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Hazrat Luqman Hakeem RA Episode 1 | Zindagi Badal Dene Wali Naseehat | Islamic Historical Drama — Transcript

by Saad · 2,180 words · 304 segments · language en · Watch on YouTube

Full transcript

  1. 0:10जर्रे को अपनी मंजिल मालूम है। परिंदे को
  2. 0:13अपना रिज़्क
  3. 0:16और इंसान कायनात का सबसे बड़ा अकलमंद होकर
  4. 0:20भी अपनी असल मंजिल से गाफिल है।
  5. 0:27अगर आका को खबर हो गई तो हमारी जुबान काट
  6. 0:29देगा।
  7. 0:31डरो मत वो काला लकड़हारा किस काम आएगा?
  8. 0:35सारा दिन गूंगा बनकर लकड़ी छीलता रहता है।
  9. 0:39जब आका पूछेगा हम दोनों एक जुबान होकर कसम
  10. 0:43खाएंगे और सारा इल्जाम लुकमान पर लगा
  11. 0:46देंगे। आका हम दोनों की बात मानेगा या उस
  12. 0:50तन्हा गुलाम की? [हंसी]
  13. 0:58यह वो खास फल था जिसकी मैंने महीनों
  14. 1:02हिफाजत की थी।
  15. 1:05तुम तीनों के अलावा इस बाग की दहलीज कोई
  16. 1:07पार नहीं करता। बोलो
  17. 1:10मेरी अमानत में किसने खयानत की?
  18. 1:15आका की कसम हमने तो सूरज निकलने के बाद इस
  19. 1:19तरफ कदम भी नहीं रखा। दोपहर को जब तपिश
  20. 1:23बढ़ी तो हमने लुकमान को उस क्यारी के करीब
  21. 1:25देखा था। उसने अपना चेहरा भी छुपा रखा था।
  22. 1:28हां मालिक मैं खुद गवाह हूं। हमने उसे
  23. 1:31रोका भी मगर वो हमसे ताकत में बड़ा है
  24. 1:34इसलिए हम खामोश रहे।
  25. 1:38लुकमान तेरे खिलाफ दो गवाह खड़े हैं। और
  26. 1:42तेरा हाथ खाली है। क्या तेरे पास अपने
  27. 1:46दिफा में कुछ कहने के लिए कोई लफज़ है?
  28. 1:50ए सरदार जब झूठ की दो जुबाने मिल जाए तो
  29. 1:54सच्चाई अल्फाज की मोहताज हो जाती है।
  30. 1:58इंसान झूठ बोलता है मगर इंसान का अपना
  31. 2:02वजूद कभी झूठ नहीं बोल सकता। वजूद
  32. 2:07झूठ नहीं बोल सकता।
  33. 2:10इसका क्या मतलब है?
  34. 2:13अगर मालिक सच्चे अदल के ख्वाहा हैं तो ना
  35. 2:16मुझ पर इल्जाम धरे और ना इन दोनों पर।
  36. 2:19हम तीनों को बराबर मिकदार में गर्म उबला
  37. 2:22हुआ नीम गरम पानी पीने को दिया जाए और फिर
  38. 2:26हम तीनों को इस सहन के गिर्द तेज दौड़ने
  39. 2:28का हुक्म दिया जाए जिसके पेट में जो सच
  40. 2:31छुपा होगा
  41. 2:34उसका महदा खुद उसकी गवाही उगलेगा
  42. 2:39[हांफने की आवाज़]
  43. 2:40दौड़ो सेहन के तीन चक्कर लगाओ
  44. 2:45[हांफने की आवाज़]
  45. 2:48[खांसने की आवाज़]
  46. 2:50तुमने ना तलवार मांगी ना शोर मचाया ना
  47. 2:54झूठी कसमें खाएं। तुमने इंसान की अपनी
  48. 2:57बनावट से सच का फैसला करवा दिया।
  49. 3:01ए लुकमान यह कैसी अक्ल है जो पत्थर के
  50. 3:05नीचे छुपे राज को भी बाहर निकाल लाती है।
  51. 3:09ऐ सरदार जब यह नाचीज मैदा चंद घंटों की
  52. 3:13चोरी को अपने अंदर छुपा नहीं सकता
  53. 3:16तो इंसान यह क्यों कर गुमान कर लेता है कि
  54. 3:20वह अपने दिलों में छुपाई हुई खयानतों और
  55. 3:23गुनाहों को इस कायनात के रब से छुपा लेगा।
