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How Einstein Proved Newton Was Completely Wrong | हिंदी — Transcript

by Quera Official · 2,321 words · 285 segments · language en · Watch on YouTube

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  1. 0:00एक नॉर्मल सी सुबह थी साल 1907 की जब
  2. 0:03अल्बर्ट आइंस्टाइन अपने ऑफिस में बैठे हुए
  3. 0:05थे और अचानक उनके दिमाग में एक ऐसा ख्याल
  4. 0:08आया जिसने पूरी दुनिया ही बदल दी और सबसे
  5. 0:11मजेदार बात यह है कि वो ख्याल इतना सिंपल
  6. 0:13था कि आप सोचोगे कि भाई इसमें क्या बड़ी
  7. 0:15बात है। आइंस्टाइन ने बस यही सोचा था कि
  8. 0:18अगर कोई इंसान किसी बिल्डिंग से नीचे गिर
  9. 0:20रहा हो तो गिरते वक्त उसे अपना वजन महसूस
  10. 0:23नहीं होगा। बस इतनी सी बात। लेकिन इसी
  11. 0:26छोटी सी बात से निकली एक ऐसी थ्योरी जिसने
  12. 0:29हमें ब्लैक होल से लेकर टाइम ट्रैवल तक सब
  13. 0:31कुछ समझने में मदद की। तो चलो आज मैं आपको
  14. 0:34एक कहानी सुनाता हूं कि कैसे एक नॉर्मल सा
  15. 0:36इंसान यूनिवर्स के सबसे बड़े सीक्रेट को
  16. 0:38समझने में कामयाब हुआ। तो देखो पहले हमें
  17. 0:42थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा साल 1687 में जब
  18. 0:45आइसक न्यूटन नाम के एक साइंटिस्ट ने
  19. 0:47ग्रेविटी के बारे में एक आईडिया दिया था।
  20. 0:49[संगीत]
  21. 0:49अब न्यूटन का आईडिया बहुत ही सिंपल था और
  22. 0:51वो कुछ ऐसा था कि हर चीज दूसरी चीज को
  23. 0:54अपनी तरफ खींचती है। जैसे समझो ना अर्थ
  24. 0:56हमें अपनी तरफ खींच रही है। इसीलिए हम
  25. 0:58जमीन पर खड़े हैं। चांद को अर्थ खींच रही
  26. 1:01है। इसीलिए चांद हमारे अराउंड घूम रहा है
  27. 1:03और सूरज सभी प्लनेट्स को खींच रहा है।
  28. 1:06इसीलिए सभी प्लनेट्स सूरज के चक्कर लगा
  29. 1:08रहे हैं। अब यह आईडिया इतना कमाल का था कि
  30. 1:11इससे हम कैलकुलेट कर सकते थे कि चांद कल
  31. 1:13कहां होगा। मंगल ग्रह अगले महीने कहां
  32. 1:16होगा और यहां तक कि हम रॉकेट्स को भी
  33. 1:18स्पेस में भेज सकते थे। तो मतलब न्यूटन का
  34. 1:20आईडिया काम कर रहा था परफेक्टली। तो फिर
  35. 1:23प्रॉब्लम क्या थी? प्रॉब्लम यह थी कि
  36. 1:25न्यूटन यह तो बता रहे थे कि ग्रेविटी क्या
  37. 1:27करती है? लेकिन यह नहीं बता रहे थे कि
  38. 1:29ग्रेविटी काम कैसे करती है? जैसे समझो ना
  39. 1:32मैं आपसे पूछूं कि सूरज अर्थ को कैसे खींच
  40. 1:35रहा है? तो आप बोलोगे कि ग्रेविटी से ठीक
  41. 1:37है। पर ग्रेविटी काम कैसे करती है? सूरज
  42. 1:40और अर्थ के बीच में तो कुछ भी नहीं है।
  43. 1:42बीच में तो खाली स्पेस है। तो फिर सूरज
  44. 1:44अपनी ग्रेविटी अर्थ तक पहुंचाता कैसे है?
