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Becoming Supernatural Audiobook (Hindi) | जब Mind Reality को बदलने लगता है — Transcript

by Kitaab Nest · 14,329 words · 2,020 segments · language hi · Watch on YouTube

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  1. 0:00अगर तुम्हें किताबें पसंद हैं, लेकिन
  2. 0:02अक्सर लगता है कि उनके आइडियाज सिर्फ
  3. 0:05जल्दी-जल्दी समरीज में खत्म हो जाते हैं।
  4. 0:07तो शायद तुम सही जगह पर हो। यह है किताब
  5. 0:11नेस्ट। यहां हम किताबों को सिर्फ समराइज
  6. 0:13नहीं करते। हम उनके आइडियाज को धीरे-धीरे
  7. 0:16एक्सप्लोर करते हैं। ताकि एक किताब सिर्फ
  8. 0:18पेजेस और कोट्स का कलेक्शन ना लगे। बल्कि
  9. 0:21एक ऐसी सोच बन जाए जो तुम्हारी नजर को
  10. 0:24थोड़ा सा बदल दे।
  11. 0:25कभी नोटिस किया है? सुबह जब नींद खुलती
  12. 0:28है, तो उस पहले ही पल में माइंड में सबसे
  13. 0:30पहला ख्याल क्या आता है?
  14. 0:31हम्म, आंख खुलती है, कमरे में हल्की सी
  15. 0:34रोशनी आ रही होती है। लेकिन हमारा मन उस
  16. 0:36कमरे में होता ही नहीं है।
  17. 0:37बिल्कुल नहीं होता। असल में हम या तो कल
  18. 0:39रात की किसी अधूरी बातचीत में उलझे होते
  19. 0:42हैं या फिर आने वाले दिन की लंबी सी टू
  20. 0:44लिस्ट के बझ में दबे होते हैं।
  21. 0:46और मजे की बात यह है कि हमें लगता है कि
  22. 0:48हमारी आंखें खुली हैं। तो हम आज में जी
  23. 0:50रहे हैं। हम प्रेजेंट मोमेंट में हैं।
  24. 0:51है ना? मैं भी यही सोच रही थी कि हम बस
  25. 0:54मान लेते हैं कि हम यहां हैं। लेकिन अगर
  26. 0:56हम रिसर्च की तरफ देखें तो एक बहुत ही
  27. 0:58हैरान करने वाली बात सामने आती है कि एक
  28. 1:00आम इंसान दिनभर में जो 60 70 हजार विचार
  29. 1:04सोचता है उसका 95% हिस्सा हूबहू वही बातें
  30. 1:08होती हैं जो उसने एक दिन पहले सोची थी।
  31. 1:1095% मतलब यह सिर्फ एक डाटा पॉइंट नहीं है।
  32. 1:13यह इंसानी अनुभव की एक बहुत गहरी ट्रेजडी
  33. 1:16है।
  34. 1:16कैसे? मतलब आप इसे ट्रेजडी क्यों कहेंगे?
  35. 1:19क्योंकि इसका सीधा सा अर्थ यह है कि
  36. 1:21टेक्निकली तो हमारी सांसे आज में चल रही
  37. 1:23हैं। शरीर इस पल में है। लेकिन मेंटली हम
  38. 1:25एक बहुत ही लंबी और ना खत्म होने वाली
  39. 1:27टाइम ट्रैवल पर निकले हुए हैं।
  40. 1:28मेंटल टाइम ट्रैवल
  41. 1:30हां हमारा माइंड या तो 3 साल पहले घटी
  42. 1:32किसी बात को आज भी प्रोसेस कर रहा है या
  43. 1:34फिर 3 साल बाद क्या होगा उसकी काल्पनिक
  44. 1:36दुनिया बन रहा है। प्रेजेंट का जो पल है
  45. 1:38जो अभी है वो बस एक स्टेशन की तरह रह गया
  46. 1:40है।
  47. 1:41जहां से हम बस अतीत या भविष्य की ट्रेन
  48. 1:43पकड़ लेते हैं। रुकते कभी नहीं है।
  49. 1:45बिल्कुल रुकते कभी नहीं है। और जब तक हम
  50. 1:47इस टाइम ट्रैवल के लूप को नहीं समझेंगे यह
  51. 1:49नहीं देखेंगे कि हम अनजाने में पास्ट की
  52. 1:52यादों और फ्यूचर के एंग्जायटी में कैसे
  53. 1:54फंसे हैं। तब तक एक असली इनर साइलेंस या
  54. 1:57मेंटल आजादी महसूस कर पाना लगभग नामुमकिन
  55. 1:59है।
  56. 2:00लेकिन यहां मेरे माइंड में एक सवाल आ रहा
  57. 2:02है। अगर हमारा दिमाग हर वक्त पुरानी यादों
  58. 2:05के बेसिस पर फ्यूचर का अंदाजा लगा रहा है।
  59. 2:08तो क्या यह कोई डिज़ाइन फ्लॉ है? मतलब बचपन
  60. 2:11से तो हमें यही सिखाया जाता है कि अपने
  61. 2:13पास्ट से सीखो और आगे की प्लानिंग करो।
  62. 2:16सही बात है।
  63. 2:17तो फिर दिमाग का यह जो प्रेडिक्शन सिस्टम
  64. 2:19है, यह हमारे ही खिलाफ कैसे काम करने लगता
  65. 2:22है?
  66. 2:22असल में दिमाग का यह सिस्टम कोई खराबी
  67. 2:24नहीं है। यह हमारे इवोल्यूशन का एक बहुत
  68. 2:27बड़ा सर्वाइवल मैकेनिज्म है। लाखों साल
  69. 2:29पहले जब इंसान जंगलों में रहता था, तो
  70. 2:31झाड़ी की हर सरसराहट का मतलब एक शिकारी
  71. 2:34जानवर हो सकता था।
  72. 2:35तो, वहां दिमाग का काम बस हमें जिंदा रखना
  73. 2:37था। एक्जेक्टली। इसलिए माइंड हर पल आसपास
  74. 2:40से डाटा लेता है और पुरानी यादों से मैच
  75. 2:42करता है। जो जाना पहचाना है वो सेफ है और
  76. 2:45जो नया है वो खतरे जैसा महसूस होता है।
  77. 2:47हम्म तो समस्या तब शुरू होती है जब हम आज
  78. 2:50के इस मॉडर्न वर्ल्ड में भी उसी पुराने
  79. 2:53सर्वाइवल मोड में जी रहे होते हैं।
  80. 2:55हां क्योंकि आज झाड़ियों में कोई शेर नहीं
  81. 2:57छिपा है। लेकिन हमारा माइंड एक ईमेल को,
  82. 2:59किसी के इग्नोर किए हुए मैसेज को या बैंक
  83. 3:02बैलेंस को देखकर बिल्कुल वैसा ही रियेक्ट
  84. 3:05करता है जैसे किसी जंगली जानवर को देखकर
  85. 3:07करता था।
  86. 3:08मतलब दिमाग फर्क ही नहीं कर पाता कि असली
  87. 3:10खतरा कौन सा है और सिर्फ एक विचार से पैदा
  88. 3:13हुआ खतरा कौन सा है।
  89. 3:14बिल्कुल नहीं कर पाता। यह तो शरीर और
  90. 3:17दिमाग के कनेक्शन की बहुत अजीब सी स्थिति
  91. 3:19है। मुझे न्यूरो साइंस का वो कांसेप्ट याद
  92. 3:22आ रहा है कि जो न्यूरॉन्स एक साथ फायर
  93. 3:25करते हैं वो एक साथ वायर हो जाते हैं।
  94. 3:27हम्म न्यूरल पाथवेज।
  95. 3:29हां। तो अगर हम आपके उस सर्वाइवल वाले
  96. 3:32पॉइंट को इस न्यूरल पाथवे से जोड़ें तो
  97. 3:35क्या इसका मतलब यह है कि हम लगातार डरने
  98. 3:37या चिंता करने की प्रैक्टिस कर रहे हैं और
  99. 3:39उसमें एक्सपर्ट होते जा रहे हैं।
  100. 3:41बहुत सही तरह से पकड़ा आपने इसे। इसे ऐसे
  101. 3:43इमेजिन करें जैसे किसी मैदान में कच्ची
  102. 3:45जमीन पर घास उगी हो। पहली बार चलेंगे तो
  103. 3:48घास थोड़ी दबेगी रास्ता नहीं बनेगा।
  104. 3:50लेकिन अगर उसी रास्ते पर हम दिन में 100
  105. 3:53बार चलेंगे, हजारों बार चलेंगे तो एक
  106. 3:56पक्की पगडंडी बन जाएगी।
  107. 3:58और फिर आपके कदम बिना सोचे अपने आप उसी
  108. 4:00पगडंडी पर मुड़ जाएंगे। हमारे माइंड के
  109. 4:02न्यूरॉन्स के साथ भी हूबहू यही होता है।
  110. 4:05जब कोई चिंता का विचार बार-बार आता है तो
  111. 4:07माइंड में एक पक्का रास्ता एक न्यूरल
  112. 4:09हाईवे बन जाता है।
  113. 4:10और फिर वही भावना हमारी डिफॉल्ट आदत बन
  114. 4:13जाती है। हम अनजाने में ही उदास रहने के
  115. 4:16आदि हो जाते हैं और हमें लगता है कि यह
  116. 4:18हमारी पर्सनालिटी है।
  117. 4:19लोग कहते हैं ना कि मैं तो इंसान ही ऐसा
  118. 4:21हूं। मुझे जल्दी टेंशन हो जाती है जबकि वह
  119. 4:24उनकी पहचान नहीं है। वह बस एक बहुत गहरा
  120. 4:26न्यूरल पाथवे है।
  121. 4:27और इसका हमारे शरीर पर हमारे हॉर्मोंस पर
  122. 4:30जो असर होता है वो और भी गहरा है। मैं सोच
  123. 4:33रही थी कि अगर कोई इंसान पास्ट की किसी
  124. 4:36बहुत बुरी घटना को याद कर रहा है। किसी से
  125. 4:39हुई कोई बहस या कोई नुकसान तो शरीर तुरंत
  126. 4:42कॉर्टिसोल रिलीज करने लगता है।
  127. 4:44स्ट्रेस हॉर्मोन।
  128. 4:45हां। और सबसे अजीब बात यह है कि शरीर को
  129. 4:48पता ही नहीं होता कि यह घटना बाहर हो रही
  130. 4:51है या सिर्फ माइंड में।
  131. 4:52यही वो पॉइंट है जहां यह लूप सबसे ज्यादा
  132. 4:54महसूस होता है। शरीर बहुत वफादार है। वो
  133. 4:57बस केमिकल सिग्नल्स को समझता है। अगर
  134. 4:59माइंड किसी पुरानी दर्दनाक याद को एक
  135. 5:02फिल्म की तरह प्ले कर रहा है तो शरीर
  136. 5:05बिल्कुल वैसा ही रिएक्ट करेगा जैसे वो
  137. 5:07घटना अभी इसी पल घट रही हो।
  138. 5:10दिल की धड़कन तेज हो जाएगी। सांसे छोटी हो
  139. 5:13जाएंगी। शरीर लगातार उस अतीत के ट्रॉमा
  140. 5:16में जी रहा होता है।
  141. 5:18एक फिजिकल लूप बन जाता है। इसके बिल्कुल
  142. 5:20ऑोजिट जब हम पूरी तरह से प्रेजेंट मोमेंट
  143. 5:23में होते हैं। किसी काम में इतने डूबे
  144. 5:25होते हैं कि समय का पता ही ना चले। तब
  145. 5:27माइंड डोपामाइन रिलीज करता है
  146. 5:29जो हमें अलाइव महसूस कराता है। बॉडी को
  147. 5:32रिपेयर करता है।
  148. 5:33लेकिन हम प्रेजेंट में इतना कम रहते हैं
  149. 5:35कि शरीर को यह रिपेयर मोड बहुत कम मिल
  150. 5:37पाता है।
  151. 5:38मुझे लगता है कि इस मोमेंट में ना रह पाने
  152. 5:40की एक बहुत बड़ी वजह हमारा डिफॉल्ट मोड
  153. 5:43नेटवर्क भी है। डीएमएन मैंने कहीं पढ़ा था
  154. 5:46कि जब हम खाली बैठे होते हैं तो माइंड
  155. 5:48एकदम से भटकने लगता है।
  156. 5:50हम डिफॉल्ट मोड नेटवर्क इसे एक बहुत ही आम
  157. 5:54अनुभव से समझते हैं। कई बार हम ऑफिस से घर
  158. 5:56ड्राइव कर रहे होते हैं और अचानक घर आ
  159. 5:58जाता है।
  160. 5:59हां, याद ही नहीं रहता कि कब गैर बदला,
  161. 6:01कौन सा कट लिया।
  162. 6:03यह माइंड का ऑटो पायलट है। जब दिमाग को
  163. 6:05कोई बहुत ध्यान देने वाला काम नहीं करना
  164. 6:08होता है, तो यह नेटवर्क एक्टिव हो जाता है
  165. 6:10और इसका काम ही है ख्यालों में भटकना। एक
  166. 6:13रिसर्च का बहुत ही क्लियर कंक्लूजन था कि
  167. 6:15इंसान अपनी जागती हुई जिंदगी का लगभग आधा
  168. 6:18हिस्सा ख्यालों में भटकते हुए बिताता है।
  169. 6:21और शायद इसीलिए कहा जाता है कि एक भटकता
  170. 6:23हुआ मन एक दुखी मन होता है।
  171. 6:25बिल्कुल।
  172. 6:26लेकिन ऐसा क्यों है कि भटकता हुआ मन अक्सर
  173. 6:28बुरी बातों की तरफ ही जाता है। हम खाली
  174. 6:31बैठकर कुछ बहुत अच्छा क्यों नहीं सोचते?
  175. 6:33क्योंकि यहां फिर से वही इवोल्यूशन का रूल
  176. 6:36काम करता है। नेगेटिविटी बायस। दिमाग का
  177. 6:38झुकाव हमेशा उन चीजों की तरफ होता है जो
  178. 6:41गलत हो सकती हैं ताकि वह आपको सेफ रख सके।
  179. 6:44वो पुराने बुरे अनुभवों को कुरेदेगा ताकि
  180. 6:46वैसी गलती दोबारा ना हो। इसे बिना किसी
  181. 6:49बाहरी कारण के हम बस बैठे-बैठे स्ट्रेस
  182. 6:52क्रिएट कर लेते हैं।
  183. 6:53हां, और यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में
  184. 6:55बहुत साफ दिखता है। मान लीजिए कोई इंसान
  185. 6:58रात के 11:00 बजे अपने आरामदायक बिस्तर पर
  186. 7:00लेटा है। कमरे में शांति है।
  187. 7:02लेकिन उसका माइंड सुबह आई किसी ईमेल को
  188. 7:04लूप में दोहरा रहा है।
  189. 7:06वो शब्दों को डिकोड कर रहा है। टोन का
  190. 7:08अंदाजा लगा रहा है। उस ईमेल का सच में अब
  191. 7:10कोई वजूद नहीं है। पर उसकी नींद उड़ चुकी
  192. 7:13है। इस वक्त उसका नर्वस सिस्टम तो रेस्ट
  193. 7:15की स्टेट में बिल्कुल नहीं होगा। घटना को
  194. 7:18बीते हुए 12 घंटे हो चुके हैं। ऑफिस मीलों
  195. 7:21दूर है। लेकिन शरीर अभी भी फाइट या फ्लाइट
  196. 7:24मोड में है।
  197. 7:25बिस्तर पर लेते हुए भी वह एक अदृश्य युद्ध
  198. 7:27लड़ रहा है। यही है प्रेजेंट से पूरी तरह
  199. 7:29कट जाना।
  200. 7:30और यह शोर सिर्फ काम तक नहीं रहता। यह
  201. 7:32रिश्तों में भी आ जाता है। मान लीजिए कोई
  202. 7:35अपने पास्ट रिलेशनशिप में बहुत हर्ट हुआ
  203. 7:37है। अब आज वह एक नए और अच्छे इंसान के साथ
  204. 7:40है। सब ठीक है। लेकिन अचानक पार्टनर का
  205. 7:43रिप्लाई 2 घंटे लेट आता है।
  206. 7:44और माइंड खतरे की घंटी बजाने लगता है।
  207. 7:47हां, उसे लगता है कि फिर से वही सब हो रहा
  208. 7:50है। वो इस प्रेजेंट मोमेंट में रिएक्ट
  209. 7:52नहीं कर रही है। वो अपने पास्ट के चश्मे
  210. 7:55से आज को देख रही है। एमिक दला जो हमारा
  211. 7:58इमोशन सेंटर है वह एक फॉल्स फायर अलार्म
  212. 8:01की तरह काम करता है। उसमें पुराने दर्द की
  213. 8:04यादें इतनी स्ट्रांग होती हैं कि जरा सा
  214. 8:07ट्रिगर मिलते ही वो लॉजिक वाले हिस्से को
  215. 8:09शटडाउन कर देता है।
  216. 8:10मतलब वो इंसान अपने नए पार्टनर से बात ही
  217. 8:13नहीं कर रहा है। वो अतीत के किसी भूत से
  218. 8:15लड़ रहा है।
  219. 8:16यह बहुत ही गहरी बात है। हमारा माइंड ही
  220. 8:18हमारे लिए एक जेल बना देता है।
  221. 8:20और यही डर का लूप हमें लकवा मार जाने जैसी
  222. 8:23स्थिति में डाल देता है। जहां हम कुछ नया
  223. 8:25शुरू ही नहीं कर पाते। और एक बहुत बड़ा
  224. 8:27ट्रैप यह भी है कि हम अपनी आइडेंटिटी को
  225. 8:30ही अपना पास्ट बना लेते हैं। अगर कोई
  226. 8:32इंसान सालों से एक ही रूटीन में है वैसी
  227. 8:35ही शिकायतें कर रहा है तो उसकी पूरी
  228. 8:37पर्सनालिटी उसकी हिस्ट्री बन जाती है।
  229. 8:39इंसान एक चलती फिरती रिकॉर्डिंग बन जाता
  230. 8:41है।
  231. 8:42और जब किसी की पहचान उसका अतीत बन जाए तो
  232. 8:45उसके फ्यूचर में कुछ भी नया होने की
  233. 8:47पॉसिबिलिटी खत्म हो जाती है। क्योंकि कोई
  234. 8:49भी नया मौका आएगा तो वह उसे पुराने सांचे
  235. 8:52में ही फिट करने की कोशिश करेगा। यह सब
  236. 8:54सुनकर एक अजीब सी बेचैनी होती है कि हम
  237. 8:57कितने ऑटोमेटिक तरीके से जी रहे हैं और
  238. 8:59अगर हम अपने आसपास देखें खासकर अपनी
  239. 9:02फैमिलीज में या सोशल गैदरिंग्स में तो सब
  240. 9:04एक साथ बैठे होते हैं चाय पी रहे होते
  241. 9:06हैं। लेकिन क्या कोई सच में वहां मौजूद
  242. 9:09होता है?
