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तुर्की के दो मोची भाइयों की कहानी। #history #moralstory — Transcript

by live's true horizon · 3,555 words · 428 segments · language en · Watch on YouTube

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  1. 0:00तुर्की के एक छोटे से गांव में दो गरीब
  2. 0:02मोची रहते थे। दोनों भाई बहुत मेहनत करके
  3. 0:04गुजर बसर करते थे। उनके पास थोड़ी सी जमीन
  4. 0:07भी थी, जिसकी पैदावार से उनकी जरूरतें
  5. 0:10पूरी हो जाती थी। लेकिन इत्तेफाक से उसी
  6. 0:12गांव में एक नया मोची आ गया और धीरे-धीरे
  7. 0:15सभी गांव वाले अपने जूते उसी से बनवाने
  8. 0:18लगे। हालात और बिगड़ गए जब उस साल भारी
  9. 0:21बारिश और सर्दी की वजह से उनकी जौ की फसल
  10. 0:24खराब हो गई। अब उनके सामने गुजारे का संकट
  11. 0:28खड़ा हो गया। दोनों भाइयों की झोपड़ी गांव
  12. 0:31से थोड़ी दूर जंगल के पास थी। बर्फबारी
  13. 0:34इतनी ज्यादा हो चुकी थी कि जंगल के सारे
  14. 0:36पेड़ों पर बर्फ जम गई थी। तभी उनकी झोपड़ी
  15. 0:39के बाहर एक बड़ा दरख्त गिर पड़ा। दोनों
  16. 0:42भाइयों ने उस दरख्त को कांटा और उसकी
  17. 0:44लकड़ी से आग जलाई। खोखले तने को वे झोपड़ी
  18. 0:47के अंदर ले आए और उस पर बैठकर आग की गर्मी
  19. 0:50लेने लगे। इसी दौरान अचानक उन्हें एक कोयल
  20. 0:54की आवाज सुनाई दी। देखते ही देखते वही
  21. 0:57कोयल उस खोखले तने से निकल कर सामने आई और
  22. 1:00जाकर मेज पर बैठ गई। दोनों भाई हैरान रह
  23. 1:03गए। उनकी हैरानी और बढ़ गई। जब वह कोयल
  24. 1:06इंसानों की तरह बोल उठी उसने पूछा यह कौन
  25. 1:09सा मौसम है? शाकिर ने जवाब दिया, "यह
  26. 1:12सर्दी का मौसम है और बर्फबारी हो रही है।"
  27. 1:15कोयल बोली, ओह, आग की गर्मी के कारण मुझे
  28. 1:18लगा कि गर्मी आ गई है। वैसे भी तुमने मेरा
  29. 1:21घर और घोंसला तोड़ दिया है। अब गर्मियों
  30. 1:24तक मुझे अपने पास ही रख लो। मेरे लिए यह
  31. 1:26खोखला तना ही काफी है। जब गर्मी आएगी तो
  32. 1:29मैं अपनी यात्रा पर निकल जाऊंगी और वापसी
  33. 1:32पर तुम्हारे लिए एक तोहफा लेकर आऊंगी।
  34. 1:34जिससे तुम्हारी मुश्किलें कम हो जाएंगी।
  35. 1:37यह सुनकर शाकिर ने मुस्कुराते हुए कहा,
  36. 1:40ठीक है, मैं तुम्हारे लिए एक नया घोंसला
  37. 1:42बना देता हूं। तुम आराम से हमारे साथ रह
  38. 1:45सकती हो। गर्मियों तक हम तुम्हारी देखभाल
  39. 1:47करेंगे। तुम्हें भूख भी लगी होगी। शाकिर
  40. 1:50ने कोयल की ओर देखते हुए कहा, इसीलिए मैं
  41. 1:53अपने हिस्से की आधी रोटी तुम्हें देता
  42. 1:55हूं। कोयल ने रोटी खाई, पानी पिया और फिर
  43. 1:59शाकिर के बनाए हुए घोंसले में जाकर आराम
  44. 2:02से सो गई। कुछ दिन बीते। एक सुबह दोनों
  45. 2:05भाई कोयल की मीठी कूक सुनकर जाग गए।
  46. 2:07उन्होंने देखा कि कोयल खिड़की पर बैठी थी
  47. 2:10और बाहर जाने की तैयारी कर रही थी। उसने
  48. 2:13कहा, अब मैं दुनिया के सफर पर निकल रही
  49. 2:16हूं ताकि हर जगह बसंत के आने की खबर
  50. 2:19पहुंचा दूं। लेकिन बताओ वापसी पर तुम्हारे
  51. 2:22लिए क्या तोहफा लाऊं? यह सुनते ही फजलों