  45. 1:47क्या वहां कोई अदृश्य रस्सी है या फिर कोई
  46. 1:49मैग्नेट जैसी चीज है? न्यूटन के पास इसका
  47. 1:52कोई जवाब नहीं था। और यही वो सवाल था जो
  48. 1:55आइंस्टाइन को रात में नींद नहीं आने देता
  49. 1:57था। लेकिन आइंस्टाइन की कहानी भी बड़ी
  50. 1:59इंटरेस्टिंग है दोस्तों। बचपन में
  51. 2:01आइंस्टाइन कोई टॉपर टाइप स्टूडेंट नहीं
  52. 2:03थे। उन्हें स्कूल में बोरिंग लगता था
  53. 2:05क्योंकि टीचर्स बस याद करने के लिए बोलते
  54. 2:07थे, समझाते नहीं थे। आइंस्टाइन को तो बस
  55. 2:09सवाल पूछने थे, चीजों को समझना था। लेकिन
  56. 2:12स्कूल सिस्टम में तो बस किताब रट लो और
  57. 2:14एग्जाम पास कर लो। तो नेचुरली आइंस्टाइन
  58. 2:17का मन नहीं लगता था। और जब वो कॉलेज से
  59. 2:19ग्रेजुएट हुए तो सोचा था कि यार अब तो
  60. 2:21प्रोफेसर बन जाएंगे। रिसर्च करेंगे मजा
  61. 2:24आएगा। लेकिन रिजेक्शन पर रिजेक्शन मिलता
  62. 2:26रहा। कहीं भी जॉब नहीं मिली। फाइनली किसी
  63. 2:29तरह उन्हें एक पेटेंट ऑफिस में क्लर्क की
  64. 2:31जॉब मिल गई। स्विट्जरलैंड के एक छोटे से
  65. 2:33शहर बर्न में। अब सोचो कि वो इंसान जो
  66. 2:36यूनिवर्स के सीक्रेट समझना चाहता था वो
  67. 2:38दिन भर लोगों के पेटेंट एप्लीकेशनेशंस चेक
  68. 2:40कर रहा था कि यह नया आईडिया है या पुराना।
  69. 2:43लेकिन आइंस्टाइन ने हार नहीं मानी। दिन
  70. 2:45में वो ऑफिस में काम करते थे और शाम को
  71. 2:48अपने छोटे से अपार्टमेंट में बैठकर
  72. 2:49फिजिक्स के सवालों पर सोचते रहते थे। और
  73. 2:52साल 1905 में उन्होंने ऐसे चार पेपर्स
  74. 2:55पब्लिश कर दिए जिन्होंने [संगीत] पूरी
  75. 2:57साइंस कम्युनिटी को हिला दिया। इन पेपर्स
  76. 2:59में से एक था स्पेशल रिलेटिविटी के बारे
  77. 3:02में जिसमें उन्होंने बताया कि टाइम सबके
  78. 3:04लिए एक जैसा नहीं चलता। जैसे अगर आप बहुत
  79. 3:06तेज स्पीड से ट्रैवल करो तो आपके लिए टाइम
  80. 3:09स्लो हो जाएगा। अब यह सुनकर लोगों ने कहा
  81. 3:11[संगीत] कि यह क्या बकवास है भाई? टाइम तो
  82. 3:14टाइम है। सबके लिए एक जैसा होता है। लेकिन
  83. 3:16आइंस्टाइन ने मैथमेटिकली प्रूव [संगीत] कर
  84. 3:18दिया और बाद में एक्सपेरिमेंट से भी
  85. 3:21कंफर्म हो गया। लेकिन स्पेशल रिलेटिविटी
  86. 3:23में एक प्रॉब्लम थी और वो यह कि यह सिर्फ
  87. 3:26उन चीजों पर काम करती थी जो एक ही स्पीड
  88. 3:29से चल रही हो। लेकिन रियल लाइफ में तो
  89. 3:31चीजें तेज होती हैं, स्लो होती हैं, रुकती
  90. 3:33हैं फिर चलती हैं। तो आइंस्टाइन को पता था
  91. 3:36कि उन्हें इससे भी आगे जाना होगा और यहीं
  92. 3:38से शुरू होती है असली कहानी। 1907 की उस
  93. 3:42सुबह जब आइंस्टाइन अपने ऑफिस में बैठे थे
