलिस्ट पोजेसिव सिस्टम बना लोगे। बस
- 2:01:27उसका रंग और लैंग्वेज थोड़ा अलग
- 2:01:31होगा। तुम चाहे इस सिस्टम को हटा भी दो।
- 2:01:35लेकिन जब तक
- 2:01:37पोजेसिवनेस है तुम एक नए कैपिटलिस्ट
- 2:01:40सिस्टम को जन्म दोगे। नए नाम, नए शब्दों
- 2:01:44के साथ। रिलीजन के साथ भी यही
- 2:01:48है। उनके बेकार के रिचुअल्स, एक्सप्लइटेशन
- 2:01:52और डर के साथ। किसने बनाया यह सब? तुमने
- 2:01:56और
- 2:01:56मैंने। सदियों तक हमने इन्हें बनाया है।
- 2:02:00और डर के कारण इनके आगे झुकते रहे हैं। यह
- 2:02:04सब फॉल्स एनवायरमेंट हम इंसानों ने ही
- 2:02:07बनाया
- 2:02:08है। और अब हम उसके स्लेव बन गए हैं। और उस
- 2:02:12झूठे कंडीशन ने ही पैदा किया है वह झूठा
- 2:02:16सर्च फॉर सिक्योरिटी जिसे तुम आई कहते हो
- 2:02:20और इसलिए हमेशा फाइट होती रहती है आई और
- 2:02:25इस फॉल्स एनवायरमेंट के
- 2:02:28बीच तुम यह जानना चाहते हो कि किसने यह
- 2:02:32मिस
- 2:02:33बनाया क्योंकि तुम चाहते हो कोई रिडीमर आए
- 2:02:38जो तुम्हें इस मिस से निकाल के किसी नए
- 2:02:41हेवन में ले जाए। अपने प्रजुडिस, उम्मीद,
- 2:02:45डर और चाहत को पकड़े रखे हुए। तुमने ही
- 2:02:49इंडिविजुअली इस एनवायरमेंट को बनाया है।
- 2:02:53इसलिए तुम्हें ही इसे तोड़ना
- 2:02:55पड़ेगा। तुम्हारा इंतजार करना कि कोई
- 2:02:58सिस्टम आए और इसे हटा दे, वह सिर्फ
- 2:03:01तुम्हें एक नए सिस्टम का स्लेव
- 2:03:04बनाएगा। कम्युनिज्म आ जाए तो क्या होगा?
- 2:03:07तुम नए शब्दों का यूज करोगे। लेकिन
- 2:03:09तुम्हारे रिएक्शंस वही रहेंगे। बस स्टाइल
- 2:03:12अलग होगा। इसीलिए मैंने पहले कहा था अगर
- 2:03:16एनवायरमेंट तुम्हें किसी एक्शन के लिए
- 2:03:18फोर्स कर रहा है तो वह एक्शन राइटियस नहीं
- 2:03:22हो
- 2:03:24सकता। रचियस एक्शन तब होता है जब वह
- 2:03:27एनवायरमेंट को समझने से जन्मा हो। इसलिए
- 2:03:31हमें इंडिविजुअली अवेयर बनना होगा। और जब
- 2:03:34तुम अवेयर बनते हो तो इंडिविजुअली तुम कुछ
- 2:03:39बहुत बड़ा क्रिएट करते
- 2:03:41हो। एक ऐसी सोसाइटी जो सिर्फ किसी आइडियल
- 2:03:44को पकड़ के नहीं बैठी होती और इसलिए सड़
- 2:03:48जाती
- 2:03:49है। बल्कि एक ऐसी सोसाइटी जो हमेशा मूव
- 2:03:53करती रहती है। कभी रुकती नहीं, कभी खत्म
- 2:03:56नहीं होती।
- 2:03:58आज का इंसान एक गोल सेट करता है। उसके
- 2:04:01पीछे भागता है और जब मिल जाता है तो
- 2:04:04कोलैप्स कर जाता
- 2:04:06है। वह हमेशा किसी गोल तक पहुंचना चाहता
- 2:04:10है और फिर उसी स्टेज पर रुक जाता
- 2:04:13है। जैसा आदमी होता है वैसे ही स्टेट भी
- 2:04:17होती
- 2:04:18है। स्टेट भी हमेशा किसी गोल तक पहुंचने
- 2:04:22की कोशिश करती है। लेकिन मेरे लिए एक आदमी
- 2:04:26को हमेशा मूवमेंट में रहना चाहिए।
- 2:04:30हमेशा बन रहा हो ना कि किसी गोल के पीछे
- 2:04:34भाग रहा हो। तभी जो सेल्फ एक्सप्रेशन है,
- 2:04:37जो सोसाइटी है वह भी हमेशा मूव करती
- 2:04:43रहेगी।
- 2:04:45सवाल क्या आप मानते हैं कि कर्म एक
- 2:04:48इंटरेक्शन है झूठे एनवायरमेंट और झूठ के
- 2:04:51आय के बीच?
- 2:04:56देखो कर्म एक संस्कृत शब्द है जिसका मतलब
- 2:05:00होता है कुछ करना एक्शन लेना
- 2:05:04काम और इसका मतलब होता है कॉज और इफेक्ट
- 2:05:08भी अब कर्म क्या
- 2:05:11है कर्म एक बंधन है वह रिएक्शन है जो
- 2:05:15एनवायरमेंट से पैदा होता है जिसे दिमाग ने
- 2:05:18समझा
- 2:05:20नहीं जैसे मैंने कल समझा समझाने की कोशिश
- 2:05:23की
- 2:05:24थी। अगर हम किसी पर्टिकुलर कंडीशन को नहीं
- 2:05:28समझते तो नेचुरली दिमाग उस कंडीशन का बोझ
- 2:05:32उठाता है। उस समझने की कमी का बोझ।
- 2:05:37और उसी कमी के साथ हम सोचते हैं, एक्ट
- 2:05:41करते हैं और और ज्यादा बोझ बनाते
- 2:05:45हैं और ज्यादा लिमिटेशंस क्रिएट करते हैं।
- 2:05:50तो हमें यह समझना होगा कि यह समझने की कमी
- 2:05:54आती कहां से
- 2:05:56है? क्या चीज रोकती रही है किसी आदमी को
- 2:06:00एनवायरमेंट का पूरा मतलब समझने से?
- 2:06:04चाहे वह पास्ट हो या प्रेजेंट का
- 2:06:07एनवायरमेंट और उस असली मतलब को समझने के
- 2:06:10लिए दिमाग को बिल्कुल प्रजुडिस से फ्री
- 2:06:13होना पड़ेगा। यह सबसे मुश्किल काम
- 2:06:16है। अपने बायस, अपनी सोच, अपने ट्विस्ट से
- 2:06:20सच में फ्री
- 2:06:22होना। एनवायरमेंट को फ्रेश नजरिए से
- 2:06:26देखना।
- 2:06:27सीधे और क्लियर तरीके से इसमें बहुत
- 2:06:30ज्यादा समझने की जरूरत होती है। ज्यादा
- 2:06:33लोगों का दिमाग बायस्ड होता है। अपनी
- 2:06:36वैनिटी के
- 2:06:38चलते, दूसरों को इंप्रेस करने की चाहत के
- 2:06:41चलते या सच तक पहुंचने की इच्छा के
- 2:06:45चलते या एनवायरमेंट से भागने की इच्छा के
- 2:06:49चलते या अपने कॉन्शियसनेस को बढ़ाने के
- 2:06:52चलते जो वह स्पिरिचुअल नाम देते हैं या
- 2:06:56अपने नेशनल प्राइड के चलते।
- 2:07:00यह सब इच्छाएं दिमाग को रोकती हैं
- 2:07:03एनवायरमेंट की असली वैल्यू को डायरेक्टली
- 2:07:05देखने से और क्योंकि ज्यादा दिमाग बायस्ड
- 2:07:10है इसलिए सबसे पहले इंसान को अपने
- 2:07:13लिमिटेशंस का पता लगाना होता है और जैसे
- 2:07:17ही तुम अवेयर होने लगते हो उस अवेयरनेस
- 2:07:20में ही कॉन्फ्लिक्ट होता
- 2:07:22है। जब तुम जानते हो कि तुम सच में अंदर
- 2:07:26से एोगेंट हो या प्राउड हो।
- 2:07:29तो उस घमंड को महसूस करते ही वह धीरे-धीरे
- 2:07:33खत्म होने लगता
- 2:07:35है क्योंकि तुम उसकी फुलिशनेस को देख पाते
- 2:07:39हो।
- 2:07:40लेकिन अगर तुम उसे सिर्फ छुपाते हो तो वह
- 2:07:44और बीमारियां बनाता है और झूठे रिएक्शनंस
- 2:07:48क्रिएट करता
- 2:07:51है। तो हर मोमेंट को अभी के अभी जीने के
- 2:07:55लिए बिना पास्ट या प्रेजेंट के बोझ के
- 2:07:59बिना उस मेमोरी के जो समझने की कमी से बनी
- 2:08:02हो। दिमाग को हर चीज से नए तरीके से मिलना
- 2:08:06चाहिए।
- 2:08:08अगर तुम सर्टेनिटी का बोझ ले जिंदगी को
- 2:08:11फेस करते हो या नॉलेज के घमंड के साथ तो
- 2:08:15वह डेंजरस है। क्योंकि नॉलेज भी सिर्फ
- 2:08:19पास्ट की चीज है। पर जब तुम जिंदगी के पास
- 2:08:22एक नए प्लान के साथ जाते हो तभी तुम समझ
- 2:08:26पाते हो कि बिना कॉन्फ्लिक्ट के कैसे जीना
- 2:08:29है। बिना लगातार स्ट्रगल के कैसे जीना
- 2:08:33है। तब तुम जिंदगी के साथ दूर तक निकल
- 2:08:37जाते हो एक बहने वाली लहर के
- 2:08:43साथ उजाई कैलिफोर्निया जून 18
- 2:08:531934 लिविंग इन
- 2:08:57एक्ससी खुशी भरी जिंदगी
- 2:09:02जीना मेरे लिए एक रियल िटी है। एक जिंदा
- 2:09:06बड़ी सच्चाई
- 2:09:08है और
- 2:09:11उसे समझने के लिए सोच का बिल्कुल सिंपल
- 2:09:14होना जरूरी
- 2:09:16है। जो चीज सिंपल होती है वह बहुत गहरी
- 2:09:19होती है। जो सिंपल होती है उसमें एक नरमी
- 2:09:23एक नजाकत होती है। उसमें एक बड़ी
- 2:09:27सर्टिलिटी होती है। एक इनफिनिट
- 2:09:30सॉफ्टनेस। और अगर तुम शब्दों का यूज सिर्फ
- 2:09:34एक तरीके के रूप में करते
- 2:09:36हो उस नजाकत तक पहुंचने के
- 2:09:43लिए। तो मुझे लगता है तुम वह बात समझ नहीं
- 2:09:47पाओगे जो मैं कहना चाहता हूं।
- 2:09:50पर अगर तुम शब्दों के मतलब को एक ब्रिज की
- 2:09:53तरह यूज करो तो शब्द तुम्हारे लिए एक
- 2:09:56इल्ल्यूजन नहीं बनेंगे जिसमें दिमाग खो
- 2:09:59जाता
- 2:10:01है। मैं कह रहा हूं कि यह एक जिंदा
- 2:10:04रियलिटी है। चाहे तुम इसे गॉड बोलो, ट्रुथ
- 2:10:08बोलो या जो चाहे वह
- 2:10:12बोलो। और यह रियलिटी ढूंढने से नहीं
- 2:10:15मिलती।
- 2:10:17जहां भी सर्च होता है वहां हमेशा
- 2:10:20कंट्रास्ट होता है, डलिटी होती
- 2:10:24है। जब दिमाग कुछ ढूंढता है तो उसमें
- 2:10:28हमेशा डिवाइड होती है, फर्क होता है। पर
- 2:10:32इसका मतलब यह नहीं कि दिमाग को बस संतुष्ट
- 2:10:35रहना चाहिए या रुक जाना चाहिए।
- 2:10:39एक नरमी होती है, एक बैलेंस होता है। ना
- 2:10:43वह सेटिस्फेक्शन होता है, ना वह लगातार
- 2:10:46कोशिश जो किसी गोल को पाने के लिए होती
- 2:10:51है। उस नजाकत भरे बैलेंस में ही
- 2:10:54सिंपलीसिटी होती
- 2:10:56है। यह वह सिंपलीसिटी नहीं है जिसमें
- 2:10:59तुम्हारे पास बस कुछ कपड़े हो या कम सामान
- 2:11:03हो। मैं उस सिंपलीसिटी की बात नहीं कर
- 2:11:06रहा। मैं उस सिंपलीसिटी की बात कर रहा हूं
- 2:11:10जो एक नजाकत भरी सोच से आती
- 2:11:13है। जिसमें ना तो खोजने की इच्छा होती है
- 2:11:17ना ही संतुष्टि होती है। जैसे मैंने कहा
- 2:11:22सर्च का मतलब होता है डुअलिटी
- 2:11:25फर्क। जहां डुएलिटी होती है वहां तुम किसी
- 2:11:28एक साइड से चिपक जाते हो। और यहीं से
- 2:11:32कंपल्शन पैदा होती है।
- 2:11:37जब हम कहते हैं कि हम कुछ ढूंढ रहे
- 2:11:40हैं तो इसका मतलब है कि हम कुछ रिजेक्ट कर
- 2:11:44रहे हैं और उसके बदले एक सब्स्टट्यूट
- 2:11:47चाहते हैं जो हमें सेटिस्फाई
- 2:11:50करे और इसी प्रोसेस में डुअलिटी बन जाती
- 2:11:54है और यह डुअलिटी कंपल्शन को जन्म देती
- 2:11:58है।
- 2:11:59यानी जब तुम एक चीज चूज़ करते हो तो तुम
- 2:12:03दूसरी को हराने की कोशिश कर रहे हो। है
- 2:12:06ना?
- 2:12:08जब तुम कहते
- 2:12:10हो कि तुम नए वैल्यू को डेवलप करना चाहते
- 2:12:14हो तो वह बस उस पुरानी चीज को हराने का एक
- 2:12:17तरीका होता है जिसमें दिमाग ऑलरेडी अटका
- 2:12:21हुआ होता
- 2:12:23है। यह चॉइस या तो किसी अट्रैक्शन से होती
- 2:12:27है या किसी फियर के
- 2:12:29चलते और यह अट्रैक्शन या फियर से जो
- 2:12:33क्लिंग होती है वह माइंड पर इन्फ्लुएंस बन
- 2:12:36जाती
- 2:12:37है। और इन्फ्लुएंस का होना अंडरस्टैंडिंग
- 2:12:41का ना होना होता है। इनफ्लुएंस तभी होती
- 2:12:44है जब डिवाइड होती है। जैसे क्लास,
- 2:12:48रिलीजन, जेंडर, नेशनलिटी के डिवाइड।
- 2:12:54जब दिमाग कुछ हराने की कोशिश करता है तो
- 2:12:57वह ऑटोमेटिकली डलिटी क्रिएट करता है और यह
- 2:13:01डुअलिटी ही समझ को खत्म कर देती
- 2:13:06है और सब डिवाइड्स क्रिएट करती है।
- 2:13:11डुअलिटी दिमाग को इन्फ्लुएंस करती है।
- 2:13:14इसलिए ऐसा दिमाग एनवायरमेंट या
- 2:13:17कॉन्फ्लिक्ट के असली मीनिंग को नहीं समझ
- 2:13:19सकता।
- 2:13:21यह साइकोलॉजिकल इनफ्लुएंसेस बस एनवायरमेंट
- 2:13:25के रिएक्शन होते हैं आई के सेंटर से जो
- 2:13:29लाइक, डिसलाइक, ऑोजिट्स, एंटीथेसिस से
- 2:13:33भरपूर होता है। और जहां यह ऑोजिट्स होते
- 2:13:36हैं, वहां समझना पॉसिबल ही नहीं
- 2:13:40होता। इसी डुअलिटी से होती है इनफ्लुएंसेस
- 2:13:43की क्लासिफिकेशन अच्छी और बुरी।
- 2:13:48जब तक दिमाग इनफ्लुएंस्ड होता है और
- 2:13:51इनफ्लुएंस अट्रैक्शन ऑोजिट्स और कंट्रास्ट
- 2:13:55से होती है तब तक लव इंटेलेक्ट सोसाइटी का
- 2:13:59कंट्रोल या प्रेशर रहता
- 2:14:02है और यह प्रेशर अंडरस्टैंडिंग के रास्ते
- 2:14:05में रुकावट बनता
- 2:14:07है जो समझ ब्यूटी ट्रुथ और लव का असली
- 2:14:12फॉर्म होती
- 2:14:13है। अब अगर तुम इस इनफ्लुएंस के प्रति
- 2:14:16अवेयर हो जाओ तो तुम उसका कॉज समझ
- 2:14:21पाओगे। ज्यादा लोग बस ऊपर ऊपर से अवेयर
- 2:14:24होते हैं अंदर से
- 2:14:27नहीं। सिर्फ जब अवेयरनेस दिमाग और इमोशन
- 2:14:30के डीपेस्ट लेवल तक होती है तब तुम देख
- 2:14:33पाते हो कि इन्फ्लुएंस कैसे डिवाइड करता
- 2:14:36है और वह डिवाइड समझने को कैसे रोकता
- 2:14:42है। सवाल
- 2:14:45आपका टॉक सुनकर मेरी मेमोरी गायब हो गई
- 2:14:48है। मुझे अपने बड़े-बड़े कर्ज याद ही
- 2:14:50नहीं। मैं बहुत ब्लिसफुल फील कर रहा हूं।
- 2:14:53क्या यह लिबरेशन
- 2:14:57है? जिससे तुमने पैसे उधार लिए हैं उससे
- 2:15:02पूछो। मुझे लगता है कुछ कंफ्यूजन हो गई है
- 2:15:05मेमोरी को लेकर। मैंने जो कहा था
- 2:15:08उसमें अगर तुम मेमोरी पर डिपेंड करते हो
- 2:15:11अपने कंडक्ट अपनी लाइफ के एक्शंस के लिए
- 2:15:14तो वो मेमोरी तुम्हारे एक्शन को स्लो
- 2:15:17करेगी क्योंकि तब तुम्हारा एक्शन बस
- 2:15:20कैलकुलेशन बन जाता है जिसमें ना
- 2:15:24स्पॉनटेनिटी होती है ना रिचनेस ना लाइफ की
- 2:15:28[संगीत]
- 2:15:30फुलनेस इसका मतलब यह नहीं कि तुम अपना
- 2:15:33कर्ज भूल जाओ तुम पास्ट को भूल नहीं सकते।
- 2:15:38तुम उसे दिमाग से हटा नहीं सकते। यह
- 2:15:40इंपॉसिबल है। वह सबकॉन्शियस में रहेगा ही।
- 2:15:46पर अगर वह सबकॉन्शियस मेमोरी तुम्हें बिना
- 2:15:49जाने इन्फ्लुएंस कर रही है। तुम्हारे
- 2:15:51एक्शंस, तुम्हारा कंडक्ट, तुम्हारी लाइफ
- 2:15:54की सोच को शेप दे रही है, तो वह
- 2:15:57इन्फ्लुएंस और ज्यादा लिमिटेशन क्रिएट
- 2:16:00करेगा। और तुम्हारी इंटेलिजेंस पे और बोझ
- 2:16:04डालेगा।
- 2:16:06जैसे मैंने अभी-अभी इंडिया से ट्रैवल किया
- 2:16:09है। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड गया। वहां
- 2:16:13लोगों से मिला। नए आइडियाज देखे, नए सींस
- 2:16:17देखे। मैं उन सबको भूल नहीं सकता। चाहे
- 2:16:20उनकी यादें धीरे-धीरे फेड हो जाए।
- 2:16:24पर अगर उन पुरानी चीजों का रिएक्शन
- 2:16:27प्रेजेंट में इंटरफेयर करें तो वह मेरे
- 2:16:29अंडरस्टैंडिंग को रोक सकता है। अगर मेरे
- 2:16:33पास्ट के एक्सपीरियंसेस मुझे रोकते हैं
- 2:16:36प्रेजेंट को फुल्ली जीने से तो मैं
- 2:16:38प्रेजेंट में पूरी तरह से नहीं जी सकता।
- 2:16:41मैं उस मोमेंट में डीपली नहीं जी सकता।
- 2:16:46तुम पास्ट पर रिएक्ट करते हो क्योंकि
- 2:16:49प्रेजेंट का कोई मतलब नहीं लगता या तुम
- 2:16:52प्रेजेंट से बचना चाहते हो इसलिए तुम
- 2:16:54पास्ट में लौट जाते हो और उस पुरानी यादों
- 2:16:58के थ्रिल में जीते हो उस रिएक्शन में जो
- 2:17:01मेमोरी से उभर कर आता है क्योंकि प्रेजेंट
- 2:17:05तुम्हें कुछ खास नहीं लगता।
- 2:17:09तो जब तुम कहते हो मेरी मेमोरी पूरी तरह
- 2:17:12चली गई है तो मुझे लगता है तुम सिर्फ एक
- 2:17:15ही जगह के लायक हो। तुम मेमोरी खो नहीं
- 2:17:19सकते। पर अगर तुम पूरी तरह प्रेजेंट में
- 2:17:22जीते हो उस मूवमेंट की पूरी गहराई में तो
- 2:17:26तुम अवेयर हो जाते हो उन सबकॉन्शियस
- 2:17:29मेमोरी की उलझनों से उस छुपी हुई आशाओं और
- 2:17:33चाहतों से जो भर कर आती हैं और तुम्हारे
- 2:17:38प्रेजेंट में इंटेलिजेंट तरीके से जीने से
- 2:17:41रोकती हैं। अगर तुम इस बात के प्रति अवेयर
- 2:17:45हो। अगर तुम उस रुकावट को गहराई से देख
- 2:17:49पाते हो। सिर्फ ऊपर ऊपर से नहीं तो वह
- 2:17:53छुपी हुई
- 2:17:54मेमोरी जो कि समझने की कमी और अधूरे जीने
- 2:17:58का नतीजा होती है, वह खत्म हो जाती है। और
- 2:18:02तब तुम एनवायरमेंट के हर नई हलचल से हर
- 2:18:06तेजी से आई सोच से नए तरीके से मिलते हो।
- 2:18:13सवाल आप कहते हैं कि जब आदमी अपने आउटर और
- 2:18:17इनर एनवायरमेंट को पूरी तरह समझता है तो
- 2:18:20वह बॉन्डेज और दुख से फ्री हो जाता है। पर
- 2:18:22अगर किसी इंसान का कोई अपना क्लोज पर्सन
- 2:18:25मर जाए तो उसके दुख से कैसे फ्री हो सकते
- 2:18:33हैं? इस केस में दुख का कॉज क्या है और
- 2:18:38दुख होता क्या है?
- 2:18:40क्या दुख सिर्फ एक झटका नहीं होता दिमाग
- 2:18:43को जो उसे उसकी अपनी कमी का एहसास दिलाता
- 2:18:48है। जब दिमाग को अपनी कमी दिखती है तभी तो
- 2:18:52हम उसे दुख कहते हैं। मानो तुम अपने बेटे,
- 2:18:56पति या पत्नी पर डिपेंड कर रहे थे। अपनी
- 2:19:00उस कमी को पूरा करने के लिए।
- 2:19:03जब वह पर्सन चला जाता है जिसे तुम प्यार
- 2:19:06करते हो तो तुम्हें उस खालीपन का पूरा
- 2:19:09एहसास होता है और उसी एहसास से दुख पैदा
- 2:19:12होता है और तुम कहते हो मैंने किसी अपने
- 2:19:16को खो
- 2:19:18दिया तो मौत के बाद सबसे पहले होता है उस
- 2:19:22खालीपन का पूरा
- 2:19:25एहसास जिसे तुम अब तक अवॉइड करते आ रहे
- 2:19:29थे इसीलिए जहां भी डिपेंड ेंडेंस होती है।
- 2:19:33वहां खालीपन होता ही होता है। सरफेस पे सब
- 2:19:37ठीक दिखे लेकिन अंदर से कमी होती है और
- 2:19:40फिर होता है दुख और
- 2:19:43तकलीफ। पर हम उस बात को मानना नहीं चाहते।
- 2:19:47हम यह नहीं देखते कि यही असली कॉज है। तो
- 2:19:52हम कहते हैं मैं अपने दोस्त, पति, पत्नी
- 2:19:56या बच्चों को मिस करता हूं। इस दुख से
- 2:20:00कैसे निकलूं?
- 2:20:01इस लॉस को कैसे पार करूं?
- 2:20:05पर हर ओवरकमिंग सिर्फ एक सब्सीट्यूशन होती
- 2:20:08है। उसमें कोई समझ नहीं होती और इसीलिए
- 2:20:12उससे और दुख आता है। चाहे तुम्हें थोड़ी
- 2:20:16देर के लिए रिलीफ मिल जाए लेकिन वह बस
- 2:20:19माइंड को सुला देता है। अगर तुम दुख को
- 2:20:23जीतने की कोशिश नहीं
- 2:20:25करते तो तुम मीडियम्स या साइंटिफिक
- 2:20:29प्रूफ्स की तरफ जाते हो जो कहते हैं कि
- 2:20:32डेथ के बाद भी जिंदगी चालू रहती
- 2:20:36है। तो तुम निकालते हो अलग-अलग
- 2:20:39रास्ते जिससे तुम्हें टेंपरेरी रिलीफ
- 2:20:42मिलता है।
- 2:20:45लेकिन अगर तुम जीतने की इच्छा ही छोड़ दो
- 2:20:48और पूरी सच्चाई से समझने की इच्छा रखो कि
- 2:20:51दुख और तकलीफ का असल कॉज क्या है तो तुम
- 2:20:55पाओगे कि जब तक अंदर लोनलीनेस, शैलोनेस,
- 2:21:00खालीपन या कमी है जो बाहर से दिखती है
- 2:21:04डिपेंडेंस के रूप में तब तक पेन
- 2:21:08रहेगा। और तुम उस कमी को भर नहीं सकते।
- 2:21:12किसी ऑब्सकल को जीत के, किसी सब्सीट्यूशन
- 2:21:15से या किसी से भाग
- 2:21:19के यह सब बस दिमाग का एक स्मार्ट सा ट्रैप
- 2:21:23है जो सिर्फ कुछ पाने के चक्कर में लगा
- 2:21:25होता है। दुख सिर्फ एक हाई क्लेरिटी होती
- 2:21:29है। थॉट और इमोशन की जो तुम्हें दिखाती है
- 2:21:34चीजें जैसी हैं वह वाकई हैं।
- 2:21:40लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम उसे
- 2:21:42एक्सेप्ट कर लो या सरेंडर कर दो। जब तुम
- 2:21:46चीजें देखते हो वैसे जैसे वह हैं ट्रुथ के
- 2:21:50मिरर में जो कि इंटेलिजेंस है तो उसमें एक
- 2:21:53जॉय होती है। एक एक्ससी होती है। उसमें ना
- 2:21:57डुएलिटी होती है ना लॉस का एहसास ना ही
- 2:22:01कोई
- 2:22:03डिवीजन। मैं यह थ्योरेटिकल नहीं कह रहा
- 2:22:06अगर तुम इस बात को सीरियसली समझो।
- 2:22:10और मेमोरी वाले पहले क्वेश्चन के जवाब के
- 2:22:12साथ
- 2:22:13जोड़ो। तो तुम देखोगे कि मेमोरी ही ज्यादा
- 2:22:17से ज्यादा डिपेंडेंस क्रिएट करती
- 2:22:19है। तुम लगातार पास्ट की किसी इमोशनल याद
- 2:22:23में जाते हो। जिसे तुम्हें एक रिएक्शन
- 2:22:27मिलता है और वही रोकता है तुम्हारी
- 2:22:30इंटेलिजेंस को प्रेजेंट में फुल्ली जीने
- 2:22:36से। सवाल
- 2:22:40क्या आप कुछ एडवाइस देंगे उस इंसान को जो
- 2:22:42स्ट्रांग सेक्सुअल डिजायर से परेशान
- 2:22:49है? जब जिंदगी का क्रिएटिव एक्सप्रेशन
- 2:22:52नहीं होता तब हम सेक्स को ज्यादाेंस देने
- 2:22:56लगते हैं। और वह एक बड़ी प्रॉब्लम बन जाता
- 2:22:59है। तो सवाल यह नहीं कि मैं क्या एडवाइस
- 2:23:03दूं या कैसे तुम पैशन या सेक्सुअल डिजायर
- 2:23:06को कंट्रोल करो।
- 2:23:08सवाल यह है कि कैसे तुम उस क्रिएटिव
- 2:23:11लिविंग को रिलीज करो और सिर्फ सेक्स को
- 2:23:14अलग ट्रीट ना करो। मतलब यह समझना कि लाइफ
- 2:23:18का पूरा मतलब क्या है? उसका होलनेस उसकी
- 2:23:22कंप्लीटनेस क्या
- 2:23:26है? आज की मॉडर्न एजुकेशन, सरकमस्ट्ससेस
- 2:23:30और एनवायरमेंट के थ्रू तुम्हें ऐसे काम
- 2:23:32करने पड़ते हैं जो तुम्हें पसंद नहीं।
- 2:23:35तुम्हें वह काम नफरत लगता है पर करना
- 2:23:38पड़ता है क्योंकि तुम्हारे पास सही स्किल
- 2:23:43सही ट्रेनिंग नहीं है। तुम्हारे काम में
- 2:23:46तुम्हें रोका जा रहा है। सरकमस्ट्ससेस
- 2:23:50कंडीशंस तुम्हें रोक रही हैं। अपने आप को
- 2:23:54फंडामेंटली क्रिएटिवली एक्सप्रेस करने से।
- 2:23:57इसलिए जरूरत पड़ती है किसी आउटलेट की।
- 2:24:03और यही आउटलेट बन जाता है सेक्स का इशू या
- 2:24:07ड्रिंक का प्रॉब्लम या कोई और बेकार सी
- 2:24:09बात। और यह सभी आउटलेट्स प्रॉब्लम्स बन
- 2:24:13जाती हैं या तुम्हारा इंटरेस्ट आर्टिस्टिक
- 2:24:16हो सकता है। बहुत कम लोग सच में आर्टिस्ट
- 2:24:20होते हैं। पर तुम्हारा उस तरफ रुझान हो
- 2:24:23सकता है। लेकिन वह रुझान बार-बार ट्विस्ट
- 2:24:26हो रहा होता है। रोक दिया जाता है, दबा
- 2:24:29दिया जाता है। और तुम्हारे पास असली सेल्फ
- 2:24:33एक्सप्रेशन का कोई रास्ता नहीं बचता।
- 2:24:37तो फिर या तो सेक्स या कोई रिलीजियस
- 2:24:41ऑब्सेशन ज्यादा इंपॉर्टेंट बन जाता है या
- 2:24:45तुम्हारी एंबिशंस ही रोक दी जाती
- 2:24:48हैं। काटी जाती हैं, बंद हो जाती हैं। और
- 2:24:53फिर वही नेचुरल चीजें जो नॉर्मल होनी
- 2:24:55चाहिए उन्हें ज्यादाेंस मिलने लगती
- 2:24:59है। तो जब तक तुम अपने रिलीजियस,
- 2:25:02पॉलिटिकल, इकोनॉमिक और सोशल डिजायर्स और
- 2:25:06उनके ऑब्सकल्स को समझ नहीं लेते तब तक
- 2:25:10जिंदगी की नेचुरल चीजें ही तुम्हारी लाइफ
- 2:25:13में सबसे इंपॉर्टेंट बन जाती हैं। इसीलिए
- 2:25:17लालच,
- 2:25:18पोज़ेसिवनेस, सेक्स और जाति और सोसाइटी के
- 2:25:22फर्क जैसे प्रॉब्लम्स गलत मायने और गलत
- 2:25:25वैल्यू ले लेते हैं।
- 2:25:29लेकिन अगर तुम जिंदगी को टुकड़ों में नहीं
- 2:25:33पूरा का पूरा देखो समझो क्रिएटिवली
- 2:25:37डेलीजेंटली तो तुम देखोगे कि यह सब
- 2:25:39प्रॉब्लम्स जो दिमाग को कमजोर कर रहे हैं
- 2:25:43और क्रिएटिव लाइफ को खत्म कर रहे हैं वह
- 2:25:45सब खत्म हो जाते हैं और तब इंटेलिजेंस
- 2:25:49नेचुरली काम करती है और उसमें होती है
- 2:25:52खुशी मजा
- 2:25:56एक्ससी सवाल
- 2:26:01मुझे लगता था कि मैं आपकी बातें फॉलो कर
- 2:26:03रहा हूं। पर मेरी लाइफ में कोई जॉय नहीं,
- 2:26:06कोई एंथूजियाज्म नहीं। मेरी अवेयरनेस की
- 2:26:10कोशिशों ने कंफ्यूजन दूर नहीं किया। ना ही
- 2:26:13कोई चेंज लाया, ना ही एनर्जी। मेरी जिंदगी
- 2:26:17का आज भी उतना ही कम मतलब है जितना जब
- 2:26:20मैंने आपको पहली बार 7 साल पहले सुना था।
- 2:26:23मुझ में क्या गलत है?
- 2:26:31मुझे लगता है पहले तो पूछने वाले ने यह
- 2:26:34समझा भी है या नहीं कि मैं कह क्या रहा
- 2:26:40हूं। उसे एक्शन में लाने की कोशिश करने से
- 2:26:44पहले और वैसे भी उसे मेरी बातों को एक्शन
- 2:26:48में लाना ही क्यों
- 2:26:51चाहिए? और मेरी बातें क्या है और वह मेरी
- 2:26:55क्यों है?
- 2:26:56मैं तुम्हें कोई रूल बुक नहीं दे रहा हूं।
- 2:26:59ना कोई कोड, ना कोई सिस्टम जिसे तुम फॉलो
- 2:27:02करो। मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि अगर
- 2:27:06तुम्हें क्रिएटिवली, जॉयफुली,
- 2:27:09इंटेलिजेंटली और फुल एनर्जी के साथ जीना
- 2:27:13है, तो तुम्हारी इंटेलिजेंस को फ्री होना
- 2:27:16पड़ेगा। वह इंटेलिजेंस रुक गई
- 2:27:19है, बिखर गई है मेमोरी की वजह से। और यह
- 2:27:23मैं पहले एक्सप्लेन कर चुका
- 2:27:27हूं। जब तक तुम लगातार किसी गोल को पाने
- 2:27:30की फाइट में हो, जब तक दिमाग किसी
- 2:27:32इन्फ्लुएंस में है, तब तक डुअलिटी
- 2:27:36रहेगी। और उसके साथ ही आएगा पेन, स्ट्रगल।
- 2:27:42और जो हम ट्रुथ या रियलिटी ढूंढ रहे होते
- 2:27:45हैं, वह बस उस पेन से भागने का तरीका होता
- 2:27:49है। इसीलिए मैं कह रहा हूं यह जान लो कि
- 2:27:54तुम्हारी मेहनत, तुम्हारा स्ट्रगल,
- 2:27:56तुम्हारी पुरानी यादें यह सब तुम्हारी
- 2:27:59इंटेलिजेंस को डिस्ट्रॉय कर रही
- 2:28:02हैं। अवेयर होना मतलब सिर्फ ऊपर ऊपर से
- 2:28:06कॉन्शियस होना नहीं।
- 2:28:08बल्कि पूरे कॉन्शियसनेस की गहराई तक जाना।
- 2:28:12जहां एक भी अनकॉन्शियस रिएक्शन छुपा ना
- 2:28:15रहे। यह सब करने के लिए सोच
- 2:28:18चाहिए। दिमाग और दिल दोनों का फुल अलर्ट
- 2:28:22होना
- 2:28:24चाहिए। ना कि ऐसा दिमाग जो भर गया हो
- 2:28:28बिलीव्स, क्रेड्स और आइडियल
- 2:28:31से। ज्यादा लोगों के दिमाग इन्हीं चीजों
- 2:28:34का बोझ उठा रहे हैं।
- 2:28:37और साथ में होती है किसी को फॉलो करने की
- 2:28:41इच्छा। जब तुम्हें अपने ऊपर यह बोझ दिखे
- 2:28:45तो यह मत कहना कि तुम्हें आइडियल्स नहीं
- 2:28:48चाहिए, क्रीड्स नहीं चाहिए या फिर वही
- 2:28:50पुराना लेक्चर रिपीट मत करना। क्योंकि
- 2:28:54मुझे ऐसा होना चाहिए या नहीं होना चाहिए।
- 2:28:57कहने से एक नया रूल बन जाता है। एक नई
- 2:29:01बंदिश बस अवेयर हो जाओ। और उस अवेयरनेस की
- 2:29:04इंटेंसिटी में उस जलती हुई आग
- 2:29:08में एक ऐसा कॉन्फ्लिक्ट पैदा होगा जो खुद
- 2:29:12ही उस रुकावट को खत्म कर
- 2:29:15देगा। मैं जानता हूं कुछ लोग हर साल यहां
- 2:29:18आते हैं और मैं हर साल कोशिश करता हूं इन
- 2:29:22बातों को अलग तरीके से समझाने की।
- 2:29:26पर मुझे लगता है उन लोगों के दिमाग
- 2:29:30में सच्ची सोच बहुत कम है जो कहते हैं हम
- 2:29:35आपको 7 साल से सुन रहे
- 2:29:38हैं। मेरा मतलब सोच से यह नहीं कि सिर्फ
- 2:29:42दिमागी रीजनिंग वह तो सिर्फ राख
- 2:29:46है। मैं कह रहा हूं उस बैलेंस की बात जो
- 2:29:49इमोशन और रीजन के बीच होता है। अफेक्शन और
- 2:29:54थॉट के बीच होता है।
- 2:29:56और वह बैलेंस ऑोजिट्स के कॉन्फ्लिक्ट से
- 2:29:59अफेक्टेड नहीं
- 2:30:00होता। पर अगर तुम्हारे पास ना तो सोचने की
- 2:30:04क्लेरिटी है और ना महसूस करने की गहराई तो
- 2:30:08तुम कैसे
- 2:30:09जागोगे? कैसे वह बैलेंस पैदा होगा? कैसे
- 2:30:13यह अलर्टनेस, यह अवेयरनेस
- 2:30:17आएगी। फिर तो जिंदगी बेकार हो जाती है
- 2:30:20फीकी बिना मतलब की।
- 2:30:23तो सबसे पहली चीज जो तुम्हें करनी चाहिए
- 2:30:26अगर मैं सजेस्ट करूं वह यह कि समझो तुम इस
- 2:30:31तरीके से क्यों सोच रहे हो और इस तरीके से
- 2:30:35क्यों फील कर रहे
- 2:30:37हो अपनी सोच को बदलने की कोशिश मत करो।
- 2:30:41अपने इमोशंस को एनालाइज मत करो। सिर्फ
- 2:30:44अवेयर हो जाओ कि तुम ऐसा क्यों सोच रहे
- 2:30:47हो। और तुम्हारा एक्शन किस मोटिव से आता
- 2:30:51है। हां।
- 2:30:53तुम एनालिसिस से कुछ समझ सकते हो पर वह
- 2:30:56असली समझ नहीं होती। असली समझ तब आती है
- 2:31:00जब तुम इंटेंसली अवेयर
- 2:31:02हो। उस मोमेंट में जब तुम्हारा थॉट और
- 2:31:06इमोशन काम कर रहे
- 2:31:08हो। तब तुम उनकी सॉफ्टनेस उनकी डेलीिकसी
- 2:31:12देख पाओगे। जब तक तुम्हारे अंदर मुझे ऐसा
- 2:31:16करना चाहिए और यह नहीं करना चाहिए चलता
- 2:31:20रहेगा तब तक तुम उस थॉट और इमोशन की तेजी
- 2:31:24को नहीं पकड़
- 2:31:26पाओगे और मुझे पूरा यकीन है तुम सब इसी
- 2:31:30शुड और शुड नॉट वाले स्कूल में बड़े हुए
- 2:31:34हो इसीलिए तुमने अपनी सोच और अपना फील
- 2:31:38करना ही खत्म कर दिया है। तुम रूल्स
- 2:31:42मेथड्स
- 2:31:43और अपने टीचर्स के थ्रू बंधे हुए हो। तो
- 2:31:48छोड़ो यह सब। मुझे करना चाहिए और नहीं
- 2:31:51करना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि अब कुछ
- 2:31:54भी चलता
- 2:31:56है। बस अवेयर हो जाओ उस माइंड से जो हमेशा
- 2:32:01कह रहा होता है मुझे करना है या नहीं करना
- 2:32:04है। तब जैसे एक फूल सुबह खिलता है वैसे ही
- 2:32:08इंटेलिजेंस खिलती है। वह होती है काम करती
- 2:32:12है और समझ पैदा होती
- 2:32:15है।
- 2:32:19सवाल आर्टिस्ट को कई बार ऐसे इंसान के रूप
- 2:32:23में देखा जाता है जिसके पास वह समझ होती
- 2:32:26है जिसके बारे में आप बोलते हैं। कम से कम
- 2:32:29जब वह क्रिएटिव काम कर रहा हो। पर अगर कोई
- 2:32:32उसे डिस्टर्ब करे तो वह बहुत वायलेंटली
- 2:32:35रिएक्ट करता है और कहता है यह तो मेरा
- 2:32:37टेंपरामेंट है। लेकिन साफ दिख रहा है कि
- 2:32:40वह उस मोमेंट में फुली नहीं जी रहा। तो
- 2:32:44क्या उसने वाकई समझा है अगर वह इतनी आसानी
- 2:32:47से अपने आई में लौट आता है?
- 2:32:54तुम जिस इंसान को आर्टिस्ट कह रहे हो क्या
- 2:32:57वह सिर्फ वह आदमी है जो कभी-कभी क्रिएटिव
- 2:33:00होता है? अगर ऐसा है तो मेरे लिए वह
- 2:33:03आर्टिस्ट नहीं है। जो आदमी कभी-कभी
- 2:33:07क्रिएटिव इंपल्स में आता है और उस
- 2:33:10क्रिएटिविटी को टेक्निक के जरिए एक्सप्रेस
- 2:33:12करता है। तुम उसे आर्टिस्ट नहीं कह सकते।
- 2:33:18मेरे लिए सच्चा आर्टिस्ट वह है जो पूरी
- 2:33:21तरह जीता है। हार्मोनी में जीता
- 2:33:25है। जो अपने आर्ट को अपनी लाइफ से अलग
- 2:33:28नहीं करता। जिसकी पूरी जिंदगी ही एक
- 2:33:30एक्सप्रेशन है। चाहे वह पेंटिंग हो,
- 2:33:34म्यूजिक हो या उसका डे टू डे
- 2:33:37बिहेवियर। जो अपने कैनवस, म्यूजिक या
- 2:33:41स्टोन के काम को अपने रोज के जीवन से अलग
- 2:33:45नहीं रखता। यह सब तभी मुमकिन है जब उसमें
- 2:33:48हाईएस्ट इंटेलिजेंस हो। सबसे बड़ी
- 2:33:51हार्मोनी
- 2:33:53हो। मेरे लिए सच्चा आर्टिस्ट वह है जिसमें
- 2:33:56यह हार्मोनी
- 2:33:58हो। हो सकता है वह इसे कैनवस पर दिखाए या
- 2:34:02बात करे या पेंट
- 2:34:04करे। या हो सकता है वह कुछ भी एक्सप्रेस
- 2:34:08ना करे। बस महसूस करे। पर यह सब तभी होता
- 2:34:12है जब उसके अंदर एक डेलिकेट बैलेंस हो। एक
- 2:34:16स्ट्रांग अवेयरनेस हो और तब उसका
- 2:34:19एक्सप्रेशन उसकी डेली जिंदगी से अलग नहीं
- 2:34:26होता। हो जाए कैलिफोर्निया जून 29
- 2:34:391934 टू बी अ ट्रू ह्यूमन बीइंग
- 2:34:45जो चीज हम खुशी या एक्ससी कहते
- 2:34:49हैं मेरे लिए वह है क्रिएटिव
- 2:34:54सोचना और क्रिएटिव सोचना मतलब है सोच
- 2:34:57इमोशन और एक्शन को इनफिनिट
- 2:35:01मूवमेंट यानी जब सोच जो कि इमोशन है जो कि
- 2:35:06खुद एक्शन है जब वह फ्रीली चलती है बिना
- 2:35:09किसी रोक-टोक के बिना किसी आईडिया के
- 2:35:12प्रेशर
- 2:35:15बिना किसी इनफ्लुएंस, बिना किसी हैबिट या
- 2:35:18ट्रेडिशन के बैकग्राउंड से तब वह मूवमेंट
- 2:35:21क्रिएटिव होता
- 2:35:24है। जब तक सोच किसी फिक्स्ड आईडिया में
- 2:35:27बंधी होती
- 2:35:29है या सिर्फ बैकग्राउंड के हिसाब से
- 2:35:33एडजस्ट होती है तब तक वह लिमिटेड होती है
- 2:35:36और ऐसी सोच क्रिएटिव नहीं होती।
- 2:35:40तो हर थॉटफुल इंसान का सवाल होता है कैसे
- 2:35:44वह अपने अंदर यह क्रिएटिव सोच
- 2:35:47जगाए क्योंकि जब यह क्रिएटिव सोच होती है
- 2:35:51जो इनफिनिट मूवमेंट है तो वहां कोई
- 2:35:55लिमिटेशन या कॉन्फ्लिक्ट हो ही नहीं
- 2:35:59सकता और यह क्रिएटिव थिंकिंग किसी रिजल्ट
- 2:36:03किसी अचीवमेंट के पीछे नहीं होती इसका कोई
- 2:36:06एंड पॉइंट नहीं होता यह हमेशा चलती रहती
- 2:36:10है।
- 2:36:13लेकिन ज्यादातर दिमाग सक्सेस के पीछे
- 2:36:16भागते हैं। गोल चाहते हैं। किसी चीज को
- 2:36:20पाने के लिए खुद को डाल देते हैं एक मोल्ड
- 2:36:24में।
- 2:36:25और ऐसी सोच अपने आप को लिमिट कर लेती है।
- 2:36:29पर अगर सोच बस समझने के लिए चलती रहे बिना
- 2:36:33किसी गोल के तभी वह क्रिएटिव होती
- 2:36:37है। जब सोच किसी इन्फ्लुएंस से एडजस्ट कर
- 2:36:40रही होती है या किसी ट्रेडिशन के
- 2:36:43बैकग्राउंड से चल रही होती है जिसे समझा
- 2:36:46ही नहीं गया तो वह सोच क्रिएटिव नहीं
- 2:36:49होती।
- 2:36:51वह एक जानवर की तरह होती है जो रस्सी से
- 2:36:54बंधा होता है। जब तक यह लिमिटेशन या
- 2:36:58एडजस्टमेंट रहती है तब तक क्रिएटिव सोच जो
- 2:37:02कि आजादी है आ ही नहीं सकती।
- 2:37:07क्रिएटिव सोच कभी रिजल्ट नहीं ढूंढती
- 2:37:10क्योंकि रिजल्ट या कलमिनेशन हमेशा रुकने
- 2:37:14और चलने के बीच का आउटकम होता है। पर जब
- 2:37:18कोई रिजल्ट ढूंढने की जरूरत ही नहीं होती
- 2:37:21और सोच सिर्फ चलते रहती है तभी वह
- 2:37:24क्रिएटिव होती
- 2:37:26है। क्रिएटिव सोच में कोई डिवीजन नहीं
- 2:37:30होता। जो सोच इमोशन और एक्शन के बीच
- 2:37:34कॉन्फ्लिक्ट पैदा करें।
- 2:37:38और यह डिवीजन तभी होती है जब तुम किसी गोल
- 2:37:41को ढूंढ रहे होते हो या जब तुम्हें
- 2:37:44सर्टेनिटी से सुकून मिल रहा होता
- 2:37:47है। एक्शन भी वही मूवमेंट है जो सोच और
- 2:37:51इमोशन के साथ होती है। और यह एक्शन ही
- 2:37:55इंसान और सोसाइटी के बीच का रिश्ता है।
- 2:38:00यही कंडक्ट है, काम है, कोऑपरेशन है। जिसे
- 2:38:04हम फुलफिलमेंट कहते
- 2:38:07हैं। जब दिमाग बिना किसी गोल के काम करता
- 2:38:10है और क्रिएटिव तरीके से सोचता है तो वह
- 2:38:14सोच ही एक्शन बन जाती है। जो इंडिविजुअल
- 2:38:18और सोसाइटी के बीच का कनेक्शन बन जाती है।
- 2:38:22अगर यह सोच क्लियर, सिंपल, डायरेक्ट,
- 2:38:26स्पॉनटेनियस और डीप हो तो फिर इंडिविजुअल
- 2:38:31और सोसाइटी के बीच कोई कॉन्फ्लिक्ट ही
- 2:38:33नहीं
- 2:38:35रहता। क्योंकि एक्शन खुद ही एक जीती जागती
- 2:38:39क्रिएटिव मूवमेंट बन जाती है। इसीलिए मेरे
- 2:38:43लिए सोचने का आर्ट नाम की कोई चीज नहीं
- 2:38:47होती। सिर्फ क्रिएटिव सोच होती है। कोई
- 2:38:51सोचने की टेक्निक नहीं होती। बस एक
- 2:38:54स्पॉनटेनियस इंटेलिजेंट फंक्शन होता है।
- 2:38:57जिसमें रीजन, इमोशन और एक्शन परफेक्टली
- 2:39:01हार्मोनी में होते हैं। अलग नहीं जुड़े
- 2:39:05हुए।
- 2:39:09जब सोच और इमोशन किसी रिवॉर्ड, किसी
- 2:39:12रिजल्ट के पीछे नहीं होते, तभी वह एक रियल
- 2:39:16एक्सपेरिमेंट बन जाते हैं। है
- 2:39:19ना? रियल एक्सपीरियंस में, रियल
- 2:39:22एक्सपेरिमेंट में कोई रिजल्ट ढूंढना
- 2:39:24पॉसिबल नहीं होता।
- 2:39:27क्योंकि वह एक्सपेरिमेंट खुद क्रिएटिव सोच
- 2:39:30का मूवमेंट होता
- 2:39:32है। क्रिएटिव सोच के लिए दिमाग को
- 2:39:35कास्टेंटली उस एनवायरमेंट से फ्री करना
- 2:39:38पड़ता है जिससे वह टकराता है और वह
- 2:39:41एनवायरमेंट है पास्ट।
- 2:39:45जब दिमाग रिवॉर्ड के पीछे होता है या गोल
- 2:39:48चस करता है तो वह स्टग्नेशन और कंफर्ट में
- 2:39:52फंस जाता है और फिर उससे प्रैक्टिस चाहिए
- 2:39:56होती है। डिसिप्लिन चाहिए होता है और यही
- 2:40:00सब कॉन्फ्लिक्ट क्रिएट करता है।
- 2:40:04लोग सोचते हैं कि किसी आईडिया को बार-बार
- 2:40:06प्रैक्टिस करके वह क्रिएटिव सोच ला सकते
- 2:40:09हैं। पर अगर तुम ध्यान से देखो तो
- 2:40:12प्रैक्टिस सिर्फ डुएलिटी का रिजल्ट होती
- 2:40:15है और जो एक्शन डुएलिटी से आता है वह
- 2:40:18सिर्फ दिमाग और दिल के बीच का गैप बनाए
- 2:40:21रखता
- 2:40:22है। ऐसी एक्शन एक कैलकुलेटेड लॉजिकल सेल्फ
- 2:40:26प्रोटेक्टिव कंक्लूजन बन जाती है। अगर तुम
- 2:40:31डिसिप्लिन या सरकमस्टेंससेस के प्रेशर में
- 2:40:34प्रैक्टिस कर रहे
- 2:40:38हो तो वह सिर्फ एक चेंज है टुवर्ड किसी
- 2:40:42एंड एक लिमिटेड सोच के अंदर का एक्शन तो
- 2:40:47प्रैक्टिस से क्रिएटिव सोच नहीं आती।
- 2:40:49क्रिएटिव सोच तब आती है जब दिमाग, इमोशन
- 2:40:54और एक्शन एक हार्मोनी में होते
- 2:40:56हैं। यानी अगर तुम किसी एक्शन में पूरी
- 2:40:59तरह श्योर
- 2:41:01हो बिना किसी रिवॉर्ड के पीछे
- 2:41:05भागे तो वह एक्शन इंटेलिजेंस से आता है।
- 2:41:10जो सब रुकावटें तोड़ देता है। जो दिमाग पर
- 2:41:14समझ की कमी के कारण बनी होती है। जहां
- 2:41:17दिमाग और दिल फियर में
- 2:41:19समझ की कमी में या कंपलशन में फंसे होते
- 2:41:23हैं। वहां सोच कभी भी सच में नहीं चलती और
- 2:41:29उसकी हर एक्शन एक नई रुकावट खड़ी करती है।
- 2:41:33इसीलिए सोच की पावर और छोटी होती रहती है।
- 2:41:37पर अगर दिमाग खुद को फ्री करे,
- 2:41:40सरकमस्ट्ससेस को समझने के रास्ते और उस
- 2:41:43समझ से एक्शन करें तो वही एक्शन क्रिएटिव
- 2:41:47सोच बन जाता
- 2:41:49है।
- 2:41:52सवाल क्या आप एवरीडे लाइफ में अवेयरनेस और
- 2:41:56चॉइस का कोई प्रैक्टिकल एग्जांपल दे सकते
- 2:41:58हैं?
- 2:42:04अगर आपके कमरे में एक जहरीला सांप हो तो
- 2:42:07क्या आप यह सवाल
- 2:42:11पूछते? तब तो आप यह नहीं पूछते कि मैं
- 2:42:15कैसे इंटेंसिवली अवेयर
- 2:42:17रहूं। आप यह सवाल तभी पूछते हैं जब आपको
- 2:42:21पक्का नहीं पता कि वहां कोई जहरीला सांप
- 2:42:24है या तो आप उसे बिल्कुल अनजान हो।
- 2:42:28या आप उसके साथ खेलना चाहते हो। उसके दर्द
- 2:42:32और मजा दोनों का आनंद लेना चाहते हो।
- 2:42:36प्लीज ध्यान से
- 2:42:40सुनो। जब तक दिमाग दर्द और सुख दोनों में
- 2:42:44फंसा है तब तक अवेयरनेस वो अलर्टनेस
- 2:42:49पॉसिबल नहीं।
- 2:42:51यानी जब एक एक्सपीरियंस आपको दर्द भी देता
- 2:42:54है और सुख भी तो आप कुछ नहीं
- 2:42:58करते। आप तभी कुछ करते हो जब दर्द सुख से
- 2:43:02ज्यादा हो जाता
- 2:43:03है। पर अगर सुख ज्यादा होता है तो आप कुछ
- 2:43:07नहीं करते। क्योंकि तब कोई स्ट्रांग
- 2:43:10कॉन्फ्लिक्ट नहीं
- 2:43:12होता। एक्शन तभी होती है जब दर्द सुख से
- 2:43:16ज्यादा तेज हो।
- 2:43:19ज्यादा लोग पेन बढ़ाने का इंतजार करते
- 2:43:22हैं। फिर एक्ट करते हैं और उसी टाइम वह
- 2:43:25अवेयरनेस के तरीके ढूंढना चाहते हैं।
- 2:43:28उन्हें कोई बता नहीं
- 2:43:31सकता। वह बस दर्द के बढ़ने का इंतजार कर
- 2:43:35रहे होते हैं। ताकि दर्द उन्हें एक्शन
- 2:43:38लेने पर मजबूर
- 2:43:41करें। और जब आप कंपल्शन में एक्ट करते हो
- 2:43:45तो वहां इंटेलिजेंस नहीं होती। वह सिर्फ
- 2:43:48एनवायरमेंट का प्रेशर होता है। इसीलिए जब
- 2:43:52दिमाग स्टैगेंट हो जिसमें कोई टेंशननेस ना
- 2:43:57हो तो और ज्यादा पेन और कॉन्फ्लिक्ट आता
- 2:44:00है। मान लो पॉलिटिकल सिचुएशन को देखो।
- 2:44:06जैसा लग रहा है कोई और वॉर आ सकती है। 2
- 2:44:09साल में, 5 साल में, 10 साल में।
- 2:44:13एक इंटेलिजेंट इंसान इसको पहले से देख
- 2:44:16सकता है और एक्ट कर सकता है। पर जो इंसान
- 2:44:19स्टैगेंट है, जो बस दर्द के आने का इंतजार
- 2:44:23कर रहा है, वह केओस बढ़ने का इंतजार करता
- 2:44:26है ताकि उसे कुछ करने का रीजन
- 2:44:31मिले। तो उस वक्त उसकी इंटेलिजेंस काम ही
- 2:44:34नहीं कर रही होती।
- 2:44:37अवेयरनेस तभी होती है जब दिमाग और दिल
- 2:44:40दोनों टाइट होते हैं। टेंशन में होते
- 2:44:44हैं। मान लो तुम्हें दिखे कि पोजेसिवनेस
- 2:44:48से तुम कभी कंप्लीट नहीं हो
- 2:44:50सकते। जब तुम देखते हो कि अंदर की खालीपन
- 2:44:55जो कि शैलोनेस है हमेशा किसी पर डिपेंडेंट
- 2:44:59बनाता है और तुम्हें यह रियलाइज होता है
- 2:45:02तो तुम्हारा दिमाग और दिल क्या करते हैं?