  56. 3:32लुकमान कल से तुम अस्तबल में नहीं रहोगे।
  57. 3:37तुम मेरे बराबर वाली मसनद पर बैठोगे। और
  58. 3:41काजी की अदालत में मेरे फैसलों की रहनुमाई
  59. 3:43करोगे।
  60. 3:45मसनदे इंसान को बड़ा नहीं बनाते सरदार।
  61. 3:48इंसान को उसका सच और उसके रब का खौफ बड़ा
  62. 3:51बनाता है।
  63. 3:53[गहरी सांस लेने की आवाज़][अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़]
  64. 3:55तीन दिन से यह मुकदमा इस अदालत के सामने
  65. 3:58है।
  66. 3:59ना कोई सबूत मिलता है, ना गवाह बाकी है।
  67. 4:03शरीयत कसम मांगती है और दोनों कसम खा चुके
  68. 4:07हैं।
  69. 4:09अगर मैंने बेधानी में गलत फैसला दिया तो
  70. 4:12मुझ पर आसमान का कहर टूट पड़ेगा।
  71. 4:16काजी साहब मेरे साथ मौजूद इस नौजवान को
  72. 4:19देखें। यह देखने में सादा खादिम है। मगर
  73. 4:22इसके सीने में वह बसीरत है जो पत्थर के
  74. 4:26अंदर छुपे ऐब को भी भांप लेती है। इजाजत
  75. 4:29दें कि यह दोनों मुद्दयों के बयानात सुने।
  76. 4:34ऐ शहर के काजी 3 साल पहले जब मैं सफर पर
  77. 4:39जा रहा था तो मैंने अपने बरसों की जमा
  78. 4:42पूंजी
  79. 4:45100 सोने के दीनार एक थैली में डालकर अपने
  80. 4:48उस पड़ोसी बारूख को बतौरे अमानत सौंपी थी।
  81. 4:51जब मैं लौटा और अपना हक मांगा तो यह साफ
  82. 4:55मुकर गया कि उसे मुझसे कोई अमानत मिली ही
  83. 4:58नहीं।
  84. 5:01बारूक तुम इस दावे के जवाब में क्या कहते
  85. 5:04हो? ऐ काजीए वक्त इसने मुझे 100 दीनार दिए
  86. 5:08थे। मैं उससे इंकार नहीं करता।
  87. 5:12लेकिन जब यह सफर से वापस आया तो मैंने
  88. 5:15एक-एक दीनार गिनकर उसी के हाथ में वापस
  89. 5:18लौटा दिया था। यह लालच में आकर मुझसे
  90. 5:20दोबारा रकम में एंठना चाहता है।
  91. 5:22खुदा की कसम इसने मुझे एक दरहम भी वापस
  92. 5:24नहीं किया। खामोश बारूख क्या तुम इस पाक
  93. 5:28जात की कसम खाने को तैयार हो जिसके कब्जे
  94. 5:31में आसमान और जमीन है कि तुमने उसका पूरा
  95. 5:34हक लौटा दिया। मैं हल्फ उठाने को तैयार
  96. 5:37हूं।
  97. 5:39जरा इस लाठी को पकड़ना। मैं हल्फ के लिए
  98. 5:41दोनों हाथ बुलंद करना चाहता हूं।
  99. 5:46ए कायनात के मालिक और अदल करने वाले रब तू
  100. 5:51गवाह रहना।
  101. 5:54मैंने इस इमरान की जो रकम ली थी वह पूरी
  102. 5:58की पूरी उसके अपने दोनों हाथों में सौंप
  103. 6:02दी है। इस वक्त उसका हक उसके अपने हाथों
  104. 6:05में है और मुझ पर उसका कोई कर्ज बाकी
  105. 6:07नहीं।
  106. 6:13इसने हलफ उठा लिया। शरीयत के मुताबिक
  107. 6:17मुकदमा खारिज किया जाता है।
  108. 6:20मोहतरम काजी साहब कलम को चंद लम्हों के
  109. 6:22लिए रोक लीजिए।
  110. 6:25हलफ झूठा नहीं था मगर इंसाफ अभी तक इस
  111. 6:29लाठी के अंदर कैद है।
  112. 6:32तुम क्या कहना चाहते हो लुकमान? तुमने
  113. 6:35सुना नहीं कि उसने कैसा हल्फ उठाया? मैंने
  114. 6:38सुना है। लेकिन क्या आप लोगों ने गौर से
  115. 6:41सुना कि उसने अभी क्या कहा?