  52. 2:25की आंखों में लालच चमक उठा। वह बोला, "तुम
  53. 2:28तो पूरी दुनिया देख चुकी हो। मेरे लिए कोई
  54. 2:31बड़ा सा हीरा या कीमती मोती ले आना ताकि
  55. 2:33हमारी सारी मुसीबतें खत्म हो जाए। कोयल ने
  56. 2:36मुस्कुराकर जवाब दिया, हीरे तो चट्टानों
  57. 2:39में छुपे रहते हैं और मोती समंदर की
  58. 2:42गहराइयों में होते हैं। उन्हें निकालना
  59. 2:44मेरे बस में नहीं है। लेकिन यहां से बहुत
  60. 2:47दूर एक कुआंव है जिसके किनारे दो पेड़
  61. 2:49खड़े हैं। उनमें से एक पेड़ सुनहरी पेड़
  62. 2:52कहलाता है। क्योंकि उसके पत्ते सोने के
  63. 2:55बने हैं। दूसरा पेड़ जैतून का पेड़ है जो
  64. 2:58हमेशा हरा भरा रहता है। कहते हैं कि जो
  65. 3:00कोई भी उसके पत्ते को अपने पास रख लेता
  66. 3:02है, वह इल्म और दानिश का मालिक बन जाता
  67. 3:05है। उसका दिल हमेशा सुकून और तसल्ली से
  68. 3:08भरा रहता है। चाहे वह झोपड़ी में क्यों ना
  69. 3:11रहे उसे ऐसा लगेगा जैसे वह महल में रह रहा
  70. 3:14है। यह सुनकर शाकिर ने बड़ी सादगी से कहा।
  71. 3:17प्यारी कोयल, तुम मेरे लिए जैतून का पत्ता
  72. 3:20ले आना। फजलू ने तुरंत टोका। तुम बिल्कुल
  73. 3:23अहमक हो। सोने का पत्ता क्यों नहीं मांगा?
  74. 3:26प्यारी कोयल तुम मेरे लिए सोने का पत्ता
  75. 3:29ही ले आना। कोयल ने दोनों भाइयों को
  76. 3:31अल्लाह हाफिज कहा और खुली खिड़की से उड़ान
  77. 3:34भर दी। वह मैदानों और चरागाहों के ऊपर से
  78. 3:37उड़ती हुई दूर चली गई। रास्ते भर वह अपनी
  79. 3:40मीठी आवाज में सबको बसंत आने की खुशखबरी
  80. 3:43सुनाती रही। इधर दोनों भाइयों ने उस पूरे
  81. 3:46साल बड़ी तंगी और मुश्किलात के साथ गुजारा
  82. 3:49किया। लोगों ने दोनों भाइयों से जूते
  83. 3:51बनवाना बंद कर दिया था और उस साल उनकी
  84. 3:54बाजरे की फसल भी बहुत कम हुई। धीरे-धीरे
  85. 3:57उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि फाकाकशी तक
  86. 4:00नौबत आ पहुंची। जब बाहर का मौसम आया तो एक
  87. 4:04सुबह उनकी झोपड़ी के दरवाजे पर दस्तक हुई।
  88. 4:06साथ ही कोयल की प्यारी आवाज सुनाई दी।
  89. 4:09मेरे दोस्तों जल्दी से दरवाजा खोलो। मैं
  90. 4:12तुम्हारे लिए तोहफा लाई हूं। शाकिर दौड़कर
  91. 4:15दरवाजा खोलने गया। अंदर आते ही कोयल की
  92. 4:18चोंच में दो पत्ते चमक रहे थे। एक बड़ा
  93. 4:21सुनहरी पत्ता और दूसरा हराभरा जैतून का।
  94. 4:24उसने सोने का पत्ता फजलू को और जैतून का
  95. 4:27पत्ता शाकिर को देते हुए कहा, "मैं यह
  96. 4:30पत्ते दुनिया के आखिरी सिरे से तुम्हारे
  97. 4:32लिए लाई हूं। लेकिन अब मुझे जल्दी से कुछ
  98. 4:35खाने के लिए दो। क्योंकि मुझे अभी उत्तरी
  99. 4:37मुल्कों की ओर उड़ना है। ताकि वहां भी
  100. 4:39बाहर के आने की खुशखबरी पहुंचा सकूं।
  101. 4:42शाकिर ने बिना देर किए अपने हिस्से की
  102. 4:44रोटी कोयल के सामने रख दी। कोयल रोटी खाने
  103. 4:47लगी। इतने में फजलू ने गर्व से अपना सोने
  104. 4:49का पत्ता दिखाते हुए शाकिर से कहा, देखा
  105. 4:52मेरी अकलमंदी। अब समझ आया कि किस चीज की
  106. 4:55कीमत होती है। कोयल ने रोटी खाते-खाते