- 2:45:06तुरंत क्रेविंग आती है उस खालीपन को फिल
- 2:45:09करने की। पर अगर तुम उस रियलाइजेशन के बाद
- 2:45:13भी सिर्फ एक्यूमुलेट करते जा रहे हो तो
- 2:45:17तुम देखते हो कि एक्यूमुलेशन में कोई
- 2:45:19क्रिएटिव सोच नहीं होती।
- 2:45:22और फिर भी दिमाग वही कर रहा होता है।
- 2:45:26इसीलिए जब तुम इस कंट्राडिक्शन को देखते
- 2:45:29हो तभी एक कॉन्फ्लिक्ट पैदा होता है और वह
- 2:45:33कॉन्फ्लिक्ट खुद ही एक्यूमुलेशन की वजह को
- 2:45:37डिॉल्व कर देता
- 2:45:40है।
- 2:45:43सवाल अगर कोई स्टेट्समैन आपकी बात समझ जाए
- 2:45:46तो वह इस समझ को पब्लिक अफेयर्स में कैसे
- 2:45:49दिखाएं या फिर वह पॉलिटिक्स से ही हट
- 2:45:56जाए। अगर उसने मेरी बात समझ ली होती तो वह
- 2:46:00पॉलिटिक्स को लाइफ से अलग ना
- 2:46:03समझता। और मुझे नहीं लगता उसे पॉलिटिक्स
- 2:46:06से रिटायर होना चाहिए।
- 2:46:09आज पॉलिटिक्स सिर्फ एक्सप्लइटेशन का टूल
- 2:46:12बन गया है। पर अगर वह पूरी लाइफ को एक
- 2:46:15यूनिट के रूप में देखे ना कि सिर्फ अपने
- 2:46:18देश, अपनी कौम, अपने लोगों तक सीमित
- 2:46:22रखे और इंसानी प्रॉब्लम्स को नेशनल नहीं
- 2:46:26बल्कि वर्ल्ड प्रॉब्लम्स की तरह देखे ना
- 2:46:29कि हिंदू, अमेरिकन या जर्मन
- 2:46:32प्रॉब्लम्स तो अगर वह समझ जाए मेरी बात
- 2:46:38तो वह पॉलिटिशियन नहीं एक सच्चा ह्यूमन
- 2:46:41बीइंग बन
- 2:46:42जाता। और मेरे लिए सबसे जरूरी बात वही है
- 2:46:46इंसान बनना ना कि सिर्फ एक एक्सपर्ट या एक
- 2:46:50एक्सप्लइटर।
- 2:46:54प्रॉब्लम यह है कि हर एक्सपर्ट अपनेप
- 2:46:56फील्ड में अटका हुआ है। पॉलिटिशियन सिर्फ
- 2:47:00पॉलिटिक्स में, मोरलिस्ट सिर्फ मोरलिटी
- 2:47:03में, स्पिरिचुअल गुरु सिर्फ स्पिरिचुअलिटी
- 2:47:06में।
- 2:47:11सब एक दूसरे को अलग करके देखते हैं। हमारी
- 2:47:14सोसाइटी का पूरा स्ट्रक्चर इसी पर बना है।
- 2:47:18और यह अलग-अलग एक्सपर्ट्स मिलके और ज्यादा
- 2:47:21केस क्रिएट करते हैं। अगर हम एज ह्यूमन
- 2:47:26बीइंग्स पॉलिटिक्स, रिलीजन, इकोनॉमिक्स और
- 2:47:30सोशल लाइफ के बीच का कनेक्शन देख सकें। तो
- 2:47:35हम
- 2:47:37इंडिविजुअलिस्टिकली अलग सोच के काम नहीं
- 2:47:41करते। इंडिया में करोड़ों भूखे
- 2:47:45हैं। एक हिंदू नेशनलिस्ट कहता है पहले हम
- 2:47:49नेशन बन जाए फिर भूख का स्यूशन
- 2:47:52निकालेंगे। पर मेरे लिए सशन यह है कि हम
- 2:47:56नेशनलिज्म को ही छोड़ दें। क्योंकि भूख एक
- 2:48:00वर्ल्ड प्रॉब्लम
- 2:48:01है। और आइसोलेशन से सिर्फ भूख और बढ़ती
- 2:48:05है। तो अगर कोई पॉलिटिशियन सिर्फ
- 2:48:07पॉलिटिक्स तक लिमिटेड रहे तो वह और ज्यादा
- 2:48:11डिस्ट्रक्शन
- 2:48:12करेगा। पर अगर वह लाइफ को एक होल के रूप
- 2:48:16में देखे जिसमें कोई रेस, नेशनलिटी या
- 2:48:20क्लास का फर्क ना हो तो फिर वह पॉलिटिशियन
- 2:48:24नहीं एक सच्चा इंसान बन जाता है।
- 2:48:32सवाल आपने कहा था कि अगर दो या तीन लोग
- 2:48:36समझ जाए तो आप दुनिया बदल सकते हो। बहुत
- 2:48:40लोग मानते हैं कि वह खुद समझते हैं और ऐसे
- 2:48:42और लोग भी हैं जैसे कि आर्टिस्ट और
- 2:48:45साइंटिस्ट। फिर भी दुनिया बदली नहीं।
- 2:48:48प्लीज बताइए कि आप किस तरीके से दुनिया को
- 2:48:52बदलते? क्या आप अभी दुनिया को बदल नहीं
- 2:48:56रहे हो? धीरे-धीरे और सल तरीके से ही सही।
- 2:48:59लेकिन फिर भी एक डेफिनेट तरीके
- 2:49:01से अपने बोलने, जीने और जो इन्फ्लुएंस
- 2:49:05आपका ह्यूमन थॉट पे आएगा आने वाले सालों
- 2:49:08में उसके जरिए। क्या यही वह बदलाव है जो
- 2:49:12आपने सोचा था या कुछ ऐसा जो तुरंत
- 2:49:14पॉलिटिकल, इकोनॉमिक और रेशियल स्ट्रक्चर
- 2:49:17को बदल दे।
- 2:49:22मुझे लगता है मैंने कभी एक्शन के तुरंत
- 2:49:25इफेक्ट के बारे में नहीं
- 2:49:27सोचा। अगर कोई रिजल्ट सही और लंबे समय तक
- 2:49:31चलने वाला होना चाहिए तो उसके पीछे गहरी
- 2:49:35ऑब्जरवेशन, सोच और इंटेलिजेंस होनी
- 2:49:39चाहिए। और बहुत कम लोग हैं जो क्रिएटिवली
- 2:49:43सोचना चाहते हैं या इनफ्लुएंस और बायस से
- 2:49:47फ्री होना चाहते हैं।
- 2:49:50अगर आप इंडिविजुअली सोचना शुरू करो तो तभी
- 2:49:54आप इंटेलिजेंटली कोऑपरेट कर सकते हो और जब
- 2:49:58तक इंटेलिजेंस नहीं होती तब तक कोऑपरेशन
- 2:50:01नहीं सिर्फ कंपल्शन होता है और वही केओस
- 2:50:05का रीजन
- 2:50:08है।
- 2:50:11सवाल क्या एक आदमी अपने एक्शंस को कंट्रोल
- 2:50:14कर सकता है? अगर हम एक टाइम पर अपने पास्ट
- 2:50:16एक्सपीरियंस का टोटल हैं? और कोई
- 2:50:19स्पिरिचुअल सेल्फ नहीं है तो क्या हम अपने
- 2:50:22इन्हहेरिटेंस पास्ट ट्रेनिंग और जो
- 2:50:24स्टिमुली हम पर काम कर रहे हैं उसके अलावा
- 2:50:27किसी और तरीके से एक्ट कर सकते हैं अगर
- 2:50:30हां तो फिजिकल प्रोसेस में चेंज कैसे आता
- 2:50:33है और कौन करता
- 2:50:40है? क्या एक आदमी अपने एक्शंस को कंट्रोल
- 2:50:44कर सकता है? अगर उसने एनवायरमेंट को नहीं
- 2:50:47समझा।
- 2:50:49तो
- 2:50:51नहीं तब वह सिर्फ एनवायरमेंट के प्रेशर
- 2:50:54इनफ्लुएंस में एक्ट करता है और ऐसी एक्शन
- 2:50:59एक्शन नहीं रिएक्शन होती है या सिर्फ
- 2:51:02सेल्फ प्रोटेक्शन।
- 2:51:05पर अगर एक आदमी एनवायरमेंट को समझना शुरू
- 2:51:08करें, उसका पूरा सिग्निफिकेंस और वैल्यू
- 2:51:11देखे तो फिर वह अपने एक्शंस का मालिक बन
- 2:51:15जाता है। तब वह इंटेलिजेंट बन जाता है और
- 2:51:18फिर चाहे कंडीशन कुछ भी हो वह हमेशा
- 2:51:22इंटेलिजेंटली एक्ट करेगा।
- 2:51:27अगर हम एक समय पर सिर्फ अपने पास्ट का
- 2:51:29रिजल्ट हैं और स्पिरिचुअल सेल्फ नहीं है
- 2:51:32तो क्या हम कोई और तरीका चूज़ कर सकते हैं
- 2:51:35एक्ट करने
- 2:51:37का? जो मैंने पहले कहा वह यहां भी अप्लाई
- 2:51:40होता है। अगर आदमी सिर्फ पास्ट के बर्डन
- 2:51:44से एक्ट करता
- 2:51:46है। चाहे वह इंडिविजुअल हो या रेशियल
- 2:51:51इनहेरिटेंस तो वह सिर्फ फियर का रिएक्शन
- 2:51:54है।
- 2:51:57पर अगर वह अपने सबकॉन्शियस को समझता है
- 2:52:01यानी अपने पास्ट के एक्यूमुलेशन को तो वह
- 2:52:05पास्ट से फ्री हो जाता है और जब वह पास्ट
- 2:52:08से फ्री होता है तब वह एनवायरमेंट के
- 2:52:11प्रेशर से भी फ्री होता
- 2:52:13है। आखिर
- 2:52:15में एनवायरमेंट प्रेजेंट का भी है और
- 2:52:19पास्ट का भी।
- 2:52:21इंसान प्रेजेंट को इसलिए नहीं समझ पाता
- 2:52:24क्योंकि उसका दिमाग पास्ट के क्लाउड से
- 2:52:26ढका होता है। और दिमाग को पास्ट के
- 2:52:30अनकॉन्शियस हिंडरेंसेस से फ्री करने का
- 2:52:33मतलब यह नहीं कि मेमोरी को पीछे धकेल दो।
- 2:52:37बल्कि प्रेजेंट में फुली कॉन्शियस होना।
- 2:52:41और जब तुम प्रेजेंट में पूरी तरह से
- 2:52:43कॉन्शियस होते हो तो पास्ट के सारे
- 2:52:46हिंडरेंससेस सरफेस पर आते हैं। और अगर तुम
- 2:52:50अवेयर हो तो तुम उनका पूरा अर्थ देखते हो।
- 2:52:55और इसी तरह तुम प्रेजेंट को समझ लेते हो।
- 2:52:59अगर ऐसा है तो फिजिकल प्रोसेससेस में चेंज
- 2:53:03कैसे आता है? जितना मुझे लगता है क्वेश्चन
- 2:53:08यह पूछना चाह रहे हैं कि वह एक्शन जो
- 2:53:11एनवायरमेंट से फोर्स होती है वह कैसे
- 2:53:14बदलती
- 2:53:16है? आदमी एक पर्टिकुलर तरीके से एक्ट करता
- 2:53:19है क्योंकि एनवायरमेंट ने उसे मजबूर किया।
- 2:53:23पर अगर वह एनवायरमेंट को इंटेलिजेंटली
- 2:53:26समझे तो फिर कोई कंपलशन नहीं होती। वहां
- 2:53:30अंडरस्टैंडिंग होती है और वही
- 2:53:32अंडरस्टैंडिंग एक्शन बन जाती है।
- 2:53:37सवाल मैं एक ऐसे वर्ल्ड में जीता हूं जहां
- 2:53:40पॉलिटिकल, इकोनॉमिक और सोशल केओस है। लॉज़
- 2:53:44और कन्वेंशंस मुझे रिस्ट्रिक्ट करते हैं।
- 2:53:47जब मेरी डिजायर्स इन चीजों से टकराती है
- 2:53:50तो मुझे या तो लॉ तोड़ना पड़ता है और उसके
- 2:53:53कॉन्सिक्वेंसेस लेने पड़ते हैं या अपने
- 2:53:56डिजायर्स को दबाना पड़ता
- 2:53:58है। तो ऐसे वर्ल्ड में क्या सेल्फ
- 2:54:01डिसिप्लिन से कोई एस्केप है?
- 2:54:06सेल्फ डिसिप्लिन सिर्फ एनवायरमेंट के
- 2:54:09एडजस्टमेंट का दूसरा नाम है जो
- 2:54:12कॉन्फ्लिक्ट के थ्रू होता है।
- 2:54:16यही मैं सेल्फ डिसिप्लिन बोलता
- 2:54:20हूं। आपने एक पैटर्न या आइडियल बनाया है
- 2:54:23जो एक कंपल्शन की तरह काम करता है और आप
- 2:54:28अपने दिमाग को फोर्स करते हो उस पैटर्न
- 2:54:30में फिट करने के लिए।
- 2:54:34आप उसे मॉडिफाई करते हो, कंट्रोल करते हो
- 2:54:38और ऐसा करने से क्या होता
- 2:54:40है? आप अपनी क्रिएटिविटी को डिस्ट्रॉय कर
- 2:54:44रहे हो। आप अपनी ट्रू अफेक्शन को दबा रहे
- 2:54:48हो। पर अगर आप एनवायरमेंट को समझना शुरू
- 2:54:51करो तो फिर ना कोई रिप्रेशन रहती है ना
- 2:54:55सिर्फ एडजस्टमेंट जिसे आप सेल्फ डिसिप्लिन
- 2:54:58कहते हो।
- 2:55:00तो एनवायरमेंट को कैसे
- 2:55:03समझें? उसका पूरा वैल्यू और मीनिंग कैसे
- 2:55:06समझें? क्या चीज रोक रही है उसे देखने
- 2:55:10में? सबसे पहले फियर,
- 2:55:14डर। फियर ही प्रोटेक्शन या सिक्योरिटी
- 2:55:17ढूंढने का रीजन है। चाहे वह फिजिकल हो,
- 2:55:22स्पिरिचुअल, रिलीजियस या इमोशनल।
- 2:55:27जब तक यह सर्च चालू है तब तक फियर भी
- 2:55:31रहेगा और फियर एक वॉल बनाता है आपके माइंड
- 2:55:35और एनवायरमेंट के बीच वही वॉल कॉन्फ्लिक्ट
- 2:55:39क्रिएट करती है और जब तक आप सिर्फ
- 2:55:42एडजस्टमेंट और मॉडिफिकेशन में लगे रहते हो
- 2:55:45और फियर के रूट को नहीं समझते उसकी जड़ को
- 2:55:50तब तक यह कॉन्फ्लिक्ट खत्म नहीं होगा।
- 2:55:55जहां भी सिक्योरिटी, सर्टेनिटी या किसी
- 2:55:59गोल की तलाश होती है, जो क्रिएटिव सोच को
- 2:56:02रोकती है, वहां माइंड को एडजस्ट करना
- 2:56:05पड़ता
- 2:56:06है। जिसे हम सेल्फ डिसिप्लिन कहते हैं जो
- 2:56:10बस एक कंपल्शन होता है। एक पैटर्न की नकल
- 2:56:14होती है।
- 2:56:16लेकिन जब माइंड देख लेता है कि चीजें जमा
- 2:56:20करने या नॉलेज इकट्ठा करने में कोई
- 2:56:23सिक्योरिटी होती ही नहीं तब माइंड फियर से
- 2:56:26फ्री हो जाता
- 2:56:27है। और जब फियर नहीं होती तो माइंड खुद ही
- 2:56:31इंटेलिजेंस बन जाता है। और जो चीज
- 2:56:35इंटेलिजेंस होती है, वह अपने आप को
- 2:56:37डिसिप्लिन नहीं
- 2:56:38करती। सेल्फ डिसिप्लिन सिर्फ वहां होती है
- 2:56:42जहां इंटेलिजेंस नहीं होती। जहां
- 2:56:44इंटेलिजेंस होती है वहां अंडरस्टैंडिंग
- 2:56:48होती है जो फ्री होती है इनफ्लुएंस
- 2:56:51कंट्रोल और डोमिनेशन
- 2:56:55से।
- 2:56:57सवाल अगर किसी इंसान के अंदर एब्स्ट्रैक्ट
- 2:57:00आईडियाज समझने की एबिलिटी ही नहीं है तो
- 2:57:03उसमें थॉट कैसे जगाया जा सकता है?
- 2:57:08सिंपल है सफरिंग के प्रोसेस से या फिर
- 2:57:13बार-बार के एक्सपीरियंस से।
- 2:57:17लेकिन प्रॉब्लम यह है कि हमने अपने आसपास
- 2:57:20इतने झूठे वैल्यूस का शेल्टर ले लिया है
- 2:57:24कि हमने सोचना ही छोड़ दिया
- 2:57:27है। और फिर हम पूछते हैं हमें क्या करना
- 2:57:31चाहिए? सोच कैसे जगाएं?
- 2:57:35हमने फिय्स को कल्टीवेट किया है और उन
- 2:57:37फियर्स को वर्चूस और आइडियल्स का नाम दे
- 2:57:40दिया
- 2:57:41है। माइंड उन्हीं आइडियल्स के पीछे छुप
- 2:57:45जाता है और एक्शन भी उसी शेल्टर से निकलता
- 2:57:49है। इसलिए वह रियल थॉट या रियल एक्शन नहीं
- 2:57:54होता। वह सिर्फ फियर से पैदा हुआ रिएक्शन
- 2:57:57होता है जो माइंड को क्रिपल्ड कर देता
- 2:58:01है। सोच कैसे जगाएं? कभी कोई बड़ी ट्रेजडी
- 2:58:06जैसे किसी अपने की डेथ हो जाए या कोई
- 2:58:09एक्सीडेंट हो या डिप्रेशन आए तो वह आपको
- 2:58:12कॉन्फ्लिक्ट में डाल देते
- 2:58:14हैं। बाहरी सरकमस्ट्ससेस आपको एक्ट करने
- 2:58:18पर मजबूर करते हैं और जब आप कंपल्शन से
- 2:58:21एक्ट करते हो तब रियल थॉट का अवेकनिंग
- 2:58:24नहीं
- 2:58:28होता। क्योंकि वह एक्शन भी फियर से होती
- 2:58:31है। लेकिन अगर आप देख लें कि आप हर बार
- 2:58:35किसी सिचुएशन के आने का इंतजार नहीं कर
- 2:58:38सकते। तब आप शुरू करते हो उन्हीं सिचुएशंस
- 2:58:41को देखना,
- 2:58:43समझना। फिर आप उन्हीं एनवायरमेंट्स को
- 2:58:46डीपली ऑब्जर्व करते हो। आप डिप्रेशन का
- 2:58:49वेट नहीं करते कि वह आपको वर्चुअस बना दे।
- 2:58:53बल्कि आप अपने माइंड को पोज़ेसिवनेस और
- 2:58:56कंपलसशन से फ्री करते हो।
- 2:59:01जो सिस्टम हमने बनाया है वह यह कहता है कि
- 2:59:05पोजेस करना सही
- 2:59:07है और जितना ज्यादा आपके पास है उतना ही
- 2:59:11आप अच्छे
- 2:59:13हैं। आपने खुद ही यह सिस्टम बनाया और आप
- 2:59:18अब उस सिस्टम के स्लेव बन गए हैं। आप एक
- 2:59:22दूसरा सिस्टम भी बना सकते हैं जो
- 2:59:24पोज़ेसिवनेस पे बेस्ड ना हो। लेकिन वह नया
- 2:59:28सिस्टम भी आपको फोर्स करेगा किसी नए तरीके
- 2:59:32से जीने के लिए। जैसे यह सिस्टम करता है
- 2:59:35तो फर्क क्या हुआ? कोई भी
- 2:59:38नहीं। आप सिर्फ सरकमस्ट्ससेस या लॉ के
- 2:59:42थ्रू किसी एक डायरेक्शन में धकेले जा रहे
- 2:59:46हैं। इसीलिए वहां कोई क्रिएटिव थिंकिंग
- 2:59:49नहीं होती।
- 2:59:52लेकिन अगर इंटेलिजेंस फंक्शन करना शुरू कर
- 2:59:55दे तो आप किसी भी सोसाइटी के स्लेव नहीं
- 2:59:59बनोगे। चाहे वह पोजेसिव हो या नॉन
- 3:00:03पोजेसिव। पर माइंड को फ्री करने के लिए
- 3:00:06बहुत इंटेंसिटी चाहिए। एक कास्टेंट
- 3:00:09अलर्टनेस चाहिए। एक ऑब्जरवेशन चाहिए जो
- 3:00:13खुद ही कॉन्फ्लिक्ट क्रिएट करता है। यह
- 3:00:16अलर्टनेस खुद ही एक डिस्टरबेंस लाता है और
- 3:00:20जब वह क्राइसिस आती है वह कॉन्फ्लिक्ट
- 3:00:22इंटेंस हो जाता
- 3:00:24है। और अगर आप उसे एस्केप नहीं कर रहे हो
- 3:00:29तो माइंड नई तरह सोचना शुरू करता है।
- 3:00:33क्रिएटिव तरीके से सोचता है। और वही सोच
- 3:00:38वही रियल थिंकिंग वही है
- 3:00:43एटरर्निटी हो जाए कैलिफोर्निया जून 30
- 3:00:48[संगीत]
- 3:00:561934 बीइंग वनरेबल टू
- 3:00:59ट्रुथ सच के लिए खुला हुआ होना
- 3:01:05मुझे लगता है ज्यादातर लोग सुनने का अर्थ
- 3:01:09भूल गए
- 3:01:11हैं। वह अपने स्पेसिफिक प्रॉब्लम्स ले आते
- 3:01:15हैं और सोचते हैं कि मेरी बात सुनके उनकी
- 3:01:18प्रॉब्लम सॉल्व हो
- 3:01:20जाएगी। मुझे लगता है ऐसा नहीं होगा।
- 3:01:25लेकिन अगर आप सही तरीके से सुनना जाने तो
- 3:01:29आप पूरे को समझना शुरू करेंगे और आपका
- 3:01:33माइंड किसी एक स्पेसिफिक बात में उलझेगा
- 3:01:38नहीं। तो अगर आप चाहे तो मैं यह सजेस्ट
- 3:01:43करूं कि इस बात से कोई स्पेसिफिक स्यूशन
- 3:01:46मत ढूंढिए या अपने दर्द का कोई तुरंत इलाज
- 3:01:50मत चाहिए।
- 3:01:53मैं आपकी मदद तभी कर सकता हूं या आप खुद
- 3:01:56की मदद तभी कर सकते हैं जब आप नए तरीके से
- 3:02:00सोचना शुरू करें
- 3:02:03क्रिएटिवली। जिंदगी को अलग-अलग प्रॉब्लम्स
- 3:02:06का जोड़ा मत
- 3:02:09समझिए। उसे एक पूरे रूप में
- 3:02:12देखिए। एक ऐसे माइंड के साथ जो सशंस के
- 3:02:16प्रेशर से दबा हुआ ना हो।
- 3:02:21अगर आप बिना बर्डन के सुनेंगे और एक पूरी
- 3:02:25तस्वीर के नजरिए से
- 3:02:27देखेंगे तो आपकी स्पेसिफिक प्रॉब्लम भी एक
- 3:02:30नए तरीके से दिखने
- 3:02:32लगेगी और हो सकता है तुरंत सॉल्व ना हो
- 3:02:37लेकिन आप उसका असली रीजन देखने
- 3:02:41लगेंगे नए तरीके से सोचने में दोबारा
- 3:02:44सोचना सीखने में वो कॉन्फ्लिक्ट्स और
- 3:02:48प्रॉब्लम्स डिोल्व होने लगेंग जो माइंड और
- 3:02:52हार्ट को बर्डन करती
- 3:02:55हैं। जिनसे हर तरह का पेन,
- 3:02:58डिसहार्मोनी और सफरिंग पैदा होती
- 3:03:02है। हर इंसान कुछ ना कुछ चाहता है। पर वह
- 3:03:08चाह अलग-अलग होती है। उसके एनवायरमेंट,
- 3:03:12टेंपरामेंट और अपब्रिंगिंग के हिसाब से।
- 3:03:18अपने अपनी अपब्रिंगिंग रिलीजन, सोसाइटी और
- 3:03:21इकोनमी के बेसिस पर कुछ ऑब्जेक्टिव्स सेट
- 3:03:26कर लिए हैं। और अब उनके पीछे लगातार भाग
- 3:03:30रहे हो।
- 3:03:33और जब आपने एक ऑब्जेक्टिव बना लिया तो
- 3:03:36नेचुरली कुछ स्पेशलिस्ट भी आते
- 3:03:39हैं जो आपको उस गोल तक पहुंचाने के तरीके
- 3:03:43बताते
- 3:03:44हैं। इसलिए टेक्निक का परफेक्शन और
- 3:03:49स्पेशलाइजेशन बस एक मींस बन जाता है आपके
- 3:03:53एंड तक पहुंचने का।
- 3:03:56और उस एंड को पाने के लिए जो आपने अपने
- 3:04:00कंडीशनिंग के थ्रू सेट किया
- 3:04:03है। आपको स्पेशलिस्ट की जरूरत पड़ती
- 3:04:08है। तो आपका एक्शन खुद अपनी वैल्यू खो
- 3:04:12देता
- 3:04:13है। क्योंकि आप सिर्फ रिजल्ट चाहते हो ना
- 3:04:17कि उस एक्शन में जो इंटेलिजेंस और
- 3:04:20फुलफिलमेंट होती
- 3:04:23है। जिंदगी एक मीडियम बन जाती
- 3:04:27है। एक स्कूल जिसमें सिर्फ किसी गोल तक
- 3:04:31पहुंचने की ट्रेनिंग होती
- 3:04:34है। एक्शन सिर्फ एक जरिया बन जाता है। उस
- 3:04:38ऑब्जेक्टिव तक जाने का जो आपने सोसाइटी और
- 3:04:42कंडीशनिंग के थ्रू बना लिया
- 3:04:45है। तो जिंदगी बन जाती है एक बड़ा
- 3:04:48स्ट्रगल, एक कॉन्फ्लिक्ट ना कि एक
- 3:04:52फुलफिलिंग और रिच
- 3:04:56एक्सपीरियंस। और फिर आप पूछते हो जिंदगी
- 3:04:59का एंड क्या है? जिंदगी का मकसद क्या
- 3:05:03है? यह ज्यादातर लोगों के दिमाग में होता
- 3:05:07है। हम क्यों जी रहे हैं? क्या गोल है?
- 3:05:11आपको प्रेजेंट में जीना नहीं आता। इसलिए
- 3:05:14आपको फ्यूचर का मकसद चाहिए।
- 3:05:18लेकिन जो इंसान सच में फुलफिल करता है, वह
- 3:05:22कभी भी एंड के बारे में नहीं पूछता
- 3:05:25क्योंकि उसके लिए फुलफिलमेंट ही काफी होती
- 3:05:28है।
- 3:05:30लेकिन आप फुलफिलमेंट नहीं हो
- 3:05:33पाते। आपको जीना नहीं आता डीपली, रिचली,
- 3:05:38कंप्लीटली। इसलिए आप एक गोल ढूंढते हो।
- 3:05:42आप सोचते हो अगर आपको एंड पता होगा तो आप
- 3:05:46जिंदगी को उस गोल की तरफ ले जा सकते
- 3:05:49हो और फिर आप लाइफ को एक मेजर बना लेते
- 3:05:54हो। एक तरीका बनाते हो उस एंड तक पहुंचने
- 3:05:59का। चाहे कॉन्शियसली हो या
- 3:06:04अनकॉन्शियसली। आप पपस ढूंढना शुरू कर देते
- 3:06:07हो।
- 3:06:08और हर कोई आपको अपने हिसाब से आंसर देता
- 3:06:12है। अगर आप किसी आर्टिस्ट से पूछो तो वह
- 3:06:16बोलेगा लाइफ का मकसद है सेल्फ
- 3:06:21एक्सप्रेशन। पेंटिंग, म्यूजिक या पोएट्री
- 3:06:24के
- 3:06:25थ्रू। इकोनॉमिस्ट बोलेगा लाइफ का मकसद है
- 3:06:29काम करना। प्रोडक्शन
- 3:06:33कोपरेशन एक ग्रुप में
- 3:06:36जीना और रिलीजन वाला बोलेगा गॉड को ढूंढना
- 3:06:40रियलाइज
- 3:06:42करना उन रूल्स के अकॉर्डिंग जीना जो
- 3:06:45टीचर्स और प्रॉफिट्स ने
- 3:06:48बताए हर स्पेशलिस्ट आपको एक अलग आंसर देगा
- 3:06:52और आप अपने टेंपरामेंट और इमेजिनेशन के
- 3:06:57हिसाब से उन आंसर्स को अपना डोगमा बना
- 3:07:02गेयल्स आपके लिए एक सेफ प्लेस बन जाते हैं
- 3:07:06जिन्हें आप यूज करते हो प्रोटेक्शन के
- 3:07:11लिए। इस दुनिया के केओस में आप उन
- 3:07:15आइडियल्स के बेसिस पर अपनी एक्सपीरियंसेस
- 3:07:18को मेजर करते हो और सिर्फ एनवायरमेंट के
- 3:07:21पर्पस को समझने की कोशिश करते हो। बिना यह
- 3:07:25समझे कि फुलफिलमेंट क्या है?
- 3:07:30और जब आप पपस ढूंढने लगते हो अपनी
- 3:07:33कंडीशनिंग के लेंस से तब आप लिविंग के
- 3:07:37रियल कॉन्फ्लिक्ट से बच जाते हो। आप
- 3:07:40अंडरस्टैंडिंग नहीं चाहते। आप बस एस्केप
- 3:07:43चाहते हो।
- 3:07:47हमने जिंदगी को अलग-अलग हिस्सों में बांट
- 3:07:50दिया है। आइडियल्स, मकसद, मंजिलें, हासिल,
- 3:07:55अंत और दूसरी तरफ परेशानी, टकराव, अशांति,
- 3:08:02बेचैनी और तीसरी तरफ तुम खुद अपनी मैं
- 3:08:07वाली सोच के साथ।
- 3:08:12यानी जिंदगी के तीन टुकड़े कर दिए हैं।
- 3:08:16तुम इस टकराव में फंसे हो। और इस टकराव,
- 3:08:20इस दर्द, इस परेशानी से गुजरते हुए एक
- 3:08:23मंजिल, एक मकसद की तरफ पढ़ रहे हो।
- 3:08:27तुम इस परेशानी को चीरते हुए एक सेफ जगह
- 3:08:31तक पहुंचना चाहते हो जिसे तुमने आइडियल या
- 3:08:35गोल बना रखा
- 3:08:38है। और यह आइडियल्स, यह गोल्स, यह
- 3:08:43रिफ्यूज यह सब बनाए गए हैं इकोनॉमिक,
- 3:08:46रिलीजियस और स्पिरिचुअल एक्सपर्ट्स के
- 3:08:49जरिए।
- 3:08:51तो तुम एक तरफ से गुजरते हो इस एनवायरमेंट
- 3:08:54इस परेशानी से और दूसरी तरफ भाग रहे हो उन
- 3:08:58गोल्स की तरफ जो तुम्हारे लिए सेफ जगह बन
- 3:09:01चुके
- 3:09:03हैं। तुम जिंदगी के मकसद के बारे में
- 3:09:06इसलिए सोच रहे हो क्योंकि तुम प्रेजेंट
- 3:09:08में इंटेलिजेंट नहीं हो पा रहे।
- 3:09:12जो इंसान पूरी तरह एक्टिव है, सिर्फ बिजी
- 3:09:15नहीं बल्कि इमोशनली और इंटेलिजेंटली जिंदा
- 3:09:19है, वह ऑलरेडी फुलफिल हो चुका
- 3:09:25है। इसलिए जिंदगी का कोई एंड या स्टार्ट
- 3:09:29नहीं होता। जिंदगी एक कास्टेंट मूवमेंट है
- 3:09:32क्रिएटिव थिंकिंग का।
- 3:09:35और जो तुम प्रॉब्लम्स कहते हो वह तुम्हारे
- 3:09:38उसी स्ट्रगल का रिजल्ट है जिसमें तुम एक
- 3:09:41एंड तक पहुंचना चाहते
- 3:09:44हो। तुम्हारी जिंदगी इसी में लगी है। कैसे
- 3:09:48इस स्ट्रगल से निकला जाए? कैसे इसे जीता
- 3:09:52जाए?
- 3:09:53कैसे इसे डज किया
- 3:09:57जाए? और इसी परफेक्ट एस्केप को तुम आइडियल
- 3:10:00या पपस ऑफ लाइफ कह देते हो।
- 3:10:05और जब तुम जीतने, भागने, पहुंचने की सोच
- 3:10:08में हो तो नेचुरली तुम्हें सिस्टम्स
- 3:10:11चाहिए, लीडर्स चाहिए, गुरुस
- 3:10:15चाहिए। मेरे लिए यह सब एक्सप्लइटर्स
- 3:10:19हैं। सिस्टम्स, उनके टीचर्स, उनका
- 3:10:24कंपटीशन, उनका
- 3:10:26चालाकपन, उनका प्रॉमिस देना और धोखा देना।
- 3:10:30यह सब अलग-अलग सेक्स और कर्ट्स क्रिएट
- 3:10:33करते
- 3:10:33हैं। तुम अटेनमेंट चाहते हो, एक रिजल्ट
- 3:10:37चाहते हो, लेकिन तुम खुद को मैं को नहीं
- 3:10:41समझते। ना ही उस गोल को जो तुम चस कर रहे
- 3:10:45हो कॉन्शियसली या
- 3:10:49अनकॉन्शियसली। और जब तक तुम खुद को नहीं
- 3:10:52देखते तब तक तुम दूसरों के छोटे गोल्स,
- 3:10:56उनकी जेलसी, उनके रूल्स में फंसते रहोगे।
- 3:11:00तुम सिर्फ उस स्ट्रगल को ले चलते हो ना कि
- 3:11:03उस स्ट्रगल में तुम कौन हो और कैसे एक्ट
- 3:11:06कर रहे
- 3:11:08हो। मेरे लिए तो स्ट्रगल एंड और तुम यह सब
- 3:11:12एक ही चीज है। यह अलग-अलग पार्ट्स तुमने
- 3:11:16खुद बनाए हैं। और बनाए हैं गेन चाहने की
- 3:11:20वजह से फायदे के
- 3:11:23लिए। जिसका बेस है तुम्हारे अंदर की
- 3:11:26खालीपन वाली फीलिंग।
- 3:11:29जब तुम्हें लगता है तुम कुछ नहीं हो तो
- 3:11:33तुम सोचना शुरू करते हो कैसे कुछ बन सकते
- 3:11:38हो और वहीं से शुरू होती है यह
- 3:11:42डिवीजन तुम और तुम्हारा गोल
- 3:11:47लेकिन जब फुलफिलमेंट होता है तब ना एक्टर
- 3:11:50बचा है ना एक्ट सिर्फ एक क्रिएटिव सोच का
- 3:11:54फ्लो होता है जो किसी रिजल्ट की तलाश नहीं
- 3:11:58करता बस कंटीन्यूसली जीता है और वही है
- 3:12:03इमोर्टिटी।
- 3:12:07लेकिन तुमने लाइफ को डिवाइड कर दिया है।
- 3:12:09अब सोचो यह मैं यह एक्टर, यह ऑब्जर्वर, यह
- 3:12:15कॉन्फ्लिक्ट का सेंटर है
- 3:12:17क्या? यह सिर्फ एक लंबी मेमोरी का रोल है।
- 3:12:21इस मैं में कुछ हाई पॉइंट्स होते हैं और
- 3:12:24कुछ लो।
- 3:12:26इन्हीं हाईज और लोस को तुम कहते हो
- 3:12:29कॉम्प्लेक्सेस और इन्हीं से तुम एक्ट करते
- 3:12:33हो। तुम्हारा माइंड जब अपनी कमी महसूस
- 3:12:37करता
- 3:12:38है तब गेन के पीछे भागता है और उसी से
- 3:12:43होती है
- 3:12:45डिवीजन। ऐसा माइंड एनवायरमेंट को समझ ही
- 3:12:49नहीं सकता तो उसे रिलाई करना पड़ता है
- 3:12:53मेमोरी पर।
- 3:12:55मेमोरी सिर्फ एक कलेक्शन है एक्सपीरियंसेस
- 3:12:59का जो तुम्हारे एकशंस को गाइड करता है एक
- 3:13:02प्रीसेट गोल की तरफ और यह गोल क्या होता
- 3:13:07है एक सेल्फ प्रोटेक्शन का एक
- 3:13:10इल्लुजन जो तुमने आइडियल गॉड परफेक्शन या
- 3:13:15ट्रुथ नाम दे दिया
- 3:13:18है बिगिनिंग और एंड तुम और
- 3:13:22गोल यह सब एक सेल्फ प्रोटेक्टिव माइंड के
- 3:13:26बनाए हुए इल्लुजंस
- 3:13:29हैं। मैंने बताया कैसे यह सेल्फ
- 3:13:31प्रोटेक्टिव माइंड बनाता है। जब तुम्हें
- 3:13:35अपने खालीपन का एहसास होता है तब तुम गेन
- 3:13:39और अचीवमेंट के बारे में सोचना शुरू करते
- 3:13:42हो और वही सोच डिवाइड कर देती है जिंदगी
- 3:13:45को और लिमिट कर देती है तुम्हारे एकशंस
- 3:13:50को तो एंड और तुम दोनों बन जाते हैं इस
- 3:13:54सेल्फ प्रोटेक्टिव माइंड के
- 3:13:57प्रोडक्ट और टर्मल कॉन्फ्लिक्ट
- 3:14:01डिसहार्मोनी यह सब इसी सेल्फ प्रोटेक्शन
- 3:14:04से पैदा होते हैं। चाहे स्पिरिचुअल हो या
- 3:14:11इकोनॉमिक। स्पिरिचुअली और इकोनॉमिकली तुम
- 3:14:14सिक्योरिटी ढूंढ रहे हो। क्योंकि तुम्हें
- 3:14:17लगता है कि चीजों को जमा करके ही तुम्हें
- 3:14:20समझ
- 3:14:22मिलेगी। पूर्णता मिलेगी और तुम खुद को
- 3:14:25पूरा महसूस करोगे।
- 3:14:28इसीलिए चालू लोग चाहे स्पिरिचुअल हो या
- 3:14:32इकोनॉमिक तुम्हारा फायदा उठाते हैं
- 3:14:36क्योंकि दोनों को पावर चाहिए और वह सेल्फ
- 3:14:39प्रोटेक्शन को बढ़ा चढ़ा के दिखाते
- 3:14:44हैं हर माइंड एक जबरदस्त कोशिश कर रहा है
- 3:14:48अपने आप को बचाने
- 3:14:50की और जो अंत है जो रास्ता है और जो तुम
- 3:14:55हो यह सब सिर्फ सिर्फ सेल्फ प्रोटेक्शन का
- 3:14:58प्रोसेस
- 3:15:00है। और जब यह सेल्फ प्रोटेक्शन का प्रोसेस
- 3:15:03होता है तो सरकमस्ट्ससेस के साथ
- 3:15:06कॉन्फ्लिक्ट होना ही है जो तुम सोसाइटी
- 3:15:09कहते
- 3:15:11हो। तुम खुद को बचाने की कोशिश कर रहे हो।
- 3:15:15ग्रुप समाज के खिलाफ।
- 3:15:19पर इसका उल्टा सच नहीं है। यानी अगर तुम
- 3:15:23अपने आप को प्रोटेक्ट करना छोड़ दोगे तो
- 3:15:26इसका मतलब यह नहीं कि तुम खो जाओगे।
- 3:15:30उल्टा अगर तुम अपने आप को प्रोटेक्ट कर
- 3:15:34रहे हो अपनी कमी या सोच की वजह
- 3:15:38से। तो तब तुम खुद को वाकई में खो दोगे।
- 3:15:44लेकिन अगर तुम सिर्फ इसलिए सेल्फ
- 3:15:46प्रोटेक्शन छोड़ते हो क्योंकि तुम सोच रहे
- 3:15:49हो कि इस रास्ते से तुम्हें सच मिल जाएगा
- 3:15:53तो यह भी एक और तरीका है प्रोटेक्ट करने
- 3:15:57का। सदियों से जनरेशन के बाद जनरेशन हमने
- 3:16:02एक चक्र बनाया है स्पिरिचुअल और इकोनॉमिक
- 3:16:06सेल्फ प्रोटेक्शन का।
- 3:16:09अब चलो पूछते हैं कि क्या स्पिरिचुअल या
- 3:16:12इकोनॉमिक सेल्फ प्रोटेक्शन वाकई में रियल
- 3:16:16है? शायद इकोनॉमिक लेवल पर तुम थोड़ा समय
- 3:16:20के लिए सेल्फ प्रोटेक्शन दिखाते हो। जिसके
- 3:16:23पास पैसा है, जो सुविधाओं से भरा हुआ है,
- 3:16:28वह अक्सर अंदर से बहुत कमजोर होता है। और
- 3:16:33सो कॉल्ड स्पिरिचुअल प्रोटेक्शन के पीछे
- 3:16:36भागता है।
- 3:16:40लेकिन सच यह है कि इकोनॉमिक सिक्योरिटी एक
- 3:16:43इल्लुजन
- 3:16:46है। पूरी दुनिया में डिप्रेशन, क्राइसिस,
- 3:16:50वॉर और डिजास्टर ने दिखा दिया है कि कोई
- 3:16:54इकोनॉमिक सिक्योरिटी नहीं होती।
- 3:16:57तो हम स्पिरिचुअल सिक्योरिटी की तरफ भागे
- 3:16:59जा रहे
- 3:17:01हैं। पर मेरे लिए कोई सिक्योरिटी नहीं है।
- 3:17:05ना स्पिरिचुअल ना इकोनॉमिक और ना ही कभी
- 3:17:09हो सकती
- 3:17:10है। मेरे लिए सिर्फ एक चीज है
- 3:17:14विज़डम। जो समझ से आती है ना कि प्रोटेक्शन
- 3:17:18से।
- 3:17:20सेल्फ प्रोटेक्शन एक कमी से पैदा होता है
- 3:17:23जिसमें ना कोई इंटेलिजेंस होती है ना
- 3:17:26क्रिएटिव सोच सिर्फ टकराव होता है तुम और
- 3:17:31सोसाइटी के बीच और वही चालू लोग तुम्हारा
- 3:17:34फायदा उठाते
- 3:17:37हैं। जब तक सेल्फ प्रोटेक्शन का पीछा चालू
- 3:17:41है तब तक कॉन्फ्लिक्ट होगा और जब तक
- 3:17:44कॉन्फ्लिक्ट है तब तक ना समझ है ना विडम।
- 3:17:50और जब तक तुम्हारा एटीट्यूड यही है तब तक
- 3:17:54तुम्हारा
- 3:17:55सच स्पिरिचुअलिटी या गॉड का ढूंढना सिर्फ
- 3:17:59एक और पावर या सिक्योरिटी का खेल
- 3:18:04है। सिर्फ तब जब माइंड जो अपने बनाए हुए
- 3:18:09प्रोटेक्शन की दीवारों के पीछे छुपा है।
- 3:18:13जब वह खुद को उन दीवारों से आजाद करता है।
- 3:18:16तभी वह सच की असली खूबसूरती को महसूस करता
- 3:18:20है। यह दीवार तुम्हारे माइंड ने ही बनाई
- 3:18:23है जो अपनी कमी को महसूस करके यह
- 3:18:28प्रोटेक्शन खड़ी करता है और उसके पीछे छुप
- 3:18:31जाता
- 3:18:33है। यह दीवारें तुमने कॉन्शियसली या
- 3:18:36अनकॉन्शियसली बनाई है और तुम्हारा माइंड
- 3:18:41इनमें इतना बंध गया है कि हर एक्शन सिर्फ
- 3:18:45और ज्यादा कॉन्फ्लिक्ट पैदा करता
- 3:18:48है। तो सिर्फ तुम्हारे प्रॉब्लम्स का
- 3:18:51स्यूशन ढूंढना तुम्हें नए प्रॉब्लम से
- 3:18:54आजाद नहीं
- 3:18:56करेगा। जब तक सेल्फ प्रोटेक्शन का सेंटर
- 3:18:59जो कमी से पैदा हुआ है जब तक वह जिंदा है।
- 3:19:05तब तक डिस्टरबेंस, दर्द और तकलीफ
- 3:19:09चलेगी और तुम उस कमी को डिसिप्लिन करके
- 3:19:13मिटा नहीं
- 3:19:14सकते। तुम सोचते हो मैं अंदर से शैलो
- 3:19:19हूं। कैसे इसे हटाऊं? मैं कहता हूं उसे
- 3:19:23हटाने की कोशिश मत करो। यह सिर्फ एक
- 3:19:26सब्सीट्यूशन बन जाता
- 3:19:29है। सिर्फ अवेयर बनो। जांचो कि यह कमी
- 3:19:33कहां से आई
- 3:19:35है। तुम इसे जबरदस्ती मिटा नहीं सकते। ना
- 3:19:39किसी आइडियल, डर या सुख के खेल में।
- 3:19:46सिर्फ अवेयरनेस से ही तुम जान सकते हो कि
- 3:19:49यह कमी का असली वजह क्या
- 3:19:52है। जब तुम अपने एनवायरमेंट को ऑब्जर्व
- 3:19:55करते हो और उसके अंदर छुपे हुए लेयर्स को
- 3:19:59देखते हो तब तुम्हें समझ
- 3:20:04आएगा कि सेल्फ प्रोटेक्शन कितना ट्रिकी और
- 3:20:08सल होता
- 3:20:10है। सेल्फ प्रोटेक्शन कमी का रिजल्ट है और
- 3:20:15तुम्हारा माइंड सदियों से कंडीशनिंग में
- 3:20:18बंधा हुआ है। तुम इसे डिसिप्लिन करके हटा
- 3:20:22नहीं सकते। अगर किया तो तुम उन इमोशंस और
- 3:20:27सोचो के झूठी सेफ्टी के लेयर्स को मिस कर
- 3:20:30दोगे जिसके पीछे तुम्हारा माइंड छुपा हुआ
- 3:20:35है। और उनको समझने के लिए तुम्हें बस
- 3:20:38अवेयर होना पड़ेगा। अवेयरनेस का मतलब यह
- 3:20:42नहीं कि तुम तुरंत कुछ बदल
- 3:20:45दो। तुम्हारा माइंड आदत में है सब कुछ
- 3:20:49मॉडिफाई करने का। जिसे तुम कहते हो
- 3:20:52एडजस्टमेंट,
- 3:20:53डिसिप्लिन, चेंज।
- 3:20:58लेकिन अवेयरनेस में कोई मॉडिफिकेशन नहीं
- 3:21:01होती। उसमें होती है सिर्फ
- 3:21:04समझ पूरी तरीके से।
- 3:21:08सिर्फ जब तुम इन प्रोटेक्शन की दीवारों को
- 3:21:11अवेयरनेस की आग में जला देते हो बिना
- 3:21:14मॉडिफाई किए बिना एडजस्ट किए तब तुम
- 3:21:18एनवायरमेंट का असली मतलब समझ पाते हो उसके
- 3:21:22छुपे हुए लेयर्स और कमियों के
- 3:21:27साथ और तभी आता है वह सच वह एटरनल क्योंकि
- 3:21:31उसमें कोई तुम नहीं रहता जो अपने आप को
- 3:21:34प्रोटेक्ट कर रहा हो
- 3:21:37जब तक यह सेल्फ प्रोटेक्टिव सेंटर जो तुम
- 3:21:40मैं कहते हो जिंदा है तब तक कंफ्यूजन
- 3:21:44होगा, डिस्टरबेंस होगा, कॉन्फ्लिक्ट
- 3:21:49होगा। तुम इन ऑब्सकल्स को डिसिप्लिन से
- 3:21:52सिस्टम फॉलो करके या किसी और को कॉपी करके
- 3:21:56खत्म नहीं कर
- 3:21:57सकते। तुम इन्हें सिर्फ तब समझ सकते हो जब
- 3:22:01माइंड और दिल दोनों पूरी तरह अवेयर हो
- 3:22:05जाए।
- 3:22:07और तभी आता है एक आनंद, एक जीता हुआ ट्रुथ
- 3:22:11का फ्लो जो ना कोई एंड है ना कोई
- 3:22:15गोल। सिर्फ एक लगातार जिंदा रहने वाली
- 3:22:19मूवमेंट
- 3:22:21है। वह आनंद, वह एक्ससी जिसे बयां नहीं
- 3:22:27किया जा सकता। क्योंकि जो चीज डिस्क्राइब
- 3:22:31की जाए वह खत्म हो जाती
- 3:22:34है। जब तक तुम सच के लिए व्नरेबल नहीं
- 3:22:38होते तब तक ना एक्ससी है ना
- 3:22:45इमोटिटी उजाई
- 3:22:48कैलिफोर्निया जुलाई वन 19 34
- 3:23:12पार्ट
- 3:23:15टू इनाइट्स इन टू एवरीडे लाइफ।
- 3:23:21इस पार्ट में कृष्णमूर्ति जी की कुछ लिखी
- 3:23:24हुई बातें दी गई हैं जो तीन वॉल्यूम्स में
- 3:23:27कमेंट्रीज ऑन लिविंग के नाम से पब्लिश हुई
- 3:23:30हैं।
- 3:23:32यहां उनकी लिखी बातें एजुकेशन और यंग
- 3:23:35जनरेशन के बारे में भी हैं। एजुकेशन एंड द
- 3:23:38सिग्निफिकेंस ऑफ लाइफ और लाइफ अहेड।
- 3:23:43और फ्रीडम पर भी हैं। एक ऐसी किताब में
- 3:23:46जिसका इंट्रोडक्शन एल्डस हगजली ने लिखा
- 3:23:49था। द फर्स्ट एंड लास्ट
- 3:23:53फ्रीडम। शायद सबसे पर्सनल और रिवलिंग
- 3:23:56बातें उनकी जर्नल और कृष्णमूर्ति टू
- 3:23:59हिमसेल्फ से ली गई हैं। जिसमें उन्होंने
- 3:24:03अक्सर अपने टीचिंग्स के डीपेस्ट मिस्टिकल
- 3:24:06सोर्सेस को टच किया
- 3:24:10है। द फर्स्ट एंड लास्ट
- 3:24:17फ्रीडम। एक दूसरे से बात करना चाहे हम एक
- 3:24:20दूसरे को कितना भी अच्छे से जानते हो बहुत
- 3:24:23मुश्किल होता
- 3:24:24है। हो सकता है जो शब्द मैं यूज कर रहा
- 3:24:28हूं उनका मतलब तुम्हारे लिए कुछ और हो।
- 3:24:32समझ तब आता है जब तुम और मैं एक ही लेवल
- 3:24:35पर एक ही वक्त पर मिलते
- 3:24:38हैं। यह तभी होता है जब लोगों के बीच
- 3:24:42सच्चा प्यार होता है। पतिप के बीच या
- 3:24:45क्लोज दोस्तों के
- 3:24:47बीच। वही होती है असली बातचीत।
- 3:24:52तुरंत समझ तभी आता है जब हम एक ही लेवल पर
- 3:24:56एक ही वक्त पर मिलते हैं। एक दूसरे से
- 3:24:59आसानी से अच्छे से और क्लियर एक्शन के साथ
- 3:25:04बात करना बहुत मुश्किल
- 3:25:07है। मैं सिंपल वर्ड्स यूज कर रहा हूं।
- 3:25:11टेक्निकल
- 3:25:13नहीं क्योंकि मुझे नहीं लगता कि कोई भी
- 3:25:16टेक्निकल तरीके हमारी मुश्किलें सॉल्व कर
- 3:25:19सकते हैं।
- 3:25:21इसलिए मैं साइकोलॉजी या साइंस के टेक्निकल
- 3:25:24शब्द यूज नहीं करूंगा। मैंने ना साइकोलॉजी
- 3:25:28की कोई बुक पढ़ी है ना रिलीजियस बुक्स। यह
- 3:25:31मेरी किस्मत
- 3:25:33है। मैं चाहता हूं कि हम डेली लाइफ में जो
- 3:25:37सिंपल वर्ड्स यूज़ करते हैं, उन्हीं से
- 3:25:40कुछ गहरा मतलब समझा सकूं।
- 3:25:44लेकिन यह तभी पॉसिबल है जब तुम्हें सुनने
- 3:25:47का तरीका आता हो। सुनने का भी एक आर्ट
- 3:25:51होता
- 3:25:52है। असली सुनने के लिए इंसान को अपने सारे
- 3:25:56बायस, सोच और डेली थॉट्स साइड में रखने
- 3:26:00पड़ते
- 3:26:01हैं। जब तुम्हारा माइंड एक ओपन स्टेट में
- 3:26:04होता है, तभी बात आसानी से समझ में आती
- 3:26:10है। तुम तभी सुन रहे होते हो जब तुम्हारा
- 3:26:13पूरा ध्यान किसी चीज पर होता है। लेकिन
- 3:26:17अफसोस हम में से ज्यादा लोग एक स्क्रीन के
- 3:26:21थ्रू सुनते हैं। वह स्क्रीन होती है हमारे
- 3:26:24प्रिजुडिसिस
- 3:26:26की। चाहे वह रिलीजियस हो या स्पिरिचुअल
- 3:26:30साइकोलॉजिकल हो या साइंटिफिक।
- 3:26:33या फिर हमारे डेली के टेंशन, चाहतें और डर
- 3:26:38हो और यह सब चीजें एक स्क्रीन बन जाती हैं
- 3:26:42और हम उसके पीछे से सुनते
- 3:26:45हैं। इसलिए हम असल में सामने वाले को नहीं
- 3:26:50सुनते। बल्कि अपने ही दिमाग की आवाज सुनते
- 3:26:54हैं। अपने ट्रेनिंग, बायस, आदतें,
- 3:26:58रेजिस्टेंस को साइड में रखना बहुत मुश्किल
- 3:27:01होता है। और वर्बल बात के परे जाके ऐसे
- 3:27:05सुनना कि तुरंत समझ में आए। यह हमारी सबसे
- 3:27:08बड़ी प्रॉब्लम
- 3:27:10है। अगर इस बातचीत के दौरान कोई बात
- 3:27:14तुम्हारे बिलीफ या सोच के खिलाफ लगे तो बस
- 3:27:17सुनो। रजिस्ट मत करो।
- 3:27:20हो सकता है तुम सही हो और मैं गलत। लेकिन
- 3:27:24अगर हम दोनों मिलकर सुनेंगे और सोचेंगे तो
- 3:27:28हम सच को जान सकते
- 3:27:30हैं। सच किसी और से तुम्हें नहीं मिल
- 3:27:33सकता। तुम्हें खुद ही उसे ढूंढना पड़ता
- 3:27:37है। और उसके लिए तुम्हारा माइंड एक ऐसे
- 3:27:40स्टेट में होना चाहिए जहां तुम सीधा देख
- 3:27:43सको।
- 3:27:45सीधा देखना तब पॉसिबल नहीं होता जब अंदर
- 3:27:48रेजिस्टेंस, सेफ्टी या प्रोटेक्शन
- 3:27:53हो। समझ तब आता है जब हम जो हैं उससे
- 3:27:56अवेयर हो
- 3:27:58जाए। जो है जैसे है बिना उसे तोड़ मरोड़
- 3:28:02के बिना उसे जज किए या जस्टिफाई किए।
- 3:28:08उसे जानना ही विडम की शुरुआत
- 3:28:11है। जब हम इंटरप्रेट करते हैं या अपने
- 3:28:15बायस से सोचने लगते हैं तो हम सच से दूर
- 3:28:18हो जाते हैं। यह बिल्कुल रिसर्च जैसे
- 3:28:24है। किसी चीज को जानना हो जैसे वह वाकई है
- 3:28:29तो रिसर्च चाहिए। तुम अपने मूड के हिसाब
- 3:28:32से उसे समझ नहीं सकते। वैसे ही अगर हम देख
- 3:28:36सकें, ऑब्जर्व कर सकें, सुन सकें, अवेयर
- 3:28:40हो सके जो है बिल्कुल वैसे जैसे वह है तो
- 3:28:44प्रॉब्लम खत्म हो जाती
- 3:28:46है। और इसी बात को हम इन सब डिस्कोर्सेज
- 3:28:50में करने वाले हैं। मैं तुम्हें सिर्फ यह
- 3:28:53दिखाने वाला हूं क्या है ना कि अपने तरीके
- 3:28:57से उसका मीनिंग बदलने वाला हूं।
- 3:29:01और तुम्हें भी अपने बैकग्राउंड या
- 3:29:03ट्रेनिंग के हिसाब से उसका मतलब नहीं
- 3:29:05निकालना
- 3:29:07चाहिए। क्या यह पॉसिबल नहीं है कि हम सब
- 3:29:10चीजों को जैसे है वैसे ही देखें। वहीं से
- 3:29:14तो समझ की शुरुआत होती है। जो है उसे
- 3:29:18एक्सेप्ट करना, उसे जानना वही स्ट्रगल का
- 3:29:22द एंड
- 3:29:24है। अगर मुझे पता है कि मैं झूठा हूं और
- 3:29:28मैं इस बात को मान लेता हूं तो स्ट्रगल
- 3:29:31खत्म हो जाती
- 3:29:33है। जो हम है उसे जानना उसे एक्सेप्ट करना
- 3:29:38वही विज़डम का स्टार्ट है। वही समझ की
- 3:29:41शुरुआत है जो तुम्हें टाइम से फ्री कर
- 3:29:44देती है।
- 3:29:47टाइम को ना कि घड़ी के टाइम को बल्कि
- 3:29:50माइंड के साइकोलॉजिकल प्रोसेस के टाइम को
- 3:29:54जब हम बीच में लाते हैं तो वह कंफ्यूजन और
- 3:29:58डिस्ट्रक्शन क्रिएट करता
- 3:30:01है। तो हम तभी समझ पाते हैं जो है जब हम
- 3:30:06उसे बिना ब्लेम किए, बिना जस्टिफाई किए,
- 3:30:09बिना उसमें अपने आप को डाले समझते
- 3:30:12हैं। यह जान लेना कि इंसान किसी पर्टिकुलर
- 3:30:15कंडीशन या स्टेट में है, खुद एक फ्रीडम का
- 3:30:18प्रोसेस है।
- 3:30:21लेकिन जो आदमी अपनी कंडीशन, अपनी स्ट्रगल
- 3:30:24से अनजान है, वह कुछ और बनने की कोशिश
- 3:30:27करता है और वही आदत बन जाती है।
- 3:30:32तो
- 3:30:33चलिए यह याद रखें कि हम यह देखना चाहते
- 3:30:37हैं कि असल में क्या है। उस चीज को
- 3:30:40ऑब्जर्व करना और वैसे ही देखना जैसे वह है
- 3:30:43बिना किसी एंगल के बिना कोई मीनिंग दिए।
- 3:30:48इसके लिए एक बहुत ही शार्प माइंड चाहिए और
- 3:30:51एक सॉफ्ट हार्ट जो वैसे ही देख सके जैसे
- 3:30:55चीजें हैं। क्योंकि जो है वह हमेशा बदल
- 3:30:58रहा होता है। हमेशा एक नई शेप ले रहा होता
- 3:31:03है। और अगर माइंड किसी बिलीफ या नॉलेज में
- 3:31:06अटका होता है तो वह उस चेंज को फॉलो नहीं
- 3:31:10कर
- 3:31:11सकता। वह जो चल रहा है उसके साथ चल ही
- 3:31:14नहीं सकता।
- 3:31:16जो है वह कभी सेम नहीं
- 3:31:19होता। वह हमेशा चल रहा होता है। अगर तुम
- 3:31:22ध्यान से देखो तो पता
- 3:31:25चलेगा। उसके साथ चलने के लिए तुम्हारा
- 3:31:28माइंड फास्ट होना चाहिए। और तुम्हारा दिल
- 3:31:32फ्लेक्सिबल होना
- 3:31:35चाहिए। और अगर तुम्हारा माइंड स्टक है
- 3:31:39बिलीफ में, किसी सोच में, किसी आइडेंटिटी
- 3:31:42में और तुम्हारा दिल सूख गया है,
- 3:31:46तो तुम उसको फास्ट फॉलो नहीं कर
- 3:31:50सकते। मुझे लगता है ज्यादा बात किए बिना
- 3:31:54यह क्लियर है कि हर जगह इंडिविजुअल और
- 3:31:56ग्रुप लेवल पर कंफ्यूजन पेन और केओस है।
- 3:32:00सिर्फ इंडिया में नहीं पूरे वर्ल्ड में।
- 3:32:04चीन, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी हर जगह
- 3:32:07दुख और कंफ्यूजन बढ़ रहा है। यह सिर्फ
- 3:32:11नेशनल नहीं, यह सिर्फ यहां का नहीं, यह हर
- 3:32:14जगह का
- 3:32:15है। बहुत इंटेंस सफरिंग है। और यह सिर्फ
- 3:32:19पर्सनल नहीं बल्कि कलेक्टिव भी है। यह एक
- 3:32:23ग्लोबल ट्रेजडी
- 3:32:26है। और इसे सिर्फ एक मैप के कलर्ड एरिया
- 3:32:30तक लिमिट करना बेकार है। क्योंकि अगर हम
- 3:32:33ऐसा करेंगे तो हम इस वर्ल्ड वाइड और
- 3:32:36पर्सनल पेन का रियल मीनिंग नहीं समझ
- 3:32:40पाएंगे। इस कंफ्यूजन को देखते हुए आज
- 3:32:43हमारी रिस्पांस क्या है? हम कैसे रिएक्ट
- 3:32:47करते हैं? दुख है पॉलिटिकल, सोशल,
- 3:32:52रिलीजियस। हमारा पूरा साइकोलॉजिकल बीइंग
- 3:32:55कंफ्यूज्ड है। और सब
- 3:32:57लीडर्स पॉलिटिकल और रिलीजियस फेल हो चुके
- 3:33:01हैं।
- 3:33:02सब बुक्स का मतलब खत्म हो गया है। चाहे
- 3:33:06तुम भगवत गीता पढ़ लो या बाइबल या लेटेस्ट
- 3:33:10पॉलिटिक्स या साइकोलॉजी की
- 3:33:12बुक। तुम देखोगे कि उनमें से सच की वह बात
- 3:33:16चली गई है। वह सिर्फ शब्द बन गए
- 3:33:20हैं। तुम खुद जो उन वर्ड्स को रिपीट करते
- 3:33:24हो, कंफ्यूज्ड हो और श्योर नहीं हो।
- 3:33:29और सिर्फ वर्ड्स रिपीट करने से कुछ नहीं
- 3:33:32होता। इसलिए वह वर्ड्स और बुक्स का कोई
- 3:33:35वैल्यू नहीं रह गया। मतलब अगर तुम बाइबल
- 3:33:39या मार्क्स या भगवत गीता कोट करते हो और
- 3:33:43तुम खुद ही अनशोर हो, कंफ्यूज्ड हो तो
- 3:33:47तुम्हारा रिपीट करना झूठ बन जाता है।
- 3:33:50क्योंकि जो लिखा है वह सिर्फ प्रोपेगेंडा
- 3:33:53बन जाता है और प्रोपेगेंडा कभी सच नहीं
- 3:33:56होता।
- 3:33:58तो जब तुम रिपीट करते हो तो तुम अपनी खुद
- 3:34:01की स्टेट को समझना बंद कर देते
- 3:34:04हो। तुम सिर्फ अथॉरिटी के शब्दों से अपनी
- 3:34:07कंफ्यूजन को छुपा रहे हो।
- 3:34:11लेकिन हम यह करने नहीं आए
- 3:34:14हैं। हम इस कंफ्यूजन को समझने आए हैं। ना
- 3:34:18कि कोटेशन से
- 3:34:21छुपाने। तो तुम्हारा रिस्पांस क्या है?