  243. 9:09हम्म शायद ही कोई।
  244. 9:11ज्यादातर बातचीत या तो पास्ट की होती है
  245. 9:13कि 10 साल पहले क्या हुआ था या फ्यूचर की
  246. 9:16कि आगे क्या होगा। शरीर एक कमरे में है पर
  247. 9:19माइंड अलग-अलग टाइम जोन में है।
  248. 9:21हमारी कंडीशनिंग ही ऐसी हुई है। बचपन से
  249. 9:23सिखाया जाता है कि आज इच्छाओं को मार लो
  250. 9:26ताकि कल अच्छा हो सके। आज को हमेशा कल के
  251. 9:29लिए कुर्बान करने की ट्रेनिंग दी जाती है।
  252. 9:31यह एक ऐसी ट्रेडमिल है जो कभी रुकती नहीं
  253. 9:34है। क्योंकि जब वो कल आता है तो हम किसी
  254. 9:37नए कल की चिंता करने लगते हैं।
  255. 9:39प्रेजेंट तो बस एक सीढ़ी बन गया है फ्यूचर
  256. 9:41तक पहुंचने की। अपने आप में कोई मंजिल
  257. 9:43नहीं। और यह बात कोई नई नहीं है। अगर हम
  258. 9:46एंशिएंट विज़डम को देखें तो हजारों साल
  259. 9:49पहले भी यही बातें कही गई थी। चाहे वह
  260. 9:52भगवत गीता का योगस्थ गुरुकर्मानी हो कि
  261. 9:55पहले माइंड को स्थिर करो फिर काम करो।
  262. 9:58या बुद्ध का अनच्छा का कांसेप्ट कि सब कुछ
  263. 10:00बदल रहा है। बस यह पल ही सच है।
  264. 10:03हां। तो अब सवाल यह है कि अगर यह लूप इतना
  265. 10:06गहरा है तो इस मेंटल टाइम ट्रैवल को रोका
  266. 10:10कैसे जाए? हम इस ऑटो पायलट से बाहर कैसे
  267. 10:12आए? इसके लिए सबसे पहला और बहुत ही सिंपल
  268. 10:15तरीका है अपनी सांस को एक एंकर की तरह यूज
  269. 10:18करना।
  270. 10:19सांस ही क्यों? मतलब सांस पर ध्यान देना
  271. 10:22इतना असरदार क्यों होता है?
  272. 10:24क्योंकि हमारी सांस कभी पास्ट या फ्यूचर
  273. 10:26में नहीं जा सकती। आप कल की सांस आज नहीं
  274. 10:29ले सकते।
  275. 10:30हम सांस सिर्फ प्रेजेंट में होती है।
  276. 10:33बिल्कुल। जब हम सचेत होकर सांस लेते हैं
  277. 10:36जैसे 4 सेकंड अंदर, 4 सेकंड होल्ड और 4
  278. 10:39सेकंड बाहर तो यह सिर्फ ध्यान भटकाना नहीं
  279. 10:41है। यह नर्वस सिस्टम को सीधा मैसेज भेजता
  280. 10:44है कि आसपास कोई खतरा नहीं है।
  281. 10:46शरीर फाइट या फ्लाइट मोड से निकल कर रेस्ट
  282. 10:49मोड में आ जाता है।
  283. 10:50हां, यह शरीर को एहसास दिलाता है कि अभी
  284. 10:53सब सुरक्षित है।
  285. 10:54एक और तरीका है अपनी सेंसेस पर ध्यान
  286. 10:56देना। जैसे यह देखना कि हम क्या छू रहे
  287. 11:00हैं। आसपास क्या आवाजें हैं।
  288. 11:02क्योंकि विचार टाइम ट्रैवल कर सकते हैं।
  289. 11:04लेकिन हमारी सेंसेस हमेशा आज में ही कैद
  290. 11:07होती हैं।
  291. 11:08और इसके बाद एक और स्टेप आता है अपने
  292. 11:10विचारों का ऑब्जर्वर बनना। मतलब अपने ही
  293. 11:13थॉट्स को दूर से देखना।
  294. 11:15जैसे आसमान में गुजरते हुए बादल।
  295. 11:17हां, बादल काले भी हो सकते हैं, सफेद भी।
  296. 11:20पर आसमान कभी उनसे जुड़ता नहीं है। जब हम
  297. 11:23डरावने विचारों में उलझने के बजाय उन्हें
  298. 11:26बस देखते हैं तो एक आजादी सी महसूस होती
  299. 11:29है।
  300. 11:29यह एहसास होता है कि विचार अलग हैं और
  301. 11:32उन्हें देखने वाली अवेयरनेस बिल्कुल अलग
  302. 11:35है। हम विचार नहीं है।
  303. 11:37इसी से जुड़ा है इमोशनल बॉडी स्कैन। अक्सर
  304. 11:40हम भावनाओं को लॉजिक से सुलझाने की कोशिश
  305. 11:42करते हैं। लेकिन कहते हैं ना कि फील इट टू
  306. 11:46हील इट। हम भावनाओं से इतना भागते क्यों
  307. 11:49हैं? क्योंकि वह शरीर में बहुत
  308. 11:51अनकंफर्टेबल होती हैं।
  309. 11:53सीने में भारीपन या पेट में हलचल हम उस
  310. 11:56बेचैनी से बचने के लिए वापस ख्यालों में
  311. 11:58भाग जाते हैं।
  312. 11:59लेकिन जब तक हम उस भावना को शरीर में
  313. 12:02महसूस नहीं करेंगे वो रिलीज नहीं होगी।
  314. 12:04वो लूट में ही घूमती रहेगी।
  315. 12:06पर यहां एक डाउट आ सकता है कि अगर हम
  316. 12:09सिर्फ प्रेजेंट में रहें तो क्या हम
  317. 12:10फ्यूचर की प्लानिंग छोड़ दें? क्या
  318. 12:13प्रेजेंट में जीने का मतलब केयरलेस होना
  319. 12:15है? यह बहुत बड़ा मिथक है। प्रेजेंट में
  320. 12:18रहने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि
  321. 12:19प्लानिंग ना की जाए।
  322. 12:20तो दोनों में फर्क क्या है? प्लानिंग करना
  323. 12:23प्रेजेंट का एक कॉन्शियस काम है।
  324. 12:25आप बैठकर तय करते हैं कि अगले हफ्ते क्या
  325. 12:27करना है।
  326. 12:28आपका पूरा ध्यान उस प्रोसेस पर है।
  327. 12:30लेकिन चिंता करना पास्ट के डर से चलने
  328. 12:33वाला एक ऑटोमेटिक लूप है। प्लानिंग रास्ता
  329. 12:36साफ करती है। चिंता सिर्फ घुटन पैदा करती
  330. 12:38है।
  331. 12:39हम यह फर्क बहुत गहरा है। मतलब नए विचार,
  332. 12:43नई भावनाएं और नया एक्शन तभी मुमकिन है जब
  333. 12:47हम प्रेजेंट में हो। क्योंकि पास्ट में तो
  334. 12:49पुराने विचार थे और फ्यूचर अभी आया नहीं
  335. 12:51है। बदलाव की गुंजाइश सिर्फ इसी पल में
  336. 12:54है।
  337. 12:54जब ध्यान प्रेजेंट में आता है तो जिंदगी
  338. 12:57ऑटो पायलट से हट जाती है। इस पूरे
  339. 13:00एक्सपीरियंस को मैं एक छत के पंखे की तरह
  340. 13:02देखती हूं।
  341. 13:03हम कैसे?
  342. 13:04हमारा माइंड उस तेज चलते पंखे की तरह है।
  343. 13:06जब वो फुल स्पीड पर होता है तो सब धुंधला
  344. 13:09लगता है। कोई क्लेरिटी नहीं होती। बस
  345. 13:11भागते हुए विचार होते हैं।
  346. 13:12बिल्कुल। लेकिन जब हम अवेयरनेस को इस पल
  347. 13:15में लाते हैं तो लगता है जैसे किसी ने
  348. 13:18पंखे की स्पीड कम कर दी हो। विचार धीमे
  349. 13:20होने लगते हैं। धुंधलापन छटने लगता है और
  350. 13:24पंखुड़ियों के बीच की खाली जगह दिखने लगती
  351. 13:26है।
  352. 13:27हां वो खाली जगह वो शांति माइंड का वो
  353. 13:30लगातार चलने वाला बैकग्राउंड नॉइज़ जो
  354. 13:32पास्ट और फ्यूचर में भाग रहा था वो अचानक
  355. 13:35धीमा पड़ जाता है।
  356. 13:36हम
  357. 13:37और जो वो शोर रुकता है तो ऐसा नहीं लगता
  358. 13:39कि हमने उस शांति को कहीं बाहर से लाया
  359. 13:41है। वो हमेशा से वही थी। बस उस शोर में
  360. 13:44छिप गई थी। बॉडी तो हमेशा यहीं है। इसी पल
  361. 13:47में है।
  362. 13:48पर माइंड हमेशा कहीं और ट्रैवल कर रहा है।
  363. 13:51कभी सोचिएगा इस बारे में कि अगर मन का वो
  364. 13:54बैकग्राउंड शोर बस एक पल के लिए बिल्कुल
  365. 13:58शांत हो जाए तो क्या वो खामोशी बाहर से
  366. 14:01आएगी या वो हमेशा से हमारे अंदर ही थी। बस
  367. 14:04सुनाई नहीं दी।
  368. 14:06शायद वो हमेशा से थी। अगली बार जब मन यूं
  369. 14:08ही भटकने लगे किसी पुरानी याद में या कल
  370. 14:12की फिक्र में तो क्या एक गहरी सांस लेकर
  371. 14:14सिर्फ इस पल को देखा जा सकता है? उस आजादी
  372. 14:17को महसूस किया जा सकता है जो सिर्फ अभी
  373. 14:20में है। कभी-कभी यह बात बहुत गहराई से
  374. 14:22महसूस होती है। सुबह उठना वही पुराना
  375. 14:24अलार्म बजना, ऑफिस जाने का वही रास्ता और
  376. 14:28माइंड में लगातार चलने वाले वही पुराने
  377. 14:30विचार। हम जैसे जैसे कोई बैकग्राउंड नॉइज़
  378. 14:35हो या छत पर लगातार घूमते हुए पंखे की
  379. 14:37आवाज जिसे हम अक्सर नोटिस भी नहीं करते।
  380. 14:39बिल्कुल ऐसा लगता है जैसे शरीर तो इस पल
  381. 14:42में यहां मौजूद है लेकिन माइंड माइंड किसी
  382. 14:45और ही टाइम ज़ोन में चल रहा है।
  383. 14:46या तो वो कल की किसी बात का रिप्ले कर रहा
  384. 14:48है या फिर आने वाले कल की किसी चिंता में
  385. 14:50उलझा हुआ है।
  386. 14:51हां। और आज के इस डीप ड्राइव में जहां हम
  387. 14:54क्वांटम पॉसिबिलिटी और जो डिस्पेंजा के
  388. 14:57विचारों की गहराई में जा रहे हैं, इसका
  389. 14:59इमोशनल कोर यही है। ऐसा लगता है कि
  390. 15:02ज्यादातर लोग मतलब हम लोग एक्चुअली
  391. 15:04प्रेजेंट मोमेंट में जीते ही नहीं है।
  392. 15:06ये बहुत ही बहुत ही गहरी बात है। हमारा
  393. 15:09माइंड जो है ना वो लगातार मेंटल टाइम
  394. 15:11ट्रैवल करता रहता है। और इसी वजह से लाइफ
  395. 15:14ऑलमोस्ट एक ऑटोमेटिक मोड में चलती रहती
  396. 15:16है।
  397. 15:16हम जिसे हम रियलिटी कहते हैं। क्या वो सच
  398. 15:20में पहले से तय है या फिर हमारा जो ध्यान
  399. 15:23है, हमारी जो अवेयरनेस है, वह तय करती है
  400. 15:26कि हमें क्या दिखेगा।
  401. 15:28एक्चुअली जब हम इस शोर को इस मेंटल नॉइज़
  402. 15:31को थोड़ा शांत करते हैं तब समझ आता है कि
  403. 15:33हम दुनिया को वैसे नहीं देखते जैसी वो है।
  404. 15:36हम उसे वैसे देखते हैं जैसे हम खुद अंदर
  405. 15:39से हैं।
  406. 15:40मतलब हमारी मान्यताएं एक बहुत ही कड़े
  407. 15:43फिल्टर की तरह काम करती हैं।
  408. 15:45अगर हम क्वांटम फिजिक्स के डबल स्लिट
  409. 15:47एक्सपेरिमेंट की बात करें जो इस पूरे
  410. 15:49कांसेप्ट का एक बड़ा हिस्सा है तो वो बहुत
  411. 15:52कुछ ऐसा ही कहता है।
  412. 15:53हां वो एक्सपेरिमेंट जो है वो हमारे सोचने
  413. 15:55के तरीके को पूरी तरह से पलट देता है।
  414. 15:57बिल्कुल उसमें होता ये है कि जब तक
  415. 15:59पार्टिकल्स को यानी उन सूक्ष्म कणों को
  416. 16:02कोई ऑब्जर्व नहीं कर रहा होता तब तक वो एक
  417. 16:05साथ कई पॉसिबिलिटीज में एक तरंग की तरह
  418. 16:08मौजूद रहते हैं।
  419. 16:09पर जैसे ही
  420. 16:11जैसे ही अवेयरनेस आती है।
  421. 16:12हां जैसे ही कोई उन्हें ऑब्जर्व करता है
  422. 16:14उनका रूप एकदम से तय हो जाता है। वो एक
  423. 16:18ठोस पार्टिकल बन जाते हैं। और अगर इसे हम
  424. 16:21इंसानी जीवन पर लागू करें तो यह क्वांटम
  425. 16:24फील्ड और हमारा माइंड दोनों एक ही तरह से
  426. 16:27काम कर रहे हैं। जब हम दुनिया को एक सीमित
  427. 16:31अवसरों वाली जगह मानते हैं तो हम सिर्फ
  428. 16:34सीमाएं ही देख पाते हैं।
  429. 16:36क्योंकि हमारा माइंड उसी पास्ट के लूप में
  430. 16:39फंसा है।
  431. 16:39एक्सक्ट्ली।
  432. 16:40हम प्रेजेंट मोमेंट को ऑब्जर्व ही नहीं कर
  433. 16:41रहे हैं।
  434. 16:42एक्सैक्टली। न्यूरोबायोलॉजी में इसे
  435. 16:44रेटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम या आरएएस
  436. 16:47कहते हैं। हमारा दिमाग हर सेकंड लगभग 11
  437. 16:50मिलियन बिट्स डाटा प्रोसेस करता है।
  438. 16:5311 मिलियन
  439. 16:54यह तो
  440. 16:55बहुत बड़ा नंबर है।
  441. 16:56कमरे का तापमान, बाहर ट्रैफिक की आवाज,
  442. 16:58सांस लेने की रिदमम सब कुछ। लेकिन हम सचेत
  443. 17:02रूप से सिर्फ 40 या 50 बिट्स डाटा के
  444. 17:04प्रति ही जागरूक हो पाते हैं।
  445. 17:06तो बाकी का सारा डाटा माइंड हमारी जानकारी
  446. 17:08के बिना ही डिलीट कर देता है।
  447. 17:10हां। और यह तय कौन करता है कि क्या अंदर
  448. 17:13आएगा वो आर एस नाम का फिल्टर। और उस
  449. 17:16फिल्टर को प्रोग्राम करती हैं हमारी
  450. 17:18पुरानी यादें, हमारे डर, हमारी उम्मीदें।
  451. 17:21मतलब अगर अंदर से प्रोग्रामिंग है कि सब
  452. 17:24कुछ मुश्किल है तो माइंड नए अवसरों को
  453. 17:27बाहर ही रोक देगा।
  454. 17:28बिल्कुल। वो प्रेजेंट मोमेंट की शांति वो
  455. 17:31नई पॉसिबिलिटी कभी रजिस्टर ही नहीं होगी।
  456. 17:33अगर हम इसे अपने भारतीय समाज के एक आम
  457. 17:36मिडिल क्लास लूप के नजरिए से देखें तो ये
  458. 17:39बहुत साफ दिखता है। एक बहुत ही आम सोच है।
  459. 17:42हमारे जैसे लोग ज्यादा आगे नहीं जा सकते।
  460. 17:44हम यह एक बहुत ही स्ट्रांग इमोशनल रूप है।
  461. 17:47हां और जब इस सोच के साथ कोई कुछ नया करने
  462. 17:50की कोशिश करता है और फेल हो जाता है तो वो
  463. 17:53किस्मत को दोष देने लगता है। भविष्य से
  464. 17:56उम्मीद कम हो जाती है और फिर वही पुराने
  465. 17:58नतीजे मिलते हैं।
  466. 17:59और फिर माइंड कहता है दिखा मैं तो पहले ही
  467. 18:01कह रहा था। माइंड उसी पास्ट को रिपीट करता
  468. 18:04रहता है और भविष्य की ए्जायटी भी इन्हीं
  469. 18:06पास्ट मेमोरीज पर बेस्ड होती है।
  470. 18:08इस बिलीफ लूप की सांस्कृतिक जड़े भी बहुत
  471. 18:10गहरी हैं।
  472. 18:11बहुत गहरी है। पारिवारिक कहानियों से लेकर
  473. 18:13समाज में जो तुलना होती है वो शर्मा जी का
  474. 18:15बेटा वाला जो कांसेप्ट है वो माइंड में यह
  475. 18:17फीड कर देता है कि रिस्क लेना गलत है।
  476. 18:20हमारा एजुकेशन सिस्टम भी तो यही करता है।
  477. 18:22रटने पर इनाम मिलता है और गलती करने पर
  478. 18:26सजा। इसी वजह से इंसान प्रेजेंट में नई
  479. 18:28पॉसिबिलिटीज खोजना बंद कर देता है। अगर हम
  480. 18:30वेदांत की बात करें जो माया का कांसेप्ट
  481. 18:33है वह यही तो है। जो रियलिटी हम देख रहे
  482. 18:36हैं वो सिर्फ हमारा इल्यूजन है। हमारा
  483. 18:39फिल्टर है।
  484. 18:39और योग में जिसे चित्तवृत्ति निरोध कहा
  485. 18:42गया है।
  486. 18:43हां माइंड के भटकाव को रोकना। जो
  487. 18:45बैकग्राउंड नॉइज़ है उसे धीमा करना।
  488. 18:48क्योंकि साइलेंस शांति हमेशा वहां होती
  489. 18:51है। बस हमें वो सुनाई नहीं देती। यह जो
  490. 18:53थ्योरी है यह असल जिंदगी में कैसे काम
  491. 18:56करती है? अगर हम उन केस स्टडीज की बात
  492. 18:58करें जैसे रमेश की कहानी है। लखनऊ के रमेश
  493. 19:01जिनके पास एक बहुत ही सुरक्षित लेकिन उबाऊ
  494. 19:04सरकारी नौकरी थी।
  495. 19:05उनकी मान्यता थी कि नौकरी छोड़कर रिस्क
  496. 19:08लेना बेवकूफी है। यह उनका पास लूप था।
  497. 19:11पर जब अवेयरनेस अचानक से प्रेजेंट मोमेंट
  498. 19:14में आई, जब उन्होंने एक स्टार्टअप फाउंडर
  499. 19:16का वीडियो देखा, तो वो लूप टूट गया।
  500. 19:19उन्होंने नौकरी नहीं छोड़ी। बस उनका
  501. 19:21ध्यान, उनका अटेंशन शिफ्ट हो गया।
  502. 19:23उन्होंने रोज 2 घंटे एक नई स्किल सीखी और
  503. 19:278 महीने में ही उनकी फ्रीलांस इनकम उनकी
  504. 19:30सैलरी से ज्यादा हो गई।
  505. 19:31दुनिया नहीं बदली बस उनका फिल्टर बदल गया।
  506. 19:34और प्रिया का केस देखिए जो रिलेशनशिप से
  507. 19:37जुड़ा है। तीन असफल रिश्तों के बाद उसके
  508. 19:40माइंड ने यह मान लिया था कि रिश्ते हमेशा
  509. 19:43दर्द देते हैं।
  510. 19:44सेम मेमोरीज, सेम इमोशंस क्रिएट कर रहे
  511. 19:46थे।
  512. 19:47बिल्कुल। वो हर नए इंसान को उसी फिल्टर से
  513. 19:50देख रही थी। वो प्रेजेंट में थी ही नहीं।
  514. 19:52वो अपने पास्ट के दर्द को जी रही थी।
  515. 19:54पर जब उसने खुद को ऑब्जर्व करना शुरू
  516. 19:57किया, जब उसे समझ आया कि उसकी अपनी
  517. 19:59इनसिक्योरिटीज ही रिश्तों को खराब कर रही
  518. 20:02हैं, तब वो फिल्टर टूट गया।
  519. 20:04जैसे ही अवेयरनेस प्रेजेंट मोमेंट में आई,
  520. 20:06उसका बिहेवियर बदल गया। और विक्रम की
  521. 20:08कहानी भी तो ऐसी ही है। दो स्टार्टअप्स
  522. 20:10फेल होने के बाद उन्हें लगा कि इंडियन
  523. 20:13मार्केट में इनोवेशन की कोई कद्र नहीं है।
  524. 20:15यह उनका कंफर्मेशन बायस था। माइंड सिर्फ
  525. 20:18वही देख रहा था जो उसके फेल होने को सही
  526. 20:20ठहरा सके।
  527. 20:21पर उनके मेंटर का वो सवाल जो सफल हो रहे
  528. 20:24हैं वो क्या देख रहे हैं? उस एक सवाल ने
  529. 20:27उनका पूरा नजरिया बदल दिया।
  530. 20:29उनका मेंटल टाइम ट्रैवल रुका। उन्होंने
  531. 20:31पास्ट को छोड़कर प्रेजेंट को देखा और अपनी
  532. 20:34तीसरी कोशिश में वह सफल रहे। सुनीता की
  533. 20:36कहानी भी बहुत पावरफुल है। जयपुर की आर्ट
  534. 20:39टीचर जो मानती थी कि कला सिर्फ एक शौक है।
  535. 20:42इससे पैसे नहीं बनते।
  536. 20:44ये उनका बिलीफ था जो उन्हें ऑटोमेटिक मोड
  537. 20:46में चला रहा था।
  538. 20:47पर Instagram पर एक दूसरी लोकल आर्टिस्ट
  539. 20:49को सफल होते देखकर उनका फिल्टर टूट गया।
  540. 20:52उन्होंने अपनी तीन पेंटिंग्स ऑनलाइन डाली
  541. 20:55और एक बिक भी गई।
  542. 20:56और सबसे पेचीदा केस अर्जुन का है। 45 साल
  543. 20:59के अर्जुन जिन्हें टाइप टू डायबिटीज थी।
  544. 21:02उन्होंने मान लिया था कि यह जेनेटिक है और
  545. 21:04कुछ नहीं हो सकता। उनका आर एस फिल्टर इस
  546. 21:06कदर बंद था कि वह बीमारी को रिवर्स करने
  547. 21:09की कोई भी जानकारी रजिस्टर ही नहीं करता
  548. 21:11था।
  549. 21:11पर जब एक वर्कशॉप में उनका माइंड शांत
  550. 21:13हुआ, उनका वो फिल्टर खुला, तब उन्होंने 90
  551. 21:17दिन का प्रयोग किया, लाइफ स्टाइल बदला और
  552. 21:19सेहत में भारी सुधार हुआ।
  553. 21:21इन सभी कहानियों में एक बात कॉमन है।
  554. 21:24माइंड जब पास्ट या फ्यूचर में भटकना बंद
  555. 21:27करता है और अवेयरनेस प्रेजेंट में आती है,
  556. 21:30तभी मेंटल लूप्स ब्रेक होते हैं।
  557. 21:32तो ये बदलाव शुरू कैसे होता है? इसका
  558. 21:34मैकेनिज्म क्या है?
