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गुफा में रहने वाला गरीब परिवार | Hindi Story | Hindi Kahaniya | Moral Stories | Cartoon — Transcript

by Kahaniya Tv · 5,993 words · 762 segments · language en · Watch on YouTube

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  1. 0:26एक छोटे से गांव के किनारे घने जंगल के
  2. 0:29पास पास एक पुरानी और टूटी फूटी सी झोपड़ी
  3. 0:32थी। उस झोपड़ी में गरीब किसान धनिया अपनी
  4. 0:36बूढ़ी मां और बेटी गौरी के साथ रहता था।
  5. 0:40धनिया के पास बस कुछ छोटे-छोटे खेत थे।
  6. 0:43उन्हीं खेतों में मेहनत करके वह अपने
  7. 0:45परिवार का पेट पालता था। हर दिन सुबह सूरज
  8. 0:48निकलने से पहले ही धनिया उठ जाता। ठंडी
  9. 0:51हवा चल रही होती। आसमान में हल्की लालिमा
  10. 0:54होती और गांव के ज्यादातर लोग अभी गहरी
  11. 0:58नींद में होते। लेकिन धनिया अपने पुराने
  12. 1:01हल और बैलों को लेकर खेत की तरफ निकल
  13. 1:03पड़ता। दरवाजे पर खड़ी उसकी मां प्यार से
  14. 1:06कहती, बेटा धनिया थोड़ा आराम भी कर लिया
  15. 1:11कर। दिन रात इतनी मेहनत करते-करते तू बहुत
  16. 1:15थक जाता होगा। सुबह से शाम तक खेत में काम
  17. 1:19करता है। फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं लाता।
  18. 1:22मुझे तेरी चिंता होती है बेटा। शरीर को भी
  19. 1:26थोड़ा आराम देना जरूरी होता है।
  20. 1:28मां, अगर मैं मेहनत नहीं करूंगा तो हमारे
  21. 1:31घर का चूल्हा कैसे चलेगा? हमारी जरूरतें
  22. 1:34कैसे पूरी होंगी? मुझे पता है मेहनत
  23. 1:37मुश्किल होती है लेकिन यही हमारी जिंदगी
  24. 1:39का सहारा है। जब तक मेरे हाथ पैर चल रहे
  25. 1:42हैं, मैं मेहनत करता रहूंगा ताकि आपको कभी
  26. 1:45किसी चीज की कमी महसूस ना हो। तभी उसकी
  27. 1:47बेटी गौरी दौड़ते हुए आती और कहती
  28. 1:51बाबा जल्दी वापस आना मैं आपका इंतजार
  29. 1:55करूंगी। देर मत करना मुझे अच्छा लगता है
  30. 1:58जब आप जल्दी घर आ जाते हैं। धनिया अपनी
  31. 2:00बेटी के सिर पर प्यार से हाथ फेरता और खेत
  32. 2:03की ओर चल पड़ता। दिनभर वह खेत में पसीना
  33. 2:06बहाता रहता। कभी तेज धूप, कभी अचानक
  34. 2:10बारिश। लेकिन धनिया मेहनत करना कभी नहीं
  35. 2:13छोड़ता। [संगीत] धनिया ने कभी हार नहीं
  36. 2:15मानी। वह हमेशा अपनी मां से कहता
  37. 2:18ईश्वर ने हमें मेहनत करने के लिए हाथ दिए
  38. 2:20हैं। अगर हम सच्चे दिल से मेहनत करते
  39. 2:22रहेंगे तो एक ना एक दिन हमारी किस्मत जरूर
  40. 2:24बदलेगी। ईश्वर मेहनत करने वालों को कभी
  41. 2:27खाली हाथ नहीं लौटाते।
  42. 2:29मां उसकी बात सुनकर चुपचाप भगवान से
  43. 2:32प्रार्थना करती।
  44. 2:40बाबा आज मैं जंगल के किनारे से कुछ
  45. 2:43लकड़ियां लेकर आई हूं ताकि घर के काम में
  46. 2:46थोड़ी मदद हो सके।
  47. 2:47अकेली गई थी बेटा जंगल के किनारे अकेले
  48. 2:51जाना ठीक नहीं होता। वहां खतरा भी हो सकता
  49. 2:53है।
  50. 2:54हां बाबा मैं अकेली ही गई थी। थोड़ा डर तो
  51. 2:58लगा था लेकिन मैंने हिम्मत रखी। आप ही तो
  52. 3:01कहते हो कि डर के आगे हिम्मत रखनी चाहिए।
  53. 3:04इसलिए मैं बहादुर बनकर गई।
  54. 3:06धनिया थोड़ा चिंतित हो गया क्योंकि गांव
  55. 3:08के लोग कहते थे कि जंगल के अंदर एक पुरानी
  56. 3:11गुफा है जहां रात के समय अजीब-अजीब आवाजें
  57. 3:14आती हैं। गांव वाले उस गुफा के पास जाने
  58. 3:17से डरते थे।
  59. 3:18बेटी जंगल के अंदर ज्यादा मत जाना। वहां
  60. 3:21एक रहस्यमई गुफा है। लोग कहते हैं वहां
  61. 3:24कुछ अजीब होता है। इसलिए उससे दूर ही
  62. 3:26रहना। धनिया भले ही गरीब था लेकिन उसकी
  63. 3:29मेहनत और ईमानदारी पूरे इलाके में मशहूर
  64. 3:32थी। उसके छोटे-छोटे खेतों में उगने वाली
  65. 3:35सब्जियां और अनाज हमेशा बहुत अच्छे होते
  66. 3:39थे। मिट्टी भी जैसे उसकी मेहनत को पहचानती
  67. 3:42थी। वह अपनी फसल में कभी कोई मिलावट नहीं
  68. 3:44करता था। ना कोई दवा जरूरत से ज्यादा
  69. 3:47डालता ना ही लालच में आकर अनाज में कुछ
  70. 3:50मिलाता। यही कारण था कि जब भी धनिया अपनी
  71. 3:54फसल लेकर बाजार जाता तो उसकी सब्जियां और
  72. 3:57अनाज पलक झपकते ही बिक जाते।
  73. 3:59अगर सच में शुद्ध और अच्छा अनाज चाहिए तो
  74. 4:02धनिया से ही लेना। उसका अनाज हमेशा साफ
  75. 4:05सुथरा और बढ़िया होता है। इसलिए गांव के
  76. 4:08लोग उसी पर भरोसा करते हैं।
  77. 4:10लेकिन धनिया कभी इसका फायदा उठाकर ज्यादा
  78. 4:12पैसे नहीं मांगता था। मेहनत का सही दाम
  79. 4:15मिल जाए वही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।
  80. 4:18मैं ज्यादा दौलत या बड़ी-बड़ी चीजों की
  81. 4:21चाह नहीं रखता। बस इतना चाहता हूं कि दिन
  82. 4:24भर की मेहनत के बाद जो अनाज मैं उगाता
  83. 4:26हूं, उसका सही मूल्य मिल जाए। अगर मेरी
  84. 4:29मेहनत से मेरे घर का चूल्हा जल जाए और
