Becoming Supernatural Audiobook (Hindi) | जब Mind Reality को बदलने लगता है — Transcript
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- 0:00अगर तुम्हें किताबें पसंद हैं, लेकिन
- 0:02अक्सर लगता है कि उनके आइडियाज सिर्फ
- 0:05जल्दी-जल्दी समरीज में खत्म हो जाते हैं।
- 0:07तो शायद तुम सही जगह पर हो। यह है किताब
- 0:11नेस्ट। यहां हम किताबों को सिर्फ समराइज
- 0:13नहीं करते। हम उनके आइडियाज को धीरे-धीरे
- 0:16एक्सप्लोर करते हैं। ताकि एक किताब सिर्फ
- 0:18पेजेस और कोट्स का कलेक्शन ना लगे। बल्कि
- 0:21एक ऐसी सोच बन जाए जो तुम्हारी नजर को
- 0:24थोड़ा सा बदल दे।
- 0:25कभी नोटिस किया है? सुबह जब नींद खुलती
- 0:28है, तो उस पहले ही पल में माइंड में सबसे
- 0:30पहला ख्याल क्या आता है?
- 0:31हम्म, आंख खुलती है, कमरे में हल्की सी
- 0:34रोशनी आ रही होती है। लेकिन हमारा मन उस
- 0:36कमरे में होता ही नहीं है।
- 0:37बिल्कुल नहीं होता। असल में हम या तो कल
- 0:39रात की किसी अधूरी बातचीत में उलझे होते
- 0:42हैं या फिर आने वाले दिन की लंबी सी टू
- 0:44लिस्ट के बझ में दबे होते हैं।
- 0:46और मजे की बात यह है कि हमें लगता है कि
- 0:48हमारी आंखें खुली हैं। तो हम आज में जी
- 0:50रहे हैं। हम प्रेजेंट मोमेंट में हैं।
- 0:51है ना? मैं भी यही सोच रही थी कि हम बस
- 0:54मान लेते हैं कि हम यहां हैं। लेकिन अगर
- 0:56हम रिसर्च की तरफ देखें तो एक बहुत ही
- 0:58हैरान करने वाली बात सामने आती है कि एक
- 1:00आम इंसान दिनभर में जो 60 70 हजार विचार
- 1:04सोचता है उसका 95% हिस्सा हूबहू वही बातें
- 1:08होती हैं जो उसने एक दिन पहले सोची थी।
- 1:1095% मतलब यह सिर्फ एक डाटा पॉइंट नहीं है।
- 1:13यह इंसानी अनुभव की एक बहुत गहरी ट्रेजडी
- 1:16है।
- 1:16कैसे? मतलब आप इसे ट्रेजडी क्यों कहेंगे?
- 1:19क्योंकि इसका सीधा सा अर्थ यह है कि
- 1:21टेक्निकली तो हमारी सांसे आज में चल रही
- 1:23हैं। शरीर इस पल में है। लेकिन मेंटली हम
- 1:25एक बहुत ही लंबी और ना खत्म होने वाली
- 1:27टाइम ट्रैवल पर निकले हुए हैं।
- 1:28मेंटल टाइम ट्रैवल
- 1:30हां हमारा माइंड या तो 3 साल पहले घटी
- 1:32किसी बात को आज भी प्रोसेस कर रहा है या
- 1:34फिर 3 साल बाद क्या होगा उसकी काल्पनिक
- 1:36दुनिया बन रहा है। प्रेजेंट का जो पल है
- 1:38जो अभी है वो बस एक स्टेशन की तरह रह गया
- 1:40है।
- 1:41जहां से हम बस अतीत या भविष्य की ट्रेन
- 1:43पकड़ लेते हैं। रुकते कभी नहीं है।
- 1:45बिल्कुल रुकते कभी नहीं है। और जब तक हम
- 1:47इस टाइम ट्रैवल के लूप को नहीं समझेंगे यह
- 1:49नहीं देखेंगे कि हम अनजाने में पास्ट की
- 1:52यादों और फ्यूचर के एंग्जायटी में कैसे
- 1:54फंसे हैं। तब तक एक असली इनर साइलेंस या
- 1:57मेंटल आजादी महसूस कर पाना लगभग नामुमकिन
- 1:59है।
- 2:00लेकिन यहां मेरे माइंड में एक सवाल आ रहा
- 2:02है। अगर हमारा दिमाग हर वक्त पुरानी यादों
- 2:05के बेसिस पर फ्यूचर का अंदाजा लगा रहा है।
- 2:08तो क्या यह कोई डिज़ाइन फ्लॉ है? मतलब बचपन
- 2:11से तो हमें यही सिखाया जाता है कि अपने
- 2:13पास्ट से सीखो और आगे की प्लानिंग करो।
- 2:16सही बात है।
- 2:17तो फिर दिमाग का यह जो प्रेडिक्शन सिस्टम
- 2:19है, यह हमारे ही खिलाफ कैसे काम करने लगता
- 2:22है?
- 2:22असल में दिमाग का यह सिस्टम कोई खराबी
- 2:24नहीं है। यह हमारे इवोल्यूशन का एक बहुत
- 2:27बड़ा सर्वाइवल मैकेनिज्म है। लाखों साल
- 2:29पहले जब इंसान जंगलों में रहता था, तो
- 2:31झाड़ी की हर सरसराहट का मतलब एक शिकारी
- 2:34जानवर हो सकता था।
- 2:35तो, वहां दिमाग का काम बस हमें जिंदा रखना
- 2:37था। एक्जेक्टली। इसलिए माइंड हर पल आसपास
- 2:40से डाटा लेता है और पुरानी यादों से मैच
- 2:42करता है। जो जाना पहचाना है वो सेफ है और
- 2:45जो नया है वो खतरे जैसा महसूस होता है।
- 2:47हम्म तो समस्या तब शुरू होती है जब हम आज
- 2:50के इस मॉडर्न वर्ल्ड में भी उसी पुराने
- 2:53सर्वाइवल मोड में जी रहे होते हैं।
- 2:55हां क्योंकि आज झाड़ियों में कोई शेर नहीं
- 2:57छिपा है। लेकिन हमारा माइंड एक ईमेल को,
- 2:59किसी के इग्नोर किए हुए मैसेज को या बैंक
- 3:02बैलेंस को देखकर बिल्कुल वैसा ही रियेक्ट
- 3:05करता है जैसे किसी जंगली जानवर को देखकर
- 3:07करता था।
- 3:08मतलब दिमाग फर्क ही नहीं कर पाता कि असली
- 3:10खतरा कौन सा है और सिर्फ एक विचार से पैदा
- 3:13हुआ खतरा कौन सा है।
- 3:14बिल्कुल नहीं कर पाता। यह तो शरीर और
- 3:17दिमाग के कनेक्शन की बहुत अजीब सी स्थिति
- 3:19है। मुझे न्यूरो साइंस का वो कांसेप्ट याद
- 3:22आ रहा है कि जो न्यूरॉन्स एक साथ फायर
- 3:25करते हैं वो एक साथ वायर हो जाते हैं।
- 3:27हम्म न्यूरल पाथवेज।
- 3:29हां। तो अगर हम आपके उस सर्वाइवल वाले
- 3:32पॉइंट को इस न्यूरल पाथवे से जोड़ें तो
- 3:35क्या इसका मतलब यह है कि हम लगातार डरने
- 3:37या चिंता करने की प्रैक्टिस कर रहे हैं और
- 3:39उसमें एक्सपर्ट होते जा रहे हैं।
- 3:41बहुत सही तरह से पकड़ा आपने इसे। इसे ऐसे
- 3:43इमेजिन करें जैसे किसी मैदान में कच्ची
- 3:45जमीन पर घास उगी हो। पहली बार चलेंगे तो
- 3:48घास थोड़ी दबेगी रास्ता नहीं बनेगा।
- 3:50लेकिन अगर उसी रास्ते पर हम दिन में 100
- 3:53बार चलेंगे, हजारों बार चलेंगे तो एक
- 3:56पक्की पगडंडी बन जाएगी।
- 3:58और फिर आपके कदम बिना सोचे अपने आप उसी
- 4:00पगडंडी पर मुड़ जाएंगे। हमारे माइंड के
- 4:02न्यूरॉन्स के साथ भी हूबहू यही होता है।
- 4:05जब कोई चिंता का विचार बार-बार आता है तो
- 4:07माइंड में एक पक्का रास्ता एक न्यूरल
- 4:09हाईवे बन जाता है।
- 4:10और फिर वही भावना हमारी डिफॉल्ट आदत बन
- 4:13जाती है। हम अनजाने में ही उदास रहने के
- 4:16आदि हो जाते हैं और हमें लगता है कि यह
- 4:18हमारी पर्सनालिटी है।
- 4:19लोग कहते हैं ना कि मैं तो इंसान ही ऐसा
- 4:21हूं। मुझे जल्दी टेंशन हो जाती है जबकि वह
- 4:24उनकी पहचान नहीं है। वह बस एक बहुत गहरा
- 4:26न्यूरल पाथवे है।
- 4:27और इसका हमारे शरीर पर हमारे हॉर्मोंस पर
- 4:30जो असर होता है वो और भी गहरा है। मैं सोच
- 4:33रही थी कि अगर कोई इंसान पास्ट की किसी
- 4:36बहुत बुरी घटना को याद कर रहा है। किसी से
- 4:39हुई कोई बहस या कोई नुकसान तो शरीर तुरंत
- 4:42कॉर्टिसोल रिलीज करने लगता है।
- 4:44स्ट्रेस हॉर्मोन।
- 4:45हां। और सबसे अजीब बात यह है कि शरीर को
- 4:48पता ही नहीं होता कि यह घटना बाहर हो रही
- 4:51है या सिर्फ माइंड में।
- 4:52यही वो पॉइंट है जहां यह लूप सबसे ज्यादा
- 4:54महसूस होता है। शरीर बहुत वफादार है। वो
- 4:57बस केमिकल सिग्नल्स को समझता है। अगर
- 4:59माइंड किसी पुरानी दर्दनाक याद को एक
- 5:02फिल्म की तरह प्ले कर रहा है तो शरीर
- 5:05बिल्कुल वैसा ही रिएक्ट करेगा जैसे वो
- 5:07घटना अभी इसी पल घट रही हो।
- 5:10दिल की धड़कन तेज हो जाएगी। सांसे छोटी हो
- 5:13जाएंगी। शरीर लगातार उस अतीत के ट्रॉमा
- 5:16में जी रहा होता है।
- 5:18एक फिजिकल लूप बन जाता है। इसके बिल्कुल
- 5:20ऑोजिट जब हम पूरी तरह से प्रेजेंट मोमेंट
- 5:23में होते हैं। किसी काम में इतने डूबे
- 5:25होते हैं कि समय का पता ही ना चले। तब
- 5:27माइंड डोपामाइन रिलीज करता है
- 5:29जो हमें अलाइव महसूस कराता है। बॉडी को
- 5:32रिपेयर करता है।
- 5:33लेकिन हम प्रेजेंट में इतना कम रहते हैं
- 5:35कि शरीर को यह रिपेयर मोड बहुत कम मिल
- 5:37पाता है।
- 5:38मुझे लगता है कि इस मोमेंट में ना रह पाने
- 5:40की एक बहुत बड़ी वजह हमारा डिफॉल्ट मोड
- 5:43नेटवर्क भी है। डीएमएन मैंने कहीं पढ़ा था
- 5:46कि जब हम खाली बैठे होते हैं तो माइंड
- 5:48एकदम से भटकने लगता है।
- 5:50हम डिफॉल्ट मोड नेटवर्क इसे एक बहुत ही आम
- 5:54अनुभव से समझते हैं। कई बार हम ऑफिस से घर
- 5:56ड्राइव कर रहे होते हैं और अचानक घर आ
- 5:58जाता है।
- 5:59हां, याद ही नहीं रहता कि कब गैर बदला,
- 6:01कौन सा कट लिया।
- 6:03यह माइंड का ऑटो पायलट है। जब दिमाग को
- 6:05कोई बहुत ध्यान देने वाला काम नहीं करना
- 6:08होता है, तो यह नेटवर्क एक्टिव हो जाता है
- 6:10और इसका काम ही है ख्यालों में भटकना। एक
- 6:13रिसर्च का बहुत ही क्लियर कंक्लूजन था कि
- 6:15इंसान अपनी जागती हुई जिंदगी का लगभग आधा
- 6:18हिस्सा ख्यालों में भटकते हुए बिताता है।
- 6:21और शायद इसीलिए कहा जाता है कि एक भटकता
- 6:23हुआ मन एक दुखी मन होता है।
- 6:25बिल्कुल।
- 6:26लेकिन ऐसा क्यों है कि भटकता हुआ मन अक्सर
- 6:28बुरी बातों की तरफ ही जाता है। हम खाली
- 6:31बैठकर कुछ बहुत अच्छा क्यों नहीं सोचते?