  116. 6:45उसने कहा इस वक्त इसका हक उसके अपने हाथों
  117. 6:48में है। और यह अल्फाज उस वक्त अदा किए जब
  118. 6:51उसने अपनी लाठी इमरान के हाथों में थमा
  119. 6:53रखी थी। यह यह कैसा तमाशा है? यह एक
  120. 6:57मामूली गुलाम है। यह मेरी खानदानी लाठी पर
  121. 7:01कैसा बेबुनियाद इल्जाम लगा रहा है।
  122. 7:04इस लाठी को दरमियान से खोल कर देखा जाए।
  123. 7:07लकड़ी का वजन बता रहा है कि इसका पेट खाली
  124. 7:10नहीं है।
  125. 7:11पहरीदार बारूख से यह लाठी लेकर मेरे पास
  126. 7:14लाओ।
  127. 7:21अब जो भी हकीकत है वो सबके सामने आ जाएगी।
  128. 7:28बारूख ने सोना अपनी लकड़ी के अंदर छुपा
  129. 7:30रखा था।
  130. 7:32आपका बहुत शुक्रिया।
  131. 7:35शुक्र उसका करो जिसने अदल की तराजू बनाई।
  132. 7:39लुकमान तो सिर्फ मट्टी का एक जर्रा है।
  133. 7:45खुदा की कसम तीन दिन से मैं गवाहों और
  134. 7:48शरीयत के अल्फाज में उलझा हुआ था।
  135. 7:51और तुमने इंसान की बनाई हुई फरेब की गिरह
  136. 7:54को पलक झपकने में खोल दिया। तुमने अदालत
  137. 7:58को गुनाह से और मजलूम को फाकों से बचा
  138. 8:01लिया। ए लुकमान यह इल्म तुम्हें किस मदरसे
  139. 8:04ने सिखाया?
