Is Islamic Banking Really Islamic? (Don't Watch If You Can't Handle the Answer) — Transcript
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- 0:01पाकिस्तान एक बटा हुआ मुल्क है।
- 0:05करंट कप्तानों में से कौन सा बेहतर है?
- 0:07अच्छा
- 0:08बाबर आजम
- 0:08बाबर आजम
- 0:09लूट के बाहर लेगा सारा पैसा
- 0:12इमरान खान
- 0:13जरदारी
- 0:14इमरान खान
- 0:14इमरान खान
- 0:18जिंदाबाद
- 0:19कराची
- 0:19लाहौर
- 0:20लाहौर जितना बड़ा लाहौर है उतना सौर है
- 0:24ये प्राइवेटाइज करनी चाहिए थी नहीं करनी
- 0:26चाहिए थी
- 0:26ये नहीं बेचना चाहिए था
- 0:27सही किया उन्होंने
- 0:28ने भेज दिया अच्छा नहीं
- 0:29डॉलर हो गया है कि भैया
- 0:34[चीखने की आवाज़]
- 0:36[संगीत]
- 0:36एक क्रिकेट ही थी जो हमें जोड़ती थी लेकिन
- 0:39अब तो उसका भी अल्लाह ही हाफिज है। लेकिन
- 0:41एक मौजू ऐसा है जिसमें ये डिवाइड बहुत
- 0:44शिद्दत इख्तियार कर चुका है और वो है
- 0:47इस्लामिक बैंकिंग। [संगीत]
- 0:50सोशल मीडिया हो, चाहे कि होटल हो, घरेलू
- 0:53महफिल हो, यूनिवर्सिटीज हो, उलमा की बैठक
- 0:56हो या फिर मुल्क के टॉप ऑफिशियल्स की
- 0:59मीटिंग। यह बहस हर जगह नजर आती है कि आया
- 1:02इस्लामिक बैंकिंग वाकई इस्लामिक है या फिर
- 1:05नई पैकेजिंग में वही पुरानी चीज। लेकिन एक
- 1:08चीज इस बहस में मुख्तलिफ है वो यह कि इसके
- 1:10मुखालिफ तो खुल्लम खुल्ला बबांगे दौहल इस
- 1:13पर तनकीद करते हैं लेकिन इस्लामिक बैंकिंग
- 1:16को बनाने और चलाने वाले खुलकर जवाब देने
- 1:19के बजाय बंद कमरों पेड सेमिनार्स में ही
- 1:22तकरीर करते नजर आते हैं। यही वजह है कि
- 1:24इस्लामिक बैंकिंग के एक आम हामी के पास
- 1:27सिर्फ यही जवाब रह जाता है कि यार मुफ्ती
- 1:30साहब ने कहा है ना तो ठीक ही होगा यार।
- 1:33लेकिन आज हम शुक्रगुजार हैं कि इस
- 1:34डॉक्यूमेंट्री के लिए उनमें से चंद इंतहाई
- 1:36रिस्पेक्टेड लोग ना सिर्फ हमारे इस
- 1:38प्लेटफार्म पर आए बल्कि आवाम के लिए इवन
- 1:41सख्त सवालों का भी तहम्मुल और सादा तरीन
- 1:44जबान में जवाब भी दिया। तो इस
- 1:46डॉक्यूमेंट्री को एंड तक जरूर देखिएगा
- 1:47क्योंकि इसमें हम नहीं बल्कि सवालात एतराज
- 1:50और उन पर उलमा की जानिब से दी गई
- 1:52एक्सप्लेनेशन जू के तू देखने के बाद आप
- 1:55फैसला करेंगे कि आया मौजूदा इस्लामिक
- 1:57बैंकिंग वाकई इस्लामिक भी है या फिर नहीं।
- 2:00तैयार हैं तो फिर आपके लाइक, सब्सक्राइब
- 2:03और पेट्रन पर हमारी सपोर्ट के साथ शुरू
- 2:06करते हैं। इस्लामिक बैंकिंग की कहानी।
- 2:16अच्छा, इस्लामिक बैंकिंग की
- 2:17कॉम्प्लेक्सिटीज को आसानी से समझने के लिए
- 2:19पहले हमें एक बुनियादी और सबसे अहम
- 2:22टर्मिनोलॉजी को समझना होगा। और वो है रिबा
- 2:25जिसे आम अल्फाज में सूद कहा जाता है। और
- 2:28हां यहां एक बात बहुत अहम है कि रिबा को
- 2:31सिर्फ इस्लाम ही नहीं बल्कि यहूदी मजहब
- 2:33में भी हराम करार दिया गया है। इस
- 2:35डॉक्यूमेंट्री के दौरान हमें पता चला कि
- 2:36इसीलिए इस्लामिक मुालिक की तरह इसराइल में
- 2:39भी रिबा के खिलाफ एक यहूदी बैंकिंग का
- 2:42निजाम काम कर रहा है।
- 2:45[चीखने की आवाज़]
- 2:46उलमा इकराम के मुताबिक 14 से लेकर 70 के
- 2:49करीब गुनाह ऐसे हैं जिन्हें कबाय शुमार
- 2:52किया जाता है। यानी बहुत बड़े गुनाह। लेकिन
- 2:55जिस किस्म की मुजम्मत और वहीदे रेबा के
- 2:58मसले पर आई है, शायद ही किसी और गुनाह के
- 3:00बारे में आई हो।
- 3:04कुरान करीम में अल्लाह ताला फरमाते हैं कि
- 3:06ऐ लोगों जो ईमान लाए हो खुदा से डरो और जो
- 3:10कुछ तुम्हारा सूद लोगों पर बाकी रह गया है
- 3:13उसे छोड़ दो। अगर तुम वाकई ईमान लाए हो।
- 3:18लेकिन अगर तुमने ऐसा ना किया तो आगाह हो
- 3:21जाओ कि अल्लाह और उसके रसूल की तरफ से
- 3:24तुम्हारे खिलाफ ऐलान जंग है। हां अब भी
- 3:28तौबा कर लो और छोड़ दो तो तुम असल सरमाया
- 3:32लेने के हकदार हो। ना तुम जुल्म करो और ना
- 3:36तुम पर जुल्म किया जाए।
- 3:39और हां अल्लाह ही नहीं अल्लाह के रसूल ने
- 3:42भी रिबा की शदीद मुजम्मत की। आप
- 3:45सल्लल्लाहु अलह वसल्लम ने फरमाया कि रिबा
- 3:47के 70 गुनाह या दर्जेचे हैं जिनमें से
- 3:50सबसे हल्का यह है कि आदमी अपनी मां के साथ
- 3:53जिना करे। तो सवाल यह पैदा होता है कि
- 3:56रहमान रब और उसका नबी जो रहमतल आलमीन है
- 4:01रिबा को लेकर इतने सख्त गुस्से में क्यों
- 4:04नजर आते हैं? और उसकी वजह है इस्तहसाल या
- 4:08एक्सप्लॉयटेशन। इस्लाम दरअसल कैपिटलिज्म
- 4:11नहीं बल्कि कैपिटल मूवमेंट को प्रमोट करता
- 4:13है। यानी इस्लाम में पैसा कमाना तो जायज
- 4:16है लेकिन उसे चंद हाथों में रोके रखना
- 4:18हराम। इसकी सबसे बड़ी मिसाल है जकात। जहां
- 4:21अल्लाह ताला हर उस चीज पर 2ाई फीसद टैक्स
- 4:23नाफिज़ कर रहे हैं जिसे पिछले एक साल से
- 4:26रोके रखा गया हो। जबकि किसी भी किस्म के
- 4:28रनिंग फाइनेंस या इस्तेमाल के पैसे पर कोई
- 4:31जकात नहीं है। और सूद का तो सबसे बड़ा
- 4:33प्रॉब्लम ही यही है कि यह अमीरों को बगैर
- 4:35किसी रिस्क के अपनी डॉलर डबल करने का एक
- 4:38रास्ता फराहम करता है। इससे होता यह है कि
- 4:40बड़ा पैसा छोटे पैसे को खींच देता है।
- 4:42जिसके बाद अमीर और अमीर जबकि गरीब मजीद
- 4:46गरीब हो जाता है। तो यह बात और
- 4:47कॉन्टेक्स्ट याद रखिएगा। अब बात यह है कि
- 4:50कुरान करीम में आपको कई आयात ऐसी तो जरूर
- 4:52मिल जाएंगी जहां रिबा ममनू करार दिया गया
- 4:54हो। लेकिन कोई आयत ऐसी नहीं है जिसमें
- 4:57रिबा क्या है इसे डिफाइन किया गया हो।
- 5:00इसीलिए इसकी डेफिनिशन उलमा इकराम ने अह
- 5:02हदीस और उस वक्त के कल्चरल रेफरेंस से ली।
- 5:07रिबा लुगत में इजाफे को कहते हैं।
- 5:10किसी को कर्ज दे या किसी के साथ उधार का
- 5:13लेनदेन करे और
- 5:14[नाक से की जाने वाली आवाज़] उस कर्ज और
- 5:15उधार से जो रकम बन रही है उसके लेने देने
- 5:18के ऊपर एक इजाफा तय करे। इंक्रीस तय करे
- 5:21और वो टाइम के साथ लिंक्ड हो। बाज़ औकात
- 5:23कहा जाता है कि रिबा तो फकत उस वक्त होगा
- 5:26जब किसी पर जुल्म हो रहा हो। यानी जब
- 5:28इस्तहसाल की बुनियाद पर हो। लिहाजा अगर
- 5:30कुछ थोड़ा बहुत नफा हो तो वो रिबा में