- 6:33क्योंकि यहां फिर से वही इवोल्यूशन का रूल
- 6:36काम करता है। नेगेटिविटी बायस। दिमाग का
- 6:38झुकाव हमेशा उन चीजों की तरफ होता है जो
- 6:41गलत हो सकती हैं ताकि वह आपको सेफ रख सके।
- 6:44वो पुराने बुरे अनुभवों को कुरेदेगा ताकि
- 6:46वैसी गलती दोबारा ना हो। इसे बिना किसी
- 6:49बाहरी कारण के हम बस बैठे-बैठे स्ट्रेस
- 6:52क्रिएट कर लेते हैं।
- 6:53हां, और यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में
- 6:55बहुत साफ दिखता है। मान लीजिए कोई इंसान
- 6:58रात के 11:00 बजे अपने आरामदायक बिस्तर पर
- 7:00लेटा है। कमरे में शांति है।
- 7:02लेकिन उसका माइंड सुबह आई किसी ईमेल को
- 7:04लूप में दोहरा रहा है।
- 7:06वो शब्दों को डिकोड कर रहा है। टोन का
- 7:08अंदाजा लगा रहा है। उस ईमेल का सच में अब
- 7:10कोई वजूद नहीं है। पर उसकी नींद उड़ चुकी
- 7:13है। इस वक्त उसका नर्वस सिस्टम तो रेस्ट
- 7:15की स्टेट में बिल्कुल नहीं होगा। घटना को
- 7:18बीते हुए 12 घंटे हो चुके हैं। ऑफिस मीलों
- 7:21दूर है। लेकिन शरीर अभी भी फाइट या फ्लाइट
- 7:24मोड में है।
- 7:25बिस्तर पर लेते हुए भी वह एक अदृश्य युद्ध
- 7:27लड़ रहा है। यही है प्रेजेंट से पूरी तरह
- 7:29कट जाना।
- 7:30और यह शोर सिर्फ काम तक नहीं रहता। यह
- 7:32रिश्तों में भी आ जाता है। मान लीजिए कोई
- 7:35अपने पास्ट रिलेशनशिप में बहुत हर्ट हुआ
- 7:37है। अब आज वह एक नए और अच्छे इंसान के साथ
- 7:40है। सब ठीक है। लेकिन अचानक पार्टनर का
- 7:43रिप्लाई 2 घंटे लेट आता है।
- 7:44और माइंड खतरे की घंटी बजाने लगता है।
- 7:47हां, उसे लगता है कि फिर से वही सब हो रहा
- 7:50है। वो इस प्रेजेंट मोमेंट में रिएक्ट
- 7:52नहीं कर रही है। वो अपने पास्ट के चश्मे
- 7:55से आज को देख रही है। एमिक दला जो हमारा
- 7:58इमोशन सेंटर है वह एक फॉल्स फायर अलार्म
- 8:01की तरह काम करता है। उसमें पुराने दर्द की
- 8:04यादें इतनी स्ट्रांग होती हैं कि जरा सा
- 8:07ट्रिगर मिलते ही वो लॉजिक वाले हिस्से को
- 8:09शटडाउन कर देता है।
- 8:10मतलब वो इंसान अपने नए पार्टनर से बात ही
- 8:13नहीं कर रहा है। वो अतीत के किसी भूत से
- 8:15लड़ रहा है।
- 8:16यह बहुत ही गहरी बात है। हमारा माइंड ही
- 8:18हमारे लिए एक जेल बना देता है।
- 8:20और यही डर का लूप हमें लकवा मार जाने जैसी
- 8:23स्थिति में डाल देता है। जहां हम कुछ नया
- 8:25शुरू ही नहीं कर पाते। और एक बहुत बड़ा
- 8:27ट्रैप यह भी है कि हम अपनी आइडेंटिटी को
- 8:30ही अपना पास्ट बना लेते हैं। अगर कोई
- 8:32इंसान सालों से एक ही रूटीन में है वैसी
- 8:35ही शिकायतें कर रहा है तो उसकी पूरी
- 8:37पर्सनालिटी उसकी हिस्ट्री बन जाती है।
- 8:39इंसान एक चलती फिरती रिकॉर्डिंग बन जाता
- 8:41है।
- 8:42और जब किसी की पहचान उसका अतीत बन जाए तो
- 8:45उसके फ्यूचर में कुछ भी नया होने की
- 8:47पॉसिबिलिटी खत्म हो जाती है। क्योंकि कोई
- 8:49भी नया मौका आएगा तो वह उसे पुराने सांचे
- 8:52में ही फिट करने की कोशिश करेगा। यह सब
- 8:54सुनकर एक अजीब सी बेचैनी होती है कि हम
- 8:57कितने ऑटोमेटिक तरीके से जी रहे हैं और
- 8:59अगर हम अपने आसपास देखें खासकर अपनी
- 9:02फैमिलीज में या सोशल गैदरिंग्स में तो सब
- 9:04एक साथ बैठे होते हैं चाय पी रहे होते
- 9:06हैं। लेकिन क्या कोई सच में वहां मौजूद
- 9:09होता है?
- 9:09हम्म शायद ही कोई।
- 9:11ज्यादातर बातचीत या तो पास्ट की होती है
- 9:13कि 10 साल पहले क्या हुआ था या फ्यूचर की
- 9:16कि आगे क्या होगा। शरीर एक कमरे में है पर
- 9:19माइंड अलग-अलग टाइम जोन में है।
- 9:21हमारी कंडीशनिंग ही ऐसी हुई है। बचपन से
- 9:23सिखाया जाता है कि आज इच्छाओं को मार लो
- 9:26ताकि कल अच्छा हो सके। आज को हमेशा कल के
- 9:29लिए कुर्बान करने की ट्रेनिंग दी जाती है।
- 9:31यह एक ऐसी ट्रेडमिल है जो कभी रुकती नहीं
- 9:34है। क्योंकि जब वो कल आता है तो हम किसी
- 9:37नए कल की चिंता करने लगते हैं।
- 9:39प्रेजेंट तो बस एक सीढ़ी बन गया है फ्यूचर
- 9:41तक पहुंचने की। अपने आप में कोई मंजिल
- 9:43नहीं। और यह बात कोई नई नहीं है। अगर हम
- 9:46एंशिएंट विज़डम को देखें तो हजारों साल
- 9:49पहले भी यही बातें कही गई थी। चाहे वह
- 9:52भगवत गीता का योगस्थ गुरुकर्मानी हो कि
- 9:55पहले माइंड को स्थिर करो फिर काम करो।
- 9:58या बुद्ध का अनच्छा का कांसेप्ट कि सब कुछ
- 10:00बदल रहा है। बस यह पल ही सच है।
- 10:03हां। तो अब सवाल यह है कि अगर यह लूप इतना
- 10:06गहरा है तो इस मेंटल टाइम ट्रैवल को रोका
- 10:10कैसे जाए? हम इस ऑटो पायलट से बाहर कैसे
- 10:12आए? इसके लिए सबसे पहला और बहुत ही सिंपल
- 10:15तरीका है अपनी सांस को एक एंकर की तरह यूज
- 10:18करना।
- 10:19सांस ही क्यों? मतलब सांस पर ध्यान देना
- 10:22इतना असरदार क्यों होता है?
- 10:24क्योंकि हमारी सांस कभी पास्ट या फ्यूचर
- 10:26में नहीं जा सकती। आप कल की सांस आज नहीं
- 10:29ले सकते।
- 10:30हम सांस सिर्फ प्रेजेंट में होती है।
- 10:33बिल्कुल। जब हम सचेत होकर सांस लेते हैं
- 10:36जैसे 4 सेकंड अंदर, 4 सेकंड होल्ड और 4
- 10:39सेकंड बाहर तो यह सिर्फ ध्यान भटकाना नहीं
- 10:41है। यह नर्वस सिस्टम को सीधा मैसेज भेजता
- 10:44है कि आसपास कोई खतरा नहीं है।
- 10:46शरीर फाइट या फ्लाइट मोड से निकल कर रेस्ट
- 10:49मोड में आ जाता है।
- 10:50हां, यह शरीर को एहसास दिलाता है कि अभी
- 10:53सब सुरक्षित है।
- 10:54एक और तरीका है अपनी सेंसेस पर ध्यान
- 10:56देना। जैसे यह देखना कि हम क्या छू रहे
- 11:00हैं। आसपास क्या आवाजें हैं।
- 11:02क्योंकि विचार टाइम ट्रैवल कर सकते हैं।
- 11:04लेकिन हमारी सेंसेस हमेशा आज में ही कैद
- 11:07होती हैं।
- 11:08और इसके बाद एक और स्टेप आता है अपने
- 11:10विचारों का ऑब्जर्वर बनना। मतलब अपने ही
- 11:13थॉट्स को दूर से देखना।
- 11:15जैसे आसमान में गुजरते हुए बादल।
- 11:17हां, बादल काले भी हो सकते हैं, सफेद भी।
- 11:20पर आसमान कभी उनसे जुड़ता नहीं है। जब हम
- 11:23डरावने विचारों में उलझने के बजाय उन्हें
- 11:26बस देखते हैं तो एक आजादी सी महसूस होती
- 11:29है।
- 11:29यह एहसास होता है कि विचार अलग हैं और
- 11:32उन्हें देखने वाली अवेयरनेस बिल्कुल अलग
- 11:35है। हम विचार नहीं है।
- 11:37इसी से जुड़ा है इमोशनल बॉडी स्कैन। अक्सर
- 11:40हम भावनाओं को लॉजिक से सुलझाने की कोशिश
- 11:42करते हैं। लेकिन कहते हैं ना कि फील इट टू
- 11:46हील इट। हम भावनाओं से इतना भागते क्यों
- 11:49हैं? क्योंकि वह शरीर में बहुत
- 11:51अनकंफर्टेबल होती हैं।
- 11:53सीने में भारीपन या पेट में हलचल हम उस
- 11:56बेचैनी से बचने के लिए वापस ख्यालों में
- 11:58भाग जाते हैं।
- 11:59लेकिन जब तक हम उस भावना को शरीर में
- 12:02महसूस नहीं करेंगे वो रिलीज नहीं होगी।
- 12:04वो लूट में ही घूमती रहेगी।
- 12:06पर यहां एक डाउट आ सकता है कि अगर हम
- 12:09सिर्फ प्रेजेंट में रहें तो क्या हम
- 12:10फ्यूचर की प्लानिंग छोड़ दें? क्या
- 12:13प्रेजेंट में जीने का मतलब केयरलेस होना
- 12:15है? यह बहुत बड़ा मिथक है। प्रेजेंट में
- 12:18रहने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि
- 12:19प्लानिंग ना की जाए।
- 12:20तो दोनों में फर्क क्या है? प्लानिंग करना
- 12:23प्रेजेंट का एक कॉन्शियस काम है।
- 12:25आप बैठकर तय करते हैं कि अगले हफ्ते क्या
- 12:27करना है।
- 12:28आपका पूरा ध्यान उस प्रोसेस पर है।
- 12:30लेकिन चिंता करना पास्ट के डर से चलने
- 12:33वाला एक ऑटोमेटिक लूप है। प्लानिंग रास्ता
- 12:36साफ करती है। चिंता सिर्फ घुटन पैदा करती
- 12:38है।
- 12:39हम यह फर्क बहुत गहरा है। मतलब नए विचार,
- 12:43नई भावनाएं और नया एक्शन तभी मुमकिन है जब
- 12:47हम प्रेजेंट में हो। क्योंकि पास्ट में तो
- 12:49पुराने विचार थे और फ्यूचर अभी आया नहीं
- 12:51है। बदलाव की गुंजाइश सिर्फ इसी पल में
- 12:54है।
- 12:54जब ध्यान प्रेजेंट में आता है तो जिंदगी
- 12:57ऑटो पायलट से हट जाती है। इस पूरे
- 13:00एक्सपीरियंस को मैं एक छत के पंखे की तरह
- 13:02देखती हूं।
- 13:03हम कैसे?