  94. 3:44और अचानक उनके दिमाग में वो ख्याल आया।
  95. 3:47उन्होंने सोचा कि अगर कोई इंसान किसी
  96. 3:49बिल्डिंग से गिर रहा हो तो उसे अपना वजन
  97. 3:52महसूस नहीं होगा। अब यह सुनकर आप सोचोगे
  98. 3:54कि इसमें क्या नया है? लेकिन आइंस्टाइन ने
  99. 3:57इस सिंपल सी बात से एक बहुत बड़ी चीज
  100. 3:59निकाली। उन्होंने सोचा कि ठीक है गिरते
  101. 4:02वक्त इंसान को वजन महसूस नहीं होता। लेकिन
  102. 4:04वही इंसान अगर एक रॉकेट में बैठा हो जो
  103. 4:07ऊपर की तरफ तेजी से जा रहा हो तो उसे
  104. 4:09ज्यादा वजन महसूस होगा। अब यहां पर एक
  105. 4:12मजेदार चीज है। इमेजिन करो कि एक आदमी एक
  106. 4:14बंद कमरे में है जिसमें कोई खिड़की नहीं
  107. 4:17है। अब अगर वह कमरा स्पेस में है और तेजी
  108. 4:20से ऊपर की तरफ जा रहा है तो उस आदमी को
  109. 4:22लगेगा कि मुझ पर ग्रेविटी का असर हो रहा
  110. 4:24है और अगर वही कमरा अर्थ पर रखा हो तो भी
  111. 4:27उसे वैसा ही फील होगा। तो अब सवाल यह है
  112. 4:30कि क्या वो आदमी बता सकता है कि वो
  113. 4:31ग्रेविटी के असर में है या फिर एक्सीलरेशन
  114. 4:34के असर में है? और जवाब है नहीं वो नहीं
  115. 4:37बता सकता। दोनों एक जैसे ही महसूस होते
  116. 4:39हैं। और आइंस्टाइन ने कहा कि अगर दोनों एक
  117. 4:41जैसे महसूस होते हैं तो मतलब दोनों एक ही
  118. 4:44चीज है। और इसी को उन्होंने नाम दिया
  119. 4:46इक्विवेलेंस प्रिंसिपल। अब इस आईडिया से
  120. 4:48आइंस्टाइन के दिमाग में एक बिजली सी
  121. 4:50कौंधी। अगर ग्रेविटी और एक्सीलरेशन एक ही
  122. 4:53चीज है और मुझे पता है कि तेज चलने से
  123. 4:56टाइम स्लो होता है तो इसका मतलब ग्रेविटी
  124. 4:58से भी टाइम स्लो होना चाहिए। और यहीं से
  125. 5:00शुरू हुआ वो सफर जो 8 साल तक चला। हां
  126. 5:03दोस्तों 8 साल। आइंस्टाइन को इस पूरी चीज
  127. 5:06को समझने में और एक थ्योरी बनाने में पूरे
  128. 5:088 साल लग गए और वो 8 साल इतने आसान नहीं
  129. 5:12थे। कई बार उन्होंने सोचा कि शायद मैं गलत
  130. 5:14दिशा में जा रहा हूं। कई बार उन्हें लगा
  131. 5:16कि शायद यह काम ही नहीं करेगा। असल में
  132. 5:18प्रॉब्लम यह थी कि इस पूरी चीज को समझाने
  133. 5:21के लिए बहुत ही मुश्किल टाइप की मैथ्स की
  134. 5:23जरूरत थी और आइंस्टाइन को वो मैथ्स अच्छे
  135. 5:25से आती नहीं थी। तो उन्होंने अपने एक
  136. 5:27दोस्त से हेल्प मांगी जो मैथ्स में बहुत
  137. 5:29अच्छा था। और उस दोस्त ने उन्हें बताया कि
  138. 5:32एक मैथमेटिशियन थे रीमान जिन्होंने कर्व्ड
  139. 5:34स्पेसेस पर काम किया था और यहीं पर
  140. 5:36आइंस्टाइन को वो चीज मिली जो वो ढूंढ रहे
  141. 5:39थे। अब ये कर्व्ड स्पेस क्या होता है? चलो