  85. 4:32मेरे परिवार का पेट भर जाए तो मुझे लगता
  86. 4:34है कि मेरी मेहनत सफल हो गई। मेरे लिए
  87. 4:37सच्ची खुशी और सुकून इसी में है कि इंसान
  88. 4:40ईमानदारी से मेहनत करें और उसी मेहनत की
  89. 4:43कमाई से अपना जीवन चलाए।
  90. 4:44इसी वजह से गरीब लोग भी अक्सर उसी से
  91. 4:47सामान खरीदते थे। लेकिन गांव में एक बहुत
  92. 4:50बड़ा और अमीर व्यापारी था। उसका नाम था
  93. 4:54लालाचंद सेठ। लालाचंद सेठ पूरे इलाके में
  94. 4:57अनाज और सब्जियों का बड़ा व्यापार करता
  95. 5:00था। लेकिन वह अक्सर मुनाफे के लिए मिलावट
  96. 5:02भी कर देता था और चीजों को बहुत महंगे
  97. 5:05दामों में बेचता था। जब लोगों ने धनिया से
  98. 5:08सामान खरीदना शुरू किया तो सेठ का व्यापार
  99. 5:11थोड़ा कम होने लगा। यह बात उसे बिल्कुल
  100. 5:14पसंद नहीं आई।
  101. 5:18एक दिन बाजार में उसने धनिया को देखते ही
  102. 5:21ताना मारा। अरे धनिया तू किसान है या कोई
  103. 5:25संत हर बार इतना सस्ता माल बेच देता है
  104. 5:28इसलिए लोग तुझे हल्के में लेने लगे हैं।
  105. 5:31लेकिन याद रख इस बाजार में असली फैसला
  106. 5:34मेरा चलता है। अगर तू मेरे हिसाब से अनाज
  107. 5:37नहीं बेचेगा तो तेरा माल कोई नहीं
  108. 5:40खरीदेगा। फिर देखना तेरे घर का चूल्हा
  109. 5:43कैसे जलेगा। सेठ जी मैं तो बस इतना चाहता
  110. 5:46हूं कि मेरी मेहनत का सही दाम मिल जाए।
  111. 5:49[संगीत] मैंने दिन भर खेत में मेहनत की
  112. 5:51है। पसीना बहा है। अगर उस मेहनत का थोड़ा
  113. 5:54सा भी सही मूल्य मिल जाए तो मेरे लिए वही
  114. 5:56काफी है। मैं किसी को धोखा देकर या गलत
  115. 5:59तरीके से पैसा नहीं कमाना चाहता। मेहनत का
  116. 6:01सही दाम मिल जाए वही मेरे लिए बहुत बड़ी
  117. 6:04बात है। बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने लगा है
  118. 6:06तू। सुन ले धनिया। इस बाजार में वही चलता
  119. 6:10है जो ताकतवर होता है। अगर तूने मेरी बात
  120. 6:12नहीं मानी तो मैं ऐसा हाल कर दूंगा कि
  121. 6:15तेरा अनाज बाजार में कोई नहीं खरीदेगा।
  122. 6:18फिर तू अपने घर बैठकर यही ईमानदारी की
  123. 6:21बातें करता रहना।
  124. 6:22बाजार में खड़े कुछ लोग यह सब सुन रहे थे।
  125. 6:25धनिया ने बस मुस्कुराकर अपनी फसल बेचनी
  126. 6:28जारी रखी। वह कभी किसी से झगड़ा नहीं करता
  127. 6:31था। लेकिन लालाचंद सेठ का गुस्सा दिन
  128. 6:34प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। कभी वह धनिया
  129. 6:37को सबके सामने नीचा दिखाने की कोशिश करता।
  130. 6:40कभी उसे गरीबी का ताना देता। फिर भी धनिया
  131. 6:44के चेहरे पर कभी शिकायत नहीं आती। शाम को
  132. 6:47जब वह घर लौटता तो उसकी बेटी गौरी दौड़ कर
  133. 6:50आ जाती।
  134. 6:51बाबा आज बाजार कैसा रहा? क्या आज अनाज
  135. 6:56अच्छे दाम में बिका या फिर लोगों ने पहले
  136. 6:58की तरह मोलभाव किया?
  137. 7:00अच्छा रहा बेटी। भगवान की कृपा से आज लगभग
  138. 7:03सारा अनाज बिक गया। लोगों ने भरोसे से
  139. 7:06लिया और मेहनत का ठीक-ठाक दाम भी मिल गया।
  140. 7:08घर में कमाई भले ही कम थी, लेकिन उस छोटे
  141. 7:11से घर में सुकून और प्यार बहुत था। बूढ़ी
  142. 7:15मां, बेटी गौरी और धनिया तीनों साथ बैठकर
  143. 7:18सादा खाना खाते और बातें करते।
  144. 7:21बेटा ईमानदारी से कमाया हुआ थोड़ा सा धन
  145. 7:24भी बहुत सुख देता है। जब कमाई सच्चाई और
  146. 7:28मेहनत से होती है तो मन को सुकून मिलता है
  147. 7:31और इंसान चैन से जी पाता है।
  148. 7:34मां हमें जितना मिला है उसी में खुश रहना
  149. 7:37चाहिए। लालच करने से कभी सच्ची खुशी नहीं
  150. 7:40मिलती। लेकिन मेहनत और संतोष से जीवन आसान
  151. 7:43और सुखी बन जाता है।
  152. 7:44लेकिन उसे क्या पता था कि लालाचंद सेठ का
  153. 7:47जलता हुआ दिल अब धीरे-धीरे एक खतरनाक
  154. 7:50योजना बना रहा है। एक ऐसी योजना जो बहुत
  155. 7:53जल्द धनिया की जिंदगी को पूरी तरह बदलने
  156. 7:56वाली थी। लालाचंद सेठ की जलन अब इतनी बढ़
  157. 7:59चुकी थी कि उसने धनिया को बर्बाद करने की
  158. 8:01ठान ली। एक रात जब पूरा गांव सो रहा था।
  159. 8:05सेठ ने अपने आदमियों को चुपके से धनिया के
  160. 8:07खेत में भेज दिया। उन्होंने खेत में ऐसी
  161. 8:10दवा डाल दी जिससे पूरी फसल धीरे-धीरे खराब
  162. 8:13होने लगी।
  163. 8:21सुबह जब धनिया खेत पर पहुंचा तो उसकी
  164. 8:23आंखें फटी की फटी रह गई। हरी-भरी खड़ी फसल
  165. 8:26पीली पड़ चुकी थी। कई पौधे सूख गए थे। वह
  166. 8:30घुटनों के बल बैठ गया।
  167. 8:32हे ईश्वर यह क्या हो गया? कल तक तो मेरी
  168. 8:35फसल बिल्कुल हरीभरी थी। हर पौधा लहलहा रहा
  169. 8:38था। मैंने कितनी मेहनत से इस खेत को सींचा
  170. 8:41था। दिन रात इसकी देखभाल की थी। फिर अचानक
  171. 8:44एक ही रात में सब कुछ कैसे बदल गया। मेरी
  172. 8:47सारी मेहनत, मेरी सारी उम्मीदें क्या सब
  173. 8:50यूं ही खत्म हो जाएंगी?