- 13:04हमारा माइंड उस तेज चलते पंखे की तरह है।
- 13:06जब वो फुल स्पीड पर होता है तो सब धुंधला
- 13:09लगता है। कोई क्लेरिटी नहीं होती। बस
- 13:11भागते हुए विचार होते हैं।
- 13:12बिल्कुल। लेकिन जब हम अवेयरनेस को इस पल
- 13:15में लाते हैं तो लगता है जैसे किसी ने
- 13:18पंखे की स्पीड कम कर दी हो। विचार धीमे
- 13:20होने लगते हैं। धुंधलापन छटने लगता है और
- 13:24पंखुड़ियों के बीच की खाली जगह दिखने लगती
- 13:26है।
- 13:27हां वो खाली जगह वो शांति माइंड का वो
- 13:30लगातार चलने वाला बैकग्राउंड नॉइज़ जो
- 13:32पास्ट और फ्यूचर में भाग रहा था वो अचानक
- 13:35धीमा पड़ जाता है।
- 13:36हम
- 13:37और जो वो शोर रुकता है तो ऐसा नहीं लगता
- 13:39कि हमने उस शांति को कहीं बाहर से लाया
- 13:41है। वो हमेशा से वही थी। बस उस शोर में
- 13:44छिप गई थी। बॉडी तो हमेशा यहीं है। इसी पल
- 13:47में है।
- 13:48पर माइंड हमेशा कहीं और ट्रैवल कर रहा है।
- 13:51कभी सोचिएगा इस बारे में कि अगर मन का वो
- 13:54बैकग्राउंड शोर बस एक पल के लिए बिल्कुल
- 13:58शांत हो जाए तो क्या वो खामोशी बाहर से
- 14:01आएगी या वो हमेशा से हमारे अंदर ही थी। बस
- 14:04सुनाई नहीं दी।
- 14:06शायद वो हमेशा से थी। अगली बार जब मन यूं
- 14:08ही भटकने लगे किसी पुरानी याद में या कल
- 14:12की फिक्र में तो क्या एक गहरी सांस लेकर
- 14:14सिर्फ इस पल को देखा जा सकता है? उस आजादी
- 14:17को महसूस किया जा सकता है जो सिर्फ अभी
- 14:20में है। कभी-कभी यह बात बहुत गहराई से
- 14:22महसूस होती है। सुबह उठना वही पुराना
- 14:24अलार्म बजना, ऑफिस जाने का वही रास्ता और
- 14:28माइंड में लगातार चलने वाले वही पुराने
- 14:30विचार। हम जैसे जैसे कोई बैकग्राउंड नॉइज़
- 14:35हो या छत पर लगातार घूमते हुए पंखे की
- 14:37आवाज जिसे हम अक्सर नोटिस भी नहीं करते।
- 14:39बिल्कुल ऐसा लगता है जैसे शरीर तो इस पल
- 14:42में यहां मौजूद है लेकिन माइंड माइंड किसी
- 14:45और ही टाइम ज़ोन में चल रहा है।
- 14:46या तो वो कल की किसी बात का रिप्ले कर रहा
- 14:48है या फिर आने वाले कल की किसी चिंता में
- 14:50उलझा हुआ है।
- 14:51हां। और आज के इस डीप ड्राइव में जहां हम
- 14:54क्वांटम पॉसिबिलिटी और जो डिस्पेंजा के
- 14:57विचारों की गहराई में जा रहे हैं, इसका
- 14:59इमोशनल कोर यही है। ऐसा लगता है कि
- 15:02ज्यादातर लोग मतलब हम लोग एक्चुअली
- 15:04प्रेजेंट मोमेंट में जीते ही नहीं है।
- 15:06ये बहुत ही बहुत ही गहरी बात है। हमारा
- 15:09माइंड जो है ना वो लगातार मेंटल टाइम
- 15:11ट्रैवल करता रहता है। और इसी वजह से लाइफ
- 15:14ऑलमोस्ट एक ऑटोमेटिक मोड में चलती रहती
- 15:16है।
- 15:16हम जिसे हम रियलिटी कहते हैं। क्या वो सच
- 15:20में पहले से तय है या फिर हमारा जो ध्यान
- 15:23है, हमारी जो अवेयरनेस है, वह तय करती है
- 15:26कि हमें क्या दिखेगा।
- 15:28एक्चुअली जब हम इस शोर को इस मेंटल नॉइज़
- 15:31को थोड़ा शांत करते हैं तब समझ आता है कि
- 15:33हम दुनिया को वैसे नहीं देखते जैसी वो है।
- 15:36हम उसे वैसे देखते हैं जैसे हम खुद अंदर
- 15:39से हैं।
- 15:40मतलब हमारी मान्यताएं एक बहुत ही कड़े
- 15:43फिल्टर की तरह काम करती हैं।
- 15:45अगर हम क्वांटम फिजिक्स के डबल स्लिट
- 15:47एक्सपेरिमेंट की बात करें जो इस पूरे
- 15:49कांसेप्ट का एक बड़ा हिस्सा है तो वो बहुत
- 15:52कुछ ऐसा ही कहता है।
- 15:53हां वो एक्सपेरिमेंट जो है वो हमारे सोचने
- 15:55के तरीके को पूरी तरह से पलट देता है।
- 15:57बिल्कुल उसमें होता ये है कि जब तक
- 15:59पार्टिकल्स को यानी उन सूक्ष्म कणों को
- 16:02कोई ऑब्जर्व नहीं कर रहा होता तब तक वो एक
- 16:05साथ कई पॉसिबिलिटीज में एक तरंग की तरह
- 16:08मौजूद रहते हैं।
- 16:09पर जैसे ही
- 16:11जैसे ही अवेयरनेस आती है।
- 16:12हां जैसे ही कोई उन्हें ऑब्जर्व करता है
- 16:14उनका रूप एकदम से तय हो जाता है। वो एक
- 16:18ठोस पार्टिकल बन जाते हैं। और अगर इसे हम
- 16:21इंसानी जीवन पर लागू करें तो यह क्वांटम
- 16:24फील्ड और हमारा माइंड दोनों एक ही तरह से
- 16:27काम कर रहे हैं। जब हम दुनिया को एक सीमित
- 16:31अवसरों वाली जगह मानते हैं तो हम सिर्फ
- 16:34सीमाएं ही देख पाते हैं।
- 16:36क्योंकि हमारा माइंड उसी पास्ट के लूप में
- 16:39फंसा है।
- 16:39एक्सक्ट्ली।
- 16:40हम प्रेजेंट मोमेंट को ऑब्जर्व ही नहीं कर
- 16:41रहे हैं।
- 16:42एक्सैक्टली। न्यूरोबायोलॉजी में इसे
- 16:44रेटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम या आरएएस
- 16:47कहते हैं। हमारा दिमाग हर सेकंड लगभग 11
- 16:50मिलियन बिट्स डाटा प्रोसेस करता है।
- 16:5311 मिलियन
- 16:54यह तो
- 16:55बहुत बड़ा नंबर है।
- 16:56कमरे का तापमान, बाहर ट्रैफिक की आवाज,
- 16:58सांस लेने की रिदमम सब कुछ। लेकिन हम सचेत
- 17:02रूप से सिर्फ 40 या 50 बिट्स डाटा के
- 17:04प्रति ही जागरूक हो पाते हैं।
- 17:06तो बाकी का सारा डाटा माइंड हमारी जानकारी
- 17:08के बिना ही डिलीट कर देता है।
- 17:10हां। और यह तय कौन करता है कि क्या अंदर
- 17:13आएगा वो आर एस नाम का फिल्टर। और उस
- 17:16फिल्टर को प्रोग्राम करती हैं हमारी
- 17:18पुरानी यादें, हमारे डर, हमारी उम्मीदें।
- 17:21मतलब अगर अंदर से प्रोग्रामिंग है कि सब
- 17:24कुछ मुश्किल है तो माइंड नए अवसरों को
- 17:27बाहर ही रोक देगा।
- 17:28बिल्कुल। वो प्रेजेंट मोमेंट की शांति वो
- 17:31नई पॉसिबिलिटी कभी रजिस्टर ही नहीं होगी।
- 17:33अगर हम इसे अपने भारतीय समाज के एक आम
- 17:36मिडिल क्लास लूप के नजरिए से देखें तो ये
- 17:39बहुत साफ दिखता है। एक बहुत ही आम सोच है।
- 17:42हमारे जैसे लोग ज्यादा आगे नहीं जा सकते।
- 17:44हम यह एक बहुत ही स्ट्रांग इमोशनल रूप है।
- 17:47हां और जब इस सोच के साथ कोई कुछ नया करने
- 17:50की कोशिश करता है और फेल हो जाता है तो वो
- 17:53किस्मत को दोष देने लगता है। भविष्य से
- 17:56उम्मीद कम हो जाती है और फिर वही पुराने
- 17:58नतीजे मिलते हैं।
- 17:59और फिर माइंड कहता है दिखा मैं तो पहले ही
- 18:01कह रहा था। माइंड उसी पास्ट को रिपीट करता
- 18:04रहता है और भविष्य की ए्जायटी भी इन्हीं
- 18:06पास्ट मेमोरीज पर बेस्ड होती है।
- 18:08इस बिलीफ लूप की सांस्कृतिक जड़े भी बहुत
- 18:10गहरी हैं।
- 18:11बहुत गहरी है। पारिवारिक कहानियों से लेकर
- 18:13समाज में जो तुलना होती है वो शर्मा जी का
- 18:15बेटा वाला जो कांसेप्ट है वो माइंड में यह
- 18:17फीड कर देता है कि रिस्क लेना गलत है।
- 18:20हमारा एजुकेशन सिस्टम भी तो यही करता है।
- 18:22रटने पर इनाम मिलता है और गलती करने पर
- 18:26सजा। इसी वजह से इंसान प्रेजेंट में नई
- 18:28पॉसिबिलिटीज खोजना बंद कर देता है। अगर हम
- 18:30वेदांत की बात करें जो माया का कांसेप्ट
- 18:33है वह यही तो है। जो रियलिटी हम देख रहे
- 18:36हैं वो सिर्फ हमारा इल्यूजन है। हमारा
- 18:39फिल्टर है।
- 18:39और योग में जिसे चित्तवृत्ति निरोध कहा
- 18:42गया है।
- 18:43हां माइंड के भटकाव को रोकना। जो
- 18:45बैकग्राउंड नॉइज़ है उसे धीमा करना।