- 5:31शामिल नहीं। ये एक फिक्र पाई जाती है और
- 5:33इसके बाज़ औकात बुनियाद जो है वो बाज़
- 5:36स्कॉलर्स ने कुरान मजीद की इस आयत से
- 5:38इस्तफादा किया है। लाल रबा मुजाफा तो ये
- 5:42उनके यहां बहुत मारूफ तरीका था। इसलिए
- 5:44कुरान करीम ने इस तरीके को बतरे शर्त के
- 5:46नहीं बयान किया। ये बयान किया कि एक तरीका
- 5:48तुम्हारा ये भी है। तुम और चीज़ तो करते ही
- 5:50हो। लेकिन एक तरीका यह भी है।
- 5:52लेकिन बहरहाल क्योंकि इस्लामी दुनिया के
- 5:54ज्यादातर उलमा इस बात पर मुत्तफिक हैं
- 5:55रिबा चाहे किसी भी परसेंट में हो हराम है
- 5:58तो हम भी [संगीत] आज की बैंकिंग समझने के
- 6:00लिए इसी डेफिनेशन को फॉलो करेंगे।
- 6:08भाई इस्लामिक बैंकिंग की करंट मॉडल पर
- 6:09इख्तलाफ करने वाले लोगों की आप बात सुने
- 6:11तो आपको एक जुमला बहुत कॉमनली सुनने को
- 6:14मिलेगा। जितनी भी अरबी इस्तलाह इस्तेमाल
- 6:16करते हैं मुारबा मुदारबा जो भी बड़ी मतलब
- 6:19अरबी जितनी भी बातें करते हैं कर रहे हैं
- 6:21सिर्फ सूद के बेसिस पे ही और कोई और बेसिस
- 6:23नहीं है। सिर्फ सूद ही रेफरेंस है इनका।
- 6:25ये शराब कोला के कंटेनर में बेचने की
- 6:27कोशिश कर रहे हैं। और ये डबल धोखा हो जाता
- 6:30है। एक तो शराब बेच रहे हैं, कोका कोला के
- 6:32कंटेनर में बेच रहे हैं और महंगी बेच रहे
- 6:34हैं।
- 6:34तो क्या वाकई ऐसा ही है या फिर यह बस एक
- 6:37इल्जाम है। इसके लिए चले जरा कन्वेंशनल
- 6:40बैंकिंग के निजाम के बुनियादी स्ट्रक्चर
- 6:42पर नजर डालते हैं।
- 6:46दुनिया भर में बैंकिंग सिस्टम की बुनियाद
- 6:48फ्रैक्शनल रिजर्व बैंकिंग है। अकाउंटिंग
- 6:50का एक ऐसा गोरख धंधा जिसके बगैर दुनिया भर
- 6:53के बैंक्स एक दिन भी काम नहीं कर सकते। अब
- 6:56आप बोलेंगे ये क्या बोला है? परेशान मत
- 6:59हो। अभी समझाता हूं। आपने वो जुमले तो
- 7:01सुने होंगे ना।
- 7:02एक का दो, एक का तीन, एक का चार, एक का
- 7:05दो, एक का तीन, एक का चार।
- 7:07लेकिन जानते हैं बैंक्स में क्या होता है?
- 7:09एक का 10। कैसे? बताता हूं। बल्कि एक काम
- 7:13करते हैं। रशीद भाई की एग्जांपल से समझाता
- 7:15हूं। जानते हैं जब रशीद भाई बैंक में अपना
- 7:18पैसा मसलन ₹1 लाख जमा कराते हैं तो होता
- 7:21क्या है? बैंक जो है उस ₹1 लाख में से
- 7:23सिर्फ ₹10,000 अपने पास रखता है। जबकि
- 7:26₹90,000 कयूम भाई जो उससे कर्जा लेने आए
- 7:29थे गाड़ी खरीदने के लिए उन्हें दे देता
- 7:31है। अब आप सोच रहे होंगे इसमें क्या? तो
- 7:33मजे की बात यह है कि बैंक ने यह नहीं किया
- 7:36कि उसके डिपॉजिट में से ₹90,000 दिए हो।
- 7:38क्योंकि अगर ऐसा होता तो अगर कल रशीद भाई
- 7:41वापस अपना पैसा मांगने आते तो उन्हें तो
- 7:43बैंक सिर्फ ₹10,000 ही दे सकेगा। राइट? तो
- 7:45बैंक का निजाम यह होता है कि एक बार जो
- 7:48रकम आ जाए उसमें से हुकूमती शर्त के
- 7:50मुताबिक मसलन सिर्फ 10% रखकर बाकी 90% की
- 7:53वो हवाई करेंसी बना देता है जो फिजिकली
- 7:56मौजूद ही नहीं। बस चंद डिजिटल नंबर्स।
- 7:59हालांकि असली अमाउंट सिर्फ ₹1 लाख थी
- 8:02लेकिन अब ₹1 लाख रशीद भाई के पास भी है
- 8:05जबकि [नाक से की जाने वाली आवाज़] ₹90,000
- 8:06कयूम भाई के पास भी। लेकिन आपको बताऊं यह
- 8:08तो कुछ भी नहीं। असली गेम यह है कि यह
- 8:11कहानी सिर्फ यहीं नहीं रुकती। अब जब कयूम
- 8:14भाई यह पैसे अपने बैंक में डिपॉजिट करेंगे
- 8:16या गाड़ी खरीदने के केस में वह किसी और को
- 8:19देंगे और वो बैंक में डिपॉजिट करेगा तो
- 8:22वही 10% रखकर अबकी बार ₹81,000 की नई
- 8:26करेंसी बन जाएगी। जो किसी और को दे दी
- 8:28जाएगी। और यह सिलसिला ऐसे चलता ही रहेगा।
- 8:31यानी फ्रैक्शनल रिजर्व बैंक के इस मॉडल से
- 8:33होता यह है कि जो रकम एक्चुअल में मौजूद
- 8:35होती है उसकी फॉर एग्जांपल 10 गुना हवाई
- 8:39रकम बना दी जाती है। अब जाहिर है उलमा
- 8:41इकराम से ही हमने सुना है कि इस्लामिक
- 8:43बैंकिंग एसेट बेस्ड है खयाल ही नहीं। तो
- 8:45ऐतराज ये उठता है कि कैसे इस्लामिक बैंक
- 8:48एक ऐसा मॉडल इस्तेमाल कर सकता है जिसका
- 8:50सारा पैसा हवाई हो। एक वक्त आया कि नहीं
- 8:53करेंसी आई नोट आया लेकिन इट रिप्रेजेंट्स
- 8:56इसके पीछे एक असासा मौजूद है और उसकी
- 8:59बुनियाद के ऊपर इस करेंसी की एक अपनी
- 9:01वैल्यू डिटरमाइन होती है। अलबत्ता आज जो
- 9:04करेंसी है मुतलकन चाहे वो डॉलर हो चाहे वो
- 9:07रुपए हो दुनिया भर की करेंसी सब फियाट
- 9:09करेंसी है। यानी इट्स का ताल्लुक मुल्क के
- 9:11जीडीपी की बुनियाद पर इसकी करेंसी की
- 9:12वैल्यू डिटरमाइन होती है। अलबत्ता इसके
- 9:14पीछे कोई असा नहीं है। यानी इटसेल्फ ये एक
- 9:16वैल्यू रखता है। जिसे हम कहते हैं फियाट
- 9:18करेंसी हम कहते हैं यह एतबारी बुनियाद पर
- 9:21मालियत रखती [संगीत] है। क्योंकि यह जो आज
- 9:23फिया करेंसी मौजूद है इसके पीछे एतबार
- 9:25हुकूमत का है। लिहाजा हम इसे माल समझते
- 9:28हैं।
- 9:28इस वक्त फ्रिक्शन रिजर्व बैंकिंग है या
- 9:30मनी सप्लाई है। जब हम इसको खालिस इस्लामी
- 9:32नुक्त नजर से देखते हैं तो हमारे सामने
- 9:34सवाल आता है कि बैंक जब मनी मल्टीप्लिकेशन
- 9:37करता है तो इसका मतलब है कि वो मनी क्रिएट
- 9:39कर रहा होता है। तखलीक जर कर रहा होता है।
- 9:41और यह तखली जर अगर हुकूमत की इजाजत से
- 9:43होती है तो हुकूमत खुद करे या किसी के
- 9:46जरिए कराए। उसके अंदर कम से कम हलाल हराम
- 9:48का सवाल नहीं है। जैसे आज आप जाके किसी से
- 9:50भी पूछे माहरीन कानून से पूछे कि बैंक जो
- 9:52मनी सप्लाई करता है या कानूनन सही है या
- 9:55गलत है? तो इसका जवाब है सही है। क्योंकि
- 9:56पाकिस्तान के एक निजाम एक मनी सप्लाई के
- 9:59लॉ के तहत ये काम हो रहा है।
- 10:00अच्छा अब हम जानते हैं कि रफ्तार की
- 10:02ऑडियंस ऐसी बिल्कुल नहीं है जो क्रिटिकल
- 10:04थिंकिंग ना करती हो। जिसके दिमाग में
- 10:06सवालात ना आते हो। इसलिए आपके दिमाग में
- 10:08ये सवाल लाजमी आया होगा कि क्या हुकूमत की
- 10:10कुबूलियत क्राइटेरिया है? क्योंकि अगर ऐसा
- 10:12है तो कल को अगर हुकूमत शराब की या किसी
- 10:15और चीज की जो हराम है उसकी इजाजत दे दे तो
- 10:18क्या वो भी हलाल हो जाएगी?