  174. 8:52इतने में गांव के कुछ लोग भी खबर सुनकर
  175. 8:54वहां आ गए। वे भी खेत की हालत देखकर हैरान
  176. 8:57रह गए और आपस में बातें करने लगे।
  177. 9:00यह अचानक कैसे हो गया? कल शाम तक तो यह
  178. 9:03खेत बिल्कुल ठीक था। फसल भी बहुत अच्छी
  179. 9:06दिख रही थी। एक ही रात में इतने सारे पौधे
  180. 9:09कैसे सूख गए? कहीं किसी ने जानबूझकर तो
  181. 9:11कुछ नहीं किया।
  182. 9:12धनिया को समझते देर नहीं लगी कि यह किसी
  183. 9:15की साजिश है। उसे तुरंत लालाचंद सेठ का
  184. 9:18ख्याल आया।
  185. 9:19अगर यह सब सेठ का किया हुआ है तो मैं चुप
  186. 9:21नहीं बैठूंगा। मेरी मेहनत की फसल को इस
  187. 9:24तरह बर्बाद करना कोई छोटी बात नहीं है।
  188. 9:27मैंने दिन रात मेहनत करके इस खेत को सींचा
  189. 9:29था। हर पौधे को अपने बच्चे की तरह संभाला
  190. 9:32था। मैं पंचायत में जाकर न्याय मांगूंगा
  191. 9:35और सबके सामने सच रखूंगा ताकि जिसने भी यह
  192. 9:38अन्याय किया है उसे उसकी सजा मिल सके। यह
  193. 9:41बात धीरे-धीरे पूरे गांव में फैल गई। जब
  194. 9:44यह खबर लालाचंद सेठ तक पहुंची तो वह एक पल
  195. 9:48के लिए घबरा गया। लेकिन चालाक सेठ ने
  196. 9:50तुरंत एक नई और खतरनाक साजिश सोच ली। अगली
  197. 9:54सुबह वह खुद ही गांव की पंचायत में पहुंच
  198. 9:57गया। गांव के बड़े बुजुर्ग वहां बैठे थे।
  199. 10:00सेठ ने ऊंची आवाज में कहा, मुझे पंचायत से
  200. 10:04न्याय चाहिए। मेरे साथ बहुत बड़ा अन्याय
  201. 10:06हुआ है और मैं चाहता हूं कि गांव के सामने
  202. 10:09इस बात का फैसला हो। क्या बात है सेठ जी?
  203. 10:12आप इतने गुस्से और परेशानी में क्यों हैं?
  204. 10:14खुलकर बताइए कि आखिर मामला क्या है? मेरी
  205. 10:17सोने की अंगूठी चोरी हो गई है और मुझे
  206. 10:20पूरा शक है कि वह अंगूठी धनिया ने चुराई
  207. 10:23है। वही कल मेरे घर आया था। उसके बाद ही
  208. 10:25अंगूठी गायब हुई है।
  209. 10:27यह सुनते ही पंचायत में सन्नाटा छा गया।
  210. 10:30उसी समय किसी ने धनिया को बुला लिया।
  211. 10:32धनिया अपनी बूढ़ी मां और बेटी गौरी के साथ
  212. 10:35वहां पहुंचा।
  213. 10:36धनिया सेठ कह रहा है कि उसकी सोने की
  214. 10:39अंगूठी तुमने चुराई है। क्या यह सच है?
  215. 10:42पंचायत के सामने सच-सच बता दो ताकि सही
  216. 10:46फैसला हो सके।
  217. 10:47धनिया की आंखों में हैरानी और दुख दोनों
  218. 10:50साफ दिखाई दे रहे थे। इतने बड़े इल्जाम से
  219. 10:54उसका दिल टूट गया था। मुखिया जी मैं गरीब
  220. 10:57जरूर हूं लेकिन चोर नहीं हूं। मैंने किसी
  221. 11:00की अंगूठी नहीं चुराई। मैं मेहनत से कमाने
  222. 11:03वाला आदमी हूं। किसी की चीज पर बुरी नजर
  223. 11:06डालना तो दूर ऐसा सोच भी नहीं सकता।
  224. 11:09मेरा बेटा ऐसा काम कभी नहीं कर सकता।
  225. 11:12मैंने इसे हमेशा ईमानदारी और मेहनत की सीख
  226. 11:15दी है। यह किसी की चीज चुराने वाला नहीं
  227. 11:18है।
  228. 11:18अगर धनिया सच बोल रहा है तो फिर उसके घर
  229. 11:21की तलाशी ले ली जाए। पंचायत के सामने उसके
  230. 11:24घर को अच्छे से देख लिया जाए। अगर वहां
  231. 11:26मेरी अंगूठी नहीं मिली तो मैं भी मान
  232. 11:28जाऊंगा कि धनिया बेगुनाह है।
  233. 11:30पंचायत के लोग एक दूसरे का चेहरा देखने
  234. 11:33लगे। कुछ देर सोचने के बाद मुखिया ने कहा
  235. 11:36सच जानने का एक ही तरीका है। हम सब अभी
  236. 11:39धनिया के घर चलेंगे और वहां अच्छी तरह
  237. 11:42तलाशी ली जाएगी। पंचायत के सामने सब कुछ
  238. 11:45साफ हो जाएगा और फिर उसी के अनुसार फैसला
  239. 11:48किया जाएगा।
  240. 11:51पंचायत के कई लोग लालाचंद सेठ और गांव के
  241. 11:54कुछ और लोग धनिया के साथ उसके छोटे से घर
  242. 11:57की तरफ चल पड़े।
  243. 12:00धनिया की बूढ़ी मां और छोटी बेटी गौरी भी
  244. 12:03डरते-डरते उनके पीछे चल रही थी। धनिया का
  245. 12:07दिल बहुत तेज धड़क रहा था। उसे अपने ऊपर
  246. 12:10पूरा भरोसा था कि उसने कोई चोरी नहीं की।
  247. 12:13कुछ ही देर में [संगीत] सब लोग धनिया की
  248. 12:15झोपड़ी के सामने पहुंच गए। वह छोटी सी
  249. 12:18झोपड़ी थी। मिट्टी की दीवारें, ऊपर से
  250. 12:21घास-फूस की छत और अंदर बहुत कम सामान।
  251. 12:24धनिया, हमें तुम्हारे घर की तलाशी लेनी
  252. 12:27पड़ेगी। पंचायत के सामने सच जानना जरूरी
  253. 12:30है। तभी इस मामले का सही फैसला हो पाएगा।
  254. 12:33मुखिया जी, मुझे किसी तलाशी से कोई डर
  255. 12:36नहीं है। आप पूरे घर की तलाशी ले लीजिए।
  256. 12:39हर कोना देख लीजिए। मेरे पास छुपाने के
  257. 12:41लिए कुछ भी नहीं है। अगर आपको अंगूठी मिल
  258. 12:44जाए तो पंचायत जो भी ससा देगी मुझे मंजूर
  259. 12:47होगी। लेकिन मैं फिर भी यही कहूंगा कि
  260. 12:49मैंने कोई चोरी नहीं की है। मैंने किसी की
  261. 12:52चीज को हाथ तक नहीं लगाया। पंचायत के
  262. 12:55दो-तीन लोग झोपड़ी के अंदर गए। उन्होंने
  263. 12:58धीरे-धीरे हर जगह देखना शुरू किया। कभी
  264. 13:01पुराने बर्तन उठाकर देखते, कभी कोने में
  265. 13:04रखी टोकरी को उलटते, कभी खाट के नीचे
  266. 13:06झांकते। धनिया बाहर खड़ा सब देख रहा था।
  267. 13:10उसकी मां ईश्वर का नाम जप रही थी। कुछ देर
  268. 13:13तक तो कुछ भी नहीं मिला। धनिया के दिल में
  269. 13:15थोड़ी उम्मीद जागने लगी। लेकिन तभी एक
  270. 13:19आदमी ने अचानक जोर से आवाज लगाई।
  271. 13:21रुको यहां कुछ चमक रहा है। जरा देखो तो
  272. 13:24सही। अरे यह तो सोने की अंगूठी है।
  273. 13:30एक पल के लिए पूरा माहौल सन्न रह गया।
  274. 13:33देखा मैंने कहा था ना यही चूर है। अब सबके
  275. 13:37सामने सच आ गया। अंगूठी इसके ही घर से
  276. 13:39मिली है। नहीं, यह अंगूठी मेरी नहीं है।
  277. 13:42मैंने इसे कभी नहीं देखा। मुझ पर झूठा
  278. 13:45इल्जाम लगाया जा रहा है।
  279. 13:47यह झूठ है। मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता।
  280. 13:50किसी ने जानबूझकर हमारे घर में यह अंगूठी
  281. 13:53रखी है ताकि धनिया को बदनाम किया जा सके।
  282. 13:57लालाचंद सेठ के चेहरे पर तुरंत नकली
  283. 13:59हैरानी आ गई। लेकिन अब पंचायत के लोग एक
  284. 14:02दूसरे की तरफ देखने लगे। क्योंकि अंगूठी
  285. 14:05सच में धनिया के घर से मिली थी। अब तो
  286. 14:08सबूत भी मिल गया। ऐसे आदमी को हमारे गांव
  287. 14:10में रहने का कोई हक नहीं है। जो चोर है
  288. 14:13उसे सख्त सजा मिलनी चाहिए ताकि दूसरे भी