- 3:34:24तुम इस केओस इस कंफ्यूजन इस अनसर्टेन
- 3:34:28जिंदगी को कैसे देखते
- 3:34:31हो? इसे महसूस करो। जैसे मैं बात कर रहा
- 3:34:35हूं। मेरे शब्द फॉलो मत
- 3:34:38करो। अपने अंदर चल रहे थॉट को फॉलो
- 3:34:43करो। ज्यादातर लोग सिर्फ स्पेक्टेटर्स बन
- 3:34:46गए हैं। गेम का हिस्सा नहीं
- 3:34:49बनते। हम बुक्स पढ़ते हैं लेकिन कभी लिखते
- 3:34:52नहीं।
- 3:34:54यह हमारी आदत बन गई है। सिर्फ देखते
- 3:34:58रहना। फुटबॉल गेम हो या पॉलिटिकल स्पीच।
- 3:35:03हम सिर्फ बाहर खड़े रहते
- 3:35:05हैं और अपना क्रिएटिव पावर खो चुके
- 3:35:09हैं। इसलिए हम चाहते हैं कि अब हम
- 3:35:13अब्सॉर्ब करें, हिस्सा बने। लेकिन अगर तुम
- 3:35:16सिर्फ देख रहे हो, सिर्फ स्पेक्टेटर हो।
- 3:35:21तो तुम इस डिस्कोर्स का रियल मीनिंग खो
- 3:35:24दोगे क्योंकि मैं तुम्हें ऐसी इंफॉर्मेशन
- 3:35:27नहीं देने वाला जो इनसाइक्लोपीडिया में
- 3:35:30मिल
- 3:35:31जाए। हम यह कोशिश कर रहे हैं कि एक दूसरे
- 3:35:34के थॉट्स को फॉलो करें जितना गहरा हो सके।
- 3:35:38अपने फीलिंग्स के सिग्नल्स और रिएक्शंस को
- 3:35:41समझें।
- 3:35:43तो प्लीज यह देखो कि तुम्हारा खुद का
- 3:35:46रिस्पांस क्या है इस पेन के लिए ना कि
- 3:35:50किसी और के शब्दों
- 3:35:52का। तुम्हारा रिस्पांस इनडिफरेंट है अगर
- 3:35:55तुम इस सफरिंग इस केओस से फायदा ले रहे
- 3:35:58हो। चाहे वह इकोनॉमिक हो, सोशल हो,
- 3:36:02पॉलिटिकल हो या
- 3:36:06साइकोलॉजिकल। इसलिए तुम्हें कोई प्रॉब्लम
- 3:36:09नहीं होती। कि अगर यह केओस चलता
- 3:36:11रहे जितनी ज्यादा दिक्कत होती है दुनिया
- 3:36:14में जितना ज्यादा केओस होता है उतना ही
- 3:36:18ज्यादा इंसान सिक्योरिटी ढूंढता है तुमने
- 3:36:22नोटिस किया है
- 3:36:24ना जब दुनिया में हर तरफ कंफ्यूजन होती है
- 3:36:28माइंड में भी और हर तरीके
- 3:36:31से तो तुम अपने आप को किसी ना किसी
- 3:36:34सिक्योरिटी में बंद कर लेते हो या तो बैंक
- 3:36:37अकाउंट वाली सिक्योरिटी या किसी
- 3:36:39आईडियोलॉजी
- 3:36:41वाली या तुम प्रेयर की तरफ जाते हो, मंदिर
- 3:36:45जाते हो जो असल में दुनिया में जो हो रहा
- 3:36:49है उससे भागना
- 3:36:52है और भी ज्यादा सेट्स बन रहे हैं और
- 3:36:55नए-नए इज्म्स हर जगह निकल रहे हैं।
- 3:37:00क्योंकि जितनी ज्यादा कंफ्यूजन होती है,
- 3:37:02उतनी ही ज्यादा तुम्हें एक लीडर चाहिए
- 3:37:04होता
- 3:37:06है। कोई जो तुम्हें इस मिस से बाहर
- 3:37:09निकाले। इसलिए तुम रिलीजियस बुक्स की तरफ
- 3:37:13जाते हो या किसी नए टीचर की तरफ या किसी
- 3:37:17सिस्टम के हिसाब से एक्ट करते हो जो
- 3:37:20प्रॉब्लम सॉल्व करता हुआ लगता है। लेफ्ट
- 3:37:23का हो या राइट का।
- 3:37:26यही एग्जजेक्टली हो रहा
- 3:37:28है। जब तुम्हें कंफ्यूजन का असली रियलिटी
- 3:37:32का पता चलता है तो तुम तुरंत उससे भागने
- 3:37:35लगते हो।
- 3:37:37वह सेक्स जो तुम्हें सफरिंग का स्यूशन
- 3:37:40देने का सिस्टम देते हैं। इकोनॉमिक, सोशल
- 3:37:44या रिलीजियस वह सबसे खतरनाक
- 3:37:47है। क्योंकि तब सिस्टम इंपॉर्टेंट हो जाता
- 3:37:50है इंसान
- 3:37:52नहीं। चाहे वह रिलीजियस सिस्टम हो या
- 3:37:55लेफ्ट का हो या राइट
- 3:37:57का। सिस्टम इंपॉर्टेंट हो जाता है।
- 3:38:01फिलॉसफी आईडिया इंपॉर्टेंट हो जाता है और
- 3:38:04इंसान नहीं। और आईडिया के लिए, आईडियोलॉजी
- 3:38:07के लिए तुम पूरी इंसानियत को सैक्रिफाइस
- 3:38:11करने के लिए रेडी हो जाते हो। और यही
- 3:38:14दुनिया में हो रहा
- 3:38:16है। यह सिर्फ मेरा इंटरप्रिटेशन नहीं है।
- 3:38:19अगर तुम ऑब्जर्व करो तो तुम देखोगे कि
- 3:38:22एग्जजेक्टली यही हो रहा
- 3:38:24है। सिस्टम इंपॉर्टेंट हो गया है।
- 3:38:29इसलिए जब सिस्टम इंपॉर्टेंट हो जाता है तो
- 3:38:32इंसान तुम और मैं
- 3:38:35हमारा कोई मतलब नहीं रहता। और जो सिस्टम
- 3:38:39को कंट्रोल करते हैं रिलीजियस हो या सोशल
- 3:38:43लेफ्ट के हो या राइट के वह पावर ले लेते
- 3:38:47हैं। अथॉरिटी बन जाते हैं और तुम
- 3:38:51इंडिविजुअल को सैक्रिफाइस कर देते हैं।
- 3:38:55यही एग्जैक्टली हो रहा
- 3:38:57है। अब यह सोचो कि इस कंफ्यूजन इस पेन का
- 3:39:01कारण क्या है?
- 3:39:04यह पेन कैसे आया? यह सफरिंग सिर्फ अंदर से
- 3:39:07नहीं, बाहर भी। यह डर और वॉर का
- 3:39:11खौफ। जो थर्ड वर्ल्ड वॉर आ रही है, इसका
- 3:39:15कारण क्या
- 3:39:18है? यह क्लियरली दिखाता है कि सारी मोरल
- 3:39:22स्पिरिचुअल वैल्यूस खत्म हो गई हैं। और
- 3:39:26सिर्फ सेंसुअल वैल्यूस का हीेंस रह गया
- 3:39:29है।
- 3:39:32वह चीजें जो हाथ से या दिमाग से बनी है।
- 3:39:36जब हमारे पास कोई और वैल्यू नहीं रहती
- 3:39:38सिवाय चीजों की वैल्यू के जो सेंसेस से
- 3:39:42आती हैं या दिमाग या हाथ या मशीन से तो
- 3:39:46क्या होता
- 3:39:48है? जितना ज्यादा हम चीजों की सेंसुअल
- 3:39:51वैल्यू कोेंस देते हैं, उतना ही ज्यादा
- 3:39:55कंफ्यूजन बढ़ती है। है ना?
- 3:39:58फिर से कह रहा हूं यह मेरी थ्यरी नहीं
- 3:40:02है। तुम्हें कोई बुक कोट करने की जरूरत
- 3:40:05नहीं है यह समझने के लिए कि तुम्हारी
- 3:40:08वैल्यूस, तुम्हारा पैसा, तुम्हारा सोशल और
- 3:40:11इकोनॉमिक लाइफ सब चीजों पर बेस्ड है। जो
- 3:40:15हाथ या दिमाग से बनी
- 3:40:18है। तो हम जीते हैं, काम करते हैं और पूरा
- 3:40:22एकिस्टेंस एक सेंसुअल वैल्यू में डूब गया
- 3:40:25है। इसका मतलब चीजें इंपॉर्टेंट हो गई
- 3:40:29हैं। जो चीजें माइंड से बनी है, हाथ से
- 3:40:33बनी है, मशीन से बनी है, वही इंपॉर्टेंट
- 3:40:36हो गई
- 3:40:37हैं। और जब चीजें इंपॉर्टेंट हो जाती हैं,
- 3:40:40तो बिलीव सबसे ज्यादा सिग्निफिकेंट बन
- 3:40:43जाता है। और यही दुनिया में हो रहा है। है
- 3:40:47ना?
- 3:40:49तो सेंसेस की वैल्यू को ज्यादा और
- 3:40:52ज्यादाेंस देना ही कंफ्यूजन का रीजन बन
- 3:40:55जाता है। और जब कंफ्यूजन होती है तो हम
- 3:41:00उससे भागने की कोशिश करते हैं अलग-अलग
- 3:41:03तरीकों से। चाहे वह रिलीजियस हो, इकोनॉमिक
- 3:41:07हो, सोशल
- 3:41:08हो या एंबिशन के थ्रू, पावर के थ्रू या
- 3:41:12रियलिटी ढूंढने के थ्रू।
- 3:41:16लेकिन जो रियल है वह पास ही होता है। उसे
- 3:41:19ढूंढने की जरूरत
- 3:41:20नहीं। और जो आदमी सच ढूंढता है वह उसे कभी
- 3:41:26नहीं पाता। सच वही है जो है और इसी में
- 3:41:30उसकी ब्यूटी है।
- 3:41:34लेकिन जैसे ही तुम उसे सोचने लगते हो,
- 3:41:36जैसे ही तुम उसके पीछे भागते हो, तुम
- 3:41:39स्ट्रगल करने लगते हो। और जो आदमी स्ट्रगल
- 3:41:43करता है वह समझ नहीं सकता। इसलिए हमें
- 3:41:47शांत रहना चाहिए, देखना चाहिए, पैसिवली
- 3:41:50अवेयर रहना चाहिए।
- 3:41:53हम देखते हैं कि हमारा जीना हमारी एक्शन
- 3:41:57हमेशा डिस्ट्रक्शन के एरिया में होती है।
- 3:42:00सो के एरिया में होती है। जैसे एक वेव
- 3:42:04कन्फ्यूजन और केओस हमेशा हमें ले लेते
- 3:42:09हैं। जिंदगी के कंफ्यूजन में कोई गैप
- 3:42:13नहीं। जो भी हम आज कर रहे हैं, वह केस की
- 3:42:17तरफ ले जाता है। वह सोरो और अनहैपीनेस की
- 3:42:20तरफ ले जाता है।
- 3:42:22अपनी खुद की लाइफ देख लो। तुम्हें दिखेगा
- 3:42:26कि हमारा जीना हमेशा सौरों के किनारे होता
- 3:42:29है। हमारी जॉब, हमारी सोशल एक्टिविटी,
- 3:42:32हमारा पॉलिटिक्स।
- 3:42:35नेशंस का मिलना और वॉर का रोकना सब कुछ और
- 3:42:40वॉर ले आता
- 3:42:42है। लिविंग के पीछे हमेशा डिस्ट्रक्शन
- 3:42:45छुपा होता है। जो भी हम करते हैं वह डेथ
- 3:42:49की तरफ जाता है। यही सच में हो रहा है।
- 3:42:53क्या हम इस मिजरी को तुरंत रोक सकते हैं?
- 3:42:56बिना हमेशा कंफ्यूजन और सोरो के वेव में
- 3:42:59फंसे हुए जीते रहें।
- 3:43:04बुद्ध या क्राइस्ट जैसे बड़े टीचर्स आए।
- 3:43:07उन्होंने फेथ को एक्सेप्ट किया। शायद खुद
- 3:43:09को कंफ्यूजन और सोरो से फ्री कर लिया।
- 3:43:14लेकिन उन्होंने सोरो को कभी रोका नहीं।
- 3:43:16उन्होंने कंफ्यूजन को कभी खत्म नहीं किया।
- 3:43:19कंफ्यूजन चलता रहा। सो चलता रहा। अगर तुम
- 3:43:24यह सोशल और इकोनॉमिक कंफ्यूजन, यह केओस,
- 3:43:27यह मिरी देखकर अपने आप को सो कॉल्ड
- 3:43:30रिलीजियस लाइफ में ले जाते हो और दुनिया
- 3:43:33को छोड़ देते हो तो तुम्हें लगता है कि
- 3:43:36तुम इन ग्रेट टीचर्स का हिस्सा बन गए हो।
- 3:43:40लेकिन दुनिया वैसे ही चलती रहती है अपने
- 3:43:43केओस, मिजरी और डिस्ट्रक्शन के साथ।
- 3:43:46अमीरों और गरीबों का हमेशा का सफरिंग।
- 3:43:51तो हमारा प्रॉब्लम तुम्हारा और मेरा यह है
- 3:43:54कि क्या हम इस मिजरी से तुरंत बाहर आ सकते
- 3:43:59हैं? अगर तुम दुनिया में रहकर भी सिस्टम
- 3:44:02का हिस्सा बनने से इनकार करते
- 3:44:06हो तो तुम दूसरों की मदद करोगे इस केओस से
- 3:44:10निकलने में। कल नहीं
- 3:44:12आज वही तो असली प्रॉब्लम
- 3:44:15है। वॉर आने वाली है और भी डिस्ट्रक्टिव
- 3:44:19और भी खौफनाक फॉर्म
- 3:44:22में। हमें लगता है हम इसे रोक नहीं सकते
- 3:44:26क्योंकि यह इशूज़ बहुत स्ट्रांग और बहुत
- 3:44:28क्लोज है।
- 3:44:31लेकिन तुम और मैं यह कंफ्यूजन और मिजरी को
- 3:44:34तुरंत देख सकते हैं। है ना? हमें उन्हें
- 3:44:37देखना होगा।
- 3:44:39तभी हम किसी और में भी सच का वही समझ जगा
- 3:44:42सकते
- 3:44:44हैं। मतलब क्या तुम तुरंत फ्री हो सकते
- 3:44:48हो? क्योंकि वही एक रास्ता है मिजरी से
- 3:44:50बाहर आने
- 3:44:52का। परसेप्शन सिर्फ प्रेजेंट में होता है।
- 3:44:56लेकिन अगर तुम कहते हो मैं कल करूंगा तो
- 3:44:59कंफ्यूजन का वेव तुम्हें ले जाता है और
- 3:45:02तुम हमेशा कंफ्यूजन में उलझे रहते हो।
- 3:45:06अब क्या यह पॉसिबल है कि तुम ऐसे स्टेट
- 3:45:08में आ जाओ जहां तुम सच को तुरंत देख लो और
- 3:45:12इस कंफ्यूजन का एंड हो
- 3:45:15जाए। मैं कहता हूं कि यह पॉसिबल है और यही
- 3:45:19एक रास्ता है। मैं कहता हूं कि यह हो सकता
- 3:45:22है और होना चाहिए।
- 3:45:25यह कोई मान लेना या बिलीफ पर बेस्ड नहीं
- 3:45:29है। इस एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी रिवोल्यूशन को
- 3:45:33लाना जो यह नहीं है कि कैपिटलिस्ट को हटा
- 3:45:37के किसी और ग्रुप को लाओ।
- 3:45:40यह जो असली ट्रांसफॉर्मेशन है, जो एक
- 3:45:43सच्ची रिवोल्यूशन है, वही प्रॉब्लम
- 3:45:47है। जो नॉर्मल रिवोल्यूशन कहते हैं, वह
- 3:45:50सिर्फ राइट को थोड़ा मॉडिफाई करके लेफ्ट
- 3:45:54बनाना होता है। लेफ्ट भी असल में राइट का
- 3:45:57ही कंटीन्यूएशन होता है। थोड़ा अलग फॉर्म
- 3:46:00या डिग्री में।
- 3:46:04अगर राइट सेंसफुल वैल्यूस पर बेस्ड है तो
- 3:46:07लेफ्ट भी वही सेंसुल वैल्यूस रखता है।
- 3:46:11सिर्फ थोड़ा एक्सप्रेशन अलग होता है।
- 3:46:15इसलिए सच्ची रिवोल्यूशन तभी हो सकती है जब
- 3:46:18तुम इंडिविजुअल अपने रिलेशन में अवेयर हो
- 3:46:23जाओ। जो तुम अपने रिलेशन में हो अपनी
- 3:46:26वाइफ, अपने चाइल्ड, अपने बॉस, अपने नेबर
- 3:46:30के साथ वही सोसाइटी है।
- 3:46:33सोसाइटी अपने आप में कुछ नहीं
- 3:46:35है। सोसाइटी वही है जो तुम और मैं अपने
- 3:46:39रिलेशन से बनाते
- 3:46:40हैं। यह हमारे अंदर के साइकोलॉजिकल
- 3:46:44स्टेट्स का आउटर प्रोजेक्शन है। तो अगर
- 3:46:47तुम और मैं खुद को नहीं समझते तो सिर्फ
- 3:46:51आउटर वर्ल्ड को बदलना जो कि अंदर का
- 3:46:54रिफ्लेक्शन है उसका कोई मतलब नहीं बनता।
- 3:46:58मतलब सोसाइटी में कोई रियल बदलाव तब तक
- 3:47:02नहीं हो सकता जब तक मैं अपने रिलेशन में
- 3:47:04खुद को नहीं समझता।
- 3:47:07अगर मैं अपने रिलेशन में कंफ्यूज्ड हूं तो
- 3:47:11मैं एक ऐसी सोसाइटी बनाता हूं जो मेरे
- 3:47:14जैसे ही कंफ्यूज्ड
- 3:47:15है। यह एक सिंपल फैक्ट है जिसको हम डिस्कस
- 3:47:19कर सकते
- 3:47:21हैं। हम डिस्कस कर सकते हैं कि सोसाइटी ने
- 3:47:25मुझे बनाया या मैंने सोसाइटी को
- 3:47:28बनाया। तो क्या यह क्लियर फैक्ट नहीं है
- 3:47:31कि मैं अपने रिलेशन में जो हूं वही
- 3:47:34सोसाइटी बनाता हूं। और बिना खुद को डीपली
- 3:47:38बदले सोसाइटी के फंक्शन को बदलना पॉसिबल
- 3:47:41ही नहीं
- 3:47:43है। जब हम किसी सिस्टम से सोसाइटी को
- 3:47:47बदलने की कोशिश करते हैं तो हम असल सवाल
- 3:47:50से भाग रहे होते हैं। क्योंकि सिस्टम कभी
- 3:47:54इंसान को नहीं बदल सकता। इंसान ही सिस्टम
- 3:47:57को बदलता है। यह हिस्ट्री भी दिखाती
- 3:48:01है। जब तक मैं तुम्हारे साथ अपने रिलेशन
- 3:48:04में खुद को नहीं समझता तब तक मैं ही केओस,
- 3:48:09मिजरी, डिस्ट्रक्शन, फियर और ब्रूटलिटी का
- 3:48:13रीजन
- 3:48:15हूं। खुद को समझना टाइम का मैटर नहीं है।
- 3:48:18मैं अभी के अभी खुद को समझ सकता हूं। अगर
- 3:48:21मैं कहता हूं मैं कल समझूंगा तो मैं केओस
- 3:48:25और मिजरी को ला रहा
- 3:48:27हूं। मेरा एक्शन डिस्ट्रक्टिव हो जाता है।
- 3:48:31जब मैं कहता हूं मैं
- 3:48:34समझूंगा। तो मैं टाइम ले आता हूं और
- 3:48:36कंफ्यूजन और डिस्ट्रक्शन के वेव में फंस
- 3:48:39जाता
- 3:48:42हूं। समझना अभी होता है। कल नहीं। कल उनके
- 3:48:47लिए होता है जो आलसी हैं। जो स्लो हैं। जो
- 3:48:51इंटरेस्टेड नहीं
- 3:48:53है। जब तुम किसी चीज में इंटरेस्टेड होते
- 3:48:56हो तो तुम तुरंत उसमें लग जाते हो। तुरंत
- 3:49:00समझ आता है। तुरंत बदलाव होता है। अगर तुम
- 3:49:04अभी नहीं बदलते तो तुम कभी नहीं बदलोगे।
- 3:49:07क्योंकि जो कल बदलाव होता है, वह सिर्फ
- 3:49:10थोड़ा चेंज होता है। वह असली
- 3:49:13ट्रांसफॉर्मेशन नहीं होता।
- 3:49:16असली ट्रांसफॉर्मेशन सिर्फ तुरंत होता है।
- 3:49:19रिवोल्यूशन अभी होती है। कल नहीं। जब यह
- 3:49:23होता है तो तुम्हारे पास कोई प्रॉब्लम
- 3:49:26नहीं बचा होता। क्योंकि सेल्फ खुद के बारे
- 3:49:30में चिंता करना छोड़ देता
- 3:49:34है। फिर तुम डिस्ट्रक्शन के वेव के परे
- 3:49:37चले जाते हो।
- 3:49:49एंबिशन बच्चा पूरी रात रोता रहा और बेचारी
- 3:49:53मां उसे चुप कराने की पूरी कोशिश करती
- 3:49:56रही। उसने गाना गाया, डांटा भी प्यार से
- 3:50:00गोद में उठाया, झुलाया लेकिन कुछ काम नहीं
- 3:50:05आया। शायद बच्चे के दांत निकल रहे थे और
- 3:50:08पूरी फैमिली के लिए रात बहुत थकने वाली
- 3:50:11थी।
- 3:50:13लेकिन अब अंधेरा पेड़ों के पार से हटा जा
- 3:50:16रहा
- 3:50:17था और आखिर में बच्चा चुप हो
- 3:50:20गया। जैसे-जैसे आसमान हल्का होता गया एक
- 3:50:24अजीब सी शांति छा
- 3:50:27गई। लंबे पेड़ों की शाखाएं साफ दिख रही
- 3:50:31थी। पतली और नंगी।
- 3:50:34एक बच्चा चिल्लाया, एक कुत्ता भौका, एक
- 3:50:37ट्रक गुजरा और एक नया दिन शुरू हो गया।
- 3:50:42थोड़ी देर बाद मां बच्चे को ले बाहर आई
- 3:50:45ध्यान से लपेट के और रोड पर से गुजरते हुए
- 3:50:49गांव के आगे तक चली गई। जहां वह बस का वेट
- 3:50:54कर रही
- 3:50:54थी। लगता था वह उसे डॉक्टर के पास ले जा
- 3:50:58रही थी। वह रात भर जागने के बाद बहुत थकी
- 3:51:01और उदास लग रही
- 3:51:03थी। लेकिन बच्चा गहरी नींद में सो रहा था।
- 3:51:07थोड़ी ही देर में सूरज पेड़ों के ऊपर आ
- 3:51:10गया और हरी घास ओस में चमकने
- 3:51:15लगी। दूर एक ट्रेन की सीटी बजी और दूर के
- 3:51:20पहाड़ ठंडे और छाया से भरे
- 3:51:23लगे। एक बड़ा सा पंछी जोर से उड़ा।
- 3:51:28क्योंकि हमने उसका आशियाना डिस्टर्ब कर
- 3:51:31दिया था। लगता है हम बहुत अचानक वहां आ
- 3:51:35गए। इसलिए उसे अपने अंडे पत्तों से ढकने
- 3:51:39का टाइम ही नहीं मिला। वहां एक दर्जन से
- 3:51:43ज्यादा अंडे थे। भले ही वह खुले थे, लेकिन
- 3:51:46मुश्किल से दिख रहे
- 3:51:48थे। उसने उन्हें इतनी सफाई से छुपा दिया
- 3:51:52था और अब वह दूर एक पेड़ से हमें देख रही
- 3:51:55थी।
- 3:51:56कुछ दिन बाद हमने उस मां को उसके बच्चों
- 3:52:00के साथ देखा और घोंसला खाली
- 3:52:03था। रास्ता ठंडा और थोड़ा अंधेरा था जो
- 3:52:07गीले जंगल से होकर दूर के पहाड़ों तक जाता
- 3:52:11था और वेटल के फूल खिले हुए
- 3:52:14थे। कुछ दिन पहले जोर की बारिश हुई थी और
- 3:52:18जमीन नरम और भीगी थी। छोटे आलू के खेत थे
- 3:52:23और नीचे घाटी में एक शहर
- 3:52:26था। दिन बहुत खूबसूरत और सुनहरा था।
- 3:52:30पहाड़ी के पार रास्ता वापस घर की तरफ जाता
- 3:52:33था। वो बहुत स्मार्ट थी। उसने लेटेस्ट बुक
- 3:52:38पढ़ी थी। लेटेस्ट प्लेस देखे थे। और एक नई
- 3:52:42फिलॉसफी के क्रेज के बारे में वेल इनफॉर्म
- 3:52:45थी।
- 3:52:46उसका एनालिसिस हुआ था और उसने साइकोलॉजी
- 3:52:49भी काफी पढ़ी थी क्योंकि उसे उसका
- 3:52:52लैंग्वेज अच्छी तरह आता
- 3:52:54था। वह सब इंपॉर्टेंट लोगों से मिलने की
- 3:52:57कोशिश करती थी और कैजुअली किसी के साथ
- 3:53:00यहां आ गई थी। वह आसानी से बात करती थी और
- 3:53:04अपने वर्ड्स को स्टाइल से बोलती थी। वह
- 3:53:08शादीशुदा थी। लेकिन उसके कोई बच्चे नहीं
- 3:53:11थे।
- 3:53:13और लगता था यह सब अब उसके पीछे छूट गया
- 3:53:16है। और अब वह एक नई जर्नी पर थी। लगता था
- 3:53:19वह अमीर
- 3:53:21थी क्योंकि उसके आसपास एक अलग ही रिच
- 3:53:25लोगों वाली वाइफ थी। उसने सीधा पूछा आप इस
- 3:53:28टाइम पर दुनिया की हेल्प कैसे कर रहे
- 3:53:31हो? लगता था यह उसका फिक्स्ड सवाल था। फिर
- 3:53:35उसने और भी इंटरेस्ट से वार फ्रोकने
- 3:53:38कम्युनिज्म के इफेक्ट्स और इंसान के
- 3:53:41फ्यूचर के बारे में
- 3:53:43पूछा। क्या वॉर्स बढ़ते डिजास्टर्स और पेन
- 3:53:47हमारी डेली लाइफ का ही रिजल्ट नहीं है?
- 3:53:51क्या हम सब इंडिविजुअली इस क्राइसिस के
- 3:53:54लिए जिम्मेदार नहीं है। फ्यूचर प्रेजेंट
- 3:53:57में ही है। अगर प्रेजेंट का समझ नहीं है
- 3:54:01तो फ्यूचर अलग कैसे होगा?
- 3:54:04लेकिन क्या तुम नहीं सोचती कि हर एक इंसान
- 3:54:06इस कॉन्फ्लिक्ट और कंफ्यूजन का हिस्सा
- 3:54:09है? हो सकता है।
- 3:54:12लेकिन इस रिस्पांसिबिलिटी को मान लेने से
- 3:54:15क्या होता
- 3:54:16है? मेरे छोटे से एक्शन का क्या वैल्यू है
- 3:54:19इस बड़े डिस्ट्रक्शन के बीच? मेरा थॉट
- 3:54:23दुनिया की स्टूपिडिटी को कैसे बदल सकता
- 3:54:25है?
- 3:54:26जो दुनिया में हो रहा है वह टोटली
- 3:54:28स्टूपिडिटी है और मेरी इंटेलिजेंस उसे
- 3:54:32चेंज नहीं कर सकती। और सोचो कितना टाइम
- 3:54:37लगेगा इंडिविजुअल एक्शन को दुनिया पर
- 3:54:39इंपैक्ट डालने में। क्या दुनिया तुमसे अलग
- 3:54:42है? क्या सोसाइटी का स्ट्रक्चर हम जैसे
- 3:54:46लोगों ने नहीं बनाया? अगर स्ट्रक्चर को
- 3:54:49डीपली बदलना है तो क्या तुम्हें और मुझे
- 3:54:53खुद को डीपली चेंज नहीं करना
- 3:54:56चाहिए? अगर वैल्यूस का असली बदलाव चाहिए
- 3:54:59तो वह हमसे ही स्टार्ट होना चाहिए। है
- 3:55:03ना? आज के क्राइसिस में हेल्प करने के लिए
- 3:55:07क्या हमें एक नई आईडियोलॉजी चाहिए? एक नया
- 3:55:10इकोनॉमिक प्लान। यह हमें पहले अपने अंदर
- 3:55:14के कॉन्फ्लिक्ट और कंफ्यूजन को समझना
- 3:55:16चाहिए। जो ही दुनिया का प्रोजेक्शन
- 3:55:21है। क्या नए आईडियोलॉजी इंसान और इंसान के
- 3:55:25बीच यूनिटी ला सकते
- 3:55:27हैं? क्या बिलीव्स इंसान को एक दूसरे के
- 3:55:30अगेंस्ट नहीं करते?
- 3:55:32क्या हमें अपने आइडियोलॉजिकल वाल्स हटा के
- 3:55:35अपने प्रॉब्लम्स को बिना बायस डायरेक्टली
- 3:55:38नहीं देखना
- 3:55:40चाहिए? हम कभी भी अपने प्रॉब्लम से
- 3:55:43डायरेक्ट रिलेशन में नहीं होते। हमेशा
- 3:55:46किसी ना किसी बिलीफ या फार्मूला के थ्रू
- 3:55:48देखते
- 3:55:50हैं। प्रॉब्लम्स तभी सॉल्व होती हैं जब हम
- 3:55:53उसे डायरेक्टली फेस टू फेस होते हैं।
- 3:55:57प्रॉब्लम हमें डिवाइड नहीं करती। हमारे
- 3:56:00उसके बारे में जो आईडियाज होते हैं, वह
- 3:56:03अलग करते
- 3:56:04हैं। प्रॉब्लम हमें एक साथ लाती है। लेकिन
- 3:56:09आइडियाज हमें अलग कर देते
- 3:56:11हैं। अगर मैं पूछूं तुम इतनी कंसर्न क्यों
- 3:56:15हो इस क्राइसिस के बारे में?
- 3:56:18ओ मुझे नहीं पता। मैं इतना दुख देखती हूं।
- 3:56:21इतनी मिजरी और लगता है कुछ तो करना चाहिए।
- 3:56:25क्या तुम वाकई कंसर्न हो या सिर्फ कुछ
- 3:56:28करने का एंबिशन
- 3:56:30है? जब आप ऐसे कहते हैं तो शायद मैं
- 3:56:33एंबिशियस हूं कुछ ऐसा करने के लिए जिसमें
- 3:56:36मैं सक्सेसफुल हो जाऊं।
- 3:56:41बहुत कम लोग होते हैं जो अपने सोचने में
- 3:56:44सच्चे होते हैं। हम सक्सेसफुल बनना चाहते
- 3:56:47हैं या तो सीधा अपने लिए या उस आइडियल के
- 3:56:52लिए जिसे हमने अपने आप को जोड़ रखा
- 3:56:55है। वह आइडियल हमारा अपना ही बनाया हुआ
- 3:56:58होता है। वह हमारे माइंड का प्रोडक्ट होता
- 3:57:02है और हमारा माइंड एक्सपीरियंस करता है
- 3:57:06अपनी कंडीशनिंग के हिसाब से।
- 3:57:09इन्हीं अपने ही बनाए प्रोजेक्शंस के लिए
- 3:57:12हम काम करते हैं। मेहनत करते हैं, मर जाते
- 3:57:17हैं। नेशनलिज्म भी गॉड की वरशिप की तरह
- 3:57:21सिर्फ अपने आप को बड़ा बनाने का एक तरीका
- 3:57:24है। असली में या आईडिया के लेवल पे
- 3:57:28इंपॉर्टेंट बस हम खुद होते
- 3:57:31हैं। ना कि वह डिस्ट्रक्शन या मिजरी जो चल
- 3:57:35रही होती है। हम वाकई कुछ करना नहीं चाहते
- 3:57:38इस क्राइसिस के बारे में। यह सिर्फ एक नया
- 3:57:42टॉपिक बन गया है स्मार्ट लोगों के लिए या
- 3:57:45उन लोगों के लिए जो सोशली एक्टिव हैं या
- 3:57:48आइडियलिस्ट
- 3:57:50हैं। हम एंबिशियस क्यों होते हैं? अगर हम
- 3:57:54एंबिशियस ना होते तो दुनिया में कुछ होता
- 3:57:57ही नहीं। अगर हम एंबिशियस ना
- 3:58:00होते तो आज भी घोड़ों के गाड़ियों में घूम
- 3:58:04रहे होते। एंबिशन का दूसरा नाम प्रोग्रेस
- 3:58:07है। प्रोग्रेस के बिना हम सड़ जाते, खत्म
- 3:58:12हो
- 3:58:13जाते। दुनिया में काम तो हो रहा है लेकिन
- 3:58:17साथ ही हम वॉर्स और पेन भी पैदा कर रहे
- 3:58:20हैं। क्या एंबिशन ही प्रोग्रेस
- 3:58:24है? अभी हम प्रोग्रेस की बात नहीं कर रहे।
- 3:58:27सिर्फ एंबिशन की बात कर रहे हैं। हम
- 3:58:30एंबिशियस क्यों होते हैं?
- 3:58:32हम सक्सेसफुल क्यों बनना चाहते हैं? किसी
- 3:58:36बनने की कोशिश क्यों करते
- 3:58:38हैं? सुपीरियर बनने के लिए इतना स्ट्रगल
- 3:58:42क्यों? इतनी मेहनत क्यों अपने आप को प्रूफ
- 3:58:45करने के लिए? चाहे सीधा हो या किसी
- 3:58:48आईडियोलॉजी या स्टेट के थ्रू।
- 3:58:52क्या यह सिर्फ असरशन ही हमारे कॉन्फ्लिक्ट
- 3:58:55और कंफ्यूजन की जड़ नहीं है? अगर एंबिशन
- 3:58:59ना हो तो क्या हम खत्म हो
- 3:59:02जाएंगे? क्या बिना
- 3:59:05एंबिशियस हुए हम फिजिकली सर्वाइव नहीं कर
- 3:59:09सकते? कौन सर्वाइव करना चाहता है बिना
- 3:59:12सक्सेस के बिना रिकॉग्निशन
- 3:59:14के? क्या यह सक्सेस चाहने की इच्छा? यह
- 3:59:18क्लैप्स चाहने का
- 3:59:19क्रेज अंदर और बाहर दोनों जगह कॉन्फ्लिक्ट
- 3:59:23नहीं
- 3:59:24लाता। क्या एंबिशन से फ्री होने का मतलब
- 3:59:27होता है सड़
- 3:59:29जाना? क्या बिना कॉन्फ्लिक्ट के जीना मतलब
- 3:59:32रुक जाना है? हम अपने आप को ड्रग्स दे
- 3:59:36सकते हैं बिलीफ से, डॉक्टाइन से और कहेंगे
- 3:59:40कि अब कोई डीप कॉन्फ्लिक्ट नहीं
- 3:59:42है। ज्यादा लोगों के लिए कोई ना कोई
- 3:59:45एक्टिविटी ही एक नशा है। ऑब्वियस है। ऐसी
- 3:59:49स्टेट सड़ने वाली होती है। बिखरती है।
- 3:59:54लेकिन जब हम फॉल्स को फॉल्स के रूप में
- 3:59:57देखते हैं, क्या उससे मौत आ जाती
- 4:00:01है। यह समझना कि एंबिशन किसी भी फॉर्म में
- 4:00:05चाहे खुशी के लिए हो, गॉड के लिए या
- 4:00:08सक्सेस के लिए। अंदर और बाहर दोनों जगह
- 4:00:11कॉन्फ्लिक्ट लाता है। इसका मतलब यह नहीं
- 4:00:15कि लाइफ या एक्शन का एंड हो गया। हम
- 4:00:18एंबिशियस क्यों होते
- 4:00:23हैं। अगर मैं कुछ अचीव करने की कोशिश में
- 4:00:26बिजी ना रहूं तो बोर हो जाऊंगी। पहले मैं
- 4:00:28अपने हस्बैंड के लिए एंबिशियस थी और आप
- 4:00:32कहेंगे कि वह मेरे लिए ही था। हस्बैंड के
- 4:00:35थ्रू। अब मैं खुद के लिए एंबिशियस हूं। एक
- 4:00:37आईडिया के थ्रू। मैंने कभी एंबिशन के बारे
- 4:00:40में सोचा नहीं। बस हमेशा एंबिशियस रही
- 4:00:46हूं। हम इतने स्मार्ट और एंबिशियस क्यों
- 4:00:49होते
- 4:00:50हैं? क्या एंबिशन एक तरीका नहीं होता जो
- 4:00:55है उसे भागने का?
- 4:00:57क्या यह स्मार्टनेस असल में स्टूपिडिटी
- 4:01:00नहीं है? जो हम
- 4:01:02हैं। हम इतने डरे हुए क्यों होते हैं? जो
- 4:01:06है उससे क्या फायदा भाग के जाने
- 4:01:11का? जब जो हम हैं वह तो वहीं का वहीं रहता
- 4:01:15है। हो सकता है हम एस्केप कर लें।
- 4:01:20लेकिन जो हम हैं वह फिर भी वहां होता है
- 4:01:23और वह कॉन्फ्लिक्ट और मिजरी पैदा करता है।
- 4:01:27हम इतने डरे हुए क्यों हैं? अपनी लोनलीनेस
- 4:01:31से, अपने खालीपन
- 4:01:34से जो भी एक्टिविटी होती है जो है उससे
- 4:01:37दूर भागने के लिए वह सोरो और क्लैश ले आती
- 4:01:41है। कॉन्फ्लिक्ट का मतलब ही होता है जो है
- 4:01:46उसका इंकार या उससे
- 4:01:48भागना। और कोई कॉन्फ्लिक्ट होता ही नहीं।
- 4:01:53हमारे कॉन्फ्लिक्ट्स इतने कॉम्प्लेक्स और
- 4:01:55इंपॉसिबल इसलिए बन जाते हैं क्योंकि हम जो
- 4:01:59है उससे डायरेक्टली फेस नहीं करते। जो है
- 4:02:03उसमें कोई कॉम्प्लेक्सिटी नहीं होती।
- 4:02:06कॉम्प्लेक्सिटी सिर्फ उन सब रास्तों में
- 4:02:09होती है जिनसे हम उससे भाग रहे होते
- 4:02:19हैं। द इंडिविजुअल एंड द
- 4:02:23आइडियल। इंडिया में हमारी जिंदगी टूट चुकी
- 4:02:26है। हम फिर से कुछ बनाना चाहते हैं। लेकिन
- 4:02:28समझ नहीं आता शुरुआत कहां से करें। मुझे
- 4:02:32मास एक्शन कीेंस भी दिखती है और उसके
- 4:02:34डेंजर्स भी। मैं नॉन वायलेंस के आइडियल को
- 4:02:37फॉलो करता आया हूं। लेकिन फिर भी खून बहता
- 4:02:40रहा। लोग दुख भोगते रहे। पार्टीशन के बाद
- 4:02:44इस देश के हाथ खून सेंगे हुए हैं। और अब
- 4:02:47हम आर्मी बिल्ड कर रहे हैं। हम नॉन
- 4:02:50वायलेंस की बात करते हैं। लेकिन वॉर की
- 4:02:52तैयारी करते हैं। मैं भी पॉलिटिकल लीडर्स
- 4:02:55की तरह कंफ्यूज्ड हूं। जब मैं जेल में था,
- 4:02:59मैंने काफी किताबें पढ़ी। लेकिन मुझे अपनी
- 4:03:01पोजीशन क्लियर करने में वो मदद नहीं कर
- 4:03:05पाई। क्या हम एक-एक करके बात करें और
- 4:03:09थोड़ा गहरा जाए? सबसे पहले आप इंडिविजुअल
- 4:03:11पर ज्यादा जोर देते हैं लेकिन क्या
- 4:03:13कलेक्टिव एक्शन जरूरी नहीं है?
- 4:03:24इंडिविजुअल असल में कलेक्टिव ही होता है
- 4:03:27और सोसाइटी इंडिविजुअल का ही क्रिएशन
- 4:03:31है। इंडिविजुअल और सोसाइटी एक दूसरे से
- 4:03:34जुड़े हुए हैं। है ना? वह अलग नहीं
- 4:03:39होते। इंडिविजुअल ही सोसाइटी का स्ट्रक्चर
- 4:03:43बनाता है। और सोसाइटी या एनवायरमेंट
- 4:03:46इंडिविजुअल को शेप करता है।
- 4:03:51चाहे एनवायरमेंट इंडिविजुअल को कंडीशन
- 4:03:53करता है लेकिन वह हमेशा अपने आप को फ्री
- 4:03:56कर सकता है। अपने पास्ट से अलग हो सकता
- 4:04:01है। इंडिविजुअल खुद ही वह एनवायरमेंट
- 4:04:04बनाता है जिसका वह बाद में गुलाम बन जाता
- 4:04:07है। लेकिन उसके पास यह पावर भी होती है कि
- 4:04:12वह उससे अलग हो जाए और एक नया एनवायरमेंट
- 4:04:15क्रिएट करें।
- 4:04:19जो उसके माइंड या स्पिरिट को डल ना
- 4:04:23करें। इंडिविजुअल सिर्फ तभी इंपॉर्टेंट है
- 4:04:26जब उसमें अपने कंडीशनिंग से फ्री होने की
- 4:04:29कैपेसिटी हो और रियलिटी को समझने का
- 4:04:34जज्बा। अगर इंडिविजुअल सिर्फ अपनी
- 4:04:37कंडीशनिंग में ही रूथलेस बना रहे तो वह
- 4:04:41ऐसी सोसाइटी बनाता है जो वायलेंस और हेट
- 4:04:45रेट पर बेस्ड होती है।
- 4:04:48इंडिविजुअल सिर्फ रिलेशन में ही एक्सिस्ट
- 4:04:51करता है। वरना उसका कोई मतलब नहीं।
- 4:04:56और इसी रिलेशन को ना समझने की कोशिश से
- 4:05:00कॉन्फ्लिक्ट और कंफ्यूजन पैदा हो रहा
- 4:05:03है। अगर इंडिविजुअल अपने रिलेशन को समझता
- 4:05:07ही नहीं लोगों से, प्रॉपर्टी से, आइडियाज
- 4:05:11या बिलीफ
- 4:05:12से तो उस पर कोई भी कलेक्टिव या पैटर्न
- 4:05:15थोपना उसके असली गोल को ही खत्म कर देता
- 4:05:20है। एक नया पैटर्न लागू करने के लिए मास
- 4:05:23एक्शन चाहिए होती है। लेकिन वह नया पैटर्न
- 4:05:27कुछ सिलेक्टेड इंडिविजुअल्स का ही
- 4:05:29इन्वेंशन होता
- 4:05:31है। और मास सिर्फ नए स्लोगंस नए
- 4:05:35प्रॉमिससेस से हिप्नोटाइज हो जाता
- 4:05:39है। मास वही पुराना मास रहता है। वही भीड़
- 4:05:44सिर्फ नए रूलर्स होते हैं। नए शब्द, नए
- 4:05:48प्रीस्ट, नए रूल्स।
- 4:05:52यह मास तुम और मैं ही है। यह भीड़ यह
- 4:05:56इंडिविजुअल का ही ग्रुप
- 4:05:59है। मास एक फेक नाम है। जिसे लीडर्स और
- 4:06:03पॉलिटिशियंस अपने बेनिफिट के लिए यूज करते
- 4:06:07हैं। थोड़े लोग ही मास को एक्शन में डालते
- 4:06:10हैं। वॉर में भेजते हैं। और यह थोड़े लोग
- 4:06:14ही मास की डिजायर्स और अर्ज को दिखाते
- 4:06:19हैं। असली इंपॉर्टेंट चीज है इंडिविजुअल
- 4:06:22का ट्रांसफॉर्मेशन। लेकिन किसी पैटर्न के
- 4:06:26थ्रू नहीं।
- 4:06:28पैटर्न्स हमेशा कंडीशन करते हैं और एक
- 4:06:31कंडीशन इंसान हमेशा अंदर से कॉन्फ्लिक्टेड
- 4:06:35होता है और इसलिए सोसाइटी से
- 4:06:39भी एक ओल्ड पैटर्न को नए पैटर्न से
- 4:06:42रिप्लेस करना आसान है।
- 4:06:46लेकिन इंडिविजुअल को खुद का हर कंडीशनिंग
- 4:06:49से फ्री करना एक अलग ही लेवल की बात है।
- 4:06:58इसमें बहुत केयरफुल और डीप सोच चाहिए।
- 4:07:00लेकिन मुझे लगता है मैं थोड़ा समझने लगा
- 4:07:03हूं। आप इंडिविजुअल पर जोर देते हो। लेकिन
- 4:07:08ऐसे नहीं जैसे वह सोसाइटी में अलग ही
- 4:07:10अगेंस्ट हो। अब दूसरी बात मैं हमेशा एक
- 4:07:14आइडियल के लिए काम करता रहा हूं। और मुझे
- 4:07:16समझ नहीं आता कि आप उसका इंकार क्यों करते
- 4:07:19हैं। क्या आप इस इशू को थोड़ा और
- 4:07:21एक्सप्लेन करेंगे।
- 4:07:30हमारी आज की मोरलिटी पास्ट या फ्यूचर पर
- 4:07:33बेस्ड है। या तो ट्रेडिशन पे या जो होना
- 4:07:37चाहिए उस
- 4:07:39पे। जो होना चाहिए वही आइडियल होता है। जो
- 4:07:44पास्ट के अगेंस्ट होता है। यानी फ्यूचर और
- 4:07:48पास्ट में कॉन्फ्लिक्ट।
- 4:07:52नॉन वायलेंस एक आइडियल है जो होना चाहिए
- 4:07:55और जो था वह वायलेंस
- 4:07:58था। जो था वही प्रोजेक्ट करता है जो होना
- 4:08:01चाहिए। आइडियल हमारा खुद का बना हुआ होता
- 4:08:05है। वह अपने ऑोजिट से ही निकला होता
- 4:08:10है। ऑोजिट अपने ऑोजिट का पार्ट ही होता
- 4:08:14है। जब माइंड वायलेंट होता है तो वह उसका
- 4:08:18ऑोजिट बनाता है। नॉन वायलेंस का
- 4:08:23आइडियल। कहा जाता है कि आइडियल अपने ऑोजिट
- 4:08:27को खत्म करता है। लेकिन क्या वह करता है?
- 4:08:31क्या आइडियल एक तरीका नहीं होता जो था या
- 4:08:35जो है उससे भागने का?
- 4:08:40एक्चुअल और आइडियल के बीच का कॉन्फ्लिक्ट
- 4:08:43सिर्फ एक्चुअल को समझने से बचने का एक
- 4:08:46तरीका होता है और यह कॉन्फ्लिक्ट एक नया
- 4:08:49प्रॉब्लम ले आता है जो प्रेजेंट प्रॉब्लम
- 4:08:52को छुपा देता
- 4:08:54है। आइडियल एक रिस्पेक्टफुल एस्केप होता
- 4:08:57है जो है
- 4:08:59उससे नॉन वायलेंस का आइडियल जैसे कलेक्टिव
- 4:09:03यूटोपिया एक फिक्शन है। आइडियल जो होना
- 4:09:07चाहिए। हमें हेल्प करता है उस चीज से दूर
- 4:09:10भागने में जो सच में
- 4:09:13है। आइडियल के पीछे भागना मतलब रिवॉर्ड को
- 4:09:17ढूंढना। हो सकता है तुम दुनिया के रिवॉर्ड
- 4:09:20को बेकार और बर्बर समझो और उसको छोड़ दो।
- 4:09:25जो वैसे वैसे है भी।
- 4:09:30लेकिन आइडियल के पीछे तुम्हारा भागना एक
- 4:09:32और लेवल का रिवॉर्ड ढूंढना है जो उतना ही
- 4:09:35बेकार है।
- 4:09:38आइडियल एक कंपनसेशन है। एक फेक स्टेट है
- 4:09:42जो माइंड ने खुद बना लिया
- 4:09:45है। जब माइंड वायलेंट होता है, अलग होता
- 4:09:49है, सिर्फ अपने लिए होता है तो एक सुकून
- 4:09:52देने वाला झूठा सपना बनाता है। जिसे वह
- 4:09:56आइडियल कहता है, यूटोपिया कहता है, फ्यूचर
- 4:09:59कहता है और उसके पीछे भागता रहता
- 4:10:03है। यही भागना खुद कॉन्फ्लिक्ट है। लेकिन
- 4:10:07इसमें एक मजा भी होता है। जो एक्चुअल से
- 4:10:12भागने का तरीका बन जाता
- 4:10:15है। आइडियल जो होना चाहिए किसी भी तरह से
- 4:10:19जो है उसे समझने में हेल्प नहीं करता
- 4:10:23बल्कि उसे समझने से रोकता
- 4:10:30है। क्या आप कहना चाहते हैं कि हमारे
- 4:10:33लीडर्स और टीचर्स गलत थे जो आइडियल को
- 4:10:36प्रमोट करते
- 4:10:37रहे। आपको क्या लगता है? अगर मैं आपकी बात
- 4:10:41सही समझ रहा हूं
- 4:10:45तो
- 4:10:48प्लीज बात किसी और की बात समझने की नहीं
- 4:10:51है। बात यह है कि सच क्या है? वह खुद
- 4:10:56ढूंढना। सच कोई ओपिनियन नहीं होता।
- 4:11:00सच किसी टीचर या लीडर पर डिपेंड नहीं
- 4:11:03करता।
- 4:11:05ओपिनियंस को तोलने से सच नहीं
- 4:11:08मिलता बल्कि वह सच को देखने से रोकता
- 4:11:13है। यह तो आइडियल एक फेक चीज है जो अपने
- 4:11:16ऑोजिट को अपने अंदर रखता है या फिर नहीं
- 4:11:22है। इसमें दो रास्ते
- 4:11:25हैं। यह किसी टीचर पर डिपेंड नहीं करता।
- 4:11:29तुम्हें खुद ही इसकी सच्चाई देखनी पड़ेगी।
- 4:11:34अगर आइडियल झूठा है तो मेरी पूरी सोच पलट
- 4:11:36जाएगी। क्या आप कहना चाहते हैं कि आइडियल
- 4:11:39के पीछे भागना बिल्कुल बेकार
- 4:11:45है? यह एक बेकार की फाइट है। एक सुकून
- 4:11:49देने वाला सेल्फ चीटिंग है। है ना?
- 4:11:56यह बात सुनकर हिला देने वाली है। लेकिन
- 4:11:58मुझे मानना पड़ रहा है कि यह सही है। हमने
- 4:12:01इतनी सारी चीजें बिना सोचे समझे मान ली है
- 4:12:04कि कभी हाथ में जो है उसे ढंग से देखा ही
- 4:12:07नहीं। हमने खुद को ही धोखा दिया है और जो
- 4:12:10आप कह रहे हैं। वह मेरी पूरी सोच और एक्शन
- 4:12:14के स्ट्रक्चर के हिला देती है। यह
- 4:12:17एजुकेशन, जिंदगी जीने का तरीका, काम करने
- 4:12:20का ढंग सब कुछ बदल देगा। मुझे लगता है मैं
- 4:12:24समझ पा रहा हूं एक ऐसे माइंड का मतलब जो
- 4:12:27आइडियल से जो होना चाहिए उससे फ्री हो।
- 4:12:30ऐसे माइंड के लिए एक्शन का मतलब बिल्कुल
- 4:12:33अलग होता है जो हम अब देते हैं। कंपनसेटरी
- 4:12:37एक्शन एक्शन नहीं होती। वह सिर्फ रिएक्शन
- 4:12:40होती है और हम उसी पे फक्र करते हैं।
- 4:12:45लेकिन अगर आइडियल ही नहीं हो तो जो है
- 4:12:47उसके साथ कैसे डील करें या जो हो चुका है
- 4:12:51उसके साथ
- 4:12:57कैसे जो है उसे समझना तभी पॉसिबल है जब
- 4:13:01माइंड से आइडियल जो होना चाहिए हट जाता
- 4:13:06है। मतलब
- 4:13:08जब झूठ को झूठ के रूप में देख पाते हैं,
- 4:13:11जो होना चाहिए, वह भी एक तरह का नहीं होना
- 4:13:15चाहिए है। जब तक माइंड एक्चुअल के पास
- 4:13:19पॉजिटिव या नेगेटिव कंपनसेशन के साथ जाता
- 4:13:22है, तब तक एक्चुअल को समझना पॉसिबल
- 4:13:27नहीं। एक्चुअल को समझने के लिए तुम्हारा
- 4:13:30उसके साथ डायरेक्ट कनेक्शन होना चाहिए।
- 4:13:35तुम्हारा रिश्ता उससे आइडियल के स्क्रीन
- 4:13:38के थ्रू नहीं हो
- 4:13:40सकता। ना पास्ट के ना ट्रेडिशन के ना
- 4:13:44एक्सपीरियंस
- 4:13:45के। गलत तरीके से फ्री होना ही असली
- 4:13:49प्रॉब्लम है। इसका मतलब है कंडीशनिंग को
- 4:13:52समझना जो कि माइंड है। प्रॉब्लम खुद माइंड
- 4:13:57है। ना कि उसके बनाए हुए प्रॉब्लम्स।
- 4:14:03माइंड के बनाए प्रॉब्लम्स को सॉल्व करना
- 4:14:05सिर्फ इफेक्ट्स को पैच करना है जो और
- 4:14:09ज्यादा कंफ्यूजन और इल्ल्यूजन लाता
- 4:14:14है। माइंड को कैसे समझा जाए थोड़ा इस पर
- 4:14:22बताइए। माइंड का रास्ता ही जिंदगी का
- 4:14:25रास्ता है। ना कि आइडियल जिंदगी बल्कि
- 4:14:28असली जिंदगी जो दर्द और सुख
- 4:14:32धोखा और क्लेरिटी गुरूर और झूठी
- 4:14:35ह्यूमिलिटी से भरी
- 4:14:37है। माइंड को समझना मतलब डिजायर और फियर
- 4:14:42को
- 4:14:45देखना। प्लीज यह सब थोड़ा ज्यादा हो रहा
- 4:14:48है मेरे लिए। मैं अपने माइंड को कैसे
- 4:14:50समझूं? जरा बताइए।
- 4:14:56माइंड को जानना है तो क्या तुम्हें उसके
- 4:14:59एक्टिविटी को ऑब्जर्व नहीं करना
- 4:15:02चाहिए? माइंड सिर्फ एक्सपीरियंस ही है।
- 4:15:05सिर्फ अभी का नहीं बल्कि सब जमा हुआ
- 4:15:09भी। माइंड पास्ट का प्रेजेंट पर रिएक्शन
- 4:15:12है जो फ्यूचर बनाता
- 4:15:15है। माइंड के पूरे प्रोसेस को समझना
- 4:15:20होगा। मुझे कहां से शुरू करना चाहिए?