- 10:20उल अम्र या हुकूमत का इख्तियार कहां तक
- 10:22है? तो वो इख्तियार जो है वो हलाल को हराम
- 10:24करने या हराम को हलाल करने का नहीं है।
- 10:26बल्कि सिर्फ वो नमूर में जो मुबा है जो
- 10:28हुकूमत के दायरे इख्तियार में आते हैं।
- 10:30मसन माशी निजाम [संगीत] को चलाने के लिए
- 10:32हुकूमत को बा जरूरी है। जो भी हाकिम वक्त
- 10:35होगा। अलबत्ता अगर कोई ऐसा हुक्म है जो
- 10:37शरीयत से मुतसादम होगा उस सूरत में जायज
- 10:39नहीं है।
- 10:40जो चीजें उसूली तौर पर जायज होती है। अब
- 10:43एडमिनिस्ट्रेटिवली वो बेहतर है कम बेहतर
- 10:45हैं। ये एक अलग डिबेट होती है जो कि एक
- 10:47टेक्निकल और फनी गुफ्तगू होती है। तो हम
- 10:50उसमें देखते हैं कि अगर कोई चीज फिर नफ्स
- 10:51ही जायज है। यानी कि इन प्रिंसिपल वो हलाल
- 10:54में आती है तो अगर हुकूमत या कोई सिस्टम
- 10:58रन करने वाला उसको अडॉप करता है तो हम
- 11:00उसको फिर जायज समझते हैं। इसके ऊपर
- 11:02एडमिनिस्ट्रेटिवली या टेक्निकली कोई डिबेट
- 11:05कर सकता है कि ये कम बेहतर है वो ज्यादा
- 11:07बेहतर है।
- 11:07हां बात तो ठीक है। समझ में आने वाली है।
- 11:10है ना? लेकिन मजे की बात बताऊं अभी मुफ्ती
- 11:13साहब हमारे स्टूडियो में ये बात करके गए
- 11:15ही थे कि उसी दिन मंसरे आम पर एक फतवा आ
- 11:18गया। जिसमें पाकिस्तान के मुअज्जज़ तरीन
- 11:21मुफ्ती मुफ्ती तकी उस्मानी साहब ने
- 11:23क्रिप्टो करेंसी को यह कहकर हराम करार दे
- 11:26दिया कि यह माल नहीं है। महज खाते में
- 11:29फर्जी नंबरों का एतराज है। अब आपने अभी
- 11:32मुफ्ती साहब की बात सुनी है जिसमें
- 11:34उन्होंने समझाया है कि पहले फी नफ्स ही
- 11:36बाय नेचर चीज हलाल होनी चाहिए। अब पैसा
- 11:38क्योंकि बाय नेचर ठीक है इसलिए अगर फिर
- 11:40कुछ शरायत जैसे हुकूमत की बैंकिंग
- 11:42रेगुलेशन वगैरह हो तो उसके जायज होने में
- 11:45फिर कोई मसला नहीं। तो इस फतवे के बाद
- 11:47सवाल यह उठता है कि हालांकि अब हुकूमत
- 11:49पाकिस्तान क्रिप्टो को कुबूल भी करती है।
- 11:52पिवारा के नाम से रेगुलेटरी अथॉरिटी भी
- 11:54है। पैसा भी फी नफसी ही हलाल है। लेकिन
- 11:57यहां ये इसलिए जायज नहीं क्योंकि ये सिर्फ
- 12:00फर्जी नंबरों का इंदराज है। लेकिन इसके
- 12:02बरक्स फ्रैक्शनल रिजर्व बैंकिंग जिसके ऊपर
- 12:05कन्वेंशनल और इस्लामिक दोनों बैंकिंग का
- 12:07निजाम चलता है। जो कि भी फर्जी नंबरों का
- 12:10इंदराज ही है वो जायज और हलाल कैसे?
- 12:16खैर चल आगे बढ़ते हैं। कन्वेंशनल बैंकिंग
- 12:19का सबसे बड़ा प्रॉब्लम तो यही है ना कि वो
- 12:21सारफीन को बगैर किसी रिस्क के फिक्स्ड रेट
- 12:24ऑफ रिटर्न या मुनाफा ऑफर करते हैं। जानते
- 12:26हैं उस फिक्स्ड मुनाफे को फिक्स करने के
- 12:29लिए कन्वेंशनल बैंक्स एक टूल इस्तेमाल
- 12:30करते हैं जिसे कराची इंटर बैंक ऑफर रेट
- 12:33कहा जाता है। और उस कायर का तायु स्टेट
- 12:36बैंक के सरकारी इंटरेस्ट रेट के जरिए होता
- 12:39है। लेकिन प्रॉब्लम ये है कि इस्लामी
- 12:42बैंक्स भी हर तरह के लेनदेन के लिए उसी
- 12:44कन्वेंशनल बैंक्स के उसी टूल को इस्तेमाल
- 12:47करते हैं। तो अब सवाल यही उठता है ना कि
- 12:49आखिर कैसे इस्लामिक बैंक उस फिक्स्ड
- 12:52इंटरेस्ट रेट की बुनियाद पर अपने सारफीन
- 12:53को प्रॉफिट दे सकते हैं जो कन्वेंशनल बैंक
- 12:55यूज़ करते हैं जो कि बजाहिर जायज नहीं।
- 12:58काइबोर एक बेंचमार्क है जो कि उस मार्केट
- 13:01का यानी फाइनेंसियल इंडस्ट्री के रेट्स को
- 13:04बयान कर रहा है कि यहां प्रॉफिट रेट क्या
- 13:05होगा। अब उसकी बुनियाद पर बैंक एक
- 13:08प्रोडक्ट बनाता है जो कि शरी कंप्लांट है
- 13:10और उस बुनियाद पर फाइनेंसिंग करता है या
- 13:12डिपॉजिट डिपॉजिट रिसीव करता है। तो खुद
- 13:14कायब हराम नहीं है ना उसका इस्तेमाल हराम
- 13:17है बल्कि वो मामला जिसके जरिए से ये कायर
- 13:21इस्तेमाल हो रहा है वो इसको हलाल या हराम
- 13:23बनाता है। ठीक है? रेफरेंस के तौर पर
- 13:25इस्तेमाल हुआ और आपने इंटरेस्ट पे मुझे
- 13:27इंटरेस्ट को रेफरेंस के तौर पे उसको आपने
- 13:29प्रॉफिट बोला और मुझे आपने ₹1 लाख सूद दे
- 13:33कर्ज दे दिया। आपने कहा हम सूद नहीं लेंगे
- 13:36आपसे 10% मुनाफा लेंगे। ठीक है? बड़ी
- 13:38अच्छी बात है। दो महीने बाद स्टेट बैंक जो
- 13:40है वो अपनी शराए सूद बढ़ा देता है। समझ
- 13:42लीजिए वो 29 तारीख को बढ़वाता है या 30
- 13:44तारीख को तो 31 तारीख को आप मुझे खत लिख
- 13:46देते हैं कि कल से जो है वो तुमसे जो
- 13:48मुनाफा हम ले रहे हैं वो 1% बढ़ जाएगा। तो
- 13:51ये तो सूद ही है ना। रेफरेंस के तौर पे
- 13:53इस्तेमाल करना वहां तक बात ठीक है कि चलो
- 13:56पहली मर्तबा आपने किया। लेकिन हर मर्तबा
- 13:58जब स्टेट बैंक इंटरेस्ट रेट चेंज करता है
- 14:00आप अपना नफा वही कर देते हैं और मुनाफा
- 14:02जिसको आप कहते हैं वो हमेशा वही होता है
- 14:04जो सूद के बेस पे होता है तो फिर आप क्या
- 14:06बात कर रहे हैं वो ये रहा होता है कि एक
- 14:08बैंक दूसरे बैंक को सूद पर कर्जा कितनी
- 14:10शरे सूद पर देगा तो शर सूद के जो है वो
- 14:13हमारे यहां उसको हम कहते हैं काबोर यानी
- 14:15कराची इंटर बैंक ऑफर रेट ये दुनिया में
- 14:16कहीं पे लाइबोर है कहीं पे कुछ और है यानी
- 14:18ये वो रेट है कि जिस पर दो बैंक एक दूसरे
- 14:20को पैसे देने को तैयार हो जाएंगे अब सवाल
- 14:22ये है कि अगर एक इस्लामी मुशरे में
- 14:24इस्लामी बैंक या इस्लामी इदारा या इस्लामी
- 14:26हुकूमत अगर किसी से पैसे ले तो वो क्या शर