  559. 21:36इसके तीन मुख्य हिस्से हैं। इंटेंशन,
  560. 21:38इमोशन और अटेंशन। इंटेंशन यानी इरादा। यह
  561. 21:42सिर्फ कोई इच्छा नहीं है।
  562. 21:44यह माइंड के लिए एक जीपीएस प्रोग्रामिंग
  563. 21:46है।
  564. 21:47एक्जेक्टली। यह माइंड को नए पैटर्न खोजने
  565. 21:50का निर्देश देती है और इमोशन भावनाएं एक
  566. 21:54एंपलीफायर की तरह हैं।
  567. 21:55मतलब जो न्यूरॉन्स एक साथ फायर करते हैं
  568. 21:58वो आपस में जुड़ जाते हैं।
  569. 22:00हां वो नए न्यूरल पाथवे बनाते हैं। अक्सर
  570. 22:03जिस इंसान को निराशा की आदत हो गई है उसके
  571. 22:06माइंड को उम्मीद जैसी नई भावना एक खतरे
  572. 22:09जैसी लगती है।
  573. 22:10जैसे किसी घने जंगल में नई पगडंडी बनाना।
  574. 22:14बिल्कुल। और तीसरा है अटेंशन। जहां ध्यान
  575. 22:17जाता है वहां ऊर्जा बहती है।
  576. 22:19अगर हम इसे अपनी डेली लाइफ में उतारना
  577. 22:21चाहें तो कुछ बहुत ही प्रैक्टिकल टूल्स
  578. 22:24हैं। पहला है मॉर्निंग पॉसिबिलिटी
  579. 22:26प्रैक्टिस।
  580. 22:27यह बहुत ही सिंपल है।
  581. 22:28सुबह बस 10 मिनट के लिए अपनी किसी पुरानी
  582. 22:31मान्यता को पहचानना, उसे बिना जज किए
  583. 22:34देखना और एक अलग नजरिए की कल्पना करना।
  584. 22:38और उस दिशा में एक बहुत छोटा सा कदम
  585. 22:40उठाना।
  586. 22:40दूसरा टूल है द कंट्राडिक्शन कलेक्टर।
  587. 22:43अपनी सीमित मान्यताओं को तोड़ने वाले
  588. 22:45सबूतों को इकट्ठा करना, ऐसे लोगों को
  589. 22:47खोजना जो असंभव को संभव कर रहे हैं।
  590. 22:50और तीसरा द फ्रीक्वेंसी ऑडिट। अपने फोन का
  591. 22:54स्क्रीन टाइम देखना, अपनी बातचीत का ऑडिट
  592. 22:56करना कि क्या हम सिर्फ शिकायतें कर रहे
  593. 22:59हैं?
  594. 22:59और सुबह के पहले 10 विचारों पर ध्यान
  595. 23:01देना।
  596. 23:02यह सब सुनकर ऐसा लगता है कि हम सच में
  597. 23:05अपनी लाइफ को एक ऑटो पायलट मोड पर छोड़
  598. 23:07चुके हैं।
  599. 23:08हां। और जब इंसान यह नोटिस करना शुरू करता
  600. 23:10है कि माइंड हमेशा कहीं और होता है तो
  601. 23:12अवेयरनेस बहुत ही जेंटल तरीके से वापस आती
  602. 23:14है।
  603. 23:15विचारों का जो शोर है वो धीरे-धीरे धीमा
  604. 23:18होने लगता है।
  605. 23:19एक इनर साइलेंस एक खामोशी महसूस होने लगती
  606. 23:22है।
  607. 23:22हमारी रियलिटी की सीमा केवल हमारी
  608. 23:25मान्यताओं की सीमा है।
  609. 23:26जब हम अपना ध्यान बदलते हैं तो कई नए
  610. 23:28भविष्य संभव हो जाते हैं।
  611. 23:30दुनिया नहीं बदलती बस हमारा फिल्टर बदल
  612. 23:33जाता है।
  613. 23:34हम पास्ट के शोर से निकलकर फाइनली इस पल
  614. 23:37में आ जाते हैं। शायद शायद हम कभी
  615. 23:39प्रेजेंट में थे ही नहीं। और अब जब वह
  616. 23:41बैकग्राउंड नॉइज़ थोड़ी कम हुई है तो बस एक
  617. 23:44सवाल है जो हम सबको खुद से पूछना चाहिए।
  618. 23:46हम
  619. 23:47अगर हमारा माइंड लगातार हमारे पास्ट के
  620. 23:49अनुभवों के आधार पर इस प्रेजेंट मोमेंट को
  621. 23:52फिल्टर कर रहा है तो इस वक्त इसी सेकंड
  622. 23:56ऐसी कौन सी सच्चाई है? ऐसा कौन सा शानदार
  623. 23:59अवसर है जो हमारे ठीक सामने है बिल्कुल
  624. 24:02पास पर हमें दिखाई नहीं दे रहा क्योंकि
  625. 24:05हमने अपने माइंड को उसे देखने की इजाजत ही
  626. 24:07नहीं दी है। बस एक बार उस खामोशी को महसूस
  627. 24:11करें।
  628. 24:11अक्सर हम अस्यूम कर लेते हैं कि फ्यूचर भी
  629. 24:13पास्ट जैसा ही होगा।
  630. 24:15हम्म, यह बहुत ही कॉमन बिलीफ है।
  631. 24:17एक अजीब सी उलझन होती है ना हम सबके अंदर।
  632. 24:20एक बहुत ही डीप रिलेटिबल कॉन्फ्लिक्ट।
  633. 24:22माइंड कहता है कि मैं जानता हूं, मुझे
  634. 24:24चेंज करना चाहिए। नए रास्ते पर चलने का
  635. 24:27इरादा भी होता है।
  636. 24:28हां, नए रेजोलशंस बनते हैं। एक क्लियर विज़
  637. 24:31होता है कि अब जिंदगी को अलग तरीके से
  638. 24:34जीना है।
  639. 24:34राइट?
  640. 24:35पर फिर भी कुछ वक्त बाद एक अनजानी कशिश
  641. 24:38जैसे वापस उसी पुराने लूट में खींच लाती
  642. 24:41है। ऐसा लगता है जैसे बदलना नामुमकिन सा
  643. 24:43हो गया है। जैसे हम खुद अपनी ही आदतों के
  644. 24:46प्रिजनर बन गए हैं।
  645. 24:47यह सच में एक बहुत ही गहरी ह्यूमन
  646. 24:49एक्सपीरियंस है और यहां समझने वाली बात यह
  647. 24:52है कि दिक्कत हमारे विल पावर या इरादों
  648. 24:54में नहीं होती। इरादे तो सच में बहुत
  649. 24:56जेन्युइन होते हैं।
  650. 24:57तो फिर हम वापस वहीं क्यों पहुंच जाते
  651. 24:58हैं? प्रॉब्लम यह है कि हमारा माइंड अक्सर
  652. 25:01वही पॉसिबिलिटीज देखता है और वही रास्ते
  653. 25:04चुनता है जो उसने पहले एक्सपीरियंस किए
  654. 25:06हैं। एक तरह से देखा जाए तो हमारी बॉडी
  655. 25:10हमारे पुराने इमोशंस का एक लिविंग आर्काइव
  656. 25:13बन चुकी होती है। एक जीवित पुरा लेख।
  657. 25:16एक लिविंग आर्काइव। मतलब जो पास्ट में हुआ
  658. 25:18वो बॉडी में स्टोर हो गया है।
  659. 25:20बिल्कुल। जब तक इस आर्काइव को इस फिजिकल
  660. 25:23मेमोरी को चेंज नहीं किया जाता सिर्फ
  661. 25:25कॉन्शियसली सोचने से या नए प्लान्स बनाने
  662. 25:28से रियलिटी नहीं बदलती।
  663. 25:30और जब तक ध्यान उस पास्ट से उस आर्काइव से
  664. 25:32आजाद नहीं होता तब तक नए पोटेंशियलल्स और
  665. 25:35नए रास्ते एक घने कोहरे में छुपे रहते
  666. 25:37हैं। एक डेंस फॉग की तरह माइंड वही देख
  667. 25:40रहा है जो वो ऑलरेडी जानता है।
  668. 25:41सॉफ्ट ए्बिएंट।
  669. 25:42हां।
  670. 25:43और वो फोग तब तक नहीं हटता जब तक
  671. 25:45केमिस्ट्री चेंज ना हो। चलिए इसको थोड़ा
  672. 25:48अनपैक करते हैं। आखिर यह लिविंग आर्काइव
  673. 25:50बनता कैसे है? जब भी कोई इमोशन महसूस होता
  674. 25:53है, चाहे वह बहुत ज्यादा खुशी हो, गुस्सा
  675. 25:55हो या एंजायटी हो, हमारा ब्रेन ऐसे ही हवा
  676. 25:59में रिएक्ट नहीं करता। वो एक्चुअली एक
  677. 26:00स्पेसिफिक केमिकल कॉकटेल रिलीज करता है।
  678. 26:03एग्जैक्ट केमिस्ट्री प्ले आउट हो रही होती
  679. 26:06है वहां। न्यूरो पेप्टाइड्स और हॉर्मोनस
  680. 26:08तुरंत हमारे ब्लड के थ्रू ट्रेवल करना
  681. 26:09शुरू कर देते हैं और यह पूरे बॉडी में
  682. 26:11फैलने लगते हैं।
  683. 26:12यहां जो सबसे फैसनेटिंग बात है वो यह है
  684. 26:15कि ये केमिकल्स हमारी बॉडी के हर एक सेल
  685. 26:18तक पहुंचते हैं और हर सेल के सरफेस पर इन
  686. 26:21केमिकल्स को रिसीव करने के लिए छोटे-छोटे
  687. 26:24लॉक्स या रिसेप्टर्स होते हैं।
  688. 26:26जैसे एक ताले के लिए एक स्पेसिफिक चाबी
  689. 26:28होती है।
  690. 26:28हां, जैसे एक चाबी खास ताले में फिट होती
  691. 26:31है। वैसे ही हर इमोशन का केमिकल अपने
  692. 26:34स्पेसिफिक रिसेप्टर में फिट होता है। अब
  693. 26:37अम जब एक ही इमोशन बार-बार फील किया जाता
  694. 26:41है। मान लीजिए कोई सालों तक लगातार
  695. 26:43स्ट्रेस या सर्वाइवल मोड में रहा है तो
  696. 26:46बॉडी के सेल्स इन केमिकल्स के आधी हो जाते
  697. 26:49हैं।
  698. 26:50हैबचुएट हो जाते हैं।
  699. 26:51मतलब माइक्रोस्कोपिक लेवल पर एक तरह की
  700. 26:53एडिक्शन शुरू हो जाती है।
  701. 26:54एकदम वही प्रोसेस है। सेल्स अपने
  702. 26:57स्ट्रक्चर को चेंज कर लेते हैं ताकि वो उस
  703. 27:00फेमिलियर केमिकल जैसे कॉर्टिजॉल को और
  704. 27:02ज्यादा रिसीव कर सकें।
  705. 27:03जब किसी दिन बाहर कोई स्ट्रेस नहीं भी
  706. 27:05होता तो अंदर के सेल्स उस केमिकल की कमी
  707. 27:08महसूस करते हैं।
  708. 27:09उन्हें लगता है जैसे उनकी खुराक नहीं मिली
  709. 27:11आज।
  710. 27:11एक्जेक्टली। और फिर वो माइंड को वापस
  711. 27:14सिग्नल भेजते हैं ऐसे थॉट्स क्रिएट करने
  712. 27:16के लिए जो वापस उस स्ट्रेस केमिकल को
  713. 27:18रिलीज करवा सकें। यह तो बहुत ही अजीब और
  714. 27:21थोड़ा डरावना भी है। मतलब माइंड शायद
  715. 27:23शांति चाहता है। पर बॉडी अपना अलग ही
  716. 27:25प्रोग्राम चला रही है। और इस पूरे
  717. 27:27मैकेनिज्म में ब्रेन के एक छोटे से पार्ट
  718. 27:30हाइपोथैलेमस का रोल यहां एक ब्रिज जैसा
  719. 27:33लगता है जो इनविज़िबल
  720. 27:35थॉट्स को रियल फिजिकल केमिस्ट्री में
  721. 27:37कन्वर्ट कर रहा है।
  722. 27:38और इस ब्रिज की सबसे हैरान करने वाली बात
  723. 27:41पता है क्या है? इसकी कोई आंखें नहीं है।
  724. 27:44हाइपोथैलेमस का काम है इमोशनल स्टेट को
  725. 27:47रीड करके बॉडी को केमिकल इंस्ट्रक्शंस
  726. 27:50देना। पर उसे असली घटना और सिर्फ सोची हुई
  727. 27:53घटना के बीच का फर्क नहीं पता होता।
  728. 27:55एक रियल थ्रेट और एक इमेजिन मेमोरी दोनों
  729. 27:58उसके लिए एक बराबर है।
  730. 27:59हां।
  731. 28:01अगर किसी ने कल रात के किसी झगड़े के बारे
  732. 28:03में अगले दिन सोचा तो उसके माइंड में
  733. 28:05सिर्फ एक थॉट चल रहा है। पर बॉडी कुछ और
  734. 28:07ही एक्सपीरियंस कर रही है।
  735. 28:09हां हाइपोथैलेमिस तुरंत वही स्ट्रेस
  736. 28:11केमिकल्स वापस रिलीज करना शुरू कर देगा।
  737. 28:14बिल्कुल वैसे ही जैसे वो झगड़ा अभी इसी
  738. 28:17वक्त हो रहा हो। अगर दिन में चार बार उस
  739. 28:20पुरानी बुरी याद को रिकॉल किया गया तो
  740. 28:23बॉडी चार बार उस स्ट्रेस का रियल फिजिकल
  741. 28:25एक्सपीरियंस फेस करेगी। बॉडी के लिए वो
  742. 28:27पास्ट की बात नहीं है। पास्ट अभी उसके लिए
  743. 28:30प्रेजेंट रियलिटी बन चुका है।
  744. 28:31सही कहा। वो पास्ट को प्रेजेंटली लाइव कर
  745. 28:34रही है।
  746. 28:34इसको समझने के लिए एक बहुत ही खूबसूरत और
  747. 28:36थोड़ा ह्टिंग मेटाफॉर है पुराने राग का।
  748. 28:38जैसे एक क्लासिकल म्यूजिशियन होता है
  749. 28:40जिसने 20 साल तक एक ही राग बजाया हो। उसे
  750. 28:42अब उस राग को बजाने के लिए नोट्स या ताल
  751. 28:44के बारे में सोचना नहीं पड़ता।
  752. 28:46उसकी उंगलियां खुद ब खुद ढूंढ लेती हैं
  753. 28:48नोट्स को।
  754. 28:48बिल्कुल। सितार या हारमोनियम पर मसल
  755. 28:51मेमोरी इतनी स्ट्रांग होती है कि ध्यान
  756. 28:53कहीं और होने पर भी धुन परफेक्ट बजती है।
  757. 28:55हमारी बॉडी भी उस ट्रेंड म्यूजिशियन की
  758. 28:57तरह है। जब बॉडी पुराने इमोशंस का वो राग
  759. 29:00बिना सोचे अनकॉन्शियसली प्ले करने लगती है
  760. 29:04क्योंकि उसे बस वही एक धुन आती है। तो
  761. 29:06लाइफ इतनी प्रेडिक्टेबल और रुकी हुई लगने
  762. 29:09लगती है। बायोलॉजिकल प्रोग्रामिंग
  763. 29:11रोजमर्रा की जिंदगी को पूरी तरह से
  764. 29:14कंट्रोल करने लगती है।
  765. 29:15प्रेजेंट मोमेंट का सच जैसे कहीं खो जाता
  766. 29:18है। क्योंकि बॉडी तो अभी भी पास्ट की आग
  767. 29:20में ही चल रही है।
  768. 29:21और यह बायोलॉजिकल लूपिंग सिर्फ थ्योरी
  769. 29:23नहीं है। अगर ध्यान से देखें तो यह हमारे
  770. 29:26आसपास की जिंदगी को डायरेक्टली शेप कर रही
  771. 29:28है।
  772. 29:29हम ऐसे बहुत से रियल लाइफ सिनेरियोस हम
  773. 29:31रोज देखते हैं।
  774. 29:32जैसे जब कोई बिना किसी वजह के सुबह उठते
  775. 29:35ही हैवी चेस्ट और एंग्जायटी फील करता है।
  776. 29:38हालांकि दिन छुट्टी का है। बाहर मौसम
  777. 29:41अच्छा है। जॉब ठीक चल रही है। सब कुछ सेट
  778. 29:44होने के बावजूद आंख खुलते ही एक अनजानी सी
  779. 29:47बेचैनी घेर लेती है। यह इसलिए नहीं कि आज
  780. 29:51कोई स्ट्रेस है बल्कि इसलिए क्योंकि नर्वस
  781. 29:53सिस्टम ने बचपन की किसी फाइनेंशियल टेंशन
  782. 29:56को अपना डिफॉल्ट बेसलाइन बना लिया है। यह
  783. 29:59बहुत ही एक्यूरेट ऑब्जरवेशन है। उस इंसान
  784. 30:02का माइंड उस छुट्टी वाले दिन में मौजूद
  785. 30:04है। पर उसकी बॉडी अभी भी उस बचपन के घर
  786. 30:08में है जहां हमेशा इनसिक्योरिटी रहती थी।
  787. 30:11नर्वस सिस्टम को लगता है कि दुनिया ऐसी ही
  788. 30:14होती है। हमेशा अलर्ट रहना पड़ता है।
  789. 30:17हमेशा किसी बुरे वक्त के लिए तैयार रहना
  790. 30:19पड़ता है।
  791. 30:19हां, बॉडी उस सुबह की शांति पर विश्वास
  792. 30:22नहीं कर पाती। उसे शांति अनसेफ लगती है और
  793. 30:26वह वही फमिलियर कॉर्टिजोल मांगती है जिसकी
  794. 30:29वह आधी हो चुकी है।
  795. 30:30और सिर्फ इंडिविजुअल एंग्जायटी ही नहीं यह
  796. 30:33चीज ह्यूमन कनेक्शंस और प्यार में भी बहुत
  797. 30:35डीपली प्ले आउट करती है। ऐसे कई सिचुएशंस
  798. 30:37होते हैं जहां लोग इंटेलिजेंट हैं। अपनी
  799. 30:40लाइफ के पैटर्न्स को समझते हैं। फिर भी
  800. 30:42उनके रिलेशनशिप्स हमेशा एक ही तरह से
  801. 30:44क्यों टूट जाते हैं? एक ऐसी साइकिल बन
  802. 30:46जाती है जहां थोड़ी क्लोजनेस होती है। फिर
  803. 30:49कॉन्फ्लिक्ट होता है, डिस्टेंस बनता है और
  804. 30:51आखिर में सेपरेशन। इसका जवाब भी नर्वस
  805. 30:54सिस्टम के उसी आर्काइव में छुपा है। अगर
  806. 30:57बचपन में किसी ने प्यार को बहुत
  807. 30:59अनप्रिडिक्टेबल देखा था। जहां क्लोजनेस का
  808. 31:02मतलब हमेशा टेंशन और कॉन्फ्लिक्ट था तो
  809. 31:05नर्वस सिस्टम ने प्यार की डेफिनेशन ही
  810. 31:08केओस के साथ जोड़ दी है।
  811. 31:10तो प्यार का मतलब ही खतरा बन गया है
  812. 31:12सिस्टम के लिए।
  813. 31:12राइट? अब अगर कोई पार्टनर एक शांत, स्टेबल
  814. 31:16और कंसिस्टेंट प्यार देता है तो बॉडी को
  815. 31:19वो सिग्नल समझ ही नहीं आता। वो स्थिति