  142. 5:41मैं एक बहुत ही सिंपल एग्जांपल से समझाता
  143. 5:43हूं। इमेजिन करो कि एक बड़ा सा ट्रेंपलीन
  144. 5:45है जो एकदम टाइट खिंचा हुआ है। अब अगर मैं
  145. 5:48उस ट्रैपलिन पर एक बोलिंग बॉल रख दूं तो
  146. 5:50क्या होगा? वो बॉल अपने वजन की वजह से
  147. 5:52ट्रैपलिन को नीचे की तरफ दबा देगी और एक
  148. 5:55गड्ढा सा बन जाएगा। अब अगर मैं एक छोटी सी
  149. 5:57मार्बल को उस ट्रैपलिन पर रोल करूं तो वो
  150. 6:00मार्बल सीधी लाइन में नहीं जाएगी बल्कि वो
  151. 6:02उस गड्ढे की तरफ घूमते हुए जाएगी और
  152. 6:05धीरे-धीरे उस बोलिंग बॉल के पास पहुंच
  153. 6:07जाएगी। बस यही है ग्रेविटी का सीक्रेट।
  154. 6:10आइंस्टाइन ने समझा कि स्पेस कोई खाली चीज
  155. 6:13नहीं है जैसा हम सोचते हैं। स्पेस एक
  156. 6:15फैब्रिक की तरह है जैसे वो ट्रेंपलिंग। और
  157. 6:18जब कोई भारी चीज जैसे सूरज या अर्थ उस
  158. 6:21फैब्रिक में आती है तो वह उसे दबा देती
  159. 6:23है। उसमें गड्ढा बना देती है और फिर दूसरी
  160. 6:26चीजें उस गड्ढे में मूव करती हैं। तो
  161. 6:29ग्रेविटी कोई फोर्स नहीं है जो चीजों को
  162. 6:31खींच रही है। ग्रेविटी असल में स्पेस का
  163. 6:33बेंड होना है। अर्थ सूरज के चक्कर इसलिए
  164. 6:36नहीं लगा रही क्योंकि सूरज उसे खींच रहा
  165. 6:38है बल्कि इसलिए लगा रही है क्योंकि सूरज
  166. 6:41ने अपने आसपास की स्पेस को इतना बेंड कर
  167. 6:44दिया है कि अर्थ बस उस बेंड में घूम रही
  168. 6:46है। जैसे आपने वो कॉइन ड्रॉप मशीन देखी
  169. 6:49होगी ना फन फेयर्स में जिसमें आप एक कॉइन
  170. 6:51डालते हो और वो कॉइन बीच के होल के अराउंड
  171. 6:54घूमती घूमती नीचे गिर जाती है। बस वैसे ही
  172. 6:57अर्थ सूरज के बनाए हुए गड्ढे में घूम रही
  173. 6:59है। अब इस पूरे आईडिया को आइंस्टाइन को
  174. 7:02मैथ्स में लिखना था। और ये काम इतना
  175. 7:05मुश्किल था कि कई बार उन्होंने सोचा कि
  176. 7:07छोड़ दूं [संगीत] लेकिन वो लगे रहे।
  177. 7:09हजारों पेजेस के कैलकुलेशंस किए। कई बार
  178. 7:11सब गलत निकला तो सब फाड़ कर फिर से शुरू
  179. 7:14किया। और फाइनली नवंबर 1915 में उन्होंने
  180. 7:18वो इक्वेशन ढूंढ लिया जो सब कुछ एक्सप्लेन
  181. 7:20कर रहा था। जब उन्होंने यह इक्वेशन सॉल्व
  182. 7:23किया तो वो इतने एक्साइटेड थे कि उन्हें
  183. 7:25कई दिनों तक नींद नहीं आई। उन्होंने बाद
  184. 7:27में अपने एक दोस्त को लेटर में लिखा था कि
  185. 7:30मुझे लग रहा है जैसे मैंने यूनिवर्स के
  186. 7:32सबसे बड़े सीक्रेट को छू लिया हो। लेकिन
  187. 7:34थ्योरी बनाना तो बस आधी बात थी। असली
  188. 7:37चैलेंज था इसे प्रूव करना। क्योंकि साइंस
  189. 7:39में कोई भी चीज तब तक एक्सेप्ट नहीं होती