- 18:48क्योंकि साइलेंस शांति हमेशा वहां होती
- 18:51है। बस हमें वो सुनाई नहीं देती। यह जो
- 18:53थ्योरी है यह असल जिंदगी में कैसे काम
- 18:56करती है? अगर हम उन केस स्टडीज की बात
- 18:58करें जैसे रमेश की कहानी है। लखनऊ के रमेश
- 19:01जिनके पास एक बहुत ही सुरक्षित लेकिन उबाऊ
- 19:04सरकारी नौकरी थी।
- 19:05उनकी मान्यता थी कि नौकरी छोड़कर रिस्क
- 19:08लेना बेवकूफी है। यह उनका पास लूप था।
- 19:11पर जब अवेयरनेस अचानक से प्रेजेंट मोमेंट
- 19:14में आई, जब उन्होंने एक स्टार्टअप फाउंडर
- 19:16का वीडियो देखा, तो वो लूप टूट गया।
- 19:19उन्होंने नौकरी नहीं छोड़ी। बस उनका
- 19:21ध्यान, उनका अटेंशन शिफ्ट हो गया।
- 19:23उन्होंने रोज 2 घंटे एक नई स्किल सीखी और
- 19:278 महीने में ही उनकी फ्रीलांस इनकम उनकी
- 19:30सैलरी से ज्यादा हो गई।
- 19:31दुनिया नहीं बदली बस उनका फिल्टर बदल गया।
- 19:34और प्रिया का केस देखिए जो रिलेशनशिप से
- 19:37जुड़ा है। तीन असफल रिश्तों के बाद उसके
- 19:40माइंड ने यह मान लिया था कि रिश्ते हमेशा
- 19:43दर्द देते हैं।
- 19:44सेम मेमोरीज, सेम इमोशंस क्रिएट कर रहे
- 19:46थे।
- 19:47बिल्कुल। वो हर नए इंसान को उसी फिल्टर से
- 19:50देख रही थी। वो प्रेजेंट में थी ही नहीं।
- 19:52वो अपने पास्ट के दर्द को जी रही थी।
- 19:54पर जब उसने खुद को ऑब्जर्व करना शुरू
- 19:57किया, जब उसे समझ आया कि उसकी अपनी
- 19:59इनसिक्योरिटीज ही रिश्तों को खराब कर रही
- 20:02हैं, तब वो फिल्टर टूट गया।
- 20:04जैसे ही अवेयरनेस प्रेजेंट मोमेंट में आई,
- 20:06उसका बिहेवियर बदल गया। और विक्रम की
- 20:08कहानी भी तो ऐसी ही है। दो स्टार्टअप्स
- 20:10फेल होने के बाद उन्हें लगा कि इंडियन
- 20:13मार्केट में इनोवेशन की कोई कद्र नहीं है।
- 20:15यह उनका कंफर्मेशन बायस था। माइंड सिर्फ
- 20:18वही देख रहा था जो उसके फेल होने को सही
- 20:20ठहरा सके।
- 20:21पर उनके मेंटर का वो सवाल जो सफल हो रहे
- 20:24हैं वो क्या देख रहे हैं? उस एक सवाल ने
- 20:27उनका पूरा नजरिया बदल दिया।
- 20:29उनका मेंटल टाइम ट्रैवल रुका। उन्होंने
- 20:31पास्ट को छोड़कर प्रेजेंट को देखा और अपनी
- 20:34तीसरी कोशिश में वह सफल रहे। सुनीता की
- 20:36कहानी भी बहुत पावरफुल है। जयपुर की आर्ट
- 20:39टीचर जो मानती थी कि कला सिर्फ एक शौक है।
- 20:42इससे पैसे नहीं बनते।
- 20:44ये उनका बिलीफ था जो उन्हें ऑटोमेटिक मोड
- 20:46में चला रहा था।
- 20:47पर Instagram पर एक दूसरी लोकल आर्टिस्ट
- 20:49को सफल होते देखकर उनका फिल्टर टूट गया।
- 20:52उन्होंने अपनी तीन पेंटिंग्स ऑनलाइन डाली
- 20:55और एक बिक भी गई।
- 20:56और सबसे पेचीदा केस अर्जुन का है। 45 साल
- 20:59के अर्जुन जिन्हें टाइप टू डायबिटीज थी।
- 21:02उन्होंने मान लिया था कि यह जेनेटिक है और
- 21:04कुछ नहीं हो सकता। उनका आर एस फिल्टर इस
- 21:06कदर बंद था कि वह बीमारी को रिवर्स करने
- 21:09की कोई भी जानकारी रजिस्टर ही नहीं करता
- 21:11था।
- 21:11पर जब एक वर्कशॉप में उनका माइंड शांत
- 21:13हुआ, उनका वो फिल्टर खुला, तब उन्होंने 90
- 21:17दिन का प्रयोग किया, लाइफ स्टाइल बदला और
- 21:19सेहत में भारी सुधार हुआ।
- 21:21इन सभी कहानियों में एक बात कॉमन है।
- 21:24माइंड जब पास्ट या फ्यूचर में भटकना बंद
- 21:27करता है और अवेयरनेस प्रेजेंट में आती है,
- 21:30तभी मेंटल लूप्स ब्रेक होते हैं।
- 21:32तो ये बदलाव शुरू कैसे होता है? इसका
- 21:34मैकेनिज्म क्या है?
- 21:36इसके तीन मुख्य हिस्से हैं। इंटेंशन,
- 21:38इमोशन और अटेंशन। इंटेंशन यानी इरादा। यह
- 21:42सिर्फ कोई इच्छा नहीं है।
- 21:44यह माइंड के लिए एक जीपीएस प्रोग्रामिंग
- 21:46है।
- 21:47एक्जेक्टली। यह माइंड को नए पैटर्न खोजने
- 21:50का निर्देश देती है और इमोशन भावनाएं एक
- 21:54एंपलीफायर की तरह हैं।
- 21:55मतलब जो न्यूरॉन्स एक साथ फायर करते हैं
- 21:58वो आपस में जुड़ जाते हैं।
- 22:00हां वो नए न्यूरल पाथवे बनाते हैं। अक्सर
- 22:03जिस इंसान को निराशा की आदत हो गई है उसके
- 22:06माइंड को उम्मीद जैसी नई भावना एक खतरे
- 22:09जैसी लगती है।
- 22:10जैसे किसी घने जंगल में नई पगडंडी बनाना।
- 22:14बिल्कुल। और तीसरा है अटेंशन। जहां ध्यान
- 22:17जाता है वहां ऊर्जा बहती है।
- 22:19अगर हम इसे अपनी डेली लाइफ में उतारना
- 22:21चाहें तो कुछ बहुत ही प्रैक्टिकल टूल्स
- 22:24हैं। पहला है मॉर्निंग पॉसिबिलिटी
- 22:26प्रैक्टिस।
- 22:27यह बहुत ही सिंपल है।
- 22:28सुबह बस 10 मिनट के लिए अपनी किसी पुरानी
- 22:31मान्यता को पहचानना, उसे बिना जज किए
- 22:34देखना और एक अलग नजरिए की कल्पना करना।
- 22:38और उस दिशा में एक बहुत छोटा सा कदम
- 22:40उठाना।
- 22:40दूसरा टूल है द कंट्राडिक्शन कलेक्टर।
- 22:43अपनी सीमित मान्यताओं को तोड़ने वाले
- 22:45सबूतों को इकट्ठा करना, ऐसे लोगों को
- 22:47खोजना जो असंभव को संभव कर रहे हैं।
- 22:50और तीसरा द फ्रीक्वेंसी ऑडिट। अपने फोन का
- 22:54स्क्रीन टाइम देखना, अपनी बातचीत का ऑडिट
- 22:56करना कि क्या हम सिर्फ शिकायतें कर रहे
- 22:59हैं?
- 22:59और सुबह के पहले 10 विचारों पर ध्यान
- 23:01देना।
- 23:02यह सब सुनकर ऐसा लगता है कि हम सच में
- 23:05अपनी लाइफ को एक ऑटो पायलट मोड पर छोड़
- 23:07चुके हैं।
- 23:08हां। और जब इंसान यह नोटिस करना शुरू करता
- 23:10है कि माइंड हमेशा कहीं और होता है तो
- 23:12अवेयरनेस बहुत ही जेंटल तरीके से वापस आती
- 23:14है।
- 23:15विचारों का जो शोर है वो धीरे-धीरे धीमा
- 23:18होने लगता है।
- 23:19एक इनर साइलेंस एक खामोशी महसूस होने लगती
- 23:22है।
- 23:22हमारी रियलिटी की सीमा केवल हमारी
- 23:25मान्यताओं की सीमा है।
- 23:26जब हम अपना ध्यान बदलते हैं तो कई नए
- 23:28भविष्य संभव हो जाते हैं।
- 23:30दुनिया नहीं बदलती बस हमारा फिल्टर बदल
- 23:33जाता है।
- 23:34हम पास्ट के शोर से निकलकर फाइनली इस पल
- 23:37में आ जाते हैं। शायद शायद हम कभी
- 23:39प्रेजेंट में थे ही नहीं। और अब जब वह
- 23:41बैकग्राउंड नॉइज़ थोड़ी कम हुई है तो बस एक
- 23:44सवाल है जो हम सबको खुद से पूछना चाहिए।
- 23:46हम
- 23:47अगर हमारा माइंड लगातार हमारे पास्ट के
- 23:49अनुभवों के आधार पर इस प्रेजेंट मोमेंट को
- 23:52फिल्टर कर रहा है तो इस वक्त इसी सेकंड
- 23:56ऐसी कौन सी सच्चाई है? ऐसा कौन सा शानदार
- 23:59अवसर है जो हमारे ठीक सामने है बिल्कुल
- 24:02पास पर हमें दिखाई नहीं दे रहा क्योंकि
- 24:05हमने अपने माइंड को उसे देखने की इजाजत ही
- 24:07नहीं दी है। बस एक बार उस खामोशी को महसूस
- 24:11करें।
- 24:11अक्सर हम अस्यूम कर लेते हैं कि फ्यूचर भी
- 24:13पास्ट जैसा ही होगा।
- 24:15हम्म, यह बहुत ही कॉमन बिलीफ है।
- 24:17एक अजीब सी उलझन होती है ना हम सबके अंदर।
- 24:20एक बहुत ही डीप रिलेटिबल कॉन्फ्लिक्ट।
- 24:22माइंड कहता है कि मैं जानता हूं, मुझे
- 24:24चेंज करना चाहिए। नए रास्ते पर चलने का
- 24:27इरादा भी होता है।
- 24:28हां, नए रेजोलशंस बनते हैं। एक क्लियर विज़
- 24:31होता है कि अब जिंदगी को अलग तरीके से
- 24:34जीना है।
- 24:34राइट?