  816. 31:21अनजानी लगती है और इसलिए बोरिंग या
  817. 31:24अनकंफर्टेबल लगने लगती है।
  818. 31:26वहां वो पुराना केमिकल रश नहीं मिलता जो
  819. 31:28झगड़े या अनसर्टेनिटी से मिलता है। एक तरह
  820. 31:31से स्टेबिलिटी उस सिस्टम के लिए फॉरेन
  821. 31:33लैंग्वेज बन जाती है।
  822. 31:34कॉन्शियसली कोई भी कॉन्फ्लिक्ट को ढूंढ
  823. 31:36नहीं रहा होता। सब शांति ही चाहते हैं। पर
  824. 31:39बॉडी ऑटोमेटिकली ऐसी सिचुएशंस क्रिएट करती
  825. 31:43है। ऐसी बातों पर रिएक्ट करती है जिससे वो
  826. 31:46फिमिलियर टर्बुलेंस वापस आ जाए। क्योंकि
  827. 31:49बायोलॉजी के लिए वही टर्बुलेंस नॉर्मल और
  828. 31:51सेफ है।
  829. 31:52और इस लूप का एक और बहुत पावरफुल एग्जांपल
  830. 31:54एग्जाम हॉल्स में दिखता है। यह एक ऐसी
  831. 31:57सिचुएशन है जो शायद मिलियंस ऑफ स्टूडेंट्स
  832. 31:59ने फील की होगी। साल भर की मेहनत, कमरे
  833. 32:02में बैठकर सब कुछ याद होना पर जैसे ही
  834. 32:05एग्जाम हॉल का दरवाजा क्रॉस होता है और
  835. 32:07क्वेश्चन पेपर सामने आता है, सब कुछ
  836. 32:09ब्लैंक हो जाता है। एकदम फ्रीज।
  837. 32:12यह अचानक से नॉलेज गायब होने की बात नहीं
  838. 32:14होती।
  839. 32:15नहीं, यह पूरी तरह से एक सर्वाइवल
  840. 32:17रिस्पांस है। स्टूडेंट की बॉडी ने उस
  841. 32:19एग्जाम एनवायरमेंट को सालों से थ्रेट या
  842. 32:21खतरे की तरह कंडीशन कर लिया है। शेम का
  843. 32:24डर, एक्सपेक्टेशंस का बोझ, फ्यूचर की
  844. 32:26टेंशन तो हॉल में एंटर करते ही बॉडी फाइट
  845. 32:29ऑफ फ्लाइट मोड में चली जाती है।
  846. 32:31एड्रिनलिन और कॉर्टिसोल पूरी बॉडी में
  847. 32:33फ्लड हो जाते हैं वहां। और इस सर्वाइवल
  848. 32:35स्टेट में ब्रेन एक बहुत ही रेडिकल डिसीजन
  849. 32:37लेता है। ब्रेन का वह हिस्सा प्रीफ्रंटल
  850. 32:40कॉर्टेक्स जो लॉजिक और मेमोरी रिकॉल के
  851. 32:42लिए जरूरी है वह शट डाउन हो जाता है।
  852. 32:44क्योंकि जब दिमाग को लगता है कि सामने एक
  853. 32:46खतरनाक शेर खड़ा है तो उसे पोएट्री लिखने
  854. 32:49या मैथ इक्वेशन सॉल्व करने की जरूरत नहीं
  855. 32:51होती। उसे सिर्फ भागना होता है या फ्रीज
  856. 32:54होना होता है।
  857. 32:55बायोलॉजी अपना काम परफेक्टली कर रही है
  858. 32:57वहां पर। प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स की एनर्जी
  859. 33:00उन मसल्स की तरफ डायवर्ट हो जाती है जो
  860. 33:03भागने के लिए जरूरी हैं।
  861. 33:04यहां पर बात सच में बहुत इंटरेस्टिंग हो
  862. 33:06जाती है। क्योंकि इन तीनों सिचुएशंस में
  863. 33:08चाहे वो सुबह की अनक्लेन एंग्जायटी हो,
  864. 33:10रिलेशनशिप्स का बार-बार टूटना हो या
  865. 33:12एग्जाम में ब्लैंक हो जाना हो। हमारी बॉडी
  866. 33:14कोई गलती नहीं कर रही है। वो हमारे खिलाफ
  867. 33:16काम नहीं कर रही है।
  868. 33:17वो बस वही कर रही है जिसकी उसको ट्रेनिंग
  869. 33:19मिली है।
  870. 33:20हां, उसने केयरफुली वो सारा डाटा पास से
  871. 33:23सेव किया है और अब प्योर डिवोशन के साथ
  872. 33:25उसको अप्लाई कर रही है।
  873. 33:26सॉफ्ट ब्रेथ अगर हम इसको बिगर पिक्चर से
  874. 33:28कनेक्ट करें तो हमें इस बायोलॉजी की डीपर
  875. 33:31साइंस को देखना पड़ेगा। यह सिर्फ ब्रेन के
  876. 33:34अंदर बंद एक आइसोलेटेड मैकेनिज्म नहीं है।
  877. 33:37जैसे हमें अक्सर नर्वस होने पर पेट में
  878. 33:39बटरफाइस फील होती हैं या एसिडिटी और
  879. 33:42डाइजेशन के इश्यूज आते हैं। यह सिर्फ कहने
  880. 33:45की बात नहीं है। हमारे गट में यानी हमारे
  881. 33:47डाइजेस्टिव ट्रैक में करीब 100 मिलियन
  882. 33:50न्यूरॉन्स होते हैं।
  883. 33:51100 मिलियन। यह अपने आप में जैसे एक दूसरा
  884. 33:54दिमाग है जो कांस्टेंटली एनवायरमेंट को
  885. 33:57प्रोसेस कर रहा है।
  886. 33:58और इन दोनों दिमाग ब्रेन और गट के बीच एक
  887. 34:01बहुत ही वाइटल हाईवे होता है जिसे वेगस
  888. 34:03नर्व कहते हैं। यह एक टू वे कम्युनिकेशन
  889. 34:06केबल की तरह है। जब माइंड किसी स्ट्रेस या
  890. 34:08पुराने इमोशनल पैटर्न को रिकॉल करता है तो
  891. 34:11वेगस नर्व के जरिए वो सिग्नल एक
  892. 34:14इलेक्ट्रिक स्पीड से सीधा गट तक पहुंचता
  893. 34:16है।
  894. 34:16इसलिए डीप इमोशनल पैटर्न्स सीधा फिजिकल
  895. 34:19हेल्थ को डिसरप्ट करते हैं।
  896. 34:21बिल्कुल। इमोशन सिर्फ दिमाग में नहीं
  897. 34:23रहता। वो लिटरली फ्लश और टिश्यू का हिस्सा
  898. 34:26बन जाता है।
  899. 34:27और इस साइकिल को और भी ज्यादा रिजिड बनाता
  900. 34:29है हमारा ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम। एक ऐसी
  901. 34:32सोसाइटी में जहां कंपटीशन का प्रेशर और
  902. 34:34कास्टेंट हसल कल्चर इतना डोमिनेंट है
  903. 34:37हमारा नर्वस सिस्टम ऑलमोस्ट हमेशा
  904. 34:40सिंपैथेटिक मोड में फंसा रहता है। यानी
  905. 34:42हमेशा फाइट या फ्लाइट के लिए तैयार। एक
  906. 34:44हेल्दी सिस्टम की खूबसूरती उसके बैलेंस
  907. 34:47में होती है। सिंपैथेटिक मोड एक्शन के लिए
  908. 34:49है। पर पैरासिंैथेटिक मोड हमारी बॉडी का
  909. 34:52रेस्ट और रिपेयर स्टेट है। हीलिंग सिर्फ
  910. 34:55इस पैरासिंैथेटिक मोड में ही होती है। पर
  911. 34:57कास्टेंट लो ग्रेड स्ट्रेस की वजह से लोग
  912. 35:00इस रेस्ट करने वाले मोड में जाना जैसे भूल
  913. 35:03ही गए हैं। बॉडी हमेशा थोड़ी अलर्ट और
  914. 35:05डिफेंसिव पोजीशन में रहती है। जैसे हर
  915. 35:08वक्त किसी अनजाने खतरे का इंतजार कर रही
  916. 35:10हो। यह बिल्कुल ऐसा है जैसे किसी गाड़ी का
  917. 35:13एक्सीलरेटर हमेशा दबा हुआ हो और ब्रेक काम
  918. 35:15करना बंद कर दे। एक ऐसी ट्रेन जो अपने आप
  919. 35:18चली जा रही है।
  920. 35:19यह ट्रेन की पटरी का रूपक यहां बहुत गहराई
  921. 35:23से फिट बैठता है। एक हैवी आयरन ट्रेन वहीं
  922. 35:26जाएगी जहां उसके लिए लोहे की पटरियां बिछी
  923. 35:29हैं। ड्राइवर भले ही कितना भी विशु
  924. 35:32थिंकिंग करे कि उसे किसी नए शहर जाना है।
  925. 35:34सिर्फ डेस्टिनेशन के बारे में सोचने से
  926. 35:37ट्रेन हवा में नहीं मुड़ेगी। रास्ता बदलने
  927. 35:39के लिए उतर कर नई पटरियां यानी नए न्यूरल
  928. 35:42पाथवेज बिछाने पड़ते हैं और पुरानी
  929. 35:44पटरियों को यूज करना बंद करना पड़ता है।
  930. 35:47पॉज तो इस सब का आखिर मतलब क्या है? हम इस
  931. 35:51लूप को कैसे तोड़ें? नई पॉसिबिलिटीज तक
  932. 35:53पहुंचने का रास्ता कहां से शुरू होता है?
  933. 35:56सबसे पहला और सबसे जरूरी कदम कोई बहुत
  934. 35:59बड़ा फिजिकल एक्शन नहीं है। वो है प्योर
  935. 36:02अवेयरनेस। खुद को जज किए बिना अपने फिजिकल
  936. 36:06रिएक्शंस को ऑब्जर्व करना शुरू करना। जब
  937. 36:09अगली बार गुस्सा आए या चेस्ट में वो
  938. 36:12फमिलियर टाइटनेस फील हो तो यह नहीं सोचना
  939. 36:14कि मैं गुस्से में हूं या मैं हमेशा एशियस
  940. 36:17क्यों हो जाता हूं। बल्कि सिर्फ एक विटनेस
  941. 36:20की तरह देखना, नोटिस करना कि बॉडी में
  942. 36:22गुस्सा आ रहा है या बॉडी वही पुराना
  943. 36:24सर्वाइवल रिएक्शन दे रही है।
  944. 36:25हां, यह जो एक छोटी सी दूरी बनती है, यह
  945. 36:29जो पॉज क्रिएट होता है स्टिमुलस और
  946. 36:31रिएक्शन के बीच, यही वो स्पेस है जहां
  947. 36:34फ्री विल एक्सिस्ट करती है। यहीं से बदलाव
  948. 36:37शुरू होता है।
  949. 36:37उस छोटी सी स्पेस में अचानक से चॉइससेस
  950. 36:39नजर आने लगती हैं। और इन पैटर्न्स को
  951. 36:41डेलिब्रेटली इंटरप्ट करने के लिए मेडिटेशन
  952. 36:44एक बहुत ही प्रोफाउंड टूल बन जाता है।
  953. 36:46अक्सर लोग सोचते हैं कि मेडिटेशन सिर्फ
  954. 36:47रिलैक्स होने का तरीका है। आंख बंद करके
  955. 36:49शांति से बैठना ताकि थकान उतर जाए। पर
  956. 36:51साइंस इसको एक अलग ही एंगल से देखती है।
  957. 36:54मेडिटेशन सिर्फ एक मेंटल स्पा नहीं है। यह
  958. 36:57एक्चुअली बॉडी के ऑटोमेटिक इमोशनल
  959. 37:00प्रोग्राम को रोकने और उसे एक नया केमिकल
  960. 37:03एक्सपीरियंस देने का लैबोरेटरी प्रोसेस
  961. 37:05है।
  962. 37:06जब कोई ध्यान में बैठता है और जानबूझकर
  963. 37:09कॉन्शियसली एक नया इमोशन जैसे डीप
  964. 37:12ग्रेटट्यूड या पीस महसूस करने की कोशिश
  965. 37:14करता है तो वह एक्चुअली अपनी बॉडी की
  966. 37:17केमिस्ट्री को लाइव रीाइट कर रहा होता है।
  967. 37:19वह पुराने रास्ते से ध्यान हटाकर नए
  968. 37:22न्यूरल पाथवेज बना रहा होता है। और इस
  969. 37:25प्रोसेस में सबसे माइंड ब्लोइंग साइंटिफिक
  970. 37:27कांसेप्ट जो पिछले कुछ सालों में सामने
  971. 37:29आया है वो है एपीजेनेटिक्स। इसने ह्यूमन
  972. 37:33बायोलॉजी का पूरा वर्ल्ड व्यू ही बदल दिया
  973. 37:35है।
  974. 37:36पॉज। पहले हम सोचते थे कि जींस एक फिक्स्ड
  975. 37:39ब्लूप्रिंट है। जो डीएनए मिल गया वो
  976. 37:41डेस्टिनी बन गया। उसमें कोई बदलाव नहीं हो
  977. 37:43सकता। पर एपिजेनेटिक्स बताता है कि
  978. 37:46रियलिटी इससे बहुत अलग है।
  979. 37:48एपिजेनेटिक्स प्रूव करता है कि जींस
  980. 37:50एक्चुअली स्विचेस की तरह काम करते हैं।
  981. 37:53जैसे एक रूम में बहुत सारे लाइट स्विचेस
  982. 37:56हो वो सब वहां हैं। पर कौन सा ऑन होगा और
  983. 38:00कौन सा ऑफ यह एनवायरनमेंट तय करता है। और
  984. 38:03सेल का एनवायरनमेंट उसके आसपास के
  985. 38:06केमिकल्स हैं।
  986. 38:07यानी हमारे इमोशंस।
  987. 38:08बिल्कुल। जब हम कॉन्शियसली और
  988. 38:10कंसिस्टेंटली नए पॉजिटिव इमोशंस फील करते
  989. 38:14हैं तो बॉडी का केमिकल एनवायरनमेंट बदलता
  990. 38:16है। यह नया एनवायरनमेंट उन जींस के ऊपर
  991. 38:19लगे स्विचेस को ऑन कर देता है जो हेल्थ और
  992. 38:23सेल रिपेयर के लिए रिस्पांसिबल है और
  993. 38:25स्ट्रेस वाले जींस को ऑफ कर देता है।
  994. 38:28इसका मतलब है कि सिर्फ अपने अटेंशन को
  995. 38:29शिफ्ट करके हम अपने बायोलॉजिकल ब्लूप्रिंट
  996. 38:32में नए इंस्ट्रक्शंस लिख रहे होते हैं। हम
  997. 38:34लिटरली अपनी डेस्टिनी को सेल बाय सेल चेंज
  998. 38:37कर सकते हैं। सॉफ्ट ब्रेथ्स। यह सोचना ही
  999. 38:39कितना लिबरेटिंग और पावरफुल है। पर
  1000. 38:42प्रैक्टिकल लाइफ में एक चीज जो सबसे
  1001. 38:44ज्यादा चैलेंज करती है, वो यह है कि हमारी
  1002. 38:46सोसाइटी ने हमें इंतजार करना सिखाया है।
  1003. 38:49हम बाहरी बदलाव का वेट करते हैं।
  1004. 38:52हां, हम सोचते हैं कि जब बैंक बैलेंस ठीक
  1005. 38:54हो जाएगा, तब शांति फील करेंगे। जब
  1006. 38:56रिलेशनशिप ठीक हो जाएगा, तब प्यार फील
  1007. 38:58करेंगे। जब सक्सेस मिलेगी तब कॉन्फिडेंस
  1008. 39:00आएगा। और बायोलॉजी यही सबसे बड़ा शिफ्ट
  1009. 39:03मांगती है। फीलिंग को एक्सटर्नल रियलिटी
  1010. 39:06से पहले आना होगा। बॉडी को वो नया इमोशन,
  1011. 39:09सिक्योरिटी या लव आज और इसी वक्त महसूस
  1012. 39:12कराना होगा ताकि वो उसकी नई आदत उसका नया
  1013. 39:15बेसलाइन बन सके।
  1014. 39:17जब तक बॉडी अंदर से सेफ फील नहीं करेगी वो
  1015. 39:20बाहर के सेफ एनवायरमेंट को भी पहचान नहीं
  1016. 39:22पाएगी।
  1017. 39:22या उसको एक्सेप्ट नहीं करेगी। इसको एक
  1018. 39:25बहुत ही आसान तरीके से समझ सकते हैं।
  1019. 39:27मान लीजिए एक मिट्टी का मटका है जिसमें
  1020. 39:29सालों से एक ही तरह का थोड़ा खारा पानी
  1021. 39:32भरा हुआ था। मिट्टी की फितरत है कि वो उस
  1022. 39:34खारेपन को अपने अंदर सोख लेती है। अब अगर
  1023. 39:37इस मटके में अचानक से नया और साफ पानी डाल
  1024. 39:39दिया जाए तो शुरू के कुछ दिन उस नए मीठे
  1025. 39:42पानी में भी वही पुराना खारा स्वाद आएगा।
  1026. 39:44क्योंकि पुरानी केमिस्ट्री और पुरानी आदत
  1027. 39:47इतनी आसानी से फ्लश आउट नहीं होती। उस
  1028. 39:50मटके का स्ट्रक्चर उस पुराने पानी के
  1029. 39:52हिसाब से अडप्ट हो चुका है।
  1030. 39:53पर अगर बिना गिव अप के लगातार रोज उस मटके
  1031. 39:57में नया और मीठा पानी डाला जाए तो एक वक्त
  1032. 40:00आएगा जब मिट्टी उस नए पानी की प्रॉपर्टी
  1033. 40:03को सोख लेगी
  1034. 40:04और तब उस मटके का स्वभाव पूरी तरह बदल
  1035. 40:07जाएगा। हमारा फिजिकल बॉडी बिल्कुल उस मटके
  1036. 40:10की तरह है। शुरू में जब नए पॉजिटिव इमोशंस
  1037. 40:14लाने की कोशिश होती है तो बॉडी रेजिस्ट
  1038. 40:17करती है। डाउट्स आते हैं। पुराने फियर्स
  1039. 40:20वापस सरफेस पर आते हैं।
  1040. 40:21पर कंसिस्टेंसी और पेशेंस से वो सेल्यूलर
  1041. 40:24नेचर बदल जाता है।
  1042. 40:25इस पूरे क्वांटम शिफ्ट का निचोड़ यही है
  1043. 40:28कि जब बॉडी पुराने इमोशंस को रिपीट करना
  1044. 40:30बंद करती है तब माइंड भी सच में चेंज होने
  1045. 40:34लगता है। जब बायोलॉजी और माइंड दोनों एक
  1046. 40:37डायरेक्शन में चलते हैं, तब रियल बदलाव
  1047. 40:40आता है।
  1048. 40:41जब यह अजीब सा शोर और पुराने पैटर्न की वो
  1049. 40:44फेमिलियर बैकग्राउंड नॉइज़ थोड़ी कम होने
  1050. 40:46लगती है तो अंदर से बॉडी एकदम हल्की फील
  1051. 40:49होती है।
  1052. 40:49जैसे एक हैवी आर्मर उतार दिया हो।
  1053. 40:51फेसिंग ऑटोमेटिकली स्लो हो जाती है।
  1054. 40:53ऐसा लगता है जैसे अंदर सालों से एक ही
  1055. 40:56रेडियो स्टेशन प्ले हो रहा था। एक ही सैड
  1056. 40:58या एशियस फ्रीक्वेंसी पर और किसी ने धीरे
  1057. 41:01से उसकी फ्रीक्वेंसी बदल दी हो। एक
  1058. 41:03बिल्कुल नई धुन और एक नया वाइब्रेशन सुनाई