  190. 7:41जब तक उसे प्रूव ना कर दिया जाए। तो
  191. 7:43आइंस्टाइन ने सोचा कि मेरी थ्योरी से कुछ
  192. 7:46ऐसी प्रेडिक्शनंस करूं जिन्हें टेस्ट किया
  193. 7:48जा सके। उनकी पहली प्रेडिक्शन यह थी कि
  194. 7:51अगर सूरज जैसी भारी चीज स्पेस को बेंड
  195. 7:53करती है तो वो लाइट को भी बेंड करनी
  196. 7:55[संगीत] चाहिए। मतलब अगर किसी स्टार की
  197. 7:58लाइट सूरज के पास से गुजरे तो वो लाइट
  198. 8:00थोड़ी सी बेंड हो जानी चाहिए। अब यह टेस्ट
  199. 8:03करना बहुत मुश्किल था क्योंकि दिन में तो
  200. 8:04सूरज की रोशनी इतनी तेज होती है कि दूसरे
  201. 8:07स्टार्स दिखते ही नहीं। लेकिन एक मौका था
  202. 8:10जब यह चेक किया जा सकता था और वो था सोलर
  203. 8:12एक्लिप्स का टाइम। 1919 में एक सोलर
  204. 8:15एक्लिप्स आने वाला था [संगीत] और एक
  205. 8:17ब्रिटिश साइंटिस्ट आर्थर एडिंगटन ने
  206. 8:18डिसाइड किया कि वो इस मौके का फायदा उठाकर
  207. 8:21आइंस्टाइन की थ्योरी को टेस्ट करेंगे।
  208. 8:23एडिंगटन ने दो टीमें भेजी। एक अफ्रीका में
  209. 8:26और एक साउथ अमेरिका में। और एक्लिप्स के
  210. 8:29दौरान उन्होंने जो देखा वो कमाल का था।
  211. 8:31सूरज के पास दिखने वाले स्टार्स की पोजीशन
  212. 8:34वाकई में थोड़ी सी शिफ्ट हुई थी। एकदम
  213. 8:36उतनी ही जितना आइंस्टाइन ने कहा था। और बस
  214. 8:39इसके बाद तो धूम मच गई। अखबारों में
  215. 8:42बड़ी-बड़ी हेडलाइंस आई। न्यूटन गलत थे।
  216. 8:44आइंस्टाइन सही हैं। रातोंरात आइंस्टाइन
  217. 8:47वर्ल्ड फेमस हो गए। लोग सड़कों पर उन्हें
  218. 8:49पहचानने लगे। न्यूज़पेपर्स में उनकी फोटोज
  219. 8:52आने लगी। वो पेटेंट ऑफिस का क्लर्क अब
  220. 8:54दुनिया का सबसे फेमस साइंटिस्ट बन चुका
  221. 8:56था। [संगीत] लेकिन सबसे मजेदार बात यह थी
  222. 8:59कि आइंस्टाइन को खुद पूरा यकीन नहीं था कि
  223. 9:01उनकी थ्योरी सही है या नहीं। जब एडिटन के
  224. 9:04रिजल्ट्स आए तो किसी ने उनसे पूछा कि अगर
  225. 9:06यह रिजल्ट्स गलत निकलते तो क्या होता? तो
  226. 9:09आइंस्टाइन ने बड़े आराम से कहा था कि फिर
  227. 9:11मुझे यूनिवर्स पर तरस आता क्योंकि मेरी
  228. 9:13थ्योरी तो सही है और सच में उनकी थ्योरी
  229. 9:16सही निकली। आज पूरे 100 साल से ज्यादा हो
  230. 9:19गए हैं। लेकिन आइंस्टाइन की जनरल थ्योरी
  231. 9:21ऑफ रिलेटिविटी को आज तक कोई गलत साबित
  232. 9:23नहीं कर पाया है। हर बार जब भी कोई नया
  233. 9:26एक्सपेरिमेंट होता है, वो आइंस्टाइन को ही
  234. 9:28राइट प्रूफ करता है। जैसे कि आज हमारे
  235. 9:30मोबाइल्स में जो जीपीएस है ना वो भी
  236. 9:32आइंस्टाइन की थ्योरी पर काम करता है
  237. 9:34क्योंकि स्पेस में घूम रहे सेटेलाइट्स के
  238. 9:37लिए टाइम थोड़ा अलग चलता है और अगर हम उसे