- 24:35पर फिर भी कुछ वक्त बाद एक अनजानी कशिश
- 24:38जैसे वापस उसी पुराने लूट में खींच लाती
- 24:41है। ऐसा लगता है जैसे बदलना नामुमकिन सा
- 24:43हो गया है। जैसे हम खुद अपनी ही आदतों के
- 24:46प्रिजनर बन गए हैं।
- 24:47यह सच में एक बहुत ही गहरी ह्यूमन
- 24:49एक्सपीरियंस है और यहां समझने वाली बात यह
- 24:52है कि दिक्कत हमारे विल पावर या इरादों
- 24:54में नहीं होती। इरादे तो सच में बहुत
- 24:56जेन्युइन होते हैं।
- 24:57तो फिर हम वापस वहीं क्यों पहुंच जाते
- 24:58हैं? प्रॉब्लम यह है कि हमारा माइंड अक्सर
- 25:01वही पॉसिबिलिटीज देखता है और वही रास्ते
- 25:04चुनता है जो उसने पहले एक्सपीरियंस किए
- 25:06हैं। एक तरह से देखा जाए तो हमारी बॉडी
- 25:10हमारे पुराने इमोशंस का एक लिविंग आर्काइव
- 25:13बन चुकी होती है। एक जीवित पुरा लेख।
- 25:16एक लिविंग आर्काइव। मतलब जो पास्ट में हुआ
- 25:18वो बॉडी में स्टोर हो गया है।
- 25:20बिल्कुल। जब तक इस आर्काइव को इस फिजिकल
- 25:23मेमोरी को चेंज नहीं किया जाता सिर्फ
- 25:25कॉन्शियसली सोचने से या नए प्लान्स बनाने
- 25:28से रियलिटी नहीं बदलती।
- 25:30और जब तक ध्यान उस पास्ट से उस आर्काइव से
- 25:32आजाद नहीं होता तब तक नए पोटेंशियलल्स और
- 25:35नए रास्ते एक घने कोहरे में छुपे रहते
- 25:37हैं। एक डेंस फॉग की तरह माइंड वही देख
- 25:40रहा है जो वो ऑलरेडी जानता है।
- 25:41सॉफ्ट ए्बिएंट।
- 25:42हां।
- 25:43और वो फोग तब तक नहीं हटता जब तक
- 25:45केमिस्ट्री चेंज ना हो। चलिए इसको थोड़ा
- 25:48अनपैक करते हैं। आखिर यह लिविंग आर्काइव
- 25:50बनता कैसे है? जब भी कोई इमोशन महसूस होता
- 25:53है, चाहे वह बहुत ज्यादा खुशी हो, गुस्सा
- 25:55हो या एंजायटी हो, हमारा ब्रेन ऐसे ही हवा
- 25:59में रिएक्ट नहीं करता। वो एक्चुअली एक
- 26:00स्पेसिफिक केमिकल कॉकटेल रिलीज करता है।
- 26:03एग्जैक्ट केमिस्ट्री प्ले आउट हो रही होती
- 26:06है वहां। न्यूरो पेप्टाइड्स और हॉर्मोनस
- 26:08तुरंत हमारे ब्लड के थ्रू ट्रेवल करना
- 26:09शुरू कर देते हैं और यह पूरे बॉडी में
- 26:11फैलने लगते हैं।
- 26:12यहां जो सबसे फैसनेटिंग बात है वो यह है
- 26:15कि ये केमिकल्स हमारी बॉडी के हर एक सेल
- 26:18तक पहुंचते हैं और हर सेल के सरफेस पर इन
- 26:21केमिकल्स को रिसीव करने के लिए छोटे-छोटे
- 26:24लॉक्स या रिसेप्टर्स होते हैं।
- 26:26जैसे एक ताले के लिए एक स्पेसिफिक चाबी
- 26:28होती है।
- 26:28हां, जैसे एक चाबी खास ताले में फिट होती
- 26:31है। वैसे ही हर इमोशन का केमिकल अपने
- 26:34स्पेसिफिक रिसेप्टर में फिट होता है। अब
- 26:37अम जब एक ही इमोशन बार-बार फील किया जाता
- 26:41है। मान लीजिए कोई सालों तक लगातार
- 26:43स्ट्रेस या सर्वाइवल मोड में रहा है तो
- 26:46बॉडी के सेल्स इन केमिकल्स के आधी हो जाते
- 26:49हैं।
- 26:50हैबचुएट हो जाते हैं।
- 26:51मतलब माइक्रोस्कोपिक लेवल पर एक तरह की
- 26:53एडिक्शन शुरू हो जाती है।
- 26:54एकदम वही प्रोसेस है। सेल्स अपने
- 26:57स्ट्रक्चर को चेंज कर लेते हैं ताकि वो उस
- 27:00फेमिलियर केमिकल जैसे कॉर्टिजॉल को और
- 27:02ज्यादा रिसीव कर सकें।
- 27:03जब किसी दिन बाहर कोई स्ट्रेस नहीं भी
- 27:05होता तो अंदर के सेल्स उस केमिकल की कमी
- 27:08महसूस करते हैं।
- 27:09उन्हें लगता है जैसे उनकी खुराक नहीं मिली
- 27:11आज।
- 27:11एक्जेक्टली। और फिर वो माइंड को वापस
- 27:14सिग्नल भेजते हैं ऐसे थॉट्स क्रिएट करने
- 27:16के लिए जो वापस उस स्ट्रेस केमिकल को
- 27:18रिलीज करवा सकें। यह तो बहुत ही अजीब और
- 27:21थोड़ा डरावना भी है। मतलब माइंड शायद
- 27:23शांति चाहता है। पर बॉडी अपना अलग ही
- 27:25प्रोग्राम चला रही है। और इस पूरे
- 27:27मैकेनिज्म में ब्रेन के एक छोटे से पार्ट
- 27:30हाइपोथैलेमस का रोल यहां एक ब्रिज जैसा
- 27:33लगता है जो इनविज़िबल
- 27:35थॉट्स को रियल फिजिकल केमिस्ट्री में
- 27:37कन्वर्ट कर रहा है।
- 27:38और इस ब्रिज की सबसे हैरान करने वाली बात
- 27:41पता है क्या है? इसकी कोई आंखें नहीं है।
- 27:44हाइपोथैलेमस का काम है इमोशनल स्टेट को
- 27:47रीड करके बॉडी को केमिकल इंस्ट्रक्शंस
- 27:50देना। पर उसे असली घटना और सिर्फ सोची हुई
- 27:53घटना के बीच का फर्क नहीं पता होता।
- 27:55एक रियल थ्रेट और एक इमेजिन मेमोरी दोनों
- 27:58उसके लिए एक बराबर है।
- 27:59हां।
- 28:01अगर किसी ने कल रात के किसी झगड़े के बारे
- 28:03में अगले दिन सोचा तो उसके माइंड में
- 28:05सिर्फ एक थॉट चल रहा है। पर बॉडी कुछ और
- 28:07ही एक्सपीरियंस कर रही है।
- 28:09हां हाइपोथैलेमिस तुरंत वही स्ट्रेस
- 28:11केमिकल्स वापस रिलीज करना शुरू कर देगा।
- 28:14बिल्कुल वैसे ही जैसे वो झगड़ा अभी इसी
- 28:17वक्त हो रहा हो। अगर दिन में चार बार उस
- 28:20पुरानी बुरी याद को रिकॉल किया गया तो
- 28:23बॉडी चार बार उस स्ट्रेस का रियल फिजिकल
- 28:25एक्सपीरियंस फेस करेगी। बॉडी के लिए वो
- 28:27पास्ट की बात नहीं है। पास्ट अभी उसके लिए
- 28:30प्रेजेंट रियलिटी बन चुका है।
- 28:31सही कहा। वो पास्ट को प्रेजेंटली लाइव कर
- 28:34रही है।
- 28:34इसको समझने के लिए एक बहुत ही खूबसूरत और
- 28:36थोड़ा ह्टिंग मेटाफॉर है पुराने राग का।
- 28:38जैसे एक क्लासिकल म्यूजिशियन होता है
- 28:40जिसने 20 साल तक एक ही राग बजाया हो। उसे
- 28:42अब उस राग को बजाने के लिए नोट्स या ताल
- 28:44के बारे में सोचना नहीं पड़ता।
- 28:46उसकी उंगलियां खुद ब खुद ढूंढ लेती हैं
- 28:48नोट्स को।
- 28:48बिल्कुल। सितार या हारमोनियम पर मसल
- 28:51मेमोरी इतनी स्ट्रांग होती है कि ध्यान
- 28:53कहीं और होने पर भी धुन परफेक्ट बजती है।
- 28:55हमारी बॉडी भी उस ट्रेंड म्यूजिशियन की
- 28:57तरह है। जब बॉडी पुराने इमोशंस का वो राग
- 29:00बिना सोचे अनकॉन्शियसली प्ले करने लगती है
- 29:04क्योंकि उसे बस वही एक धुन आती है। तो
- 29:06लाइफ इतनी प्रेडिक्टेबल और रुकी हुई लगने
- 29:09लगती है। बायोलॉजिकल प्रोग्रामिंग
- 29:11रोजमर्रा की जिंदगी को पूरी तरह से
- 29:14कंट्रोल करने लगती है।
- 29:15प्रेजेंट मोमेंट का सच जैसे कहीं खो जाता
- 29:18है। क्योंकि बॉडी तो अभी भी पास्ट की आग
- 29:20में ही चल रही है।
- 29:21और यह बायोलॉजिकल लूपिंग सिर्फ थ्योरी
- 29:23नहीं है। अगर ध्यान से देखें तो यह हमारे
- 29:26आसपास की जिंदगी को डायरेक्टली शेप कर रही
- 29:28है।
- 29:29हम ऐसे बहुत से रियल लाइफ सिनेरियोस हम
- 29:31रोज देखते हैं।
- 29:32जैसे जब कोई बिना किसी वजह के सुबह उठते
- 29:35ही हैवी चेस्ट और एंग्जायटी फील करता है।
- 29:38हालांकि दिन छुट्टी का है। बाहर मौसम
- 29:41अच्छा है। जॉब ठीक चल रही है। सब कुछ सेट
- 29:44होने के बावजूद आंख खुलते ही एक अनजानी सी
- 29:47बेचैनी घेर लेती है। यह इसलिए नहीं कि आज
- 29:51कोई स्ट्रेस है बल्कि इसलिए क्योंकि नर्वस
- 29:53सिस्टम ने बचपन की किसी फाइनेंशियल टेंशन
- 29:56को अपना डिफॉल्ट बेसलाइन बना लिया है। यह
- 29:59बहुत ही एक्यूरेट ऑब्जरवेशन है। उस इंसान
- 30:02का माइंड उस छुट्टी वाले दिन में मौजूद
- 30:04है। पर उसकी बॉडी अभी भी उस बचपन के घर
- 30:08में है जहां हमेशा इनसिक्योरिटी रहती थी।
- 30:11नर्वस सिस्टम को लगता है कि दुनिया ऐसी ही
- 30:14होती है। हमेशा अलर्ट रहना पड़ता है।