  140. 8:06ऐ काजी
  141. 8:08जब इंसान की आंख मखलूक के फरेब से हटकर
  142. 8:11खालिक की कुदरत पर टिक जाए तो बाततिल का
  143. 8:15बारीक तरीन पर्दा भी शीशे की तरह शफाफ
  144. 8:18दिखाई देने लगता है।
  145. 8:25अब यह मुमकिन नहीं कि तुम किसी के गुलाम
  146. 8:27बनकर रहो। जिसके फहम का शहर के काजी
  147. 8:31मोहताज हो जाए
  148. 8:34वह किसी इंसान की मिल्कियत नहीं हो सकता।
  149. 8:37आज से तुम मेरी तरफ से आजाद हो। तुम्हारा
  150. 8:40हर हक तुम पर हलाल है।
  151. 8:44आजादी जिस्म की कैद से छूटने का नाम नहीं
  152. 8:47कैनान।
  153. 8:49सच्ची आजादी यह है कि इंसान का दिल दुनिया
  154. 8:52की लालच से आजाद हो जाए और वह सिर्फ अपने
  155. 8:55एक रब का गुलाम बनकर रहे।
  156. 9:00ए लुकमान सामने वो कुटिया देखिए वो बनी
  157. 9:04इसराइल के नबी और खलीफा दाऊद की कारगाह
  158. 9:07है। वो बादशाह और नबी होकर भी शाही खजाने
  159. 9:11से एक दरहम नहीं लेते। अपने हाथों की
  160. 9:14मशक्कत से खाते हैं। जो हाथ अपने रब के
  161. 9:18सामने सजदा रीज हो और रिज़्क हलाल के लिए
  162. 9:21मुशक्कत करें जमीन पर उनसे ज्यादा बाबरकत
  163. 9:24हाथ कोई नहीं हो सकते। इमरान इस मुतबरक
  164. 9:27दहलीज पर कलाम से नहीं निगाह और दिल से
  165. 9:31सीखने चलते हैं।
  166. 9:34ऐ लुकमान
  167. 9:36जब आप इस कारगाह में दाखिल हुए थे तो आपके
  168. 9:39चेहरे पर इतने सवालात थे कि मुझे लगा आप
  169. 9:41अभी नबी अल्लाह दाऊद से कलाम करेंगे। मगर
  170. 9:44आप एक घंटा एक मुजस् की तरह खामोश बैठे
  171. 9:48रहे। आपने कुछ पूछा क्यों नहीं?
  172. 9:52नादान वह है जो बात के मुकम्मल होने से
  173. 9:54पहले बोल पड़े और अकलमंद वह है जो अपनी
  174. 9:58आंखों को जुबान से आगे रखे।
  175. 10:01अगर मैं पूछता तो मैं उनकी तवज्जो काम से
  176. 10:04हटा देता। और महज एक जुमले का जवाब पाता।
  177. 10:10लेकिन जब मैं खामोश रहा तो अल्लाह ने मुझे
  178. 10:13अपनी आंखों से लोहे के मोम बनने का राज भी
  179. 10:15दिखा दिया। जरा के बनने का हुनर भी समझा
  180. 10:18दिया। हम और बगैर पूछे उसका मकसद भी मेरी
  181. 10:21समात तक पहुंचा दिया।
  182. 10:26याद रखो इमरान बोलने पर इंसान को अक्सर
  183. 10:28पछताना पड़ता है। मगर बरव खामोशी पर इंसान
  184. 10:32कभी शर्मिंदा नहीं होता।
  185. 10:38मुबारक हो ऐ लुकमान अल्लाह ने आपके आंगन
  186. 10:40को बेटे की नेमत से नवाजा है। आपका जानशीन
  187. 10:44आपकी नस्ल का चिराग
  188. 10:50ए मेरे नन्हे बेटे तू खाली हाथ इस दुनिया
  189. 10:54में आया है और खाली हाथ ही वापस लौटेगा।
  190. 10:58मैंने तेरा नाम तारान रखा। अल्लाह तुझे
  191. 11:01मिट्टी की तरह आज और आसमान की तरह पाक दिल
  192. 11:04रखे।
  193. 11:07और तुझे उन लोगों में शामिल करें जो जमीन
  194. 11:10पर फसाद नहीं बल्कि इस्लाह फैलाते हैं।
  195. 11:20ठहरो मेरे बेटे।
  196. 11:22क्या हुआ बाबा? यह तो बस चंद काली
  197. 11:25चींटियां हैं जो मिट्टी में रेंग रही हैं।
  198. 11:30बेटे
  199. 11:34जो चीज तुम्हारी नजर में मामूली और छोटी
  200. 11:36है उसका बनाने वाला छोटा नहीं है।
  201. 11:40यह चींटी अपने हिस्से की तस्बीह पढ़ रही
  202. 11:43है और अपना रिज़्क तलाश कर रही है।
  203. 11:47जो इंसान बेजुबान और कमजोर मखलूक पर रहम
  204. 11:50करना नहीं सीखता वह कल बड़ा होकर इंसानों
  205. 11:53पर भी इंसाफ नहीं कर पाता।
  206. 11:59बाबा यह चट्टान कितनी भारी और सख्त है।
  207. 12:02हम क्या दुनिया में कोई ऐसी ताकत है जो
  208. 12:05इसके अंदर छुपे हुए किसी राज को ढूंढ सके?