- 4:15:27वहीं से जहां से शुरू हो सकता है
- 4:15:32रिलेशनशिप। रिलेशनशिप ही जिंदगी है। होना
- 4:15:36मतलब रिलेट
- 4:15:38करना। सिर्फ रिलेशनशिप के मिरर में ही
- 4:15:41माइंड को समझा जा सकता है। और तुम्हें उस
- 4:15:44मिरर में अपने आप को देखना शुरू करना
- 4:15:47होगा।
- 4:15:51क्या आप कहना चाहते हैं कि मेरी वाइफ के
- 4:15:53साथ नेबर के साथ जो रिश्ता है वहीं से
- 4:15:56शुरू करूं? क्या यह प्रोसेस बहुत लिमिटेड
- 4:15:59नहीं है?
- 4:16:06जो छोटा या लिमिटेड दिखता है अगर ठीक से
- 4:16:09देखा जाए तो वही गहरा दिखता है। यह एक
- 4:16:14फनेल की तरह है जो नैरो होती है वह वाइड
- 4:16:17में खुल जाती है। जब बिना जज किए काम
- 4:16:22शांति से देखा जाए तो लिमिटेड भी लिमिटलेस
- 4:16:26को दिखाता
- 4:16:28है। वैसे
- 4:16:30भी रिवर जब स्टार्ट होती है तब छोटी सी
- 4:16:34धारा होती है जिस पर कोई ध्यान नहीं
- 4:16:40देता तो मुझे खुद से और अपने आसपास के
- 4:16:43रिश्तों से ही शुरू करना
- 4:16:46होगा
- 4:16:48बिल्कुल रिलेशनशिप कभी छोटी नहीं
- 4:16:53होती चाहे एक के साथ हो या सबके
- 4:16:56साथ रिलेशनशिप एक कॉम्प्लेक्स प्रोसेस
- 4:17:01है। तुम इसे छोटी सोच से अप्रोच कर सकते
- 4:17:04हो या ओपन हार्ट से भी और यह अप्रोच माइंड
- 4:17:09के स्टेट पर डिपेंड करता है। अगर तुम खुद
- 4:17:13से शुरू नहीं करते तो और कहां से
- 4:17:17करोगे? चाहे तुम किसी आउटर चीज से भी शुरू
- 4:17:20करो। तुम्हारा उससे भी रिलेशन होता ही है
- 4:17:25और माइंड उसका सेंटर होता है।
- 4:17:28चाहे पास से शुरू करो या दूर से तुम हमेशा
- 4:17:33वहीं होते हो। अगर तुम खुद को नहीं समझते
- 4:17:37तो जो भी करोगे वह कंफ्यूजन और दुख ही
- 4:17:41लाएगा। शुरुआत ही अंत
- 4:17:46है। मैं बहुत दूर-दूर भटक चुका हूं। मैंने
- 4:17:49बहुत कुछ देखा है, किया है। हंसा भी हूं,
- 4:17:52रोया भी जैसे सब करते हैं और फिर भी मुझे
- 4:17:56वापस खुद के पास ही आना पड़ा। मैं उस
- 4:17:59सन्यासी की तरह हूं जो ट्रुथ की तलाश में
- 4:18:01निकल
- 4:18:04पड़ा। सालों तक टीचर से टीचर तक घूमता रहा
- 4:18:07और हर कोई अलग रास्ता बताता
- 4:18:10रहा। आखिर में थक कर जब घर वापस आया तो
- 4:18:14देखा कि जो हीरा ढूंढ रहा था वह तो उसके
- 4:18:16अपने घर में ही था। मुझे अब समझ आता है कि
- 4:18:19हम कितने बेवकूफ हैं। जो पूरी दुनिया में
- 4:18:22वह सुकून ढूंढते हैं जो सिर्फ अपने दिल
- 4:18:25में मिलता है। जब माइंड अपनी एक्टिविटी से
- 4:18:28साफ हो जाता है। आप बिल्कुल सही कह रहे
- 4:18:30हैं। मैं वहीं से शुरू करता हूं जहां से
- 4:18:33छोड़ा था। मैं वहीं से शुरू करता हूं जो
- 4:18:37मैं
- 4:18:42हूं। फियर एंड एस्केप।
- 4:18:49हमें स्टडी क्लाइम कर रहे हैं। लेकिन कोई
- 4:18:52मूवमेंट महसूस नहीं हो रही थी। नीचे एक
- 4:18:56बड़ा सा बादलों का समंदर था सफेद और चमकता
- 4:18:59हुआ। लहरों के लहरों जैसे जितना आंखों से
- 4:19:03देखा जा
- 4:19:04सके। वो बादल इतने सॉलिड और भुलाने वाले
- 4:19:08लग रहे थे। कभी-कभी जब हम ज्यादा हाइट पर
- 4:19:11पहुंचते और सर्कल में ऊपर
- 4:19:14बढ़ते तो इस चमकदार झाग में कुछ ब्रेक्स
- 4:19:18दिखते और काफी नीचे हरी जमीन नजर आती।
- 4:19:23ऊपर एक साफ नीला आसमान था। ठंडी विंटर
- 4:19:28वाली। नरम और बिना किसी लिमिट के। बर्फ से
- 4:19:32ढके बड़े-बड़े पहाड़ों की एक लंबी रेंज
- 4:19:34नॉर्थ से साउथ तक फैली थी।
- 4:19:38जो सूरज की रोशनी में चमक रही थी। यह
- 4:19:40पहाड़ 14,000 फीट से ऊपर थे।
- 4:19:45लेकिन हम उनसे भी ज्यादा ऊपर आ गए थे और
- 4:19:47अभी भी ऊपर जा रहे थे। यह पीक्स पहचान
- 4:19:52वाली थी और बहुत पास और शांत लग रही
- 4:19:55थी। जो ज्यादा ऊंची पीक्स थी वह नॉर्थ में
- 4:19:59थी और हम साउथ की तरफ निकल गए थे। क्योंकि
- 4:20:0320,000 फीट की हाइट मिल चुकी थी। मेरे बगल
- 4:20:06में जो पैसेंजर था, वह बहुत बात करने वाला
- 4:20:09निकला। उसे यह पहाड़ पहचान में नहीं थे और
- 4:20:14जब हम ऊपर जा रहे थे, तब वह सो रहा था।
- 4:20:17लेकिन अब वह जाग गया था और बात करने को
- 4:20:20तैयार था। लगता था वह पहली बार किसी काम
- 4:20:23से बाहर जा रहा
- 4:20:24था। उसके काफी इंटरेस्ट थे। और वह उनके
- 4:20:29बारे में नॉलेज के साथ बात कर रहा था। अब
- 4:20:32समुंदर हमारे नीचे था। अंधेरा और
- 4:20:36दूर और यहां वहां कुछ शिप्स दिख रही थी।
- 4:20:40विंग्स में जरा भी हिलाव नहीं था और हम
- 4:20:44कोस्ट के साथ एक के बाद एक रोशन टाउन के
- 4:20:47ऊपर से जा रहे
- 4:20:49थे। वह कह रहा था कि बिना फियर के जीना
- 4:20:52कितना मुश्किल होता
- 4:20:55है। खासतौर पे किसी क्रश का नहीं।
- 4:21:00बल्कि जिंदगी के छोटे बड़े एक्सीडेंट्स का
- 4:21:03वह शादीशुदा था, बच्चे थे और हर वक्त एक
- 4:21:07डर था। सिर्फ फ्यूचर का नहीं बल्कि हर चीज
- 4:21:11का। यह एक ऐसा डर था जिसका कोई एक
- 4:21:14ऑब्जेक्ट नहीं था और जबकि वह सक्सेसफुल
- 4:21:17था। फिर भी यह फियर उसकी जिंदगी को थका
- 4:21:20देने वाला और पेनफुल बना देता
- 4:21:23था। वह हमेशा थोड़ा एशियस रहता था। लेकिन
- 4:21:27अब यह फियर बहुत ज्यादा हो गया था और उसके
- 4:21:30सपने भी डरावने होते थे। उसकी वाइफ उसके
- 4:21:35डर के बारे में जानती थी लेकिन उसके
- 4:21:37सीरियस होने का उसे अंदाजा नहीं
- 4:21:41था। फियर किसी भी चीज के रिलेशन में ही
- 4:21:44होता है। अगर वह बस एक आईडिया हो तो वह
- 4:21:48सिर्फ एक वर्ड है और वर्ड असली फियर नहीं
- 4:21:51होता। क्या तुम्हें पता है तुम किस चीज से
- 4:21:54डरते हो?
- 4:21:56मुझे कभी क्लियर नहीं हो पाया कि मैं किस
- 4:21:59चीज से डरता
- 4:22:00हूं। मेरे सपने भी बहुत वेग होते हैं।
- 4:22:03लेकिन उनमें हमेशा फियर होता है। मैं
- 4:22:05फ्रेंड्स और डॉक्टर से बात कर चुका हूं।
- 4:22:08लेकिन उन्होंने या तो मजाक में उड़ा दिया
- 4:22:10या कोई हेल्प नहीं की। यह फियर हमेशा मुझे
- 4:22:13स्लिप करता रहा। और मैं इस गंदी चीज से
- 4:22:17फ्री होना चाहता
- 4:22:21हूं। क्या तुम वाकई फ्री होना चाहते हो या
- 4:22:24बस? यह एक लाइन
- 4:22:28है। मैं कैजुअली बोलता लग सकता हूं, लेकिन
- 4:22:31मैं बहुत कुछ दे सकता हूं इस फियर से
- 4:22:33छुटकारा पाने के लिए। मैं ज्यादा रिलीजियस
- 4:22:36नहीं हूं।
- 4:22:38लेकिन अजीब बात है कि मैंने प्रे भी किया
- 4:22:40है कि यह फियर चला जाए। जब मैं अपने काम
- 4:22:44में या किसी गेम में बिजी होता हूं तो यह
- 4:22:47कभी-कभी चला जाता है। लेकिन जैसे कोई
- 4:22:49मॉन्सर यह हमेशा वेट करता है और थोड़ी देर
- 4:22:53में फिर मेरे साथी बन जाता
- 4:22:56है। क्या तुम्हें अभी वह फियर महसूस हो
- 4:23:01रहा है? क्या तुम अवेयर हो कि वह यहीं
- 4:23:04कहीं है? क्या वह फियर कॉन्शियस है या
- 4:23:09हिडन? मैं उसे महसूस कर सकता हूं। लेकिन
- 4:23:12मुझे नहीं पता वह कॉन्शियस है या
- 4:23:15अनकॉन्शियस। क्या तुम उसे दूर महसूस करते
- 4:23:19हो या
- 4:23:20पास? स्पेस या डिस्टेंस में नहीं फीलिंग
- 4:23:23के रूप
- 4:23:25में। जब मैं उसे महसूस करता हूं तो वह
- 4:23:28काफी पास लगता है। लेकिन इसका मतलब क्या
- 4:23:30है?
- 4:23:32फियर सिर्फ किसी के रिलेशन में आता है। वह
- 4:23:36चीज तुम्हारा परिवार हो सकती है। तुम्हारा
- 4:23:39काम या फ्यूचर का टेंशन या डेथ क्या
- 4:23:43तुम्हें डेथ का डर है? ज्यादा नहीं। लेकिन
- 4:23:46मैं चाहता हूं मेरी डेथ जल्दी हो ना कि
- 4:23:49लंबी और पेनफुल। मुझे नहीं लगता कि यह डर
- 4:23:52मेरी फैमिली की वजह से है और ना ही मेरी
- 4:23:54जॉब की वजह से।
- 4:23:58तो फिर यह डर सरफेस लेवल के रिश्तों से
- 4:24:00ज्यादा डीप कहीं चीज से आ रहा
- 4:24:04है। हो सकता है कोई और बताए कि क्या है?
- 4:24:09लेकिन अगर तुम खुद ढूंढ पाओ तो उसका
- 4:24:11मीनिंग बहुत ज्यादा
- 4:24:13होगा। तुम सुपरफिशियल रिलेशनशिप से क्यों
- 4:24:16नहीं डरते?
- 4:24:20मैं और मेरी वाइफ एक दूसरे से प्यार करते
- 4:24:22हैं। उसके लिए कोई और आदमी सोचना भी
- 4:24:25मुश्किल है और मुझे भी औरत में इंटरेस्ट
- 4:24:27नहीं। हम एक दूसरे में पूरी तरह से
- 4:24:30कंप्लीट फील करते हैं। बच्चों को ले थोड़ा
- 4:24:33टेंशन रहता है। जो हो सकता है वह करते
- 4:24:36हैं। लेकिन इस इकोनॉमिक मिस में हम उनको
- 4:24:39फाइनेंशियल सिक्योरिटी नहीं दे सकते। वह
- 4:24:42अपने दम पर ही कुछ करेंगे। मेरी जॉब भी
- 4:24:44काफी सिक्योर है। लेकिन नेचुरली मेरी वाइफ
- 4:24:47के साथ कुछ हो जाए इसका डर रहता
- 4:24:50है। तो तुम अपने डीपर रिलेशनशिप को लेके
- 4:24:54श्योर हो। तुम इतने श्योर क्यों
- 4:24:58हो? मुझे पता नहीं लेकिन मैं हूं। कुछ
- 4:25:01चीजें तो मान लेनी पड़ती है। है
- 4:25:04ना? बात यह नहीं है। चलो इसमें थोड़ा और
- 4:25:08घुसे।
- 4:25:11तुम अपने क्लोज रिलेशनशिप को ले इतने
- 4:25:13श्योर क्यों
- 4:25:15हो? जब तुम कहते हो कि तुम और तुम्हारी
- 4:25:18वाइफ एक दूसरे में कंप्लीटनेस फील करते
- 4:25:21हैं। इसका क्या मतलब
- 4:25:24है? हम एक दूसरे में खुशी पाते हैं। साथ
- 4:25:28समझना और वैसे ही सब। अंदर से देखा जाए तो
- 4:25:32हम एक दूसरे पर डिपेंड करते हैं। अगर हम
- 4:25:35दोनों में से किसी को कुछ हो जाए तो बहुत
- 4:25:38बड़ा झटका लगेगा। इस सेंस में हम
- 4:25:40डिपेंडेंट
- 4:25:42हैं। डिपेंडेंट का मतलब क्या
- 4:25:45है? तुम्हारा मतलब है कि उसके बिना तुम खो
- 4:25:49जाओगे। पूरी तरह अकेला महसूस करोगे। है
- 4:25:54ना? वह भी वही महसूस करेगी। तो तुम दोनों
- 4:25:59एक दूसरे पर डिपेंडेंट हो। लेकिन इसमें
- 4:26:02गलत क्या है?
- 4:26:06हम ना तो उसे कंडेम कर रहे हैं ना जज
- 4:26:09सिर्फ पूछ रहे
- 4:26:11हैं। क्या तुम सच में इस सब में जाना
- 4:26:14चाहते हो? पक्का चाहते हो? ठीक है। तो चलो
- 4:26:19आगे बढ़ते
- 4:26:21हैं। अगर तुम्हारी वाइफ ना हो तो तुम
- 4:26:24अकेला महसूस करोगे। अंदर से खो जाओगे। तो
- 4:26:28वह तुम्हारे लिए एसेंशियल है। है ना?
- 4:26:32तुम उसके ऊपर अपनी खुशी के लिए डिपेंड
- 4:26:35करते हो और इसी डिपेंडेंस को तुम प्यार
- 4:26:38कहते हो। तुम अकेला होने से डरते
- 4:26:42हो। वह हमेशा वहां होती है तुम्हारे
- 4:26:45अकेलेपन को छुपाने के लिए। जैसे तुम भी
- 4:26:49उसके अकेलेपन को छुपाते हो।
- 4:26:52लेकिन वह अकेलापन तो फिर भी वहां होता है।
- 4:26:55है ना?
- 4:26:57हम एक दूसरे को यूज करते हैं अपने अकेलेपन
- 4:27:00को छुपाने के
- 4:27:02लिए। हम उससे भाग जाते हैं कई तरीकों से।
- 4:27:06अलग-अलग टाइप के रिलेशनशिप्स के थ्रू और
- 4:27:10हर ऐसा रिलेशनशिप एक डिपेंडेंस बन जाता
- 4:27:13है। मैं रेडियो सुनता हूं क्योंकि मुझे
- 4:27:17म्यूजिक खुशी देता है। मुझे मेरे आप से
- 4:27:21दूर ले जाता है। बुक्स और नॉलेज भी एक
- 4:27:25एस्केप है खुद से। और इन सब चीजों पर हम
- 4:27:28डिपेंड करते
- 4:27:31हैं। मैं खुद से क्यों ना भागूं? मुझ में
- 4:27:34कुछ भी प्राउड होने लायक नहीं है। और जब
- 4:27:37मैं अपनी वाइफ के साथ आइडेंटिफाई करता हूं
- 4:27:39जो मुझसे काफी अच्छी है तो मैं खुद से दूर
- 4:27:42हो जाता
- 4:27:43हूं।
- 4:27:46हां, ज्यादातर लोग खुद से भागते हैं।
- 4:27:50लेकिन जब तुम खुद से भागते हो तो तुम
- 4:27:52डिपेंडेंट बन जाते हो।
- 4:27:55जितना ज्यादा डर होता है जो है उससे उतना
- 4:27:59ही ज्यादा डिपेंडेंस बढ़ती है और एस्केप
- 4:28:02और जरूरी हो जाता है। वाइफ, बुक, रेडियो
- 4:28:08यह सब बहुत इंपॉर्टेंट बन जाते
- 4:28:11हैं। एस्केप सबसे बड़ा वैल्यू बन जाता है।
- 4:28:15मैं अपनी वाइफ को यूज़ करता हूं अपने आप
- 4:28:18से भागने के लिए तो मैं उसके साथ अटैच हो
- 4:28:21जाता हूं।
- 4:28:23मुझे उसे पाना है। उसे खोना नहीं है और
- 4:28:27उसे भी पसंद है कि उसे पाया जाए क्योंकि
- 4:28:31वह भी मुझे यूज कर रही है। दोनों में एक
- 4:28:35कॉमन नीड है भागने की और हम एक दूसरे का
- 4:28:39यूज करते हैं। इस यूज करने को ही हम प्यार
- 4:28:42कहते
- 4:28:43हैं। तुम्हें जो तुम हो वह पसंद नहीं।
- 4:28:47इसलिए तुम खुद से जो है उससे भाग जाते हो।
- 4:28:52यह काफी क्लियर है। मैं इसमें कुछ समझ पा
- 4:28:55रहा हूं। यह बात कुछ सेंस बनाती है।
- 4:28:58लेकिन हम भागते क्यों
- 4:29:01हैं? वह किस चीज से भाग रहे होते
- 4:29:06हैं? अपने ही अकेलेपन से, अपने ही खालीपन
- 4:29:11से, जो तुम हो
- 4:29:14उससे अगर तुम भाग जाते हो बिना देखे कि
- 4:29:17क्या है तो तुम उसे समझ नहीं सकते।
- 4:29:22तो पहले भागना बंद करना होगा। तभी तुम खुद
- 4:29:26को वैसे देख सकते हो जैसे तुम हो।
- 4:29:29लेकिन अगर तुम हमेशा जज करते हो, पसंद या
- 4:29:34नफरत करते हो तो तुम जो है उसे ऑब्जर्व
- 4:29:37नहीं कर सकते। तुम उसे अकेलापन कहते हो और
- 4:29:42उसे भाग जाते हो। और जो है उससे भागने का
- 4:29:46प्रोसेस ही डर
- 4:29:48है। तुम इस अकेलेपन इस खालीपन से डरते हो
- 4:29:53और डिपेंडेंस उसका कवर बन जाता
- 4:29:56है। तो डर कांस्टेंट रहता है। जब तक तुम
- 4:30:01जो है उससे भागते हो। डर रहता
- 4:30:05है। किसी चीज से पूरी तरह आइडेंटिफाई हो
- 4:30:08जाना। चाहे वह इंसान हो या आइडिया। यह भी
- 4:30:12फाइनल एस्केप का गारंटी नहीं है क्योंकि
- 4:30:16यह डर बैकग्राउंड में हमेशा होता है। वह
- 4:30:19सपनों के थ्रू आ जाता है। जब
- 4:30:22आइडेंटिफिकेशन में ब्रेक होती है और ब्रेक
- 4:30:25तो हमेशा होती है जब तक हम मेंटली बैलेंस
- 4:30:30ना हो।
- 4:30:33तो मेरा फियर मेरी खुद की खालीपन से मेरी
- 4:30:36कमी से आता है। मुझे यह समझ आ गया और यह
- 4:30:40सच है। लेकिन मैं इसके साथ क्या
- 4:30:42करूं? तुम कुछ भी नहीं कर सकते। जो भी तुम
- 4:30:46करोगे वह सिर्फ एक और भागने की एक्टिविटी
- 4:30:49होगी। यही सबसे इंपॉर्टेंट बात समझनी है।
- 4:30:54तब तुम देख पाओगे कि तुम उस खालीपन से अलग
- 4:30:57नहीं हो। तुम वही हो।
- 4:31:00ऑब्जर्वर ही ऑब्जर्व एम्प्टीनेस
- 4:31:04है। अगर तुम और आगे जाते हो तो उसे
- 4:31:10अकेलापन कहना भी खत्म हो जाता है। जो नाम
- 4:31:14दिया गया था वह रुक जाता है। और अगर तुम
- 4:31:17और आगे जाते हो जो कि थोड़ा मुश्किल है।
- 4:31:21तो जो चीज अकेलेपन के नाम से जानी जाती थी
- 4:31:24वह खत्म हो जाती है। अकेलापन, खालीपन,
- 4:31:29सोचने वाला और सोच यह सब खत्म हो जाता है।
- 4:31:34और सिर्फ तभी डर का अंत होता
- 4:31:38है। तो फिर प्यार क्या
- 4:31:42है? प्यार आइडेंटिफिकेशन नहीं है। यह किसी
- 4:31:46को लेकर सोचना नहीं है। जब प्यार होता है
- 4:31:50तो तुम उसके बारे में नहीं सोचते।
- 4:31:53तुम तभी सोचते हो जब प्यार चला जाता है।
- 4:31:57जब तुम और तुम्हारे प्यार का ऑब्जेक्ट के
- 4:32:00बीच डिस्टेंस आ जाता है। जब डायरेक्ट
- 4:32:03कनेक्शन होता है तो कोई सोच नहीं होती।
- 4:32:07कोई इमेज नहीं होती, कोई याद नहीं होती।
- 4:32:11जब कनेक्शन टूट जाता है तब सोच और
- 4:32:14इमेजिनेशन स्टार्ट होती
- 4:32:17है। प्यार माइंड का पार्ट नहीं है। माइंड
- 4:32:22बनाता है जेलसी का
- 4:32:24धुआ पोज़ेस करने का, याद करने
- 4:32:28का कल के लिए लॉन्गिंग का, दुख और चिंता
- 4:32:32का। और यह सब मिलके उस फ्लेम को दबा देते
- 4:32:36हैं उस आग को।
- 4:32:40जब यह धुआ नहीं होता तभी आग तभी फ्लेम
- 4:32:43होती है। दोनों एक साथ नहीं रह
- 4:32:47सकते। सोचना कि दोनों एक साथ हो सकते हैं।
- 4:32:51सिर्फ एक विश है, एक
- 4:32:53इच्छा और विश माइंड का प्रोजेक्शन होती है
- 4:32:58और माइंड का थॉट कभी प्यार नहीं होता।
- 4:33:11टाइम एंड
- 4:33:15ट्रांसफॉर्मेशन। मैं थोड़ा सा टाइम के
- 4:33:17बारे में बात करना चाहता
- 4:33:20हूं। क्योंकि मुझे लगता है जो टाइमलेस है,
- 4:33:23जो सच है, उसकी असली ब्यूटी, उसका असली
- 4:33:27मीनिंग तभी फील किया जा सकता है जब हम
- 4:33:31टाइम के पूरे प्रोसेस को समझ लें।
- 4:33:36आखिर हम सब अपनेप तरीके से खुशी एक रिचनेस
- 4:33:41फील करने की कोशिश कर रहे
- 4:33:43हैं। श्योरली एक ऐसी जिंदगी जो मीनिंगफुल
- 4:33:47हो जिसमें ट्रू हैप्पीनेस हो वो टाइम की
- 4:33:51नहीं होती।
- 4:33:54जैसे प्यार वैसे ही असली जिंदगी टाइमलेस
- 4:33:57होती
- 4:33:58है। और जो टाइमलेस है उसको समझने के लिए
- 4:34:02हमें टाइम के थ्रू नहीं जाना
- 4:34:06चाहिए। बल्कि पहले टाइम को समझना
- 4:34:10चाहिए। हमें टाइम को एक टूल की तरह यूज़
- 4:34:13नहीं करना चाहिए जो हमें टाइमलेस तक ले
- 4:34:17जाए।
- 4:34:20लेकिन हम ज्यादातर जिंदगी इसी में लगा
- 4:34:22देते
- 4:34:23हैं। टाइमलेस चीज को समझने के लिए टाइम का
- 4:34:27यूज करते
- 4:34:28हुए। इसलिए यह समझना जरूरी है कि हम टाइम
- 4:34:33से क्या मतलब लेते
- 4:34:35हैं। क्योंकि मुझे लगता है कि टाइम से
- 4:34:38फ्री होना पॉसिबल है।
- 4:34:41टाइम को पूरे तरीके से समझना इंपॉर्टेंट
- 4:34:43है। सिर्फ थोड़ा-थोड़ा नहीं।
- 4:34:47यह सोचना इंटरेस्टिंग है कि हमारी जिंदगी
- 4:34:50ज्यादातर टाइम में ही बीतती है।
- 4:34:55लेकिन टाइम का मतलब यहां मिनट्स, हावर्स,
- 4:35:00डेज, इयर्स नहीं बल्कि साइकोलॉजिकल मेमोरी
- 4:35:06है। हम टाइम के अकॉर्डिंग जीते हैं। हम
- 4:35:10टाइम का रिजल्ट
- 4:35:12है। हमारा माइंड बहुत सारे कल के दिनों का
- 4:35:16प्रोडक्ट है और प्रेजेंट सिर्फ पास्ट का
- 4:35:20फ्यूचर की तरफ जाना
- 4:35:22है। हमारा माइंड, हमारी एक्टिविटी, हमारा
- 4:35:26होना सब टाइम पर बेस्ड
- 4:35:29है। बिना टाइम के हम सोच भी नहीं सकते
- 4:35:33क्योंकि सोच टाइम का रिजल्ट है। सोच कल के
- 4:35:38एक्सपीरियंसेस का प्रोडक्ट है। और बिना
- 4:35:41मेमोरी के कोई थॉट होता ही नहीं। मेमोरी
- 4:35:45ही टाइम है।
- 4:35:48टाइम दो तरीके का होता है। एक
- 4:35:51क्रोनोलॉजिकल और दूसरा
- 4:35:55साइकोलॉजिकल। एक होता है कल का समय घड़ी
- 4:35:58के हिसाब से। और दूसरा होता है कल की
- 4:36:03मेमोरी के हिसाब
- 4:36:05से। तुम क्रोनोलॉजिकल टाइम को रिजेक्ट
- 4:36:08नहीं कर सकते।
- 4:36:11वह तो बेकार
- 4:36:13होगा। तुम अपनी ट्रेन मिस कर दोगे।
- 4:36:18लेकिन क्या क्रोनोलॉजिकल टाइम के अलावा भी
- 4:36:21कोई और टाइम होता है? हां, कल तो था ही।
- 4:36:27लेकिन क्या वैसे भी टाइम होता है जैसे
- 4:36:30माइंड सोचता
- 4:36:31है। क्या माइंड के अलावा टाइम होता है?
- 4:36:36शोरली साइकोलॉजिकल टाइम माइंड का प्रोडक्ट
- 4:36:39है। बिना थॉट के टाइम होता ही नहीं
- 4:36:43क्योंकि टाइम तो सिर्फ मेमोरी है। कल का
- 4:36:47एक्सपीरियंस प्लस आज का एक्सपीरियंस
- 4:36:50इक्वल्स कल की सोच।
- 4:36:54यानी कल जो फील किया उसका रिएक्शन आज और
- 4:36:58उसी से फ्यूचर बनता
- 4:37:01है। यह सब थॉट का प्रोसेस है। माइंड का
- 4:37:05पाथ
- 4:37:06है। यह थॉट प्रोसेस ही साइकोलॉजिकल
- 4:37:10प्रोग्रेस बनाता है टाइम के
- 4:37:13थ्रू। लेकिन क्या यह वाकई रियल है?
- 4:37:18जैसे क्रोनोलॉजिकल टाइम रियल है। और क्या
- 4:37:22हम इस माइंड वाले टाइम को यूज करके एटरनल
- 4:37:26टाइमलेस को समझ सकते
- 4:37:30हैं? जैसे मैंने कहा हैप्पीनेस कल की नहीं
- 4:37:36होती। हैप्पीनेस टाइम का प्रोडक्ट नहीं
- 4:37:39होती। हैप्पीनेस हमेशा भी होती है। एक
- 4:37:44टाइमलेस स्टेट होती है। पता नहीं तुमने
- 4:37:47नोटिस किया या
- 4:37:51नहीं। जब तुम्हें रियल जॉय मिलता है एक
- 4:37:54क्रिएटिव
- 4:37:56एक्ससी जैसे ब्राइट बादलों के बीच में
- 4:38:00अंधेरा। तो उस मोमेंट में कोई टाइम नहीं
- 4:38:04होता। सिर्फ प्रेजेंट होता
- 4:38:07है। जब माइंड उस मोमेंट के बाद आता है तो
- 4:38:12वह याद करता है और चाहता है कि यह मोमेंट
- 4:38:15चलता रहे।
- 4:38:17फिर वह और और कलेक्ट करता है और टाइम
- 4:38:22क्रिएट करता
- 4:38:24है तो टाइम और से बनता है।
- 4:38:28टाइम पोजेस करने से बनता है और टाइम डी
- 4:38:32अटैचमेंट से भी बनता
- 4:38:34है। जो कि फिर भी माइंड की पोजीशन ही है।
- 4:38:39इसलिए सिर्फ माइंड को टाइम में डिसिप्लिन
- 4:38:42करना। थॉट को टाइम के फ्रेमवर्क में डालना
- 4:38:46जो कि मेमोरी है वह टाइमलेस चीज को कभी
- 4:38:49नहीं
- 4:38:51दिखाता। क्या ट्रांसफॉर्मेशन टाइम का मैटर
- 4:38:56है? ज्यादातर लोगों का मानना है कि
- 4:38:59ट्रांसफॉर्मेशन के लिए टाइम चाहिए।
- 4:39:02मैं जो
- 4:39:03हूं उसे बदल के जो मुझे होना चाहिए उसके
- 4:39:08बीच टाइम लगता है। मैं ग्रीडी हूं और
- 4:39:12ग्रीड से कंफ्यूजन, नफरत, कॉन्फ्लिक्ट और
- 4:39:17पेन आता
- 4:39:18है। और इस ग्रीड को हटाकर नॉन ग्रीडी बनने
- 4:39:22के लिए हम सोच लेते हैं कि टाइम चाहिए।
- 4:39:26यानी
- 4:39:28टाइम को एक तरीके के इवोल्यूशन का रास्ता
- 4:39:31समझा जाता
- 4:39:33है। जिसमें हम कुछ और बन जाते
- 4:39:37हैं। प्रॉब्लम यह है इंसान वायलेंट है,
- 4:39:42ग्रीडी
- 4:39:43है, जेलस है, एंग्री है, बुरा है या बहुत
- 4:39:48पैशनेट
- 4:39:50है। क्या जो है उसको बदलने के लिए टाइम
- 4:39:54जरूरी है?
- 4:39:56सबसे पहले हम बदलना क्यों चाहते हैं?
- 4:40:00क्योंकि जो हम हैं वह हमें पसंद नहीं। वह
- 4:40:03कॉन्फ्लिक्ट लाता है, डिस्टरबेंस लाता
- 4:40:07है। और उस स्टेट को डिसलाइक करके हम कुछ
- 4:40:10और चाहते
- 4:40:13हैं। कुछ
- 4:40:15बेटर, नोबल, आइडियल।
- 4:40:19तो हम ट्रांसफॉर्मेशन चाहते हैं क्योंकि
- 4:40:22हम दर्द, तकलीफ और कॉन्फ्लिक्ट महसूस करते
- 4:40:26हैं।
- 4:40:28लेकिन क्या कॉन्फ्लिक्ट टाइम से खत्म होता
- 4:40:31है? अगर तुम कहते हो कि टाइम से
- 4:40:34कॉन्फ्लिक्ट खत्म
- 4:40:36होगा। तो तुम अभी भी कॉन्फ्लिक्ट में हो।
- 4:40:41हो सकता है तुम कहो कि 20 दिन लगेंगे या
- 4:40:4520 साल खुद को बदलने के लिए।
- 4:40:49लेकिन अब तक तो तुम अभी भी कॉन्फ्लिक्ट
- 4:40:52में ही हो। और इसलिए टाइम ट्रांसफॉर्मेशन
- 4:40:56नहीं लाता।
- 4:40:58जब हम टाइम का यूज करते हैं किसी
- 4:41:01क्वालिटी,
- 4:41:03वर्चू या एक स्पेशल स्टेट को पाने के लिए
- 4:41:07तो हम सिर्फ जो है उससे भाग रहे होते हैं
- 4:41:11या उसे डिले कर रहे होते
- 4:41:14हैं। और मुझे लगता है यह पॉइंट समझना बहुत
- 4:41:18जरूरी है। लालच या वायलेंस पेन लाती है।
- 4:41:24डिस्टरबेंस लाती है हमारे रिलेशंस में। और
- 4:41:28वही सोसाइटी
- 4:41:29है। और जब हम इस डिस्टरबेंस को महसूस करते
- 4:41:33हैं जिसे हम ग्रीड या वायलेंस कहते हैं तो
- 4:41:38हम सोचते हैं मैं इसे टाइम के साथ निकल
- 4:41:43जाऊंगा। मैं नॉन वायलेंस प्रैक्टिस
- 4:41:46करूंगा। नॉन एनवी प्रैक्टिस करूंगा। मैं
- 4:41:49पीस प्रैक्टिस करूंगा।
- 4:41:54तुम नॉन वायलेंस इसलिए प्रैक्टिस करना
- 4:41:57चाहते हो क्योंकि वायलेंस डिस्टरबेंस है,
- 4:42:00कॉन्फ्लिक्ट है और तुम सोचते हो कि टाइम
- 4:42:04के साथ तुम नॉन वायलेंस पा जाओगे और
- 4:42:07कॉन्फ्लिक्ट खत्म हो जाएगा।
- 4:42:11लेकिन असली में क्या हो रहा है? तुम अभी
- 4:42:15कॉन्फ्लिक्ट में हो और तुम एक ऐसे स्टेट
- 4:42:18को पाना चाहते हो जहां कॉन्फ्लिक्ट ना हो।
- 4:42:22क्या वह कॉन्फ्लिक्ट फ्री स्टेट टाइम का
- 4:42:25रिजल्ट हो सकता है? साफ साफ है कि
- 4:42:30नहीं? क्योंकि जब तक तुम नॉन वायलेंस
- 4:42:34हासिल करने की कोशिश कर रहे हो, तुम
- 4:42:36वायलेंट हो और इसलिए कॉन्फ्लिक्ट में
- 4:42:41हो। हमारी प्रॉब्लम यह है क्या
- 4:42:44कॉन्फ्लिक्ट डिस्टरबेंस को किसी भी टाइम
- 4:42:47पीरियड में खत्म किया जा सकता है? चाहे वह
- 4:42:50दिन हो, साल हो या पूरी
- 4:42:55जिंदगी। जब तुम कहते हो मैं नॉन वायलेंस
- 4:42:59प्रैक्टिस करने जा रहा हूं। तो यही दिखाता
- 4:43:02है कि तुम कॉन्फ्लिक्ट में हो। है
- 4:43:05ना? तुम प्रैक्टिस तभी करते हो जब तुम
- 4:43:08किसी चीज का रेजिस्टेंस कर रहे हो।
- 4:43:12और तुम कहते हो कि कॉन्फ्लिक्ट से निकलने
- 4:43:15के लिए रेजिस्टेंस जरूरी है और उसके लिए
- 4:43:19टाइम चाहिए।
- 4:43:22लेकिन यह जो रेजिस्टेंस है वह खुद एक तरह
- 4:43:25का कॉन्फ्लिक्ट है। तुम अपनी एनर्जी
- 4:43:29कॉन्फ्लिक्ट से लड़ने में लगा रहे
- 4:43:31हो। जैसे ग्रीड, एनवी, वायलेंस के
- 4:43:35अगेंस्ट।
- 4:43:37लेकिन तुम्हारा माइंड अभी भी कॉन्फ्लिक्ट
- 4:43:40में है।
- 4:43:41इसलिए यह देखना इंपॉर्टेंट है कि टाइम पर
- 4:43:45डिपेंड करना एक फॉल्स प्रोसेस है। और जब
- 4:43:49तुम इस फॉल्स को देखते
- 4:43:52हो तो तुम वही हो जाते हो जो तुम हो। एक
- 4:43:56साइकोलॉजिकल डिस्टरबेंस जो खुद वायलेंस
- 4:44:02है। किसी भी चीज को समझने के लिए क्या
- 4:44:06चाहिए होता है? एक शांत माइंड है ना?
- 4:44:11एक ऐसा माइंड जो जेनुइनली समझना चाहता है,
- 4:44:15वह माइंड एक्सक्लूसिव नहीं होता। ना ही वह
- 4:44:18कंसंट्रेट करने की कोशिश करता
- 4:44:21है क्योंकि वह भी एक रेजिस्टेंस ही होता
- 4:44:26है। अगर मैं सच में कुछ समझना चाहता हूं
- 4:44:30तो मेरे माइंड में तुरंत शांति आ जाती
- 4:44:34है। जब तुम म्यूजिक सुनते हो, तुम्हारा
- 4:44:38माइंड इधर-उधर भटकता नहीं। तुम सुन रहे
- 4:44:42होते
- 4:44:43हो। वैसे ही जब तुम कॉन्फ्लिक्ट को समझना
- 4:44:46चाहते हो तो तुम टाइम पर डिपेंड ही नहीं
- 4:44:50करते। तुम सिर्फ जो है उसके सामने खड़े
- 4:44:54होते हो जो है वह है कॉन्फ्लिक्ट।
- 4:44:58और तुरंत ही माइंड में शांति आ जाती है।
- 4:45:01एक स्टिलनेस आ जाती
- 4:45:03है। जब तुम टाइम पर डिपेंड करना छोड़ देते
- 4:45:07हो एज अ वे टू ट्रांसफॉर्म व्हाट
- 4:45:11इज। क्योंकि तुम देख लेते हो कि वह
- 4:45:14प्रोसेस झूठ है। तो तुम फेस करते हो जो
- 4:45:18है और जैसे ही तुम्हें इंटरेस्ट होता है
- 4:45:21समझने में तुम्हारा माइंड नेचुरली शांत हो
- 4:45:26जाता है।
- 4:45:28इस अलर्ट और पैसिव स्टेट में
- 4:45:30अंडरस्टैंडिंग होती
- 4:45:32है। जब तक माइंड कॉन्फ्लिक्ट में है,
- 4:45:35ब्लेम करता है, रेजिस्ट करता है, जज करता
- 4:45:40है, तब तक समझ नहीं हो सकती। अगर मैं
- 4:45:46तुम्हें समझना चाहता हूं तो मुझे तुम्हें
- 4:45:51जज नहीं करना चाहिए। यह ऑब्वियस
- 4:45:54है। वह शांत माइंड वह स्टिल माइंड ही रियल
- 4:46:00ट्रांसफॉर्मेशन लाता
- 4:46:03है। जब माइंड रेिस्ट नहीं करता भागता नहीं
- 4:46:08ना ही जो है उसे ब्लेम करता है बल्कि
- 4:46:12सिर्फ पैसिवली अवेयर होता है तो अगर तुम
- 4:46:16इस प्रॉब्लम में गहरा जाते हो तो उस
- 4:46:20पैसिविटी में ट्रांसफॉर्मेशन हो जाता
- 4:46:24है रिवोल्यूशन सिर्फ अभी पॉसिबल है फ्यूचर
- 4:46:28में
- 4:46:29नहीं नया जीवन सिर्फ आज हो सकता है कल
- 4:46:32नहीं
- 4:46:34अगर तुम मेरी बात पर थोड़ा एक्सपेरिमेंट
- 4:46:37करोगे तो तुम देखोगे कि तुरंत एक नई ताजगी
- 4:46:41आ जाती
- 4:46:42है। एक फ्रेशनेस का एहसास होता
- 4:46:46है। क्योंकि जब माइंड को समझने की इच्छा
- 4:46:49होती है, विश होती है, जब उसमें सच में
- 4:46:53इंटरेस्ट होता है, तो वह हमेशा शांत होता
- 4:46:58है। हमारी सबसे बड़ी प्रॉब्लम यह है कि
- 4:47:03हमारे पास समझने की असली इच्छा नहीं
- 4:47:06होती क्योंकि हमें डर होता है कि अगर हमने
- 4:47:10समझ लिया तो शायद हमारी जिंदगी में कोई
- 4:47:14बड़ा बदलाव आ
- 4:47:16जाए और इसी वजह से हम रेजिस्ट करते
- 4:47:20हैं यह हमारा डिफेंस सिस्टम
- 4:47:24है जो तब एक्टिव हो जाता है जब हम टाइम या
- 4:47:28आइडियल का यूज करते हैं। ग्रेजुअल
- 4:47:32ट्रांसफॉर्मेशन के लिए।
- 4:47:35इसलिए नई शुरुआत सिर्फ प्रेजेंट में
- 4:47:38पॉसिबल है। फ्यूचर में नहीं, कल में नहीं।
- 4:47:43जो इंसान टाइम पर डिपेंड करता है खुशी
- 4:47:46पाने के लिए या ट्रुथ या गॉड रियलाइज करने
- 4:47:50के लिए वह खुद को धोखा दे रहा है। वह
- 4:47:54अंधेरे में जी रहा है और इसलिए
- 4:47:56कॉन्फ्लिक्ट में
- 4:47:58भी जो यह देख लेता है कि टाइम हमारी
- 4:48:02प्रॉब्लम का सशन नहीं है और इसलिए वह
- 4:48:05फॉल्स से फ्री हो जाता है।
- 4:48:10ऐसे लोग नेचुरली समझने की इच्छा रखते हैं।
- 4:48:14इसलिए उनका माइंड खुद ब खुद शांत हो जाता
- 4:48:17है। बिना किसी फोर्स के बिना किसी
- 4:48:21प्रैक्टिस
- 4:48:23के। जब माइंड स्टिल होता है बिल्कुल शांत।
- 4:48:28ना किसी आंसर की तलाश में ना किसी स्यूशन
- 4:48:31के पीछे ना रेिस्ट करता है ना भागता है
- 4:48:36सिर्फ तभी रियल ट्रांसफॉर्मेशन होती है
- 4:48:39क्योंकि तब माइंड सच को देखने लायक होता
- 4:48:43है और सिर्फ सच ही तुम्हें आजाद करता है
- 4:48:48तुम्हारा फ्री होने का एफर्ट नहीं
- 4:48:59सोरो फ्रॉम सेल्फ
- 4:49:03पिटी। इस समय इस गर्म मौसम में यहां बसंत
- 4:49:08का मौसम था। धूप हल्की थी। क्योंकि नॉर्थ
- 4:49:12से एक ठंडी हवा आ रही थी। जहां पहाड़ों पर
- 4:49:16नई बर्फ पड़ी थी।
- 4:49:19सड़क के पास एक पेड़ था जो एक हफ्ते पहले
- 4:49:22तक बिल्कुल नंगा था। अब नए हरे पत्तों से
- 4:49:27भरा था जो धूप में चमक रहे थे। नए पत्ते
- 4:49:31बहुत नरम थे। बहुत
- 4:49:35नाजुक। बहुत छोटे थे। माइंड धरती और नीले
- 4:49:41आसमान के इस बड़े स्पेस में।
- 4:49:46फिर भी कुछ ही देर में वह पूरे थॉट स्पेस
- 4:49:49को भर देते हैं।
- 4:49:51थोड़ा आगे एक फूलों वाला पेड़ था जिसमें
- 4:49:55कोई पत्ते नहीं
- 4:49:58थे। सिर्फ फूल ही फूल थे। हवा ने उनके
- 4:50:02पंखुड़ियां जमीन पर गिरा दी
- 4:50:04थी। और कुछ बच्चे उनमें बैठे
- 4:50:08थे। वह शॉफ्स और सर्वेंट्स के बच्चे थे।
- 4:50:13वह कभी स्कूल नहीं जाएंगे। वह हमेशा इस
- 4:50:16दुनिया के गरीब लोग
- 4:50:19रहेंगे। लेकिन सड़क के किनारे गिरे हुए
- 4:50:22फूलों के बीच वो बच्चे धरती का हिस्सा लग
- 4:50:26रहे
- 4:50:27थे। उन्होंने एक अजनबी को अपने बीच बैठे
- 4:50:31देखा तो वह हैरान हो गए। अचानक चुप हो गए।
- 4:50:36फूलों से खेलना बंद कर दिया। और कुछ
- 4:50:40सेकंड्स के लिए वह बिल्कुल मूर्तियों जैसे
- 4:50:43हो गए।
- 4:50:45लेकिन उनकी आंखों में जिंदा क्यूरियोसिटी
- 4:50:47थी, फ्रेंडलीनेस थी और थोड़ा डर भी
- 4:50:51था। सड़क के पास एक छोटी सी गार्डन थी।
- 4:50:56जिसमें बहुत सारे चमकदार फूल
- 4:50:59थे। उस गार्डन के एक पेड़ के पत्तों में
- 4:51:02एक कौवा धूप से बचा हुआ था। उसकी पूरी
- 4:51:06बॉडी ब्रांच पर थी।
- 4:51:09उसके पंजों को फिदर्स ने ढग रखा था। वह
- 4:51:13बोल रहा था या दूसरे कौवों को वह जवाब दे
- 4:51:16रहा था। और 10 मिनट में उसके पांच छह
- 4:51:20अलग-अलग आवाजें थी। शायद और भी ज्यादा थी।
- 4:51:25लेकिन अब वह कुछ नोट्स में खुश था। वह
- 4:51:28बिल्कुल काला था। उसकी गर्दन ग्रे थी।
- 4:51:32उसकी आंखें अलग थी जो कभी रुकती नहीं थी।
- 4:51:36और उसकी चोंच तेज और सख्त
- 4:51:39थी। वह पूरी तरह रेस्ट में था। फिर भी
- 4:51:43पूरा जिंदा लग रहा
- 4:51:46था। बहुत अजीब था कि माइंड उस बर्ड के साथ
- 4:51:49पूरा था। वह बर्ड को ऑब्जर्व नहीं कर रहा
- 4:51:52था। लेकिन उसने हर डिटेल ले ली थी। माइंड
- 4:51:57बर्ड नहीं बना था। क्योंकि कोई
- 4:52:00आइडेंटिफिकेशन नहीं थी। वह बर्ड के साथ
- 4:52:02था। उसकी आंखों और तेज चोंच के
- 4:52:07साथ जैसे समुंदर मछली के साथ होता है। वह
- 4:52:11बर्ड के साथ था।
- 4:52:14लेकिन उसके पार भी जा रहा
- 4:52:16था। कौवे का शार्प, एग्रेसिव और डरा हुआ
- 4:52:21माइंड उसी माइंड का हिस्सा
- 4:52:24था। जो समुंदर और टाइम के पार भी जाता है।
- 4:52:28यह माइंड बहुत बड़ा था, लिमिटलेस था।
- 4:52:33किसी माप में नहीं आता था और फिर भी उस
- 4:52:38काले कौवे की आंखों की हल्की सी मूवमेंट
- 4:52:41को फील कर रहा था जो नए चमकते पत्तों के
- 4:52:45बीच छुपा
- 4:52:47था। वह गिरे हुए फूलों को भी महसूस कर रहा
- 4:52:51था।
- 4:52:53लेकिन उसका कोई फोकस नहीं था।
- 4:52:59ना ही कोई पॉइंट जहां से वह देख रहा
- 4:53:03हो। स्पेस के ऑोजिट जिसमें हमेशा कुछ होता
- 4:53:07है जैसे धूल, धरती या
- 4:53:11आसमान। यह माइंड बिल्कुल खाली था। और खाली
- 4:53:15होने की वजह से वह बिना किसी रीजन के पूरा
- 4:53:18अटेंशन दे सकता था।
- 4:53:22उसका अटेंशन ना
- 4:53:25रूट से आता था ना ब्रांच
- 4:53:27से। सारी एनर्जी उस काली शांति में
- 4:53:31थी। वह एनर्जी वह नहीं थी जो किसी इंटेंशन
- 4:53:35से बनाई जाती है और प्रेशर हटते ही खत्म
- 4:53:38हो जाती है। वह एनर्जी थी एक नई शुरुआत
- 4:53:43की। वह लाइफ थी जिसका कोई एंड टाइम में
- 4:53:47नहीं था। कुछ लोग इकट्ठा हुए थे। और जैसे
- 4:53:51ही कोई अपना प्रॉब्लम
- 4:53:53बताया बाकी लोग उसे समझाते और अपने
- 4:53:56एक्सपीरियंस से कंपेयर करते
- 4:54:01लेकिन स्वरों को कंपेयर नहीं किया जा
- 4:54:03सकता। कंपैरिजन से सेल्फ पिटी पैदा होता
- 4:54:06है और फिर प्रॉब्लम्स बढ़ती
- 4:54:10हैं। दुख का सामना सीधा करना चाहिए। यह
- 4:54:14सोच के नहीं कि तुम्हारा दुख किसी और से
- 4:54:17ज्यादा
- 4:54:18है। अब सब चुप थे और फिर एक इंसान ने
- 4:54:21बोलना शुरू
- 4:54:23किया। मेरी मां कुछ साल पहले गुजर गई। अभी
- 4:54:27हाल ही में मेरे पापा भी चले गए और मैं
- 4:54:30गिल्ट से भरा हूं। वह अच्छे पापा थे। और
- 4:54:35मुझे वह सब होना चाहिए था जो मैं नहीं
- 4:54:38था। हमारे विचार अलग थे। हमारी लाइफ का
- 4:54:42तरीका अलग था और इस वजह से हम दूर हो गए।
- 4:54:45वह रिलीजियस थे। लेकिन मेरी रिलीजियस
- 4:54:49फीलिंग इतनी ऑब्वियस नहीं थी। हमारे बीच
- 4:54:52रिलेशन अक्सर टाइट था लेकिन एक रिलेशन था।
- 4:54:56और अब जब वह चले गए हैं तो मैं दर्द में
- 4:54:59हूं। मेरा सोरो सिर्फ गिल्ट नहीं है बल्कि
- 4:55:03अकेला छोड़े जाने का भी एहसास है। मैंने
- 4:55:07ऐसे सोरो पहले कभी महसूस नहीं किया। और यह
- 4:55:11काफी गहरा है। मैं क्या करूं? मैं कैसे
- 4:55:15इसे
- 4:55:22निकालूं? क्या मैं पूछ सकता हूं? क्या तुम
- 4:55:26अपने पापा के लिए दर्द महसूस कर रहे हो?
- 4:55:29या तुम्हारा दुख इसलिए है क्योंकि वह
- 4:55:31रिलेशन अब नहीं रहा जिसके तुम आदत डाल
- 4:55:35चुके थे।
- 4:55:38मैं समझा नहीं आप क्या कह रहे
- 4:55:42हो। क्या तुम इसलिए दर्द महसूस कर रहे हो
- 4:55:46क्योंकि तुम्हारे पापा चले गए या इसलिए
- 4:55:50क्योंकि तुम्हें अकेला महसूस हो रहा
- 4:55:53है। मुझे सिर्फ इतना पता है कि मैं दुख
- 4:55:56में हूं और मैं इससे भागना चाहता हूं।
- 4:56:00मुझे वाकई समझ नहीं आ रहा आप क्या कहना
- 4:56:03चाहते हैं। थोड़ा ठीक से एक्सप्लेन करिए
- 4:56:10प्लीज। यह काफी सिंपल है। है
- 4:56:13ना? या तो तुम अपने पापा के लिए दर्द
- 4:56:16महसूस कर रहे हो जैसे उन्हें जिंदा रहना
- 4:56:20पसंद था। और जब वह नहीं रहे तो तुम इसलिए
- 4:56:24दुख में हो क्योंकि एक ऐसा रिलेशन खत्म हो
- 4:56:27गया जो तुम्हारे लिए बहुत मायने रखता था
- 4:56:31और अब तुम्हें अकेलापन महसूस हो रहा
- 4:56:35है। तो कौन सा है? तुम दुख में हो। शायद
- 4:56:40अपने पापा के लिए नहीं बल्कि इसलिए
- 4:56:43क्योंकि तुम अकेला महसूस कर रहे
- 4:56:45हो। और तुम्हारा दुख सेल्फ पिटी से आता
- 4:56:49है।
- 4:56:52अकेलापन एक्सजेक्टली होता क्या
- 4:56:57है? क्या तुमने कभी अकेला महसूस नहीं
- 4:57:01किया? हां, मैंने अक्सर अकेला चलना पसंद
- 4:57:04किया है। मैं हॉलिडेज में लंबी वॉक्स पर
- 4:57:07अकेला जाता
- 4:57:11हूं। क्या अकेलापन फील करना और अकेला चलना
- 4:57:17जैसे किसी वॉक पर एक ही बात है।
- 4:57:21अगर दोनों में फर्क है तो मुझे नहीं लगता
- 4:57:23कि मैं समझता हूं अकेलेपन का
- 4:57:29मतलब। लगता है हम किसी भी चीज का मतलब
- 4:57:32नहीं जानते। बस शब्द ही जानते हैं। किसी
- 4:57:35ने
- 4:57:40कहा क्या तुमने कभी खुद से अकेलापन फील
- 4:57:44किया है? जैसे कोई दांत में दर्द महसूस
- 4:57:47होता है।
- 4:57:50जब हम अकेलेपन की बात करते हैं, क्या हम
- 4:57:54उसका दर्द एक्चुअल महसूस करते हैं या बस
- 4:57:58एक शब्द का यूज करते हैं किसी ऐसी चीज के
- 4:58:01लिए जो हमने कभी डायरेक्टली महसूस ही नहीं
- 4:58:06की। क्या हम वाकई सफर कर रहे होते हैं या
- 4:58:11बस सोच रहे होते हैं कि हम सफर कर रहे
- 4:58:14हैं?
- 4:58:18मैं जानना चाहता हूं कि अकेलापन क्या होता
- 4:58:24है। तुम्हारा मतलब है तुम उसका
- 4:58:27डिस्क्रिप्शन चाहते
- 4:58:29हो। यह एक एक्सपीरियंस है
- 4:58:32जिसमें हम पूरी तरह अलग महसूस करते हैं।
- 4:58:37ऐसा लगता है जैसे किसी पर भी भरोसा नहीं
- 4:58:40किया जा सकता। हर रिलेशन से कटा
- 4:58:44हुआ जो मैं है, ईगो है, सेल्फ है, वह अपनी
- 4:58:50नेचर में ही हमेशा अपने आसपास एक वॉल
- 4:58:53बनाता रहता
- 4:58:55है। और उसकी हर एक्टिविटी अलग करने वाली
- 4:58:59होती है। जब वह अपने इस अलगपन को महसूस
- 4:59:04करता है तो वह अपने आप को किसी वर्चुअ गॉड
- 4:59:09प्रॉपर्टी इंसान कंट्री या आइडियोलॉजी से
- 4:59:13जोड़ लेता है।
- 4:59:17लेकिन यह आइडेंटिफिकेशन भी आइसोलेशन का ही
- 4:59:20हिस्सा होता है।
- 4:59:23यानी हम हर पॉसिबल तरीके से इस अकेलेपन के
- 4:59:27पेन से भाग जाते हैं।
- 4:59:30और इसलिए हम कभी उसे डायरेक्टली फील ही
- 4:59:33नहीं
- 4:59:35करते। जैसे किसी कोने पर कुछ डर लगता है
- 4:59:39और हम कभी उस डर का सामना नहीं
- 4:59:43करते। कभी नहीं देखते वह चीज क्या है। बस
- 4:59:47हमेशा भागते रहते हैं और किसी ना किसी में
- 4:59:52छुप जाते
- 4:59:53हैं। जो और ज्यादा फियर पैदा करता है।
- 4:59:59क्या तुमने कभी ऐसा अकेलापन महसूस किया है
- 5:00:03जिसमें तुम सबसे अलग बिल्कुल कट गए हो
- 5:00:09सबसे मुझे बिल्कुल समझ नहीं आ रहा आप क्या
- 5:00:12कह रहे
- 5:00:15हैं तो अगर मैं
- 5:00:18पूछूं क्या तुम वाकई जानते हो दुख होता
- 5:00:22क्या
- 5:00:22है क्या तुम दुख को वैसे महसूस करते हो
- 5:00:26जैसे कोई दांत का दर्द होता है। जब दांत
- 5:00:30दर्द करता है, तुम तुरंत एक्शन लेते हो।
- 5:00:34डेंटिस्ट के पास जाते हो।
- 5:00:37लेकिन जब दुख होता है तो तुम उससे भाग
- 5:00:40जाते हो। एक्सप्लेनेशन, बिलीव, ड्रिंक
- 5:00:45वगैरह के
- 5:00:46जरिए। तुम कुछ करते हो।
- 5:00:50लेकिन वह एक्शन दुख से आजादी देने वाला
- 5:00:53एक्शन नहीं होता। है ना?
- 5:00:57मुझे नहीं पता क्या करना है। इसलिए मैं
- 5:00:59यहां
- 5:01:02हूं। पर जब तक तुम्हें पता ना हो दुख असल
- 5:01:06में है
- 5:01:07क्या? तब तक तुम क्या करोगे? कैसे पता
- 5:01:13चलेगा? क्या तुमने बस दुख के बारे में एक
- 5:01:17आईडिया एक जजमेंट बना लिया है? जो भाग
- 5:01:21जाना, जज करना, डर या सब दुख को एक्चुअल
- 5:01:26महसूस करने से रोकता
- 5:01:30है। जब दांत दर्द करता है तो तुम कोई
- 5:01:35आईडिया या ओपिनियन नहीं
- 5:01:37बनाते। तुम बस फील करते हो और कुछ करते
- 5:01:41हो।
- 5:01:43लेकिन यहां कोई एक्शन ही नहीं है। ना
- 5:01:45तुरंत ना बाद का।
- 5:01:49क्योंकि तुम वाकई दर्द महसूस नहीं कर रहे।
- 5:01:53दुख महसूस करने और समझने के लिए तुम्हें
- 5:01:57उसे देखना
- 5:01:59पड़ेगा। उसे भागना नहीं
- 5:02:03होगा। मेरे पापा अब कभी वापस नहीं आएंगे।
- 5:02:07इसलिए मुझे दुख हो रहा है। मैं क्या करूं
- 5:02:09कि दुख के पार जा सकूं।
- 5:02:16हम इसलिए दुख महसूस करते हैं क्योंकि हम
- 5:02:18दुख की सच्चाई को नहीं
- 5:02:21देखते। जो फैक्ट है और जो हमने उसके बारे
- 5:02:25में सोचा है वह दोनों अलग होते हैं। और
- 5:02:29अलग डायरेक्शंस में ले जाते हैं अगर मैं
- 5:02:33पूछूं। क्या तुम सच में दुख के फैक्ट को
- 5:02:36देख रहे हो या सिर्फ दुख के आईडिया को?