- 14:30मुनाफा या मार्केट के किस रेट को कोट करे
- 14:33तो इस पर बड़ी अरसे से गुफ्तगू है आज से
- 14:35नहीं 19 मुझे याद 2009 में हमारी कमेटी
- 14:38बनी थी हुकूमत पाकिस्तान ने बनाई थी तो
- 14:39उसके अंदर मैं भी था उस जमाने में इसकी
- 14:42कोशिश हुई दुबई के अंदर थॉमसन रटन बड़ा
- 14:44मशहूर थॉमसन रटन बड़ा मशहूर इदारा है उसने
- 14:46भी इसकी कोशिशें की और मलाइशिया में कोशिश
- 14:48हर जगह उसमें एक नतीजे पर लोग पहुंचे हैं
- 14:50कि जब तक के इस्लामी बैंकिंग किसी मुल्क
- 14:52के अंदर बैंकों का एक खास साइज जिसे हम
- 14:55क्रिटिकल मास कहते
- 14:57जब तक वो ना आए इनका रेट नहीं चल सकता। अब
- 15:00जैसे पाकिस्तान में इस्लामी बैंकिंग 20
- 15:01फीसद है। मैं [नाक से की जाने वाली आवाज़]
- 15:02अगर किसी के पास जाकर कहता हूं कि मैं
- 15:04आपको एक गाड़ी फाइनेंसिंग करना चाहता हूं
- 15:06आईबोर पे। वो मेरे से पहला सवाल करेगा जी
- 15:08आईबोर क्या होता है? मैं कहूंगा जी इस्लाम
- 15:11एक इंटर बैंक ऑफर रेट है। ये वो कहेगा वो
- 15:13कैसे काम करता है? तो होता यह है कि इस
- 15:16चीज को खत्म करने का जो सही तरीका है वो
- 15:18यह है कि मार्केट आपकी तब्दील हो। तो
- 15:20उम्मीद यह है कि जब आपका कन्वर्जन 40 से
- 15:2350% पे पहुंचेगा तो इस्लामी मार्केट जब
- 15:26बड़ी हो जाएगी तो इसके बाद फिर आपके पास
- 15:28खुद ब खुद आईबॉल इस्लामिक इंटर बैंक ऑफर
- 15:31रेट आ जाएगा।
- 15:31अच्छा हलाल हराम का लफ्ज़ अब फिर आ ही गया
- 15:33है सामने तो इसके गिर्द चंद और सवालात भाई
- 15:36ये तो उलमा से ही हम सब ने सुना है ना कि
- 15:38इस्लामिक फाइनेंसियल मॉडल में फिक्स्ड रेट
- 15:40प्रॉमिस नहीं की जा सकती। तो एक तो पहले
- 15:42यह सवाल कि ऐसा कैसे हो जाता है कि
- 15:45इस्लामिक बैंक्स पिछले कई वर्षों से जो
- 15:47एक्सपेक्टेड रेट बताते हैं वही हमेशा मिल
- 15:50भी जाता है।
- 15:50बैंकिंग में मुझे बहुत अच्छे अंदाज में
- 15:52पता है कि आजकल मार्केट में प्रॉफिट रेट
- 15:54क्या चल रहा है। क्योंकि पॉलिसी रेट के
- 15:56तहत हम लोग चल रहे होंगे। मुझे पता है कि
- 15:58मैंने डिपॉजिट जो लिया है वो 20% पे लिया
- 16:00हुआ है। और जो फाइनेंसिंग हो रही है वो
- 16:02मेरी 25% पे हो रही है। 25 26 का और प्लस
- 16:04स्प्रेड की बुनियाद पर। तो मेरे लिए आज यह
- 16:07फैसला करना या आज यह जानना यह बहुत आसान
- 16:11है कि मुझे कितने प्रॉफिट होने वाले हैं।
- 16:13मुझे पता है मसल मैंने इन्वेस्टमेंट की
- 16:15हुई है एक जगह इन्वेस्टमेंट की हुई है।
- 16:17वहां पर मुझे 10% प्रॉफिट मिलता है और मैं
- 16:19डिपॉजिट को ही लेना चाह रहा हूं। उस
- 16:20इन्वेस्टमेंट के लिए मैं कहूं मैं आपको 8%
- 16:22तक दूंगा। 2% मेरा नफा मसलन तो क्या मिली
- 16:25मुश्किल था? नहीं मुश्किल नहीं था।कि मैं
- 16:28एक बहुत ज्यादा रेगुलेटेड इंडस्ट्री में
- 16:30हूं। प्रॉफिट रेट्स मेरे सामने और मुझे
- 16:32पता है ट्रेंड क्या है कि पॉलिसी [संगीत]
- 16:34रेट कितना ऊपर जा सकता है, कितना नीचे जा
- 16:36सकता है।
- 16:36और दूसरा ये कि जनाब ये कैसे हो सकता है
- 16:38कि जहां बार-बार उलमा ही हमें बताते हैं
- 16:41कि इस्लामिक मॉडल में प्रॉफिट और लॉस
- 16:43दोनों होते हैं और डिपॉजिटर्स को दोनों
- 16:45सूरतों के लिए तैयार रहना चाहिए कि
- 16:47डिपॉजिटर्स को कभी नुकसान होता ही नहीं।
- 16:51यह बात भी सिर्फ इस्लामिक बैंकिंग के साथ
- 16:53मक्खसूस नहीं है। यह बैंकिंग के साथ है।
- 16:55क्या किसी ने कहा कन्वेंशनल बैंकिंग में
- 16:56लॉस हुआ? तो मुमकिन है कोई यह जवाब दे कि
- 16:58भाई वहां तो उन्होंने कहा गारंटीड है। आप
- 17:00तो कहते थे मुजार लॉस हो सकता है। देखिए
- 17:03इसको समझने की जरूरत है। बैंक के पास जब
- 17:05कोई डिपॉजिटर नफा अपना कोई रकम लेकर आता
- 17:08है तो ऐसा नहीं है। बैंक ही कहता है आपका
- 17:10नाम क्या है? अच्छा आपका ये आपके पैसे
- 17:11मैंने फला जगह लगा दिए हैं। यह आपने ₹1
- 17:13लाख दिए थे। लग गए और नुकसान हुआ तो मैं
- 17:15बोलूंगा ₹1 लाख के नुकसान हो गए। बल्कि
- 17:17ऐसा नहीं होता। बल्कि जो डिपॉज़िट्स आते
- 17:19हैं उनको एक जगह कमिंगल्ड कर दिया जाता
- 17:21है। एक पूल बना लिया जाता है। जहां पे
- 17:24लोगों की इन्वेस्टमेंट्स हैं यानी
- 17:25डिपॉज़िट्स हैं। किसी का 1 लाख, किसी का
- 17:281000, किसी का 10,000, किसी का 1 करोड़। अब
- 17:30जब यहां से मेरे पास जो रिटर्न में पैसा
- 17:32आया उस रिटर्न के पैसे देने के बाद मैंने
- 17:34कहा यार ये जो मुझे लॉसेस हुए हैं उन
- 17:36लॉसेस के करने के बावजूद भी इनके
- 17:39एक्सपेक्टेड रेट लेट्स से 9.80 बन रहे
- 17:42हैं। मैं अपनी तरफ से एक हिबा देता हूं
- 17:4420% का। 20% के बाद 20 पैसे का। 20 पैसे
- 17:48के बाद इनको 10% के दबा से रिटर्न मिल
- 17:51जाएगा। उसको पता चलेगा? नहीं पता चलेगा।
- 17:54क्योंकि उसको इस प्रोसेस की विजिबिलिटी
- 17:56नहीं है।
- 17:58लेकिन अब तो सवाल और संगीन हो जाता है ना
- 18:00कि आखिर क्यों इस्लामिक मॉडल में बैंक्स
- 18:03लोगों को नुकसान नहीं होने दे रहे? जबकि
- 18:05मेन मॉडल ही यही था कि रिस्क शेयर किया
- 18:08जाए। प्रॉफिट एंड लॉस दोनों शेयर किया जाए
- 18:11जो कि कन्वेंशनल बैंकिंग में नहीं होता
- 18:13था। जो कि ठीक नहीं था। जिसकी ही वजह से
- 18:15फिर यह इस्लामिक बैंकिंग का निजाम पेश
- 18:18किया गया था।
- 18:19लॉसेस की बाज दफा विजिबिलिटी नहीं होती।
- 18:21मैकेनिज्म इंटैक्ट है। मैकेनिज्म इन प्लेस
- 18:23है। लॉसेस होते हैं लेकिन लॉसेस इतने