  209. 12:10ए मेरे प्यारे बेटे सुन लो। अगर कोई नेकी
  210. 12:15या बदी राई के एक दाने के बराबर भी हो और
  211. 12:18वह इस ठोस चट्टान के पेट के अंदर बंद हो
  212. 12:22या आसमानों की बेकर वुसतों में गुम हो या
  213. 12:26जमीन की तारीख गहराइयों में दफन हो चुकी
  214. 12:29हो तब भी अल्लाह ताला उसे रोज़ कयामत सामने
  215. 12:33निकाल लाएगा।
  216. 12:35तो बाबा जब मैं अकेला होता हूं और मुझे
  217. 12:38कोई नहीं देख रहा होता तब भी मेरा रब मुझे
  218. 12:41देख रहा होता है।
  219. 12:42हम
  220. 12:43हां मेरे लखते जिगर हमारा रब हमारी शहरग
  221. 12:48से भी ज्यादा करीब है।
  222. 12:50और याद रखना मेरे बेटे सबसे बड़ी हलाकत
  223. 12:54शर्क है। कभी किसी को अपने रब का शरीक ना
  224. 12:58ठहराना।
  225. 12:59क्योंकि जिसने अपने पैदा करने वाले को
  226. 13:02छोड़कर किसी दूसरे के आगे सर झुकाया उसने
  227. 13:05अपने वजूद पर सबसे बड़ा जुल्म किया।
  228. 13:12मेरे बेटे तुम अपना लिबास बार-बार क्यों
  229. 13:15समेट रहे हो? दिल में कोई परेशानी है?
  230. 13:18बाबा आज हम वादी के सबसे बड़े तजारती
  231. 13:21रास्ते से गुजर रहे हैं। वहां बड़े ताजिर,
  232. 13:25शयूख और मुसाफिर होंगे।
  233. 13:28बाबा, मैं चाहता हूं कि बाजार में सबके
  234. 13:31सामने अच्छे अंदाज से रहूं। मुझे समझ नहीं
  235. 13:33आ रही कि वहां लोगों के दरमियान कैसे चलूं
  236. 13:36और कैसे बैठूं।
  237. 13:39लोगों की राय का खौफ।
  238. 13:41चलो तारान आज का यह सफर सिर्फ बाजार के
  239. 13:44सौदे का नहीं होगा बल्कि आज तुम इंसानों
  240. 13:47की सबसे बड़ी कमजोरी का मुशाहदा करोगे।
  241. 13:52आगे बढ़ो और गधे पर सवार हो जाओ। मैं लगाम
  242. 13:55थाम कर पैदल चलूंगा।
  243. 14:02जमाना कैसा उलट गया है। देखो इस बेअदब और
  244. 14:05गुस्ताख लड़के को। खुद तंदुरुस्त जवान
  245. 14:08होकर आराम से गधे पर बैठा है और उसका
  246. 14:11बूढ़ा बाप पत्थरों पर नंगे पांव पैदल घुस
  247. 14:14रहा है। हया और अखलाक का जनाजा निकल चुका
  248. 14:17है।
  249. 14:18बाबा मैंने कहा था ना लोग बातें बनाएंगे।
  250. 14:22मुझसे यह ताने बर्दाश्त नहीं होते।
  251. 14:24हम
  252. 14:25आप सवार हो जाइए। मैं लगाम पकड़ कर पैदल
  253. 14:28चलता हूं।
  254. 14:29जैसा तुम चाहो मेरे बेटे।
  255. 14:35अरे इस संगदिल बूढ़े को देखो खुद
  256. 14:38हट्टाकट्टा बनकर गधे की काठी परमान है और
  257. 14:43अपने इस मासूम नातुआ बच्चे को तपती रेत पर
  258. 14:46पैदल दौड़ा रहा है। क्या बूढ़ा होकर इसके
  259. 14:48दिल से औलाद का रहम भी खत्म हो गया है।
  260. 14:51देखा बाबा जब मैं बैठा तो मुझे बेदब कहा
  261. 14:54गया और जब आप बैठे तो आपको बेरहम कहा गया।
  262. 14:58अब हम क्या करें?