- 5:02:41आप मेरे सवाल का जवाब नहीं दे रहे। सर मैं
- 5:02:44क्या
- 5:02:48करूं? तुम दुख से भागना चाहते हो या दुख
- 5:02:52से आजाद होना चाहते हो।
- 5:02:54अगर तुम सिर्फ भागना चाहते हो तो एक पिल,
- 5:02:58एक
- 5:02:58बिलीफ, एक एक्सप्लेनेशन या कोई
- 5:03:01डिस्ट्रक्शन मदद कर सकता है।
- 5:03:05लेकिन उसका रिजल्ट हमेशा होता है
- 5:03:08डिपेंडेंसी, फियर वगैरह।
- 5:03:12लेकिन अगर तुम वाकई दुख से फ्री होना
- 5:03:14चाहते हो तो तुम्हें भागना बंद करना
- 5:03:18होगा और उसे बिना जज किए, बिना चॉइस के
- 5:03:21देखना होगा।
- 5:03:27तुम्हें उसे ऑब्जर्व करना होगा। उसे समझना
- 5:03:31होगा। उसके हर कोने को जानना होगा। तभी
- 5:03:35तुम उससे डोगे नहीं। और सेल्फ पिटी का जहर
- 5:03:40भी खत्म हो जाएगा।
- 5:03:43जब दुख को समझ जाते हो तो उससे आजादी
- 5:03:46मिलती है। दुख को समझने के लिए उसका
- 5:03:49एक्चुअल एक्सपीरियंस होना चाहिए ना कि बस
- 5:03:54शब्दों में सोची गई कोई
- 5:03:57कहानी। क्या मैं एक सवाल पूछ सकता हूं? एक
- 5:04:02दूसरे ने
- 5:04:03कहा अपनी रोज की जिंदगी कैसे जीनी चाहिए?
- 5:04:10जैसे तुम सिर्फ उस एक दिन के लिए जी रहे
- 5:04:13हो। उस एक घंटे के
- 5:04:16लिए
- 5:04:19कैसे? अगर तुम्हारे पास सिर्फ एक घंटा
- 5:04:22होता जीने के लिए तो तुम क्या
- 5:04:26करते? वाकई मुझे नहीं पता। उसने चिंता में
- 5:04:34कहा क्या तुम अपने जरूरी काम ठीक नहीं
- 5:04:38करते अपने पेपर व्हील
- 5:04:41वगैरह क्या तुम अपने परिवार और दोस्तों को
- 5:04:44नहीं
- 5:04:48बुलाते उनसे माफी नहीं मांगते जिसे तुमने
- 5:04:51हर्ट किया हो और उन्हें माफ नहीं करते
- 5:04:54जिन्होंने तुम्हें हर्ट किया हो क्या तुम
- 5:04:57अपने माइंड के थॉट थॉट्स,
- 5:05:01डिजायर्स और दुनिया से पूरी तरह छूट नहीं
- 5:05:04जाते। और अगर यह एक घंटे के लिए हो सकता
- 5:05:09तो फिर बाकी दिनों और सालों के लिए भी हो
- 5:05:13सकता
- 5:05:15है। क्या यह वाकई पॉसिबल है सर?
- 5:05:20ट्राई करो। तुम खुद जान जाओगे।
- 5:05:30एजुकेशन एंड द सिग्निफिकेंस ऑफ
- 5:05:34लाइफ। एजुकेशन और लाइफ का
- 5:05:40मीनिंग। जब कोई दुनिया घूमता है तो उसे यह
- 5:05:44समझ में आता है कि इंसान का नेचर हर जगह
- 5:05:48लगभग सेम ही होता है। चाहे इंडिया हो या
- 5:05:52अमेरिका, यूरोप हो या ऑस्ट्रेलिया।
- 5:05:56यह बात कॉलेजेस और यूनिवर्सिटीज में और भी
- 5:05:59ज्यादा क्लियर होती
- 5:06:01है। हम लोग एक ही तरह के इंसान बना रहे
- 5:06:05हैं। जैसे किसी मशीन से निकल रहे
- 5:06:08हो। जिसका मेन गोल होता है सिर्फ सिक्योर
- 5:06:12फील करना। किसी बड़े आदमी बनने की कोशिश
- 5:06:16करना या बिना ज्यादा सोचे समझे लाइफ का
- 5:06:20मजा लेना।
- 5:06:24नॉर्मल एजुकेशन इंडिपेंडेंट सोचना बहुत
- 5:06:27मुश्किल बना देता
- 5:06:28है। सबके जैसे रहना एवरेज बनाता
- 5:06:32है। ग्रुप से अलग होना या अपने एनवायरमेंट
- 5:06:36के अगेंस्ट जाना आसान नहीं होता। और जब तक
- 5:06:40हम सक्सेस की पूजा करते हैं, यह और भी
- 5:06:43रिस्की हो जाता
- 5:06:46है। सक्सेस पाने का प्रेशर चाहे वह पैसा
- 5:06:50हो या स्पिरिचुअल चीजें। या अंदर या बाहर
- 5:06:54का सिक्योरिटी चाहिए हो या सिर्फ कंफर्ट
- 5:06:57चाहिए। यह सब मिलकर इंसान के अंदर की
- 5:07:00डिसटिसफेक्शन को दबा देते हैं।
- 5:07:04स्पॉनटेनिटी को खत्म कर देते हैं और डर
- 5:07:07पैदा करते हैं। और यह डर ही यह फियर ही
- 5:07:11लाइफ को समझने वाली ट्रू इंटेलिजेंस को
- 5:07:14ब्लॉक करता
- 5:07:16है। जैसेजैसे उम्र बढ़ती है, माइंड और दिल
- 5:07:21दोनों डल होने लगते हैं।
- 5:07:27कंफर्ट ढूंढते-ढूंढते हम लाइफ में एक ऐसी
- 5:07:29जगह सेटल हो जाते हैं जहां कम से कम टेंशन
- 5:07:33हो। और फिर हम उस कंफर्ट ज़ोन से बाहर
- 5:07:36निकलने से डरते हैं।
- 5:07:40लाइफ का डर, स्ट्रगल का डर, नए
- 5:07:43एक्सपीरियंस का डर हमारे अंदर की एडवेंचर
- 5:07:46वाली फीलिंग को मार देता
- 5:07:49है। हमारी पूरी अपब्रिंगिंग और एजुकेशन ने
- 5:07:52हमें अपने पड़ोसी से अलग होने से डरा दिया
- 5:07:55है।
- 5:07:57सोसाइटी के सेट रोल के अगेंस्ट सोचने से
- 5:08:00रोका है। अथॉरिटी और ट्रेडिशन का झूठा
- 5:08:03रिस्पेक्ट सिखा दिया है।
- 5:08:07लेकिन अच्छी बात यह है कि कुछ लोग ऐसे भी
- 5:08:10होते हैं जो जेनुइनली इंटरेस्टेड होते
- 5:08:13हैं। जो इंसानी प्रॉब्लम्स को बिना किसी
- 5:08:17बायस के समझना चाहते हैं। ना राइट के ना
- 5:08:20लेफ्ट के।
- 5:08:23पर ज्यादातर लोगों में ना तो असली
- 5:08:26डिसटिस्फेक्शन होता है ना ही कोई रिबेलियन
- 5:08:30का जज्बा।
- 5:08:32जब हम बिना समझे सिर्फ अपने एनवायरमेंट के
- 5:08:35अकॉर्डिंग चलने लगते
- 5:08:37हैं तो अगर हमारे अंदर थोड़ा बहुत रिवोल्ट
- 5:08:40था भी वह धीरे-धीरे खत्म हो जाता है और
- 5:08:45लाइफ की रिस्पांसिबिलिटी उसे पूरी तरह मार
- 5:08:49देती
- 5:08:50है। रिवोल्ट दो तरह का होता है। एक होता
- 5:08:54है वायलेंट
- 5:08:56रिवोल्ट जो सिर्फ एक रिएक्शन होता है बिना
- 5:08:59समझे सिस्टम के
- 5:09:01अगेंस्ट और दूसरा होता है डीप साइकोलॉजिकल
- 5:09:05रिवोल्ट जो इंटेलिजेंस से आता
- 5:09:09है बहुत लोग पुराने रूल्स के अगेंस्ट जाते
- 5:09:13हैं पर फिर नए रूल्स में ही फंस जाते
- 5:09:16हैं और नए इल्लुजंस और हिडन सेल्फ
- 5:09:20इंटेलिजेंस में उलझ जाते हैं।
- 5:09:25अक्सर ऐसा होता है कि हम एक ग्रुप या
- 5:09:27आइडियल से अलग होते हैं और किसी नए ग्रुप
- 5:09:31या नए आइडियल से जुड़ जाते
- 5:09:34हैं और फिर एक नया थॉट पैटर्न बन जाता है
- 5:09:39जिसके अगेंस्ट हमें फिर रिवोल्ट करना
- 5:09:42पड़ता
- 5:09:43है यह रिएक्शन सिर्फ अपोजिशन लाता है और
- 5:09:47हर रिफॉर्म को फिर एक और रिफॉर्म चाहिए
- 5:09:51होता है।
- 5:09:54लेकिन एक इंटेलिजेंट रिवोल्ट होता है जो
- 5:09:56रिएक्शन नहीं होता जो सेल्फ नॉलेज से आता
- 5:10:01है अपने थॉट्स और फीलिंग्स को समझने
- 5:10:05से जब हम हर एक्सपीरियंस का सामना
- 5:10:09डायरेक्टली करते हैं और उसे अवॉइड नहीं
- 5:10:12करते तभी हमारी इंटेलिजेंस पूरी तरह जागी
- 5:10:16रहती
- 5:10:18है और फुली जागी हुई इंटेलिजेंस ही
- 5:10:21इंट्यूशन होती है जो लाइफ में असली गाइड
- 5:10:24होती है। अब सवाल यह है लाइफ का असली
- 5:10:29मीनिंग क्या है? हम किसके लिए जी रहे हैं?
- 5:10:34हम किस लिए जी रहे हैं? किस लिए स्ट्रगल
- 5:10:37कर रहे
- 5:10:38हैं? अगर हम सिर्फ इसलिए एजुकेटेड हो रहे
- 5:10:42हैं कि एक अच्छी जॉब
- 5:10:45मिले या किसी से ज्यादा एफिशिएंट हो जाए
- 5:10:48या और लोगों पर कंट्रोल मिले। तो हमारी
- 5:10:52लाइफ सिर्फ सरफेस पर रहेगी अंदर से
- 5:10:56खाली। अगर एजुकेशन सिर्फ यह बना रही है कि
- 5:11:00हम साइंटिस्ट बन जाए, स्कॉलर बन जाए,
- 5:11:04बुक्स के एडिक्ट या नॉलेज के स्लेव बन
- 5:11:07जाए, तो हम दुनिया के डिस्ट्रक्शन और
- 5:11:11मिजरी में कंट्रीब्यूट कर रहे
- 5:11:16हैं। चाहे लाइफ का मीनिंग कितना भी डीप और
- 5:11:20बड़ा हो।
- 5:11:21अगर हम उसे कभी डिस्कवर ही नहीं करते तो
- 5:11:26हमारी एजुकेशन का क्या
- 5:11:28फायदा? चाहे हम कितने भी एजुकेटेड हो जाए।
- 5:11:32अगर हमारे थॉट्स और फीलिंग्स का डीप
- 5:11:35इंटीग्रेशन नहीं होता तो हमारी लाइफ
- 5:11:39इनकंप्लीट कंट्राडिक्टरी और डर से भरी
- 5:11:43रहेगी। और जब तक एजुकेशन हमें लाइफ को एक
- 5:11:47इंटीग्रेटेड नजरिया से देखना नहीं सिखाती
- 5:11:50तब तक उसका कोई खास मीनिंग नहीं
- 5:11:56होता। आज की सिविलाइजेशन में हमने लाइफ को
- 5:11:59इतने पार्ट्स में डिवाइड कर दिया है कि
- 5:12:02एजुकेशन का मतलब सिर्फ एक पर्टिकुलर स्किल
- 5:12:06या प्रोफेशन तक ही रह गया
- 5:12:09है। एजुकेशन का काम था इंसान की पूरी
- 5:12:12इंटेलिजेंस
- 5:12:14जगाना। पर अब यह सिर्फ एक सेट पैटर्न फॉलो
- 5:12:18करना सिखाता है।
- 5:12:21और इसे इंसान खुद को एक कंप्लीट प्रोसेस
- 5:12:24के रूप में समझने से चूक जाता
- 5:12:28है। जब हम लाइफ के प्रॉब्लम्स को अलग-अलग
- 5:12:31कैटेगरीज में डिवाइड करके सॉल्व करने की
- 5:12:34कोशिश करते हैं तो यह प्रूव करता है कि
- 5:12:37हमने लाइफ को ट्रूली समझा ही
- 5:12:41नहीं। इंसान अलग-अलग पार्ट से बना होता
- 5:12:44है। पर अगर हम बस इन डिफरेंसेस पर ही फोकस
- 5:12:48करें और एक फिक्स टाइप बनाने का प्रेशर
- 5:12:52डालें तो लाइफ में बहुत कंफ्यूजन और
- 5:12:56कंट्राडिक्शन आ जाते
- 5:12:59हैं। एजुकेशन का काम यह होना चाहिए कि यह
- 5:13:03अलग-अलग पार्ट्स को जोड़ के एक बनाएं
- 5:13:06क्योंकि बिना इंटीग्रेशन के लाइफ सिर्फ
- 5:13:10कॉन्फ्लिक्ट्स और दुखों का सिलसिला बन
- 5:13:13जाती
- 5:13:14है। अगर हम लॉयर्स बन भी जाते हैं पर बस
- 5:13:18केसेस को बढ़ाते रहते हैं तो उसका क्या
- 5:13:22फायदा? अगर नॉलेज होते हुए भी हम
- 5:13:25कंफ्यूज्ड ही रहते हैं तो वह किस काम
- 5:13:29की? अगर हमारे पास टेक्निकल और
- 5:13:32इंडस्ट्रियल पावर है पर हम उसे एक दूसरे
- 5:13:37को खत्म करने में लगा रहे हैं तो उसका
- 5:13:39क्या मतलब?
- 5:13:42अगर हमारी लाइफ सिर्फ वायलेंस और दर्द
- 5:13:45लाती है तो जीने का मतलब क्या
- 5:13:48है? चाहे हमारे पास पैसे हो या पैसे कमाने
- 5:13:52की
- 5:13:53एबिलिटी। चाहे हमारे पास प्लेजर्स हो या
- 5:13:57रिलीजंस का सपोर्ट। फिर भी हम कास्टेंट
- 5:14:01कॉन्फ्लिक्ट में ही
- 5:14:03है। हमें पर्सनल और इंडिविजुअल में फर्क
- 5:14:06समझना होगा।
- 5:14:09पर्सनल चीजें एक्सीडेंट होती हैं। और
- 5:14:12एक्सीडेंटल से मेरा मतलब है कि हम कहां
- 5:14:16पैदा हुए, किस एनवायरमेंट में बड़े हुए
- 5:14:19जिसमें नेशनलिज्म,
- 5:14:22सुपरस्टिशंस, क्लास का फर्क और बायसेस
- 5:14:25होते
- 5:14:27हैं। पर्सनली एक्सीडेंटल चीजें टेंपरेरी
- 5:14:31होती हैं। चाहे वह टेंपरेरी पूरी लाइफ
- 5:14:34क्यों ना चले।
- 5:14:36और क्योंकि आज की एजुकेशन सिस्टम पर्सनल
- 5:14:40एक्सीडेंटल और मोमेंटरी चीजों पर बेस्ड है
- 5:14:44तो यह सोच को बिगाड़ देती है और सेल्फ
- 5:14:48डिफेंसिव डर सिखाती
- 5:14:51है। हम सबको एजुकेशन और एनवायरमेंट ने यह
- 5:14:54सिखाया है कि सिर्फ अपने बेनिफिट और
- 5:14:58सिक्योरिटी के लिए जियो और सिर्फ अपने लिए
- 5:15:01लड़ाई करो, फाइट करो।
- 5:15:04चाहे हम इस बात को अच्छे शब्दों में छुपा
- 5:15:07भी
- 5:15:08लें। पर सच यह है कि हमें एक ऐसे सिस्टम
- 5:15:12के लिए ट्रेन किया गया है जो एक्सप्लइटेशन
- 5:15:15और डर पर बेस्ड
- 5:15:18है। ऐसी ट्रेनिंग से कंफ्यूजन और दर्द ही
- 5:15:22मिलता है क्योंकि यह हर इंसान के अंदर
- 5:15:25साइकोलॉजिकल वाल्स बना देती है। जो उसे
- 5:15:29दूसरों से अलग और दूर रखता है।
- 5:15:34एजुकेशन सिर्फ माइंड को ट्रेन करना नहीं
- 5:15:37होता।
- 5:15:38ट्रेनिंग सिर्फ एफिशिएंसी लाती है।
- 5:15:40कंप्लीटनेस
- 5:15:43नहीं। एक माइंड जो सिर्फ ट्रेन हुआ है, वह
- 5:15:46पास्ट का एक्सटेंशन होता है। और ऐसा माइंड
- 5:15:50कभी कुछ नया नहीं जान
- 5:15:52सकता। इसलिए अगर हमें सही एजुकेशन समझना
- 5:15:56है तो हमें लाइफ का फुल मीनिंग एक्सप्लोर
- 5:16:00करना पड़ेगा।
- 5:16:02ज्यादातर लोगों के लिए लाइफ का मीनिंग
- 5:16:05इंपॉर्टेंट ही नहीं होता और हमारी एजुकेशन
- 5:16:09सिर्फ सेकेंडरी वैल्यूस पर फोकस करती है
- 5:16:13जो हमें बस किसी एक फील्ड का एक्सपर्ट
- 5:16:16बनाती है। चाहे नॉलेज और एफिशिएंसी जरूरी
- 5:16:22हो। पर अगर हम सिर्फ उन पर फोकस करें तो
- 5:16:26उससे
- 5:16:27कॉन्फ्लिक्ट और कंफ्यूजन ही बढ़ता है।
- 5:16:32एक एफिशिएंसी होती है जो लव से आती है
- 5:16:36प्यार से जो एंबिशन वाली एफिशिएंसी से
- 5:16:40काफी ज्यादा पावरफुल होती है और बिना लव
- 5:16:44के जो लाइफ को एक जोड़ने वाला
- 5:16:47अंडरस्टैंडिंग देता है एफिशिएंसी सिर्फ
- 5:16:51रूथलेसनेस पैदा करती
- 5:16:53है क्या यह सब दुनिया में हो नहीं
- 5:16:57रहा आज की एजुकेशन इंडस्ट्रियलाइजेशन और
- 5:17:00वॉर के लिए बनी है। इसका मेन गोल बस
- 5:17:04एफिशिएंसी बनाना है। और हम सब इस रूथलेस
- 5:17:09कंपटीशन और डिस्ट्रक्शन की मशीन में फंस
- 5:17:13गए
- 5:17:14हैं। अगर एजुकेशन वॉर तक ले जाती
- 5:17:18है। अगर यह सिखाती है कि या तो मारो या
- 5:17:22मार दिए जाओ तो क्या यह पूरी तरह फेल नहीं
- 5:17:26होगी?
- 5:17:28अगर हमें सही एजुकेशन देनी है तो हमें
- 5:17:32पहले लाइफ का फुल मीनिंग समझना
- 5:17:35होगा और उसके लिए हमें सोचना आना चाहिए
- 5:17:40डायरेक्टली और ट्रूली।
- 5:17:43एक कंसिस्टेंट थिंकर असल में थॉटलेस होता
- 5:17:46है क्योंकि वह बस एक पैटर्न फॉलो करता है।
- 5:17:51वह बस फ्रेजेस रिपीट करता है और एक ही
- 5:17:53लाइन में सोचता है।
- 5:17:57लाइफ को अब्स्ट्रैक्ट या थ्यरी में समझना
- 5:17:59पॉसिबल नहीं है। लाइफ को समझने का मतलब है
- 5:18:03खुद को समझना।
- 5:18:05और वही एजुकेशन का स्टार्टिंग और एंडिंग
- 5:18:08पॉइंट
- 5:18:09है। एजुकेशन सिर्फ नॉलेज इकट्ठा करना नहीं
- 5:18:13है या फैक्ट्स को लिंक करना नहीं है। यह
- 5:18:17लाइफ के पूरे मीनिंग को देखना है। पर पूरे
- 5:18:21को कभी पार्ट के थ्रू नहीं समझा जा सकता।
- 5:18:25और यही काम गवर्नमेंट्स, ऑर्गेनाइज
- 5:18:29रिलीजंस और ऑथरिटेरियन पार्टीज करने की
- 5:18:33कोशिश कर रही
- 5:18:36हैं। एजुकेशन का काम यह है कि वह ऐसे
- 5:18:39इंसान बनाए जो अंदर से एक हो। और इसलिए
- 5:18:43इंटेलिजेंट हो।
- 5:18:46हम डिग्रीज ले सकते हैं। मशीनंस की तरह
- 5:18:49एफिशिएंट बन सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह
- 5:18:53नहीं कि हम इंटेलिजेंट
- 5:18:55हैं। इंटेलिजेंस सिर्फ इंफॉर्मेशन नहीं
- 5:18:58होती। यह बुक्स से नहीं मिलती। ना ही यह
- 5:19:02स्मार्ट, सेल्फ डिफेंस या एग्रेसिव बोलने
- 5:19:05से आती
- 5:19:06है। जो इंसान ने पढ़ाई नहीं की हो, वह भी
- 5:19:10किसी पढ़े लिखे से ज्यादा इंटेलिजेंट हो
- 5:19:13सकता है।
- 5:19:15हमने एग्जाम्स और डिग्रीज को इंटेलिजेंस
- 5:19:18का स्केल बना दिया
- 5:19:20है। और ऐसे क्लेवर माइंड्स डेवलप किए हैं
- 5:19:24जो रियल ह्यूमन इश्यूज से बच जाते
- 5:19:28हैं। इंटेलिजेंस का मतलब है असली चीज को
- 5:19:31देख पाना। जो वाकई में है उसे
- 5:19:35समझना। और इस एबिलिटी को जगाना। अपने अंदर
- 5:19:39भी और दूसरों में भी यही एजुकेशन है।
- 5:19:44एजुकेशन हमें ऐसे वैल्यू्यूज ढूंढने में
- 5:19:47हेल्प करें जो हमेशा रहेंगे।
- 5:19:51ताकि हम सिर्फ स्लोगंस रिपीट ना करें या
- 5:19:54फार्मूलास को पकड़ के ना बैठे
- 5:19:57रह। यह हमें अपने नेशनल और सोशल वॉल्स को
- 5:20:01तोड़ने में हेल्प करें। ना कि उन्हें और
- 5:20:04स्ट्रांग बनाए क्योंकि यही वॉल्स इंसान को
- 5:20:08इंसान से अलग करती
- 5:20:10हैं। पर अफसोस
- 5:20:13आज की एजुकेशन सिस्टम हमें ओबिडिएंट मशीन
- 5:20:17जैसे और अंदर से बिल्कुल बेजान बना रही
- 5:20:21है। यह हमारा दिमाग तो चालू करती है लेकिन
- 5:20:25दिल और क्रिएटिविटी को मार देती
- 5:20:29है। जब तक लाइफ को समझने वाली एक डीप
- 5:20:32अंडरस्टैंडिंग नहीं होती तब तक हमारे
- 5:20:36पर्सनल और ग्रुप के प्रॉब्लम्स और बड़े
- 5:20:39होते जाएंगे।
- 5:20:42एजुकेशन का मकसद सिर्फ स्कॉलर्स,
- 5:20:46टेक्नशियंस या जॉब ढूंढने वाले लोग बनाना
- 5:20:50नहीं है। बल्कि ऐसे इंसान बनाना है जो डर
- 5:20:54से फ्री हो।
- 5:20:56क्योंकि सिर्फ ऐसे ही इंसान के बीच रियल
- 5:21:00पीस पॉसिबल
- 5:21:03है। जब हम खुद को समझने लगते हैं तभी फियर
- 5:21:07खत्म होता
- 5:21:09है। अगर किसी इंसान को हर मोमेंट लाइफ से
- 5:21:14डील करना है। उसके कॉम्प्लेक्स
- 5:21:17प्रॉब्लम्स, दुख और सडन डिमांड्स का सामना
- 5:21:20करना है तो उसका माइंड सॉफ्ट होना
- 5:21:24चाहिए और थरीज या फिक्स सोच से फ्री होना
- 5:21:30चाहिए। एजुकेशन का काम यह नहीं होना चाहिए
- 5:21:34कि इंसान सोसाइटी के अकॉर्डिंग चले या
- 5:21:37चुपचाप एडजस्ट हो जाए।
- 5:21:40बल्कि वह उसे हेल्प करें कि वह असली
- 5:21:43वैल्यूस खुद डिस्कवर करें।
- 5:21:47जो बिना बायस के एक्सप्लोरेशन और सेल्फ
- 5:21:51अवेयरनेस से मिलती
- 5:21:53है। जब खुद को समझना नहीं होता तब सेल्फ
- 5:21:57एक्सप्रेशन सिर्फ ईगो बन जाता
- 5:22:00है। जिसमें सिर्फ अग्रेशन और एंबिशन वाला
- 5:22:04कॉन्फ्लिक्ट होता
- 5:22:06है। एजुकेशन को यह एबिलिटी जगानी चाहिए कि
- 5:22:10इंसान सेल्फ अवेयर हो ना कि सिर्फ अपनी
- 5:22:14फीलिंग्स दिखाकर खुश हो
- 5:22:17जाए। पढ़ाई का क्या फायदा? अगर जीतेजीते
- 5:22:21हम खुद को ही बर्बाद कर रहे
- 5:22:24हैं। जब एक के बाद एक डेंजरस वॉर्स हो रहे
- 5:22:27हैं तो यह साफ है कि हम अपने बच्चों को
- 5:22:31गलत तरीके से बड़ा कर रहे
- 5:22:33हैं। मुझे लगता है हम सबको यह बात पता है।
- 5:22:38पर हम समझ नहीं पा रहे कि इसे कैसे हैंडल
- 5:22:43करें। चाहे सिस्टम एजुकेशन का हो या
- 5:22:47पॉलिटिक्स का। वह मैजिक से चेंज नहीं
- 5:22:51होता। वह तभी बदलेगा जब हम खुद डीपली
- 5:22:55बदलेंगे। सिस्टम से पहले इंसान इंपॉर्टेंट
- 5:22:59है। और जब तक इंसान खुद को पूरी तरह नहीं
- 5:23:03समझता तब तक कोई भी सिस्टम चाहे लेफ्ट का
- 5:23:08हो या राइट का दुनिया में
- 5:23:11पीस और ऑर्डर नहीं ला सकता।
- 5:23:25लाइफ
- 5:23:29अहेड मुझे लगता है कि एक बिल्कुल अलग तरह
- 5:23:32की मोरालिटी
- 5:23:34बिहेवियर और ऐसी एक्शन जो पूरी लाइफ
- 5:23:37प्रोसेस को समझने से आए। अब हमारे दुनिया
- 5:23:41के इतने सारे प्रॉब्लम्स के बीच बहुत
- 5:23:44जरूरी हो गई है।
- 5:23:47हम इन प्रॉब्लम्स को पॉलिटिकल और
- 5:23:50ऑर्गेनाइजेशनल मेथड से सॉल्व करने की
- 5:23:53कोशिश करते
- 5:23:54हैं। इकोनॉमिक चेंजेस और अलग-अलग
- 5:23:58रिफॉर्म्स के
- 5:24:00थ्रू। पर यह सब इंसानी लाइफ के
- 5:24:03कॉम्प्लिकेटेड प्रॉब्लम्स का परमानेंट
- 5:24:05स्यूशन नहीं दे सकते। चाहे यह थोड़ा
- 5:24:09टेंपरेरी रिलीफ दे भी दे।
- 5:24:12हर रिफॉर्म चाहे कितना भी बड़ा और
- 5:24:15स्ट्रांग लगे आखिर में सिर्फ और कंफ्यूजन
- 5:24:19लाता है और नए रिफॉर्म्स की डिमांड पैदा
- 5:24:22करता है। बिना इंसान के पूरे बीइंग को
- 5:24:26समझे। रिफॉर्म्स सिर्फ और रिफॉर्म्स की
- 5:24:31नीड बन जाते
- 5:24:33हैं। रिफॉर्म का कोई एंड नहीं होता और इस
- 5:24:37तरीके से कोई बेसिक स्यूशन भी नहीं मिलता।
- 5:24:41पॉलिटिकल, इकोनॉमिक या सोशल रिवोलशंस भी
- 5:24:45स्यूशन नहीं है क्योंकि इन्होंने सिर्फ नए
- 5:24:49टनीस बनाए
- 5:24:52हैं। यह पावर को एक ग्रुप से लेकर दूसरे
- 5:24:55ग्रुप को दे दिया है। ऐसे रिवोलशंस कभी भी
- 5:24:59कंफ्यूजन और कॉन्फ्लिक्ट का स्यूशन नहीं
- 5:25:02बन पाए
- 5:25:04हैं। पर एक रिवोल्यूशन होती है जो बिल्कुल
- 5:25:07अलग होती
- 5:25:08है। और अगर हमें अपने लाइफ के नॉनस्टॉप
- 5:25:12टेंशनंस,
- 5:25:14कॉन्फ्लिक्ट्स और फ्रस्ट्रेशन से बाहर
- 5:25:17निकलना है तो यह रिवोल्यूशन होना जरूरी
- 5:25:21है। यह रिवोल्यूशन थरी और आइडियाज से नहीं
- 5:25:25बल्कि माइंड के अंदर एक स्ट्रांग बदलाव से
- 5:25:28स्टार्ट होती
- 5:25:29है। ऐसा बदलाव सिर्फ सही एजुकेशन से और
- 5:25:34पूरे इंसान के डेवलपमेंट से आता
- 5:25:37है। यह रिवोल्यूशन पूरे माइंड में होनी
- 5:25:41चाहिए। सिर्फ थॉट्स में
- 5:25:43नहीं। थॉट तो सिर्फ एक रिजल्ट होता है।
- 5:25:46सोर्स नहीं। हमें रिजल्ट को थोड़ा-थोड़ा
- 5:25:50बदलने के बजाय सोर्स को पूरा चेंज करना
- 5:25:54होगा। अभी हम सिर्फ रिजल्ट से खेल रहे
- 5:25:58हैं। सिर्फ सिम्टम्स से। हम कोई रियल चेंज
- 5:26:02नहीं ला
- 5:26:03रहे। ना ही पुराने तरीके की सोच को उखाड़
- 5:26:07रहे हैं। ना ही माइंड को ट्रेडिशंस और
- 5:26:10हैबिट से फ्री कर रहे
- 5:26:12हैं। और यह रियल चेंज तभी आएगा जब सही
- 5:26:16एजुकेशन
- 5:26:18मिलेगा। माइंड का काम होता है सवाल करना
- 5:26:21और
- 5:26:22सीखना। सीखने का मतलब सिर्फ याद रखना या
- 5:26:26नॉलेज इकट्ठा करना नहीं है। बल्कि साफ-साफ
- 5:26:31और सेनली सोचने की एबिलिटी डेवलप करना है।
- 5:26:35बिना किसी इल्लुजन के।
- 5:26:38और फैक्ट से शुरू करना है ना कि बिलीव्स
- 5:26:42या आइडियल
- 5:26:44से। जहां सोच पहले से बनी हुई रिजल्ट हो
- 5:26:48वहां लर्निंग पॉसिबल नहीं होती। सिर्फ
- 5:26:52इंफॉर्मेशन ले लेना या नॉलेज कलेक्ट कर
- 5:26:55लेना। यह लर्निंग नहीं
- 5:26:58होती। लर्निंग का मतलब होता है समझने का
- 5:27:02प्यार और किसी काम को उसके लिए करने का
- 5:27:05प्यार। लर्निंग तभी होती है जब कोई
- 5:27:09जबरदस्ती ना
- 5:27:10हो। और जबरदस्ती कई फॉर्म्स में होती है।
- 5:27:15है ना? जैसे इनफ्लुएंस से, अटैचमेंट से,
- 5:27:19धमकी से या किसी हिडन रिवॉर्ड या स्वीट
- 5:27:24एनकरेजमेंट से।
- 5:27:27ज्यादा लोग सोचते हैं कि कंपैरिजन से
- 5:27:29लर्निंग होती है पर असल में उल्टा होता
- 5:27:33है। कंपैरिजन सिर्फ फ्रस्ट्रेशन लाता है
- 5:27:37और सिर्फ जेलसी बढ़ाता है जिसको हम
- 5:27:40कंपटीशन बोलते
- 5:27:42हैं। बाकी सब पर्सुएशन जैसे कंपैरिजन भी
- 5:27:46लर्निंग को रोकती है और डर पैदा करती है।
- 5:27:51एंबिशन भी डर पैदा करता
- 5:27:54है। एंबिशन चाहे पर्सनल हो या ग्रुप के
- 5:27:58नाम पर हो हमेशा एंटीसोशल होता
- 5:28:02है। रिलेशनशिप में जो अच्छे एंबिशन होते
- 5:28:06हैं वह भी अंदर से डिस्ट्रक्टिव ही होते
- 5:28:09हैं। एक अच्छे माइंड का डेवलप होना जरूरी
- 5:28:13है। ऐसा माइंड जो लाइफ के हर इशू से पूरी
- 5:28:17तरह डील कर सके।
- 5:28:19और उनसे भाग के खुद से
- 5:28:22कंट्राडिक्टरी,
- 5:28:23फ्रस्ट्रेटेड, बिटर या सिकल ना बन
- 5:28:28जाए। और यह भी जरूरी है कि माइंड को अपने
- 5:28:32ही कंडीशनिंग, मोटिव्स और गोल्स का पता
- 5:28:35हो।
- 5:28:37जब एक अच्छे माइंड का डेवलपमेंट
- 5:28:39इंपॉर्टेंट है तो कैसे पढ़ाया जाता है यह
- 5:28:44भी बहुत इंपॉर्टेंट हो जाता
- 5:28:46है। माइंड का फुल डेवलपमेंट होना चाहिए।
- 5:28:49सिर्फ नॉलेज देना ही काफी नहीं
- 5:28:52है। पढ़ाते टाइम टीचर को डिस्कशन ओपन रखना
- 5:28:56चाहिए। और स्टूडेंट्स को इनकरेज करना
- 5:28:59चाहिए कि वह खुद से सोचे और सवाल
- 5:29:03करें। मैं सब जानता हूं। यह वाली अथॉरिटी
- 5:29:07का लर्निंग में कोई काम नहीं होता।
- 5:29:11टीचर और स्टूडेंट दोनों एक स्पेशल
- 5:29:13रिलेशनशिप के थ्रू एक दूसरे से सीख रहे
- 5:29:16होते हैं। पर इसका मतलब यह नहीं कि टीचर
- 5:29:20सोचने की क्लेरिटी को इग्नोर करें।
- 5:29:25हमारी सोच में, हमारी थिंकिंग में ऑर्डर
- 5:29:28सिर्फ तब आता है जब फ्रीडम होती है। और जब
- 5:29:32टीचर यह समझता है कि इंटेलिजेंस को ग्रो
- 5:29:35करने के लिए फ्रीडम जरूरी
- 5:29:39है। इसका मतलब यह नहीं कि जो मन में आए वह
- 5:29:43करो या बस उल्टा सोचो।
- 5:29:47यह वाली फ्रीडम मतलब स्टूडेंट को यह समझने
- 5:29:50में हेल्प करना कि उनके अपने अजेस और
- 5:29:54मोटिव्स क्या
- 5:29:56हैं
- 5:29:58जो उनके रोज के थॉट्स और एक्शन से सामने
- 5:30:02आते
- 5:30:05हैं। एक डिसिप्लिन माइंड कभी फ्री माइंड
- 5:30:09नहीं होता और ना ही वह माइंड जो अपनी
- 5:30:12डिजायर को दबा चुका हो। कभी फ्री हो सकता
- 5:30:15है।
- 5:30:18सिर्फ डिजायर के पूरे प्रोसेस को समझने से
- 5:30:21ही माइंड फ्री हो सकता है।
- 5:30:24डिसिप्लिन हमेशा माइंड को एक फिक्स थॉट या
- 5:30:29बिलीफ के सिस्टम के अंदर ही चलने देती है।
- 5:30:32है
- 5:30:34ना? और ऐसा माइंड कभी इंटेलिजेंट नहीं हो
- 5:30:38सकता।
- 5:30:40डिसिप्लिन सिर्फ अथॉरिटी के सामने झुकना
- 5:30:43सिखाता है। यह माइंड को सिर्फ सोसाइटी के
- 5:30:47सिस्टम में काम करने लायक बनाता है।
- 5:30:51लेकिन उस इंटेलिजेंस को नहीं जगाता जो
- 5:30:53अपने आप में एक कैपेसिटी होती
- 5:30:57है। जो माइंड सिर्फ मेमोरी के थ्रू
- 5:31:00कैपेसिटी डेवलप करता है। वह मॉडर्न
- 5:31:03कंप्यूटर की तरह होता है। जो बहुत
- 5:31:06एक्यूरेट और फास्ट काम करता है। पर आखिर
- 5:31:10में सिर्फ एक मशीन ही होता
- 5:31:13है। अथॉरिटी माइंड को किसी स्पेसिफिक
- 5:31:16डायरेक्शन में सोचने के लिए फोर्स कर सकती
- 5:31:19है। पर जब सोच किसी फिक्स्ड लाइन या पहले
- 5:31:24से डिसाइडेड आईडिया पर बेस हो तो वह सोचना
- 5:31:27नहीं होता। वह सिर्फ एक मशीन की तरह काम
- 5:31:31करना होता है जो बिना सोचे
- 5:31:35डिसटिसफेक्शन, फ्रस्ट्रेशन और दुख पैदा
- 5:31:39करता
- 5:31:40है। हम हर इंसान का टोटल डेवलपमेंट चाहते
- 5:31:44हैं उसे यह हेल्प करना चाहते हैं कि वह
- 5:31:48अपनी हाईएस्ट और डीपेस्ट कैपेसिटी तक
- 5:31:51पहुंच सके।
- 5:31:53ना कि कोई ऐसी कैपेसिटी जिसे टीचर ने एक
- 5:31:56कासेप्ट या आइडियल बना रखा
- 5:31:59हो। कंपैरिजन का कोई भी मूड इंडिविजुअल के
- 5:32:03फुल ग्रोथ को रोक सकता
- 5:32:06है। चाहे वह एक साइंटिस्ट बनने वाला हो या
- 5:32:09एक
- 5:32:11गार्डनर। गार्डनर की फुल कैपेसिटी और
- 5:32:15साइंटिस्ट की फुल कैपेसिटी बराबर होती है
- 5:32:18जब तक कंपैरिजन नहीं होता।
- 5:32:22पर जब कंपैरिजन आता है तो फिर छोटी बड़ी
- 5:32:26सोच, जेलसी और कॉन्फ्लिक्ट शुरू हो जाता
- 5:32:30है। जैसे सोरो को कंपेयर नहीं किया जा
- 5:32:33सकता वैसे ही लव को भी नहीं। सोरो बस सोरो
- 5:32:39होता है। लव बस लव होता है। चाहे वह किसी
- 5:32:43अमीर में हो या गरीब में।
- 5:32:47जब हर इंडिविजुअल अपनी पूरी कैपेसिटी तक
- 5:32:50ग्रो करता है तो एक इक्वल सोसाइटी बनती
- 5:32:55है। आज जो सोशल स्ट्रगल चल रहा है
- 5:32:58इक्वलिटी लाने के लिए चाहे वह इकोनॉमिक
- 5:33:01लेवल पर हो या स्पिरिचुअल उसका कोई रियल
- 5:33:04मतलब नहीं होता।
- 5:33:08सोशल रिफॉर्म्स जो इक्वलिटीस्टब्लिश करना
- 5:33:12चाहते हैं, वह नए तरह की एंटी सोशल
- 5:33:15प्रॉब्लम्स क्रिएट कर देते हैं। पर जब सही
- 5:33:18एजुकेशन मिलती है, तो फिर किसी रिफॉर्म की
- 5:33:22जरूरत ही नहीं
- 5:33:23पड़ती। क्योंकि एनवी और कैपेसिटी कंपैरिजन
- 5:33:28खत्म हो जाता है।
- 5:33:31यहां हमें फंक्शन और स्टेटस के बीच फर्क
- 5:33:34समझना होगा।
- 5:33:36स्टेटस जिसमें इमोशन और पावर का प्राइड
- 5:33:39होता है। सिर्फ तब बनता है जब फंक्शनंस को
- 5:33:44हाई या लो बनाकर कंपेयर किया जाता
- 5:33:48है। जब हर इंसान अपनी पूरी कैपेसिटी में
- 5:33:51खेलता है। तब फंक्शन का कोई कंपैरिजन नहीं
- 5:33:56होता। सिर्फ एक एक्सप्रेशन होता है जैसे
- 5:34:00कोई टीचर, प्राइम मिनिस्टर या
- 5:34:03गार्डनर और तब स्टेटस अपना जेलसी वाला
- 5:34:07पोइजन खो देता
- 5:34:09है। आज फंक्शनल या टेक्निकल कैपेसिटी को
- 5:34:13डिग्री के नाम से पहचाना जाता है। पर अगर
- 5:34:17हम सच में एक इंसान का टोटल डेवलपमेंट
- 5:34:19चाहते हैं तो हमारी सोच टोटली अलग होनी
- 5:34:23चाहिए।
- 5:34:25जिस इंसान के पास कैपेसिटी होती है, वह
- 5:34:28डिग्री ले भी सकता है या नहीं भी, जैसे
- 5:34:32उसकी
- 5:34:33मर्जी। पर वह अपने अंदर की असली एबिलिटी
- 5:34:36को जानता होगा जो डिग्री से बंधी नहीं
- 5:34:39होती।
- 5:34:41और उस एबिलिटी का एक्सप्रेशन वह सेल्फ
- 5:34:44सेंटर्ड कॉन्फिडेंस नहीं बनाता जो सिर्फ
- 5:34:47टेक्निकल कैपेसिटी से आता
- 5:34:50है। ऐसा कॉन्फिडेंस हमेशा कंपैरिजन पर
- 5:34:54बेस्ड होता है। इसलिए एंटीसोशल होता
- 5:34:59है। कंपैरिजन कभी-कभी यूज़फुल हो सकता है
- 5:35:03प्रैक्टिकल रीज़ंस के लिए।
- 5:35:05लेकिन टीचर का काम नहीं है कि वह अपने
- 5:35:08स्टूडेंट्स की कैपेसिटीज को कंपेयर करें
- 5:35:11और किसी को ज्यादा या कम वैल्यू दें।
- 5:35:15क्योंकि हम इंडिविजुअल का टोटल डेवलपमेंट
- 5:35:18चाहते हैं। इसलिए स्टार्टिंग में स्टूडेंट
- 5:35:22को अपने सब्जेक्ट्स खुद चूज करने नहीं दिए
- 5:35:25[संगीत]
- 5:35:27जाते क्योंकि उसका चॉइस मूड बायस या आसानी
- 5:35:32के बेसिस पर हो सकता है या सिर्फ किसी
- 5:35:34इमीडिएट नीड के हिसाब से।
- 5:35:38पर अगर उसे हेल्प मिले कि वह खुद अपनी
- 5:35:40असली एबिलिटी डिस्कवर करे तो वह नेचुरली
- 5:35:44ऐसे सब्जेक्ट्स चूस करेगा जिसमें वह अपनी
- 5:35:47कैपेसिटी को पूरी तरह एक्सप्रेस कर
- 5:35:50सके। अगर स्टूडेंट को स्टार्टिंग से ही
- 5:35:54लाइफ को एक होल के रूप में देखना सिखाया
- 5:35:56जाए जिसमें
- 5:35:59साइकोलॉजिकल, इमोशनल और इंटेलेक्चुअल
- 5:36:01प्रॉब्लम्स हो तो वह लाइफ से डर नहीं
- 5:36:05खाएगा।
- 5:36:07इंटेलिजेंस का मतलब है लाइफ को एक होल के
- 5:36:10रूप में
- 5:36:11समझना और स्टूडेंट्स को ग्रेड्स या
- 5:36:14मार्क्स देना इंटेलिजेंस की गारंटी नहीं
- 5:36:18होती बल्कि यह इंसान की डिग्निटी को
- 5:36:21गिराता है। यह कंपैरिजन वैली वैल्यू
- 5:36:24सिस्टम माइंड को डैमेज करती है। इसका मतलब
- 5:36:28यह नहीं कि टीचर स्टूडेंट का प्रोग्रेस
- 5:36:31ऑब्जर्व ना करें या रिकॉर्ड ना करें।
- 5:36:35पेरेंट्स ऑब्वियसली अपने बच्चों का
- 5:36:38प्रोग्रेस जानना चाहते हैं और वह रिपोर्ट
- 5:36:41मांगेंगे।
- 5:36:43पर अगर उन्हें यह समझ नहीं होता कि टीचर
- 5:36:46क्या करने की कोशिश कर रहा है तो वह
- 5:36:49रिपोर्ट एक प्रेशर का टूल बन जाती है
- 5:36:52जिससे वह अपने डिजायर्ड रिजल्ट्स लेना
- 5:36:55चाहते हैं और इस प्रोसेस में टीचर की
- 5:36:59मेहनत बर्बाद हो जाती
- 5:37:02है। पेरेंट्स को यह समझना चाहिए कि स्कूल
- 5:37:06किस टाइप की एजुकेशन देना चाहते हैं।
- 5:37:10ज्यादातर पेरेंट्स इतना देख के ही खुश हो
- 5:37:12जाते हैं कि उनका बच्चा कोई डिग्री ले रहा
- 5:37:15है जो उसके फ्यूचर का पैसा सिक्योर
- 5:37:19करेगा। बहुत कम पेरेंट्स इससे ज्यादा
- 5:37:23सोचते हैं। हां, वह चाहते हैं कि उनका
- 5:37:27बच्चा खुश रहे। पर इस वेग विष के आगे वह
- 5:37:32उसके टोटल डेवलपमेंट पर ध्यान नहीं देते।
- 5:37:36ज्यादातर पेरेंट्स सिर्फ यही चाहते हैं कि
- 5:37:39उनके बच्चे का करियर सक्सेसफुल हो। इसलिए
- 5:37:44वह या तो डरा के या प्यार से फोर्स करके
- 5:37:47उन्हें नॉलेज लेने पर मजबूर करते
- 5:37:51हैं। और फिर बुक सबसे इंपॉर्टेंट बन जाती
- 5:37:55है। और साथ में बस मेमोरी का यूज होता है।
- 5:37:59सिर्फ रिपीट करना होता है बिना रियल
- 5:38:02थिंकिंग के।
- 5:38:05शायद टीचर के लिए सबसे बड़ी प्रॉब्लम यह
- 5:38:08होती है कि पेरेंट्स डीप और वाइड एजुकेशन
- 5:38:11में इंटरेस्टेड ही नहीं
- 5:38:13होते। ज्यादातर पेरेंट्स बस इतना चाहते
- 5:38:17हैं कि उनके बच्चे कुछ सुपरफिशियल नॉलेज
- 5:38:22ले लें ताकि उन्हें एक रिस्पेक्टेबल
- 5:38:24पोजीशन मिल जाए इस करप्ट सोसाइटी में।
- 5:38:29इसलिए टीचर को सिर्फ बच्चों को सही तरीके
- 5:38:32से पढ़ाना ही नहीं होता बल्कि यह भी देखना
- 5:38:36पड़ता है कि पेरेंट्स स्कूल के अच्छे काम
- 5:38:40को खराब ना कर
- 5:38:42दें। असल में स्कूल और घर दोनों को मिलके
- 5:38:46एक टीम की तरह काम करना चाहिए और कभी भी
- 5:38:50एक दूसरे के अपोजिट नहीं होना चाहिए।
- 5:38:54जहां पेरेंट्स कुछ और चाहते हैं और टीचर
- 5:38:57कुछ और कर रहे
- 5:38:59हो। यह बहुत इंपॉर्टेंट है कि पेरेंट्स को
- 5:39:03क्लियरली पता हो टीचर क्या कर रहा है और
- 5:39:07वह अपने बच्चों के टोटल डेवलपमेंट में दिल
- 5:39:10से इंटरेस्टेड
- 5:39:13हो। पेरेंट्स की रिस्पांसिबिलिटी भी उतनी
- 5:39:16बड़ी है जितनी टीचर्स की जिनका काम पहले
- 5:39:19से ही काफी हैवी है।
- 5:39:23बच्चे का फुल डेवलपमेंट तभी पॉसिबल है जब
- 5:39:27टीचर, स्टूडेंट और पेरेंट्स के बीच सही
- 5:39:30रिलेशनशिप
- 5:39:32हो। क्योंकि टीचर हर बार पेरेंट्स की हर
- 5:39:37डिमांड या मूड के अकॉर्डिंग नहीं चल
- 5:39:39सकता। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स टीचर को
- 5:39:44समझें और उसके साथ मिलके काम करें। ना कि
- 5:39:48अपने बच्चे के अंदर कॉन्फ्लिक्ट और
- 5:39:51कंफ्यूजन पैदा
- 5:39:57करें। बच्चे के अंदर जो नेचुरल
- 5:39:59क्यूरियोसिटी होती है, जो सीखने की चाह
- 5:40:03होती है, वह स्टार्टिंग से ही होती है और
- 5:40:08इसे स्मार्ट तरीके से हमेशा एनकरेज करना
- 5:40:11चाहिए ताकि यह स्ट्रांग रहे और बिगड़े
- 5:40:13नहीं।
- 5:40:15और धीरे-धीरे बच्चा अलग-अलग सब्जेक्ट्स
- 5:40:18में इंटरेस्ट लेने
- 5:40:20लगे। अगर यह सीखने का जज्बा हमेशा सपोर्ट
- 5:40:24किया जाए तो फिर मैथ्स, ज्योग्राफी,
- 5:40:28हिस्ट्री, साइंस या कोई भी सब्जेक्ट ना
- 5:40:32बच्चे के लिए प्रॉब्लम बनेगा ना टीचर के
- 5:40:36लिए। जब एनवायरमेंट में प्यार और थॉटफुल
- 5:40:40केयर होती है तब लर्निंग आसान हो जाती है।
- 5:40:45इमोशनल, खुलेपन और सेंसिटिविटी तभी आती है
- 5:40:49जब स्टूडेंट अपने टीचर के साथ सिक्योर फील
- 5:40:52करता
- 5:40:54है। रिलेशनशिप में सिक्योर फील करना
- 5:40:57बच्चों की एक बेसिक नीड होती
- 5:40:59है। सिक्योर होने की फीलिंग और डिपेंडेंट
- 5:41:03होने की फीलिंग अलग-अलग होती
- 5:41:06हैं। ज्यादातर टीचर्स जान के या बिना जाने
- 5:41:11डिपेंडेंसी डेवलप करते हैं। और उसी
- 5:41:14प्रोसेस में डर को भी इनकरेज करते
- 5:41:18हैं। जो सेम काम पेरेंट्स भी करते हैं।
- 5:41:22कभी प्यार से, कभी गुस्से
- 5:41:24से। बच्चे में डिपेंडेंसी तब आती है जब
- 5:41:28पेरेंट्स और टीचर्स उसे बताते हैं कि उसे
- 5:41:31क्या बनना चाहिए और क्या करना चाहिए।
- 5:41:36जहां डिपेंडेंसी होती है वहां हमेशा डर
- 5:41:39छुपा होता है और यह डर बच्चे को मजबूर
- 5:41:43करता है कि वह ब्लाइंडली माने सब कुछ
- 5:41:47एक्सेप्ट करे बिना सोच समझ के अपने बड़े
- 5:41:51लोगों के रूल्स और
- 5:41:54ऑर्डर्स जब एटमॉस्फियर डिपेंडेंट बन जाता
- 5:41:57है तब सेंसिटिविटी मर जाती है। पर जब
- 5:42:01बच्चा जानता और महसूस करता है कि वह सेफ
- 5:42:04है तो उसके इमोशंस नेचुरली ग्रो करते हैं
- 5:42:08और डर उसे रोकता नहीं
- 5:42:11है। बच्चे का यह सिक्योर फील करना
- 5:42:14इनसिक्योरिटी का ऑोजिट नहीं
- 5:42:18होता। यह होता है एक रिलैक्स्ड फील चाहे
- 5:42:22घर में हो या स्कूल में कि वह जो है वही
- 5:42:26बन सकता है बिना किसी फोर्स के।
- 5:42:30कि वह ट्री पर चढ़ सकता है और अगर गिर भी
- 5:42:33जाए तो कोई डांटेगा
- 5:42:36नहीं। यह सिक्योर फील तभी आता है जब
- 5:42:39पेरेंट्स और टीचर्स दोनों उसके टोटल वेल
- 5:42:42बीइंग को ले सीरियसली कंसर्न होते
- 5:42:46हैं। स्कूल में यह बहुत जरूरी है कि बच्चा
- 5:42:49फर्स्ट डे से ही रिलैक्स्ड फील करें। अंदर
- 5:42:52से बिल्कुल सेफ महसूस
- 5:42:55करें। यह पहला इंप्रेशन बहुत इंपॉर्टेंट
- 5:42:58होता है।
- 5:43:00लेकिन अगर टीचर अलग-अलग तरीके से बच्चे का
- 5:43:03ट्रस्ट जीतने की कोशिश करता है और उसे सब
- 5:43:06कुछ अपनी मर्जी से करने देता है तो वह
- 5:43:10सिर्फ डिपेंडेंसी डेवलप कर रहा
- 5:43:15है। वह बच्चे को यह फील नहीं करा रहा कि
- 5:43:18वह ऐसे जगह में है जहां लोग उसके टोटल वेल
- 5:43:22बीइंग के लिए जेनुइनली कंसर्न
- 5:43:27है। जब बच्चा इस नए ट्रस्ट वाले रिलेशनशिप
- 5:43:30को एक्सपीरियंस करता है जो शायद उसने पहले
- 5:43:34कभी महसूस नहीं किया हो तो वह नेचुरली
- 5:43:38कम्युनिकेशन में ओपन हो जाता है और बड़े
- 5:43:41लोग उसके लिए कोई डेंजर नहीं लगते।
- 5:43:45जो बच्चा सेफ फील करता है, वह अपने तरीके
- 5:43:48से नेचुरली रिस्पेक्ट एक्सप्रेस करता है
- 5:43:51जो लर्निंग के लिए जरूरी होती है। यह
- 5:43:55रिस्पेक्ट किसी अथॉरिटी या फियर से नहीं
- 5:44:00होती। जब उससे सिक्योर फील्ड होता है तो
- 5:44:04उसका बिहेवियर टीचर के फोर्स से नहीं
- 5:44:06होता। वह लर्निंग का एक हिस्सा बन जाता है
- 5:44:11क्योंकि उसका टीचर के साथ रिलेशनशिप
- 5:44:13सिक्योर होता है। इसलिए वह नेचुरली
- 5:44:17कंसीडरेट बन जाता है और सिर्फ इसी सेफ
- 5:44:21एटमॉस्फियर में इमोशंस खुल के डेवलप हो
- 5:44:25सकते
- 5:44:26हैं। जब बच्चा रिलैक्स्ड होता है, सेफ फील
- 5:44:30करता है। जब वह जो चाहता है वह करता है।
- 5:44:34पर उसी प्रोसेस में वह यह समझता है कि
- 5:44:36क्या सही है। और फिर उसका बिहेवियर ना
- 5:44:40किसी रेजिस्टेंस से आता है, ना जििद से ना
- 5:44:44दबाई हुई फीलिंग से। ना किसी एक पल के
- 5:44:47इंपल्सिव फीलिंग
- 5:44:50से। सेंसिटिविटी का मतलब होता है हर चीज
- 5:44:53के लिए सेंसिटिव होना। प्लांट्स के लिए,
- 5:44:57एनिमल्स के लिए, ट्रीज, स्काई, रिवर के
- 5:45:01पानी और एक उड़ते हुए बर्ड के
- 5:45:07लिए और साथ ही अपने आसपास के लोगों के मूड
- 5:45:12के लिए भी और एक स्ट्रेंजर के लिए जो
- 5:45:15सिर्फ पास जा रहा
- 5:45:17हो। यह सेंसिटिविटी एक नेचुरल सेल्फिशनेस
- 5:45:21से फ्री रिस्पांस लाती है।
- 5:45:25जो ही असली मोरलिटी और रियल बिहेवियर होता
- 5:45:29है। जब बच्चा सेंसिटिव होता है तब उसका
- 5:45:33बिहेवियर ओपन होता
- 5:45:36है। सीक्रेटिव नहीं और फिर टीचर का एक
- 5:45:40सिंपल सजेशन भी वह आसानी से एक्सेप्ट कर
- 5:45:44लेता है बिना किसी फ्रिक्शन के।
- 5:45:48जब हम एक इंसान के टोटल डेवलपमेंट की बात
- 5:45:52करते हैं तो हमें उसके इमोशनल अर्ज को
- 5:45:55समझना पड़ता है क्योंकि यह रीजनिंग से
- 5:45:58ज्यादा स्ट्रांग होते
- 5:46:00हैं। हमें इमोशनल कैपेसिटी को ग्रो करना
- 5:46:04चाहिए ना कि उसे
- 5:46:07दबाना। जब हम इमोशनल और इंटेलेक्चुअल
- 5:46:10दोनों इश्यूज को समझने लगते हैं तब हम
- 5:46:14उनसे बिना डरे डील कर सकते हैं।
- 5:46:18अगर इंसान का टोटल डेवलपमेंट चाहिए तो
- 5:46:21अकेलापन यानी सॉलिट्यूड जरूरी हो जाता है।
- 5:46:26क्योंकि यह सेंसिटिविटी को बढ़ाता
- 5:46:29है। इंसान को यह जानना चाहिए कि अकेला
- 5:46:33होना क्या होता है? मेडिटेट करना क्या
- 5:46:36होता है? और मरना क्या होता है? और इन सब
- 5:46:41चीजों का असली मतलब तभी समझ में आता है जब
- 5:46:44उन्हें खुद एक्सप्लोर किया जाए।
- 5:46:48यह चीजें सिखाई नहीं जा सकती। इनके मीनिंग
- 5:46:51को सिर्फ फील करके समझा जा सकता
- 5:46:54है। कोई पॉइंटर दिया जा सकता है, लेकिन
- 5:46:58पॉइंटर से सीखना अकेला होने या मेडिटेट
- 5:47:02करने का एक्चुअल एक्सपीरियंस नहीं
- 5:47:05होता। सॉलीट्यूड या मेडिटेशन का असली
- 5:47:08एक्सपीरियंस तभी होता है जब माइंड
- 5:47:11इंक्वायरी मोड में हो।
- 5:47:14सिर्फ एक इंक्वायरी वाला माइंड ही रियल
- 5:47:17लर्निंग कर सकता है। पर जब इंक्वायरी को
- 5:47:21पुराने नॉलेज या किसी और के एक्सपीरियंस
- 5:47:24या अथॉरिटी से दबा दिया जाता है तो
- 5:47:27लर्निंग सिर्फ इमिटेशन बन जाती है। और
- 5:47:31इमिटेशन इंसान को सिर्फ रिपीट करना सिखाता
- 5:47:34है बिना किसी रियल फील के।
- 5:47:39टीचिंग का मतलब सिर्फ इंफॉर्मेशन देना
- 5:47:42नहीं होता बल्कि एक ऐसे माइंड को डेवलप
- 5:47:45करना होता है जो हमेशा सवाल करता रहे।
- 5:47:50ऐसा माइंड रिलीजन के रियल मीनिंग तक पहुंच
- 5:47:53सकता है ना कि बस मंदिर और रिचुअल्स वाले
- 5:47:58रिलीजन को एक्सेप्ट करता
- 5:48:01है। गॉड ट्रुथ या जो भी नाम दो उसे
- 5:48:06ढूंढना ना कि बस बिलीव्स और डोगमास को मान
- 5:48:09लेना। यही असली रिलीजन
- 5:48:12है। जैसे स्टूडेंट हर दिन ब्रश करता है,
- 5:48:16नहाता है, नई चीजें सीखता है, वैसे ही
- 5:48:20उससे रोज थोड़ा अकेला या दूसरों के साथ
- 5:48:25चुप बैठना भी
- 5:48:27चाहिए। यह सॉलीट्यूड किसी इंस्ट्रक्शन से
- 5:48:30नहीं लाया जा सकता। ना ही किसी ट्रेडिशन
- 5:48:33के प्रेशर से। ना ही उन लोगों के
- 5:48:36इनफ्लुएंस से जो खुद अकेला रहना नहीं
- 5:48:39जानते पर दूसरों से साइलेंस एक्सपेक्ट
- 5:48:42करते
- 5:48:44हैं। सॉलिट्यूड माइंड को एक मिरर की तरह
- 5:48:47अपने आप को क्लियरली देखने में हेल्प करता
- 5:48:50है और एंबिशन के पीछे भागने से निकालता
- 5:48:55है। उसके सारे कन्फ्यूजन, डर और
- 5:48:59फ्रस्ट्रेशन के
- 5:49:02साथ सॉलिट्यूड माइंड को एक ऐसी स्टेबिलिटी
- 5:49:05देता है जो टाइम के हिसाब से मेजर नहीं की
- 5:49:08जा सकती। ऐसी क्लेरिटी ऑफ माइंड ही रियल
- 5:49:12कैरेक्टर होता है। जहां कैरेक्टर नहीं
- 5:49:15होता वहां सेल्फ कंट्राडिक्शन होता
- 5:49:19है। सेंसिटिविटी होना मतलब लव करना। लव
- 5:49:24शब्द लव नहीं
- 5:49:27होता। और लव को गॉड और इंसान के लव में
- 5:49:30डिवाइड नहीं किया जा सकता। ना ही यह मेजर
- 5:49:34किया जा सकता है कि किसी एक का लव ज्यादा
- 5:49:37है या कम।
- 5:49:40लव खुद को पूरी तरह देता है। जैसे एक