  107. 4:58शाकिर से कहा, "अगर अगर तुम चाहो तो मैं
  108. 5:01अगले साल तुम्हारे लिए भी सोने का पत्ता
  109. 5:03ले आऊंगी।" लेकिन शाकिर ने मुस्कुराते हुए
  110. 5:05जवाब दिया, नहीं प्यारी कोयल, तुम मेरे
  111. 5:08लिए हर बार सिर्फ जैतून का पत्ता ही लाना।
  112. 5:10फजलू ने तुरंत टोका। और मेरे लिए हर बार
  113. 5:13सोने का पत्ता ही लाना। कोयल ने उन्हें
  114. 5:16अल्लाह हाफिज कहा और दोबारा अपने सफर पर
  115. 5:19निकल गई। उसके जाते ही फजलू दांत पीसते
  116. 5:22हुए बोला, तुमने जिंदगी का सबसे सुनहरा
  117. 5:24मौका गवा दिया। जैतून के पत्तों से
  118. 5:27तुम्हें आखिर क्या मिलेगा? वह शाकिर को
  119. 5:29ताने और तिरस्कार भरी बातें सुनाता रहा।
  120. 5:32लेकिन शाकिर हर बार मुस्कुरा कर कहता, भाई
  121. 5:35कनात, संतोष से बढ़कर कोई दौलत नहीं। सोना
  122. 5:39चांदी तो आनी जानी चीज है। यह सुनकर फजलू
  123. 5:42का गुस्सा और भड़क उठा। वह चिल्लाकर बोला,
  124. 5:45"तुम मेरे जैसे समझदार और अक्लमंद आदमी के
  125. 5:48साथ रहने के काबिल नहीं हो।" कहकर उसने
  126. 5:51सुनहरी पत्ता उठाया और झोपड़ी से बाहर चला
  127. 5:54गया। गांव वालों ने जब शाकिर की बेपरवाही
  128. 5:57और बेवकूफी की बातें सुनी तो वे हंसे बिना
  129. 6:00ना रह सके। सभी लोग फजलू की अकलमंदी की
  130. 6:03तारीफ करने लगे। अब वह पहले वाला फजलू
  131. 6:06नहीं रहा था बल्कि फजलू साहब कहलाने लगा।
  132. 6:09गांव के बड़े-बड़े चौधरी भी उसके पास आने
  133. 6:11लगे और अपने जूते उसी से बनवाने लगे। उसकी
  134. 6:15इज्जत बढ़ गई और कुछ ही दिनों में फजलू ने
  135. 6:18शादी भी कर ली। शादी में गांव के सभी लोग
  136. 6:21शामिल हुए लेकिन शाकिर को बुलावा तक नहीं
  137. 6:23भेजा गया क्योंकि फजलू के मुताबिक वह
  138. 6:26गरीब, नाकारा और खानदान के नाम पर धब्बा
  139. 6:29था। फजल खान अब ऐशो आराम की जिंदगी जीने
  140. 6:33लगा। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि वह और
  141. 6:36उसकी बीवी कभी चैन से ना रहते। हर समय घर
  142. 6:39में झगड़ा और नाखशी बनी रहती। खर्चे इतने
  143. 6:42बढ़ गए कि फजलू सोने के पत्ते को
  144. 6:45धीरे-धीरे तोड़कर बेचने लगा। आखिरकार एक
  145. 6:48दिन ऐसा भी आया जब सोने का आखिरी टुकड़ा
  146. 6:51भी बिक गया और फजल खान फिर से पहले जैसा
  147. 6:54मुफलिस हो गया। अगले साल जब बाहर का मौसम
  148. 6:57लौटा तो कोयल फिर आई। फजलू और उसकी बीवी
  149. 7:00ने इस बार उसकी खूब आओ भगत की। तरह-तरह की
  150. 7:04चीजें खिलाई लेकिन कोयल ने उनकी ओर ध्यान
  151. 7:06तक ना दिया। वह सिर्फ यह कहकर शाकिर के घर
  152. 7:09चली गई। मैं तो उस गरीब शाकिर की रूखी
  153. 7:12सूखी रोटी ही पसंद करती हूं। इस तरह कई
  154. 7:15साल गुजरते गए। हर साल कोयल फजलू को सोने
  155. 7:18के पत्ते और शाकिर को जैतून के पत्ते देती
  156. 7:21रही। फजलू हमेशा सोने का पत्ता लेता और
  157. 7:24बेचकर खर्च करता। जबकि शाकिर जैतून के
  158. 7:27पत्तों पर संतोष करके खुश रहता। एक दिन
  159. 7:30किस्मत ने करवट बदली। उस मुल्क का बादशाह
  160. 7:33शिकार खेलतेखेलते उसी इलाके में आ पहुंचा।