  239. 9:40एडजस्ट ना करें तो जीपीएस गलत लोकेशन
  240. 9:42बताएगा। फिर 2015 में साइंटिस्ट ने
  241. 9:45ग्रेविटेशनल वेव्स को डिटेक्ट किया जिसके
  242. 9:48बारे में आइंस्टाइन ने 100 साल पहले बताया
  243. 9:50था। उन्होंने कहा था कि जब दो ब्लैक होल्स
  244. 9:53एक दूसरे से टकराते हैं तो स्पेस में
  245. 9:55लहरें पैदा होती हैं और सच में वैसा ही
  246. 9:57निकला। इस डिस्कवरी के लिए साइंटिस्ट को
  247. 10:00नोबेल प्राइज भी मिला। तो आज की इस कहानी
  248. 10:02से हमें क्या सीख मिलती है? पहली बात तो
  249. 10:05यह कि कोई भी बड़ी चीज रातोंरात नहीं
  250. 10:07होती। आइंस्टाइन को इस थ्योरी पर 8 साल
  251. 10:10लगे। 8 साल की मेहनत, 8 साल का संघर्ष।
  252. 10:14कितनी बार उन्हें लगा होगा कि शायद यह काम
  253. 10:16नहीं करेगा। लेकिन फिर भी वो रुके नहीं।
  254. 10:20दूसरी बात यह कि बड़े आइडियाज अक्सर
  255. 10:22छोटी-छोटी चीजों से निकलते हैं। एक गिरते
  256. 10:24हुए आदमी के बारे में सोचना, इतनी सी बात
  257. 10:27से निकली एक ऐसी थ्योरी जिसने पूरी दुनिया
  258. 10:30बदल दी। तीसरी बात यह कि फेलियर से डरना
  259. 10:33नहीं चाहिए। [संगीत] आइंस्टाइन को कहीं
  260. 10:35जॉब नहीं मिली थी। लेकिन उन्होंने हार
  261. 10:37नहीं मानी। वो एक छोटी सी जॉब करते रहे और
  262. 10:40साथ-साथ अपने सपनों पर काम करते रहे।
  263. 10:43[संगीत] और चौथी और सबसे इंपॉर्टेंट बात
  264. 10:45यह कि क्यूरियोसिटी यानी कि जानने की
  265. 10:48इच्छा सबसे बड़ी ताकत है। आइंस्टाइन के
  266. 10:51पास ना कोई बड़ी लैब थी, ना कोई सुपर
  267. 10:54कंप्यूटर था। बस उनके पास था उनका दिमाग
  268. 10:56और सवाल पूछने की हिम्मत। तो दोस्तों, यही
  269. 10:59थी आइंस्टाइन और उनकी जनरल थ्योरी ऑफ
  270. 11:01रिलेटिविटी की कहानी। एक ऐसी कहानी जो
  271. 11:04हमें सिखाती है कि मेहनत, लगन और
  272. 11:06क्यूरियोसिटी से कुछ भी पॉसिबल है।
  273. 11:08आइंस्टाइन ने साबित कर दिया कि एक नॉर्मल
  274. 11:11इंसान भी यूनिवर्स के सबसे बड़े सीक्रेट्स
  275. 11:14को समझ सकता है। बस जरूरत है तो सवाल
  276. 11:16पूछने की हिम्मत की, मेहनत करने के जज्बे
  277. 11:19की और हार ना मानने की ताकत की। उम्मीद
  278. 11:22करता हूं आपको यह कहानी पसंद आई होगी और
  279. 11:24आपको कुछ नया सीखने को मिला होगा। अगर
  280. 11:27वीडियो अच्छी लगी तो लाइक जरूर करना और
  281. 11:29चैनल को सब्सक्राइब करना मत भूलना। मिलते
  282. 11:32हैं अगली वीडियो में एक नई इंटरेस्टिंग
  283. 11:34कहानी के साथ। तब तक के लिए स्टे
  284. 11:36क्यूरियस, कीप लर्निंग एंड कीप ग्रोइंग।
  285. 11:38जय हिंद।

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