- 30:17हमेशा किसी बुरे वक्त के लिए तैयार रहना
- 30:19पड़ता है।
- 30:19हां, बॉडी उस सुबह की शांति पर विश्वास
- 30:22नहीं कर पाती। उसे शांति अनसेफ लगती है और
- 30:26वह वही फमिलियर कॉर्टिजोल मांगती है जिसकी
- 30:29वह आधी हो चुकी है।
- 30:30और सिर्फ इंडिविजुअल एंग्जायटी ही नहीं यह
- 30:33चीज ह्यूमन कनेक्शंस और प्यार में भी बहुत
- 30:35डीपली प्ले आउट करती है। ऐसे कई सिचुएशंस
- 30:37होते हैं जहां लोग इंटेलिजेंट हैं। अपनी
- 30:40लाइफ के पैटर्न्स को समझते हैं। फिर भी
- 30:42उनके रिलेशनशिप्स हमेशा एक ही तरह से
- 30:44क्यों टूट जाते हैं? एक ऐसी साइकिल बन
- 30:46जाती है जहां थोड़ी क्लोजनेस होती है। फिर
- 30:49कॉन्फ्लिक्ट होता है, डिस्टेंस बनता है और
- 30:51आखिर में सेपरेशन। इसका जवाब भी नर्वस
- 30:54सिस्टम के उसी आर्काइव में छुपा है। अगर
- 30:57बचपन में किसी ने प्यार को बहुत
- 30:59अनप्रिडिक्टेबल देखा था। जहां क्लोजनेस का
- 31:02मतलब हमेशा टेंशन और कॉन्फ्लिक्ट था तो
- 31:05नर्वस सिस्टम ने प्यार की डेफिनेशन ही
- 31:08केओस के साथ जोड़ दी है।
- 31:10तो प्यार का मतलब ही खतरा बन गया है
- 31:12सिस्टम के लिए।
- 31:12राइट? अब अगर कोई पार्टनर एक शांत, स्टेबल
- 31:16और कंसिस्टेंट प्यार देता है तो बॉडी को
- 31:19वो सिग्नल समझ ही नहीं आता। वो स्थिति
- 31:21अनजानी लगती है और इसलिए बोरिंग या
- 31:24अनकंफर्टेबल लगने लगती है।
- 31:26वहां वो पुराना केमिकल रश नहीं मिलता जो
- 31:28झगड़े या अनसर्टेनिटी से मिलता है। एक तरह
- 31:31से स्टेबिलिटी उस सिस्टम के लिए फॉरेन
- 31:33लैंग्वेज बन जाती है।
- 31:34कॉन्शियसली कोई भी कॉन्फ्लिक्ट को ढूंढ
- 31:36नहीं रहा होता। सब शांति ही चाहते हैं। पर
- 31:39बॉडी ऑटोमेटिकली ऐसी सिचुएशंस क्रिएट करती
- 31:43है। ऐसी बातों पर रिएक्ट करती है जिससे वो
- 31:46फिमिलियर टर्बुलेंस वापस आ जाए। क्योंकि
- 31:49बायोलॉजी के लिए वही टर्बुलेंस नॉर्मल और
- 31:51सेफ है।
- 31:52और इस लूप का एक और बहुत पावरफुल एग्जांपल
- 31:54एग्जाम हॉल्स में दिखता है। यह एक ऐसी
- 31:57सिचुएशन है जो शायद मिलियंस ऑफ स्टूडेंट्स
- 31:59ने फील की होगी। साल भर की मेहनत, कमरे
- 32:02में बैठकर सब कुछ याद होना पर जैसे ही
- 32:05एग्जाम हॉल का दरवाजा क्रॉस होता है और
- 32:07क्वेश्चन पेपर सामने आता है, सब कुछ
- 32:09ब्लैंक हो जाता है। एकदम फ्रीज।
- 32:12यह अचानक से नॉलेज गायब होने की बात नहीं
- 32:14होती।
- 32:15नहीं, यह पूरी तरह से एक सर्वाइवल
- 32:17रिस्पांस है। स्टूडेंट की बॉडी ने उस
- 32:19एग्जाम एनवायरमेंट को सालों से थ्रेट या
- 32:21खतरे की तरह कंडीशन कर लिया है। शेम का
- 32:24डर, एक्सपेक्टेशंस का बोझ, फ्यूचर की
- 32:26टेंशन तो हॉल में एंटर करते ही बॉडी फाइट
- 32:29ऑफ फ्लाइट मोड में चली जाती है।
- 32:31एड्रिनलिन और कॉर्टिसोल पूरी बॉडी में
- 32:33फ्लड हो जाते हैं वहां। और इस सर्वाइवल
- 32:35स्टेट में ब्रेन एक बहुत ही रेडिकल डिसीजन
- 32:37लेता है। ब्रेन का वह हिस्सा प्रीफ्रंटल
- 32:40कॉर्टेक्स जो लॉजिक और मेमोरी रिकॉल के
- 32:42लिए जरूरी है वह शट डाउन हो जाता है।
- 32:44क्योंकि जब दिमाग को लगता है कि सामने एक
- 32:46खतरनाक शेर खड़ा है तो उसे पोएट्री लिखने
- 32:49या मैथ इक्वेशन सॉल्व करने की जरूरत नहीं
- 32:51होती। उसे सिर्फ भागना होता है या फ्रीज
- 32:54होना होता है।
- 32:55बायोलॉजी अपना काम परफेक्टली कर रही है
- 32:57वहां पर। प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स की एनर्जी
- 33:00उन मसल्स की तरफ डायवर्ट हो जाती है जो
- 33:03भागने के लिए जरूरी हैं।
- 33:04यहां पर बात सच में बहुत इंटरेस्टिंग हो
- 33:06जाती है। क्योंकि इन तीनों सिचुएशंस में
- 33:08चाहे वो सुबह की अनक्लेन एंग्जायटी हो,
- 33:10रिलेशनशिप्स का बार-बार टूटना हो या
- 33:12एग्जाम में ब्लैंक हो जाना हो। हमारी बॉडी
- 33:14कोई गलती नहीं कर रही है। वो हमारे खिलाफ
- 33:16काम नहीं कर रही है।
- 33:17वो बस वही कर रही है जिसकी उसको ट्रेनिंग
- 33:19मिली है।
- 33:20हां, उसने केयरफुली वो सारा डाटा पास से
- 33:23सेव किया है और अब प्योर डिवोशन के साथ
- 33:25उसको अप्लाई कर रही है।
- 33:26सॉफ्ट ब्रेथ अगर हम इसको बिगर पिक्चर से
- 33:28कनेक्ट करें तो हमें इस बायोलॉजी की डीपर
- 33:31साइंस को देखना पड़ेगा। यह सिर्फ ब्रेन के
- 33:34अंदर बंद एक आइसोलेटेड मैकेनिज्म नहीं है।
- 33:37जैसे हमें अक्सर नर्वस होने पर पेट में
- 33:39बटरफाइस फील होती हैं या एसिडिटी और
- 33:42डाइजेशन के इश्यूज आते हैं। यह सिर्फ कहने
- 33:45की बात नहीं है। हमारे गट में यानी हमारे
- 33:47डाइजेस्टिव ट्रैक में करीब 100 मिलियन
- 33:50न्यूरॉन्स होते हैं।
- 33:51100 मिलियन। यह अपने आप में जैसे एक दूसरा
- 33:54दिमाग है जो कांस्टेंटली एनवायरमेंट को
- 33:57प्रोसेस कर रहा है।
- 33:58और इन दोनों दिमाग ब्रेन और गट के बीच एक
- 34:01बहुत ही वाइटल हाईवे होता है जिसे वेगस
- 34:03नर्व कहते हैं। यह एक टू वे कम्युनिकेशन
- 34:06केबल की तरह है। जब माइंड किसी स्ट्रेस या
- 34:08पुराने इमोशनल पैटर्न को रिकॉल करता है तो
- 34:11वेगस नर्व के जरिए वो सिग्नल एक
- 34:14इलेक्ट्रिक स्पीड से सीधा गट तक पहुंचता
- 34:16है।
- 34:16इसलिए डीप इमोशनल पैटर्न्स सीधा फिजिकल
- 34:19हेल्थ को डिसरप्ट करते हैं।
- 34:21बिल्कुल। इमोशन सिर्फ दिमाग में नहीं
- 34:23रहता। वो लिटरली फ्लश और टिश्यू का हिस्सा
- 34:26बन जाता है।
- 34:27और इस साइकिल को और भी ज्यादा रिजिड बनाता
- 34:29है हमारा ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम। एक ऐसी
- 34:32सोसाइटी में जहां कंपटीशन का प्रेशर और
- 34:34कास्टेंट हसल कल्चर इतना डोमिनेंट है
- 34:37हमारा नर्वस सिस्टम ऑलमोस्ट हमेशा
- 34:40सिंपैथेटिक मोड में फंसा रहता है। यानी
- 34:42हमेशा फाइट या फ्लाइट के लिए तैयार। एक
- 34:44हेल्दी सिस्टम की खूबसूरती उसके बैलेंस
- 34:47में होती है। सिंपैथेटिक मोड एक्शन के लिए
- 34:49है। पर पैरासिंैथेटिक मोड हमारी बॉडी का
- 34:52रेस्ट और रिपेयर स्टेट है। हीलिंग सिर्फ
- 34:55इस पैरासिंैथेटिक मोड में ही होती है। पर
- 34:57कास्टेंट लो ग्रेड स्ट्रेस की वजह से लोग
- 35:00इस रेस्ट करने वाले मोड में जाना जैसे भूल
- 35:03ही गए हैं। बॉडी हमेशा थोड़ी अलर्ट और
- 35:05डिफेंसिव पोजीशन में रहती है। जैसे हर
- 35:08वक्त किसी अनजाने खतरे का इंतजार कर रही
- 35:10हो। यह बिल्कुल ऐसा है जैसे किसी गाड़ी का
- 35:13एक्सीलरेटर हमेशा दबा हुआ हो और ब्रेक काम
- 35:15करना बंद कर दे। एक ऐसी ट्रेन जो अपने आप
- 35:18चली जा रही है।
- 35:19यह ट्रेन की पटरी का रूपक यहां बहुत गहराई
- 35:23से फिट बैठता है। एक हैवी आयरन ट्रेन वहीं
- 35:26जाएगी जहां उसके लिए लोहे की पटरियां बिछी
- 35:29हैं। ड्राइवर भले ही कितना भी विशु
- 35:32थिंकिंग करे कि उसे किसी नए शहर जाना है।
- 35:34सिर्फ डेस्टिनेशन के बारे में सोचने से
- 35:37ट्रेन हवा में नहीं मुड़ेगी। रास्ता बदलने
- 35:39के लिए उतर कर नई पटरियां यानी नए न्यूरल
- 35:42पाथवेज बिछाने पड़ते हैं और पुरानी
- 35:44पटरियों को यूज करना बंद करना पड़ता है।
- 35:47पॉज तो इस सब का आखिर मतलब क्या है? हम इस
- 35:51लूप को कैसे तोड़ें? नई पॉसिबिलिटीज तक
- 35:53पहुंचने का रास्ता कहां से शुरू होता है?