  161. 7:37बादशाह बहुत परेशान और उदास था। वजह यह थी
  162. 7:40कि उसका बेटा नजरुद्दीन हमेशा उसकी
  163. 7:43नाफरमानी करता और वजीर भी उसकी शिकायतें
  164. 7:46करते रहते। शुमा इलाके में बगावत हो चुकी
  165. 7:49थी और पूरे मुल्क में अफरातफरी फैली हुई
  166. 7:51थी। इन हालात ने बादशाह का सुकून और चैन
  167. 7:55पूरी तरह छीन लिया था। वह हर वक्त
  168. 7:57फिक्रमंद और उदास रहता। अचानक उसकी नजर
  169. 8:00शाकिर पर पड़ी। शाकिर फटे पुराने कपड़े
  170. 8:03पहने हुए था और उसके चेहरे से साफ झलकता
  171. 8:06था कि वह कई दिनों से भूखा है। लेकिन
  172. 8:09हैरानी की बात यह थी कि उसके चेहरे पर
  173. 8:11गहरी तसल्ली और खुशी झलक रही थी। बादशाह
  174. 8:15ने पूछा तुम इतनी मुश्किल हालत में भी
  175. 8:17इतने मुत्तमिन कैसे हो? शाकिर ने
  176. 8:20मुस्कुराते हुए जवाब दिया बादशाह सलामत
  177. 8:23कनात ही सबसे बड़ी दौलत है। जिसे कनात की
  178. 8:26दौलत हासिल हो जाती है उसे ना कोई परेशानी
  179. 8:29सताती है और ना कोई गम। शाकिर की बातें
  180. 8:32सुनकर बादशाह बहुत मुतासिर हुआ और देर तक
  181. 8:35उसके पास बैठा रहा। अजीब बात यह थी कि
  182. 8:38जितनी देर वो शाकिर के साथ रहा उसके दिल
  183. 8:41से सारी परेशानियां दूर होती गई। बादशाह
  184. 8:45के शाकिर से मिलने और उसकी वजह से उसके
  185. 8:47दिल को सुकून मिलने की खबर दूर-दूर तक फैल
  186. 8:50गई। अब लोग अपनी-अपनी परेशानियां और फिक्र
  187. 8:54लेकर शाकिर के पास आने लगे। शाकिर उनकी
  188. 8:56बातें सुनकर उन्हें नसीहत और समझदारी से
  189. 8:58जवाब देता और लोग हल्काफुल्का महसूस करते
  190. 9:01हुए खुशी-खुशी अपने घर लौट जाते। अमीर लोग
  191. 9:04उसे दौलत पेश करते और गरीब लोग ढेरों
  192. 9:07दुआएं देते। धीरे-धीरे शाकिर भी आराम की
  193. 9:10जिंदगी गुजारने लगा। एक दिन बादशाह ने
  194. 9:12शाकिर को महल बुलाने के लिए एक सिपाही
  195. 9:14भेजा। सिपाही उसकी झोपड़ी पर पहुंचा और
  196. 9:17बादशाह का हुक्मनामा दिखाकर बोला, "बाद
  197. 9:20बादशाह सलामत ने तुम्हें याद फरमाया है।"
  198. 9:23शाकिर ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "कल बहार
  199. 9:26का पहला दिन है। सूरज निकलने से पहले तक
  200. 9:29मैं कहीं नहीं जा सकता।" सिपाही मजबूरन
  201. 9:32शाकिर की झोपड़ी के पास ही ठहर गया। अगले
  202. 9:35दिन सुबह सवेरे कोयल आई और उसने शाकिर के
  203. 9:38हाथ में जैतून का पत्ता रख दिया। शाकिर ने
  204. 9:41कोयल से कहा, "्यारी कोयल, बादशाह ने मुझे
  205. 9:45महल में बुलाया है।" क्या तुम वहां मुझसे
  206. 9:47मिलने आया करोगी? कोयल ने हल्की सी कूक
  207. 9:50भरकर जवाब दिया, ऊंचे-ऊंचे महल असल में
  208. 9:53कैदखाने होते हैं। वहां नफरत, अदावत, लालच
  209. 9:57और आपसी झगड़े पनपते हैं। मैं तुमसे मिलने
  210. 9:59के लिए वहां नहीं आ सकूंगी। कोयल ने शाकिर
  211. 10:02से कहा, तुम इन जैतून के पत्तों की हिफाजत
  212. 10:05करना और कभी अपने से जुदा ना करना। फिर
  213. 10:08उसने रोटी का टुकड़ा खाया और बोली, अब तुम
  214. 10:12मुझे इजाजत दो। अल्लाह हाफिज। शाकिर को