- 18:26ज्यादा नहीं होते जिन लॉसेस के ज्यादा ना
- 18:28होने की वजह से एक्सपेक्टेड डेट कम नहीं
- 18:31होता या एक्सपेक्टेड डेट कम होता है। हम
- 18:34यह चाहते हैं कि जब तक हमें हिट ना पड़े
- 18:36तो हमें फील नहीं होगी। और बैंक इस्लामिक
- 18:40बैंकिंग इंस्टीट्यूशन इस चैलेंज में होते
- 18:42हैं कि अगर हमने उसको रिटर्न नीचे करा तो
- 18:44कस्टमर भाग जाएगा और कस्टमर ये समझता है
- 18:47कि मैं इतने सालों से मेरा डेसिमल भी
- 18:49तब्दील नहीं हुआ तो ये कैसी इस्लामिक
- 18:51बैंकिंग है कि कहते हैं एक्सपेक्टेड रेट
- 18:53और मिलता है फिक्स्ड रेट।
- 18:56वैसे तो अब एक और सवाल भी उठता है और वो
- 18:58ये कि आया किसी भी वजह से चाहे इस्लामिक
- 19:01बैंकिंग की तरफ लोगों को अट्रैक्ट करने या
- 19:03किसी भी वजह से लॉस को डेलीबेटली अगर
- 19:06डिपॉजिटर्स के लिए कट किया जाए तो ये क्या
- 19:08इस्लामिक मॉडल के तहत दुरुस्त अमल है भी
- 19:11या नहीं? लेकिन चल एक बार फिर आगे बढ़ते
- 19:14हैं।
- 19:17अब आप सोच रहे होंगे कि कितने अच्छे
- 19:19इस्लामी बैंक्स शरिया कंप्लाइंट तरीके से
- 19:21लोगों को सिर्फ फायदा ही फायदा पहुंचा रहे
- 19:23हैं। है ना? लेकिन आपको बताऊं कुछ लोगों
- 19:26का ख्याल है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।
- 19:28अच्छा स्टेट बैंक आपको ये कहता है जब
- 19:30पॉलिसी रेट जिसको आपने कहा था कि पॉलिसी
- 19:32रेट का मतलब है आजकल जो है मेरे ख्याल 11
- 19:34फीसद है कि पॉलिसी रेट 11 फीसद है तो आपको
- 19:37बैंक्स जो है ना तकरीबन आपको
- 19:40इस जो आपसे कर्ज आपको दे रहे होते हैं वो
- 19:4311:30 से ज्यादा लेकिन कार्य 11 12 1/2
- 19:46होगा 11 होगा। ठीक है? अच्छा स्टेट बैंक
- 19:48साथ-साथ आपको ये कहता था कि देखो अगर
- 19:50पॉलिसी रेट 11:30 है तो आप 8 से कम नहीं
- 19:52दे सकते डिपॉजिटर को। अगर तुम 12 12 ले
- 19:55रहे हो अपने
- 19:58बोरोअ से तो तुम कम से कम 8% दो उन बेवाओं
- 20:02को उन खवातीनों को उन हजरात को रिटायर्ड
- 20:05लोगों को जिन्होंने अपनी पूंजी तुम्हारे
- 20:07पास रखाई है उनको तुम 8 दो तो इस्लामिक
- 20:09बैंक बोलते थे नहीं ये इस्लाम के खिलाफ है
- 20:11आप फिक्स थोड़ी कर सकते हैं ये तो आपने
- 20:13फिक्स कर दिया तो सूद हो गया ओ भाई जब
- 20:16इस्ला जब जब पॉलिसी रेट बढ़ता है तो तो
- 20:19तुम बड़े मजे से फिक्स रेट पे 1% बढ़ा
- 20:21देते हो पहली तारीख को हर आदमी का रेट
- 20:23बढ़ा देते हो तो वो फिक्स तो था तो तुमको
- 20:26वो मंजूर था और स्टेट बैंक के ऊपर इतना
- 20:28प्रेशर था इनका कि वो स्टेट बैंक जो था वो
- 20:30डरता था वो करता नहीं था इनका बोल नहीं
- 20:31सकता था इनको ये बोलते थे नहीं ये इस्लाम
- 20:33के खिलाफ है इस्लाम के खिलाफ बात कर दी तो
- 20:35क्या बात करेंगे वो लेकिन खुद जब सूद लेने
- 20:37का वक्त आता था तो उसके अंदर थोड़ा सा वो
- 20:39यू नो अल्हम्दुलिल्लाह वो थोड़ा बहुत
- 20:42रास्ता निकाल लेते थे सूदने का वक्त आता
- 20:44तो तो रास्ता नहीं निकालते थे फिर अब
- 20:46स्टेट बैंक ने ये कहा है कि भाई आपको कम
- 20:48से कम मेरे ख्याल से जो आपका पास कैपिटल
- 20:51है उसका 75% पैसे कुछ आपको देने हैं। ऐसी
- 20:54कुछ इस स्टेट बैंक ने नया रूल निकाल दिया
- 20:56है। तो अब सबके लिए बराबर रूल कर दिया।
- 20:58लेकिन आज भी क्योंकि ऐसे बहुत से लोग हैं
- 21:00जो कहते हैं कि यार नहीं इस्लामिक बैंक
- 21:02में ही काम करना है। वो सूद से घबराते
- 21:04हैं। तो इस्लामिक बैंक जो उनको नफा देता
- 21:07है और सूद ही देता है बेसिकली वो उनको कम
- 21:10देता है बनिस्बत जो गैर इस्लामी बैंक है।
- 21:13तो एक्सप्लइट करता है अपने कस्टमर्स को।
- 21:17[संगीत]
- 21:21इस बात को समझने के लिए पहले यह समझ लें
- 21:23कि बैंक्स पैसा कैसे कमाते हैं। बैंक्स
- 21:25में हम पैसा रखते हैं जिस पर वो हमें मसलन
- 21:288% मुनाफा देता है। जबकि जब हम उससे पैसा
- 21:31लेते हैं तो हमें उसे ऊपर मसलन 14% देना
- 21:34होता है। अब यही आठ और 14% के बीच का
- 21:37मुनाफा स्प्रेड कहलाता है जो बुनियादी तौर
- 21:39पर बैंक्स की आमदनी होती है। कन्वेंशनल
- 21:42बैंक्स में फर्क यह होता है कि वह हमें
- 21:43इंटरेस्ट देता है। जबकि इस्लामी बैंक
- 21:45तिजारत के एवज मुनाफा। अब अगर आपने बैंक
- 21:48पर हमारी यह डॉक्यूमेंट्री देखी होगी तो
- 21:50आप जानते होंगे कि बैंक से जो आजकल
- 21:52रिकॉर्ड आमदनी हो रही है वह दरअसल इसलिए
- 21:54कि एक तो वो ज्यादातर हुकूमत को कर्जा
- 21:57देते हैं जिसमें एज सच लॉस का कोई खतरा
- 21:59नहीं ऊपर से लेकिन यह जो रकम दी भी जाती
- 22:02है इस पर मैक्सिमम फायदा हासिल करने के
- 22:05लिए बैंक्स धड़ाधड़ सेविंग अकाउंट्स को
- 22:08करंट अकाउंट्स में कन्वर्ट कर रहे हैं
- 22:10ताकि अब मसलन सिर्फ 8 और 14% के बीच का 6%
- 22:14नहीं बल्कि पूरा का पूरा 14% फायदा हो।
- 22:17क्यों? क्योंकि करंट अकाउंट्स में बैंक्स
- 22:19को लोगों को कुछ नहीं देना होता।
- 22:22आप अभी कहीं भी से बोले सेविंग अकाउंट
- 22:24खोलना है। अब तो खैर फिर भी खोल दें। पहले
- 22:25कहते नहीं सेविंग खोल ही नहीं सकते। हमें
- 22:27मना किया गया है। करंट अकाउंट पे कोई
- 22:28कॉस्ट नहीं देता बैंक। अगर सेविंग लेते
- 22:30हैं तो बैंक को कॉस्ट पड़ती है। टर्म
- 22:32डिपॉजिट देते हैं उस पे भी कॉस्ट पड़ती
- 22:33है।
- 22:34बैंक ब्रांचेस हैड टारगेट्स कि जी आपने
- 22:36सेविंग अकाउंट नहीं खोलने। आपने सेविंग से
- 22:38करंट में कन्वर्ट करना है।
- 22:39अच्छा करंट अकाउंट