  289. 14:16डरे। मैंने चोरी नहीं की। मुझ पर भरोसा
  290. 14:19कीजिए। मैं कभी किसी की चीज नहीं
  291. 14:21चुराऊंगा। यह सब झूठा इल्जाम है।
  292. 14:27लेकिन उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था।
  293. 14:30गांव वाले लालाचंद की तरफ देखकर सिर हिला
  294. 14:32रहे थे और किसी ने धनिया की ओर ध्यान ही
  295. 14:35नहीं दिया। अगर आज ऐसे चोर को सजा नहीं
  296. 14:37मिली तो कल कोई भी आदमी चोरी करने लगेगा।
  297. 14:41गांव की शांति और नियमों की रक्षा के लिए
  298. 14:44मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। कोई भी
  299. 14:47ऐसा काम करे तो उसका अंजाम यही होना चाहिए
  300. 14:50ताकि बाकी लोग सबक सीखें। ऐसे आदमी को
  301. 14:53गांव से निकाल देना चाहिए। इसे यहां रहने
  302. 14:56का कोई हक नहीं। धनिया पंचायत के सामने यह
  303. 15:00मामला बहुत गंभीर है। तुम्हारे घर से
  304. 15:03अंगूठी मिली है और यही सबसे बड़ा सबूत
  305. 15:06माना जा रहा है। हमारे पास इसी आधार पर
  306. 15:09फैसला करना होगा। हमें सच जानना है और उसी
  307. 15:13अनुसार न्याय करना है। मैंने चोरी नहीं
  308. 15:16की। मुझ पर भरोसा कीजिए। मैं कभी किसी की
  309. 15:19चीज नहीं चुराऊंगा। यह सब झूठा इल्जाम है।
  310. 15:22मुखिया जी, मैं गरीब जरूर हूं, लेकिन चोर
  311. 15:25नहीं हूं। मैंने किसी की चीज हाथ नहीं
  312. 15:28लगाई। किसी ने जानबूझकर मुझे फंसाया है
  313. 15:31ताकि मुझे बदनाम किया जा सके।
  314. 15:33लेकिन पंचायत के कई लोग अब सेठ की बातों
  315. 15:36में आ चुके थे।
  316. 15:37ऐसे आदमी को गांव से निकाल देना चाहिए।
  317. 15:40इसे यहां रहने का कोई हक नहीं।
  318. 15:42मत करो ऐसा। हम कहां जाएंगे? हमारा तो यही
  319. 15:46एक घर है। यही हमारी जिंदगी है।
  320. 15:49पंचायत का निर्णय है कि धनिया को चोरी के
  321. 15:52अपराध में आज से इस गांव से निकाल दिया
  322. 15:55जाए। यह फैसला गांव की शांति और कानून के
  323. 15:58लिए लिया गया है।
  324. 16:00यह सुनते ही धनिया जैसे पत्थर का बन गया।
  325. 16:03उसकी मां की आंखों से आंसू बहने लगे। गौरी
  326. 16:06रोने लगी।
  327. 16:07धनिया तुम्हें आज ही इस गांव को छोड़ना
  328. 16:10होगा। अब से इस गांव में तुम्हारा कोई हक
  329. 16:13या अधिकार नहीं रहेगा। ना खेतों पर, ना
  330. 16:16पानी के स्रोतों पर, ना किसी भी गांव की
  331. 16:19किसी सुविधा पर। यह कठिन निर्णय है। लेकिन
  332. 16:22पंचायत के आदेश के मुताबिक इसे मानना ही
  333. 16:26पड़ेगा।
  334. 16:36यह सुनकर धनिया ने एक बार पूरे गांव की
  335. 16:39तरफ देखा। वह वही गांव था जहां उसने बचपन
  336. 16:42बिताया था। जहां उसके पिता रहते थे। जहां
  337. 16:46उसने अपने खेतों में दिन रात मेहनत की थी।
  338. 16:49लेकिन आज उसी गांव से उसे एक चोर समझकर
  339. 16:52निकाल दिया जा रहा था।
  340. 16:57लालाचंद सेठ दूर खड़ा यह सब देख रहा था।
  341. 17:01उसके चेहरे पर एक हल्की संतुष्टि भरी
  342. 17:03मुस्कान थी क्योंकि उसकी साजिश सफल हो
  343. 17:07चुकी थी।
  344. 17:10शाम होते-होते धनिया ने अपनी झोपड़ी से
  345. 17:13थोड़े बहुत सामान बांध लिए। उसकी मां और
  346. 17:16गौरी उसके साथ खड़ी थी। तीनों धीरे-धीरे
  347. 17:19गांव से बाहर निकलने लगे। सूरज ढल रहा था
  348. 17:23और सामने घना जंगल दिखाई दे रहा था।
  349. 17:26उन्हें नहीं पता था कि अब वे कहां जाएंगे।
  350. 17:30लेकिन किस्मत उन्हें धीरे-धीरे उसी जंगल
  351. 17:33की रहस्यमई गुफा की तरफ ले जा रही थी।
  352. 17:36जहां से उनकी जिंदगी की कहानी एक बिल्कुल
  353. 17:39नया मोड़ लेने वाली थी। तीनों दर-दर भटकते
  354. 17:43हुए जंगल के रास्तों पर चल रहे थे। कभी
  355. 17:46दूर से किसी पक्षी की आवाज आती, कभी
  356. 17:49झाड़ियों में कोई जानवर सरसराता।
  357. 17:52धनिया बार-बार पीछे मुड़कर गांव की तरफ
  358. 17:55देखता लेकिन अब वहां लौटने का कोई रास्ता
  359. 17:59नहीं था। उसके दिल में एक ही बात बार-बार
  360. 18:02चुभ रही थी। उसे गांव से निकाले जाने का
  361. 18:06उतना दुख नहीं था। जितना इस बात का था कि
  362. 18:09उस पर चोरी का झूठा इल्जाम लगा दिया गया
  363. 18:12था।
  364. 18:23मां गौरी हम कहां जाएंगे? हे ईश्वर मैंने
  365. 18:27कभी किसी का बुरा नहीं किया। किसी का
  366. 18:29अधिकार नहीं छीना। किसी को दुख नहीं दिया।
  367. 18:33फिर भी [संगीत] आज मुझे चोर समझ लिया गया।
  368. 18:36मेरी मेहनत और ईमानदारी पर शक किया गया।
  369. 18:39लेकिन मैं जानता हूं कि सच्चाई अंततः
  370. 18:41जीतती है और आपकी न्यायपूर्ण [संगीत]
  371. 18:43दृष्टि के सामने किसी का छल और अन्याय टिक
  372. 18:46नहीं सकता। उसकी आंखें भर आई लेकिन वह
  373. 18:50अपने आंसू अपनी मां और बेटी के सामने छुपा
  374. 18:54रहा था। तभी गौरी ने धीरे से कहा
  375. 18:57बाबा मुझे याद है जब मैं जंगल से लकड़ियां
  376. 19:01लेने आती थी तो रास्ते में एक बहुत बड़ा
  377. 19:04पेड़ है। उसका तना इतना चौड़ा है कि उसके
  378. 19:08नीचे हम लोग आराम से रात बिता सकते हैं।
  379. 19:10वहां थोड़ा सा खुला मैदान भी है।
  380. 19:13सच कह रही हो बेटी। इतना बड़ा पेड़ है कि
  381. 19:16हम सब वहां आराम से रात बिता सकते हैं।
  382. 19:18हां बाबा। वहां जमीन भी साफ है और
  383. 19:21सुरक्षित लगती है। अगर आप चाहें तो हम आज
  384. 19:25की रात वहीं रुक सकते हैं। मैं आपको
  385. 19:27रास्ता दिखा दूंगी।
  386. 19:29धनिया ने अपनी मां की तरफ देखा। बूढ़ी मां
  387. 19:32बहुत थक चुकी थी। बेटा अगर सच में ऐसा
  388. 19:36बड़ा और सुरक्षित पेड़ है तो वहीं चलकर
  389. 19:38थोड़ा आराम कर लेते हैं। रास्ते में थकान
  390. 19:41भी कम होगी और हम सब एक साथ ठहर कर रात
  391. 19:44गुजार सकते हैं।
  392. 19:47तीनों उसी दिशा में चल पड़े।
  393. 19:51कुछ देर बाद सच में उन्हें एक बहुत बड़ा
  394. 19:54और पुराना पेड़ दिखाई दिया। उसकी मोटी
  395. 19:58जड़े जमीन से बाहर निकली हुई थी और उसकी
  396. 20:01शाखाएं चारों तरफ फैली हुई थी। पेड़ इतना
  397. 20:04बड़ा था कि उसके नीचे काफी जगह खाली थी।
  398. 20:07धनिया ने चारों तरफ देखा। जंगल धीरे-धीरे
  399. 20:11अंधेरे में डूब रहा था।
  400. 20:13आज की रात हम यहीं रुकेंगे। यहां ठहरना
  401. 20:16सुरक्षित रहेगा और थोड़ी देर आराम भी हो
  402. 20:19जाएगा।
  403. 20:19बाबा आप और दादी यहीं आराम से बैठिए। मैं
  404. 20:23थोड़ी देर में वापस आती हूं।
  405. 20:25कहां जा रही हो बेटी? इतनी रात में?