  1059. 41:05देने लगता है।
  1060. 41:06जो चीजें पहले रिजिड और फिक्स लगती थी कि
  1061. 41:09नेचर ऐसी ही है या सब कुछ प्रेडिक्टेबल है
  1062. 41:12वो बस पुराने केमिकल प्रोग्राम्स का एक
  1063. 41:14इल्यूजन लगने लगते हैं। जब ध्यान पास्ट के
  1064. 41:17उन यादों और ट्रैप्ड इमोशन से कंप्लीटली
  1065. 41:20हट जाता है तो सामने का फॉग जैसे
  1066. 41:22धीरे-धीरे छटने लगता है।
  1067. 41:24उस कोहरे के पीछे एक बहुत बड़ा और क्लियर
  1068. 41:27ओपन लैंडस्केप नजर आने लगता है। नए रास्ते
  1069. 41:29दिखने लगते हैं जो शायद हमेशा से वहीं थे।
  1070. 41:32बस पुरानी फ्रीक्वेंसी उन्हें देख नहीं पा
  1071. 41:34रही थी। नई पॉसिबिलिटीज वहां मौजूद है। एक
  1072. 41:37ऐसी जगह जहां अब तक ध्यान गया ही नहीं था।
  1073. 41:40शायद रियलिटी उतनी फिक्स नहीं है जितनी
  1074. 41:43हमें लगती थी।
  1075. 41:44कभी-कभी ऐसा लगता है ना कि हमारा माइंड तो
  1076. 41:48चेंज आता है।
  1077. 41:49वो शांत रहना चाहता है।
  1078. 41:50पर हमारी बॉडी वो ऑटोमेटिकली रिएक्ट कर
  1079. 41:52देती है।
  1080. 41:53हां एक्सैक्टली। जैसे-जैसे बॉडी को किसी
  1081. 41:55पुराने स्ट्रेस की एक आदत सी पड़ गई हो।
  1082. 41:57माइंड कह रहा है कि सब ठीक है। रिलैक्स
  1083. 41:59करो। पर बॉडी ऑलरेडी एक पैनिक मोड में जा
  1084. 42:02चुकी है।
  1085. 42:02यह बहुत ही अनसेटलिंग फीलिंग है और बहुत
  1086. 42:05रियल भी। ऐसा लगता है जैसे जैसे बॉडी खुद
  1087. 42:09एक ऑटो पायलट पर हो। वही तो बचपन से हमें
  1088. 42:12सिखाया गया है कि हमारा दिमाग यानि हमारा
  1089. 42:14ब्रेन इस पूरे जिस्म का बॉस है। कि सब कुछ
  1090. 42:17वहीं से कंट्रोल होता है। पर इस ऑटो पायलट
  1091. 42:20वाली फीलिंग को देखकर लगता है कि शायद,
  1092. 42:22शायद हमारी बॉडी ही पास्ट को याद रखती है।
  1093. 42:25और यही आज की सबसे बड़ी रियलाइजेशन है। हम
  1094. 42:28इंसान हर कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम को सिर्फ
  1095. 42:31लॉजिक से सोच-सच कर सॉल्व करना चाहते हैं।
  1096. 42:34पर क्या हो अगर बॉडी पहले ही फैसला ले
  1097. 42:36चुकी हो। आज हम इसी बारे में बात करने
  1098. 42:38वाले हैं। आज के इस गहरे डिस्कशन में हम
  1099. 42:40इस बात की तह तक जाएंगे कि कैसे हमारा दिल
  1100. 42:43और हमारा दिमाग आपस में बात करते हैं।
  1101. 42:46कैसे रिपीटेड इमोशंस हमारी बॉडी को कंडीशन
  1102. 42:49कर देते हैं।
  1103. 42:49बिल्कुल। क्योंकि अगर कोई इंसान
  1104. 42:51ओवरथिंकिंग या एंजायटी से परेशान है तो
  1105. 42:53उसको सिर्फ अपने ख्यालों से ठीक करने की
  1106. 42:56कोशिश करना शायद एक बहुत ही गलत तरीका है।
  1107. 43:00असली चाबी कहीं और ही है।
  1108. 43:01यह एक ऐसा सच है जो हमारी बायोलॉजी को
  1109. 43:05देखने का पूरा नजरिया बदल देता है। अगर हम
  1110. 43:07मेडिकल साइंस की बात करें तो अब यह पूरी
  1111. 43:10तरह से मान लिया गया है कि दिल सिर्फ एक
  1112. 43:13मस्कुलर पंप नहीं है
  1113. 43:14जो सिर्फ खून सप्लाई करता है।
  1114. 43:16राइट? 1991 में 1991 में एक
  1115. 43:20न्यूरोसाइंटिस्ट थे डॉक्टर जे एंड्रू
  1116. 43:23आर्मर। उन्होंने एक ऐसी चीज डिस्कवर की
  1117. 43:26जिसने सबको हैरान कर दिया। उन्होंने साबित
  1118. 43:29किया कि दिल के पास अपना खुद का एक नर्वस
  1119. 43:32सिस्टम होता है।
  1120. 43:33अपना खुद का नर्वस सिस्टम?
  1121. 43:35हां। जिसे साइंस की भाषा में इंट्रिंसिक
  1122. 43:38कार्डियाक नर्वस सिस्टम कहते हैं। या आम
  1123. 43:41भाषा में कहें तो हार्ट ब्रेन दिल का अपना
  1124. 43:44दिमाग। वेट मतलब दिल के पास सच में अपना
  1125. 43:47एक मिनी ब्रेन है जो हमारे मेन ब्रेन को
  1126. 43:49जो हमारे सर में है उसको बाईपास कर सकता
  1127. 43:51है।
  1128. 43:51कर सकता है और करता भी है।
  1129. 43:54यह तो किसी के लिए भी डाइजेस्ट करना
  1130. 43:55मुश्किल है क्योंकि देखिए हमारी स्कूल की
  1131. 43:57बायोलॉजी क्लास में तो ऐसा कुछ नहीं था।
  1132. 43:59मैं समझ सकती हूं। सुनने में अजीब जरूर
  1133. 44:02लगता है लेकिन इस हार्ट ब्रेन में लगभग 40
  1134. 44:05हजार सेंसरी न्यूरॉन्स होते हैं। और ये
  1135. 44:08कोई ऐसे वैसे न्यूरॉन्स नहीं है।
  1136. 44:10तो ये क्या अलग करते हैं? यह
  1137. 44:12इंडिपेंडेंटली चीजों को फील कर सकते हैं,
  1138. 44:15सीख सकते हैं। पुरानी यादों को, इमोशंस को
  1139. 44:18स्टोर कर सकते हैं। और सबसे बड़ी बात
  1140. 44:20दिमाग के आदेश का इंतजार किए बिना खुद
  1141. 44:24डिसीजंस ले सकते हैं।
  1142. 44:25बिना ब्रेन को पूछे
  1143. 44:26बिना ब्रेन के ऑर्डर्स के और जो डाटा हम
  1144. 44:29देखते हैं वो बहुत ही स्ट्राइकिंग है। वो
  1145. 44:32बताता है कि हमारा दिमाग दिल को जितने
  1146. 44:36सिग्नल्स भेजता है
  1147. 44:37दिल उससे पांच गुना ज्यादा इंफॉर्मेशन
  1148. 44:40दिमाग को वापस भेजता है।
  1149. 44:42पांच गुना ज्यादा
  1150. 44:44ये तो बिल्कुल एक घर के उस डायनेमिक की
  1151. 44:47तरह हो गया जहां दिमाग को लगता है कि वो
  1152. 44:48बॉस है। पर असली कंट्रोल किसी और के पास
  1153. 44:51है जो लगातार इंस्ट्रक्शंस भेज रहा है।
  1154. 44:53यह एनालॉजी काफी हद तक सही है। इस पूरे
  1155. 44:56रिश्ते में दिमाग मोस्टली एक लिसनिंग मोड
  1156. 44:59में होता है। हम्म।
  1157. 45:00सुनने की स्थिति में वो दिल से आने वाले
  1158. 45:03सिग्नल्स को सुनता है और उसके हिसाब से
  1159. 45:06बॉडी का आगे का रिएक्शन तय करता है।
  1160. 45:08ओके, लेट्स अनपैक दिस। अगर दिल इतनी सारी
  1161. 45:11इंफॉर्मेशन ब्रेन को भेज रहा है तो इनकी
  1162. 45:14आपस में बात कैसे होती है? इनके पास ऐसी
  1163. 45:16कौन सी भाषा है? मुझे तो हमेशा लगता था कि
  1164. 45:18सब कुछ नर्व्स के थ्रू ही होता है।
  1165. 45:20नर्व्स के थ्रू जरूर होता है पर वो सिर्फ
  1166. 45:22एक रास्ता है। दिल और दिमाग के बीच
  1167. 45:26कम्युनिकेशन के चार अलग-अलग पाथवेज होते
  1168. 45:29हैं। चार रास्ते जो आपने कहा वो पहला है
  1169. 45:32न्यूरोलॉजिकल पाथवे। जिसमें न्यूरॉन्स
  1170. 45:34इन्वॉल्व होते हैं।
  1171. 45:35हां, दिल के न्यूरॉन्स सीधे दिमाग के
  1172. 45:38एमग्डाला और थैलेमिस को सिग्नल भेजते हैं।
  1173. 45:41एमगडेडला यानी दिमाग का वो हिस्सा जो
  1174. 45:43हमारे खतरे वाले अलार्म सिस्टम को कंट्रोल
  1175. 45:45करता है।
  1176. 45:46जो इमोशंस प्रोसेस करता है।
  1177. 45:47एक्सक्ट्ली।
  1178. 45:48मतलब अगर अचानक से डर लगता है या गुस्सा
  1179. 45:50आता है तो वो ट्रिगर दिमाग से नहीं बल्कि
  1180. 45:53दिल से आ रहा है।
  1181. 45:54बिल्कुल।
  1182. 45:54हार्ट पहले सिचुएशन को सेंस करता है और
  1183. 45:57फिर ब्रेन को बताता है कि खतरे का अलार्म
  1184. 46:00बजाना है या नहीं। इसके बाद आता है दूसरा
  1185. 46:02रास्ता जो है बायोकेमिकल पाथवे।
  1186. 46:05बायोकेमिकल मतलब हॉर्मोंस के थ्रू। पर
  1187. 46:08यहां पर लोग ज्यादातर यही सोचते हैं कि
  1188. 46:09हॉर्मोन सिर्फ दिमाग से या थायरॉइड वैसे
  1189. 46:12ग्लैंड से आते हैं। दिल हॉर्मोनस कैसे बना
  1190. 46:14सकता है?
  1191. 46:15है और एक और हॉर्मोन है जिसे हम लव
  1192. 46:18हॉर्मोन कहते हैं। ऑक्सीटोसिन। ओह,
  1193. 46:20ऑक्सीटोसिन भी हार्ट में बनता है।
  1194. 46:22हां, जब हम किसी से बॉन्ड करते हैं, प्यार
  1195. 46:25महसूस करते हैं तो वह ऑक्सीटोसिन दिल में
  1196. 46:28ही बनता है और सीधे दिमाग की केमिस्ट्री
  1197. 46:31को जाकर बदल देता है।
  1198. 46:32ये तो माइंड ब्लोइंग है। मतलब हमारी
  1199. 46:34बॉन्डिंग और हमारा स्ट्रेस दोनों का
  1200. 46:36केमिकल सोर्स हार्ट के पास ही है।
  1201. 46:38सही पकड़ा आपने। और तीसरा रास्ता है
  1202. 46:40बायोफिजिकल पाथवे। जब दिल धड़कता है तो वो
  1203. 46:44खून की नालियों में एक ब्लड प्रेशर वेव
  1204. 46:47बनाता है।
  1205. 46:47एक प्रेशर वेव।
  1206. 46:48हां। एक दबाव की लहर जो सीधे दिमाग तक
  1207. 46:51जाती है और यह लहर हमारे ब्रेन वेव्स को
  1208. 46:55जैसे अल्फा वेव्स जो हमें रिलैक्स्ड फील
  1209. 46:58कराती हैं उनको बदल देती है। उनको
  1210. 47:00सिंक्रोनाइज करती है।
  1211. 47:01अल्फा वेव्स जो हमें क्रिएटिव भी बनाती
  1212. 47:03हैं।
  1213. 47:04एक्जेक्टली पर इन सब में जो चौथा रास्ता
  1214. 47:08है वो सबसे ज्यादा प्रोफाउंड है।
  1215. 47:10एनर्जेटिक पाथवे।
  1216. 47:11एनर्जेटिक? यह थोड़ा सैफाई साउंड कर रहा
  1217. 47:14है। [हंसी]
  1218. 47:15सई लगता है, पर प्योर साइंस है। हर लिविंग
  1219. 47:18सेल एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड बनाता
  1220. 47:21है। पर दिल का फील्ड सबसे अलग है। अगर हम
  1221. 47:24ब्रेन के फील्ड से उसको कंपेयर करें तो
  1222. 47:26दिल का फील्ड दिमाग से सात गुना ज्यादा
  1223. 47:29बड़ा होता है।
  1224. 47:30सात गुना बड़ा?
  1225. 47:31और अगर मैग्नेटिक पावर की बात करें तो वो
  1226. 47:33दिमाग से करीब 5,000 गुना ज्यादा पावरफुल
  1227. 47:36होता है।
  1228. 47:375,000 गुना। यह तो मतलब एक मैसिव
  1229. 47:40ब्रॉडकास्टिंग स्टेशन की तरह हो गया जो
  1230. 47:43लगातार कुछ ना कुछ ट्रांसमिट कर रहा है।
  1231. 47:45और यह फील्ड सिर्फ जिस्म के अंदर नहीं
  1232. 47:47रहता। यह हमारे जिस्म के बाहर 8 से 10 फीट
  1233. 47:50के रेडियस तक फैला होता है।
  1234. 47:528 से 10 फीट बाहर यह तो हमारे आसपास के
  1235. 47:55लोगों तक पहुंच रहा होगा। बिल्कुल पहुंचता
  1236. 47:57है। इस पर हम आगे और गहराई से बात करेंगे।
  1237. 48:00पर पहले इस ब्रॉडकास्टिंग स्टेशन के अंदर
  1238. 48:03क्या चल रहा है वो समझते हैं।
  1239. 48:04हां क्योंकि आम जिंदगी में जब लोग स्ट्रेस
  1240. 48:07में होते हैं, ऑफिस की टेंशन होती है या
  1241. 48:09पर्सनल इश्यूज होते हैं तो अक्सर दिमाग
  1242. 48:11पूरी तरह से फोग्ड हो जाता है। धुंधला हो
  1243. 48:13जाता है। कुछ समझ नहीं आता। उस वक्त यह
  1244. 48:15दिल क्या कर रहा होता है?
  1245. 48:17उस वक्त जो होता है उसे एचआरवी यानी हार्ट
  1246. 48:21रेट वेरिएबिलिटी से समझा जा सकता है।
  1247. 48:23देखिए एक हेल्दी हार्ट हमेशा एक फिक्स्ड
  1248. 48:26स्पीड से नहीं धड़कता। वो अलग-अलग
  1249. 48:28सिचुएशंस को अडप्ट करता है।
  1250. 48:30मतलब उसकी स्पीड घटती बढ़ती रहती है।
  1251. 48:32हां। पर जब कोई इंसान लगातार स्ट्रेस में
  1252. 48:35होता है, गुस्से या एंग्जायटी में होता है
  1253. 48:38तो यह जो धड़कन का पैटर्न है वो
  1254. 48:40इनकोहेरेंट हो जाता है। एकदम क्यटिक या
  1255. 48:43जैगिड।
  1256. 48:44जैसे एक रेडियो पर स्टैटिक नॉइज़ आ रही
  1257. 48:47हो। सही एनालॉजी है। एक बहुत ही बिखरा हुआ
  1258. 48:49सिग्नल दिमाग को जाता है और तब वह होता है
  1259. 48:53जिसका जिक्र आपने शुरू में किया था कि
  1260. 48:55माइंड चेंज चाहता है पर बॉडी पास्ट को
  1261. 48:58रिपीट करती है।
  1262. 48:59हां, वही कॉन्फ्लिक्ट कि बॉडी को उस
  1263. 49:01स्ट्रेस की आदत पड़ चुकी है।
  1264. 49:03जब सेम इमोशंस रोज रिपीट होते हैं, तो
  1265. 49:06बॉडी उन इमोशंस की एक आदत बना लेती है। एक
  1266. 49:10ट्रेंड इंस्ट्रूमेंट की तरह बॉडी उस केओस
  1267. 49:13को ही अपना नॉर्मल स्टेट मान लेती है।
  1268. 49:15दिमाग शायद कह रहा हो कि काम डाउन पर बॉडी
  1269. 49:18कहती है नहीं मुझे मेरा वो रोज वाला
  1270. 49:21स्ट्रेस हॉर्मोन चाहिए।
  1271. 49:23ये तो एक तरह की मसल मेमोरी हो गई। एक
  1272. 49:25इमोशनल ऑटो पायलट जिससे बाहर निकलना बहुत
  1273. 49:28मुश्किल होता होगा।
  1274. 49:29बहुत मुश्किल होता है क्योंकि दिमाग चेंज
  1275. 49:32चाहता है पर बॉडी ऑटोमेटिकली रिएक्ट कर
  1276. 49:35रही होती है। कॉर्पोरेट दुनिया में यह
  1277. 49:37बहुत आम है। जैसे एक आईटी मैनेजर की कहानी
  1278. 49:39ले लीजिए राहुल।
  1279. 49:40हां राहुल उसका प्रोजेक्ट काफी डिले हो
  1280. 49:42गया था ना। क्लाइंट नाराज थे? क्लाइंट
  1281. 49:44नाराज, मैनेजमेंट का प्रेशर, वह दिन में
  1282. 49:4715-15 घंटे स्क्रीन के सामने बैठकर काम कर
  1283. 49:50रहा था। उसकी बॉडी पूरी तरह से उस इमोशनल
  1284. 49:53हैबिट में उस स्ट्रेस लूप में फंस चुकी
  1285. 49:56थी।
  1286. 49:56उस स्ट्रेस लूप में जहां उसका अमेगडला
  1287. 49:58लगातार अलार्म बजा रहा था।
  1288. 50:00बिल्कुल। बॉडी में कॉर्टिसॉल भरा हुआ था
  1289. 50:03और इसकी वजह से उसका हार्ट रिदमम पूरी तरह
  1290. 50:05इनकोहेरेंट था। जब हार्ट से ऐसी नॉइज़
  1291. 50:08दिमाग को जाती है तो दिमाग का प्रीफ्रंटल
  1292. 50:11कॉर्टेक्स ऑफलाइन हो जाता है।
  1293. 50:13प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स यानी वो हिस्सा जो
  1294. 50:15प्रॉब्लम सॉल्विंग करता है। नया आईडिया
  1295. 50:17सोचता है।
  1296. 50:18राइट? वो शटडाउन हो गया था। राहुल को लग
  1297. 50:21रहा था कि वो और ज्यादा ओवरथिंकिंग करके
  1298. 50:24प्रॉब्लम सॉल्व कर लेगा। पर बायोलॉजिकली
  1299. 50:26उसका दिमाग उस हालत में था ही नहीं।
  1300. 50:28क्योंकि उसकी बॉडी माइंड से पहले रिएक्ट
  1301. 50:30कर रही थी। वो सेम ओल्ड फीलिंग ऑफ़
  1302. 50:32पैनिकिक।
  1303. 50:33एक्जेक्टली। और इस लूप को तोड़ने के लिए
  1304. 50:36उसने जो किया वो सुनने में बहुत छोटा लगता
  1305. 50:38है पर बायोलॉजिकली बहुत पावरफुल है।
  1306. 50:41उसने ब्रेक लिया था। राइट?