  263. 15:00अब हम दोनों इस पर सवार हो जाते हैं। आओ
  264. 15:04मेरे पीछे बैठो।
  265. 15:08जुल्म है। सही जुल्म है। इस बेजुबान जानवर
  266. 15:12की पीठ पर दो-दो पहाड़ लाद दिए हैं।
  267. 15:16अगर यह बेजुबान बोल सकता तो इन दोनों
  268. 15:18बेहिस सवारों पर आसमान से बद्दुआ मांगता।
  269. 15:21क्या तुम्हारे दिलों में इस जानवर के लिए
  270. 15:23जरा भी खुदा का खौफ नहीं?
  271. 15:29[हंसी]
  272. 15:30अक्ल के उन अंधों को देखो। अल्लाह ने
  273. 15:32सवारी के लिए जानवर दिया है। और यह दोनों
  274. 15:35अहमक उसकी खिदमत करते हुए खुद धूप में
  275. 15:37पैदल खाक छान रहे हैं। जानवर से सवारी
  276. 15:40नहीं लेते तो उसे पालने का क्या फायदा?
  277. 15:45बाबा हमने हर वो सूरत इख्तियार की जो
  278. 15:48मुमकिन थी।
  279. 15:49हम्म।
  280. 15:50मगर उनकी जुबाने किसी एक बात पर भी राजी
  281. 15:52ना हुई। हमने अपने आप को बदला मगर उनके
  282. 15:55ताने नहीं बदले।
  283. 15:58ए मेरे प्यारे बेटे
  284. 16:01कान खोल कर सुन लो और यह सबक अपनी रूह की
  285. 16:04तख्ती पर लिख लो।
  286. 16:06तमाम इंसानों को राजी करना वह मंजिल है जो
  287. 16:10कभी हासिल नहीं हो सकती। चाहे तुम आसमान
  288. 16:12पर उड़ने लगो या जमीन की तह में उतर जाओ।
  289. 16:16लोगों की जुबाने तुम्हारे बारे में कभी
  290. 16:18खामोश नहीं होंगी। जो इंसान लोगों की
  291. 16:22खुशनूदी तलाश करने निकलता है, वह अपनी
  292. 16:25इज्जत और ईमान दोनों गवा बैठता है।
  293. 16:29तुम्हारा मकसद सिर्फ एक होना चाहिए अपने
  294. 16:32रब की रजा। अगर तुम्हारा रब तुमसे राजी है
  295. 16:35और तुम हक पर कायम हो तो पूरी कायनात भी
  296. 16:39मिलकर तुम्हें मलामत करे तो उसकी कोई
  297. 16:42परवाह ना करो। और अगर तुम्हारा रब तुमसे
  298. 16:45नाराज हो तो सारी दुनिया की तारीफें भी
  299. 16:48तुम्हें उसके अज़ाब से नहीं बचा सकती।
  300. 16:51और याद रखना मेरे बेटे चलते हुए जमीन पर
  301. 16:55अकड़ कर मत चलना।
  302. 16:57अपनी चाल में तवाजुन रखना और लोगों के
  303. 17:00तानों पर अपनी आवाज ऊंची ना करना क्योंकि
  304. 17:03सबसे बुरी आवाज गधे की चीख होती है।

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This page contains the full transcript of Hazrat Luqman Hakeem RA Episode 1 | Zindagi Badal Dene Wali Naseehat | Islamic Historical Drama by Saad, generated from the public captions YouTube serves with the video. The transcript has 2,180 words across 304 segments, with the original timestamps preserved so you can click any line to jump to that moment in the embedded player.

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