  215. 10:15कोयल की जुदाई से बहुत रंज हुआ। उसने
  216. 10:18सावधानी से जैतून के पत्ते अपने चमड़े के
  217. 10:21कुर्ते के अंदर सिल दिए और फिर वही कुर्ता
  218. 10:24पहनकर सिपाही के साथ बादशाह के महल की तरफ
  219. 10:26रवाना हो गया। जब शाकिर महल में दाखिल हुआ
  220. 10:29तो सारे दरबारी उसे देखकर आपस में
  221. 10:31चमगोइयां करने लगे कि आखिर बादशाह ने इस
  222. 10:34मामूली मोची में क्या बात देखी जो उसे महल
  223. 10:37बुला लिया। बादशाह के वजीरों ने शाकिर से
  224. 10:40बातें की और उनके जौहर खुलने लगे। शहजादे
  225. 10:43अमीर और दरबारी जो पहले परेशान और बोझिल
  226. 10:46थे उनके दिल हल्के हो गए। दरबार में ऐसी
  227. 10:49सकारात्मक तब्दीली आई जो पहले कभी नहीं
  228. 10:52हुई थी। लोग आपस की रंजिशें भूल गए और
  229. 10:55उनके दिलों से हसद, रकबत और नफरतें दूर हो
  230. 10:58गई। बादशाह ने शाकिर के लिए महल में एक
  231. 11:00कमरा मुंतखब किया और अपने तख्त के पास
  232. 11:03उसकी कुर्सी रखी। वजीरों ने उसकी सेवा के
  233. 11:06लिए शाकिर के सामने कई तोहफे पेश किए और
  234. 11:09कई दरबारी उसे कीमती कुर्ते भी देने लगे।
  235. 11:12लेकिन शाकिर ने अपना चमड़े का पुराना
  236. 11:14कुर्ता नहीं उतारा। महल के सभी लोग इसे
  237. 11:16नापसंद करने लगे। बादशाह ने पूछा तुम यह
  238. 11:20कुर्ता किसी फकीर को क्यों नहीं दे देते?
  239. 11:23शाकिर ने मुस्कुराते हुए कहा, "अलीजा, महल
  240. 11:26में दाखिल होने से पहले मेरे पास यही
  241. 11:28लिबास था। यह कुर्ता पहनने से मेरे अंदर
  242. 11:31तुर और गुरूर पैदा नहीं होता।" बादशाह को
  243. 11:33शाकिर का यह जवाब बहुत पसंद आया। उसने महल
  244. 11:36में ऐलान कर दिया कि आज के बाद कोई भी
  245. 11:39शाकिर को उसके कुर्ते के बारे में कोई भी
  246. 11:42टिप्पणी नहीं करेगा। अगले साल कोयल फिर
  247. 11:44आई। लेकिन इस बार फजल खान के लिए सोने के
  248. 11:47दो पत्ते लाई क्योंकि शाकिर के लिए अब
  249. 11:50जैतून के पत्ते लाने की जरूरत नहीं रही
  250. 11:52थी। फजल खान ने सोने का एक पत्ता फजूल
  251. 11:55खर्चियों में ही खत्म कर दिया। उसकी बीवी
  252. 11:57ने गुस्से में कहा आखिर हम कब तक तंगी की
  253. 12:00जिंदगी गुजारते रहेंगे? तुम्हारा भाई
  254. 12:02शाकिर कैसे शाहाना जिंदगी बसर कर रहा है।
  255. 12:05मैं तो कहती हूं अपना बोरा बिस्तरा समेटो
  256. 12:08और महल का रुख करो। वहां तुम्हें कहीं ना
  257. 12:10कहीं जगह मिल जाएगी। फजल खान ने अपना
  258. 12:12सामान लपेटा और सोने का पत्ता भी संभाल कर
  259. 12:15रखा। फिर दोनों सफर के लिए रवाना हो गए।
  260. 12:18काफी देर पैदल चलने के बाद वे एक घने जंगल
  261. 12:20में पहुंच गए। दोनों पूरी तरह थक चुके थे।
  262. 12:23फजल खान की बीवी ने शिकायत की। तुम तो
  263. 12:26बिल्कुल अक्ल से पैदल चल रहे हो। सफर के
  264. 12:29लिए किसी सवारी का इंतजाम क्यों नहीं
  265. 12:30किया? आखिर यह सोना हमारे किसी काम आएगा।
  266. 12:33फजल खान ने रुमाल खोलकर सोने का पत्ता
  267. 12:36देखा। तभी एक चालाक बुढ़िया जो काफी देर