  1307. 50:43हां।
  1308. 50:43टेरेस पर गया था वो।
  1309. 50:44हां। जब उसकी वाइफ ने उसको फोर्स किया
  1310. 50:47ब्रेक लेने के लिए। वो टेरेस पर बैठा।
  1311. 50:50उसने काम के बारे में सोचना बंद किया और
  1312. 50:52अपनी टीम के एक जूनियर मेंबर की मेहनत को
  1313. 50:55याद किया। एक सच्ची अप्रिसिएशन फील की।
  1314. 50:58सिर्फ फील की। सोचा नहीं, फील किया। यह
  1315. 51:02डिस्टिंशन बहुत जरूरी है। उसने बॉडी को एक
  1316. 51:05नया इमोशन एक्सपीरियंस करना सिखाया और
  1317. 51:08जैसे ही उसने दिल से ग्रेटट्यूड या
  1318. 51:10अप्रिसिएशन महसूस किया, उसकी एचआरवी
  1319. 51:13कोहेरेंट हो गई। धड़कन का पैटर्न स्मूद हो
  1320. 51:16गया।
  1321. 51:17और तब जाकर दिमाग को एक क्लियर सिग्नल
  1322. 51:19मिला होगा।
  1323. 51:19हां, प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स वापस ऑनलाइन आ
  1324. 51:22गया और जो स्यूशन उसको हफ्तों से नहीं मिल
  1325. 51:25रहा था, वो 20 मिनट में सामने था। रियल
  1326. 51:28चेंज तब होता है जब बॉडी भी नए इमोशंस फील
  1327. 51:31करना सीखे।
  1328. 51:32यह बात सच में मतलब अंदरूनी तौर पर झकझोर
  1329. 51:35देने वाली है। हम बस दिमाग को पुश करते
  1330. 51:38रहते हैं। जबकि बॉडी को वो फीलिंग देना
  1331. 51:40जरूरी है। यही चीज एक और केस में भी दिखती
  1332. 51:43है सुनीता वाले केस में।
  1333. 51:44हां, वो ग्राफिक डिजाइनर
  1334. 51:46जिससे एक क्रिएटिव ब्लॉक हो गया था। मतलब
  1335. 51:48एक आर्टिस्ट के लिए तो उसकी क्रिएटिविटी
  1336. 51:50ही सब कुछ है। वो घंटों बैठी रहती थी पर
  1337. 51:52कुछ बन नहीं रहा था। क्योंकि क्रिएटिविटी
  1338. 51:54के लिए आपके नर्वस सिस्टम का सेफ फील करना
  1339. 51:57जरूरी है। सुनीता फ्रस्ट्रेशन के लूप में
  1340. 52:00थी और फ्रस्ट्रेट होने पर दिल फिर से इन
  1341. 52:03कोहेरेंट सिग्नल भेजता है। दिमाग रिस्क
  1342. 52:06लेने से डरता है। नए आइडियाज ब्लॉक हो
  1343. 52:08जाते हैं।
  1344. 52:09तो उसने अपनी बॉडी का यह इमोशनल स्टेट
  1345. 52:11चेंज कैसे किया?
  1346. 52:12उसने अपनी मां के साथ वक्त बिताया। बचपन
  1347. 52:15की यादों पर बात की। उन खुशगवार पलों में
  1348. 52:17उसकी बॉडी को वापस सेफ फील हुआ। उसकी बॉडी
  1349. 52:20उस पुराने स्ट्रेस पैटर्न से बाहर आई।
  1350. 52:23हार्ट रिदमम कोहेरेंट हुई।
  1351. 52:24और जैसे ही उसकी बॉडी रिलैक्स हुई, मैंने
  1352. 52:27इसके बारे में पढ़ा है कि जब बॉडी रिलैक्स
  1353. 52:29होती है और हार्ट कोहेरेंट होता है, तो
  1354. 52:31ब्रेन का डिफॉल्ट मोड नेटवर्क एक्टिव हो
  1355. 52:33जाता है।
  1356. 52:34बिल्कुल सही।
  1357. 52:34यह वो सिस्टम है जो हमारे बैकग्राउंड में
  1358. 52:37चलता है। जो रैंडम डॉट्स को कलेक्ट करता
  1359. 52:39है जब हम डायरेक्टली किसी चीज पर फोकस
  1360. 52:41नहीं कर रहे होते। तो सुनीता की
  1361. 52:42क्रिएटिविटी वापस आई क्योंकि उसके दिल ने
  1362. 52:45दिमाग को रिलैक्सेशन का सिग्नल भेजा।
  1363. 52:47एकदम ठीक। और यह बायोलॉजी सिर्फ कॉर्पोरेट
  1364. 52:50मीटिंग्स या आर्ट तक ही सीमित नहीं है।
  1365. 52:52जिंदगी के हर हिस्से पर इसका असर है। अगर
  1366. 52:55हम एग्जाम्स की बात करें जैसे प्रिया की
  1367. 52:57कहानी थी।
  1368. 52:58ओ प्रिया स्टूडेंट्स का तो स्ट्रेस लेवल
  1369. 53:00वापस में एक अलग ही लेवल पर होता है। उसको
  1370. 53:02एग्जाम से पहले कुछ याद ही नहीं हो रहा था
  1371. 53:03ना?
  1372. 53:04नहीं हो रहा था क्योंकि एग्जाम प्रेशर की
  1373. 53:07वजह से बॉडी स्ट्रेस में थी और उस पैनिकिक
  1374. 53:10स्टेट में दिमाग का हिपोकंपस ठीक से काम
  1375. 53:13नहीं करता।
  1376. 53:14हिप्पोकंपस जो मेमोरी रिटेन करता है।
  1377. 53:16हां। वो इंफॉर्मेशन रिटेन करना बंद कर
  1378. 53:19देता है। दिमाग चाहता है पढ़ना पर बॉडी डर
  1379. 53:23रही है। पर जब प्रिया की दादी ने उसको
  1380. 53:25किसी बात पर हंसाया उन्होंने एक खुशी का
  1381. 53:28पल शेयर किया। उस हंसी ने उस इमोशन ने
  1382. 53:32प्रिया के हार्ट में कोहिरेंस बनाई।
  1383. 53:34उसकी बॉडी को एक नया सिग्नल मिला। एक सेफ
  1384. 53:37सिग्नल।
  1385. 53:37और उसके बाद उसका मेमोरी सेंटर दोबारा खुल
  1386. 53:40गया और उसको पढ़ाई समझ आने लगी।
  1387. 53:42वाओ। और मुझे लगता है इसका सबसे बड़ा असर
  1388. 53:45हमारे रिश्तों पर होता होगा। अमित और नेहा
  1389. 53:47की बात करते हैं। यह कहानी बहुत रिलेटेबल
  1390. 53:49है। दोनों के बीच एक झगड़ा शुरू होता है
  1391. 53:51और बात इतनी बढ़ जाती है कि वह एक दूसरे
  1392. 53:53की बात समझ ही नहीं पा रहे थे।
  1393. 53:55यहां वो चौथा पाथवे काम कर रहा था जिसका
  1394. 53:58हमने जिक्र किया था एनर्जेटिक पाथवे।
  1395. 54:00वो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड जो बाहर तक
  1396. 54:03फैला होता है।
  1397. 54:03हां, जब अमित और नेहा झगड़ रहे थे, तो
  1398. 54:07उनके हार्ट फील्ड्स बहुत केटिक थे। अमित
  1399. 54:11का स्ट्रेस वाला एनर्जेटिक फील्ड नेहा के
  1400. 54:14नर्वस सिस्टम को ट्रिगर कर रहा था और नेहा
  1401. 54:17का फील्ड अमित को
  1402. 54:19ओ मतलब वो वर्ड से नहीं अपनी बॉडी की
  1403. 54:21एनर्जी से लड़ रहे थे। उनकी बॉडीज एक
  1404. 54:24दूसरे को थ्रेट मान रही थी।
  1405. 54:26एक्जेक्टली और इसलिए लॉजिक काम ही नहीं आ
  1406. 54:29रहा था। पर फिर अमित ने अलग जाकर कुछ देर
  1407. 54:32शांति से सांस ली। उसने एक पुरानी अच्छी
  1408. 54:36याद को दोबारा महसूस किया। अपनी बॉडी को
  1409. 54:39उस गुस्से से बाहर निकाला।
  1410. 54:40उसने बॉडी को नया इमोशन सिखाया। उसका
  1411. 54:43हार्ट फील्ड कोहेरेंट हुआ और जब वो वापस
  1412. 54:46आया तो बिना किसी नए आर्गुमेंट के सिर्फ
  1413. 54:50उसके शांत फील्ड ने नेहा के नर्वस सिस्टम
  1414. 54:53को भी रिलैक्स कर दिया।
  1415. 54:54उनका कम्युनिकेशन बेटर हो गया। बिना कुछ
  1416. 54:57बोले एक अजीब सी शांति से। यह बहुत
  1417. 54:59प्रोफाउंड है। तो सवाल यह उठता है कि इस
  1418. 55:04माइंड बॉडी कॉन्फ्लिक्ट को तोड़ने के लिए
  1419. 55:07लोग प्रैक्टिकली कर क्या सकते हैं? अगर
  1420. 55:09दिमाग एक स्टूडेंट है और दिल उसका टीचर है
  1421. 55:12तो हम टीचर को कैसे समझाएं?
  1422. 55:14लोग क्या करते हैं कि दिमाग की परेशानी को
  1423. 55:16सिर्फ सोच-सच कर ठीक करना चाहते हैं।
  1424. 55:18जबकि शुरुआत दिल से करनी पड़ेगी।
  1425. 55:20बॉडी से करनी पड़ेगी।
  1426. 55:21हां। और इसका सबसे प्रैक्टिकल और असरदार
  1427. 55:24तरीका है ब्रीथिंग। जी
  1428. 55:26जब आप धीरे-धीरे और ध्यान से सांस लेते
  1429. 55:28हैं, डेलिबेट ब्रीथिंग करते हैं, तो यह
  1430. 55:31सीधे आपकी वेगस नर्व को स्टिमुलेट करता
  1431. 55:34है।
  1432. 55:34वेगस नर्व को।
  1433. 55:35हां, और सिर्फ 7 से 90 सेकंड्स के अंदर
  1434. 55:38लगभग 1ढ़ मिनट में आपकी हार्ट रिदमम को ही
  1435. 55:41रिंट होने लगती है।
  1436. 55:42सिर्फ 1ढ़ मिनट में हम बॉडी का स्टेट चेंज
  1437. 55:44कर सकते हैं।
  1438. 55:45बिल्कुल कर सकते हैं। और दूसरा सबसे जरूरी
  1439. 55:48समय होता है सुबह का। उठने के बाद के पहले
  1440. 55:5120 मिनट।
  1441. 55:52क्यों उस वक्त क्या होता है? उस वक्त आप
  1442. 55:54जो इमोशनल स्टेट महसूस करते हैं, वह आपके
  1443. 55:57पूरे दिन का बायोलॉजिकल टेंपलेट सेट कर
  1444. 55:59देता है। अगर सुबह उठते ही आपने स्ट्रेस
  1445. 56:02फील किया या बॉडी पुरानी एंग्जायटी में
  1446. 56:04चली गई, तो पूरा दिन बॉडी उसको अपना
  1447. 56:07नॉर्मल स्टेट मानकर रिएक्ट करती रहेगी।
  1448. 56:09मतलब हमें उस आदत को सुबह ही तोड़ना होगा।
  1449. 56:12एक क्वाइट रियलाइजेशन देनी होगी बॉडी को।
  1450. 56:15यह वैसे काफी हद तक हमारी परंपराओं से
  1451. 56:17मिलताजुलता लग रहा है।
  1452. 56:18हमारी भारतीय परंपराओं ने इस बात को
  1453. 56:20हजारों साल पहले ही समझ लिया था। अगर आप
  1454. 56:22देखें तो हमारी संस्कृति में हृदय यानी
  1455. 56:25दिल को हमेशा से चेतना का कॉन्शियसनेस का
  1456. 56:29केंद्र माना गया है। दिमाग को नहीं।
  1457. 56:31सही बात है। हमेशा हृदय की बात होती है।
  1458. 56:34और जो प्रैक्टिससेस हमने बनाई हैं जैसे
  1459. 56:36विपासना मेडिटेशन हो गया या फिर बड़ी
  1460. 56:38जॉइंट फैमिलीज में एक साथ आकर खुशी मनाना
  1461. 56:41या सत्संग करना। हां, जहां बहुत सारे लोग
  1462. 56:44एक साथ बैठते हैं।
  1463. 56:45यह ऐसी प्रैक्टिससेस हैं जिन्हें हम ग्रुप
  1464. 56:47कोहेरेंस प्रैक्टिसेस कह सकते हैं। जब लोग
  1465. 56:50एक साथ बैठकर एक पॉजिटिव इमोशन महसूस करते
  1466. 56:53हैं तो उनके ओवरलैपिंग हार्ट फील्स एक
  1467. 56:56दूसरे को फायदा पहुंचाते हैं। एक साथ सबकी
  1468. 56:59बॉडी रिलैक्स होती है।
  1469. 57:01एक की शांति दूसरे की मदद करती है। यह
  1470. 57:03बहुत बहुत गहरा थॉट है कि ग्रेटट्यूड या
  1471. 57:07एप्रिसिएशन या शांति सिर्फ कोई फील गुड
  1472. 57:09एडवाइस नहीं है। ये पूरी तरह से बायोलॉजी
  1473. 57:12और न्यूरोकार्डियोलॉजी है।
  1474. 57:14पूरी तरह से साइंस है।
  1475. 57:15हम दिमाग को फोर्स करके कंट्रोल नहीं कर
  1476. 57:17सकते क्योंकि बॉडी अपनी पुरानी आदत
  1477. 57:20दोहराएगी। पर हम दिल को शांत करके बॉडी को
  1478. 57:23नए इमोशंस के लिए रिकंडीशन कर सकते हैं।
  1479. 57:25और जब बॉडी काम होती है तो दिमाग अपने आप
  1480. 57:28ही क्लियर हो जाता है।
  1481. 57:29इस विषय पर सोचते हुए एक आखिरी और बहुत ही
  1482. 57:32हैरान करने वाला ख्याल है जिसे मैं यहां
  1483. 57:34रखना चाहूंगी।
  1484. 57:35हां बताइए। जैसा हमने कहा कि दिल का
  1485. 57:37इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड हमारे जिस्म के
  1486. 57:40बाहर 8 से 10 फीट तक फैला होता है और यह
  1487. 57:44आसपास के लोगों के नर्वस सिस्टम को
  1488. 57:46प्रभावित करता है।
  1489. 57:47वही 8-10 फीट वाला रेडियस।
  1490. 57:49हां। तो सोचिए कि अगर बिना एक शब्द बोले
  1491. 57:53हमारा दिल हमारे आसपास के लोगों पर असर
  1492. 57:56डाल रहा है तो हम रोजाना अपने घर में अपने
  1493. 58:00ऑफिस में अनजाने में अपनी कौन सी अंदरूनी
  1494. 58:03इमोशनल स्टेट बाकी सबको ट्रांसमिट कर रहे
  1495. 58:06हैं
  1496. 58:07ये तो ये बहुत बड़ा सवाल है
  1497. 58:08हां
  1498. 58:09कि अगर हम अंदर से स्ट्रेस में हैं तो हम
  1499. 58:11वही स्ट्रेस बाहर फैला रहे हैं
  1500. 58:12और इसका उल्टा भी उतना ही सच है क्या
  1501. 58:15हमारी अंदरूनी शांति किसी और की उलझन को
  1502. 58:18सुलझा सकती है। अगर हम अपनी बॉडी को पास्ट
  1503. 58:21इमोशंस से आजाद कर लें तो क्या हमारी एक
  1504. 58:24क्वायट एक शांत स्टेट किसी और केटिक दिमाग
  1505. 58:28को आराम दे सकती है?