- 22:42में क्यों है वो? आपके ख्याल में क्यों
- 22:45है? इसलिए है कि करंट अकाउंट से इंटरेस्ट
- 22:47नहीं मिल रहा। जब इंटरेस्ट नहीं मिल रहा
- 22:48उसकी विथिंग नहीं हो रही तो वो किसी
- 22:50रिकॉर्ड में ही नहीं है।
- 22:55अब यह बात इस्लामिक बैंकिंग की
- 22:57डॉक्यूमेंट्री में क्यों बताई? क्योंकि
- 22:59हालांकि उलमा इकराम करंट अकाउंट्स को
- 23:01प्रेफर नहीं करते। सेविंग अकाउंट्स को
- 23:03फरोख देते हैं। क्योंकि जाहिर है गुरबत के
- 23:05खात्मे के लिए इस्लाम कारोबार को,
- 23:08शराकतारी को इस सब को प्रमोट करता है।
- 23:11लेकिन यह एक ऐसी चीज है जो बावजूद मुफ्ती
- 23:13तकी उस्मानी साहब के बेटे इमरान अशरफ
- 23:15उस्मानी की तहरीरों की सूरत में कोशिश के
- 23:18फिलहाल किसी के काबू में नहीं। यानी आप ये
- 23:21डाटा देखेंगे तो आप जानेंगे कि पिछले चंद
- 23:23वर्षों में बढ़-बढ़कर अब तकरीबन सभी
- 23:26इस्लामी बैंकों के करंट अकाउंट्स टोटल
- 23:28अकाउंट्स के तकरीबन आधे हो चुके हैं।
- 23:31जिनमें सबसे ज्यादा रेश्यो हमारे प्रीमियर
- 23:33इस्लामिक बैंक का ही है। जबकि समझने के
- 23:36लिए कि वाकई ये स्केल कितना बड़ा है। अब
- 23:38आप यह डाटा देखेंगे तो आप शॉक हो जाएंगे
- 23:41कि करंट अकाउंट्स के डिपॉजिट्स में जिसे
- 23:43मुफ्त डिपॉजिट्स भी कहा जाता है। क्योंकि
- 23:46इससे बैंक्स तो दबाकर कमाते हैं लेकिन
- 23:48लोगों को कुछ नहीं देना होता। अगर सबसे
- 23:50बड़े इस्लामी बैंक की ही बात करें तो
- 23:52पिछले एक क्वार्टर में इन डिपॉजिट्स में
- 23:55240 अरब का इजाफा हुआ है। और यही वजह है
- 24:00कि इस एतराज को और तकवियत मिलती है कि
- 24:02इस्लामिक बैंक्स एक्सप्लॉयटेशन कर रहे
- 24:04हैं। क्यों? क्योंकि एक तरफ रिकॉर्ड आमदनी
- 24:08जबकि दूसरी जानिब लोगों को कन्वेंशनल
- 24:11बैंक्स की निस्बत इंतहाई कम मुनाफ।
- 24:15अगर कोई ज्यादा रिटर्न दे रहा है लेकिन
- 24:17हराम दे रहा है तो उसका लेना हलाल तो नहीं
- 24:20हो जाएगा। अगर मिसाल के तौर पे कोई बंदा
- 24:23किसी को हलाल रिटर्न दे रहा है लेकिन कम
- 24:25रिटर्न दे रहा है तो इसका मतलब वो एथिकली
- 24:28गलत कर रहे हैं।
- 24:28हलाल और हराम की बुनियाद पर हम आपको यह तो
- 24:30नहीं कहते कि आप किसी को प्रॉफिट कितना
- 24:32दें? यानी अगर एक आदमी मुझसे आकर पूछता है
- 24:34कि मैं पार्टनरशिप कर रहा हूं। मैं अपने
- 24:36पार्टनर को 5% प्रॉफिट दूंगा। 95स में
- 24:38रखूंगा। आप बताएं यह हलाल है, हराम है। तो
- 24:40मैं कहूंगा हलाल तक तो ठीक है अगर आप बामी
- 24:42रजामंदी से कर रहे हैं। लेकिन ये बहुत
- 24:44बड़ा फर्क हम समझते हैं कि नहीं होना
- 24:46चाहिए। अब अगर मुझसे पूछे कि आप बताएं
- 24:48कितना रखूं मैं तो मैं कहूंगा ये मेरे
- 24:49दायरे से बाहर है। मैं अगर आपसे कहूं
- 24:5150-50 करें और कल आप आके मुझे बताएं कि
- 24:53नहीं 50-50 तो नहीं हो सकता। इस वजह से हम
- 24:56लोगों ने इसमें ये बात शुरू से रखी उलमा
- 24:57इकराम ने और जितने भी इस्लामी बैंक से
- 24:59वाबस्ता हजरात हैं कि इसके अंदर जो जो
- 25:02रेगुलेटर होता है यानी कि जो निगबान
- 25:05कस्टोडियन होता है यानी स्टेट बैंक वगैरह
- 25:07ये इसके अंदर एक मुदाखलत करने के बाद कोई
- 25:10एक चीज हमारी स्टेट बैंक के भी पैनल के
- 25:13अंदर उलमा है उनकी मुशावरत से एक चीज तय
- 25:15करने के देखिए जी ये है हमारा हलाल हराम
- 25:18का दायरा और यह है हमारा एक रेगुलेटरी आप
- 25:20इसके मुताबिक करने के पाब
- 25:25अच्छाकि ये नुक्ता इंतहाई अहम है तो हमारी
- 25:28ख्वाहिश थी कि खुद उनका मकब भी इस पर
- 25:30हासिल कर लें। इसलिए हमने सबसे बड़े
- 25:32इस्लामी बैंक्स के फॉर्मर और हाजिर दोनों
- 25:34प्रेसिडेंट से रिक्वेस्ट की लेकिन अफसोस
- 25:37वहां से हामी नहीं भरी गई। खैर लेकिन ऐसा
- 25:40कैसे हो सकता है कि हम आपके सामने
- 25:42क्रेडिबल सोर्स से जवाब लेकर ना आए। हमने
- 25:46बहरहाल मिजान बैंक का मौकफ हासिल कर ही
- 25:49लिया। कैसे? अभी बताता हूं। भाई आप Madan
- 25:51बैंक की वेबसाइट पर जाएं तो वहां लोगों की
- 25:53मदद के लिए उन्हें जवाब देने के लिए
- 25:55उन्हीं का एक जीबीटी मौजूद है। हमने उससे
- 25:58पूछा कि जनाब बताओ madan बैंक की पिछले
- 26:00बरस कितनी आमदनी हुई? तो उसने बताया कि
- 26:032025 की रिपोर्ट के मुताबिक 285 अरब। फिर
- 26:06हमने उससे पूछा कि भाई अब यह बताओ कि यह
- 26:08आमदनी कैसे हुई? जानते हैं उसने ऑफिशियल
- 26:11डॉक्यूमेंट छानकर क्या जवाब दिया? 88%
- 26:14स्प्रेड से हुआ। यानी वही पैसे लेने और
- 26:17देने के बीच के उसी प्रॉफिट से जहां
- 26:19तकरीबन 50% केसेस में याद है ना क्योंकि
- 26:22वो पैसा करंट अकाउंट का है तो बैंक को
- 26:24लोगों को कख कुछ नहीं देना। अच्छा पहले तो
- 26:27सच्ची बात है कि हमें यकीन ही नहीं आया था
- 26:29कि मतलब इस्लामिक बैंक्स में इतनी आमदनी
- 26:31इस चीज से कैसे हो सकती है। जबकि इस्लामिक
- 26:33बैंक के बानी मुफ्ती तकीर उस्मानी साहब के
- 26:35घर से आवाें आ रही हैं कि करंट अकाउंट्स
- 26:37को कम करना चाहिए। लेकिन फिर हमारे सामने
- 26:39इरफान सिद्दीकी साहब जो कुछ महीने कबल तक
- 26:42प्रेसिडेंट मिजान बैंक थे उन्हीं की यह
- 26:44पडकास्ट सामने आई जिसमें उन्होंने खुद ही
- 26:46दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया।
- 26:48सेविंग अकाउंट पे इनफैक्ट इस्लामिक बैंक्स
- 26:51पैसे नहीं बना सकती हैं। मैं ये नहीं कह
- 26:54रहा हूं कि नहीं बनाती है बना नहीं सकती
- 26:56हैं। बाय थ्योरी नहीं बना सकती। सारे बैंक
- 26:58जो बेसिकली पैसे कमाते हैं, वह करंट