  268. 12:38से उनका पीछा कर रही थी। दरख्त के पीछे से
  269. 12:41निकल आई। वह उनकी सभी बातें सुन चुकी थी
  270. 12:44और पत्ते की झलक भी देख चुकी थी। बुढ़िया
  271. 12:47ने चापलूसी करते हुए कहा, आले कदर नवाब
  272. 12:50साहिब और मोहतरमा बानो साहिबा कनीज का
  273. 12:53सलाम कबूल फरमाइए। फजल खान की बीवी ने
  274. 12:56हक्का बक्का होकर पूछा। तुमने कैसे जाना
  275. 12:58कि हम नवाब हैं? बुढ़िया ने कहा, आले कदर
  276. 13:02आपकी शक्ल ही से अंदाजा हो जाता है कि आप
  277. 13:05खानदानी नवाब हैं। जनाब क्या आप मुझे अपनी
  278. 13:08मेजबानी की इज्जत बखशेंगे? उसकी इतनी
  279. 13:10खुशामद और चापलूसी ने फजल खान और उसकी
  280. 13:13बीवी को फरेब में डाल दिया। दोनों भूखे
  281. 13:16प्यासे थे और उन्होंने बुढ़िया की दावत
  282. 13:18कबूल कर ली। बुढ़िया ने अपनी थैली खोली और
  283. 13:21कहा, जनाब आपने आज तक बहुत आला किस्म के
  284. 13:25खाने खाए होंगे। लेकिन आज मेरा यह सादा सा
  285. 13:28खाना भी खाइए। यहां मक्खन लगी रोटी और आम
  286. 13:31का अचार हाजिर है। फजल खान और उसकी बीवी
  287. 13:34ने भूख मिटाने के लिए पेट भरकर खाना खाया।
  288. 13:37फिर बुढ़िया ने उनके सामने शरबत पेश किया
  289. 13:39जिसमें कोई नशीली चीज छुपी हुई थी। जैसे
  290. 13:42ही दोनों ने शरबत पिया, उनकी आंखें
  291. 13:44धीरे-धीरे बंद होने लगी और वे जल्द ही
  292. 13:47नवाबी ख्वाबों में खो गए। बुढ़िया के दो
  293. 13:50बेटे थे टूटू और गोली जो उसके साथ रहते
  294. 13:53थे। फजल और उसकी बीवी सो गए तो बुढ़िया
  295. 13:56चीखते हुए बोली ए अहम को कहां मर गए और
  296. 13:59फिर उसने फुसफुसा कर कहा अब मेरा मुंह
  297. 14:02क्या देखते हो जल्दी से सामान समेटो और
  298. 14:05यहां से चलो फिर उसने टूटू से कहा आज
  299. 14:08तुम्हारी क्या कारगुजारी रही कुछ माल
  300. 14:11उड़ाया या यूं ही आए टूटू ने कहा अम्मा आज
  301. 14:15जब मैं महल के करीब से गुजर रहा था तो
  302. 14:18किसी ने एक चमड़े का कुर्ता ऊपर से फेंका
  303. 14:20यह कुर्ता बेकार है लेकिन मैंने मैंने इसे
  304. 14:23आपके हुक्म की तामील के लिए ले आया। यह
  305. 14:26कहते हुए उसने कुर्ता बुढ़िया की ओर
  306. 14:27फेंका। बुढ़िया ने तेवरी चढ़ाकर कहा, "अरे
  307. 14:31अहमक, यह कुर्ता मेरे किस काम का है?" फिर
  308. 14:34बुढ़िया ने वह कुर्ता फजल के ऊपर डाल
  309. 14:36दिया। इसके बाद उसने बाकी सामान समेटा और
  310. 14:39हंसते हुए तीनों वहां से चले गए। बहुत देर
  311. 14:42बाद फजल और उसकी बीवी की आंख खुली।
  312. 14:45उन्होंने देखा कि उनका सारा सामान चोरी हो
  313. 14:48चुका है। यह देखकर फजल खान की बीवी
  314. 14:50जोर-जोर से चीख पीकर रोने लगी। शाम
  315. 14:53होते-होते जंगल में कड़क-कड़ाती सर्दी छा
  316. 14:56गई। फजल खान ने पास ही पड़े चमड़े का
  317. 14:59कुर्ता पहन लिया। जैसे ही उसने कुर्ता
  318. 15:01अपने बदन पर डाला, उसके भीतर एक अजीब सी
  319. 15:04कैफियत महसूस हुई। रोनेधोने की बजाय वह
  320. 15:07हंसने और मुस्कुराने लगा और उसकी बीवी भी
  321. 15:10धीरे-धीरे इस रंजो गम से मुक्त हो गई।
  322. 15:12उन्होंने जंगल में एक घर बनाया और फजल खान