- 5:49:43फ्लावर अपना फ्रेगरेंस देता है। पर हम
- 5:49:47हमेशा रिलेशनशिप में लव को मेजर करते हैं
- 5:49:50और इसी वजह से उसे खत्म कर देते
- 5:49:55हैं। लव किसी रिफॉर्मर या सोशल वर्कर की
- 5:49:59चीज नहीं होती। यह कोई पॉलिटिकल टूल भी
- 5:50:02नहीं होता जिससे एक्शन क्रिएट किया जाए।
- 5:50:06जब पॉलिटिशियन और रिफॉर्मर लव की बात करते
- 5:50:10हैं तो वह सिर्फ वर्ड यूज करते हैं। असली
- 5:50:12लव को छूते भी नहीं। क्योंकि लव कभी भी
- 5:50:16किसी गोल को अचीव करने के लिए यूज नहीं
- 5:50:19किया जा सकता। ना अभी के लिए ना फ्यूचर के
- 5:50:24लिए। लव पूरे अर्थ का होता है ना कि किसी
- 5:50:28एक फील्ड या फॉरेस्ट
- 5:50:30का। असली लव किसी रिलीजन के अंदर बंधा
- 5:50:33नहीं होता। और जब ऑर्गेनाइज रिलीजंस लव का
- 5:50:38यूज करते हैं तो वह लव वहां खत्म हो जाता
- 5:50:42है। सोसाइटी रिलीजंस और अथॉरिटेरियन
- 5:50:48गवर्नमेंट्स जो अपने काम में लगातार बिजी
- 5:50:51होते हैं, वह बिना जाने उस लव को
- 5:50:54डिस्ट्रॉय कर देते हैं। जो एक्शन में पैशन
- 5:50:57बन जाता
- 5:50:59है। इंसान के टोटल डेवलपमेंट के लिए जो
- 5:51:03सही एजुकेशन से होता है, लव की क्वालिटी
- 5:51:07को शुरू से ही नरिश और सस्टेन करना पड़ता
- 5:51:11है। लव कोई इमोशनल ड्रामा या डिवोशन नहीं
- 5:51:15होता। यह डेथ जितना स्ट्रांग होता है। लव
- 5:51:20नॉलेज से नहीं मिलता।
- 5:51:23और जो माइंड सिर्फ नॉलेज के पीछे भागता है
- 5:51:26बिना लव के वह रूथलेस बन जाता है और सिर्फ
- 5:51:30एफिशिएंसी के लिए काम करता
- 5:51:33है। इसलिए टीचर को शुरू से ही लव की
- 5:51:37क्वालिटी को समझना चाहिए। जिसमें होती है
- 5:51:41ह्यूमिलिटी,
- 5:51:43जेंटलनेस, कंसीडरेशन, पेशेंस और करसी।
- 5:51:49मेस्टी और करसी नेचुरली होते हैं एक सही
- 5:51:53एजुकेटेड इंसान में। वह सबके साथ काइंड
- 5:51:57होता है।
- 5:51:58दयालु एनिमल्स और प्लांट्स के साथ भी और
- 5:52:02यह उसके बिहेवियर और बात करने के तरीके
- 5:52:05में दिखता
- 5:52:07है। लव की क्वालिटी पर फोकस करने से माइंड
- 5:52:11अपनी
- 5:52:12एंबिशन, ग्रीड और पोजीशन वाली सोच से फ्री
- 5:52:16हो जाता है।
- 5:52:20क्या लव में एक ऐसी फाइन सेंस नहीं होती
- 5:52:24जो रिस्पेक्ट और गुड टेस्ट में एक्सप्रेस
- 5:52:27होती
- 5:52:29है? क्या यह माइंड को प्यूरिफाई नहीं करता
- 5:52:33जो अदर वाइज प्राइड को और स्ट्रांग बना
- 5:52:36देता? रिफाइनमेंट एक नेचुरल चीज होती है
- 5:52:40जब लव होता है। यह कोई सेल्फ कंट्रोल या
- 5:52:44आउटसाइड प्रेशर का रिजल्ट नहीं होती।
- 5:52:49जब लॉ को समझ होती है तब सेक्स और ह्यूमन
- 5:52:54रिलेशनशिप्स के कॉम्प्लेक्स इश्यूज को हम
- 5:52:58ठीक तरह से हैंडल कर सकते हैं ना कि
- 5:53:00एक्साइटमेंट और डर के
- 5:53:03साथ। जो टीचर इंसान के टोटल डेवलपमेंट को
- 5:53:07सबसे इंपॉर्टेंट मानता है, उसको सेक्सुअल
- 5:53:11अर्ज की रियलिटी को समझना चाहिए। क्योंकि
- 5:53:14यह लाइफ का बड़ा पार्ट होती
- 5:53:17है और उसे शुरू से ही बच्चों की
- 5:53:21क्यूरियोसिटी को बिना किसी वियर्ड
- 5:53:24इंटरेस्ट के हैंडल करना आना चाहिए।
- 5:53:28सिर्फ बायोलॉजिकल फैक्ट्स बताना। जब बच्चे
- 5:53:31बड़े हो रहे होते हैं और अगर उसमें लव की
- 5:53:35क्वालिटी नहीं होती तो वह सिर्फ लस्ट तक
- 5:53:38पहुंच सकता है। लव माइंड को इविल से क्लीन
- 5:53:43करता
- 5:53:44है। अगर टीचर के पास लव और अंडरस्टैंडिंग
- 5:53:47नहीं है तो लड़के लड़कियों को अलग करना
- 5:53:51चाहे वायर लगा के हो या रूल्स से सिर्फ
- 5:53:54उनकी क्यूरियोसिटी बढ़ाता है।
- 5:53:57और वह पैशन को सिर्फ एक फिजिकल
- 5:54:00सेटिस्फेक्शन बना देता
- 5:54:02है। इसलिए यह जरूरी है कि लड़के लड़कियों
- 5:54:06को सही तरीके से साथ पढ़ाया जाए। लव की
- 5:54:10क्वालिटी हाथों से कुछ करने में भी दिखती
- 5:54:14है। जैसे गार्डनिंग, कारपेंट्री, पेंटिंग,
- 5:54:19हैंडीक्राफ्ट्स। और सेंसेस के थ्रू भी
- 5:54:22जैसे ट्रीज देखना, माउंटेंस देखना।
- 5:54:26अर्थ की ब्यूटी और लोगों के बनाए हुए
- 5:54:29पावर्टी को महसूस
- 5:54:33करना और म्यूजिक
- 5:54:35सुनना। बर्ड्स के गाने और फ्लावरिंग वाटर
- 5:54:40की साउंड को
- 5:54:42सुनना। हम सिर्फ माइंड को ट्रेन करने और
- 5:54:45इमोशनल सेंसिटिविटी जगाने में ही नहीं लगे
- 5:54:50हैं। हमें बॉडी के बैलेंस डेवलपमेंट पर भी
- 5:54:54ध्यान देना होगा।
- 5:54:58क्योंकि अगर बॉडी हेल्दी और एनर्जेटिक
- 5:55:01नहीं होगी तो वह सोच को डिस्टोर्ट करेगी
- 5:55:05और इनसेंसिटिविटी लाएगी। यह इतना ऑब्वियस
- 5:55:10है कि इस पर ज्यादा बोलने की जरूरत
- 5:55:13नहीं। बॉडी हेल्दी होनी चाहिए। उसको सही
- 5:55:17फूड मिलना चाहिए और प्रॉपर स्लीप भी।
- 5:55:21अगर सेंसेस एक्टिव नहीं होंगे तो बॉडी
- 5:55:24इंसान के टोटल डेवलपमेंट में रुकावट बन
- 5:55:28जाएगी। बॉडी के मूवमेंट्स ग्रेसफुल होने
- 5:55:32चाहिए और मसल्स का बैलेंस होना चाहिए।
- 5:55:36इसके लिए एक्सरसाइज, डांसिंग और गेम्स
- 5:55:39जरूरी
- 5:55:41हैं। जो बॉडी साफ नहीं होती, जो स्लोपी
- 5:55:45होती है और पॉश्चर लूस होता है, वह माइंड
- 5:55:49और इमोशंस की सेंसिटिविटी को खत्म कर देता
- 5:55:53है। बॉडी सिर्फ माइंड का टूल नहीं होती।
- 5:55:57बॉडी, इमोशंस और माइंड मिलकर पूरा इंसान
- 5:56:01बनाते
- 5:56:02हैं। और जब तक यह तीन एक साथ हार्मोनी में
- 5:56:06नहीं जीते, कॉन्फ्लिक्ट हमेशा होगा।
- 5:56:11और कॉन्फ्लिक्ट से सेंसिटिविटी खत्म हो
- 5:56:13जाती
- 5:56:15है। माइंड अगर बॉडी को डोमिनेट करता है और
- 5:56:19सेंसेस को सप्रेस करता है तो बॉडी
- 5:56:23इनसेंसिटिव हो जाती है और ऐसी बॉडी माइंड
- 5:56:28के फुल फ्लाइट में रुकावट बन जाती
- 5:56:31है। बॉडी को टॉर्चर करना कभी भी डीप
- 5:56:35कॉन्शियसनेस तक पहुंचने में मदद नहीं
- 5:56:37करता। क्योंकि यह तभी पॉसिबल है जब माइंड,
- 5:56:42इमोशंस और बॉडी एक दूसरे के साथ
- 5:56:46कॉन्फ्लिक्ट में ना हो। बल्कि नेचुरल
- 5:56:49यूनिटी में हो। बिना किसी कासेप्ट, बिलीफ
- 5:56:54या आइडियल के प्रेशर के।
- 5:56:59माइंड को ग्रो करते वक्त हमें फोकस
- 5:57:01कंसंट्रेशन पर नहीं अटेंशन पर करना
- 5:57:05चाहिए। कंसंट्रेशन मतलब माइंड को जबरदस्ती
- 5:57:09एक पॉइंट पर लाना जबकि अटेंशन किसी
- 5:57:12बाउंड्री में बंद ही नहीं होती।
- 5:57:16कंसंट्रेशन में माइंड हमेशा एक लिमिट के
- 5:57:19अंदर ही चलता है। लेकिन जब हम माइंड को
- 5:57:23पूरी तरह समझना चाहते हैं तो सिर्फ
- 5:57:26कंसंट्रेशन एक रुकावट बन जाता
- 5:57:29है। अटेंशन बिना लिमिट के होता है। नॉलेज
- 5:57:33की बाउंड्रीज के
- 5:57:35बाहर। नॉलेज कंसंट्रेशन से आता है और उसका
- 5:57:39एक्सटेंशन भी उसी बाउंड्री के अंदर ही
- 5:57:43होता है।
- 5:57:46अटेंशन के स्टेट में माइंड नॉलेज का यूज
- 5:57:49करता है जो कि कंसंट्रेशन का रिजल्ट होता
- 5:57:52है।
- 5:57:53लेकिन पार्ट कभी भी होल नहीं होता और
- 5:57:58पार्ट्स को जोड़ने से भी पूरा नहीं समझा
- 5:58:01जा
- 5:58:02सकता। नॉलेज जो कि कंसंट्रेशन का रिजल्ट
- 5:58:06है, वह कभी भी उस चीज को समझा नहीं सकता
- 5:58:10जो मेजर के बाहर है।
- 5:58:14पूरा माइंड कभी भी एक कंसंट्रेटेड माइंड
- 5:58:17के लिमिट में नहीं आता। इसलिए अटेंशन सबसे
- 5:58:22इंपॉर्टेंट होता है। लेकिन यह कंसंट्रेशन
- 5:58:25वाली मेहनत से नहीं
- 5:58:27आता। अटेंशन एक ऐसा स्टेट होता है जहां
- 5:58:31माइंड हमेशा सीख रहा होता है। बिना किसी
- 5:58:35सेंटर के जहां नॉलेज इकट्ठा हो रही
- 5:58:38हो। जब माइंड सिर्फ अपने ऊपर कंसंट्रेटेड
- 5:58:42होता है।
- 5:58:43तो वह नॉलेज का यूज अपने आप को बढ़ाने के
- 5:58:47लिए करता है और ऐसी एक्टिविटी सेल्फ
- 5:58:51कंट्राडिक्टरी और एंटीसोशल हो जाती
- 5:58:55है। असली लर्निंग सिर्फ उसी अटेंशन के
- 5:58:58स्टेट में होती है जहां कोई आउटर या इनर
- 5:59:02प्रेशर नहीं
- 5:59:03होता। राइट थिंकिंग तभी आती है जब माइंड,
- 5:59:08ट्रेडिशन और मेमोरी का स्लेव नहीं
- 5:59:11होता। अटेंशन ही वह स्पेस बनाता है जहां
- 5:59:15साइलेंस आता है और वही साइलेंस क्रिएशन का
- 5:59:19दरवाजा खोलता
- 5:59:20है। इसीलिए अटेंशन सबसे इंपॉर्टेंट होता
- 5:59:25है। नॉलेज फंक्शन लेवल पर जरूरी होता है
- 5:59:29माइंड को ग्रो करने के लिए पर वह एंड गोल
- 5:59:32नहीं होना
- 5:59:34चाहिए। हम सिर्फ एक स्किल का डेवलपमेंट
- 5:59:37नहीं चाहते। ना सिर्फ मैथमेटिशियन का,
- 5:59:41साइंटिस्ट का, म्यूजिशियन का। हम स्टूडेंट
- 5:59:44के फुल ह्यूमन बीइंग बनने का डेवलपमेंट
- 5:59:47चाहते
- 5:59:49हैं। अटेंशन का स्टेट कैसे लाएं? यह
- 5:59:53अटेंशन किसी पर्सुएशन,
- 5:59:56कंपैरिजन, रिवॉर्ड या पनिशमेंट से नहीं
- 5:59:59आता।
- 6:00:00यह सब कोजन के फॉर्म होते
- 6:00:03हैं। अटेंशन का स्टार्ट होता है जब फियर
- 6:00:08डर खत्म होता
- 6:00:12है। जब तक सक्सेस पाने की अर्ज रहती है,
- 6:00:16उम्मीद रहती है तब तक डर रहता है और उसके
- 6:00:21साथ-साथ फ्रस्ट्रेशन और कंट्राडिक्शन भी।
- 6:00:26आप कंसंट्रेशन सिखा सकते हो लेकिन अटेंशन
- 6:00:30सिखाया नहीं जा सकता। जैसे कि डर से आजादी
- 6:00:34भी सिखाई नहीं जा सकती।
- 6:00:37पर हम यह देख सकते हैं कि डर का रीजन क्या
- 6:00:41है और जब हम उस रीजन को समझते हैं तो डर
- 6:00:46खुद खत्म हो जाता
- 6:00:48है। इसलिए अटेंशन नेचुरली आता है जब
- 6:00:53स्टूडेंट के अराउंड एक वेल बीइंग का
- 6:00:55एटमॉस्फियर होता है। जब उसे सेफ फील होता
- 6:01:00है, रिलैक्स्ड लगता है और उसके आसपास लव
- 6:01:04से आई डिसइंटस्टेड एक्शन होती
- 6:01:07है। लव कभी कंपेयर नहीं करता इसलिए एनवी
- 6:01:12और बनने की टॉर्चर वाली फीलिंग खत्म हो
- 6:01:15जाती
- 6:01:16है। जो जनरल डिसटिस्फेक्शन सबको होती है।
- 6:01:20चाहे यंग हो या
- 6:01:22ओल्ड वह जल्दी ही किसी ना किसी
- 6:01:25सेटिस्फेक्शन में बदल जाती है और माइंड सो
- 6:01:29जाता
- 6:01:30है। दुख के टाइम वह डिसटिस्फेक्शन दोबारा
- 6:01:34जागती है। पर माइंड फिर किसी कंफर्ट में
- 6:01:38चला जाता
- 6:01:40है। यह डिसटिस्फेक्शन और कंफर्ट का चक्कर
- 6:01:45माइंड को पकड़ के रखता है। दर्द से जो
- 6:01:48बार-बार जागना होता है, वह भी
- 6:01:52डिसटिस्फेक्शन का हिस्सा है।
- 6:01:56डिसंटेंट इंक्वायरी का रास्ता है। पर
- 6:01:59इंक्वायरी तब नहीं होती जब माइंड ट्रेडिशन
- 6:02:03और आइडियल से बंधा
- 6:02:06हो। इंक्वायरी ही अटेंशन का फ्लेम होती
- 6:02:09है।
- 6:02:11डिंटेंट का मतलब है वह स्टेट जहां माइंड
- 6:02:15जो है उसे क्लियरली देखता है और हमेशा नए
- 6:02:19को ढूंढता है।
- 6:02:22डिस्कंटेंट का मतलब
- 6:02:25है जो कुछ है उसके लिमिटेशंस के परे जाना।
- 6:02:30अगर तुम डिस्कंटेंट को चुप करने का तरीका
- 6:02:34ढूंढते हो तो तुम अपने सेल्फ सेंटर्ड
- 6:02:37एक्टिविटी और सोसाइटी की लिमिटेशंस को
- 6:02:41एक्सेप्ट कर लेते हो।
- 6:02:44डिस्कंटेंट एक ऐसी फ्लेम है जो
- 6:02:46सेटिस्फेक्शन के बेकार लेयर्स को जला देती
- 6:02:49है।
- 6:02:51लेकिन ज्यादातर लोग इसे खत्म करने की
- 6:02:54कोशिश करते
- 6:02:55हैं। फिर यह डिस्कंटेंट और ज्यादा के पीछे
- 6:02:59भागना बन जाता
- 6:03:01है। बड़ा घर, अच्छी कार और वैसे सब।
- 6:03:07जो एनवी के फील्ड में आता
- 6:03:10है और एनवी ही ऐसे डिसंटेंट को जिंदा रखता
- 6:03:17है। पर मैं उस डिस्कंटेंट की बात कर रहा
- 6:03:21हूं जिसमें ना एनवी होती है ना
- 6:03:24ग्रीड ना और ज्यादा चाहिए होता है ना ही
- 6:03:28सेटिस्फेक्शन का डिजायर होता
- 6:03:31है। यह डिस्कंटेंट एक प्योर स्टेट होती है
- 6:03:36जो हर इंसान में होती
- 6:03:38है। अगर इसे रॉन्ग एजुकेशन, जल्दी मिलने
- 6:03:42वाले कंफर्ट, एंबिशन या किसी आइडियल के
- 6:03:46चेस से मार ना दिया हो।
- 6:03:51जब हम रियल डिस्कंटेंट को समझ लेते हैं तो
- 6:03:55हमें दिखता है कि अटेंशन भी इसी बर्निंग
- 6:03:59फ्लेम का हिस्सा
- 6:04:01है जो छोटी सोच को जला के खत्म कर देता है
- 6:04:05और माइंड को फ्री कर देता है उस सेल्फ
- 6:04:09सेंटर्ड चेज और सेटिस्फेक्शन के लिमिटेशन
- 6:04:13से।
- 6:04:16इसलिए अटेंशन तब आता है जब इंक्वायरी किसी
- 6:04:20सेल्फ बेनिफिट या सेटिस्फेक्शन पर बेस्ड
- 6:04:23नहीं
- 6:04:24होती। यह अटेंशन बच्चे में स्टार्टिंग से
- 6:04:28ग्रो करना चाहिए।
- 6:04:31तुम देखोगे कि जब लव होता है जो
- 6:04:34ह्यूमिलिटी,
- 6:04:36करसी, पेशेंस और जेंटलनेस के थ्रू
- 6:04:40एक्सप्रेस होता है तो तुम उन वॉल से फ्री
- 6:04:44हो जाते हो जो
- 6:04:47इनसेंसिटिविटी ने खड़ी की होती है। और तब
- 6:04:51तुम एक छोटी एज से ही बच्चे में अटेंशन का
- 6:04:55यह स्टेट लाने में मदद करते हो।
- 6:04:59अटेंशन कोई ऐसी चीज नहीं है जो सिखाई जाए।
- 6:05:03लेकिन आप स्टूडेंट के अंदर उसे जगा सकते
- 6:05:07हो। जब आप उसके अराउंड ऐसा प्रेशर क्रिएट
- 6:05:11ना करो जो उसके अंदर कंट्राडिक्शन वाली
- 6:05:14लाइफ पैदा करता
- 6:05:16है। तब उसकी अटेंशन किसी भी मूवमेंट किसी
- 6:05:20भी सब्जेक्ट पर नेचुरली आ सकती है और यह
- 6:05:25वह नैरो कंसंट्रेशन नहीं होती।
- 6:05:28जो किसी रिजल्ट या अचीवमेंट के प्रेशर से
- 6:05:32आती
- 6:05:33है। जो जनरेशन इस तरीके से एजुकेट होती
- 6:05:37है, वह ग्रीट और डर से फ्री होती है। जो
- 6:05:41उनके पेरेंट्स और सोसाइटी से उन्हें
- 6:05:44साइकोलॉजिकल रूप में मिलता
- 6:05:47है। और क्योंकि उन्हें ऐसे एजुकेट किया
- 6:05:51गया होता है। वह प्रॉपर्टी के इनहेरिटेंस
- 6:05:54पर डिपेंड नहीं रहेंगे।
- 6:05:57इनहेरिटेंस असली इंडिपेंडेंस को डिस्ट्रॉय
- 6:06:00करता है और इंटेलिजेंस को लिमिट करता
- 6:06:03है क्योंकि यह एक फेक सिक्योरिटी का
- 6:06:07फीलिंग देता है। एक ऐसी सेल्फ कॉन्फिडेंस
- 6:06:10देता है जिसका कोई बेस नहीं होता और माइंड
- 6:06:14में अंधेरा भर देता है जहां कुछ नया ग्रो
- 6:06:18नहीं कर सकता।
- 6:06:23लेकिन जो जनरेशन इस टोटली अलग तरीके से
- 6:06:25एजुकेट होती है वह एक नई सोसाइटी बनाएगी
- 6:06:29क्योंकि उनके पास वह इंटेलिजेंस होती है
- 6:06:33जो डर से बंधी हुई नहीं
- 6:06:36होती क्योंकि एजुकेशन टीचर्स और पेरेंट्स
- 6:06:40दोनों की रिस्पांसिबिलिटी है तो हमें साथ
- 6:06:44काम करने का आर्ट सीखना होगा और यह तभी
- 6:06:49पॉसिबल है जब हर एक इंसान इंसान सच को
- 6:06:52साफ-साफ देखता
- 6:06:54हो। सच का देखना ही हमें एक साथ लाता है
- 6:06:58ना कि ओपिनियन, बिलीफ या थ्यरी।
- 6:07:04कांसेप्ट और फैक्ट में बहुत बड़ा फर्क
- 6:07:06होता है। कांसेप्ट हमें टेंपरेरीली साथ ला
- 6:07:11सकता है। लेकिन अगर हम सिर्फ किसी बिलीफ
- 6:07:15के बेसिस पर काम कर रहे हैं तो अलग होने
- 6:07:18का चांस हमेशा
- 6:07:21रहेगा। अगर हर कोई सच को क्लियरली देखता
- 6:07:25है तो डिटेल्स पर डिसए्रीमेंट हो सकती है
- 6:07:28लेकिन अलग होने की जरूरत नहीं होती।
- 6:07:33सिर्फ बेवकूफ ही छोटी बातों पर अलग होते
- 6:07:36हैं। जब सब लोग सच को क्लियरली देखते हैं
- 6:07:41तो डिटेल कभी भी झगड़े का रीजन नहीं बनता।
- 6:07:46ज्यादातर लोग अथॉरिटी के रूल्स के
- 6:07:48अकॉर्डिंग काम करने की आदत में होते हैं।
- 6:07:52हम एक कासेप्ट के लिए या एक आइडियल को पुश
- 6:07:56करने के लिए मिलके काम करते हैं। और इसमें
- 6:07:59हमें बिलीव
- 6:08:01पर्सुएशन प्रोपेगेंडा लगता
- 6:08:04है। पर कासेप्ट या आइडियल के लिए काम करना
- 6:08:08और उस सच को एक्शन में लाना जो हमने खुद
- 6:08:12देखा हो। यह दोनों बिल्कुल अलग चीजें
- 6:08:16हैं। जब हम किसी अथॉरिटी के अंडर काम करते
- 6:08:20हैं, चाहे वह एक आईडिया हो या एक आदमी हो
- 6:08:24जो उस आईडिया को रिप्रेजेंट करता हो, तो
- 6:08:27यह रियल कोऑपरेशन नहीं होता।
- 6:08:33एक स्ट्रांग अथॉरिटी जो ज्यादा जानता है
- 6:08:37या जिसका पर्सनालिटी पावरफुल होता है वह
- 6:08:41दूसरों को फोर्स या सर्टली इनफ्लुएंस कर
- 6:08:44सकता है अपने सो कॉल्ड आइडियल के लिए काम
- 6:08:49करने को।
- 6:08:51लेकिन यह अलर्ट और जिंदा लोगों का साथ
- 6:08:54मिलकर काम करना नहीं होता।
- 6:08:57जब हर एक इंसान किसी इशू की सच्चाई को खुद
- 6:09:01समझता है तब सबका वह सेम अंडरस्टैंडिंग एक
- 6:09:06एक्शन बन जाती है और वही रियल कोऑपरेशन
- 6:09:09होती
- 6:09:10है। जो इंसान इसलिए कोऑपरेट करता है
- 6:09:14क्योंकि उसने सच को सच झूठ को झूठ और झूठ
- 6:09:18के अंदर छुपी सच्चाई को देखा
- 6:09:22है। वह यह भी जानता है कि कब कोऑपरेट नहीं
- 6:09:26करना है और यह भी उतना ही इंपॉर्टेंट
- 6:09:30है। अगर हर एक इंसान एजुकेशन में एक बेसिक
- 6:09:34बदलाव की जरूरत को समझ जाए और उस सच को
- 6:09:39साफ-साफ देखे जो हम डिस्कस कर रहे हैं। तो
- 6:09:42हम बिना किसी प्रेशर के मिलके काम करेंगे।
- 6:09:47प्रेशर तब होता है जब कोई इंसान एक पॉइंट
- 6:09:50पर अटक जाता है और हिलने को तैयार नहीं
- 6:09:56होता। जब कोई सिर्फ एक आईडिया से कन्विंस
- 6:10:00होता है या अपनी ओपिनियन में अटका होता है
- 6:10:03तब ऑोजिशन पैदा होता है और फिर उसे या
- 6:10:08दूसरों को पर्सुएट करना पड़ता है।
- 6:10:10इनफ्लुएंस करना पड़ता है या फोर्स करना
- 6:10:14पड़ता है अलग सोचने के लिए।
- 6:10:17पर ऐसी सिचुएशन कभी भी नहीं होगी जब हर
- 6:10:21इंसान उस बात की सच्चाई खुद देखता हो।
- 6:10:25लेकिन अगर हम सच को नहीं देखते और सिर्फ
- 6:10:28वर्ड्स या रीजनिंग पर बेस करके एक्शन लेते
- 6:10:31हैं तो फिर कॉन्फ्लिक्ट एग्रीमेंट
- 6:10:36डिसए्रीमेंट सब होगा और सब बेकार एफर्ट बन
- 6:10:40जाता
- 6:10:42है हमें मिलके काम करना बहुत जरूरी है और
- 6:10:47यह बिल्कुल ऐसे है जैसे हम एक घर बना रहे
- 6:10:50हो।
- 6:10:51अगर कुछ लोग बना रहे हैं और कुछ तोड़ रहे
- 6:10:54हैं तो घर कभी नहीं
- 6:10:56बनेगा। इसलिए हमें हर एक को क्लियरली
- 6:11:00समझना होगा कि हम कैसी एजुकेशन चाहते हैं
- 6:11:05जो एक ऐसी जनरेशन तैयार करें जो लाइफ के
- 6:11:09सारे प्रॉब्लम्स को एक होल के रूप में समझ
- 6:11:12सके ना कि अलग-अलग पार्ट्स में।
- 6:11:18ऐसे रियल कोपरेटिव वे में काम करने के लिए
- 6:11:21हमें बार-बार मिलना होगा और ध्यान रखना
- 6:11:24होगा कि हम डिटेल्स में ना अटक
- 6:11:29जाए। जो लोग सीरियसली सही एजुकेशन लाना
- 6:11:32चाहते
- 6:11:33हैं उनकी रिस्पांसिबिलिटी सिर्फ यह नहीं
- 6:11:37है कि वह जो समझे हैं उसे एक्शन में लाएं।
- 6:11:43बल्कि दूसरों को भी उस अंडरस्टैंडिंग तक
- 6:11:46पहुंचने में मदद करें।
- 6:11:49टीचिंग सबसे नोबल प्रोफेशन है। अगर इसे
- 6:11:53प्रोफेशन बोला भी जाए। यह एक आर्ट है जो
- 6:11:57सिर्फ दिमाग से नहीं बल्कि इनफिनिट पेशेंस
- 6:12:01और लॉ से होता
- 6:12:03है। असली एजुकेशन का मतलब होता है हर चीज
- 6:12:07के साथ अपना रिलेशनशिप समझना। पैसे के
- 6:12:12साथ, प्रॉपर्टी के साथ, लोगों के साथ और
- 6:12:17नेचर के
- 6:12:18साथ हमारी पूरी लाइफ के फील्ड
- 6:12:23में ब्यूटी समझने का एक हिस्सा है। लेकिन
- 6:12:27ब्यूटी सिर्फ प्रोपोशन, फॉर्म,
- 6:12:31टेस्ट और बिहेवियर तक सीमित नहीं
- 6:12:34है। ब्यूटी वह स्टेट होती है जहां माइंड
- 6:12:38ने सेल्फ के सेंटर को छोड़ दिया होता है।
- 6:12:41सिंपलीसिटी के पैशन
- 6:12:45में सिंपलीसिटी का कोई एंड नहीं होता। और
- 6:12:49सिंपलीसिटी तभी होती है जब एक ऐसी
- 6:12:52ऑस्टेरिटी हो जो किसी कैलकुलेट की गई
- 6:12:55डिसिप्लिन या सेल्फ डिनायल से ना आई हो।
- 6:13:01यह ऑस्टेरिटी होती है सेल्फ
- 6:13:04अबेंडनमेंट जो सिर्फ लव से पॉसिबल होती
- 6:13:08है। जब हमारे पास लव नहीं होता तब हम एक
- 6:13:12ऐसी सिविलाइजेशन बनाते हैं जहां सिर्फ
- 6:13:15फॉर्म की ब्यूटी ढूंढी जाती
- 6:13:19है। पर उसके अंदर की वाइटिलिटी और सेल्फ
- 6:13:23अबेंडनमेंट की सिंपलीसिटी नहीं होती।
- 6:13:27जब हम गुड वर्क्स, आइडियल्स या बिलीव्स के
- 6:13:30नाम पर अपने आप को सैक्रिफाइस करते हैं तो
- 6:13:34वह भी सेल्फ अबेंडनमेंट नहीं होता।
- 6:13:39यह सब एक्टिविटीज बाहर से सेल्फलेस लगती
- 6:13:43हैं। लेकिन अंदर से सेल्फ अलग-अलग नाम के
- 6:13:47पीछे छुपा होता
- 6:13:49है। सिर्फ एक इनोसेंट माइंड ही अननोन को
- 6:13:52एक्सप्लोर कर सकता है। लेकिन वह इनोसेंस
- 6:13:56जो कैलकुलेट की गई हो जो सिर्फ एक मक के
- 6:14:00कपड़े पहनने या लायन क्लॉथ में छुपी हो।
- 6:14:04वह असली सेल्फ अबेंडनमेंट का पैशन नहीं
- 6:14:07होती।
- 6:14:09जहां से कटसी, जेंटलनेस, हमिलिटी, पेशेंस
- 6:14:13निकलते हैं जो लव के एक्सप्रेशनंस होते
- 6:14:18हैं। ज्यादातर लोग ब्यूटी को सिर्फ उस चीज
- 6:14:22में देखते हैं जो बनाई गई हो या जोड़ी गई
- 6:14:25हो। जैसे ह्यूमन फॉर्म या एक
- 6:14:29टेंपल। हम कहते हैं एक ट्री, एक हाउस या
- 6:14:33एक कर्व लेती रिवर सुंदर है।
- 6:14:38और फिर हम कंपैरिजन के थ्रू जानते हैं कि
- 6:14:41अगली क्या होता है। कम से कम हम सोचते हैं
- 6:14:45कि जानते
- 6:14:46हैं। पर क्या ब्यूटी कंपेयर की जा सकती
- 6:14:50है? क्या ब्यूटी सिर्फ वही होती है जो
- 6:14:53सामने दिखे।
- 6:14:58हम किसी पिक्चर, पोएम या फेस को ब्यूटीफुल
- 6:15:02कहते हैं। क्योंकि हम ऑलरेडी जानते हैं
- 6:15:04ब्यूटी क्या होती है? जो हमें सिखाया गया
- 6:15:08होता है या जो हमें फमिलियर लगता
- 6:15:12है पर क्या ब्यूटी कंपैरिजन के साथ खत्म
- 6:15:16नहीं हो
- 6:15:17जाती? क्या ब्यूटी सिर्फ नोन चीज से मिलती
- 6:15:21पहचान होती है? यह एक ऐसी स्टेट होती है
- 6:15:24जिसमें फॉर्म हो भी सकता है और नहीं भी।
- 6:15:32हम हमेशा ब्यूटी के पीछे भागते हैं और
- 6:15:35अगली चीजों से बचना चाहते हैं और यह एक
- 6:15:39तरफ भागना और दूसरी तरफ से दूर भागना
- 6:15:42अल्टीमेटली इनसेंसिटिविटी पैदा करता
- 6:15:46है। अगर हमें ब्यूटी को समझना है या महसूस
- 6:15:50करना है तो हमें ब्यूटीफुल और अगली दोनों
- 6:15:54के लिए सेंसिटिव होना पड़ेगा।
- 6:15:58एक फीलिंग ना ब्यूटीफुल होती है ना अगली
- 6:16:01वह बस एक फीलिंग होती है
- 6:16:05लेकिन हम उसे अपने रिलीजियस और सोशल
- 6:16:08कंडीशनिंग के थ्रू देखते हैं और उसको लेबल
- 6:16:12दे देते हैं अच्छी फीलिंग बुरी
- 6:16:16फीलिंग और फिर उसे डिस्ट कर देते हैं या
- 6:16:20डिस्ट्रॉय कर देते
- 6:16:23हैं। जब फीलिंग को कोई लेबल नहीं दिया
- 6:16:26जाता तो वह पूरे तरीके से इंटेंस रहती है
- 6:16:30और यही पैशनेट इंटेंसिटी जरूरी होती है उस
- 6:16:35चीज को समझने के लिए जो ना अगली होती है
- 6:16:39ना ऑब्वियस
- 6:16:42ब्यूटी जो चीज सबसे इंपॉर्टेंट है वह है
- 6:16:46सस्टेंड
- 6:16:47फीलिंग ऐसा पैशन जो सिर्फ अपने प्लेजर का
- 6:16:51लस्ट नहीं होता
- 6:16:54यही पैशन ब्यूटी क्रिएट करता है और
- 6:16:58क्योंकि वह किसी से कंपेयर नहीं हो सकता।
- 6:17:01इसका कोई ऑोजिट भी नहीं
- 6:17:04होता। अगर हमें इंसान का टोटल विकास लाना
- 6:17:08है टोटल
- 6:17:10डेवलपमेंट तो हमें कॉन्शियस माइंड के
- 6:17:13साथ-साथ अनकॉन्शियस माइंड को भी समझना
- 6:17:16पड़ेगा।
- 6:17:18सिर्फ कॉन्शियस माइंड को एजुकेट करना बिना
- 6:17:21अनकॉन्शियस को समझे ह्यूमन लाइफ में
- 6:17:24कंट्राडिक्शन लाता है जिसमें फ्रस्ट्रेशन
- 6:17:28और मिजरी होती
- 6:17:30है। हिडन माइंड सुपरफिशियल से ज्यादा
- 6:17:34पावरफुल होता
- 6:17:36है। ज्यादातर टीचर्स सिर्फ इंफॉर्मेशन या
- 6:17:40नॉलेज देने में लगे होते हैं सुपरफिशियल
- 6:17:43माइंड को
- 6:17:45ताकि वह जॉब ले सके और सोसाइटी में एडजस्ट
- 6:17:48हो
- 6:17:49सके। इसलिए हिडन माइंड तक कभी बात पहुंचती
- 6:17:53ही नहीं।
- 6:17:55जो एजुकेशन कहलाता है, वह सिर्फ एक नॉलेज
- 6:17:58का लेयर चढ़ा देता है और टेक्निक सिखाता
- 6:18:03है और थोड़ी सी एबिलिटी देता है
- 6:18:06एनवायरमेंट के साथ एडजस्ट होने
- 6:18:09की। हिडन माइंड सुपरफिशियल माइंड से काफी
- 6:18:13ज्यादा पावरफुल होता है। चाहे सुपरफिशियल
- 6:18:17माइंड कितना भी एजुकेटेड हो या एडजस्ट
- 6:18:20करने के कैपेबल हो।
- 6:18:23और यह हिडन माइंड कोई मिस्टीरियस चीज नहीं
- 6:18:26है। हिडन या अनकॉन्शियस माइंड पुरानी
- 6:18:29रेशियल यानी जाति की यादों का स्टोर हाउस
- 6:18:33होता
- 6:18:36है। हमारे पास्ट
- 6:18:40का रिलीजन सुपरस्टिशन सिंबल्स किसी रेस के
- 6:18:45अजीब
- 6:18:46ट्रेडिशंस होली और नॉन होली लिटरेचर का
- 6:18:50इन्फ्लुएंस एस्पिरेशंस फ्रस्टेशंस हैबिट्स
- 6:18:55और अलग-अलग तरह के
- 6:18:57फूड यह सब अनकॉन्शियस माइंड में बसे होते
- 6:19:02हैं। छुपी और खुली डिजायर्स, उनके पीछे के
- 6:19:06मोटिव्स, होप्स, फिय्स, दुख और
- 6:19:11सुख और बिलीव्स जो सिक्योरिटी की जरूरत से
- 6:19:15बनते हैं जो अलग-अलग फॉर्म्स में
- 6:19:17एक्सप्रेस होते
- 6:19:20हैं। यह सब हिडन माइंड में होते हैं। हिडन
- 6:19:25माइंड के पास यह पुराने पास्ट को रखने की
- 6:19:29एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी पावर होती है और
- 6:19:31फ्यूचर को इनफ्लुएंस करने की भी कैपेसिटी
- 6:19:34होती
- 6:19:35है। इन सबकी झलक सुपरफिशियल माइंड को
- 6:19:39ड्रीम्स या अलग-अलग तरीकों से मिलती है।
- 6:19:43जब वह पूरा बिजी नहीं होता डेली चीजों
- 6:19:46में।
- 6:19:48हिडन माइंड ना कोई सेक्रेट चीज है ना ही
- 6:19:51उससे डरने की जरूरत है और ना ही उसे बाहर
- 6:19:54निकालने के लिए किसी स्पेशलिस्ट की जरूरत
- 6:19:58होती है।
- 6:20:00लेकिन क्योंकि हिडन माइंड इतना पावरफुल
- 6:20:03होता है। सुपरफिशियल माइंड उसे अपनी मर्जी
- 6:20:06से हैंडल नहीं कर सकता।
- 6:20:09सुपरफिशियल माइंड अपने हिडन पार्ट के आगे
- 6:20:12काफी कमजोर होता है। चाहे वह कितनी भी
- 6:20:16कोशिश करें डोमिनेट करने की या उसे
- 6:20:20कंट्रोल करने की सोशल नीड्स के चक्कर में।
- 6:20:24वह सिर्फ सरफेस को छू पाता
- 6:20:27है। इस वजह से सुपरफिशियल और हिडन के बीच
- 6:20:31में एक गैप बन जाता है। एक कंट्राडिक्शन।
- 6:20:36हम डिसिप्लिन, प्रैक्टिसेस या रूल्स के
- 6:20:39थ्रू इस गैप को भरने की कोशिश करते हैं।
- 6:20:42लेकिन यह गैप ऐसे भर नहीं
- 6:20:46सकता। कॉन्शियस माइंड सिर्फ प्रेजेंट
- 6:20:49मोमेंट में बिजी होता है। जबकि अनकॉन्शियस
- 6:20:53माइंड पे कई सेंचुरीज का वेट होता है। और
- 6:20:58उसे किसी छोटी इमीडिएट नीड से नहीं बदला
- 6:21:01जा सकता।
- 6:21:03अनकॉन्शियस में डीप टाइम की क्वालिटी होती
- 6:21:07है और कॉन्शियस माइंड जो रिसेंट कल्चर से
- 6:21:11भरा होता है वह इसे हैंडल नहीं कर सकता
- 6:21:14अपनी अर्जेंसी के
- 6:21:17थ्रू। अगर सेल्फ कंट्राडिक्शन को खत्म
- 6:21:20करना है तो सुपरफिशियल माइंड को यह फैक्ट
- 6:21:23समझना होगा और उससे साइलेंट होना होगा।
- 6:21:28इसका मतलब यह नहीं कि हिडन के अर्ज को
- 6:21:31खुला छोड़ दिया
- 6:21:34जाए। जब सुपरफिशियल और हिडन के बीच
- 6:21:37रेजिस्टेंस नहीं होती तब हिडन जो टाइम के
- 6:21:41पेशेंस के साथ होता है इमीडिएट पे फोर्स
- 6:21:44नहीं
- 6:21:45करता। हिडन जो अनएक्स्लो और समझा नहीं गया
- 6:21:49होता और सुपरफिशियल जो एजुकेटेड होता है।
- 6:21:53प्रेजेंट मोमेंट के चैलेंजेस से टकराते
- 6:21:56हैं।
- 6:21:58सुपरफिशियल रिस्पांस दे सकता है। लेकिन
- 6:22:02क्योंकि दोनों के बीच कंट्राडिक्शन होती
- 6:22:04है। कोई भी एक्सपीरियंस जो सुपरफिशियल
- 6:22:08करता है, वह कॉन्फ्लिक्ट को और बढ़ा देता
- 6:22:13है। यह और एक्सपीरियंस पैदा करता है और
- 6:22:16पास्ट और प्रेजेंट के बीच के गैप को बढ़ा
- 6:22:19जाता
- 6:22:21है। सुपरफिशियल माइंड जब आउटर एक्सपीरियंस
- 6:22:25करता है मिना इनर हिडन को समझे तो यह
- 6:22:29सिर्फ और ज्यादा कॉन्फ्लिक्ट पैदा करता
- 6:22:32है। एक्सपीरियंस माइंड को फ्री नहीं करता
- 6:22:36ना ही उसे रिच बनाता है जैसे हम सोचते
- 6:22:40हैं। जब तक एक्सपीरियंस सिर्फ
- 6:22:43एक्सपीरियंसर को स्ट्रांग बनाता है तब तक
- 6:22:46कॉन्फ्लिक्ट रहता
- 6:22:48है। कंडीशन माइंड जब एक्सपीरियंस करता है
- 6:22:53तो वह सिर्फ अपनी कंडीशनिंग को स्ट्रांग
- 6:22:56करता है और कंट्राडिक्शन और मिजरी को बनाए
- 6:23:00रखता
- 6:23:01है। सिर्फ वही माइंड जो अपने पूरे
- 6:23:04स्ट्रक्चर को समझने के कैपेबल होता है
- 6:23:08उसके लिए ही एक्सपीरियंस फ्री करने वाला
- 6:23:10फैक्टर बन सकता
- 6:23:12है। जब एक बार हिडन माइंड की पावर और
- 6:23:16लेयर्स को समझ लिया जाता है तब डिटेल्स को
- 6:23:20वाइजली और इंटेलिजेंटली देखा जा सकता
- 6:23:24है। सबसे जरूरी चीज है हिडन माइंड को
- 6:23:28समझना ना कि सुपरफिशियल माइंड को सिर्फ
- 6:23:31नॉलेज देना। चाहे वह नॉलेज कितना भी
- 6:23:35यूज़फुल
- 6:23:36हो। हिडन माइंड को समझने से पूरा माइंड
- 6:23:40कॉन्फ्लिक्ट से फ्री हो जाता है और तभी
- 6:23:43रियल इंटेलिजेंस पॉसिबल होती
- 6:23:48है। हमें सुपरफिशियल माइंड को जो डेली
- 6:23:52लाइफ में रहता है उसकी फुल पावर जगानी
- 6:23:55चाहिए और साथ ही हिडन माइंड को भी समझना
- 6:24:01चाहिए। हिडन माइंड को समझने से एक टोटल
- 6:24:05लिविंग होती है। जहां सेल्फ कंट्राडिक्शन
- 6:24:08और उसके दुख सुख के साइकिल खत्म हो जाते
- 6:24:11हैं।
- 6:24:13हिडन माइंड को पहचानना और उसके काम को
- 6:24:16देखना जरूरी है।
- 6:24:18लेकिन उसमें ही अटक जाना या उसे ज्यादाेंस
- 6:24:23देना भी गलत
- 6:24:24है। सिर्फ जब माइंड सुपरफिशियल और हिडन
- 6:24:28दोनों को समझता है। तभी वह अपने लिमिटेशंस
- 6:24:32के परे जा सकता है और उस ब्लिस को डिस्कवर
- 6:24:36कर सकता है जो टाइम का हिस्सा नहीं होती।
- 6:24:51अगर तुम खुद को जानना सिर्फ इसलिए जरूरी
- 6:24:55समझते हो क्योंकि मैंने या किसी और ने
- 6:24:57बोला है तो मुझे डर है कि हमारे बीच का हर
- 6:25:02तरह का कनेक्शन यहीं खत्म हो जाता है।
- 6:25:09लेकिन अगर हम दोनों मान लें कि खुद को
- 6:25:12समझना बहुत इंपॉर्टेंट है तो फिर हमारा
- 6:25:16रिश्ता कुछ और हो जाता है। फिर हम साथ में
- 6:25:21खुशी से ध्यान से और समझदारी से एक्सप्लोर
- 6:25:25कर सकते
- 6:25:26हैं। मैं तुम्हारा ट्रस्ट नहीं
- 6:25:30मांगता। मैं अपने आप को किसी अथॉरिटी के
- 6:25:33रूप में नहीं रख रहा। मेरे पास तुम्हें
- 6:25:36सिखाने के लिए कुछ नहीं है। ना कोई नई
- 6:25:40फिलॉसफी, ना कोई नया
- 6:25:43सिस्टम, ना कोई नया रास्ता रियलिटी तक।
- 6:25:47वैसे भी सच तक कोई रास्ता होता ही नहीं।
- 6:25:52हर तरीके की अथॉरिटी स्पेशली थॉट और
- 6:25:56अंडरस्टैंडिंग के फील्ड में सबसे
- 6:25:59डिस्ट्रक्टिव और बुरी चीज होती है।
- 6:26:03लीडर्स अपने फॉलोअर्स को बर्बाद कर देते
- 6:26:06हैं और फॉलोअर्स अपने लीडर्स को। तुम्हें
- 6:26:10खुद का टीचर और खुद का डिसाइपल बनना
- 6:26:13पड़ेगा। तुम्हें हर वह चीज क्वेश्चन करनी
- 6:26:16पड़ेगी जो इंसान ने वैलुएबल या नेसेसरी
- 6:26:19मानी है।
- 6:26:21अगर तुम किसी को फॉलो नहीं करते तो
- 6:26:24तुम्हें बहुत अकेला लगता है। तुम अकेले ही
- 6:26:29रहो। तुम्हें अकेला होने का डर क्यों लगता
- 6:26:33है? क्योंकि तुम खुद के सामने आ जाते हो।
- 6:26:37जैसे तुम हो और तुम्हें लगता है तुम खाली
- 6:26:40हो, बुरे हो, बेवकूफ हो, बेचारे हो,
- 6:26:45गिल्टी हो और छोटी सोच वाले हो।
- 6:26:50एक दूसरे हाथ का पुराना इंसान इस सच को
- 6:26:54देखो भागो मत।
- 6:26:57जब भी तुम भागते हो तभी डर शुरू होता
- 6:27:03है। जब हम अपने आप को समझने की कोशिश करते
- 6:27:07हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि हम दुनिया से
- 6:27:11अलग हो जा रहे हैं। यह कोई गलत प्रोसेस
- 6:27:14नहीं
- 6:27:16है। पूरे वर्ल्ड के लोग वही डेली
- 6:27:19प्रॉब्लम्स में फंसे होते हैं जिसमें हम
- 6:27:23हैं। तो जब हम खुद को समझने की कोशिश करते
- 6:27:27हैं तो हम पागल नहीं बन
- 6:27:30रहे क्योंकि इंडिविजुअल और कलेक्टिव में
- 6:27:33कोई फर्क नहीं है। यह एक सच है। मैं वैसे
- 6:27:38ही दुनिया बनाता हूं जैसे मैं हूं। तो चलो
- 6:27:42हम इस पार्ट और होल के बीच के फाइट में
- 6:27:46गुम ना हो जाए।
- 6:27:48मुझे अपने पूरे सेल्फ के फील्ड को देखना
- 6:27:51पड़ेगा जो कि इंडिविजुअल और सोसाइटी का
- 6:27:54कॉन्शियसनेस है। सिर्फ
- 6:27:57तब जब माइंड इन दोनों के पार चला जाता
- 6:28:02है। तभी मैं अपने लिए एक ऐसी रोशनी बन
- 6:28:05सकता हूं जो कभी बुझती नहीं। तो हम खुद को
- 6:28:10समझना कहां से शुरू करें? यह मैं हूं।
- 6:28:15और मैं कैसे अपने आप को स्टडी करूं? कैसे
- 6:28:19ऑब्जर्व
- 6:28:22करूं? कैसे देखूं कि अंदर क्या हो रहा है।
- 6:28:26मैं अपने आप को सिर्फ रिलेशनशिप में ही
- 6:28:29ऑब्जर्व कर सकता हूं। क्योंकि जिंदगी पूरी
- 6:28:32रिलेशनशिप ही
- 6:28:35है। किसी कोने में बैठ के मेडिटेट करने से
- 6:28:39कोई फायदा नहीं। मैं अकेला तो रह ही नहीं
- 6:28:42सकता।
- 6:28:44मैं तभी एक्सिस्ट करता हूं जब मैं लोगों,
- 6:28:47चीजों और आइडियाज से रिलेट करता हूं। और
- 6:28:52जब मैं अपने इन रिश्तों को समझने लगता हूं
- 6:28:55तभी मैं खुद को समझने लगता हूं। बाकी सब
- 6:28:59अंडरस्टैंडिंग सिर्फ सोच
- 6:29:02है। और मैं खुद को सोच के रूप में समझ
- 6:29:06नहीं
- 6:29:08सकता। मैं कोई एब्स्ट्रैक्ट चीज नहीं हूं।
- 6:29:12इसलिए मुझे खुद को वैसे ही देखना होगा
- 6:29:15जैसे मैं
- 6:29:16हूं ना कि वैसे जैसे मैं बनना चाहता हूं।
- 6:29:22समझना कोई माइंड का इंटेलेक्चुअल काम नहीं
- 6:29:25है। खुद के बारे में नॉलेज जमा करना और
- 6:29:28खुद को समझना यह दोनों अलग चीजें
- 6:29:32हैं। जो भी नॉलेज तुम खुद के बारे में जमा
- 6:29:36करते हो, वह हमेशा पास्ट की होती है। और
- 6:29:40एक माइंड जो पास्ट से भरा होता है, वह दुख
- 6:29:43भरा माइंड होता है। खुद को समझना वैसा
- 6:29:46नहीं
- 6:29:47है। जैसे लैंग्वेज या साइन सीखना जिसमें
- 6:29:52तुम्हें चीजें याद रखनी पड़ती हैं।
- 6:29:55लेकिन साइकोलॉजिकल फील्ड में खुद के बारे
- 6:29:58में सीखना हमेशा प्रेजेंट में होता है और
- 6:30:02नॉलेज सिर्फ पास्ट होती है। और क्योंकि हम
- 6:30:07ज्यादातर पास्ट में जीते हैं और उससे ही
- 6:30:11खुश
- 6:30:12हैं। इसलिए नॉलेज को हम बहुत इंपॉर्टेंट
- 6:30:15समझने लगते हैं। इस वजह से हम क्लेवर
- 6:30:19इंटेलिजेंट लोगों की पूजा करते हैं। लेकिन
- 6:30:22अगर तुम हर वक्त सीख रहे हो हर मिनट
- 6:30:25देखकर, सुनकर करके और महसूस करके तो तुम
- 6:30:30पाओगे कि सीखना एक कंटीन्यूअस मूवमेंट है।
- 6:30:34जिसमें पास्ट का कोई रोल नहीं होता।
- 6:30:39अगर तुम कहते हो कि मैं धीरे-धीरे
- 6:30:41सीखूंगा, थोड़ा थोड़ा ऐड करते जाऊंगा, तो
- 6:30:45तुम अभी के अपने आप को नहीं देख रहे बल्कि
- 6:30:49पास्ट के नॉलेज के फिल्टर से देख रहे
- 6:30:52हो। सीखने के लिए बहुत सेंसिटिविटी चाहिए
- 6:30:56और कोई भी सेंसिटिविटी नहीं हो सकती।
- 6:31:00जब पास्ट का आईडिया प्रेजेंट को कंट्रोल
- 6:31:03करता
- 6:31:04है तब माइंड क्विक फ्लेक्सिबल अलर्ट नहीं
- 6:31:10रहता। हम में से ज्यादा लोग फिजिकली भी
- 6:31:14सेंसिटिव नहीं है। हम ज्यादा खा लेते हैं।
- 6:31:17अच्छी डाइट की परवाह नहीं करते। ज्यादा
- 6:31:20स्मोक और ड्रिंक करते हैं और अपने बॉडी को
- 6:31:23डल और इनसेंसिटिव बना लेते
- 6:31:26हैं। जब बॉडी ही डल हो जाती है तो माइंड
- 6:31:30अलर्ट क्लियर कैसे
- 6:31:34बनेगा? हो सकता है तुम कुछ पर्सनल चीजों
- 6:31:37के लिए सेंसिटिव हो।
- 6:31:39लेकिन जिंदगी के हर एस्पेक्ट के लिए पूरी
- 6:31:43तरह सेंसिटिव होने के लिए बॉडी और माइंड
- 6:31:46में अलगपन नहीं चाहिए होता।
- 6:31:51यह एक पूरी मूवमेंट होती
- 6:31:54है। किसी भी चीज को समझने के लिए तुम्हें
- 6:31:58उसके साथ रहना पड़ता है। उसको ऑब्जर्व
- 6:32:01करना पड़ता
- 6:32:02है। उसके हर हिस्सा, उसकी नेचर, उसकी
- 6:32:06स्ट्रक्चर, उसके मूवमेंट को जानना पड़ता
- 6:32:10है। क्या तुमने कभी अपने साथ रहकर देखने
- 6:32:14की कोशिश की है? अगर किया है तो तुम
- 6:32:18देखोगे कि तुम्हारा सेल्फ कोई रूखी सूखी
- 6:32:22चीज नहीं है। वह एक जिंदा चीज है हर वक्त
- 6:32:26नहीं। और एक जिंदा चीज के साथ रहने के लिए
- 6:32:30तुम्हारा माइंड भी जिंदा होना चाहिए।
- 6:32:33और माइंड जिंदा तब तक नहीं होता जब वह
- 6:32:37ओपिनियंस,
- 6:32:39जजमेंट्स और वैल्यू्यूज में फंसा होता
- 6:32:43है। अपने माइंड और दिल की मूवमेंट को
- 6:32:46देखने के लिए, अपने पूरे बीइंग को देखने
- 6:32:50के लिए तुम्हारा माइंड फ्री होना चाहिए।
- 6:32:56ना कि वह जो एग्री करता हो या
- 6:33:00डिसए्री ना जो साइड्स ले आर्गुमेंट्स में
- 6:33:04ना ही बस वर्ड्स पर
- 6:33:06झगड़े बल्कि ऐसा माइंड चाहिए जो समझने की
- 6:33:10इच्छा से देखे और यह करना मुश्किल होता
- 6:33:15है। क्योंकि हम में से ज्यादा लोग खुद को
- 6:33:18देखना या सुनना भूल गए हैं। वैसे ही जैसे
- 6:33:23हम एक नदी की खूबसूरती देखना भूल गए हैं
- 6:33:26या पेड़ों के बीच से गुजरती हवा को सुनना
- 6:33:29भूल गए
- 6:33:30हैं। जब हम किसी चीज को कंडेम या जस्टिफाई
- 6:33:35करते हैं तब हम क्लियर नहीं देख सकते।
- 6:33:41और जब हमारा माइंड लगातार बोलता रहता है
- 6:33:44तब भी हम देख नहीं सकते जो
- 6:33:47है हम सिर्फ वह देखते हैं जो हमने अपने
- 6:33:50बारे में इमेजिन किया होता है। हर एक
- 6:33:54इंसान के पास एक इमेज होती है कि वह क्या
- 6:33:58है या क्या होना चाहिए और वही इमेज वही
- 6:34:02फोटो हमें वैसे देखने से रोकती है जैसे हम
- 6:34:06वाकई
- 6:34:08हैं। दुनिया की सबसे मुश्किल चीजों में से
- 6:34:11एक है किसी भी चीज को सिंपल तरीकों से
- 6:34:16देखना। हमारा माइंड बहुत कॉम्प्लेक्स हो
- 6:34:19गया है और हमने सिंपलीसिटी का टच खो दिया
- 6:34:23है। मैं यह सिंपलीसिटी कपड़ों या खाने में
- 6:34:28नहीं कह रहा। सिर्फ लायन क्लॉथ पहनना या
- 6:34:32फास्टिंग करके रिकॉर्ड तोड़ना यह सब बचपना
- 6:34:36है जो संत करते हैं। मैं उस सिंपलीसिटी की
- 6:34:40बात कर रहा हूं जो बिना डरे सीधा देख
- 6:34:45सके। जो खुद को वैसे देख सके जैसे हम हैं।
- 6:34:49बिना किसी झूठ के बिना भाग जाने
- 6:34:53के। अगर हम झूठ बोलते हैं तो कह पाएं। हां
- 6:34:58मैंने झूठ बोला ना कि उसे छुपाएं या उससे
- 6:35:02भाग
- 6:35:03जाए और खुद को समझने के लिए बहुत ज्यादा
- 6:35:06ह्यूमिलिटी चाहिए। अगर तुम शुरू ही यह कह
- 6:35:10के करते हो कि मैं खुद को जानता हूं तो
- 6:35:14तुमने खुद को सीखना तुरंत बंद कर दिया। और
- 6:35:18अगर तुम कहते हो कि मेरे बारे में क्या ही
- 6:35:22सीखना है। मैं तो सिर्फ यादों, आइडियाज
- 6:35:27एक्सपीरियंसेस और ट्रेडिशंस का बंडल
- 6:35:31हो तो तुमने सीखना फिर से बंद कर
- 6:35:36दिया। जब भी तुम कुछ अचीव कर लेते हो तो
- 6:35:40तुम्हारे अंदर इनोसेंस और ह्यूमिलिटी खत्म
- 6:35:43हो जाती
- 6:35:45है। जैसे ही तुम कंक्लूजन ले लेते हो या
- 6:35:49नॉलेज के थ्रू देखना शुरू करते हो तुम
- 6:35:52खत्म हो जाते हो।
- 6:35:54क्योंकि फिर तुम हर जिंदा चीज को पुरानी
- 6:35:58नजर से देखते हो।
- 6:36:00लेकिन अगर तुम्हारे पास कोई बेस नहीं है,
- 6:36:04कोई सर्टेनिटी नहीं है, कोई अचीवमेंट नहीं
- 6:36:07है तो तुम फ्री हो।
- 6:36:12देखने के लिए, सीखने के लिए और जब तुम
- 6:36:16फ्रीडम से देखते हो तो हर बार चीज नई होती
- 6:36:20है। एक ओवर कॉन्फिडेंट आदमी अंदर से मर
- 6:36:24चुका होता है। लेकिन हम कैसे फ्री होकर
- 6:36:27देखें और सीखें। जब हमारा माइंड जन्म से
- 6:36:32लेकर मौत तक एक कल्चर के
- 6:36:35पैटर्न मैं के पैटर्न में बना होता
- 6:36:38है। सदियों से हम
- 6:36:41नेशनलिटी, कास्ट, क्लास, ट्रेडिशन,
- 6:36:45रिलीजन, लैंग्वेज, एजुकेशन, लिटरेचर,
- 6:36:50आर्ट, कस्टम्स,
- 6:36:52प्रोपेगेंडा, इकोनॉमिक
- 6:36:55प्रेशर, खाने, मौसम, परिवार, दोस्तों,
- 6:37:01एक्सपीरियंसेस और हर पॉसिबल इन्फ्लुएंस से
- 6:37:04कंडीशन होते आए हैं। इसलिए हम हर प्रॉब्लम
- 6:37:09को अपने कंडीशनिंग के थ्रू ही देखते
- 6:37:14हैं। क्या तुम्हें पता है कि तुम कंडीशंड
- 6:37:18हो? यह पहला सवाल है जो तुम्हें खुद से
- 6:37:21पूछना
- 6:37:23चाहिए। ना कि यह कैसे फ्री हो कंडीशनिंग
- 6:37:28से। हो सकता है तुम कभी फ्री ना हो। और
- 6:37:32अगर तुम कहते हो मुझे फ्री होना ही है।
- 6:37:37तो तुम किसी और कंडीशनिंग के ट्रैप में
- 6:37:40फंस जाते हो। तो क्या तुम अवेयर हो कि तुम
- 6:37:43कंडीशंड हो?