  406. 20:28पास में कुछ फल वाले पेड़ हैं। मैं दादी
  407. 20:31के लिए ताजा और मीठे फल लेकर आती हूं।
  408. 20:34जल्दी आ जाऊंगी बाबा।
  409. 20:36धनिया कुछ कह पाता। उससे पहले ही गौरी पास
  410. 20:40की झाड़ियों की तरफ चली गई।
  411. 20:43थोड़ी देर बाद वह वापस लौटी। उसके हाथों
  412. 20:46में कुछ जंगली फल थे। उसने वह फल अपनी
  413. 20:49दादी के हाथ में रख दी।
  414. 20:51बेटी तू खुद खा ले। मुझे कोई फर्क नहीं
  415. 20:54पड़ेगा।
  416. 20:55पहले आप खाइए दादी। आप सबसे ज्यादा थकी
  417. 20:58हुई है। मैं तब तक इंतजार कर लूंगी। आपका
  418. 21:02पेट भरा होना जरूरी है।
  419. 21:05बाबा आप दुखी मत होइए। आपने कभी कुछ गलत
  420. 21:09नहीं किया। सब जानते हैं कि आप सच्चे और
  421. 21:12ईमानदार इंसान हैं। एक दिन जरूर आएगा जब
  422. 21:15सबको सच पता चल जाएगा और तब सभी लोग
  423. 21:18समझेंगे कि आप बेगुनाह हैं। अपनी बेटी यह
  424. 21:22बात सुनकर धनिया की आंखें भर आईं।
  425. 21:26बूढ़ी मां आसमान की तरफ देख रही थी। तारों
  426. 21:30से भरा आसमान जैसे उन्हें दिलासा दे रहा
  427. 21:32था। पेड़ के नीचे बैठे-बैठे काफी समय बीत
  428. 21:36चुका था। रात धीरे-धीरे गहरी होने लगी थी।
  429. 21:40आसमान में काले बादल गिर आए थे और ठंडी
  430. 21:43हवा चलने लगी थी।
  431. 21:50अचानक बिजली चमकी और कुछ ही पलों बाद तेज
  432. 21:53बारिश शुरू हो गई। पहले तो हल्की-हल्की
  433. 21:56बूंदे गिरने लगी। लेकिन देखते ही देखते
  434. 21:59बारिश बहुत तेज हो गई।
  435. 22:08पेड़ की घनी शाखाएं कुछ देर तक उन्हें
  436. 22:11बचाती रही। लेकिन जल्द ही पानी की बूंदे
  437. 22:15नीचे तक आने लगी। बूढ़ी मां कांपने लगी।
  438. 22:18गौरी भी अपने पिता के पास सिमट गई। धनिया
  439. 22:22ने चारों तरफ चिंतित होकर देखा। अगर ऐसे
  440. 22:25ही बारिश होती रही तो हम सब पूरी तरह भीग
  441. 22:28जाएंगे और तब बीमार पड़ने का डर भी रहेगा।
  442. 22:31हमें तुरंत कहीं ऐसा स्थान ढूंढना होगा
  443. 22:33जहां हम सिर छुपा सकें और थोड़ी देर के
  444. 22:36लिए सुरक्षित रह सकें।
  445. 22:37यह सोचकर धनिया तुरंत उठ खड़ा हुआ। वह
  446. 22:41बारिश में भीगते हुए आसपास जगह ढूंढने
  447. 22:44लगा। जंगल में अंधेरा था और हर तरफ पानी
  448. 22:48की आवाज गूंज रही थी।
  449. 22:55कुछ देर तक इधर-उधर देखने के बाद अचानक
  450. 22:58उसकी नजर थोड़ी दूर पहाड़ी के पास बने एक
  451. 23:01अंधेरे से मुंह पर पड़ी। वह ध्यान से
  452. 23:05देखने लगा। बारिश की चमकती बिजली में उसे
  453. 23:08साफ दिखाई दिया। वह एक गुफा थी।
  454. 23:14धनिया जल्दी से अपनी मां और गौरी के पास
  455. 23:17आया और बोला
  456. 23:18चलो। मुझे सामने एक गुफा दिखाई दे रही है।
  457. 23:21वहां जाकर हम बारिश से बच सकते हैं और
  458. 23:23थोड़ा आराम कर सकते हैं। जल्दी चलते हैं।
  459. 23:26बारिश तेज हो रही है।
  460. 23:28तीनों जल्दी-जल्दी उस तरफ चल पड़े। कुछ ही
  461. 23:31देर में
  462. 23:33वे उस गुफा के अंदर पहुंच गए। गुफा अंदर
  463. 23:36से काफी बड़ी थी। सबसे अच्छी बात यह थी कि
  464. 23:40गुफा के अंदर ना तो पानी टपक रहा था और ना
  465. 23:43ही तेज हवा आ रही थी। बाहर जोरदार बारिश
  466. 23:47हो रही थी। लेकिन गुफा के अंदर एक अजीब सी
  467. 23:51शांति थी। जैसे यह जगह उन्हें सुरक्षित
  468. 23:54रखने के लिए ही बनी हो। धनिया ने राहत की
  469. 23:57सांस ली।
  470. 23:58कम से कम आज की रात हम यहां आराम से गुजार
  471. 24:01सकते हैं।
  472. 24:02धीरे-धीरे थकान के कारण तीनों वहीं
  473. 24:04बैठते-बैठते सो गए।
  474. 24:11सुबह जब धनिया की आंख खुली तो बारिश रुक
  475. 24:14चुकी थी। गुफा के बाहर से हल्की धूप अंदर
  476. 24:17आ रही थी। पक्षियों की चहचहट फिर से जंगल
  477. 24:20में सुनाई देने लगी थी। धनिया उठकर बाहर
  478. 24:24गया और चारों तरफ देखा। जंगल हरियाली से
  479. 24:27चमक रहा था। वह कुछ देर चुप खड़ा रहा और
  480. 24:31सोचने लगा। फिर वह गुफा के अंदर वापस आया।
  481. 24:35उसकी मां और गौरी भी अब जाग चुकी थी।
  482. 24:38जब तक हमें रहने के लिए कोई और जगह नहीं
  483. 24:40मिल जाती, हम इसी गुफा में रहेंगे। बूढ़ी
  484. 24:43मां ने सहमति में सिर हिलाया। गौरी भी खुश
  485. 24:46हो गई।
  486. 24:47बाबा यह जगह तो अच्छी है। यहां हमें बारिश
  487. 24:51और हवा से भी डर नहीं लगेगा।
  488. 25:02दिन बीतने लगे।
  489. 25:06धीरे-धीरे गुफा ही धनिया उसकी मां और गौरी
  490. 25:10का नया घर बन गई। सुबह धनिया जंगल से
  491. 25:13लकड़ियां और फल लाता। गौरी गुफा के अंदर
  492. 25:16साफ सफाई करती और बूढ़ी मां पास बैठकर
  493. 25:19ईश्वर का नाम जपती रहती।
  494. 25:24गरीबी अभी भी थी लेकिन तीनों एक दूसरे के
  495. 25:28साथ होने से संतुष्ट थे।
  496. 25:36एक दिन सुबह गौरी गुफा के अंदर झाड़ू लगा
  497. 25:39रही थी। वह धीरे-धीरे गुफा के कोने-कोने
  498. 25:43की धूल साफ कर रही थी। झाड़ू लगाते लगाते