  323. 15:15एक घोंसले से अंडे निकाल लाया जिससे उनका
  324. 15:18जीवन फिर से सरल और खुशहाल होने लगा। फजल
  325. 15:21खान की बीवी ने अंडों और फलों को भुना और
  326. 15:24दोनों ने भूख मिटाकर एक फूंस के ढेर पर
  327. 15:27लेट कर सो गए। उन्होंने अपने जंगल में बने
  328. 15:29घर को बड़ा कर लिया और वहीं रहने लगे।
  329. 15:32उनका गुजारा परिंदों के अंडों और जंगल के
  330. 15:35फलों पर ही चलने लगा। उनके दिल से महल
  331. 15:38जाने का ख्वाब पूरी तरह निकल गया। इधर
  332. 15:40शाकिर की बात करें तो जब सुबह उसकी आंख
  333. 15:44खुली तो उसने देखा कि उसका प्रिय चमड़े का
  334. 15:46कुर्ता गुम हो चुका है। उसने नौकरों से
  335. 15:49पूछा लेकिन किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
  336. 15:52उसने महल का कोना कोना छान मारा लेकिन
  337. 15:55कुर्ते का कोई पता नहीं चला। उसकी हालत
  338. 15:57फिर से उसी पुराने वक्त जैसी हो गई। वजीर
  339. 16:00एक दूसरे से हसद करने लगे और आपस में
  340. 16:02लड़ने झगड़ने लगे। बादशाह की परेशानियां
  341. 16:05भी बढ़ गई। शाकिर की सभी सलाहियतें उसके
  342. 16:08कुर्ते में थी। जब वह कुर्ता नहीं रहा तो
  343. 16:11उसकी सलाहियतें भी चली गई। ऐसा लगने लगा
  344. 16:13कि उसका जन बिल्कुल नाकारा हो गया और
  345. 16:16दरबार में भी लोग पूछने लगे कि इस मोची का
  346. 16:19महल में क्या काम है? बादशाह ने तहकीकात
  347. 16:22का हुक्म दे दिया कि यह मोची यहां तक कैसे
  348. 16:24आया और इसे यह दर्जा किसने दिया? तहकीकात
  349. 16:28के बाद सामने आया कि मोची महल में बस यूं
  350. 16:31ही ठहरा हुआ था। इसके बादशाह ने हुक्म
  351. 16:34सुनाया कि मोची को महल से निकाल दिया जाए
  352. 16:36और उसकी हर चीज जब्त कर ली जाए। फरमान
  353. 16:40जारी हुआ और एक नौकर शाकिर के कमरे में
  354. 16:42दाखिल हुआ ताकि उसका सामान जब्त किया जा
  355. 16:45सके और कीमती चीजों पर कब्जा किया जा सके।
  356. 16:48शाकिर ने खिड़की से बाहर कूद कर भागना
  357. 16:50शुरू किया। उसे भागते देखकर एक राहगीर ने
  358. 16:53देखा और बोला आज सुबह ही यहां से एक
  359. 16:56कुर्ता बाहर गिरा था और अब उसका मालिक
  360. 16:58खिड़की से कूद रहा है। शाकिर ने उस आदमी
  361. 17:01का हाथ पकड़ कर मिन्नत करते हुए कहा आप
  362. 17:04बता सकते हैं कि इस वक्त वह कुर्ता किसके
  363. 17:06पास है? राहगीर ने जवाब दिया एक लड़का वह
  364. 17:10कुर्ता उठाकर जंगल की तरफ भाग गया था।
  365. 17:12शाकिर ने कहा अगर तुम मुझे उस लड़के तक ले
  366. 17:15चलो तो मैं तुम्हें बहुत इनाम दूंगा।
  367. 17:17राहगीर ने उसे रास्ता दिखाते हुए कहा, तुम
  368. 17:20इस रास्ते पर चलते रहो। जहां यह रास्ता
  369. 17:22खत्म हो जाएगा, वहां एक घर है। शायद
  370. 17:25तुम्हें अपने कुर्ते के बारे में कोई
  371. 17:27मालूमात मिल जाए। शाकिर ने अपना बटुआ
  372. 17:30राहगीर को सौंपा और बताए गए रास्ते पर चल
  373. 17:32पड़ा। वह धीरे-धीरे जंगल में दाखिल हुआ और
  374. 17:35रात का अंधेरा चारों तरफ फैल गया। दूर
  375. 17:38कहीं आग जल रही थी। शाकिर आग की रोशनी की