- 35:56सबसे पहला और सबसे जरूरी कदम कोई बहुत
- 35:59बड़ा फिजिकल एक्शन नहीं है। वो है प्योर
- 36:02अवेयरनेस। खुद को जज किए बिना अपने फिजिकल
- 36:06रिएक्शंस को ऑब्जर्व करना शुरू करना। जब
- 36:09अगली बार गुस्सा आए या चेस्ट में वो
- 36:12फमिलियर टाइटनेस फील हो तो यह नहीं सोचना
- 36:14कि मैं गुस्से में हूं या मैं हमेशा एशियस
- 36:17क्यों हो जाता हूं। बल्कि सिर्फ एक विटनेस
- 36:20की तरह देखना, नोटिस करना कि बॉडी में
- 36:22गुस्सा आ रहा है या बॉडी वही पुराना
- 36:24सर्वाइवल रिएक्शन दे रही है।
- 36:25हां, यह जो एक छोटी सी दूरी बनती है, यह
- 36:29जो पॉज क्रिएट होता है स्टिमुलस और
- 36:31रिएक्शन के बीच, यही वो स्पेस है जहां
- 36:34फ्री विल एक्सिस्ट करती है। यहीं से बदलाव
- 36:37शुरू होता है।
- 36:37उस छोटी सी स्पेस में अचानक से चॉइससेस
- 36:39नजर आने लगती हैं। और इन पैटर्न्स को
- 36:41डेलिब्रेटली इंटरप्ट करने के लिए मेडिटेशन
- 36:44एक बहुत ही प्रोफाउंड टूल बन जाता है।
- 36:46अक्सर लोग सोचते हैं कि मेडिटेशन सिर्फ
- 36:47रिलैक्स होने का तरीका है। आंख बंद करके
- 36:49शांति से बैठना ताकि थकान उतर जाए। पर
- 36:51साइंस इसको एक अलग ही एंगल से देखती है।
- 36:54मेडिटेशन सिर्फ एक मेंटल स्पा नहीं है। यह
- 36:57एक्चुअली बॉडी के ऑटोमेटिक इमोशनल
- 37:00प्रोग्राम को रोकने और उसे एक नया केमिकल
- 37:03एक्सपीरियंस देने का लैबोरेटरी प्रोसेस
- 37:05है।
- 37:06जब कोई ध्यान में बैठता है और जानबूझकर
- 37:09कॉन्शियसली एक नया इमोशन जैसे डीप
- 37:12ग्रेटट्यूड या पीस महसूस करने की कोशिश
- 37:14करता है तो वह एक्चुअली अपनी बॉडी की
- 37:17केमिस्ट्री को लाइव रीाइट कर रहा होता है।
- 37:19वह पुराने रास्ते से ध्यान हटाकर नए
- 37:22न्यूरल पाथवेज बना रहा होता है। और इस
- 37:25प्रोसेस में सबसे माइंड ब्लोइंग साइंटिफिक
- 37:27कांसेप्ट जो पिछले कुछ सालों में सामने
- 37:29आया है वो है एपीजेनेटिक्स। इसने ह्यूमन
- 37:33बायोलॉजी का पूरा वर्ल्ड व्यू ही बदल दिया
- 37:35है।
- 37:36पॉज। पहले हम सोचते थे कि जींस एक फिक्स्ड
- 37:39ब्लूप्रिंट है। जो डीएनए मिल गया वो
- 37:41डेस्टिनी बन गया। उसमें कोई बदलाव नहीं हो
- 37:43सकता। पर एपिजेनेटिक्स बताता है कि
- 37:46रियलिटी इससे बहुत अलग है।
- 37:48एपिजेनेटिक्स प्रूव करता है कि जींस
- 37:50एक्चुअली स्विचेस की तरह काम करते हैं।
- 37:53जैसे एक रूम में बहुत सारे लाइट स्विचेस
- 37:56हो वो सब वहां हैं। पर कौन सा ऑन होगा और
- 38:00कौन सा ऑफ यह एनवायरनमेंट तय करता है। और
- 38:03सेल का एनवायरनमेंट उसके आसपास के
- 38:06केमिकल्स हैं।
- 38:07यानी हमारे इमोशंस।
- 38:08बिल्कुल। जब हम कॉन्शियसली और
- 38:10कंसिस्टेंटली नए पॉजिटिव इमोशंस फील करते
- 38:14हैं तो बॉडी का केमिकल एनवायरनमेंट बदलता
- 38:16है। यह नया एनवायरनमेंट उन जींस के ऊपर
- 38:19लगे स्विचेस को ऑन कर देता है जो हेल्थ और
- 38:23सेल रिपेयर के लिए रिस्पांसिबल है और
- 38:25स्ट्रेस वाले जींस को ऑफ कर देता है।
- 38:28इसका मतलब है कि सिर्फ अपने अटेंशन को
- 38:29शिफ्ट करके हम अपने बायोलॉजिकल ब्लूप्रिंट
- 38:32में नए इंस्ट्रक्शंस लिख रहे होते हैं। हम
- 38:34लिटरली अपनी डेस्टिनी को सेल बाय सेल चेंज
- 38:37कर सकते हैं। सॉफ्ट ब्रेथ्स। यह सोचना ही
- 38:39कितना लिबरेटिंग और पावरफुल है। पर
- 38:42प्रैक्टिकल लाइफ में एक चीज जो सबसे
- 38:44ज्यादा चैलेंज करती है, वो यह है कि हमारी
- 38:46सोसाइटी ने हमें इंतजार करना सिखाया है।
- 38:49हम बाहरी बदलाव का वेट करते हैं।
- 38:52हां, हम सोचते हैं कि जब बैंक बैलेंस ठीक
- 38:54हो जाएगा, तब शांति फील करेंगे। जब
- 38:56रिलेशनशिप ठीक हो जाएगा, तब प्यार फील
- 38:58करेंगे। जब सक्सेस मिलेगी तब कॉन्फिडेंस
- 39:00आएगा। और बायोलॉजी यही सबसे बड़ा शिफ्ट
- 39:03मांगती है। फीलिंग को एक्सटर्नल रियलिटी
- 39:06से पहले आना होगा। बॉडी को वो नया इमोशन,
- 39:09सिक्योरिटी या लव आज और इसी वक्त महसूस
- 39:12कराना होगा ताकि वो उसकी नई आदत उसका नया
- 39:15बेसलाइन बन सके।
- 39:17जब तक बॉडी अंदर से सेफ फील नहीं करेगी वो
- 39:20बाहर के सेफ एनवायरमेंट को भी पहचान नहीं
- 39:22पाएगी।
- 39:22या उसको एक्सेप्ट नहीं करेगी। इसको एक
- 39:25बहुत ही आसान तरीके से समझ सकते हैं।
- 39:27मान लीजिए एक मिट्टी का मटका है जिसमें
- 39:29सालों से एक ही तरह का थोड़ा खारा पानी
- 39:32भरा हुआ था। मिट्टी की फितरत है कि वो उस
- 39:34खारेपन को अपने अंदर सोख लेती है। अब अगर
- 39:37इस मटके में अचानक से नया और साफ पानी डाल
- 39:39दिया जाए तो शुरू के कुछ दिन उस नए मीठे
- 39:42पानी में भी वही पुराना खारा स्वाद आएगा।
- 39:44क्योंकि पुरानी केमिस्ट्री और पुरानी आदत
- 39:47इतनी आसानी से फ्लश आउट नहीं होती। उस
- 39:50मटके का स्ट्रक्चर उस पुराने पानी के
- 39:52हिसाब से अडप्ट हो चुका है।
- 39:53पर अगर बिना गिव अप के लगातार रोज उस मटके
- 39:57में नया और मीठा पानी डाला जाए तो एक वक्त
- 40:00आएगा जब मिट्टी उस नए पानी की प्रॉपर्टी
- 40:03को सोख लेगी
- 40:04और तब उस मटके का स्वभाव पूरी तरह बदल
- 40:07जाएगा। हमारा फिजिकल बॉडी बिल्कुल उस मटके
- 40:10की तरह है। शुरू में जब नए पॉजिटिव इमोशंस
- 40:14लाने की कोशिश होती है तो बॉडी रेजिस्ट
- 40:17करती है। डाउट्स आते हैं। पुराने फियर्स
- 40:20वापस सरफेस पर आते हैं।
- 40:21पर कंसिस्टेंसी और पेशेंस से वो सेल्यूलर
- 40:24नेचर बदल जाता है।
- 40:25इस पूरे क्वांटम शिफ्ट का निचोड़ यही है
- 40:28कि जब बॉडी पुराने इमोशंस को रिपीट करना
- 40:30बंद करती है तब माइंड भी सच में चेंज होने
- 40:34लगता है। जब बायोलॉजी और माइंड दोनों एक
- 40:37डायरेक्शन में चलते हैं, तब रियल बदलाव
- 40:40आता है।
- 40:41जब यह अजीब सा शोर और पुराने पैटर्न की वो
- 40:44फेमिलियर बैकग्राउंड नॉइज़ थोड़ी कम होने
- 40:46लगती है तो अंदर से बॉडी एकदम हल्की फील
- 40:49होती है।
- 40:49जैसे एक हैवी आर्मर उतार दिया हो।
- 40:51फेसिंग ऑटोमेटिकली स्लो हो जाती है।
- 40:53ऐसा लगता है जैसे अंदर सालों से एक ही
- 40:56रेडियो स्टेशन प्ले हो रहा था। एक ही सैड
- 40:58या एशियस फ्रीक्वेंसी पर और किसी ने धीरे
- 41:01से उसकी फ्रीक्वेंसी बदल दी हो। एक
- 41:03बिल्कुल नई धुन और एक नया वाइब्रेशन सुनाई
- 41:05देने लगता है।
- 41:06जो चीजें पहले रिजिड और फिक्स लगती थी कि
- 41:09नेचर ऐसी ही है या सब कुछ प्रेडिक्टेबल है
- 41:12वो बस पुराने केमिकल प्रोग्राम्स का एक
- 41:14इल्यूजन लगने लगते हैं। जब ध्यान पास्ट के
- 41:17उन यादों और ट्रैप्ड इमोशन से कंप्लीटली
- 41:20हट जाता है तो सामने का फॉग जैसे
- 41:22धीरे-धीरे छटने लगता है।
- 41:24उस कोहरे के पीछे एक बहुत बड़ा और क्लियर
- 41:27ओपन लैंडस्केप नजर आने लगता है। नए रास्ते
- 41:29दिखने लगते हैं जो शायद हमेशा से वहीं थे।
- 41:32बस पुरानी फ्रीक्वेंसी उन्हें देख नहीं पा
- 41:34रही थी। नई पॉसिबिलिटीज वहां मौजूद है। एक
- 41:37ऐसी जगह जहां अब तक ध्यान गया ही नहीं था।
- 41:40शायद रियलिटी उतनी फिक्स नहीं है जितनी
- 41:43हमें लगती थी।
- 41:44कभी-कभी ऐसा लगता है ना कि हमारा माइंड तो
- 41:48चेंज आता है।
- 41:49वो शांत रहना चाहता है।
- 41:50पर हमारी बॉडी वो ऑटोमेटिकली रिएक्ट कर
- 41:52देती है।
- 41:53हां एक्सैक्टली। जैसे-जैसे बॉडी को किसी
- 41:55पुराने स्ट्रेस की एक आदत सी पड़ गई हो।
- 41:57माइंड कह रहा है कि सब ठीक है। रिलैक्स
- 41:59करो। पर बॉडी ऑलरेडी एक पैनिक मोड में जा
- 42:02चुकी है।
- 42:02यह बहुत ही अनसेटलिंग फीलिंग है और बहुत
- 42:05रियल भी। ऐसा लगता है जैसे जैसे बॉडी खुद
- 42:09एक ऑटो पायलट पर हो। वही तो बचपन से हमें
- 42:12सिखाया गया है कि हमारा दिमाग यानि हमारा
- 42:14ब्रेन इस पूरे जिस्म का बॉस है। कि सब कुछ
- 42:17वहीं से कंट्रोल होता है। पर इस ऑटो पायलट
- 42:20वाली फीलिंग को देखकर लगता है कि शायद,
- 42:22शायद हमारी बॉडी ही पास्ट को याद रखती है।
- 42:25और यही आज की सबसे बड़ी रियलाइजेशन है। हम
- 42:28इंसान हर कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम को सिर्फ
- 42:31लॉजिक से सोच-सच कर सॉल्व करना चाहते हैं।
- 42:34पर क्या हो अगर बॉडी पहले ही फैसला ले
- 42:36चुकी हो। आज हम इसी बारे में बात करने
- 42:38वाले हैं। आज के इस गहरे डिस्कशन में हम
- 42:40इस बात की तह तक जाएंगे कि कैसे हमारा दिल
- 42:43और हमारा दिमाग आपस में बात करते हैं।
- 42:46कैसे रिपीटेड इमोशंस हमारी बॉडी को कंडीशन
- 42:49कर देते हैं।
- 42:49बिल्कुल। क्योंकि अगर कोई इंसान
- 42:51ओवरथिंकिंग या एंजायटी से परेशान है तो
- 42:53उसको सिर्फ अपने ख्यालों से ठीक करने की
- 42:56कोशिश करना शायद एक बहुत ही गलत तरीका है।
- 43:00असली चाबी कहीं और ही है।
- 43:01यह एक ऐसा सच है जो हमारी बायोलॉजी को
- 43:05देखने का पूरा नजरिया बदल देता है। अगर हम
- 43:07मेडिकल साइंस की बात करें तो अब यह पूरी
- 43:10तरह से मान लिया गया है कि दिल सिर्फ एक
- 43:13मस्कुलर पंप नहीं है
- 43:14जो सिर्फ खून सप्लाई करता है।
- 43:16राइट? 1991 में 1991 में एक
- 43:20न्यूरोसाइंटिस्ट थे डॉक्टर जे एंड्रू
- 43:23आर्मर। उन्होंने एक ऐसी चीज डिस्कवर की
- 43:26जिसने सबको हैरान कर दिया। उन्होंने साबित
- 43:29किया कि दिल के पास अपना खुद का एक नर्वस
- 43:32सिस्टम होता है।
- 43:33अपना खुद का नर्वस सिस्टम?