- 27:00अकाउंट की वजह से कमा पाते हैं वह। वह
- 27:02लेते हैं और फिर वही उसको जब लेंड कर रहे
- 27:04होते हैं वह तो उसमें मार्जिन्स आपके
- 27:06ज्यादा होते हैं।
- 27:07लेकिन इस पॉडकास्ट का सबसे हैरानक,
- 27:08परेशानक और कंफ्यूजिंग पार्ट आपको दिखाऊं।
- 27:11सेविंग अकाउंट का पूल होता है। आप अपने
- 27:13डिपॉजिटर के साथ मुयदा करते हैं कि भ मैं
- 27:16फॉरेन एक्सचेंज करूंगा तो वो मेरा हेडक
- 27:18है। उसका ना रिस्क मैं आपको दे रहा हूं ना
- 27:20रिवॉर्ड आपको दे रहा हूं। मैं अगर इक्विटी
- 27:22में पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में पैसे
- 27:24लगा रहा हूं बैंक। तो उसका ना उनको फायदा
- 27:25मिलता है ना नुकसान मिलता है। बिकॉज़ अगर
- 27:27हम उसमें डालें और वह नीचे चले जाए तो हम
- 27:29उनको लॉस देंगे। तो डे वन से यह होता है
- 27:31कि हम यह कहते हैं कि भ हम आपके पैसे जो
- 27:33हैं वो हमारी पूरा लेंडिंग पोर्टफोलियो उस
- 27:37जुमरे में आएगा पूरा। ये नहीं कि हम
- 27:39सिलेक्टिव के बाद अच्छी लैंडिंग हमने बाहर
- 27:41निकाल दिए। हाई रेंज वाली निकाल दिए। तो
- 27:43आवर एंटायर फाइनेंसिंग पोर्टफोलियो इस
- 27:45देयर एंटायर एंड आवर एंटायर सुक
- 27:47पोर्टफोलियो इस देयर। तो हम इसमें आपके
- 27:49साथ शेयर कर रहे होते हैं। तो ये हमारा वो
- 27:52है बेसिस ऑफ मशारकत। तो हमने स्टेटेड है
- 27:56कि भ हम आपको ना उसका नफा देंगे दूसरी चीज
- 27:58का ना प्रॉफिट देंगे।
- 28:00और हां एक और हैरानक बात आपको बताऊं जानते
- 28:02हैं मुफ्ती तक मानी साहब के मुताबिक
- 28:04इस्लामिक प्रोडक्ट्स में सबसे बेस्ट है
- 28:06मुशारका और मुदारबा क्योंकि ये सबसे बेहतर
- 28:09और एक्चुअल प्रॉफिट एंड लॉस शेयरिंग मॉडल
- 28:11है। इसीलिए उनके अपने बेटे के मुताबिक इसे
- 28:14ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए। जानते हैं
- 28:16आज भी अगर पाकिस्तान की बात करें तो यहां
- 28:19प्योर मुशारका सिर्फ 28% है। जबकि मुदार
- 28:22तो इतना कम है कि स्टेट बैंक के बुलेटन
- 28:25में इसकी कैटेगरी ही नहीं।
- 28:27असल में जो बात उन्होंने लिखी थी कि जब हम
- 28:28एक इकोनमिक मॉडल की बात करते हैं कि एक
- 28:31किसी मुल्क का इकोनमिक मॉडल कैसा होना
- 28:33चाहिए तो उसके अंदर जो फाइनेंसियल सिस्टम
- 28:36है वो ज्यादा से ज्यादा इस तरह का बना हुआ
- 28:39हो कि वो रियल सेक्टर जिसे हम कहते हैं ना
- 28:42फाइनेंसियल सेक्टर रियल रियल सेक्टर के
- 28:43साथ उसकी इंगेजमेंट ज्यादा हो। यानी कि वो
- 28:45उसके साथ ज्यादा मुतहरिक तौर पर फ़ तौर पर
- 28:48किरदार अदा करे और उसका तरीका यही है कि
- 28:50जहां पर भी आप इस तरह की चीजें करते हो
- 28:52वहां पर आपके पास पार्टनरशिप बेस काम हो
- 28:55ज्यादातर लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि
- 28:57अगर आपने कोई ऐसा काम किया जो कि ट्रेड
- 28:59बेस है वो नहीं हो सकता। मिसाल के तौर पर
- 29:00कंज्यूमर का जितना पोर्टफोलियो है वो कभी
- 29:03भी पार्टनरशिप पे इतना नहीं जा सकता। वो
- 29:05जॉइंट ओनरशिप पे रहेगा या ट्रेड पर रहेगा।
- 29:07यानी मिसाल के तौर पे आपने एक गाड़ी
- 29:08खरीदनी है 5 साल की फाइनेंस पे। मैं आपसे
- 29:11कहता हूं मैं आपसे पार्टनरशिप करूंगा। तो
- 29:12आप मुझसे कहते हैं अभी किस चीज की
- 29:13पार्टनरशिप करेंगे? गाड़ी तो मैं चलाऊंगा।
- 29:16इसकी वजह से इस इस जुमले की जो असल
- 29:18इंटरप्रिटेशन है उनकी ये है कि अगर हम एक
- 29:20इकोनमिक मॉडल बनाते हैं जिसे हम फाइनेंस
- 29:24की जबान में कहते हैं तो उसके अंदर
- 29:25इक्विटी बेस चीजें इस तरह की चीजों को
- 29:27बनना चाहिए और यकीनन यही मॉडल प्रेफरेबल
- 29:31है आने वाले वक्तों में भी। लेकिन इसके से
- 29:33जो हमारे बाज लोगों ने मतलब ये निकाला है
- 29:35कि नहीं ये मुदार मुराबा वगैरह जो है ना
- 29:37ये खुदा ना खास्ता कोई बहुत ही खराब चीज
- 29:38है। ऐसा कुछ नहीं है।
- 29:42अगर हम वाकई इस्लामिक फाइनेंसियल मॉडल की
- 29:44बात करें तो बिला तफरीक तमाम उलमा का भी
- 29:46इस बात पर इत्तेफाक है कि ये एक ऐसा मॉडल
- 29:48होता है जिससे गुरबत का खात्मा होता है
- 29:51जिसमें इस्तहसाल नहीं होता जिसमें चंद
- 29:53हाथों में पैसा नहीं रहता बल्कि घूमता है
- 29:55और हां जाहिर है जिसमें रिबा नहीं होता।
- 29:58लेकिन हकीकत यह है कि पिछले 24 बरस से
- 30:00इस्लामिक बैंकिंग का मॉडल होने के बावजूद
- 30:02आपके सामने ही है। ना खुर्बत में कमी है
- 30:05ना इसहसाल में जबकि पैसा भी चंद हाथों में
- 30:08ही जा रहा है।
- 30:09ये थोड़े से मसाइल है जो कि मेरा अपना
- 30:11ख्याल है कि ये तबीय तौर पर यानी के जब हम
- 30:14इंसेप्शन के अंदर होते हैं और ग्रोथ की
- 30:16तरफ जाते हैं तो इस तरह के मसाइल, इस तरह
- 30:18की मार्केट से आने वाले सवालात, लोगों की
- 30:20डिमांड, तनकीद इसके नतीजे में सिस्टम
- 30:22आहिस्ता-आहिस्ता बेहतर होता है। और ये चीज
- 30:24इस लिहाज से मुफीद होती है। यानी कि कोई
- 30:26भी पॉजिटिव तन जिसे हम कहते हैं पॉजिटिव
- 30:28क्रिटिसिज्म या मुस्बत तनकीद है वो इस
- 30:31लिहाज से अच्छी होती है कि आपको वो सिस्टम
- 30:33को बेहतर करने की तरफ तवज्जो देती है।
- 30:35अच्छा वैसे जहां इस रीजनिंग को काफी लोग
- 30:37एक्सेप्ट कर लेते हैं लेकिन आपको बताऊं कि
- 30:39बहरहाल एक राय यह भी है कि अब तो सिल्वर
- 30:42जुबली होने वाली है। इतने अरसे में तो
- 30:44मुकम्मल कुरान नाजिल हो गया था। तो ये
- 30:46क्या जस्टिफिकेशन अब भी मानने लायक है भी
- 30:49या नहीं?