  1506. 58:30शायद हमें लगता है कि बदलाव बाहर से आएगा।
  1507. 58:33पर शुरुआत शायद इस क्वाइट रियलाइजेशन से
  1508. 58:36करनी होगी कि हमारी चुप्पी हमारी अंदरूनी
  1509. 58:40स्टेट ही सबसे बड़ी आवाज है। क्या हमारी
  1510. 58:42अंदरूनी शांति किसी और की उलझन को सुलझा
  1511. 58:45सकती है? शायद सबको आज थोड़ा ठहर कर इस
  1512. 58:49बारे में सोचने की जरूरत है। आज के इस
  1513. 58:50गहरे विश्लेषण की शुरुआत ना एक बहुत ही
  1514. 58:54हैरान करने वाले विचार से करते हैं।
  1515. 58:56बिल्कुल और आज का जो विषय है वो सच में
  1516. 58:59इंसान के शरीर और उसकी चेतना के बीच के
  1517. 59:01तालमेल को ना एक बिल्कुल नए नजरिए से
  1518. 59:04हमारे सामने रखता है। हां और यह पूरी
  1519. 59:06चर्चा मुख्य रूप से जो डिस्पेंजा की किताब
  1520. 59:08है बिकमिंग सुपर नेचुरल
  1521. 59:10उसका पांचवा अध्याय
  1522. 59:11जी बिकमिंग सुपर नेचुरल के पांचवे अध्याय
  1523. 59:14और प्राचीन भारतीय ज्ञान के उन वैज्ञानिक
  1524. 59:16प्रमाणों पर आधारित है जो आज की आधुनिक
  1525. 59:19दुनिया में बहुत ही ज्यादा प्रासंगिक हो
  1526. 59:21गए हैं।
  1527. 59:21सही बात है क्योंकि अक्सर हम देखते हैं कि
  1528. 59:24विज्ञान और सदियों पुराना ज्ञान अलग-अलग
  1529. 59:26दिशाओं में खड़े दिखाई देते हैं।
  1530. 59:28हां ऐसा लगता है जैसे दोनों की आपस में
  1531. 59:29कोई बनती ही नहीं है। बिल्कुल। लेकिन आज
  1532. 59:32जिस बारे में हम बात करने वाले है ना यानी
  1533. 59:34पाइनियल ग्लैंड।
  1534. 59:35दिमाग के बिल्कुल बीचोंबीच मौजूद वो छोटी
  1535. 59:37सी ग्रंथि।
  1536. 59:37हां, वही। जब पाइनियल ग्लैंड की बात आती
  1537. 59:40है ना तो विज्ञान और आध्यात्म दोनों एक ही
  1538. 59:43सच्चाई की तरफ इशारा करते हैं।
  1539. 59:45यह कोई रहस्यमई या मतलब जादुई बात नहीं
  1540. 59:48है।
  1541. 59:48नहीं, बिल्कुल नहीं। यह इंसान के
  1542. 59:50न्यूरोलॉजिकल सिस्टम की एक बहुत ही ठोस और
  1543. 59:53प्रमाणित वास्तविकता है।
  1544. 59:54और यही आज के इस विश्लेषण का मिशन भी है।
  1545. 59:57यह समझना कि कैसे इंसान की बायोलॉजी और
  1546. 1:00:00प्राचीन ज्ञान एक ही बात कह रहे हैं।
  1547. 1:00:02और जब इन स्रोत सामग्रियों को हम मिलाकर
  1548. 1:00:04देखते हैं तो एक बहुत बड़ा अहम मोमेंट आता
  1549. 1:00:07है।
  1550. 1:00:07हां कि कैसे हमारे दिमाग के ठीक बीचों-बीच
  1551. 1:00:09मौजूद एक बहुत ही छोटा सा हिस्सा हमारी
  1552. 1:00:12नींद को ही नहीं बल्कि पूरी वास्तविकता को
  1553. 1:00:15देखने के नजरिए को बदल सकता है। यह महज एक
  1554. 1:00:17बायोलॉजिकल स्विच नहीं है बल्कि धारणा और
  1555. 1:00:20चेतना को विस्तार देने का एक पूरा का पूरा
  1556. 1:00:22प्राकृतिक सिस्टम है जिसे सदियों से
  1557. 1:00:25पहचाना गया है।
  1558. 1:00:26तो अगर हम पाइनियल ग्लैंड की शारीरिक
  1559. 1:00:28बनावट और उसकी जगह से ही शुरुआत करें ना
  1560. 1:00:30तो प्रकृति का ये डिज़ाइन बहुत ही दिलचस्प
  1561. 1:00:33लगता है।
  1562. 1:00:33हां इसका आकार बहुत ही छोटा होता है।
  1563. 1:00:36मतलब महज एक चावल के दाने जितना करीब 8
  1564. 1:00:39मि.मी. का होता है ये।
  1565. 1:00:40बिल्कुल। और इसका जो रूप है वो एक पाइन
  1566. 1:00:42कोन जैसा होता है।
  1567. 1:00:43अच्छा तभी इसका नाम पाइनियल पड़ा है।
  1568. 1:00:46एक्जेक्टली और दिलचस्प बात ये है कि दिमाग
  1569. 1:00:49के ज्यादातर हिस्से जहां जोड़ों में या दो
  1570. 1:00:52हिस्सों में बटे होते हैं
  1571. 1:00:53जैसे लेफ्ट और राइट हेमिस्फेयर होते हैं
  1572. 1:00:55दिमाग में।
  1573. 1:00:56हां वैसे ही लेकिन ये जो ग्रंथि है ये
  1574. 1:00:58एकदम अकेली होती है। स्वतंत्र और दिमाग के
  1575. 1:01:01बिल्कुल केंद्र में स्थित होती है।
  1576. 1:01:03मेडिकल साइंस के मुताबिक इसका जो सबसे
  1577. 1:01:06स्थापित और जाना माना काम है वो है
  1578. 1:01:08मेलाटोनिन नाम का हार्मोन बनाना। हां जो
  1579. 1:01:11हमारी नींद के चक्र को नियंत्रित करता है।
  1580. 1:01:13जैसे ही हमारी आंखों में सूरज की रोशनी कम
  1581. 1:01:15होती है ना
  1582. 1:01:16तो यह ग्रंथि सक्रिय हो जाती है
  1583. 1:01:17और मेलाटोनिन को खून में छोड़ना शुरू कर
  1584. 1:01:20देती है जिससे शरीर को नींद आने लगती है।
  1585. 1:01:23नींद के इस चक्र को कंट्रोल करना इसका
  1586. 1:01:24बुनियादी काम है और आज का आधुनिक चिकित्सा
  1587. 1:01:26विज्ञान इसे बहुत अच्छी तरह समझता भी है।
  1588. 1:01:30लेकिन स्रोत सामग्री में जो सबसे चौंकाने
  1589. 1:01:33वाला तथ्य सामने आता है ना वो इसके अंदर
  1590. 1:01:36मौजूद खास तरह के न्यूरोसेल से जुड़ा है।
  1591. 1:01:38पाइनिलोसाइट्स राइट? हां, पाइनियल ग्लैंड
  1592. 1:01:41में पाइनियलोसाइट्स नाम के सेल्स होते
  1593. 1:01:44हैं। और न्यूरोलॉजी के अनुसार यह सेल्स
  1594. 1:01:48हमारी आंखों के फोटो रिसेप्टर सेल्स के
  1595. 1:01:50बिल्कुल समान होते हैं।
  1596. 1:01:51मतलब ये वही सेल्स हैं जो रोशनी को पकड़ने
  1597. 1:01:54या देखने का काम करते हैं।
  1598. 1:01:55बिल्कुल वही।
  1599. 1:01:56ये तथ्य मुझे व्यक्तिगत रूप से ना सबसे
  1600. 1:01:58ज्यादा अजीब लगा।
  1601. 1:01:59ऐसा क्यों?
  1602. 1:02:00मतलब इंसान की खोपड़ी के बिल्कुल बीचोंबीच
  1603. 1:02:02जहां गुप अंधेरा है।
  1604. 1:02:03हां, बाहर की रोशनी का कोई नामोनिशान नहीं
  1605. 1:02:06है वहां। वहां प्रकृति ने ऐसे सेल्स क्यों
  1606. 1:02:08दिए हैं जो रोशनी देखने के लिए बने हैं?
  1607. 1:02:10यह तो ऐसा ही हो गया है जैसे किसी गहरी
  1608. 1:02:12अंधेरी गुफा में जहां सूरज की कोई किरण
  1609. 1:02:14नहीं जाती वहां कोई दूरबीन लगा कर बैठा
  1610. 1:02:17हो।
  1611. 1:02:17ये बहुत ही सटीक उदाहरण है और इन
  1612. 1:02:20फोटोसेप्टर सेल्स का अंधेरे में मौजूद
  1613. 1:02:22होना किसी बहुत बड़े बायोलॉजिकल रहस्य की
  1614. 1:02:25तरफ इशारा करता है।
  1615. 1:02:26क्योंकि प्रकृति आमतौर पर बिना किसी वजह
  1616. 1:02:28के तो कोई संरचना विकसित नहीं करती। सही
  1617. 1:02:30बात है। अगर दिमाग के उस अंधेरे हिस्से
  1618. 1:02:33में रोशनी को महसूस करने वाले सेल्स हैं
  1619. 1:02:36तो इसका सीधा मतलब है कि शरीर के अंदर भी
  1620. 1:02:39एक प्रकार की ऊर्जा या रोशनी पैदा होती
  1621. 1:02:42है।
  1622. 1:02:42जिसे ये सेल्स पकड़ने के लिए बनाए गए हैं।
  1623. 1:02:44बिल्कुल। इसके अलावा एक और बड़ा
  1624. 1:02:47बायोलॉजिकल तथ्य यह है कि पाइनियल ग्लैंड
  1625. 1:02:50दिमाग के ब्लड ब्रेन बैरियर के बाहर होती
  1626. 1:02:53है।
  1627. 1:02:53हम जो कि न्यूरोलॉजी के हिसाब से एक बहुत
  1628. 1:02:56ही असाधारण बात है।
  1629. 1:02:57हां। इस ब्लड ब्रेन बैरियर को समझने के
  1630. 1:02:59लिए ना इसे दिमाग के एक वीआईपी सिक्योरिटी
  1631. 1:03:02गार्ड की तरह देखा जा सकता है।
  1632. 1:03:03हां, यह सुरक्षा व्यवस्था खून में मौजूद
  1633. 1:03:06हर रसायन या बाहरी तत्वों को सीधे दिमाग
  1634. 1:03:08में घुसने से रोकती है।
  1635. 1:03:10लेकिन हमारी यह पाइनल ग्लैंड इस वीआईपी
  1636. 1:03:12सुरक्षा घेरे के बाहर बैठी है।
  1637. 1:03:13जिसका मतलब है कि यह खून के सीधे संपर्क
  1638. 1:03:16में रहती है।
  1639. 1:03:17और इसी वजह से यह ग्रंथि खून में होने
  1640. 1:03:20वाले किसी भी रासायनिक बदलाव के प्रति
  1641. 1:03:22बेहद संवेदनशील होती है। और इसी पर डॉक्टर
  1642. 1:03:26रिक स्ट्रेसमैन जैसे शोधकर्ताओं की जो
  1643. 1:03:28विस्तृत रिसर्च है वह बताती है कि गहरी
  1644. 1:03:31ध्यान अवस्था जैसी खास परिस्थितियों में
  1645. 1:03:34यह पाइनियल ग्लैंड डीएमटी नाम का एक
  1646. 1:03:36शक्तिशाली रसायन भी पैदा कर सकती है।
  1647. 1:03:38हां डीएमटी यह एक प्राकृतिक न्यूरोट
  1648. 1:03:41ट्रांसमीटर है जो इंसान के देखने और महसूस
  1649. 1:03:44करने के तरीके को असाधारण रूप से विस्तृत
  1650. 1:03:47कर सकता है।
  1651. 1:03:47मतलब हमारी धारणा को पूरी तरह बदल सकता
  1652. 1:03:49है। बिल्कुल और शायद इन्हीं सूक्ष्म और
  1653. 1:03:52गहरे न्यूरोलॉजिकल गुणों के कारण ही 17वीं
  1654. 1:03:55सदी के मशहूर फ्रांसीसी दार्शनिक रेने
  1655. 1:03:59डिसकातेस ने इस ग्रंथि को एक खास नाम दिया
  1656. 1:04:02था।
  1657. 1:04:02जी उन्होंने इसे आत्मा का निवास या सीट ऑफ
  1658. 1:04:05द सोल कहा था।
  1659. 1:04:05हां। डिस्कार्टिस का यह विचार तो अपनी जगह
  1660. 1:04:08है। लेकिन जब हम हजारों साल पुराने भारतीय
  1661. 1:04:10ज्ञान को इस वैज्ञानिक परिप्रेक्ष में
  1662. 1:04:12देखते हैं ना तो सच में हैरानी होती है।
  1663. 1:04:15क्योंकि उस प्राचीन दौर में तो कोई एमआरआई
  1664. 1:04:17मशीन या स्कैनिंग तकनीक नहीं थी।
  1665. 1:04:20बिल्कुल नहीं थी। फिर भी भारतीय परंपराओं
  1666. 1:04:22ने बिना किसी मेडिकल चीर फाड़ के इस
  1667. 1:04:26ग्रंथि की सटीक जगह और इसके काम को किस
  1668. 1:04:28तरह पहचान लिया था? यह एक बहुत बड़ा रहस्य
  1669. 1:04:31है।
  1670. 1:04:32अगर हम प्राचीन ज्ञान के पन्नों को पलटें
  1671. 1:04:35तो इस ग्रंथि को अजना चक्र या छठे चक्र का
  1672. 1:04:38नाम दिया गया है।
  1673. 1:04:39जो दोनों भों के ठीक बीच में स्थित माना
  1674. 1:04:42जाता है।
  1675. 1:04:43और अगर आज के शरीर रचना विज्ञान यानी
  1676. 1:04:45एनाटॉमी के हिसाब से देखा जाए तो भों के
  1677. 1:04:48बीच से ठीक पीछे दिमाग के एकदम केंद्र में
  1678. 1:04:52पाइनियल ग्लैंड ही मौजूद है।
  1679. 1:04:54प्राचीन दर्शन में इसे इंट्यूशन या
  1680. 1:04:56अंतर्ज्ञान का केंद्र भी कहा गया है। एक
  1681. 1:04:58ऐसी जगह जहां से इंसान सामान्य आंखों से
  1682. 1:05:02परे की सच्चाई देख सकता है।
  1683. 1:05:04शिव की तीसरी आंख की कहानी भी इसी अजना
  1684. 1:05:06चक्र से जुड़ती है।
  1685. 1:05:07हां बिल्कुल।
  1686. 1:05:08अक्सर सामान्य कहानियों में तो यह बताया
  1687. 1:05:10जाता है कि शिव की तीसरी आंख खुलने का
  1688. 1:05:13मतलब विनाश है।
  1689. 1:05:14लेकिन अगर श्रोत सामग्री के आधार पर इसका
  1690. 1:05:16गहराई से विश्लेषण किया जाए तो यह तीसरी
  1691. 1:05:19आंख किसी बाहरी दुनिया को देखने या खत्म
  1692. 1:05:22करने का प्रतीक नहीं है।
  1693. 1:05:24तो यह असल में किस चीज का प्रतीक है? यह
  1694. 1:05:26असल में इंसान की अपनी अंदरूनी सच्चाई और
  1695. 1:05:29उन गहराइयों को देखने की क्षमता को
  1696. 1:05:32दर्शाती है जो रोजमर्रा के सामान्य
  1697. 1:05:34विचारों से बहुत परे हैं।
  1698. 1:05:36और यह सिर्फ एक दार्शनिक या अप्रतीकात्मक
  1699. 1:05:38विचार नहीं था।
  1700. 1:05:39नहीं बिल्कुल नहीं। प्राचीन भारतीय
  1701. 1:05:41परंपराओं में इस अजना चक्र को जागृत करने
  1702. 1:05:44के लिए पूरी वैज्ञानिक और न्यूरोलॉजिकल
  1703. 1:05:47तकनीकें विकसित की गई थी।
  1704. 1:05:49हम जैसे कि कश्मीर शैव धर्म में त्राटक का
  1705. 1:05:52अभ्यास होता है।
  1706. 1:05:53हां। जहां किसी एक बिंदु या दिए की लौ पर
  1707. 1:05:56बिना पलक झपकाए ध्यान केंद्रित किया जाता
  1708. 1:05:59है।
  1709. 1:05:59इसी तरह योग विज्ञान में शंभवी मुद्रा है
  1710. 1:06:02जिसमें आंखों को हल्का सा ऊपर और अंदर की
  1711. 1:06:04तरफ मोड़कर भौहों के बीच ध्यान लगाया जाता
  1712. 1:06:07है।
  1713. 1:06:08यानी यह सब सिर्फ धार्मिक कर्मकांड या कोई
  1714. 1:06:10अंधविश्वास नहीं थे।
  1715. 1:06:11बिल्कुल नहीं। यह अभ्यास सीधे तौर पर एक
  1716. 1:06:14तरह से पाइनियल ग्लैंड को सक्रिय करने के
  1717. 1:06:17लिए डिजाइन किए गए बायोलॉजिकल टूल थे। उस
  1718. 1:06:20समय की भाषा चाहे कितनी भी रहस्यमई लगती
  1719. 1:06:22हो, लेकिन उसके पीछे का न्यूरोलॉजिकल
  1720. 1:06:24विज्ञान
  1721. 1:06:25हम
  1722. 1:06:25बहुत ही सटीक था।
  1723. 1:06:27इस संगम को समझने के बाद ना यह सवाल उठना
  1724. 1:06:30लाजमी है कि यह पूरी प्रक्रिया वास्तव में
  1725. 1:06:32काम कैसे करती है?
  1726. 1:06:34हां। मतलब अगर कोई इंसान ध्यान करने बैठता
  1727. 1:06:36है तो उसके दिमाग के अंदर ऐसा क्या
  1728. 1:06:38बायोलॉजिकल बदलाव होता है कि यह ग्रंथि
  1729. 1:06:41सक्रिय हो जाती है?