  499. 25:47वह गुफा के पीछे वाले हिस्से तक पहुंच गई।
  500. 25:50वहां पत्थरों के बीच कुछ अजीब सा दिखाई
  501. 25:53दिया। गौरी रुक गई। उसे लगा जैसे वहां कोई
  502. 25:57पुरानी थैली पड़ी हो। उसने झुककर उसे
  503. 26:00उठाया। उस थैली के अंदर चमकते हुए सोने के
  504. 26:03सिक्के भरे हुए थे। गौरी घबराकर जोर से
  505. 26:07चिल्लाई। बाबा बाबा जल्दी आइए।
  506. 26:15क्या हुआ बेटी?
  507. 26:16गौरी ने कांपते हाथों से वह थैली अपने
  508. 26:19पिता को दिखाई। धनिया ने जब अंदर देखा तो
  509. 26:23वह भी कुछ पल के लिए हक्का-बक्का रह गया।
  510. 26:26थैली में सचमुच बहुत सारे सोने के सिक्के
  511. 26:29थे। बूढ़ी मां भी पास आ गई। लगता है भगवान
  512. 26:33ने हमारी सच्चाई और हमारे दुखों को देखकर
  513. 26:36हम पर दया की है। उसने हमें कठिन समय में
  514. 26:39सहारा दिया। हमारी मेहनत और ईमानदारी को
  515. 26:42महत्व दिया और अब हमें सुख, सुरक्षा और
  516. 26:46सम्मान मिला है। सच में उसकी कृपा से ही
  517. 26:49आज हमारा परिवार खुशहाल और सुरक्षित है।
  518. 26:53धनिया कुछ देर तक चुप खड़ा रहा। उसकी
  519. 26:56आंखों में आंसू आ गए। उसे लगा जैसे ईश्वर
  520. 27:00ने आखिरकार उसकी ईमानदारी का फल दे दिया
  521. 27:03हो।
  522. 27:04अब हमें इस जंगल में रहने की जरूरत नहीं
  523. 27:06है।
  524. 27:13कुछ ही दिनों में धनिया ने उन सिक्कों में
  525. 27:16से थोड़ा सा इस्तेमाल करके पास के एक
  526. 27:19दूसरे गांव में छोटा सा घर खरीद लिया। वह
  527. 27:22अपनी मां और गौरी के साथ वहां रहने लगा।
  528. 27:26धीरे-धीरे उसने फिर से छोटा सा खेत भी ले
  529. 27:29लिया और मेहनत करने लगा। अब उनकी जिंदगी
  530. 27:33पहले से कहीं बेहतर हो गई थी। घर में
  531. 27:36खुशहाली लौट आई थी। बूढ़ी मां अक्सर ईश्वर
  532. 27:40को धन्यवाद देती। लेकिन कुछ ही समय में
  533. 27:43धनिया के अमीर बनने की खबर दूर-दूर तक फैल
  534. 27:46गई। यह बात आखिरकार लालाचंद सेठ के कानों
  535. 27:50तक भी पहुंच गई। जब उसने सुना कि जिसे
  536. 27:54उसने गांव से निकलवा दिया था वही धनिया अब
  537. 27:57अमीर हो गया है तो वह एकदम हक्का बक्का रह
  538. 28:01गया। वह गुस्से और हैरानी से बोला।
  539. 28:04यह कैसे हो सकता है? वो गरीब किसान जिसने
  540. 28:08कभी किसी से कुछ नहीं लिया, इतना मेहनती
  541. 28:11और ईमानदार रहा, अब इतना अमीर कैसे बन
  542. 28:14गया, यह तो किसी ने सोचा भी नहीं होगा।
  543. 28:17सेठ को जल्द ही पता चल गया कि धनिया को
  544. 28:19जंगल की गुफा में सोने के सिक्के मिले थे।
  545. 28:22यह सुनते ही लालाचंद सेठ की आंखों में
  546. 28:25लालच चमकने लगा।
  547. 28:27अगर सच में उस गुफा में सोने की सिक्कों
  548. 28:29की थैली मिली थी तो इसका मतलब यह है कि
  549. 28:32वहां और भी खजाने छुपे हुए हो सकते हैं।
  550. 28:35शायद वो गुफा किसी पुराने राजाओं या अमीर
  551. 28:38व्यक्तियों का खजाना रही हो। अगर मैं
  552. 28:41जल्दी ही वहां पहुंचूं और सारी चीजें खोज
  553. 28:44लूं तो मैं भी अमीर बन सकता हूं। हां, यही
  554. 28:47मौका है जो कभी दोबारा नहीं मिलेगा। इस
  555. 28:51बार मैं किसी को रोकने नहीं दूंगा और खुद
  556. 28:54ही सब कुछ अपने नाम कर लूंगा।
  557. 28:56लालच से भरा हुआ सेठ उसी समय जंगल की तरफ
  558. 28:59निकल पड़ा। वह जल्दी-जल्दी उस गुफा के पास
  559. 29:03पहुंचा जहां कभी धनिया रहा करता था। गुफा
  560. 29:07अब शांत और खाली थी। सेठ की आंखों में
  561. 29:10लालच साफ दिखाई दे रहा था। वह तेजी से
  562. 29:13गुफा के अंदर जाने लगा। उसे बस एक ही चीज
  563. 29:17चाहिए थी। खजाना। लेकिन उसे यह नहीं पता
  564. 29:20था कि लालच में उठाया गया उसका यह कदम।
  565. 29:24उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक बनने वाला
  566. 29:27है। वो मन ही मन सोच रहा था।
  567. 29:30अगर धनिया को यहां सोने के सिक्के मिले थे
  568. 29:33तो जरूर यहां और भी खजाना होगा।
  569. 29:36लालच में वह गुफा के अंदर और गहराई तक
  570. 29:39जाने लगा। कुछ देर बाद अचानक उसकी नजर एक
  571. 29:43पत्थर के पीछे पड़ी एक पुरानी थैली पर गई।
  572. 29:46सेठ जल्दी से वहां दौड़ा। उसने थैली उठाकर
  573. 29:49खोली और जैसे ही अंदर देखा उसकी आंखें चमक
  574. 29:54उठी। उस थैली में भी सोने के कई सिक्के
  575. 29:57भरे हुए थे। [हंसी]
  576. 29:59आज तो मेरी किस्मत खुल गई। आखिरकार मेहनत
  577. 30:03और भाग्य दोनों मेरे साथ हैं। अब मैं वही
  578. 30:06कर सकता हूं जो हमेशा चाहता था। इतना धन
  579. 30:10जमा करूं कि कोई मुझसे टक्कर भी ना ले
  580. 30:12सके।
  581. 30:13सेठ खुशी से हंस पड़ा। उसने जल्दी से वह
  582. 30:16थैली हाथ पर रख ली। अब वह गुफा से बाहर
  583. 30:20निकलने के लिए मुड़ा। लेकिन जैसे ही वह
  584. 30:22आगे बढ़ा, उसे अचानक एहसास हुआ कि उसे
  585. 30:26बाहर जाने का रास्ता समझ नहीं आ रहा था।
  586. 30:30गुफा के अंदर कई छोटे-छोटे रास्ते थे। सेठ
  587. 30:33एक रास्ते पर गया। फिर वापस लौटा। फिर