- 30:50इंसान की एक तबीयत होती है। इंसान चाहता
- 30:52है हर चीज मेरी जिंदगी में हो।
- 30:53फितरत है इंसान की। जो कुछ हो मेरी जिंदगी
- 30:55में मैं देख के जाऊं दुनिया में। निजाम की
- 30:57तदीली के अगर लिहाज से आप देखें तो 25 50
- 31:00साल कोई बहुत बड़े नहीं होते। यानी अगर आप
- 31:02सिर्फ यह बुनियाद बना ले कि कोई इदारा 25
- 31:04साल से तो उसको सही हो जाना चाहिए। यह
- 31:06बुनियाद बना ले कि परसेंटेज इस पर एक
- 31:09रिसर्च अभी होनी बाकी है कि क्रिटिकल मास
- 31:11या तब्दीली के लिहाज से हमें कितना चाहिए।
- 31:13दुनिया के अगर हम वैसे देखें पूरी दुनिया
- 31:15के अंदर तो 25 साल कोई बहुत बड़ी मुद्दत
- 31:17नहीं है। मेरा ख्याल है कि थोड़ी और
- 31:19मुद्दत लगेगी। मैं खुद नहीं जानता कि
- 31:21कितनी लगेगी। हो सकता है कि मजीद 10 साल
- 31:22लगे। हो सकता है 20 साल लगे। लेकिन ये कि
- 31:25सिर्फ 25 साल को मेरार बनाना उम्र को
- 31:27मेरार बनाना मेरा ख्याल है कि ये इतना
- 31:30मुनासिब चीज नहीं है। हां बात तो बिलाश
- 31:34ठीक है और नियत पर भी किसी को शक नहीं
- 31:36लेकिन सवाल यह है कि ऐसे ही हर सूरत में
- 31:38कुछ ना कुछ बेनिफिट ऑफ डाउट बैंक्स के लिए
- 31:41रिलीफ या उन्हें वक्त देने की वजह से घूम
- 31:44फिर कर नतीजा यह निकल रहा है कि पैसा
- 31:46सिर्फ चंद हाथों में ही रह रहा है। इसीलिए
- 31:49बहुत से लोगों का ख्याल है कि करंट मॉडल
- 31:51रेबा फ्री बैंकिंग तो कहलाई जा सकती है
- 31:54लेकिन इस्लामिक।
- 32:02आखिर में हमारे मुखातिब वो लोग हैं जो
- 32:04समझते हैं कि यह दुनिया सूदी निजाम के
- 32:06बगैर चल ही नहीं सकती। और यह कि इस्लामिक
- 32:08फाइनेंसियल सिस्टम का कभी कोई वजूद रहा ही
- 32:11नहीं।
- 32:14जानते हैं 1896 में काहिरा की एक पुरानी
- 32:17इबादतगाह से सदियों पुराने 2 लाख खुतूत
- 32:20मिले थे। जिन्हें जनीदा डॉक्यूमेंट्स कहा
- 32:22जाता है। जिनका कई दहाइयों बाद जब तर्जमा
- 32:24हुआ तो पता चला कि मुसलमानों के सुनहरे
- 32:26तरीन मौशी दौर समझे जाने वाले फातिमी और
- 32:29अयूबी दौर के राज क्या थे। अब गौर से
- 32:32सुनिएगा। 300 साल तक जब यूरोप में सूद का
- 32:35राज था तो मशरिक वस्ता में एक ऐसा निजाम
- 32:37चल रहा था जिसमें ना सूद था और ना ही
- 32:40इस्तहसाल। बस भाईचारे पर कायम तिजारत।
- 32:44मतलब मतलब यह कि उस दौर में कर्ज बगैर
- 32:47किसी जमानत और सूद के मिलता था। गुरबत की
- 32:50सूरत में 1/3 कर्जा माफ कर दिया जाता था।
- 32:53अगर कोई ताजिर दिवालिया हो जाता तो उसका
- 32:55कर्ज अमीर तबका खुद अदा करता था। और सबसे
- 32:58बड़ा उसूल यह था कि पैसे को कभी खाली नहीं
- 33:01छोड़ा जाता था। हमेशा किसी ना किसी
- 33:03कारोबार में इन्वेस्ट कर दिया था। और
- 33:05खुदारा यह मत समझिएगा कि यह फिर कोई
- 33:07पसमांदा दौर होगा। जान लें कि यह उस वक्त
- 33:09के हिसाब से इतना एडवांस था कि ताजिर
- 33:11सिक्के उठाए बगैर सिर्फ एक लेटर ऑफ
- 33:14क्रेडिट पर यानी यूं समझ लें कि उस वक्त
- 33:16जब कोई तसवुर नहीं कर सकता था तो चेकक्स
- 33:19पर ट्यूनिस से हिजास तक लाखों का लेनदेन
- 33:22कर लेते थे।
- 33:24[संगीत]
- 33:26बात बहुत सादा सी है लेकिन बहुत अहम भी कि
- 33:29हमारा अल्टीमेट मकसद क्या है? क्या सिर्फ
- 33:32जो कन्वेंशनल बैंकिंग का मॉडल था जो उसके
- 33:35प्रोडक्ट्स थे उसकी हर चीज का बस मुतबादिल
- 33:38शरिया कंप्लाइंट वर्जन या फिर वाकई एक
- 33:41इस्लामिक फाइनेंशियल सिस्टम का कयाम जहां
- 33:44कैपिटल फिरो करे और गरीब का इस्तहसाल ना
- 33:47हो क्योंकि अगर मयार यही है तो फिर मुझे
- 33:50कह लेने दीजिए कि ऑल इज डेफिनेटली नॉट
- 33:53वेल। मुफ्ती तकी उस्मानी साहब की नियत और
- 33:55कोशिशों पर कोई शक नहीं कर सकता। लेकिन अब
- 33:58वक्त आ गया है कि उनकी तरफ से वही पैगाम
- 34:00वाज़ तौर पर इस्लामी बैंक्स को भेजा जाए जो
- 34:03अल्लाह ने मुसलमानों को 1500 साल पहले
- 34:06कुरान में नाजिल किया था।
- 34:11ऐ ईमान वालों तुम पूरे के पूरे इस्लाम में
- 34:14आ जाओ और शैतान की पैरवी ना करो कि वो
- 34:17तुम्हारा खुला दुश्मन है। कि वो तुम्हारा
- 34:21खुला दुश्मन है। कि वो तुम्हारा खुला
- 34:23दुश्मन है।
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This page contains the full transcript of Is Islamic Banking Really Islamic? (Don't Watch If You Can't Handle the Answer) by Raftar, generated from the public captions YouTube serves with the video. The transcript has 6,779 words across 861 segments, with the original timestamps preserved so you can click any line to jump to that moment in the embedded player.
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