  1730. 1:06:42स्रोत सामग्री इसके लिए ब्रेन वेव्स यानी
  1731. 1:06:45दिमाग की तरंगों का बहुत ही स्पष्ट
  1732. 1:06:47विज्ञान समझाती है।
  1733. 1:06:48इस प्रक्रिया को समझने के लिए हमें दिमाग
  1734. 1:06:50की गति और उसकी फ्रीक्वेंसी को समझना
  1735. 1:06:52होगा। आज की जो भागदौड़ वाली जिंदगी है
  1736. 1:06:55जहां लगातार काम का तनाव है, सोशल मीडिया
  1737. 1:06:58की नोटिफिकेशंस बज रही हैं
  1738. 1:07:00और हमेशा कल की चिंताएं लगी रहती हैं।
  1739. 1:07:02इन सब में दिमाग ज्यादातर बीटा वेव्स में
  1740. 1:07:04फंसा रहता है।
  1741. 1:07:05ये 13 से 30 हर्टz की फ्रीक्वेंसी होती
  1742. 1:07:07है।
  1743. 1:07:07हां।
  1744. 1:07:08अगर इसे एक आसान उदाहरण से समझा जाए ना तो
  1745. 1:07:10हर्ट्ज दिमाग के इंजन का आरपीएम या स्पीड
  1746. 1:07:14लिमिट है।
  1747. 1:07:14ये गाड़ी का उदाहरण बहुत अच्छा है।
  1748. 1:07:16बीता स्टेट में होना मतलब गाड़ी को पहले
  1749. 1:07:18गियर में रखकर एक्सीलरेटर पूरी तरह दबा
  1750. 1:07:21देना। यह एक ऐसा रडार सिस्टम है जो लगातार
  1751. 1:07:23बाहरी दुनिया से उलझने और खतरों को स्कैन
  1752. 1:07:26करने में व्यस्त रहता है।
  1753. 1:07:27और इस बीटा स्टेट में बहुत ज्यादा ऊर्जा
  1754. 1:07:30खर्च होती है। यही कारण है कि आज का इंसान
  1755. 1:07:33बिना कोई शारीरिक मेहनत किए भी मानसिक रूप
  1756. 1:07:36से थका हुआ महसूस करता है।
  1757. 1:07:38बर्न आउट का शिकार रहता है हमेशा।
  1758. 1:07:40बिल्कुल। लेकिन जब ध्यान का अभ्यास शुरू
  1759. 1:07:43होता है और सांसों की गति धीमी की जाती है
  1760. 1:07:46तो दिमाग की यह लहरें अपनी उच्च गति से
  1761. 1:07:49नीचे आने लगती हैं।
  1762. 1:07:50दिमाग बीटा से अल्फा अवस्था में आता है।
  1763. 1:07:53अल्फा वेव्स 8 से 12 हर्ट्ज की होती हैं
  1764. 1:07:56जो थोड़ी शांत रिलैक्स्ड और रचनात्मक
  1765. 1:07:58स्थिति है।
  1766. 1:07:59और जब ध्यान और गहरा होता है तो दिमाग
  1767. 1:08:01थीटा और डेल्टा अवस्था में चला जाता है।
  1768. 1:08:04जो 4 से 8 हर्ट्जर्ट्स की बहुत ही धीमी और
  1769. 1:08:07गहरी तरंगे होती है। इन धीमी तरंगों का
  1770. 1:08:09असर ना दिमाग के दूसरे हिस्सों और रसायनों
  1771. 1:08:12पर भी बहुत गहरा पड़ता है।
  1772. 1:08:14हां, जब दिमाग इस गहरी शांति में पहुंचता
  1773. 1:08:17है, तब हाइपोथैलेमिस जो दिमाग का एक अहम
  1774. 1:08:20हिस्सा है, वो शरीर में तनाव पैदा करने
  1775. 1:08:23वाले हॉर्मोंस का उत्पादन एकदम कम कर देता
  1776. 1:08:26है।
  1777. 1:08:26और जैसे ही शरीर से तनाव के रसायन कम होते
  1778. 1:08:29हैं, शरीर सेरोटिन का स्तर बढ़ाने लगता
  1779. 1:08:31है।
  1780. 1:08:31यह वही रसायन है जो हमें खुशी और शांति
  1781. 1:08:34महसूस कराता है। और यह सेरोटोनिन कोई
  1782. 1:08:36साधारण रसायन नहीं है बल्कि एक बहुत ही
  1783. 1:08:38महत्वपूर्ण कच्चा माल है।
  1784. 1:08:40सही कहा। पाइनियल ग्लैंड इसी सेरोटोनिन का
  1785. 1:08:43इस्तेमाल करके भारी मात्रा में मेलाटोनिन
  1786. 1:08:46और संभावित रूप से उस शक्तिशाली रसायन
  1787. 1:08:50डीएमटी का निर्माण करती है।
  1788. 1:08:52इस पूरे न्यूरोलॉजिकल चक्र से यह बात
  1789. 1:08:53साबित होती है कि इंसान की शांति सिर्फ एक
  1790. 1:08:56खालीपन या कुछ ना करने की स्थिति नहीं है
  1791. 1:08:59बल्कि यह शरीर के अंदर एक बहुत ही
  1792. 1:09:02शक्तिशाली और जटिल रासायनिक प्रक्रिया की
  1793. 1:09:04शुरुआत है। अब न्यूरोलॉजी के सिद्धांत को
  1794. 1:09:06सुनने के बाद अक्सर ऐसा लग सकता है कि यह
  1795. 1:09:09सारी बातें केवल किताबों तक सीमित हैं।
  1796. 1:09:11या फिर यह सिर्फ उन योगियों के साथ होता
  1797. 1:09:13है जो सालों से पहाड़ों पर गुफाओं में
  1798. 1:09:15बैठे हैं।
  1799. 1:09:15हां, लेकिन श्रोत सामग्री में असल जिंदगी
  1800. 1:09:18की कई ऐसी केस स्टडीज हैं जो यह दिखाती
  1801. 1:09:21हैं कि चेतना के विस्तार की यह प्रक्रिया
  1802. 1:09:24आम इंसानों के लिए भी पूरी तरह काम करती
  1803. 1:09:26है।
  1804. 1:09:27इसमें 20वीं सदी के प्रसिद्ध संत रमण
  1805. 1:09:29महर्षि का उदाहरण बहुत ही प्रासंगिक है।
  1806. 1:09:32रमण महर्षि की घटना ना इस बात का बहुत ही
  1807. 1:09:34सटीक और वास्तविक प्रमाण है कि चेतना का
  1808. 1:09:37विस्तार बिना किसी लंबी ट्रेनिंग के भी हो
  1809. 1:09:39सकता है।
  1810. 1:09:40जब वो महज 16 साल के थे उन्हें अचानक
  1811. 1:09:43मृत्यु का एक बहुत गहरा और भयानक डर सताने
  1812. 1:09:46लगा।
  1813. 1:09:46लेकिन इंसान की जो सामान्य प्रवृत्ति होती
  1814. 1:09:48है डर से भागने की उसके विपरीत वो उस डर
  1815. 1:09:51से भागे नहीं।
  1816. 1:09:52वो जमीन पर लेट गए और उन्होंने आत्म मंथन
  1817. 1:09:55शुरू किया।
  1818. 1:09:55खुद से यह गहरा सवाल पूछा कि आखिर यह मैं
  1819. 1:09:58कौन है जो मर जाएगा? और जब उन्होंने खुद
  1820. 1:10:00को इस गहरे सवाल में पूरी तरह झोंक दिया,
  1821. 1:10:03तो उनके दिमाग का शोर एकदम थम गया।
  1822. 1:10:05न्यूरोलॉजी के नजरिए से इस घटना को देखा
  1823. 1:10:07जाए तो उनका दिमाग उसी पल भयानक बीटा
  1824. 1:10:10स्टेट के तनाव और सर्वाइवल मोड से निकल कर
  1825. 1:10:13सीधे एक गहरी शांति में चला गया।
  1826. 1:10:15उन्होंने अपनी शारीरिक सीमाओं से परे एक
  1827. 1:10:18असीम चेतना का अनुभव किया। और यह
  1828. 1:10:20बायोलॉजिकल बदलाव सिर्फ कुछ खास संतों तक
  1829. 1:10:23सीमित नहीं है। एसएन गोय्वका द्वारा सिखाए
  1830. 1:10:26जाने वाले विपशना के 10 दिवसीय मौन
  1831. 1:10:29शिविरों का डाटा इसका एक बहुत बड़ा और
  1832. 1:10:31आधुनिक उदाहरण है।
  1833. 1:10:33हम इन शिविरों में कोई सन्यासी नहीं जाते
  1834. 1:10:35बल्कि आम लोग जाते हैं।
  1835. 1:10:37डॉक्टर्स, इंजीनियर्स और कॉर्पोरेट जगत
  1836. 1:10:39में भारी तनाव के बीच काम करने वाले लोग
  1837. 1:10:4210 दिन का मौन ना आज के दिमाग के लिए एक
  1838. 1:10:44बहुत बड़ा झटका होता है। बिल्कुल जो दिमाग
  1839. 1:10:47रोजाना डोपामिन स्क्रीन और बीटा वेव्स की
  1840. 1:10:49उच्च गति का आदि हो चुका है उसे जब अचानक
  1841. 1:10:5310 दिन तक कोई बाहरी इनपुट नहीं मिलता कोई
  1842. 1:10:56बातचीत नहीं होती
  1843. 1:10:57तो वो शुरुआत में तड़पता है लेकिन फिर
  1844. 1:10:59शांत होने पर मजबूर हो जाता है
  1845. 1:11:00और इसी लंबी शांति का परिणाम है कि विपशना
  1846. 1:11:03शिविरों में हिस्सा लेने वाले कई लोग अपने
  1847. 1:11:06अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि कुछ दिन
  1848. 1:11:09लगातार मौन में रहने के बाद
  1849. 1:11:11उन्हें अपने माथे के बिल्कुल बीच में एक
  1850. 1:11:13अजीब सा दबाव गरमा गर्माहट या स्पंदन
  1851. 1:11:16महसूस होने लगता है।
  1852. 1:11:17यह कोई शारीरिक बीमारी या दर्द नहीं होता।
  1853. 1:11:21विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो यह
  1854. 1:11:23दिमाग का लगातार अल्फा और थीटा स्टेट में
  1855. 1:11:27बने रहने का नतीजा है।
  1856. 1:11:28जिससे पाइनियल ग्लैंड सक्रिय होकर अपनी
  1857. 1:11:31भौतिक उपस्थिति का एहसास कराती है।
  1858. 1:11:34इसी कड़ी में भारत के पूर्व राष्ट्रपति और
  1859. 1:11:37महान वैज्ञानिक डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम
  1860. 1:11:40का उदाहरण भी एक बिल्कुल अलग नजरिया पेश
  1861. 1:11:43करता है।
  1862. 1:11:44हां कलाम साहब कोई सन्यासी या योगी तो थे
  1863. 1:11:46नहीं। वो एक रॉकेट साइंटिस्ट थे। जिनका
  1864. 1:11:49पूरा काम विश्लेषण और डाटा पर निर्भर था।
  1865. 1:11:52लेकिन अपनी आत्मकथा विंग्स ऑफ फायर में
  1866. 1:11:55उन्होंने साफ तौर पर बताया है कि उनके
  1867. 1:11:57जीवन के सबसे बेहतरीन और महत्वपूर्ण
  1868. 1:12:00वैज्ञानिक विचार किसी तनावपूर्ण विश्लेषण
  1869. 1:12:03या बहुत जोर देकर सोचने से नहीं आए। उनके
  1870. 1:12:05विचार उस गहरी आंतरिक शांति से निकले थे
  1871. 1:12:09जहां दिमाग के विचार पूरी तरह शांत हो
  1872. 1:12:11जाते हैं।
  1873. 1:12:12जब बाहरी शोर बंद होता है तभी इंसान चेतना
  1874. 1:12:15के उस स्तर तक पहुंच सकता है जहां से असल
  1875. 1:12:18रचनात्मकता जन्म लेती है।
  1876. 1:12:20यह दर्शाता है कि अजना चक्र या पाइनियल
  1877. 1:12:23ग्लैंड का जागरण सिर्फ आध्यात्मिक मोक्ष
  1878. 1:12:25के लिए नहीं है।
  1879. 1:12:27बल्कि दुनियावी और वैज्ञानिक और बौद्धिक
  1880. 1:12:30विकास के लिए भी उतना ही जरूरी है। कुंभ
  1881. 1:12:32मेले पर हुए शोध का जिक्र करना भी यहां
  1882. 1:12:35जरूरी हो जाता है।
  1883. 1:12:36हां, कुंभ मेले में करोड़ों लोगों की भीड़
  1884. 1:12:38होती है।
  1885. 1:12:38लेकिन इसके बावजूद वहां एक सामूहिक
  1886. 1:12:41श्रद्धा और शांति का माहौल बना रहता है।
  1887. 1:12:44वहां आए ज्यादातर लोग कोई औपचारिक ध्यान
  1888. 1:12:46तो करते नहीं है।
  1889. 1:12:47फिर भी शोधकर्ताओं ने पाया है कि उस
  1890. 1:12:50सामूहिक शांति में कई आम लोगों ने खुद को
  1891. 1:12:54अपने शरीर से बड़ा महसूस किया। यह इस बात
  1892. 1:12:57का बहुत बड़ा सबूत है कि जब सामूहिक रूप
  1893. 1:13:00से इंसान गहरी शांति का अनुभव करता है तो
  1894. 1:13:03पाइनियल ग्लैंड और ब्रेन वेव्स प्राकृतिक
  1895. 1:13:05रूप से एक नए तालमेल में आ जाते हैं।
  1896. 1:13:08यह सब समझने के बाद मन में स्वाभाविक रूप
  1897. 1:13:10से यह सवाल आता है कि ध्यान का वो असली
  1898. 1:13:13सफर कैसा होता है जो इंसान को इस ग्रंथि
  1899. 1:13:16के जागरण तक पहुंचाता है।
  1900. 1:13:18स्रोत सामग्री में ना इस सफर को बहुत ही
  1901. 1:13:20स्पष्ट रूप से पांच अलग-अलग चरणों में
  1902. 1:13:22बांटा गया है।
  1903. 1:13:23यह समझना बहुत जरूरी है कि ध्यान कोई
  1904. 1:13:26इलेक्ट्रॉनिक स्विच नहीं है जिसे दबाते ही
  1905. 1:13:28दिमाग तुरंत शांत हो जाए।
  1906. 1:13:30यह एक क्रमिक प्रक्रिया है।
  1907. 1:13:32धीरे-धीरे होने वाली
  1908. 1:13:33ध्यान के सफर का जो पहला चरण है उसे
  1909. 1:13:36शुरुआत का संघर्ष या एंट्री रेजिस्टेंस
  1910. 1:13:38कहा जाता है।
  1911. 1:13:39जब कोई इंसान आंखें बंद करके बैठता है तो
  1912. 1:13:42उसका दिमाग अपना नियंत्रण छोड़ना नहीं
  1913. 1:13:44चाहता। आंख बंद करते ही अचानक याद आने
  1914. 1:13:47लगता है कि बिजली का बिल भरना बाकी है या
  1915. 1:13:50फिर अचानक नाक पर खुजली होने लगती है।
  1916. 1:13:53यह असल में वो बीटा स्टेट है जो शांत होने
  1917. 1:13:56का विरोध कर रहा होता है और शरीर को वापस
  1918. 1:13:58बाहरी दुनिया में खींचना चाहता है।
  1919. 1:14:00जब इस शुरुआती संघर्ष को पार कर लिया जाता
  1920. 1:14:03है तब दूसरा चरण आता है जिसे सतह का शांत
  1921. 1:14:07होना कहते हैं।
  1922. 1:14:08कुछ मिनटों के बाद सांसे प्राकृतिक रूप से
  1923. 1:14:10धीमी पड़ने लगती हैं। विचारों की रफ्तार
  1924. 1:14:13कम हो जाती है और शरीर में एक हल्कापन
  1925. 1:14:15महसूस होने लगता है।
  1926. 1:14:17यहीं से असली मानसिक रिलैक्सेशन शुरू होता
  1927. 1:14:19है और इसके बाद तीसरा चरण शुरू होता है
  1928. 1:14:22जिसे गहराई कहते हैं।
  1929. 1:14:24इस गहराई वाले चरण में ना समय का एहसास
  1930. 1:14:26लगभग गायब होने लगता है।
  1931. 1:14:28इंसान को यह पता ही नहीं चलता कि आंखें
  1932. 1:14:30बंद किए हुए 10 मिनट बीते हैं या 1 घंटा।
  1933. 1:14:32विचार ना के बराबर रह जाते हैं और यही वह
  1934. 1:14:35जगह है जहां से चौथा चरण यानी दहलीज या द
  1935. 1:14:40थ्रेशहोल्ड की शुरुआत होती है।
  1936. 1:14:42यह अवस्था बहुत अहम है।
  1937. 1:14:44बिल्कुल यह दहलीज सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव
  1938. 1:14:47है। यहीं पर माथे के बीच उस दबाव या
  1939. 1:14:50गर्माहट का एहसास होता है। जिसका जिक्र
  1940. 1:14:53विपसना के अनुभव में आया था। यह वो पॉइंट
  1941. 1:14:56है जहां शरीर की ऊर्जा पाइनियल ग्लैंड पर
  1942. 1:14:59केंद्रित हो रही होती है।
  1943. 1:15:00और जब इस दहलीज को पूरी तरह पार कर लिया
  1944. 1:15:03जाता है तो पांचवा और अंतिम चरण आता है
  1945. 1:15:06जिसे चेतना का विस्तार कहते हैं।
  1946. 1:15:08इस अंतिम अवस्था में जागरूकता की कोई सीमा
  1947. 1:15:12नहीं रह जाती। ऐसा महसूस होता है जैसे
  1948. 1:15:14शरीर और कमरे की दीवारें मिट गई हैं।
  1949. 1:15:17इंसान एक खुले आसमान या असीम शून्य में
  1950. 1:15:20बदल गया है।
  1951. 1:15:21और इसी चरण में एक ऐसी घटना का उल्लेख
  1952. 1:15:24मिलता है जिसे प्राचीन भारतीय ग्रंथों में
  1953. 1:15:27ज्योति दर्शन कहा गया है।
  1954. 1:15:29यानी अंदर एक बहुत ही तेज और शुद्ध प्रकाश
  1955. 1:15:33का दिखाई देना।
  1956. 1:15:34आधुनिक विज्ञान इस आंतरिक प्रकाश को
  1957. 1:15:36पाइनियल ग्लैंड के उन फोटो रिसेप्टर सेल
  1958. 1:15:38से जोड़कर देखता है जिनकी चर्चा हमने
  1959. 1:15:40शुरुआत में की थी। जब इंसान इस गहरी, शांत
  1960. 1:15:44और असीम अवस्था में होता है तो वे सेल्स
  1961. 1:15:46दिमाग की अपनी ही इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी
  1962. 1:15:49पर प्रतिक्रिया करने लगते हैं।
  1963. 1:15:51यह कोई भ्रम या मात्र कल्पना नहीं है। यह
  1964. 1:15:54शरीर का अपना न्यूरोलॉजिकल सिस्टम है जो
  1965. 1:15:58ऊर्जा को प्रकाश के रूप में प्रस्तुत करता
  1966. 1:16:00है।
  1967. 1:16:01जो चीजें सदियों से जादुई या विशुद्ध
  1968. 1:16:03रहस्यमई लगती थी ना, उनके पीछे पूरी की
  1969. 1:16:06पूरी बायोलॉजिकल मशीनरी काम कर रही है। यह
  1970. 1:16:08समझना सच में बहुत सशक्त करने वाला है।
  1971. 1:16:10लेकिन इस पूरे विश्लेषण को आधुनिक जीवन के
  1972. 1:16:13चश्मे से देखना भी उतना ही जरूरी है।
  1973. 1:16:15आज के इस तेज तर्रार और हमेशा कनेक्टेड
  1974. 1:16:18रहने वाले दौर में रहने वाले किसी आम
  1975. 1:16:20इंसान के लिए इस जानकारी के क्या मायने
  1976. 1:16:22हैं?
  1977. 1:16:23आज की दुनिया विशेषकर शहरी जीवन एक भयानक
  1978. 1:16:26स्लीप क्राइसिस या नींद के संकट से गुजर
  1979. 1:16:29रही है।
  1980. 1:16:30स्क्रीन की नीली रोशनी, डिजिटल उपकरणों का
  1981. 1:16:33एडिक्शन और काम का लगातार दबाव। इन सब ने
  1982. 1:16:36इंसान के दिमाग को 24 घंटे बीटा स्टेट का
  1983. 1:16:39बंदी बना दिया है।
  1984. 1:16:40पाइनियल ग्लैंड जो नींद से लेकर गहरी
  1985. 1:16:43चेतना तक का मुख्य केंद्र है उसे अपना काम
  1986. 1:16:46करने के लिए गहरे अंधेरे और बाहरी शोर से
  1987. 1:16:49पूरी तरह कट जाने की जरूरत होती है।
  1988. 1:16:51जब तक वह शांति और अंधेरा नहीं मिलेगा,
  1989. 1:16:54मेलाटोनिन और अन्य महत्वपूर्ण रसायनों का
  1990. 1:16:57उत्पादन ठीक से नहीं हो पाएगा।
  1991. 1:16:59इसलिए दिन भर में थोड़ी देर के लिए ही
  1992. 1:17:01सही। स्क्रीन बंद करके दिमाग को शांत करना
  1993. 1:17:04कोई विलासिता नहीं है।
  1994. 1:17:06बल्कि अपनी ही खोई हुई बायोलॉजिकल क्षमता
  1995. 1:17:09को वापस पाने की एक बुनियादी जरूरत है।
  1996. 1:17:12यह समझना कि इंसान के शरीर में ही शांति,
  1997. 1:17:16स्पष्टता और उच्च चेतना के उपकरण जन्म से
  1998. 1:17:19मौजूद हैं। अपने आप में एक बहुत बड़ी
  1999. 1:17:21शक्ति है।
  2000. 1:17:22बाहर के शोर से कटकर ही इंसान इस अंदरूनी
  2001. 1:17:25सिस्टम को उसके सबसे बेहतरीन रूप में काम
  2002. 1:17:28करने का मौका दे सकता है। हमारी बायोलॉजी
  2003. 1:17:30हमेशा से इसी शांति के लिए डिजाइन की गई
  2004. 1:17:32है।
  2005. 1:17:32बिल्कुल।
  2006. 1:17:33इस पूरे गहरे विश्लेषण को समेटते हुए ना
  2007. 1:17:36स्रोत सामग्री से प्रेरित एक ऐसा विचार
  2008. 1:17:38सामने आता है जो सच में सोचने पर मजबूर कर
  2009. 1:17:41देता है।
  2010. 1:17:42वो क्या?
  2011. 1:17:42यह सोचने वाली बात है कि अगर इंसान के ही
  2012. 1:17:45दिमाग के बिल्कुल गहरे और अंधेरे हिस्से
  2013. 1:17:47में एक ऐसी ग्रंथि मौजूद है जो सिर्फ उसके
  2014. 1:17:50शांत होने का इंतजार कर रही है ताकि वह
  2015. 1:17:52शरीर के अंदर की ही एक अद्भुत रोशनी और
  2016. 1:17:54चेतना दिखा सके। तो इंसानी शरीर और
  2017. 1:17:56बायोलॉजी में ऐसे और कितने रहस्यमई सिस्टम
  2018. 1:18:00छिपे होंगे जो केवल इस बात का इंतजार कर
  2019. 1:18:03रहे हैं कि बाहर का शोर बंद हो और उनके
  2020. 1:18:05सक्रिय होने पर ध्यान दिया जाए।

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This page contains the full transcript of Becoming Supernatural Audiobook (Hindi) | जब Mind Reality को बदलने लगता है by Kitaab Nest, generated from the public captions YouTube serves with the video. The transcript has 14,329 words across 2,020 segments, with the original timestamps preserved so you can click any line to jump to that moment in the embedded player.

What you can do with it

Use the transcript to take notes, quote the speaker, build a study guide, generate a summary with ChatGPT or Claude via the YouTube Summary tool, or export it as a timed subtitle file with YouTube to SRT. You can also re-open it in the transcriber to translate the transcript into 100+ languages.

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