  588. 30:37दूसरे रास्ते पर गया। लेकिन हर रास्ता उसे
  589. 30:41फिर उसी जगह पर ले आता। धीरे-धीरे शाम
  590. 30:44होने लगी। सेठ घबराने लगा। वह तेजी से
  591. 30:48इधर-उधर भागने लगा। लेकिन उसे गुफा से
  592. 30:51बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा था।
  593. 30:54पहला दिन बीत गया। दूसरे दिन भी सेठ उसी
  594. 30:57गुफा में भटकता रहा। उसके पास खाने को कुछ
  595. 31:00नहीं था। प्यास और डर से उसकी हालत खराब
  596. 31:04होने लगी। तीसरा दिन भी गुजर गया। अब सेठ
  597. 31:08पूरी तरह थक चुका था।
  598. 31:12वह एक पत्थर के सहारे बैठ गया। उसके मन
  599. 31:15में अचानक एक ख्याल आया। वह धीरे-धीरे खुद
  600. 31:19से बोलने लगा।
  601. 31:20शायद यही मेरे लालच की सजा है। मैंने
  602. 31:24सिर्फ अपना फायदा सोचा और दूसरों की परवाह
  603. 31:27नहीं की। अब यह सोना मेरे हाथों में है,
  604. 31:30लेकिन ऐसा लग रहा है जैसे यह मुझे बंधक
  605. 31:33बना रहा है। शायद जब तक मैं इसे पकड़े
  606. 31:36रहूंगा तब तक मैं इस गुफा से बाहर नहीं
  607. 31:39निकल पाऊंगा। यह खजाना मेरे लिए वरदान
  608. 31:42नहीं बल्कि एक फंदा बन गया है। और अब मुझे
  609. 31:45इसका सामना करना ही पड़ेगा। कुछ पल सोचने
  610. 31:49के बाद उसने वह सोने की थैली जमीन पर रख
  611. 31:52दी। फिर धीरे-धीरे पीछे मुड़ा और बिना उस
  612. 31:56थैली को उठाए तेजी से आगे बढ़ने लगा। कुछ
  613. 32:00ही देर बाद अचानक उसे दूर से हल्की रोशनी
  614. 32:03दिखाई दी। वह उसी दिशा में भागा और कुछ
  615. 32:06पलों बाद वह गुफा के बाहर पहुंच गया। ताजी
  616. 32:10हवा उसके चेहरे से टकराई। सेठ जमीन पर बैठ
  617. 32:14गया और जोर-जोर से सांस लेने लगा। उसकी
  618. 32:18जान में जान आ गई थी।
  619. 32:20लेकिन उसी समय उसके दिल में भारी पछतावा
  620. 32:23भी होने लगा। वह सोचने लगा अगर मैंने लालच
  621. 32:28में आकर धनिया के साथ गलत नहीं किया होता
  622. 32:30तो आज मुझे यह दिन नहीं देखना पड़ता। अगर
  623. 32:34मैंने उसकी मेहनत और ईमानदारी का सम्मान
  624. 32:37किया होता। उसे गांव से नहीं निकाला होता
  625. 32:40तो शायद मैं आज इस गुफा में फंसा नहीं
  626. 32:42होता। मेरी अपनी लालच और अधूरी चालाकियों
  627. 32:46ने मुझे यहां तक पहुंचाया है। अब समझ आया
  628. 32:49कि दूसरों के अधिकारों की चोरी करके कोई
  629. 32:52कभी सच्ची खुशी या अमीरी हासिल नहीं कर
  630. 32:55सकता।
  631. 32:57अब उसे समझ आ चुका था कि लालच इंसान को
  632. 33:00अंधा बना देता है और कभी-कभी वही लालच
  633. 33:04इंसान को ऐसी मुसीबत में डाल देता है जहां
  634. 33:07से निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है।
  635. 33:10लालाचंद सेठ धीरे-धीरे गांव की तरफ लौटने
  636. 33:12लगा। लेकिन इस बार उसके मन में खजाने का
  637. 33:16लालच नहीं बल्कि अपनी गलती का पछतावा था।
  638. 33:20कुछ समय बाद पूरे गांव में धीरे-धीरे यह
  639. 33:23बात फैल गई कि धनिया पर लगाया गया चोरी का
  640. 33:26इल्जाम झूठा था। गांव के कुछ पुराने
  641. 33:30बुजुर्ग और लोग जिन्होंने सब देखा था। अब
  642. 33:33मुखर होकर कहने लगे, धनिया तो हमेशा
  643. 33:37ईमानदार और मेहनती रहा है। उसने कभी किसी
  644. 33:40का फायदा नहीं लिया। हमेशा अपने पसीने की
  645. 33:44कमाई से घर चलाया। हमें यह नहीं भूलना
  646. 33:47चाहिए कि सच्चाई और ईमानदारी ही असली ताकत
  647. 33:51है। अब समय है कि हम उसका सम्मान वापस
  648. 33:54दें। उसे सही जगह और उसका हक लौटाएं।
  649. 33:58जिसने भी उसके साथ अन्याय किया उसे समझना
  650. 34:02चाहिए कि सच का सामना करना ही पड़ता है।
  651. 34:06इस बात का पता पंचायत तक पहुंच गया। सभी
  652. 34:09सरपंच और पंचायत के लोग जिन्होंने पहले
  653. 34:12फैसला सुनाया था। अब खुद जाकर हालात की
  654. 34:16जांच करना चाहते थे। एक दिन गांव के मुख्य
  655. 34:19सरपंच अपने कुछ भरोसेमंद आदमियों के साथ
  656. 34:23पास के गांव में जाकर धनिया के नए घर
  657. 34:26पहुंचे। वे [संगीत] चाहते थे कि धनिया को
  658. 34:28वापस गांव बुलाया जाए और उसे उसका सही
  659. 34:31सम्मान लौटाया जाए।
  660. 34:33धनिया हम जानते हैं कि तुम्हारे साथ बहुत
  661. 34:36बड़ा अन्याय हुआ है। हमने अब सब कुछ देखा
  662. 34:39और समझा है। कृपया गांव लौट आओ। हम
  663. 34:42तुम्हें सम्मान देंगे। तुम्हारा हक वापस
  664. 34:45करेंगे और सभी अपनी गलतियां मानेंगे।
  665. 34:49तुम्हारे बिना यह गांव अधूरा है।
  666. 34:52लेकिन धनिया ने शांत और दृढ़ स्वर में
  667. 34:54जवाब दिया।
  668. 34:55मुखिया जी मैं आभारी हूं कि आप सच को
  669. 34:58जानने और मेरे पक्ष में खड़े होने आए।
  670. 35:01लेकिन मैं अभी इस गांव को नहीं छोड़ सकता।
  671. 35:03यह गांव ही वह जगह है जिसने मुझे मदद दी।
  672. 35:06मुझे यहां सम्मान दिया और मेरी मां और
  673. 35:08बेटी के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बनाया।
  674. 35:11यहां की मिट्टी, यहां के लोग और यहां की