- 6:37:46क्या तुम्हें पता है कि जब तुम एक ट्री को
- 6:37:49देखते हो और कहते हो यह ओक ट्री है या यह
- 6:37:54बरगद का पेड़ है तो वह नाम जो कि नॉलेज है
- 6:37:59तुम्हारे और ट्री के बीच आ जाती
- 6:38:02है उस ट्री को वाकई महसूस करने के लिए
- 6:38:06तुम्हें उसे हाथ लगाना पड़ता है और उस नाम
- 6:38:10का कोई काम
- 6:38:12नहीं तुम्हें कैसे पता चलता चलता है कि
- 6:38:15तुम कंडीशंड हो। कौन बताता है
- 6:38:19तुम्हें? जैसे तुम्हें भूख कैसे लगती है
- 6:38:23ना कि थरी के रूप में बल्कि वाकई महसूस
- 6:38:28करके। वैसे ही तुम्हें कैसे पता चलता है
- 6:38:31कि तुम कंडीशंड
- 6:38:33हो? क्या वह तुम्हारे रिएक्शन से समझ आता
- 6:38:36है? जब कोई चैलेंज आता
- 6:38:40है, तुम हर चैलेंज का रिस्पांस देते हो
- 6:38:44अपनी कंडीशनिंग के हिसाब से।
- 6:38:47और क्योंकि तुम्हारी कंडीशनिंग अधूरी है
- 6:38:50तो तुम्हारा रिस्पांस भी हमेशा अधूरा ही
- 6:38:54होता
- 6:38:57है। जब तुम इस बात को महसूस करते हो तो
- 6:39:01क्या जाति, धर्म और कल्चर का यह कंडीशनिंग
- 6:39:04तुम्हें एक कैद जैसा लगता
- 6:39:07है। सिर्फ एक कंडीशनिंग लो। जैसे
- 6:39:14नेशनलिटी और उसको सीरियसली पूरी तरह महसूस
- 6:39:18करो और देखो क्या तुम्हें उसमें मजा आता
- 6:39:22है या तुम उसके खिलाफ हो जाते हो और अगर
- 6:39:26तुम उसके खिलाफ हो जाते हो तो क्या तुम हर
- 6:39:30कंडीशनिंग से निकलना चाहते हो अगर तुम
- 6:39:34अपने कंडीशनिंग से खुश हो तो ऑब्वियसली
- 6:39:38तुम कुछ नहीं करोगे
- 6:39:41लेकिन अगर तुम खुश नहीं हो तो जैसे ही तुम
- 6:39:44अवेयर होते हो तुम्हें समझ आता है कि तुम
- 6:39:47कभी भी कुछ भी उसके बिना नहीं करते कभी भी
- 6:39:52नहीं और इसलिए तुम हमेशा पास्ट में जी रहे
- 6:39:57होते
- 6:39:59हो मृत चीजों के
- 6:40:03साथ तुम तभी देख पाते हो कि तुम कंडीशन हो
- 6:40:07जब प्लेजर के कंटिन्यू होने में या पेन से
- 6:40:12बचने में कॉन्फ्लिक्ट होता
- 6:40:16है। अगर सब कुछ तुम्हारे आसपास परफेक्ट
- 6:40:19हो, तुम्हारी वाइफ तुमसे प्यार करती हो,
- 6:40:22तुम उससे प्यार करते हो। अच्छा घर हो,
- 6:40:26अच्छे बच्चे हो, पैसा हो, तो तुम्हें अपने
- 6:40:30कंडीशनिंग का बिल्कुल भी पता नहीं चलता।
- 6:40:33लेकिन जैसे ही कोई डिस्टरबेंस होती है
- 6:40:37जैसे वाइफ किसी और की तरफ देखती है या
- 6:40:41पैसा चला जाता है या वॉर का डर हो या कोई
- 6:40:45और पेन या एंग्जायटी हो तब तुम्हें समझ
- 6:40:48आता है कि तुम कंडीशंड हो।
- 6:40:52जब तुम किसी भी डिस्टरबेंस से लड़ते हो या
- 6:40:56किसी बाहर या अंदर के खतरे से अपने आप को
- 6:40:59बचाते हो तब तुम्हें पता चलता है कि तुम
- 6:41:03कंडीशंड
- 6:41:05हो और क्योंकि ज्यादातर लोग ज्यादातर वक्त
- 6:41:09डिस्टर्बड रहते हैं। चाहे ऊपर ऊपर से हो
- 6:41:12या अंदर से।
- 6:41:15यही डिस्टरबेंस दिखाती है कि हम कंडीशंड
- 6:41:20हैं। जब तक एक जानवर को प्यार मिलता रहता
- 6:41:23है, वह अच्छा रिएक्ट करता है। लेकिन जैसे
- 6:41:26ही उसे गुस्सा दिलाया जाता है, उसकी पूरी
- 6:41:31वायलेंस बाहर आ जाती
- 6:41:33है। हम जिंदगी, पॉलिटिक्स, इकोनमी, दुनिया
- 6:41:38की हॉरर, ब्रूटलिटी, दुख और अपने अंदर के
- 6:41:43दुख से डिस्टर्ब रहते
- 6:41:47हैं। और तब हमें समझ आता है कि हम कितने
- 6:41:51छोटी सोच में, कंडीशनिंग में फंसे हुए
- 6:41:54हैं। तो अब हम क्या करें?
- 6:42:00क्या उस डिस्टरबेंस को एक्सेप्ट करके उसके
- 6:42:03साथ
- 6:42:05जिए जैसे ज्यादातर लोग करते
- 6:42:08हैं। जैसे कोई पीठ का दर्द हो जाए और हम
- 6:42:12उसके साथ जीना सीख
- 6:42:15जाए। क्या हम बस सह
- 6:42:18लें? हम सब में एक आदत होती है हर चीज सह
- 6:42:22लेने
- 6:42:23की। उसे नॉर्मल मानने की और ब्लेम करने
- 6:42:27की। सरकमस्टेंससेस
- 6:42:30पर काश सब कुछ ठीक होता तो मैं अलग होता।
- 6:42:35हम कहते हैं या मुझे एक मौका दो मैं अपने
- 6:42:39आप को पूरा कर
- 6:42:41लूंगा या मैं इस पूरी नाइंसाफी से डूबा
- 6:42:45हुआ
- 6:42:47हूं। हम हमेशा अपने दुख का ब्लेम किसी और
- 6:42:50पर डाल देते हैं या एनवायरमेंट या
- 6:42:53इकोनॉमिक हालत पे।
- 6:42:57अगर कोई डिस्टरबेंस को सह लेता है तो इसका
- 6:43:01मतलब है उसका माइंड डल हो गया है। जैसे
- 6:43:04कोई इतनी खूबसूरती देख चुका हो कि अब वह
- 6:43:08नोटिस ही नहीं करता। वह बेपरवाह हो जाता
- 6:43:11है, हार्ड हो जाता है। उसका माइंड और भी
- 6:43:15ज्यादा डल हो जाता
- 6:43:18है। और अगर हम डिस्टरबेंस सह नहीं पाते तो
- 6:43:22हम उसे भागने लगते
- 6:43:25हैं। कोई ड्रग लेके किसी पॉलिटिकल ग्रुप
- 6:43:29में जाके चिल्ला के लिख के फुटबॉल मैच देख
- 6:43:34के मंदिर या चर्च
- 6:43:36जाके या किसी और तरीके के मजे ढूंढ
- 6:43:40के हम एक्चुअल फैक्ट से भाग क्यों जाते
- 6:43:43हैं? हम डेथ से डरते
- 6:43:47हैं। मान लो बस एग्जांपल के
- 6:43:51लिए तो हम हर तरह की थ्यरी होप्स, बिलीव्स
- 6:43:57बना लेते हैं ताकि डेथ को छुपा सके।
- 6:44:01लेकिन फैक्ट फिर भी वही होता
- 6:44:05है। किसी फैक्ट को समझने के लिए हमें उसे
- 6:44:09देखना पड़ता है। उसे भागना नहीं पड़ता।
- 6:44:14ज्यादातर लोग जिंदगी से भी डरते हैं और
- 6:44:18मरने से
- 6:44:20भी। हम अपने परिवार के लिए डरते हैं। लोग
- 6:44:24क्या सोचेंगे उससे डरते हैं। अपनी जॉब,
- 6:44:27अपनी सिक्योरिटी खो देने से डरते हैं। और
- 6:44:31हजारों और चीजों से डरते
- 6:44:34हैं। सिंपल बात यह है कि हम डरते हैं। यह
- 6:44:38नहीं कि हम इस या उससे डरते हैं।
- 6:44:43अब हम उस फैक्ट का सामना क्यों नहीं कर
- 6:44:46पाते? तुम किसी फैक्ट का सामना सिर्फ
- 6:44:49प्रेजेंट में ही कर सकते हो। और अगर
- 6:44:53तुम उसे कभी प्रेजेंट में ही आने नहीं
- 6:44:57देते। क्योंकि तुम हमेशा उसे भाग रहे हो
- 6:45:00तो तुम कभी सामना नहीं कर सकते।
- 6:45:05और क्योंकि हमने एस्केप का इतना बड़ा
- 6:45:07नेटवर्क बना रखा है। हम एस्केप करना ही
- 6:45:10हैबिट बना चुके हैं। अगर तुम थोड़े भी
- 6:45:14सेंसिटिव हो, थोड़े भी सीरियस हो, तो तुम
- 6:45:18सिर्फ अपने कंडीशनिंग को नहीं देखोगे
- 6:45:21बल्कि यह भी देखोगे कि इसका रिजल्ट कितना
- 6:45:25डेंजरस है। यह कितनी हेट रेड और ब्रूटलिटी
- 6:45:29लाता है। तो फिर अगर तुम देखते हो
- 6:45:32कंडीशनिंग का डेंजर तो तुम एक्शन क्यों
- 6:45:35नहीं लेते? क्या तुम आलसी
- 6:45:39हो? आलसी मतलब जिसमें एनर्जी नहीं है।
- 6:45:42लेकिन अगर तुम्हारे सामने कोई तुरंत
- 6:45:45फिजिकल डेंजर हो जैसे रास्ते में सांप हो
- 6:45:49या खाई हो या आग हो तो तुम्हारे पास तुरंत
- 6:45:53एनर्जी आ जाती
- 6:45:55है। तो कंडीशनिंग का डेंजर देखकर तुम मे
- 6:45:59क्यों नहीं करते?
- 6:46:00अगर तुम देखते हो कि नेशनलिज्म तुम्हारी
- 6:46:04खुद की सिक्योरिटी के लिए खतरा है तो क्या
- 6:46:07तुम कुछ नहीं करते? आंसर यह है तुम देखते
- 6:46:11ही
- 6:46:13नहीं। हो सकता है तुम सोच के एनालाइज करके
- 6:46:17यह समझते हो कि नेशनलिज्म सिर्फ
- 6:46:20डिस्ट्रक्शन लाता
- 6:46:22है। लेकिन उसमें कोई इमोशनल फील नहीं
- 6:46:25होती।
- 6:46:27सिर्फ जब इमोशनल फील होती है तभी तुम
- 6:46:30एक्शन लेते
- 6:46:31हो। अगर तुम कंडीशनिंग के डेंजर को सिर्फ
- 6:46:34आईडिया के रूप में देखते हो तो तुम कभी
- 6:46:37कुछ नहीं करोगे।
- 6:46:40जब डेंजर सिर्फ एक आईडिया होता है तो
- 6:46:43आईडिया और एक्शन के बीच कॉन्फ्लिक्ट होता
- 6:46:47है और वही कॉन्फ्लिक्ट तुम्हारी एनर्जी
- 6:46:50छीन लेता
- 6:46:52है। सिर्फ तभी तुम कुछ करते हो जब तुम
- 6:46:56कंडीशनिंग को तुरंत देखते हो। जैसे तुम एक
- 6:47:01खाई को देखते हो।
- 6:47:03तो देखना ही एक्शन
- 6:47:05है। ज्यादातर लोग जिंदगी से बिना ध्यान
- 6:47:09दिए गुजर जाते हैं। बस एनवायरमेंट के
- 6:47:12हिसाब से रिएक्ट करते हैं। जहां उनका पालन
- 6:47:17पोषण हुआ है
- 6:47:18और यह रिएक्शन और ज्यादा बॉन्डेज बनाता
- 6:47:22है। बंधन और कंडीशनिंग बढ़ाता है।
- 6:47:27लेकिन जैसे ही तुम अपना पूरा अटेंशन
- 6:47:30कंडीशनिंग पर देते हो
- 6:47:33तुम देखोगे कि तुम पास्ट से बिल्कुल फ्री
- 6:47:36हो गए हो। वह अपने आप गिर जाता
- 6:47:40है। पिछली बार हमने कहा था कि जॉय प्लेजर
- 6:47:44से बिल्कुल अलग होती है। तो चलो देखते हैं
- 6:47:47प्लेजर में क्या होता है। और क्या ऐसी
- 6:47:51दुनिया में जीना पॉसिबल है जहां प्लेजर ना
- 6:47:54हो। लेकिन एक जबरदस्त जॉय हो, ब्लिस हो।
- 6:48:01हम सब किसी ना किसी तरीके से प्लेजर के
- 6:48:04पीछे भाग रहे
- 6:48:06हैं। चाहे वह इंटेलेक्चुअल हो, सेंस हो या
- 6:48:13कल्चरल। रिफॉर्म करने का प्लेजर, दूसरों
- 6:48:17को कहने का प्लेजर कि क्या करना चाहिए?
- 6:48:21सोसाइटी के बुरे काम ठीक करने का प्लेजर,
- 6:48:25अच्छा काम करने का प्लेजर, ज्यादा नॉलेज
- 6:48:28का, ज्यादा फिजिकल सेटिस्फेक्शन का,
- 6:48:31ज्यादा एक्सपीरियंस का, ज्यादा लाइफ को
- 6:48:34समझने का
- 6:48:36प्लेजर और माइंड के सब चालाक क्लेवर
- 6:48:41खेल। और लास्ट में सबसे बड़ा प्लेजर है
- 6:48:45गॉड को पाना।
- 6:48:49प्लेजर ही सोसाइटी का स्ट्रक्चर है। बचपन
- 6:48:52से लेकर डेथ तक हम छुप के चालाक तरीके से
- 6:48:58या क्लियरली प्लेजर को ढूंढते रहते हैं।
- 6:49:02तो जो भी तुम्हारा प्लेजर का फॉर्म हो यह
- 6:49:05बहुत जरूरी है कि तुम उसे क्लियरली समझो।
- 6:49:11क्योंकि वही तुम्हारी जिंदगी को शेप करता
- 6:49:15है। इसलिए हमें प्लेजर को बहुत पास से,
- 6:49:19बहुत क्लोज से, बहुत सॉफ्टली और केयरफुली
- 6:49:22देखना चाहिए।
- 6:49:24क्योंकि प्लेजर को ढूंढना और फिर उससे
- 6:49:28पलना और चलना जिंदगी की बेसिक नीड बन चुकी
- 6:49:33है और उसके बिना जीवन बोरिंग बेकार अकेला
- 6:49:38और मीनिंगलेस लगता
- 6:49:41है। तुम पूछ सकते हो तो फिर जिंदगी को
- 6:49:45प्लेजर से ही क्यों ना चलने दें?
- 6:49:48सिंपल रीजन यह है कि प्लेजर के साथ पेन,
- 6:49:52फ्रस्ट्रेशन, दुख और डर आता
- 6:49:56है और डर से वायलेंस भी निकलता
- 6:50:00है। अगर तुम ऐसे ही जीना चाहते हो तो वैसे
- 6:50:04ही जियो।
- 6:50:06दुनिया वैसे भी वैसे ही जी रही है।
- 6:50:11लेकिन अगर तुम दुख से फ्री होना चाहते हो
- 6:50:14तो तुम्हें प्लेजर के पूरे स्ट्रक्चर को
- 6:50:16समझना
- 6:50:17पड़ेगा। प्लेजर को समझने का मतलब यह नहीं
- 6:50:21कि उसे रिजेक्ट करना है। हम उसे ना गलत कह
- 6:50:25रहे हैं ना सही।
- 6:50:28लेकिन अगर तुम उसका पीछा करते हो तो आंखें
- 6:50:31खोल के करो। यह जानकर कि एक माइंड जो
- 6:50:35हमेशा प्लेजर ढूंढती है उसके साथ पेन भी
- 6:50:40आता है। दोनों अलग नहीं हो
- 6:50:46सकते। चाहे हम प्लेजर के पीछे भागे और पेन
- 6:50:50से भागने की कोशिश
- 6:50:53करें। अब यह माइंड हमेशा प्लेजर क्यों
- 6:50:56मांगता है?
- 6:50:59क्यों हम अच्छे और गंदे दोनों काम प्लेजर
- 6:51:02के साथ करते
- 6:51:04हैं? क्यों हम प्लेजर की पतली सी डोर पर
- 6:51:07सैक्रिफाइस करते हैं? सफर करते हैं?
- 6:51:11प्लेजर है
- 6:51:13क्या? और यह कैसे आता
- 6:51:16है? क्या तुमने कभी यह क्वेश्चंस खुद से
- 6:51:20पूछे हैं? और उनके आंसर्स को एंड तक फॉलो
- 6:51:23किया
- 6:51:24है? प्लेजर चार स्टेप से आता है।
- 6:51:28देखना, सेंसेशन आना, कांटेक्ट होना और
- 6:51:32डिजायर
- 6:51:33होना। मान लो मैंने एक खूबसूरत कार देखी।
- 6:51:37मुझे देखकर एक सेंसेशन आता
- 6:51:40है। फिर मैं उसे टच करता हूं या इमेजिन
- 6:51:43करता हूं और फिर आता है उस कार को पाने का
- 6:51:48डिजायर। उसे शो ऑफ करने का डिजायर।
- 6:51:53या मैं देखता हूं एक सुंदर बादल या एक
- 6:51:56पहाड़ नीले आसमान के नीचे या एक नया पत्ता
- 6:52:00जो बसंत में निकला है या एक गहरी घाटी जो
- 6:52:04खूबसूरती से भरी है या एक खूबसूरत
- 6:52:08सनसेट या एक चेहरा जो इंटेलिजेंट है जिंदा
- 6:52:12है सेल्फ कॉन्शियस नहीं है और इसलिए वह
- 6:52:16चेहरा वाकई सुंदर
- 6:52:18है मैं इन चीजों को पूरे डिलाइट के साथ
- 6:52:22देखता देखता हूं और जब मैं ऑब्जर्व करता
- 6:52:24हूं तो कोई ऑब्जर्वर होता ही नहीं। सिर्फ
- 6:52:28वह खूबसूरती होती है जैसे
- 6:52:33प्यार। एक मोमेंट के लिए मैं पूरा गायब हो
- 6:52:36जाता हूं। अपनी प्रॉब्लम्स, ए्जायटीज और
- 6:52:40दुख के
- 6:52:42साथ। सिर्फ वो मैजिकल मोमेंट होता है। मैं
- 6:52:46उस मोमेंट को जॉय के साथ देख सकता हूं।
- 6:52:50और अगले मोमेंट भूल भी सकता हूं या फिर
- 6:52:54माइंड बीच में आ जाता है और प्रॉब्लम वहीं
- 6:52:57से शुरू होती
- 6:52:59है। मेरा माइंड सोचता है कि यह कितना
- 6:53:02सुंदर था। फिर कहता है मुझे यह फिर से
- 6:53:06देखना है। सोच शुरू करता है कंपेयर करना,
- 6:53:10जज
- 6:53:12करना। और सोच कहती है मुझे यह कल फिर
- 6:53:17चाहिए।
- 6:53:19एक सेकंड की डिलाइट को रिपीट करने का
- 6:53:22प्रोसेस सोच के थ्रू चालू हो जाता
- 6:53:26है। सेक्सुअल डिजायर के साथ भी वही होता
- 6:53:29है या किसी और डिजायर के साथ।
- 6:53:34डिजायर में कोई गलती नहीं है। रिएक्ट करना
- 6:53:37बिल्कुल नॉर्मल है। अगर कोई पिन मुझे चुभे
- 6:53:41तो मैं रिएक्ट
- 6:53:43करूंगा। जब तक मैं पैरालाइज्ड ना हो जाऊं।
- 6:53:47लेकिन फिर थॉट आती है और वह उस डिलाइट को
- 6:53:51चबाने लगती
- 6:53:53है और उसे प्लेजर में बदल देती है। थॉट उस
- 6:53:58एक्सपीरियंस को रिपीट करना चाहती है और
- 6:54:01जितना ज्यादा रिपीट करते हैं वह उतना
- 6:54:04ज्यादा मैकेनिकल बन जाता
- 6:54:06है। जितना तुम सोचते हो उस मोमेंट के बारे
- 6:54:10में उतना ही थॉट प्लेजर को और स्ट्रांग
- 6:54:13बना देता
- 6:54:15है। तो थॉट ही डिजायर के जरिए प्लेजर को
- 6:54:18क्रिएट करता है। उसको चलाता है और उसको
- 6:54:23कंटिन्यू रखता है। और इस तरह एक नेचुरल
- 6:54:28डिजायर को थॉट डिस्टोर्ट कर देता है।
- 6:54:32थॉट उसे मेमोरी बना देता है। और मेमोरी को
- 6:54:36फिर सोचसच कर और बड़ा किया जाता है।
- 6:54:41हां, मेमोरी का अपना जगह होता है। कुछ
- 6:54:46लेवल पर जरूरी होती
- 6:54:49है। रोज की जिंदगी में बिना मेमोरी के काम
- 6:54:53नहीं
- 6:54:53चलेगा। उसके अपने एरिया में मेमोरी को
- 6:54:56एफिशिएंट होना चाहिए।
- 6:54:59लेकिन एक ऐसा स्टेट ऑफ माइंड भी होता है
- 6:55:02जहां मेमोरी की जगह बहुत कम होती है। एक
- 6:55:06माइंड जो मेमोरी से बंधा हुआ नहीं है वही
- 6:55:10असली फ्रीडम को जानता
- 6:55:12है। क्या तुमने कभी नोटिस किया है जब तुम
- 6:55:17किसी चीज को पूरे दिल से पूरी तरह से फील
- 6:55:20करते हो तो उसमें मेमोरी बहुत कम होती है।
- 6:55:25सिर्फ तभी मेमोरी बनती है जब तुम किसी
- 6:55:28चैलेंज का पूरे बीइंग के साथ जवाब नहीं
- 6:55:32देते। तब कॉन्फ्लिक्ट होता है, स्ट्रगल
- 6:55:36होती है और वही कंफ्यूजन, प्लेजर या पेन
- 6:55:41लाती है। और स्ट्रगल ही मेमोरी पैदा करता
- 6:55:46है। वह मेमोरी फिर और भी मेमोरीज से
- 6:55:49जुड़ती रहती है और वही मेमोरीज रिस्पांस
- 6:55:53बन जाती है।
- 6:55:55जो कुछ भी मेमोरी का रिजल्ट होता है, वह
- 6:55:59पुराना होता है और इसलिए कभी फ्री नहीं
- 6:56:02होता। फ्रीडम ऑफ थॉट जैसी कोई चीज होती ही
- 6:56:06नहीं। यह एकदम बेकार बात है। थॉट कभी नई
- 6:56:11नहीं
- 6:56:12होती। क्योंकि थॉट मेमोरी, एक्सपीरियंस और
- 6:56:17नॉलेज का रिएक्शन होती है।
- 6:56:20थॉट क्योंकि वह पुरानी होती है।
- 6:56:24तुमने जो चीज एक मोमेंट के लिए डिलाइट के
- 6:56:28साथ देखी थी उसे भी पुराना बना देती
- 6:56:32है। तुम प्लेजर हमेशा पुरानी चीज से पाते
- 6:56:36हो कभी नए से नहीं। नए में टाइम होता ही
- 6:56:41नहीं। तो अगर तुम हर चीज को ऐसे देख सको
- 6:56:44कि प्लेजर उसमें घुस ना पाए। एक चेहरा, एक
- 6:56:48चिड़िया,
- 6:56:50एक रंग, धूप में चमकते पानी की
- 6:56:55चादर या कुछ भी जो तुम्हें खुशी देता हो।
- 6:56:59अगर तुम उसे ऐसे देख सको कि तुम्हें उस
- 6:57:02एक्सपीरियंस को दोबारा चाहिए ही ना हो तो
- 6:57:06ना दर्द होगा, ना डर होगा और एक जबरदस्त
- 6:57:11जॉय होगा।
- 6:57:14जब तुम प्लेजर को रिपीट करने की कोशिश
- 6:57:17करते हो तभी वह पेन बन जाता है। अपने अंदर
- 6:57:21देखो
- 6:57:23इसको जब तुम प्लेजर को दोबारा चाहते हो तो
- 6:57:27दर्द आता ही
- 6:57:29है। क्योंकि वह वैसे होता ही नहीं जैसे कल
- 6:57:33था। तुम स्ट्रगल करते हो उसी डिलाइट को
- 6:57:37पाने के लिए। ना सिर्फ अपने सेंस के लिए
- 6:57:40बल्कि माइंड के अंदर के उस सेम फील के
- 6:57:44लिए। और जब तुम्हें वह नहीं मिलता तो तुम
- 6:57:48हर्ट फील करते हो, डिसपॉइंट होते हो। क्या
- 6:57:52तुमने देखा
- 6:57:53है? जब तुमसे छोटी सी प्लेजर छीन ली जाती
- 6:57:57है तो क्या होता है?
- 6:58:00जब तुम्हें वह नहीं मिलता जो तुम चाहते हो
- 6:58:04तो तुम एशियस हो जाते हो, जेलस होते हो,
- 6:58:08हेटफुल बन जाते
- 6:58:10हो। जब तुम्हें ड्रिंक, स्मोक, सेक्स या
- 6:58:15जो भी चाहिए था वह नहीं मिलता तो तुम्हारे
- 6:58:18अंदर कितनी फाइट होती है। यह सब डर की ही
- 6:58:23फॉर्म है। है ना?
- 6:58:26डर इस बात का कि तुम्हें वह नहीं मिलेगा
- 6:58:29जो तुम चाहते हो या जो तुम्हारे पास है वह
- 6:58:33खो जाएगा। जब कोई बिलीफ या आईडियोलॉजी
- 6:58:37जिसे तुमने सालों तक पकड़ रखा था। जब वह
- 6:58:41तुमसे छीन ली जाती है चाहे लॉजिक से या
- 6:58:44जिंदगी के किसी झटके से तो क्या तुम्हें
- 6:58:48अकेला खड़े रहने से डर नहीं
- 6:58:51लगता? वह बिलीफ तुम्हें प्लेजर देता था।
- 6:58:54सेटिस्फेक्शन देता था और जब वह चला जाता
- 6:58:58है तो तुम खाली महसूस करते
- 6:59:01हो और फिर तुम तुरंत किसी नए प्लेजर नए
- 6:59:05बिलीफ को ढूंढने लगते
- 6:59:09हो। मुझे लगता है यह सब बहुत सिंपल है और
- 6:59:13क्योंकि यह सिंपल है। हम इस सिंपलीसिटी को
- 6:59:16देखते ही नहीं।
- 6:59:19हमें हर चीज को कॉम्प्लेक्स बनाना अच्छा
- 6:59:21लगता है। जब तुम्हारी वाइफ तुमसे दूर हो
- 6:59:25जाती है तो क्या तुम जेलस नहीं होते? क्या
- 6:59:28तुम गुस्सा नहीं होते? क्या तुम उस आदमी
- 6:59:32से नफरत नहीं करते जिसकी तरफ वह अट्रैक्ट
- 6:59:35हो गई है? और यह सब क्या है? बस डर ही तो
- 6:59:39है कि तुम कुछ खो दोगे जो तुम्हें प्लेजर
- 6:59:43देता था। कंपैनियनशिप सिक्योरिटी
- 6:59:48और पोजीशन का
- 6:59:50सुकून। तो अगर तुम समझ जाओ कि जहां प्लेजर
- 6:59:54का चीज होता है, जहां प्लेजर की दौड़ होती
- 6:59:57है, वहां पेन, वहां दर्द भी होता
- 7:00:02है। तो अगर तुम ऐसे जीना चाहते हो तो
- 7:00:05जियो। लेकिन बस ऐसे ही उसमें मत गिर जाओ।
- 7:00:10लेकिन अगर तुम प्लेजर खत्म करना चाहते हो
- 7:00:13जो पेन को भी खत्म करेगा तो तुम्हें पूरे
- 7:00:16अटेंशन के साथ पूरे प्लेजर के स्ट्रक्चर
- 7:00:20को देखना
- 7:00:21होगा उसे मक्स और सन्यासी की तरह काट देना
- 7:00:26नहीं जो सोचते हैं कि औरत देखना पाप है।
- 7:00:31और इस सोच में अपनी समझने की एनर्जी को ही
- 7:00:34मार देते
- 7:00:36हैं। बल्कि प्लेजर का पूरा मीनिंग और
- 7:00:39गहराई से
- 7:00:40समझना। तभी तुम्हें जिंदगी में एक जबरदस्त
- 7:00:45जॉय
- 7:00:47मिलेगा। तुम जॉय के बारे में सोच नहीं
- 7:00:50सकते। जॉय एक तुरंत होने वाली चीज है और
- 7:00:54उसके बारे में सोचकर तुम उसे प्लेजर बना
- 7:00:57देते हो। प्रेजेंट में जीना मतलब है
- 7:01:01ब्यूटी को तुरंत देखना और उसमें से प्लेजर
- 7:01:04चाहना नहीं।
- 7:01:07डर, प्लेजर, दुख, सोच और
- 7:01:12वायलेंस यह सब एक दूसरे से जुड़े हुए
- 7:01:16हैं। ज्यादातर लोग वायलेंस में ही प्लेजर
- 7:01:20लेते हैं। किसी से नफरत करके, किसी जात या
- 7:01:23ग्रुप से गुस्सा
- 7:01:25होकर। दूसरों के खिलाफ फीलिंग्स रखकर।
- 7:01:29लेकिन एक ऐसे माइंड स्टेट में जहां
- 7:01:32वायलेंस बिल्कुल खत्म हो चुकी हो। वहां एक
- 7:01:36अलग ही जॉय होता
- 7:01:38है जो वायलेंस के प्लेजर से बहुत अलग होती
- 7:01:41है जिसमें कॉन्फ्लिक्ट, नफरत और डर होता
- 7:01:45है। क्या हम वायलेंस के बिल्कुल रूट तक जा
- 7:01:49सकते हैं और उसे फ्री हो सकते
- 7:01:51हैं। नहीं तो हम हमेशा एक दूसरे से लड़ते
- 7:01:56रहेंगे। अगर तुम्हें ऐसे ही जीना है और
- 7:02:00लगता है ज्यादातर लोग ऐसे ही जीते हैं तो
- 7:02:03चलते रहो।
- 7:02:05लेकिन अगर तुम कहते हो वायलेंस कभी खत्म
- 7:02:10ही नहीं हो सकती तो तुमने खुद को ब्लॉक कर
- 7:02:13लिया है और हमारे बीच कोई बात नहीं हो
- 7:02:18सकती। लेकिन अगर तुम कहते हो कि शायद जीने
- 7:02:22का कोई और तरीका हो सकता
- 7:02:25है तो हम एक दूसरे से बात कर सकते हैं। तो
- 7:02:29चलो हम मिलकर देखें।
- 7:02:33जो लोग कम्युनिकेट कर सकते हैं। क्या यह
- 7:02:36पॉसिबल है कि हर तरीके की वायलेंस को अपने
- 7:02:40अंदर से बिल्कुल खत्म किया जाए और फिर भी
- 7:02:44इस डरावनी ब्रूटल दुनिया में जिया
- 7:02:48जाए। मुझे लगता है यह पॉसिबल है। मैं नहीं
- 7:02:53चाहता कि मेरे अंदर नफरत, जेलसी, ए्जायटी
- 7:02:57या डर का एक भी झटका हो।
- 7:03:01मैं पूरी तरह शांति में जीना चाहता हूं।
- 7:03:04इसका मतलब यह नहीं कि मैं मरना चाहता हूं।
- 7:03:08मैं इस खूबसूरत जमीन पर जीना चाहता हूं।
- 7:03:12जो इतनी फुल है, इतनी रिच है, इतनी
- 7:03:15ब्यूटीफुल है। मैं पेड़, फूल, नदियां,
- 7:03:20खेत और औरतें, लड़के, लड़कियां देखना
- 7:03:24चाहता हूं। और साथ ही
- 7:03:27साथ पूरी तरह अपने अंदर और दुनिया के साथ
- 7:03:31शांति में जीना चाहता हूं तो मैं क्या
- 7:03:36करूं। अगर हम समझ जाए कि वायलेंस को कैसे
- 7:03:40देखा जाए ना सिर्फ बाहर सोसाइटी में जैसे
- 7:03:44वॉर, दंगे, जाति और क्लास की लड़ाई बल्कि
- 7:03:49अपने अंदर
- 7:03:50भी तो शायद हम इससे परे जा पाएंगे।
- 7:03:55यह एक बहुत कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम है।
- 7:03:58हजारों सालों से इंसान वायलेंट रहा है।
- 7:04:02रिलीजंस ने उसे कंट्रोल करने की कोशिश की
- 7:04:05है पूरी दुनिया में लेकिन कोई भी
- 7:04:08सक्सेसफुल नहीं
- 7:04:10हुआ। तो अगर हमें इस सवाल में घुसना है तो
- 7:04:14मुझे लगता है कि हमें बहुत सीरियस होना
- 7:04:17पड़ेगा। क्योंकि यह हमें एक बिल्कुल अलग
- 7:04:20दुनिया में ले जाएगा।
- 7:04:22लेकिन अगर हम बस इस पर सोच विचार करके मजा
- 7:04:27लेना चाहते हैं तो हम दूर तक नहीं जा
- 7:04:34पाएंगे। तुम्हें लग सकता है कि तुम तो इस
- 7:04:37प्रॉब्लम को ले सीरियस हो। लेकिन जब तक
- 7:04:41दुनिया के और लोग सीरियस नहीं है और कुछ
- 7:04:44करना नहीं चाहते तो तुम्हारे कुछ करने का
- 7:04:48क्या फायदा?
- 7:04:52मुझे फर्क नहीं पड़ता वह सीरियस हैं या
- 7:04:55नहीं। मैं खुद सीरियस हूं। बस वही काफी
- 7:04:59है। मैं अपने भाई का रक्षक नहीं
- 7:05:05हूं। मैं एक इंसान के रूप में इस वायलेंस
- 7:05:09के सवाल को ले अंदर से स्ट्रांग महसूस
- 7:05:11करता हूं। और मैं यह देखूंगा कि मैं खुद
- 7:05:15वायलेंट ना रहूं।
- 7:05:18लेकिन मैं तुम्हें यह किसी और को नहीं कह
- 7:05:21सकता कि वायलेंट मत बनो। उसका कोई मतलब
- 7:05:25नहीं जब तक तुम खुद नहीं
- 7:05:29चाहते। तो अगर तुम खुद रियली इस वायलेंस
- 7:05:34के प्रॉब्लम को समझना चाहते हो तो चलो हम
- 7:05:38इस सफर को साथ में एक्सप्लोर करते हैं। यह
- 7:05:42वायलेंस का प्रॉब्लम बाहर है या यहां है?
- 7:05:46तुम इस प्रॉब्लम को दुनिया में सॉल्व करना
- 7:05:49चाहते हो या तुम इस क्वेश्चन को खुद के
- 7:05:52अंदर देखना चाहते हो? अगर तुम अपने अंदर
- 7:05:55से फ्री हो वायलेंस से तो फिर सवाल आता है
- 7:05:59मैं कैसे जीूं एक ऐसी दुनिया में जो
- 7:06:03वायलेंस, ग्रीड, लालच, जेलसी और ब्रूटलिटी
- 7:06:09से भरी है। क्या मैं बर्बाद नहीं हो
- 7:06:12जाऊंगा?
- 7:06:13यह सवाल हमेशा पूछा जाता है। लेकिन जब तुम
- 7:06:17ऐसा सवाल पूछते हो तो मुझे लगता है तुम
- 7:06:20वाकई में पीसफुल नहीं जी
- 7:06:24रहे। अगर तुम रियली पीसफुली जीते हो तो
- 7:06:28तुम्हें कोई प्रॉब्लम ही नहीं होती।
- 7:06:31तुम्हें शायद जेल भेज दिया जाए क्योंकि
- 7:06:34तुम आर्मी जॉइ करने से मना करते हो या
- 7:06:37तुम्हें मार दिया जाए क्योंकि तुम फाइट
- 7:06:40करने से इंकार करते हो।
- 7:06:42लेकिन वह प्रॉब्लम नहीं है। तुम बस मार
- 7:06:45दिए
- 7:06:46जाओगे। यह बात समझना बहुत जरूरी है। हम
- 7:06:50वायलेंस को समझने की कोशिश कर रहे हैं एक
- 7:06:53फैक्ट के रूप में ना कि एक आईडिया के रूप
- 7:06:58में। एक फैक्ट जो एक इंसान के अंदर होता
- 7:07:01है और वह इंसान मैं खुद हूं। और इस
- 7:07:05प्रॉब्लम को समझने के लिए मैं खुद के
- 7:07:07सामने बिल्कुल ओपन होना पड़ेगा।
- 7:07:12मुझे खुद को खुद के सामने एक्सपोज करना
- 7:07:15पड़ेगा तुम्हारे सामने नहीं क्योंकि शायद
- 7:07:18तुम इंटरेस्टेड ही ना हो।
- 7:07:22लेकिन मुझे अपने माइंड को ऐसे स्टेट में
- 7:07:24रखना पड़ेगा जहां मैं इस चीज को एंड तक
- 7:07:27देखना चाहूं और कहीं भी रुक ना जाऊं। अब
- 7:07:31मुझे यह बात क्लियर होनी चाहिए कि मैं एक
- 7:07:34वायलेंट इंसान हूं।
- 7:07:38मैंने वायलेंस फील किया है। गुस्से में,
- 7:07:41अपनी सेक्सुअल वांट्स में, नफरत में,
- 7:07:45दुश्मनी बनाने में, जेलसी में और और भी
- 7:07:49चीजों में मैंने इसे महसूस किया है। मैं
- 7:07:52इसे जानता हूं और मैं खुद से कहता हूं।
- 7:07:56मैं इस पूरे प्रॉब्लम को समझना चाहता हूं।
- 7:08:00ना सिर्फ उस हिस्से को जो वॉर में दिखाई
- 7:08:03देता है बल्कि उस अग्रेशन को भी जो इंसान
- 7:08:06में है जो एनिमल्स में भी होता है और
- 7:08:09जिसका मैं भी एक हिस्सा
- 7:08:12हूं। वायलेंस सिर्फ किसी को मार देना नहीं
- 7:08:15होता। वायलेंस तब भी होती है जब हम किसी
- 7:08:20को तीखी बात कह देते हैं। जब हम हाथ से
- 7:08:24किसी को हटाने का इशारा करते
- 7:08:26हैं। जब हम डर के मारे किसी बात को मान
- 7:08:30लेते हैं तो वायलेंस सिर्फ गॉड सोसाइटी या
- 7:08:35कंट्री के नाम पर की गई बड़े लेवल की
- 7:08:38क्लीन नहीं है। वायलेंस बहुत छोटा भी होता
- 7:08:43है। बहुत गहरी होती है और हम उसी गहराई
- 7:08:48में जाने की कोशिश कर रहे
- 7:08:51हैं। जब तुम अपने आप को हिंदू, मुस्लिम,
- 7:08:55क्रिश्चियन,
- 7:08:57यूरोपियन या कुछ और कहते
- 7:09:00हो तो तुम वायलेंट हो जाते हो। समझ रहे हो
- 7:09:05यह वायलेंट क्यों है? क्योंकि तुम खुद को
- 7:09:08बाकी इंसानियत से अलग कर रहे हो।
- 7:09:12जब तुम बिलीफ, नेशन या ट्रेडिशन के जरिए
- 7:09:15खुद को अलग करते हो तो वह वायलेंस पैदा
- 7:09:19करता
- 7:09:21है। तो जो आदमी वायलेंस को समझना चाहता है
- 7:09:25वह किसी कंट्री, रिलीजन, पॉलिटिकल पार्टी
- 7:09:29या किसी भी पार्शियल सिस्टम का हिस्सा
- 7:09:32नहीं होता।
- 7:09:34वह इंसानियत को पूरी तरह समझने में
- 7:09:36इंटरेस्टेड होता है। अब वायलेंस को ले दो
- 7:09:41प्राइमरी स्कूल ऑफ थॉट होते हैं। एक कहता
- 7:09:44है वायलेंस इंसान की नेचर में होती है। और
- 7:09:49दूसरा कहता है वायलेंस सोसाइटी और कल्चर
- 7:09:53की वजह से होती है।
- 7:09:56लेकिन हम यह डिसाइड करने नहीं आए कि हम
- 7:09:58किस स्कूल में हैं। इसका कोई मतलब नहीं।
- 7:10:03जो इंपॉर्टेंट है वह यह फैक्ट है कि हम
- 7:10:06वायलेंट है ना कि इस वायलेंस का रीजन क्या
- 7:10:11है? वायलेंस का सबसे कॉमन रूप होता है
- 7:10:15गुस्सा। जब मेरी बीवी या बहन पर अटैक होता
- 7:10:19है तो मैं कहता हूं कि मैं सही वजह से
- 7:10:21गुस्सा हूं।
- 7:10:23जब मेरे देश पर अटैक होता है, मेरे
- 7:10:25आइडियाज पर, मेरे प्रिंसिपल्स पर, मेरे
- 7:10:28तरीके पर, तब भी मैं कहता हूं मैं सही
- 7:10:33हूं। मैं तब भी गुस्सा होता हूं जब मेरी
- 7:10:36आदतें या मेरी छोटी सोच पर कोई वॉर करता
- 7:10:40है। जब कोई मेरी बात का मजाक उड़ाता है या
- 7:10:44मुझे इंसल्ट करता है, मैं गुस्सा हो जाता
- 7:10:46हूं।
- 7:10:48या अगर कोई मेरी बीवी को ले जाता है और
- 7:10:51मैं जेलस हो जाता हूं तो उस जेलसी को भी
- 7:10:55सही माना जाता है क्योंकि वह मेरी
- 7:10:57प्रॉपर्टी थी और यह सारा गुस्सा मोरल तौर
- 7:11:02पर जस्टिफाई किया जाता है। अपने देश के
- 7:11:06लिए किसी को मारना भी जस्टिफाई किया जाता
- 7:11:09है। तो जब हम गुस्से की बात करते हैं जो
- 7:11:12कि वायलेंस का पार्ट
- 7:11:15है तो क्या हम उसे राइटियस और अनराइचियस
- 7:11:20में डिवाइड करके देखते हैं सही और गलत में
- 7:11:24अपने एनवायरमेंट और सोच के हिसाब
- 7:11:27से या हम बस गुस्से को गुस्सा ही देखते
- 7:11:30हैं क्या कभी कोई सही गुस्सा होता है या
- 7:11:35सिर्फ गुस्सा ही होता
- 7:11:37है कोई अच्छा इनफ्लु
- 7:11:40या बेकार इनफ्लुएंस नहीं होता। सिर्फ
- 7:11:42इनफ्लुएंस होता है। लेकिन जब कोई
- 7:11:45इनफ्लुएंस मुझे सूट नहीं करता तो मैं कहता
- 7:11:48हूं कि वह बुरा है। वह बेकार
- 7:11:53है। जब तुम अपने परिवार, अपने देश, एक
- 7:11:57झंडे के टुकड़े, एक बिलीफ, एक आईडिया, एक
- 7:12:00डोगमा, किसी चीज को प्रोटेक्ट करते हो तो
- 7:12:04वह प्रोटेक्शन खुद एक इंडिकेशन है गुस्से
- 7:12:07का।
- 7:12:10तो क्या तुम गुस्से को बिना किसी
- 7:12:12एक्सप्लेनेशन के देख सकते हो? बिना यह
- 7:12:15सोचे कि मुझे
- 7:12:17अपना सामान बचाना
- 7:12:21था या मैं ठीक था गुस्सा होने में या मैं
- 7:12:26कितना बेवकूफ था गुस्सा होकर? क्या तुम
- 7:12:29गुस्से को एक अलग एंटिटी की तरह देख सकते
- 7:12:32हो? बिल्कुल ऑब्जेक्टिव तरीके से। ना उसका
- 7:12:36सपोर्ट करते हुए ना उसको रिजेक्ट करते
- 7:12:39हुए क्या तुम कर सकते
- 7:12:43हो? क्या मैं तुम्हें देख सकता हूं? जब
- 7:12:47मैं तुमसे नफरत करता हूं या सोचता हूं कि
- 7:12:50तुम बहुत अच्छे हो। मैं तुम्हें तभी देख
- 7:12:54सकता हूं जब मैं तुम्हें एक ऐसे नजरिए से
- 7:12:56देखता हूं जिसमें ना प्यार हो ना नफरत।
- 7:13:01अब क्या मैं गुस्से को भी वैसे ही देख
- 7:13:04सकता हूं? इसका मतलब यह है कि मैं उस
- 7:13:08प्रॉब्लम के लिए ओपन हूं। उसको रोक नहीं
- 7:13:11रहा
- 7:13:12हूं। मैं इस अजीब सी चीज को बिना रिएक्शन
- 7:13:16के ऑब्जर्व कर रहा हूं। गुस्से को बिना
- 7:13:19फीलिंग के देखना बहुत मुश्किल है। क्योंकि
- 7:13:22वह मेरा ही एक पार्ट है।
- 7:13:26लेकिन मैं कोशिश यही कर रहा हूं। यहां मैं
- 7:13:29हूं एक वायलेंट इंसान। चाहे मैं काले रंग
- 7:13:34का हूं, भूरा, गोरा या
- 7:13:37बैंगनी। मुझे इस बात से मतलब नहीं कि यह
- 7:13:40वायलेंस मैंने अपने जींस से ली है या
- 7:13:43सोसाइटी ने मुझ में डाली है। मुझे सिर्फ
- 7:13:47इस बात से मतलब है कि क्या मैं इससे फ्री
- 7:13:50हो सकता हूं या नहीं।
- 7:13:54वायलेंस से फ्री होना मेरे लिए सबसे
- 7:13:56इंपॉर्टेंट है। यह मेरे लिए सेक्स, खाना
- 7:14:00या पोजीशन से भी ज्यादा इंपॉर्टेंट
- 7:14:04है। क्यों यह चीज मुझे अंदर से खराब कर
- 7:14:07रही है? यह मुझे बर्बाद कर रही है। दुनिया
- 7:14:11को भी और मैं इसे समझना चाहता
- 7:14:15हूं। इसके पार जाना चाहता हूं। मैं महसूस
- 7:14:19करता हूं कि दुनिया में जितनी भी वायलेंस
- 7:14:22और गुस्सा है उसके लिए मैं जिम्मेदार हूं।
- 7:14:26मैं महसूस करता हूं यह सिर्फ शब्द नहीं
- 7:14:29है। और मैं खुद से कहता
- 7:14:32हूं मैं तभी कुछ कर सकता हूं जब मैं खुद
- 7:14:36गुस्से के पार हो
- 7:14:38जाऊं। वायलेंस के पार, नेशनलिटी के पार।
- 7:14:42और यह जो फीलिंग है कि मुझे अपने अंदर की
- 7:14:46वायलेंस को समझना है। यह मुझे एक जबरदस्त
- 7:14:49एनर्जी और पैशन देती है सच जानने के लिए।
- 7:14:54लेकिन वायलेंस के पार जाने के लिए मैं उसे
- 7:14:57दबा नहीं
- 7:14:59सकता। मैं उसे इग्नोर नहीं कर सकता। मैं
- 7:15:02यह नहीं कह सकता कि यह मेरा हिस्सा है और
- 7:15:07क्या? या मुझे यह नहीं चाहिए। मुझे उसे
- 7:15:11देखना पड़ेगा। उसे स्टडी करना
- 7:15:14पड़ेगा। उसे बहुत क्लोज से समझना पड़ेगा।
- 7:15:18और मैं तभी क्लोज हो सकता हूं जब मैं उसे
- 7:15:21ना जज करूं ना जस्टिफाई।
- 7:15:25लेकिन हम हमेशा जज या जस्टिफाई करते हैं।
- 7:15:29इसलिए मैं कह रहा हूं अभी के लिए जज करना
- 7:15:32और जस्टिफाई करना बंद करो। अब अगर तुम
- 7:15:36वायलेंस खत्म करना चाहते हो। अगर तुम वॉर
- 7:15:40खत्म करना चाहते हो तो तुम इसमें कितना
- 7:15:44अपना दिल और दिमाग लगाते हो। क्या यह
- 7:15:47तुम्हारे लिए इंपॉर्टेंट है कि तुम्हारे
- 7:15:49बच्चे मार दिए जाते हैं। तुम्हारे बेटे
- 7:15:53आर्मी में भेजे जाते हैं जहां उनके साथ
- 7:15:55जुल्म होता
- 7:15:57है। क्या तुम्हें फर्क पड़ता है? अगर यह
- 7:16:01तुम्हें छू भी नहीं रही तो फिर क्या चीज
- 7:16:04तुम्हारे लिए मैटर करती है? अपना पैसा,
- 7:16:07पार्टी,
- 7:16:09ड्रग्स। क्या तुम नहीं देखते कि तुम्हारे
- 7:16:12अंदर की यह वायलेंस तुम्हारे बच्चों को
- 7:16:14बर्बाद कर रही
- 7:16:16है? या तुम इसे सिर्फ एक थ्यरी समझ रहे
- 7:16:19हो। ठीक है? अगर तुम इंटरेस्टेड हो तो
- 7:16:23अपना पूरा दिल और दिमाग इसमें लगा दो और
- 7:16:25जानने की कोशिश
- 7:16:27करो। बस ऐसे पीछे मत बैठो और बोलो। अच्छा
- 7:16:32हमें सब कुछ समझाओ।
- 7:16:34मैं तुम्हें यह पॉइंट आउट कर रहा हूं कि
- 7:16:37तुम गुस्से को या वायलेंस को तब तक नहीं
- 7:16:40देख सकते जब तक तुम उसे जज करते हो या
- 7:16:45जस्टिफाई करते
- 7:16:47हो। और जब तक तुम्हारे लिए यह एक बर्निंग
- 7:16:51प्रॉब्लम नहीं है, तुम उन दोनों चीजों को
- 7:16:53छोड़ ही नहीं सकते। तो सबसे पहले तुम्हें
- 7:16:57सीखना होगा। तुम्हें सीखना होगा कि गुस्से
- 7:17:00को कैसे देखा जाए। अपने हस्बैंड, अपने
- 7:17:03वाइफ, अपने बच्चों को कैसे देखा
- 7:17:07जाए? तुम्हें पॉलिटिशियन को सुनना होगा और
- 7:17:10यह भी समझना होगा कि तुम ऑब्जेक्टिव क्यों
- 7:17:13नहीं हो सकते। तुम क्यों जज करते हो? तुम
- 7:17:16क्यों जस्टिफाई करते हो। तुम्हें यह सीखना
- 7:17:20पड़ेगा कि जज करना और जस्टिफाई करना
- 7:17:25तुम्हारे सोशल स्ट्रक्चर का हिस्सा
- 7:17:28है। तुम्हारे कंडीशनिंग का रिजल्ट है।
- 7:17:31चाहे तुम जर्मन हो, इंडियन हो, नेग्रो हो
- 7:17:35या अमेरिकन जो भी हो और यह कंडीशनिंग
- 7:17:39तुम्हारा माइंड स्लो और डल बना देती
- 7:17:44है। सीखने के लिए कुछ असली और गहरा समझने
- 7:17:48के लिए तुम्हारे पास इतनी कैपेसिटी होनी
- 7:17:51चाहिए कि तुम उस चीज में गहरा जा
- 7:17:54सको। अगर तुम्हारा टूल ब्लंट
- 7:17:59है दिमाग डल है तो तुम गहरा जा ही नहीं
- 7:18:04सकते। तो जो हम कर रहे हैं वह है अपने
- 7:18:07दिमाग को तेज बनाना।
- 7:18:10वह दिमाग जो हर वक्त जस्टिफाई करता है,
- 7:18:13कंडेम करता है और इसी वजह से डल हो गया
- 7:18:18है। तुम तभी गहरा जा सकते हो जब तुम्हारा
- 7:18:22दिमाग एक सुई की तरह तेज हो और हीरे की
- 7:18:25तरह स्ट्रांग
- 7:18:27हो। सिर्फ पीछे बैठ के यह पूछना कि मुझे
- 7:18:31ऐसा दिमाग कैसे मिलेगा किसी काम का नहीं।
- 7:18:35तुम्हें उस दिमाग की वैसे ही भूख होनी
- 7:18:38चाहिए
- 7:18:40जैसे खाने
- 7:18:43की। और अगर तुम्हें वाकई चाहिए तो तुम्हें
- 7:18:47यह देखना पड़ेगा कि तुम्हारा दिमाग डल
- 7:18:50क्यों है? वह डल इसलिए है क्योंकि उसने
- 7:18:53खुद के आसपास एक दीवाल बना ली है जो कि
- 7:18:57कंडेमिनेशन और जस्टिफिकेशन का हिस्सा है।
- 7:19:01अगर दिमाग इन चीजों से फ्री हो जाए तो तुम
- 7:19:04देख सकते हो, पढ़ सकते हो, गहरा जा सकते
- 7:19:08हो। और हो सकता है तुम पूरे प्रॉब्लम को
- 7:19:11एकदम क्लियरली समझ जाओ।
- 7:19:14चलो अब वापस उस मेन मुद्दे पर आते
- 7:19:18हैं। क्या अपने अंदर से वायलेंस को पूरी
- 7:19:21तरह मिटा पाना मुमकिन
- 7:19:24है? यह भी एक तरह की वायलेंस है जब हम
- 7:19:28कहते हैं तुम बदले नहीं। तुम क्यों नहीं
- 7:19:31बदले? मैं ऐसा नहीं कह रहा
- 7:19:34हूं। मेरा तुम्हें कुछ भी प्रूफ करना
- 7:19:37इंपॉर्टेंट नहीं है। यह तुम्हारी लाइफ है।
- 7:19:40मेरी नहीं। तुम कैसे जीते हो? यह तुम्हारा
- 7:19:44काम है। मैं सिर्फ यह पूछ रहा
- 7:19:47हूं क्या एक इंसान जो किसी भी सोसाइटी में
- 7:19:51साइकोलॉजिकली जी रहा है, क्या वह अपने
- 7:19:54अंदर से वायलेंस को हटा सकता है? अगर हां,
- 7:19:58तो यह प्रोसेस ही एक नए जीने का तरीका ला
- 7:20:01सकता है। हम में से ज्यादा लोगों ने
- 7:20:05वायलेंस को एक नॉर्मल लाइफ का हिस्सा मान
- 7:20:07लिया है। दो भयानक वर्ल्ड वॉारर्स ने हमें
- 7:20:11कुछ नहीं सिखाया।
- 7:20:15सिर्फ यह सिखाया कि इंसानों के बीच और भी
- 7:20:18ज्यादा दीवार कैसे बनाई जाए। लेकिन अगर हम
- 7:20:21में से कुछ लोग वायलेंस से छुटकारा पाना
- 7:20:25चाहते हैं तो यह कैसे
- 7:20:30होगा? मुझे नहीं लगता कि कोई एनालिसिस
- 7:20:33चाहे हम खुद करें या किसी प्रोफेशनल से
- 7:20:36करवाएं। कुछ खास हेल्प करेगा।
- 7:20:40शायद थोड़ा सा हम बदल जाए, थोड़ा शांत हो
- 7:20:43जाए, थोड़ा प्यार बढ़ जाए,
- 7:20:48लेकिन इससे पूरी तस्वीर नहीं मिलेगी।
- 7:20:51लेकिन एनालिसिस का प्रोसेस भी जरूरी है।
- 7:20:55क्योंकि इस प्रोसेस में तुम्हारा दिमाग
- 7:20:57एकदम शार्प बन जाता है और यह शार्पनेस, यह
- 7:21:02अटेंशन, यह सीरियसनेस ही है जो तुम्हें
- 7:21:05एकदम साफ नजर दे सकती है।
- 7:21:09ज्यादा लोग एक ही नजर में पूरी बात नहीं
- 7:21:12देख पाते। लेकिन क्लेरिटी तभी आती है जब
- 7:21:15तुम डिटेल्स को देखते हो और फिर एक छलांग
- 7:21:18मारते हो। कुछ लोगों ने नॉन वायलेंस का
- 7:21:22कांसेप्ट बनाया ताकि वायलेंस से छुटकारा
- 7:21:26मिले। लेकिन नॉन वायलेंस भी एक आइडियल है।
- 7:21:30और जब तक हम आइडियल के साथ जीते हैं तब तक
- 7:21:34हम असली चीज से दूर हैं। हमें कितने ही
- 7:21:38आइडियल्स मिल चुके हैं। सभी होली बुक्सों
- 7:21:41से भरे पड़े हैं। लेकिन हम अभी भी वायलेंट
- 7:21:45ही
- 7:21:47है। तो क्यों ना वायलेंस को सीधा देखें और
- 7:21:51नॉन वायलेंस शब्द को भूल जाए।
- 7:21:54अगर तुम्हें असली को समझना है तो तुम्हें
- 7:21:57अपना पूरा ध्यान पूरी एनर्जी उसमें लगानी
- 7:21:59पड़ेगी और जब तक तुम आइडियल वर्ल्ड बना
- 7:22:02लेते
- 7:22:04हो तो तुम्हारा ध्यान भटक जाता है तो क्या
- 7:22:09तुम आइडियल को कंप्लीटली हटा सकते
- 7:22:12हो? जो आदमी वाकई सीरियस है जो सच या
- 7:22:16प्यार समझना चाहता है उसके पास कोई
- 7:22:19कांसेप्ट नहीं होता। वह सिर्फ जो है उसी
- 7:22:23में जीता
- 7:22:24है। अपने गुस्से को समझने के लिए तुम्हें
- 7:22:27उस पर कोई जजमेंट नहीं देना होगा। क्योंकि
- 7:22:31जैसे ही तुम उसका ऑोजिट सोचते हो तुम उसे
- 7:22:34कंडेम करते हो और फिर तुम उसे वैसे देख ही
- 7:22:38नहीं सकते जैसे वह
- 7:22:41है। जब तुम कहते हो तुम किसी से नफरत करते
- 7:22:44हो तो वह एक फैक्ट है। चाहे वह सुनने में
- 7:22:48बुरा लगे। अगर तुम उसे ध्यान से देखोगे,
- 7:22:52गहरा जाओगे तो वह खत्म हो जाएगा।
- 7:22:56लेकिन अगर तुम कहते हो मुझे नफरत नहीं
- 7:22:59करनी चाहिए। मुझे अपने दिल में प्यार रखना
- 7:23:02चाहिए। तो तुम एक झूठी दुनिया में जी रहे
- 7:23:05हो। जहां डबल स्टैंडर्ड्स होते हैं। पूरी
- 7:23:11तरह प्योर मोमेंट में जीना। मतलब जो है
- 7:23:14उसी में जीना।
- 7:23:16बिना किसी कंडमिनेशन के, बिना किसी
- 7:23:19जस्टिफिकेशन
- 7:23:21के और तब तुम उसे पूरी तरह समझ जाते हो और
- 7:23:26वह समझ लेना ही उसका अंत
- 7:23:29है। उसका
- 7:23:31एंड जब तुम क्लियरली देख लेते हो तो
- 7:23:35प्रॉब्लम सॉल्व हो जाती है। लेकिन क्या
- 7:23:37तुम वायलेंस का चेहरा क्लियरली देख सकते
- 7:23:40हो? सिर्फ बाहर का नहीं अंदर का भी। और
- 7:23:43इसका मतलब यह है कि तुम अंदर से पूरी तरह
- 7:23:47फ्री हो जाते हो वायलेंस
- 7:23:49से क्योंकि तुमने कोई आईडियोलॉजी एक्सेप्ट
- 7:23:53ही नहीं की जिसके जरिए तुम उससे छुटकारा
- 7:23:57पाते। यह बहुत गहरी मेडिटेशन मांगता है।
- 7:24:01सिर्फ शब्दों का हां ना
- 7:24:05नहीं। अभी तुमने एक सीरीज ऑफ स्टेटमेंट्स
- 7:24:08पढ़ लिए हैं। लेकिन क्या तुमने वाकई समझा
- 7:24:11है?