  376. 17:41दिशा में चलता रहा और काफी देर बाद वह एक
  377. 17:43घर के पास पहुंच गया। मकान का दरवाजा कुछ
  378. 17:47कदर खुला था। उसने झांक कर देखा कि अंदर
  379. 17:50उसका भाई फजल खान यानी फजलू सो रहा था।
  380. 17:54उसके सिरहाने ही उसका कुर्ता रखा हुआ था
  381. 17:56और पास में एक औरत बैठी थी। शाकिर समझ गया
  382. 18:00कि यह उसकी भाभी है। शाकिर ने दरवाजे पर
  383. 18:03दस्तक दी और अदब के साथ मकान में दाखिल
  384. 18:06होकर धीमी आवाज में सलाम किया। भाभी ने
  385. 18:09उसे तुरंत नहीं पहचाना लेकिन उसकी इज्जत
  386. 18:12और मदद से उसका स्वागत किया। उसने शाकिर
  387. 18:16से कहा भाई साहब धीमी आवाज में गुफ्तगू
  388. 18:19कीजिए। मेरे शौहर अभी सोए हुए हैं। शाकिर
  389. 18:22ने जवाब दिया बीबी मैं रास्ते से भटक कर
  390. 18:26यहां आया हूं। दरअसल मैं महल का मुलाजिम
  391. 18:28हूं। औरत ने पूछा। अच्छा तो बताइए कि महल
  392. 18:32का क्या हाल है? बहुत दिन पहले वह औरत भी
  393. 18:35महल जाने के ख्वाब देखा करती थी। लेकिन अब
  394. 18:38वह अपने इस अहमकाना ख्याल पर हंसती थी।
  395. 18:41शाकिर ने पूछा, "आप महल में क्यों जाना
  396. 18:44चाहती थी?" औरत ने जवाब दिया, "मेरे शौहर
  397. 18:47के भाई दरबार में मुलाजिम है। हम भी अपनी
  398. 18:50किस्मत आजमाने के लिए महल जाने निकले थे।
  399. 18:52लेकिन रास्ते में एक बूढ़ी औरत ने हमें
  400. 18:54नशा पिला दिया और हमारा सब कुछ लूट कर ले
  401. 18:56गई। जाते समय यह पुराना सा कुर्ता यहां
  402. 18:59फेंक गई। शाकिर ने अपना कीमती कुर्ता उतार
  403. 19:02कर रख दिया और कहा बीबी मुझे लगता है कि
  404. 19:05आपका शौहर इस पुराने कुर्ते की बजाय इस नए
  405. 19:08कुर्ते को ज्यादा पसंद करेगा। औरत ने अपने
  406. 19:11शौहर को झंझोड़ कर बेदार किया और कहने लगी
  407. 19:14देखो मैंने कैसा उम्दा सौदा किया है। फजल
  408. 19:18ने अपनी आंखें खोल कर देखा और उसके सामने
  409. 19:20शाकिर खड़ा मुस्कुरा रहा था। फजल ने आगे
  410. 19:23बढ़कर अपने भाई को गले लगाया और कहा भाई
  411. 19:26तुम ठीक तो हो? तुमने दरबार में क्या
  412. 19:29तरक्की देखी और क्या कुछ पाया? शाकिर ने
  413. 19:32मुस्कुराते हुए जवाब दिया, भाई, दरबार का
  414. 19:36अरूज भी देखा और जवाल भी। सच पूछो तो इन
  415. 19:40बातों से मेरा दिल भर चुका है। अब तो दिल
  416. 19:42चाहता है कि अपनी झोपड़ी में सुकून और
  417. 19:45आराम से रहूं। फजल और उसकी बीवी भी शाकिर
  418. 19:48के साथ रहने के लिए राजी हो गए। दोनों
  419. 19:50भाइयों ने मिलकर एक बार फिर अपने काम को
  420. 19:52संभाल लिया। जैसे ही मौसम बाहर आया कोयल
  421. 19:56अब भी उनके पास आती और दोनों भाइयों के
  422. 19:58लिए ही जैतून के पत्ते लाती रही जिससे
  423. 20:01उनका जीवन सुकून और बरकत से भरा रहा। यह
  424. 20:04कहानी आपको कैसी लगी कमेंट करके अपनी राय
  425. 20:06जरूर दें। उम्मीद है यह कहानी आपको बहुत
  426. 20:09पसंद आई होगी। यदि वीडियो पसंद आई हो तो
  427. 20:12वीडियो को लाइक और चैनल को सब्सक्राइब
  428. 20:14जरूर करना।

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