  675. 35:14मेहनत मुझे जोड़ती है। जब तक मैं यहां
  676. 35:16हूं, मैं इस गांव को नहीं छोडूंगा और अपनी
  677. 35:19मेहनत और ईमानदारी से इसे और भी बेहतर
  678. 35:21बनाने की कोशिश करूंगा।
  679. 35:25धनिया की यह बात सुनकर सरपंच कुछ पल के
  680. 35:29लिए चुप रह गए। फिर उन्होंने धीरे-धीरे
  681. 35:32सिर झुकाया और स्वीकार किया। धनिया हम
  682. 35:35तुम्हारे फैसले का पूरी तरह सम्मान करते
  683. 35:38हैं। तुम्हारे फैसले में तुम्हारी समझदारी
  684. 35:41और धैर्य झलकता है और इस बार हमें यह भी
  685. 35:45सुनिश्चित करना होगा कि लानाचंद सेठ को
  686. 35:48उसके किए का उचित दंड दिया जाए ताकि वह और
  687. 35:52किसी के साथ ऐसा अन्याय ना कर सके और सबको
  688. 35:55यह संदेश मिले कि जो भी ईमानदारी और मेहनत
  689. 35:58के रास्ते पर चलता है उसका हक कभी दबाया
  690. 36:02नहीं जा सकता।
  691. 36:07गांव लौटकर पंचायत ने फैसला सुनाया।
  692. 36:11लालाचंद सेठ को जुर्माने के रूप में दंडित
  693. 36:14किया गया और उसे गांव से हमेशा के लिए
  694. 36:17निकाल दिया गया।
  695. 36:22सब लोग इस फैसले से संतुष्ट हुए। अब धनिया
  696. 36:26के नाम पर फिर से सम्मान और भरोसा लौट
  697. 36:28आया। गांव के लोग खुश थे कि सच्चाई हमेशा
  698. 36:32जीतती है।
  699. 36:42धनिया की मां और गौरी भी अपने बेटे और
  700. 36:44पिता के गौरव से खुश थी। धनिया अब अपने
  701. 36:47गांव में सुरक्षित और सम्मानित रह सकता
  702. 36:50था। वह जानता था कि ईमानदारी और मेहनत का
  703. 36:53फल देर से सही लेकिन निश्चित रूप से मिलता
  704. 36:57है। गौरी अपने पिता की ओर देखकर मुस्कुराई
  705. 37:00और बोली
  706. 37:00बाबा देखो सच की जीत हमेशा होती है। चाहे
  707. 37:04कितनी भी मुश्किलें आई सच्चाई और ईमानदारी
  708. 37:08का मार्ग कभी खाली नहीं जाता। मुझे लगता
  709. 37:11है कि हम सब ने यह सच में महसूस किया।
  710. 37:14हां बेटी और यही सीख हमें हमेशा याद रखनी
  711. 37:17चाहिए। ईमानदारी, मेहनत और सच्चाई का
  712. 37:20मार्ग ही असली ताकत है। अगर हम इसे अपनाएं
  713. 37:23तो कोई भी चुनौती हमें नहीं हरा सकती। यही
  714. 37:26रास्ता हमें सही मंजिल तक ले जाता है।
  715. 37:30और इस तरह धनिया, उसकी मां और गौरी ने
  716. 37:35अपने नए घर में खुशी-खुशी जीवन बिताना
  717. 37:37शुरू किया। साथ ही गांव में उनका सम्मान
  718. 37:41और प्यार हमेशा बरकरार रहा।
  719. 37:51धनिया, उसकी मां और गौरी अब अपने छोटे से
  720. 37:54घर में सुरक्षित और खुशहाल जीवन बिता रहे
  721. 37:58थे। घर में चारों तरफ हल्की धूप और
  722. 38:01हरियाली की खुशबू थी।
  723. 38:03बाबा देखो अब हमारे पास अपना घर है और हम
  724. 38:07पूरी तरह सुरक्षित हैं। मैं बहुत खुश हूं
  725. 38:11कि हम सब साथ हैं और अब डर नहीं लगता। हां
  726. 38:14बेटी यह सब तुम्हारी हिम्मत, समझदारी और
  727. 38:17सच्चाई की वजह से संभव हुआ। हमारा घर अब
  728. 38:20सिर्फ ईंट पत्थर का नहीं रह गया है। यह
  729. 38:22प्यार, विश्वास और ईमानदारी का घर बन गया
  730. 38:25है। यहां हर कोना हमारी मेहनत और अच्छाई
  731. 38:28की गवाही देता है।
  732. 38:29बेटा, तुमने हमेशा मेहनत और ईमानदारी को
  733. 38:32चुना। आज यही हमें सबसे बड़ी खुशियां दे
  734. 38:36रही हैं। तुम्हारे कारण हमारा परिवार
  735. 38:38सुरक्षित और खुशहाल है।
  736. 38:40गौरी याद रखना किसी भी मुश्किल में डरना
  737. 38:43नहीं हमेशा सच का साथ देना और नेक दिल
  738. 38:46रहना यही हमें सही रास्ता दिखाता है और हर
  739. 38:49संकट में हमारी मदद करता है।
  740. 38:52हां बाबा मैं हमेशा सच और ईमानदारी का
  741. 38:55मार्ग चुनूंगी। हम सब मिलकर इस घर को
  742. 38:58खुशियों, प्यार और सुरक्षा का घर बनाए
  743. 39:01रखेंगे। आज हमारे घर में सिर्फ सुख और
  744. 39:05प्यार है। अब हम कभी किसी झूठ, लालच या डर
  745. 39:09से परेशान नहीं होंगे। हमारी मेहनत,
  746. 39:12सच्चाई और हिम्मत हमें हमेशा मजबूत बनाए
  747. 39:16रखेगी। घर के चारों कोनों में खुशियों की
  748. 39:19गूंज थी। खिड़कियों से हल्की हवा आती और
  749. 39:23पक्षियों की चहचहाट घर में संगीत की तरह
  750. 39:26गूंजती। गौरी अपने पिता के पास बैठकर
  751. 39:29मुस्कुरा रही थी। धनिया अपने खेत और घर की
  752. 39:32ओर देखकर संतोष महसूस कर रहा था और उसकी
  753. 39:36मां दोनों के बीच बैठकर शांत और गर्वित
  754. 39:40थी। अब उनके जीवन में सच्चाई, मेहनत और
  755. 39:43ईमानदारी का फल हर रोज दिखाई देता था। और
  756. 39:47यह घर हमेशा खुशियों और प्यार से भरा
  757. 39:50रहता। धनिया ने साबित कर दिया कि सच्चाई
  758. 39:54और ईमानदारी कभी हारती नहीं। समय चाहे
  759. 39:57जितना कठिन क्यों ना हो, अंत में जीत
  760. 40:00हमेशा सच की ही होती है। आपको यह कहानी
  761. 40:03कैसी लगी कमेंट करके बताइए। धनिया के नाम
  762. 40:06दो प्यारी सी लाइंस जरूर लिखें।

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