- 7:24:12तुम्हारा कंडीशन माइंड, तुम्हारी जीने की
- 7:24:16आदतें, तुम्हारा पूरा सोशल स्ट्रक्चर
- 7:24:20तुम्हें रोकता है फैक्ट को देखने से और
- 7:24:23तुरंत फ्री होने से। तुम कहते हो मैं इस
- 7:24:26पर सोचूंगा। देखूंगा कि क्या वायलेंस से
- 7:24:30फ्री होना पॉसिबल है या नहीं। मैं ट्राई
- 7:24:34करूंगा। यह सबसे खतरनाक बात है। मैं ट्राई
- 7:24:39करूंगा। कोई ट्राई नहीं होता। या तो तुम
- 7:24:42करते हो या नहीं
- 7:24:44करते। जब घर जल रहा हो तब तुम यह नहीं
- 7:24:48देखते। चलो सोच के देखते हैं किलॉजी से
- 7:24:52पानी डाला
- 7:24:54जाए। घर जल रहा है तुम्हारा दुनिया का और
- 7:24:58तुम कहते हो मैं सोचता हूं कौन सी थ्योरी
- 7:25:01बेस्ट है आग बुझाने के लिए। जब घर में आग
- 7:25:04लगी हो तो तुम पानी
- 7:25:07लाए आदमी के बालों का रंग नहीं पूछते।
- 7:25:11अगर हम सच में ट्रुथ तक पहुंचना चाहते हैं
- 7:25:15तो ना तो दबाने की तकलीफें और ना ही किसी
- 7:25:19पैटर्न में फिट होने वाली कठोर डिसिप्लिन
- 7:25:22हमें वहां ली जा सकती है।
- 7:25:25ट्रुथ तक तभी पहुंचा जा सकता है सच तक।
- 7:25:29तभी पहुंचा जा सकता है जब दिमाग बिल्कुल
- 7:25:32आजाद हो बिना किसी तोड़ो के।
- 7:25:36लेकिन सबसे पहले यह पूछना चाहिए कि क्या
- 7:25:39हम वाकई आजाद होना चाहते
- 7:25:43हैं। जब हम आजादी की बात करते हैं तो क्या
- 7:25:46हम पूरी आजादी की बात कर रहे हैं या सिर्फ
- 7:25:50उन चीजों से आजादी चाहते हैं जो हमें
- 7:25:52तकलीफ देती हैं जो अच्छी नहीं
- 7:25:56लगती। हम अपने दर्दनाक और बुरे यादों से
- 7:25:59तो छुटकारा चाहते हैं लेकिन अपने मजेदार
- 7:26:03सुखद आइडियाज, फार्मूलाज और रिश्ते रखना
- 7:26:07चाहते हैं।
- 7:26:10लेकिन सिर्फ एक को रखना और दूसरे से
- 7:26:13छुटकारा पाना मुमकिन नहीं। क्योंकि जैसे
- 7:26:16हमने देखा सुख और दुख अलग नहीं
- 7:26:20होते। तो हर एक को यह फैसला लेना है कि
- 7:26:24क्या वह पूरी तरह आजाद होना चाहता है या
- 7:26:27नहीं? अगर हां, तो हमें आजादी के स्वभाव
- 7:26:32और ढांचे को समझना होगा।
- 7:26:36क्या यह आजादी होती है जब तुम किसी चीज से
- 7:26:39आजाद हो जाते हो जैसे दर्द से या किसी
- 7:26:42चिंता से या क्या आजादी एक अलग ही चीज है
- 7:26:47मान लो तुम जलन से आजाद हो गए
- 7:26:51लेकिन क्या यह आजादी एक रिएक्शन नहीं है
- 7:26:54और अगर रिएक्शन है तो क्या यह सच में
- 7:26:56आजादी
- 7:26:57है? तुम किसी डॉग्मा से आजाद हो सकते हो।
- 7:27:01उसे एनालाइज करके या बस उससे निकल के
- 7:27:07लेकिन उस आजादी के पीछे का मोटिव एक और
- 7:27:09रिएक्शन बन जाता है। शायद तुम इसलिए आजाद
- 7:27:13हुए हो क्योंकि वह डॉग्मा अब ट्रेंड ही
- 7:27:15नहीं रहा या कन्वीनिएंट नहीं
- 7:27:19था या तुम नेशनलिज्म से आजाद हो गए हो
- 7:27:22क्योंकि तुम इंटरनेशनलिज्म में विश्वास
- 7:27:25रखते हो या तुम्हें लगता है कि आज की
- 7:27:28इकॉनमी में नेशनलिस्टिक सोच का कोई मतलब
- 7:27:32नहीं।
- 7:27:33तुम उसे आराम से साइड में कर देते
- 7:27:36हो या तुम किसी स्पिरिचुअल या पॉलिटिकल
- 7:27:40लीडर के खिलाफ हो गए हो जो तुम्हें
- 7:27:43डिसिप्लिन या रिवोल्ट के जरिए आजादी देने
- 7:27:45का वादा करता है
- 7:27:48लेकिन क्या यह सब रैशनलिज्म या लॉजिकल
- 7:27:51कंक्लूजन का किसी भी असली आजादी से लेना
- 7:27:54देना है अगर तुम कहते हो कि तुम किसी चीज
- 7:27:58से आजाद हो तो यह सिर्फ एक रिएक्शन है
- 7:28:03जो फिर एक और रिएक्शन बन जाता है और फिर
- 7:28:07एक और कंफर्मिटी बनाता
- 7:28:10है और एक और डोमिनेशन का फॉर्म ले लेता
- 7:28:14है। ऐसे तुम एक रिएक्शन के चैन में फंसे
- 7:28:18रहते हो और हर एक रिएक्शन को आजादी मान
- 7:28:21लेते हो। लेकिन यह आजादी नहीं है। यह
- 7:28:25सिर्फ एक मॉडिफाइड पास्ट का कंटिन्यूएशन
- 7:28:28है जिसे दिमाग छोड़ता नहीं।
- 7:28:32आज की यंग जनरेशन जैसे हर जमाने के यंग
- 7:28:36लोग सोसाइटी के खिलाफ रिवोल्ट में है और
- 7:28:40यह अपने आप में अच्छी बात है लेकिन
- 7:28:43रिवोल्ट आजादी नहीं है क्योंकि जब तुम
- 7:28:46रिवोल्ट करते हो तो वह एक रिएक्शन होता है
- 7:28:49और वह रिएक्शन अपना खुद का पैटर्न बनाता
- 7:28:52है और तुम उस पैटर्न में फिर से फंस जाते
- 7:28:56हो। तुम्हें लगता है कि यह कुछ नया है।
- 7:29:01लेकिन यह वही पुराना है एक नए शेप
- 7:29:04में। कोई भी सोशल या पॉलिटिकल रिवोल्ट
- 7:29:08आखिर में वही पुरानी बोरवा मेंटालिटी ले
- 7:29:12आता
- 7:29:15है। आजादी तभी आती है जब तुम देखते हो और
- 7:29:18एक्शन लेते हो। कभी भी रिवोल्ट के जरिए
- 7:29:21नहीं। वह देखना ही एक्शन है और वह एक्शन
- 7:29:25उठाना ही तुरंत होता है जितना किसी डेंजर
- 7:29:29को देखकर रिएक्ट
- 7:29:31करना। तब ना तो तुम सोचते हो ना डिस्कशन
- 7:29:36करते हो ना रुकते हो।
- 7:29:39डेंजर ही तुमसे एक्शन करवाता है। इसलिए
- 7:29:42देखना ही एक्शन है और एक्शन ही आजादी है।
- 7:29:46आजादी एक माइंड स्टेट है। किसी चीज से
- 7:29:49आजादी नहीं। बल्कि एक ऐसी फीलिंग जो हर
- 7:29:52चीज पर डाउट कर सके, हर चीज को क्वेश्चन
- 7:29:55कर
- 7:29:56सके। जो इतनी इंटेंस हो, एक्टिव हो कि हर
- 7:30:01तरह की डिपेंडेंस, स्लेवरी, कनंफर्मिटी और
- 7:30:05एक्सेप्टेंस को छोड़
- 7:30:06दे। ऐसी आजादी का मतलब है बिल्कुल अकेला
- 7:30:10होना। लेकिन क्या एक ऐसा
- 7:30:13दिमाग जो पूरे एनवायरमेंट और अपने
- 7:30:16टेंडेंसीज पर डिपेंडेंट रहा हो। कभी उस
- 7:30:19पूरी आजादी को पा सकता है जिसमें अकेलापन
- 7:30:22हो। जिसमें ना कोई लीडर हो ना ट्रेडिशन ना
- 7:30:28अथॉरिटी। यह अकेलापन एक अंदर की स्टेट है
- 7:30:32जो किसी स्टिमुलस किसी नॉलेज पर डिपेंडेंट
- 7:30:35नहीं है। और ना ही किसी एक्सपीरियंस या
- 7:30:39कंक्लूजन का नतीजा है। हम में से ज्यादातर
- 7:30:43लोग अंदर से कभी अकेले नहीं होते।
- 7:30:45आइसोलेशन और अकेलेपन में फर्क
- 7:30:51है। हम सब जानते हैं आइसोलेशन क्या होता
- 7:30:54है? खुद के चारों ओर दीवार बनाना ताकि कोई
- 7:30:58हर्ट ना करे। वनरेबल ना फील हो या
- 7:31:03डिअचमेंट को कल्टीवेट करना जो एक और तरह
- 7:31:06का दर्द है। या किसी ड्रीमी आईडियोलॉजी के
- 7:31:10आईवरी टावर में जीना। लेकिन अकेलापन एक
- 7:31:15बिल्कुल अलग चीज है।
- 7:31:18अलोननेस। तुम कभी अकेले नहीं होते क्योंकि
- 7:31:21तुम पूरी यादों, कंडीशनिंग और कल के
- 7:31:24मटरिंग से भरे होते
- 7:31:26हो। तुम्हारा दिमाग कभी भी उस सारी बकवास
- 7:31:30से साफ नहीं होता। जो उसने इकट्ठा कर रखी
- 7:31:34हैं। अकेलापन चाहिए तो तुम्हें पास्ट से
- 7:31:37मरना होगा।
- 7:31:39जब तुम अकेले होते हो बिल्कुल अकेले ना
- 7:31:42किसी फैमिली से ना किसी कंट्री से ना किसी
- 7:31:46कल्चर ना किसी कॉन्टिनेंट से जुड़े
- 7:31:49हुए तो एक आउटसाइडर होने का फीलिंग आता
- 7:31:53है। जो इंसान इस तरीके से अकेला होता है
- 7:31:55वह इनोसेंट होता है और वही इनोसेंस दिमाग
- 7:32:00को दुख से आजाद करता
- 7:32:02है। हम अपने साथ ले चलते हैं हजारों लोगों
- 7:32:06की बातें और अपने सब मिसफॉर्चूंस की
- 7:32:10यादें उस सबको पूरी तरह छोड़ देना मतलब
- 7:32:14अकेला
- 7:32:15होना और जो दिमाग अकेला होता है वह सिर्फ
- 7:32:18इनोसेंट ही नहीं बल्कि यंग भी होता है ना
- 7:32:23उम्र के सेंस में ना समय के बल्कि हर वक्त
- 7:32:26यंग इनोसेंट और
- 7:32:29जिंदा और सिर्फ ऐसा दिमाग ही वह देख सकता
- 7:32:32है जो सच है वह जो किसी शब्द से नापा नहीं
- 7:32:36जा सकता
- 7:32:39इस अकेलेपन में तुम यह समझना शुरू करते हो
- 7:32:42कि जिंदगी क्या है? खुद के साथ जीना जैसे
- 7:32:45तुम वाकई हो। ना कि जैसे तुम्हें लगता है
- 7:32:49कि तुम्हें होना चाहिए या जैसे तुम पहले
- 7:32:52थे। देखो क्या तुम खुद को देख सकते हो
- 7:32:57बिना झूठी मोस्टी के, बिना किसी डर के,
- 7:33:00बिना किसी जस्टिफिकेशन या कंडेमिनेशन के।
- 7:33:05सिर्फ वैसे ही जीना जैसे तुम
- 7:33:08हो। जब तुम किसी चीज के साथ गहरा रिश्ता
- 7:33:12बना लेते हो तभी उसे समझना शुरू करते हो।
- 7:33:16लेकिन जैसे ही तुम उसकी आदत डाल जाते
- 7:33:19हो। जैसे अपनी चिंता या जलन या जो भी
- 7:33:24हो तो तुम उसके साथ जी नहीं रहे होते।
- 7:33:29जैसे अगर तुम किसी नदी के पास रहते हो तो
- 7:33:32कुछ दिन बाद उसके पानी की आवाज सुनाई देना
- 7:33:36बंद हो जाती है। या अगर तुम्हारे कमरे में
- 7:33:39कोई तस्वीर है जो तुम रोज देखते हो तो एक
- 7:33:43हफ्ते बाद तुम उसे देखना बंद कर देते हो।
- 7:33:46पहाड़ों, घाटियों, पेड़ों के साथ भी ऐसा
- 7:33:50ही होता
- 7:33:51है। तुम्हारे फैमिली, पति, पत्नी के साथ
- 7:33:55भी।
- 7:33:57लेकिन अगर तुम जलन, चिंता, ईर्ष्या जैसी
- 7:34:01किसी चीज के साथ जीते हो तो तुम्हें कभी
- 7:34:04उसकी आदत नहीं पड़नी
- 7:34:06चाहिए। कभी उसे एक्सेप्ट नहीं करना
- 7:34:11चाहिए। तुम्हें उसकी देखभाल करनी होगी।
- 7:34:14जैसे एक नई लगाई गई पेड़ की करते हो। उसे
- 7:34:18सूरज से तूफानों से बचाते हो। तुम्हें
- 7:34:22उसकी देखभाल करनी चाहिए ना कि उसे कंडेम
- 7:34:26या
- 7:34:27जस्टिफाई। और जब तुम उसकी देखभाल करते हो,
- 7:34:31तुम उसे प्यार करना शुरू करते हो। जब तुम
- 7:34:35उसकी परवाह करते हो, तुम प्यार करना सीख
- 7:34:38रहे हो। यह नहीं कि तुम ईर्ष्या या चिंता
- 7:34:43से प्यार कर रहे हो। जैसे कई लोग करते
- 7:34:46हैं। बल्कि तुम सिर्फ ऑब्जर्व कर रहे हो।
- 7:34:49ध्यान से देख रहे हो। तो क्या तुम और मैं
- 7:34:54जी सकते हैं वैसे जैसे हम वाकई
- 7:34:58हैं। जानते हुए कि हम बोर हैं,
- 7:35:03ईर्षालु हैं, डरे हुए हैं। समझते हैं कि
- 7:35:08हम में प्यार भरा है जबकि नहीं
- 7:35:12है। आसानी से हर्ट हो जाते हैं। आसानी से
- 7:35:15खुश हो जाते हैं। क्या हम इस सब के साथ जी
- 7:35:19सकते हैं? ना उसे एक्सेप्ट करते हुए ना ही
- 7:35:23उसे इंकार करते हुए सिर्फ देखते हुए बिना
- 7:35:27डिप्रेसिव या ओवरली हैप्पी
- 7:35:29हुए। अब चलो एक और सवाल पूछते हैं। क्या
- 7:35:33यह आजादी यह अकेलापन जो हमारे अंदर के
- 7:35:36स्ट्रक्चर से मिलने का रास्ता है? क्या यह
- 7:35:39टाइम के थ्रू मिलता है? मतलब क्या आजादी
- 7:35:43ग्रेजुअली मिलती है? बिल्कुल नहीं।
- 7:35:47क्योंकि जैसे ही तुम टाइम इंट्रोड्यूस
- 7:35:49करते हो, तुम अपने आप को और ज्यादा बंधन
- 7:35:53में बांध देते
- 7:35:54हो। तुम धीरे-धीरे आजाद नहीं हो सकते। यह
- 7:35:58टाइम का खेल नहीं है। अगला सवाल क्या तुम
- 7:36:01उस आजादी को महसूस कर सकते हो? अगर तुम
- 7:36:04कहते हो मैं आजाद हूं तो तुम आजाद नहीं
- 7:36:08हो। जैसे कोई बोले मैं खुश हूं।
- 7:36:13उस मोमेंट वह खुशी याद बन गई कुछ जो जा
- 7:36:18चुकी है। आजादी सिर्फ तब आती है जब तुम
- 7:36:22नेचुरली उस पर आते हो ना कि चाहने, मांगने
- 7:36:26या तरसने
- 7:36:30से। और तुम उसे उस तस्वीर के जरिए भी नहीं
- 7:36:34पा सकते जो तुमने अपने दिमाग में उसकी
- 7:36:37बनाई है आजादी पाने के लिए।
- 7:36:41दिमाग को सीखना होगा। कैसे देखना है
- 7:36:44जिंदगी को जो एक बड़ा सा चलती रहती हलचल
- 7:36:48है बिना टाइम के बंधन के क्योंकि आजादी
- 7:36:52कॉन्शियसनेस के फील्ड के परे होती
- 7:36:56है। रिश्तों में सुरक्षा चाहना ही दुख और
- 7:37:00डर का कारण बन जाता है। यह सुरक्षा ढूंढना
- 7:37:04ही इनसिक्योरिटी को बुलाता है। क्या तुमने
- 7:37:08कभी किसी रिश्ते में सुरक्षा पाई है कभी?
- 7:37:13ज्यादातर लोग चाहते हैं कि किसी से प्यार
- 7:37:16करें और उनसे प्यार किया जाए।
- 7:37:19लेकिन क्या यह प्यार होता है जब हर कोई
- 7:37:22अपनी ही सुरक्षा अपना ही रास्ता ढूंढ रहा
- 7:37:25होता
- 7:37:26है। हमें प्यार नहीं मिलता क्योंकि हम
- 7:37:29प्यार करना जानते ही नहीं। प्यार क्या है?
- 7:37:35यह शब्द इतना भर गया है, इतना बिगड़ चुका
- 7:37:38है कि मुझे इससे कहना भी अच्छा नहीं लगता।
- 7:37:42हर कोई प्यार की बात करता है। हर मैगजीन,
- 7:37:45न्यूज़पेपर, मिशनरी बस प्यार प्यार
- 7:37:49प्यार। मैं अपने देश से प्यार करता हूं।
- 7:37:52अपने राजा से, किसी किताब से, उस पहाड़
- 7:37:56से, मजे से, अपनी बीवी से और भगवान से भी।
- 7:38:00क्या प्यार एक आईडिया है? अगर है तो उसे
- 7:38:04कल्टीवेट किया जा सकता है। नरिश किया जा
- 7:38:07सकता है। घुमा फिरा के बदला जा सकता
- 7:38:10है। जब तुम कहते हो मैं भगवान से प्यार
- 7:38:14करता हूं तो इसका मतलब होता है कि तुम
- 7:38:17अपने ही दिमाग के प्रोजेक्शन से प्यार कर
- 7:38:20रहे हो। तुम्हारा खुद का
- 7:38:22इमेज। जो तुमने रिस्पेक्टेबल और होली का
- 7:38:26रूप दे दिया है। तो कहना मैं भगवान से
- 7:38:30प्यार करता हूं। एकदम बकवास है। जब तुम
- 7:38:33भगवान को पूजते हो, तुम अपने आप को पूज
- 7:38:37रहे हो और यह प्यार नहीं होता। क्योंकि हम
- 7:38:41इस इंसानी चीज जिसे प्यार कहते हैं, इसको
- 7:38:44समझ नहीं
- 7:38:46पाते। तो हम भाग जाते हैं उससे
- 7:38:49अब्स्ट्रक्शंस में। शायद प्यार ही एक
- 7:38:52आखिरी स्यूशन हो इंसान के सब प्रॉब्लम्स,
- 7:38:56तकलीफों और मुश्किलों का।
- 7:39:00तो फिर हम कैसे जानेंगे कि प्यार क्या है?
- 7:39:03सिर्फ डिफाइन
- 7:39:06करके। चर्च ने एक तरीके से डिफाइन किया।
- 7:39:09सोसाइटी ने दूसरे तरीके से और हर तरह के
- 7:39:12ट्विस्ट और टर्न दिए हैं। किसी को पूछना,
- 7:39:17किसी के साथ सोना, इमोशनल एक्सचेंज,
- 7:39:21कंपैनियनशिप। क्या यही प्यार है?
- 7:39:26यही नॉर्म बना हुआ है। यही पैटर्न और यह
- 7:39:30इतना पर्सनल, सेंसुअल और लिमिटेड हो गया
- 7:39:34है कि धार्मिक लोग कहते हैं प्यार कुछ और
- 7:39:38होना चाहिए।
- 7:39:40उनके हिसाब से इंसानी प्यार में प्लेजर,
- 7:39:44कंपटीशन, जलन, पोजेस करना, कंट्रोल
- 7:39:48करना और दूसरे के सोच में दखल देना होता
- 7:39:53है। और जब वह यह सब देखते हैं तो कहते हैं
- 7:39:57कि प्यार का एक दूसरा वर्जन होना चाहिए।
- 7:40:01डिवाइन, खूबसूरत, अनट जो करप्ट ना हो।
- 7:40:07दुनिया भर में जो लोग अपने आप को होली
- 7:40:10कहते हैं पवित्र उन्होंने हमेशा यह कहा है
- 7:40:14कि औरत को देखना गलत
- 7:40:17है। वह कहते हैं कि तुम भगवान के करीब
- 7:40:20नहीं जा सकते अगर तुम सेक्स में इनवॉल्व
- 7:40:22हो। इसलिए वह सेक्स को साइड में रख देते
- 7:40:25हैं।
- 7:40:27लेकिन अंदर से वह उसी में उलझे होते हैं।
- 7:40:31लेकिन जब वह सेक्सुअलिटी को डिनाई करते
- 7:40:33हैं तो जैसे वह अपनी आंखें बंद कर लेते
- 7:40:37हैं। अपनी जुबान काट लेते हैं। क्योंकि वह
- 7:40:41पूरी जमीन की खूबसूरती को ही इंकार कर
- 7:40:44देते
- 7:40:45हैं। उन्होंने अपने दिल और दिमाग को भूखा
- 7:40:49मार दिया है। वह सूखे हुए इंसान बन गए
- 7:40:53हैं। उन्होंने ब्यूटी को ही जोड़ दिया है
- 7:40:56औरत से और ब्यूटी को निकाल बाहर किया
- 7:41:00है। क्या प्यार को सेक्रेड और प्रोफेन
- 7:41:05ह्यूमन और डिवाइन में बांटा जा सकता है या
- 7:41:08सिर्फ प्यार होता है? क्या प्यार सिर्फ एक
- 7:41:12के लिए होता है? सबके लिए नहीं। अगर मैं
- 7:41:15कहता हूं मैं तुमसे प्यार करता हूं। तो
- 7:41:19क्या इसका मतलब है कि मैं दूसरों से प्यार
- 7:41:21नहीं करता? क्या प्यार पर्सनल होता है या
- 7:41:25इंपर्सनल? मोरल होता है या
- 7:41:29इमोरल? फैमिली तक सीमित होता है या उसके
- 7:41:32बाहर भी? अगर तुम इंसानियत से प्यार करते
- 7:41:35हो तो क्या तुम किसी एक से प्यार कर सकते
- 7:41:39हो? क्या प्यार एक सेंटीमेंट है? क्या
- 7:41:42प्यार एक इमोशन है? क्या प्यार प्लेजर और
- 7:41:45डिजायर है? यह सारे सवाल दिखाते हैं कि
- 7:41:50हमारे पास प्यार को लेकर पहले से ही सोची
- 7:41:54समझी सोच
- 7:41:57है कि प्यार कैसा होना चाहिए या नहीं होना
- 7:42:01चाहिए। एक पैटर्न एक कोड जो हमारे कल्चर
- 7:42:05ने बनाया
- 7:42:07है। तो अगर हमें प्यार को समझना है तो
- 7:42:11सबसे पहले हमें उस पर छाई हुई सदियों की
- 7:42:15धूल हटानी
- 7:42:16पड़ेगी। सारे आइडियल्स और आईडियोलॉजीस
- 7:42:20हटानी पड़ेंगी। किसी भी चीज को क्या होना
- 7:42:23चाहिए और क्या है में बांटना।
- 7:42:27सबसे ज्यादा धोखेबाज तरीका है जिंदगी को
- 7:42:30समझने का। अब मैं कैसे समझूं कि यह आग
- 7:42:35जिसे हम प्यार कहते हैं। यह फ्लेम यह क्या
- 7:42:39है? सिर्फ किसी को एक्सप्रेस करने की बात
- 7:42:43नहीं हो रही बल्कि यह अपने आप में क्या
- 7:42:46है?
- 7:42:48सबसे पहले मैं वह सब इंकार करता हूं जो
- 7:42:50चर्च ने, सोसाइटी ने, पेरेंट्स ने,
- 7:42:53दोस्तों ने, हर किताब ने, हर आदमी ने
- 7:42:56प्यार के बारे में कहा
- 7:42:58है। क्योंकि मैं खुद जानना चाहता हूं कि
- 7:43:02यह क्या है?
- 7:43:04यह एक बहुत बड़ा सवाल है जो पूरी इंसानियत
- 7:43:07से जुड़ा है। हजार तरीकों से इसे डिफाइन
- 7:43:11किया गया है और मैं खुद भी किसी पैटर्न
- 7:43:14में फंसा हुआ हूं जो मुझे इस वक्त अच्छा
- 7:43:17लग रहा है या प्लेजर दे रहा है। तो क्या
- 7:43:22मुझे अगर मैं इसे समझना चाहता हूं अपने
- 7:43:27ही तरफदारियों से आजाद नहीं होना चाहिए।
- 7:43:31मैं कंफ्यूज्ड हूं।
- 7:43:34अपनी ही इच्छाओं में फंसा हुआ हूं। तो मैं
- 7:43:38कहता
- 7:43:39हूं अपने कंफ्यूजन को साफ करो शायद तुम
- 7:43:43जान सको कि प्यार क्या है उस चीज के जरिए
- 7:43:46जो प्यार नहीं है। सरकार कहती है अपने देश
- 7:43:50के लिए मार डालो। क्योंकि तुम अपने देश से
- 7:43:53प्यार करते हो। क्या यह प्यार
- 7:43:57है? धर्म कहता है भगवान से प्यार के लिए
- 7:44:01सेक्स छोड़ दो। क्या यह प्यार है? क्या
- 7:44:05प्यार डिजायर है? ना मत
- 7:44:10कहो। ज्यादातर लोगों के लिए प्यार डिजायर
- 7:44:13के साथ होता है जो प्लेजर देता है सेंसेस
- 7:44:17के
- 7:44:17जरिए। सेक्स के कनेक्शन और उसके पूरे
- 7:44:21एक्सपीरियंस में मैं सेक्स के अगेंस्ट
- 7:44:24नहीं हूं।
- 7:44:26लेकिन देखो इसमें क्या छुपा है। जो सेक्स
- 7:44:30तुम्हें एक मोमेंट के लिए देता है वह है
- 7:44:33अपने आप से पूरा खत्म हो जाना। फिर तुम
- 7:44:36फिर से अपने पुराने हलचल के साथ लौट आते
- 7:44:39हो। इसलिए तुम चाहते हो उस मोमेंट को
- 7:44:43बार-बार रिपीट करना जिसमें कोई वरी नहीं
- 7:44:46होती। कोई प्रॉब्लम नहीं होती। कोई मैं
- 7:44:50नहीं होता।
- 7:44:53तुम कहते हो तुम अपनी बीवी से प्यार करते
- 7:44:55हो। उस प्यार में सेक्स का प्लेजर भी होता
- 7:44:59है। यह सुकून भी होता है कि कोई तुम्हारे
- 7:45:02बच्चों का ध्यान रखे, खाना बनाए। तुम उस
- 7:45:06पर डिपेंड करते हो। उसने तुम्हें अपना तन
- 7:45:10दिया, अपने इमोशंस, अपना
- 7:45:13सपोर्ट, एक फीलिंग ऑफ
- 7:45:16सिक्योरिटी। फिर वह तुमसे अलग हो जाती है
- 7:45:19या वह बोर हो जाती है या किसी और के पास
- 7:45:22चली जाती है और तुम्हारा पूरा इमोशनल
- 7:45:25बैलेंस हिल जाता
- 7:45:27है और यह जो डिस्टरबेंस है जो तुम्हें
- 7:45:31पसंद नहीं उसे कहते हो तुम जेलसी इसमें
- 7:45:35दर्द होता है, चिंता होती है, गुस्सा होता
- 7:45:38है, हेट होती
- 7:45:40है। तो असल में तुम कह रहे हो जब तक तुम
- 7:45:45मेरी हो मैं तुमसे प्यार करता हूं लेकिन
- 7:45:48जैसे ही तुम मेरी नहीं रही मैं तुमसे नफरत
- 7:45:51करता
- 7:45:52हूं। जब तक तुम मेरी डिजायर्स को पूरा कर
- 7:45:56रही हो चाहे वह सेक्स हो या कुछ और तब तक
- 7:46:00मैं तुमसे प्यार करता हूं। लेकिन जैसे ही
- 7:46:03तुम यह देना बंद करती हो मुझे तुम पसंद
- 7:46:07नहीं।
- 7:46:09तो तुम दोनों के बीच में एगोनिज्म आता है,
- 7:46:13सेपरेशन होती है और जब तुम दूसरे से अलग
- 7:46:16महसूस करते हो तो वहां प्यार नहीं होता।
- 7:46:22लेकिन अगर तुम अपनी बीवी के साथ जी सको
- 7:46:25बिना थॉट के यह सारी कंट्राडिक्टरी
- 7:46:28स्टेट्स क्रिएट किए यह एंडलेस
- 7:46:31झगड़े तो शायद शायद तुम जानो कि प्यार
- 7:46:36क्या है।
- 7:46:39तब तुम पूरी तरह आजाद हो जाते हो और वह
- 7:46:42भी।
- 7:46:45लेकिन अगर तुम उस पर अपने प्लेजर के लिए
- 7:46:47डिपेंडेंट हो तो तुम उसके स्लेव हो। तो जब
- 7:46:51प्यार होता है वहां फ्रीडम होनी चाहिए। ना
- 7:46:54सिर्फ दूसरे से बल्कि खुद से भी। यह मेरा
- 7:46:58है। मैं तुमसे इमोशनल नरिशमेंट लेता हूं।
- 7:47:03मैं तुम पर डिपेंड करता हूं।
- 7:47:06इन सब में ए्जायटी, फियर, जेलसी, गिल्ट
- 7:47:10हमेशा होती है। और जब तक डर है तब तक
- 7:47:15प्यार नहीं हो
- 7:47:17सकता। एक दुख से भरा हुआ दिमाग कभी नहीं
- 7:47:21जान सकता कि प्यार क्या
- 7:47:24है। सेंटीमेंटालिटी और इमोशनलिज्म का
- 7:47:27प्यार से कोई लेना देना
- 7:47:30नहीं। प्यार का प्लेजर और डिजायर से कोई
- 7:47:34रिश्ता नहीं। प्यार थॉट का रिजल्ट नहीं है
- 7:47:37क्योंकि थॉट तो पास्ट
- 7:47:39है। थॉट प्यार को ग्रो नहीं कर सकता।
- 7:47:43प्यार में जेलसी नहीं होती क्योंकि जेलसी
- 7:47:46पास्ट से आती
- 7:47:48है। प्यार हमेशा एक्टिव होता है। प्रेजेंट
- 7:47:51में होता
- 7:47:52है। यह नहीं होता मैं प्यार करूंगा या मैं
- 7:47:56प्यार कर चुका
- 7:47:58हूं। अगर तुम्हें प्यार का एहसास है तो
- 7:48:01तुम किसी का पीछा नहीं करते। प्यार किसी
- 7:48:04की बात नहीं
- 7:48:06मानता। जब तुम प्यार करते हो तो वहां ना
- 7:48:09रिस्पेक्ट होती है ना
- 7:48:12डिसरिस्पेक्ट। क्या तुम जानते हो असली में
- 7:48:15किसी से प्यार करना क्या होता है? बिना
- 7:48:17नफरत के, बिना जलन के, बिना गुस्से के।
- 7:48:22बिना यह चाहे कि वह क्या करें या क्या
- 7:48:25सोचे, बिना उसको दोष दिए, बिना किसी से
- 7:48:29कंपेयर किए। क्या तुम जानते हो इसका मतलब
- 7:48:32क्या
- 7:48:33है? जहां प्यार होता है क्या वहां
- 7:48:36कंपैरिजन होती
- 7:48:39है? जब तुम किसी से अपने पूरे दिल से,
- 7:48:42पूरे दिमाग से, पूरे जिस्म से, अपने पूरे
- 7:48:45होने के साथ प्यार करते हो तो क्या वहां
- 7:48:48कंपैरिजन होती
- 7:48:51है? जब तुम अपने आप को पूरी तरह उस प्यार
- 7:48:54में खो देते हो तब कोई दूसरा होता ही
- 7:48:57नहीं। क्या प्यार में जिम्मेदारी और फर्ज
- 7:49:00होता है? और क्या प्यार इन शब्दों का यूज
- 7:49:03करता
- 7:49:03है? क्या तुम कोई काम फर्ज समझ के करते
- 7:49:07हो? क्या उसमें प्यार होता है? फर्ज में
- 7:49:11प्यार नहीं
- 7:49:13होता। फर्ज का जो स्ट्रक्चर है जिसमें
- 7:49:16इंसान फंसा हुआ है, वही उसको बर्बाद कर
- 7:49:19रहा
- 7:49:21है। जब तक तुम किसी काम को इसलिए कर रहे
- 7:49:24हो क्योंकि वह तुम्हारा फर्ज है। तब तक
- 7:49:28तुम उससे प्यार नहीं
- 7:49:30करते। जहां प्यार होता है, वहां ना फर्ज
- 7:49:33होता है, ना
- 7:49:36जिम्मेदारी। ज्यादातर मां-बाप सोचते हैं
- 7:49:39कि वह अपने बच्चों के लिए जिम्मेदार है।
- 7:49:43और उनकी यह जिम्मेदारी का मतलब होता है
- 7:49:45उनको बताना कि क्या करना चाहिए और क्या
- 7:49:49नहीं। क्या बनना चाहिए और क्या नहीं बनना
- 7:49:52चाहिए।
- 7:49:55मां-बाप चाहते हैं कि उनके बच्चों का
- 7:49:57सोसाइटी में एक सिक्योर पोजीशन हो। जो वह
- 7:50:01जिम्मेदारी कहते हैं उस रिस्पेक्टेबिलिटी
- 7:50:04का पार्ट है जिसको वह पूछते
- 7:50:07हैं। और मुझे लगता है जहां
- 7:50:10रिस्पेक्टेबिलिटी होती है, वहां कोई ऑर्डर
- 7:50:12नहीं होता।
- 7:50:14वह सिर्फ एक परफेक्ट बोरजवा बनने की कोशिश
- 7:50:17में लगे होते
- 7:50:20हैं। जब वह अपने बच्चों को सोसाइटी में
- 7:50:23फिट करने के लिए तैयार करते हैं तो वह
- 7:50:27वॉर, कॉन्फ्लिक्ट और ब्रूटलिटी को बनाए
- 7:50:30रखते
- 7:50:31हैं। क्या तुम इसे केयर और प्यार कहते हो?
- 7:50:36असली केयर करना मतलब वैसे ही केयर करना
- 7:50:39जैसे तुम किसी पेड़ या पौधे के लिए करते
- 7:50:42हो।
- 7:50:43उसे पानी देना, उसकी जरूरत समझना, कौन सी
- 7:50:47मिट्टी उसके लिए बेस्ट है यह
- 7:50:49देखना। उसे सॉफ्टनेस और प्यार से देखभाल
- 7:50:53करना।
- 7:50:54लेकिन जब तुम अपने बच्चों को सोसाइटी के
- 7:50:57लिए तैयार करते हो तो तुम उन्हें मरने के
- 7:51:00लिए तैयार कर रहे हो। अगर तुम अपने बच्चों
- 7:51:03से प्यार करते तो दुनिया में कोई वॉर नहीं
- 7:51:06होती।
- 7:51:08जब तुम किसी अपने को खो देते हो जिसे तुम
- 7:51:11प्यार करते हो तुम आंसू बहाते हो क्या वह
- 7:51:15आंसू तुम्हारे लिए होते हैं या उसके लिए
- 7:51:17जो मर
- 7:51:19गया क्या तुम खुद के लिए रो रहे हो या
- 7:51:22किसी और के लिए क्या तुमने कभी किसी और के
- 7:51:26लिए रोया
- 7:51:27है क्या तुमने कभी अपने उस बेटे के लिए
- 7:51:31रोया है जो बैटल फील्ड में मारा
- 7:51:34गया तुमने रोया तो जरूर लेकिन क्या वह
- 7:51:38आंसू सेल्फ पिटी से आए या इसलिए कि एक
- 7:51:42इंसान मार दिया
- 7:51:44गया। अगर तुमने सेल्फ पिटी से रोए तो यह
- 7:51:48उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि तुम सिर्फ
- 7:51:52अपने बारे में सोच रहे
- 7:51:54हो। अगर तुम इसलिए रो रहे हो कि तुमने
- 7:51:58जिसमें इतना प्यार इन्वेस्ट किया था वह
- 7:52:00चला गया तो वह प्यार सच में था ही नहीं।
- 7:52:05तुम रोते हो क्योंकि तुम अकेला महसूस करते
- 7:52:08हो क्योंकि तुम्हें छोड़ दिया गया है
- 7:52:12क्योंकि अब तुम पावरफुल नहीं
- 7:52:14रहे। अगर तुम इस बात को समझ जाओ मतलब उसे
- 7:52:19डायरेक्टली छू लो जैसे तुम किसी पेड़,
- 7:52:22पिलर या हाथ को छूते हो। तो तुम देखोगे कि
- 7:52:26सोरो खुद बनाई हुई चीज है। सोरो को थॉट ने
- 7:52:31बनाया है। दुख को विचारों ने बनाया है। सो
- 7:52:36टाइम का रिजल्ट है।
- 7:52:39तीन साल पहले मेरा भाई था। अब वह मर गया।
- 7:52:42अब मैं अकेला हूं। दर्द में हूं। किसी से
- 7:52:45कंफर्ट या साथ नहीं मिल रहा। और यह मेरी
- 7:52:49आंखों में आंसू लाता है। यह सब तुम अपने
- 7:52:53अंदर देख सकते हो। अगर तुम ऑब्जर्व करो।
- 7:52:56तुम इसे एक नजर में पूरी तरह देख सकते हो।
- 7:53:00एनालिसिस में टाइम बर्बाद किए बिना।
- 7:53:04तुम एक मोमेंट में देख सकते हो इस छोटी सी
- 7:53:07चीज का पूरा स्ट्रक्चर जिसे मैं कहते
- 7:53:12हैं। मेरे आंसू, मेरी फैमिली, मेरा देश,
- 7:53:16मेरी बिलीफ, मेरा धर्म, यह सारी
- 7:53:20बदसूरती, यह सब तुम्हारे अंदर है। जब तुम
- 7:53:24इसे दिल से देखते हो ना केवल दिमाग से जब
- 7:53:28तुम इसे अपने दिल की गहराइयों से देखते
- 7:53:31हो तब तुम्हारे पास वह चाबी होती है जो इस
- 7:53:37दुख को इस सोरो को खत्म करती
- 7:53:42है। यह दुख और प्यार एक साथ नहीं चल सकते।
- 7:53:47यह सोरो और प्यार एक साथ नहीं चल सकते।
- 7:53:51लेकिन क्रिश्चियन दुनिया ने सफरिंग को
- 7:53:53आइडियलाइज कर दिया है। उसे क्रॉस पर लटका
- 7:53:57दिया और उसकी पूजा की। ऐसे जैसे तुम
- 7:54:00सफरिंग से सिर्फ एक ही दरवाजे से निकल
- 7:54:03सकते
- 7:54:05हो। और यह पूरी रिलीजियस सोसाइटी की
- 7:54:09एक्सप्लइटिंग स्ट्रक्चर है। तो जब तुम
- 7:54:12पूछते हो कि प्यार क्या है? हो सकता है
- 7:54:15तुम जवाब देखने से डर रहे हो। हो सकता है
- 7:54:19उसका मतलब हो पूरी जिंदगी का हिल
- 7:54:22जाना। हो सकता है तुम्हारा परिवार टूट
- 7:54:26जाए। शायद तुम्हें पता चले कि तुम अपने
- 7:54:29पति या पत्नी या बच्चों से प्यार नहीं
- 7:54:32करते। करते हो
- 7:54:35क्या? शायद तुम्हें अपना बनाया हुआ घर
- 7:54:38तोड़ना पड़े। शायद तुम कभी वापस मंदिर ना
- 7:54:42जा पाओ।
- 7:54:44लेकिन अगर तुम फिर भी सच में जानना चाहते
- 7:54:46हो तो तुम देखोगे कि डर प्यार नहीं
- 7:54:53है। जलन प्यार नहीं
- 7:54:57है। अपना समझना या कब्जा करना या हावी
- 7:55:01होना प्यार नहीं है। जिम्मेदारी और फर्ज
- 7:55:05प्यार नहीं है। खुद पर दया प्यार नहीं है।
- 7:55:08नफरत मिलने का दर्द प्यार नहीं
- 7:55:10है। प्यार नफरत का उल्टा नहीं है। जैसे कि
- 7:55:15ह्यूमिलिटी घमंड का उल्टा नहीं
- 7:55:18है। तो अगर तुम इन सबको मिटा पाओ जोर लगा
- 7:55:22के नहीं। पर जैसे बारिश पत्ते से पुराने
- 7:55:26धूल को धो डालती है। शायद तब तुम इस अजीब
- 7:55:30से फूल को देख पाओ। जिसका इंसान हमेशा से
- 7:55:34भूखा रहा है। अगर तुम्हारे पास प्यार नहीं
- 7:55:38है सिर्फ थोड़ा सा नहीं पर पूरी भरपूरता
- 7:55:42से। अगर तुम मुझसे भरे हुए नहीं हो तो
- 7:55:45दुनिया तबाह हो
- 7:55:47जाएगी। तुम दिमाग से जानते हो कि इंसान का
- 7:55:50एक होना जरूरी है और प्यार ही इकलौता
- 7:55:53रास्ता है। लेकिन कौन तुम्हें प्यार करना
- 7:55:56सिखाएगा?
- 7:55:58क्या कोई अथॉरिटी, कोई मेथड, कोई सिस्टम
- 7:56:01तुम्हें प्यार करना सिखा सकता
- 7:56:03है? अगर कोई तुम्हें सिखा रहा है तो वह
- 7:56:07प्यार नहीं है। क्या तुम कह सकते हो कि
- 7:56:11मैं प्यार की प्रैक्टिस
- 7:56:14करूंगा? मैं रोज बैठूंगा और प्यार के बारे
- 7:56:17में सोचूंगा। मैं प्रैक्टिस करूंगा कि मैं
- 7:56:20और ज्यादा दयालु और नरम बनूं। और अपने आप
- 7:56:23को दूसरों पर ध्यान देने के लिए मजबूर
- 7:56:26करूंगा।
- 7:56:30क्या तुम कहना चाहते हो कि तुम डिसिप्लिन
- 7:56:32या विल पावर से प्यार कर सकते हो? जब तुम
- 7:56:36डिसिप्लिन और विल लगाते हो प्यार करने के
- 7:56:38लिए तो प्यार खिड़की से बाहर चला जाता है।
- 7:56:42किसी मेथड या सिस्टम को फॉलो करके तुम
- 7:56:45ज्यादा चतुर या दयालु बन सकते हो या नॉन
- 7:56:49वायलेंस का स्टेट पा सकते हो। लेकिन उसका
- 7:56:53प्यार से कोई लेना देना नहीं होता।
- 7:56:56इस टूटे फूटे प्यासे रेगिस्तान जैसे
- 7:56:59दुनिया में प्यार नहीं है क्योंकि प्लेजर
- 7:57:02और डिजायर सबसे बड़ा रोल निभाते हैं।
- 7:57:06लेकिन बिना प्यार के तुम्हारी रोज की
- 7:57:09जिंदगी का कोई मतलब
- 7:57:11नहीं। और प्यार तब तक नहीं हो सकता जब तक
- 7:57:15उसके साथ ब्यूटी नहीं हो। ब्यूटी कोई चीज
- 7:57:20देखने वाली नहीं होती। ना कोई सुंदर पेड़,
- 7:57:23ना पेंटिंग, ना बिल्डिंग, ना सुंदर
- 7:57:26औरत। ब्यूटी तब होती है जब तुम्हारा दिल
- 7:57:30और दिमाग जानते हो कि प्यार क्या
- 7:57:33है। बिना प्यार और ब्यूटी के कोई वर्चू
- 7:57:37नहीं होती। और तुम अच्छी तरह जानते हो कि
- 7:57:40चाहे तुम सोसाइटी सुधारो, गरीबों को
- 7:57:44खिलाओ। तुम सिर्फ और दुख और परेशानी पैदा
- 7:57:48करोगे। क्योंकि बिना प्यार के तुम्हारे
- 7:57:51दिल और दिमाग के अंदर सिर्फ बदसूरती और
- 7:57:54गरीबी होती है।
- 7:57:58लेकिन जब प्यार और ब्यूटी होती है तो जो
- 7:58:00कुछ भी तुम करते हो वह सही होता है। जो
- 7:58:04कुछ भी तुम करते हो उसमें एक तरह का आर्डर
- 7:58:06होता है। अगर तुम जानते हो कैसे प्यार
- 7:58:10करना है। तो तुम जो चाहो वह कर सकते हो
- 7:58:14क्योंकि वह हर प्रॉब्लम का हल
- 7:58:16है। तो हम इस पॉइंट पर पहुंचते हैं। क्या
- 7:58:21दिमाग प्यार तक पहुंच सकता है बिना किसी
- 7:58:23डिसिप्लिन
- 7:58:26के? बिना किसी सोच के, बिना किसी फोर्स
- 7:58:30के, बिना किसी किताब, गुरु या लीडर के
- 7:58:34वैसे ही जैसे एक सुंदर सनसेट को देखा जाता
- 7:58:38है। मुझे लगता है सिर्फ एक चीज जरूरी है
- 7:58:41और वह है बिना किसी मोटिव के पैशन।
- 7:58:46ऐसा पैशन जो किसी कमिटमेंट या लगाव का
- 7:58:49नतीजा नहीं हो। एक जो लस्ट ना
- 7:58:53हो। एक आदमी जो पैशन नहीं जानता वह कभी
- 7:58:57प्यार नहीं जान सकता। क्योंकि प्यार तभी
- 7:59:00आता है जब तुम पूरी तरह खुद को छोड़ देते
- 7:59:03हो। एक माइंड जो ढूंढ रहा है वह पैशनेट
- 7:59:06नहीं होता और प्यार तभी मिलता है जब तुम
- 7:59:10उसे बिना ढूंढे पाते हो।
- 7:59:14जब वह बिना किसी एफर्ट या एक्सपीरियंस के
- 7:59:16सामने आता
- 7:59:19है। ऐसा प्यार वक्त का हिस्सा नहीं होता।
- 7:59:23ऐसा प्यार पर्सनल भी होता है और इंपर्सनल
- 7:59:26भी। एक भी होता है और अनेक
- 7:59:30भी। जैसे एक फूल में खुशबू होती है। तुम
- 7:59:34उसे सूंघ सकते हो या इग्नोर कर सकते हो।
- 7:59:39वह फूल सबके लिए होता है और उसके लिए भी
- 7:59:42जो उसे गहराई से महसूस करता है, प्यार से
- 7:59:45देखता है। चाहे कोई गार्डन के पास हो या
- 7:59:49दूर फूल के लिए सब एक जैसे हैं क्योंकि वह
- 7:59:53पूरी तरह खुशबू से भरा हुआ होता है। और
- 7:59:57सबके साथ उस खुशबू को बांट रहा होता
- 8:00:02है। प्यार एक नई ताजा जिंदा चीज होती है।
- 8:00:07उसका कोई कल नहीं होता। कोई आने वाला कल
- 8:00:10नहीं होता। वह सोच के हंगामे से परे होता
- 8:00:15है। सिर्फ एक मासूम माइंड ही जानता है
- 8:00:19प्यार क्या होता है और एक मासूम माइंड
- 8:00:22दुनिया में रह सकता है जो खुद मासूम नहीं
- 8:00:27है। इस अजीब चीज को पाने के लिए जिसको
- 8:00:30इंसान हमेशा ढूंढता रहा है। सैक्रिफाइस
- 8:00:33करके, वरशिप करके, रिश्तों में, सेक्स
- 8:00:37में, प्लेजर और पेन में यह तभी मुमकिन है
- 8:00:41जब थॉट खुद को समझता
- 8:00:44है और नेचुरली खत्म हो जाता है। तब प्यार
- 8:00:49का कोई ऑोजिट नहीं होता। तब प्यार में कोई
- 8:00:52कॉन्फ्लिक्ट नहीं
- 8:00:53होता। तुम पूछ सकते हो अगर मुझे ऐसा प्यार
- 8:00:57मिलता है तो मेरा क्या होगा? मेरी पत्नी,
- 8:01:01मेरे बच्चे, मेरी फैमिली का उनको तो
- 8:01:04सिक्योरिटी
- 8:01:07चाहिए। जब तुम ऐसा सवाल पूछते हो तो इसका
- 8:01:10मतलब तुम कभी थॉट के फील्ड के बाहर गए ही
- 8:01:14नहीं
- 8:01:15हो। जब तुम एक बार उस फील्ड के बाहर चले
- 8:01:18जाते हो तो तुम कभी ऐसा सवाल पूछते ही
- 8:01:21नहीं। क्योंकि तब तुम जानते हो प्यार क्या
- 8:01:25है। इसलिए कोई थॉट नहीं होता और इसलिए कोई
- 8:01:30टाइम नहीं
- 8:01:31होता। हो सकता है जब तुम यह सब सुनो और
- 8:01:35जादू जैसा महसूस करो। लेकिन असल में थॉट
- 8:01:39और टाइम के परे जाने का मतलब है दुख। सो
- 8:01:44के परे
- 8:01:45जाना। और तब तुम जागते हो कि एक अलग
- 8:01:49डायमेंशन है जिसका नाम है प्यार।
- 8:01:54लेकिन तुम नहीं जानते कैसे उस अजीब सोर्स
- 8:01:56तक पहुंचना है तो तुम क्या करते हो अगर
- 8:02:01तुम्हें नहीं पता क्या करना है तो तुम कुछ
- 8:02:04भी नहीं करते है ना बिल्कुल कुछ
- 8:02:08नहीं और तब तुम्हारे अंदर पूरी तरह से एक
- 8:02:12सन्नाटा होता है समझ रहे हो इसका मतलब
- 8:02:16इसका मतलब है तुम ना ढूंढ रहे हो ना चाह
- 8:02:20रहे हो ना पीछा कर रहे हो। कोई सेंटर ही
- 8:02:23नहीं होता तुम्हारे अंदर और
- 8:02:26तब वहां होता है
- 8:02:32प्यार। अब तक हमने इस एपिसोड में लगभग दो
- 8:02:36पार्ट को कवर किया है। बाकी की बुक मेरे
- 8:02:40अनुमान से करीब 6 घंटे की और है। जिसको
- 8:02:44अगर समय मिलेगा तो फिर कभी कवर करने की
- 8:02:46कोशिश करूंगा। कब पता नहीं।
- 8:02:51आज के लिए बस इतना ही। हम फिर मिलेंगे
- 8:02:54आपसे एक नए एपिसोड में एक नए टॉपिक के
- 8:02:57साथ। मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे
- 8:03:00सिलेबस वि रोहित। धन्यवाद।
- 8:03:32ओम
- 8:03:46ओम
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