- 43:35हां। जिसे साइंस की भाषा में इंट्रिंसिक
- 43:38कार्डियाक नर्वस सिस्टम कहते हैं। या आम
- 43:41भाषा में कहें तो हार्ट ब्रेन दिल का अपना
- 43:44दिमाग। वेट मतलब दिल के पास सच में अपना
- 43:47एक मिनी ब्रेन है जो हमारे मेन ब्रेन को
- 43:49जो हमारे सर में है उसको बाईपास कर सकता
- 43:51है।
- 43:51कर सकता है और करता भी है।
- 43:54यह तो किसी के लिए भी डाइजेस्ट करना
- 43:55मुश्किल है क्योंकि देखिए हमारी स्कूल की
- 43:57बायोलॉजी क्लास में तो ऐसा कुछ नहीं था।
- 43:59मैं समझ सकती हूं। सुनने में अजीब जरूर
- 44:02लगता है लेकिन इस हार्ट ब्रेन में लगभग 40
- 44:05हजार सेंसरी न्यूरॉन्स होते हैं। और ये
- 44:08कोई ऐसे वैसे न्यूरॉन्स नहीं है।
- 44:10तो ये क्या अलग करते हैं? यह
- 44:12इंडिपेंडेंटली चीजों को फील कर सकते हैं,
- 44:15सीख सकते हैं। पुरानी यादों को, इमोशंस को
- 44:18स्टोर कर सकते हैं। और सबसे बड़ी बात
- 44:20दिमाग के आदेश का इंतजार किए बिना खुद
- 44:24डिसीजंस ले सकते हैं।
- 44:25बिना ब्रेन को पूछे
- 44:26बिना ब्रेन के ऑर्डर्स के और जो डाटा हम
- 44:29देखते हैं वो बहुत ही स्ट्राइकिंग है। वो
- 44:32बताता है कि हमारा दिमाग दिल को जितने
- 44:36सिग्नल्स भेजता है
- 44:37दिल उससे पांच गुना ज्यादा इंफॉर्मेशन
- 44:40दिमाग को वापस भेजता है।
- 44:42पांच गुना ज्यादा
- 44:44ये तो बिल्कुल एक घर के उस डायनेमिक की
- 44:47तरह हो गया जहां दिमाग को लगता है कि वो
- 44:48बॉस है। पर असली कंट्रोल किसी और के पास
- 44:51है जो लगातार इंस्ट्रक्शंस भेज रहा है।
- 44:53यह एनालॉजी काफी हद तक सही है। इस पूरे
- 44:56रिश्ते में दिमाग मोस्टली एक लिसनिंग मोड
- 44:59में होता है। हम्म।
- 45:00सुनने की स्थिति में वो दिल से आने वाले
- 45:03सिग्नल्स को सुनता है और उसके हिसाब से
- 45:06बॉडी का आगे का रिएक्शन तय करता है।
- 45:08ओके, लेट्स अनपैक दिस। अगर दिल इतनी सारी
- 45:11इंफॉर्मेशन ब्रेन को भेज रहा है तो इनकी
- 45:14आपस में बात कैसे होती है? इनके पास ऐसी
- 45:16कौन सी भाषा है? मुझे तो हमेशा लगता था कि
- 45:18सब कुछ नर्व्स के थ्रू ही होता है।
- 45:20नर्व्स के थ्रू जरूर होता है पर वो सिर्फ
- 45:22एक रास्ता है। दिल और दिमाग के बीच
- 45:26कम्युनिकेशन के चार अलग-अलग पाथवेज होते
- 45:29हैं। चार रास्ते जो आपने कहा वो पहला है
- 45:32न्यूरोलॉजिकल पाथवे। जिसमें न्यूरॉन्स
- 45:34इन्वॉल्व होते हैं।
- 45:35हां, दिल के न्यूरॉन्स सीधे दिमाग के
- 45:38एमग्डाला और थैलेमिस को सिग्नल भेजते हैं।
- 45:41एमगडेडला यानी दिमाग का वो हिस्सा जो
- 45:43हमारे खतरे वाले अलार्म सिस्टम को कंट्रोल
- 45:45करता है।
- 45:46जो इमोशंस प्रोसेस करता है।
- 45:47एक्सक्ट्ली।
- 45:48मतलब अगर अचानक से डर लगता है या गुस्सा
- 45:50आता है तो वो ट्रिगर दिमाग से नहीं बल्कि
- 45:53दिल से आ रहा है।
- 45:54बिल्कुल।
- 45:54हार्ट पहले सिचुएशन को सेंस करता है और
- 45:57फिर ब्रेन को बताता है कि खतरे का अलार्म
- 46:00बजाना है या नहीं। इसके बाद आता है दूसरा
- 46:02रास्ता जो है बायोकेमिकल पाथवे।
- 46:05बायोकेमिकल मतलब हॉर्मोंस के थ्रू। पर
- 46:08यहां पर लोग ज्यादातर यही सोचते हैं कि
- 46:09हॉर्मोन सिर्फ दिमाग से या थायरॉइड वैसे
- 46:12ग्लैंड से आते हैं। दिल हॉर्मोनस कैसे बना
- 46:14सकता है?
- 46:15है और एक और हॉर्मोन है जिसे हम लव
- 46:18हॉर्मोन कहते हैं। ऑक्सीटोसिन। ओह,
- 46:20ऑक्सीटोसिन भी हार्ट में बनता है।
- 46:22हां, जब हम किसी से बॉन्ड करते हैं, प्यार
- 46:25महसूस करते हैं तो वह ऑक्सीटोसिन दिल में
- 46:28ही बनता है और सीधे दिमाग की केमिस्ट्री
- 46:31को जाकर बदल देता है।
- 46:32ये तो माइंड ब्लोइंग है। मतलब हमारी
- 46:34बॉन्डिंग और हमारा स्ट्रेस दोनों का
- 46:36केमिकल सोर्स हार्ट के पास ही है।
- 46:38सही पकड़ा आपने। और तीसरा रास्ता है
- 46:40बायोफिजिकल पाथवे। जब दिल धड़कता है तो वो
- 46:44खून की नालियों में एक ब्लड प्रेशर वेव
- 46:47बनाता है।
- 46:47एक प्रेशर वेव।
- 46:48हां। एक दबाव की लहर जो सीधे दिमाग तक
- 46:51जाती है और यह लहर हमारे ब्रेन वेव्स को
- 46:55जैसे अल्फा वेव्स जो हमें रिलैक्स्ड फील
- 46:58कराती हैं उनको बदल देती है। उनको
- 47:00सिंक्रोनाइज करती है।
- 47:01अल्फा वेव्स जो हमें क्रिएटिव भी बनाती
- 47:03हैं।
- 47:04एक्जेक्टली पर इन सब में जो चौथा रास्ता
- 47:08है वो सबसे ज्यादा प्रोफाउंड है।
- 47:10एनर्जेटिक पाथवे।
- 47:11एनर्जेटिक? यह थोड़ा सैफाई साउंड कर रहा
- 47:14है। [हंसी]
- 47:15सई लगता है, पर प्योर साइंस है। हर लिविंग
- 47:18सेल एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड बनाता
- 47:21है। पर दिल का फील्ड सबसे अलग है। अगर हम
- 47:24ब्रेन के फील्ड से उसको कंपेयर करें तो
- 47:26दिल का फील्ड दिमाग से सात गुना ज्यादा
- 47:29बड़ा होता है।
- 47:30सात गुना बड़ा?
- 47:31और अगर मैग्नेटिक पावर की बात करें तो वो
- 47:33दिमाग से करीब 5,000 गुना ज्यादा पावरफुल
- 47:36होता है।
- 47:375,000 गुना। यह तो मतलब एक मैसिव
- 47:40ब्रॉडकास्टिंग स्टेशन की तरह हो गया जो
- 47:43लगातार कुछ ना कुछ ट्रांसमिट कर रहा है।
- 47:45और यह फील्ड सिर्फ जिस्म के अंदर नहीं
- 47:47रहता। यह हमारे जिस्म के बाहर 8 से 10 फीट
- 47:50के रेडियस तक फैला होता है।
- 47:528 से 10 फीट बाहर यह तो हमारे आसपास के
- 47:55लोगों तक पहुंच रहा होगा। बिल्कुल पहुंचता
- 47:57है। इस पर हम आगे और गहराई से बात करेंगे।
- 48:00पर पहले इस ब्रॉडकास्टिंग स्टेशन के अंदर
- 48:03क्या चल रहा है वो समझते हैं।
- 48:04हां क्योंकि आम जिंदगी में जब लोग स्ट्रेस
- 48:07में होते हैं, ऑफिस की टेंशन होती है या
- 48:09पर्सनल इश्यूज होते हैं तो अक्सर दिमाग
- 48:11पूरी तरह से फोग्ड हो जाता है। धुंधला हो
- 48:13जाता है। कुछ समझ नहीं आता। उस वक्त यह
- 48:15दिल क्या कर रहा होता है?
- 48:17उस वक्त जो होता है उसे एचआरवी यानी हार्ट
- 48:21रेट वेरिएबिलिटी से समझा जा सकता है।
- 48:23देखिए एक हेल्दी हार्ट हमेशा एक फिक्स्ड
- 48:26स्पीड से नहीं धड़कता। वो अलग-अलग
- 48:28सिचुएशंस को अडप्ट करता है।
- 48:30मतलब उसकी स्पीड घटती बढ़ती रहती है।
- 48:32हां। पर जब कोई इंसान लगातार स्ट्रेस में
- 48:35होता है, गुस्से या एंग्जायटी में होता है
- 48:38तो यह जो धड़कन का पैटर्न है वो
- 48:40इनकोहेरेंट हो जाता है। एकदम क्यटिक या
- 48:43जैगिड।
- 48:44जैसे एक रेडियो पर स्टैटिक नॉइज़ आ रही
- 48:47हो। सही एनालॉजी है। एक बहुत ही बिखरा हुआ
- 48:49सिग्नल दिमाग को जाता है और तब वह होता है
- 48:53जिसका जिक्र आपने शुरू में किया था कि
- 48:55माइंड चेंज चाहता है पर बॉडी पास्ट को
- 48:58रिपीट करती है।
- 48:59हां, वही कॉन्फ्लिक्ट कि बॉडी को उस
- 49:01स्ट्रेस की आदत पड़ चुकी है।
- 49:03जब सेम इमोशंस रोज रिपीट होते हैं, तो
- 49:06बॉडी उन इमोशंस की एक आदत बना लेती है। एक
- 49:10ट्रेंड इंस्ट्रूमेंट की तरह बॉडी उस केओस
- 49:13को ही अपना नॉर्मल स्टेट मान लेती है।
- 49:15दिमाग शायद कह रहा हो कि काम डाउन पर बॉडी
- 49:18कहती है नहीं मुझे मेरा वो रोज वाला
- 49:21स्ट्रेस हॉर्मोन चाहिए।
- 49:23ये तो एक तरह की मसल मेमोरी हो गई। एक
- 49:25इमोशनल ऑटो पायलट जिससे बाहर निकलना बहुत
- 49:28मुश्किल होता होगा।
- 49:29बहुत मुश्किल होता है क्योंकि दिमाग चेंज
- 49:32चाहता है पर बॉडी ऑटोमेटिकली रिएक्ट कर
- 49:35रही होती है। कॉर्पोरेट दुनिया में यह
- 49:37बहुत आम है। जैसे एक आईटी मैनेजर की कहानी
- 49:39ले लीजिए राहुल।
- 49:40हां राहुल उसका प्रोजेक्ट काफी डिले हो
- 49:42गया था ना। क्लाइंट नाराज थे? क्लाइंट
- 49:44नाराज, मैनेजमेंट का प्रेशर, वह दिन में
- 49:4715-15 घंटे स्क्रीन के सामने बैठकर काम कर
- 49:50रहा था। उसकी बॉडी पूरी तरह से उस इमोशनल
- 49:53हैबिट में उस स्ट्रेस लूप में फंस चुकी
- 49:56थी।
- 49:56उस स्ट्रेस लूप में जहां उसका अमेगडला
- 49:58लगातार अलार्म बजा रहा था।
- 50:00बिल्कुल। बॉडी में कॉर्टिसॉल भरा हुआ था
- 50:03और इसकी वजह से उसका हार्ट रिदमम पूरी तरह
- 50:05इनकोहेरेंट था। जब हार्ट से ऐसी नॉइज़
- 50:08दिमाग को जाती है तो दिमाग का प्रीफ्रंटल
- 50:11कॉर्टेक्स ऑफलाइन हो जाता है।
- 50:13प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स यानी वो हिस्सा जो
- 50:15प्रॉब्लम सॉल्विंग करता है। नया आईडिया
- 50:17सोचता है।
- 50:18राइट? वो शटडाउन हो गया था। राहुल को लग
- 50:21रहा था कि वो और ज्यादा ओवरथिंकिंग करके
- 50:24प्रॉब्लम सॉल्व कर लेगा। पर बायोलॉजिकली
- 50:26उसका दिमाग उस हालत में था ही नहीं।
- 50:28क्योंकि उसकी बॉडी माइंड से पहले रिएक्ट
- 50:30कर रही थी। वो सेम ओल्ड फीलिंग ऑफ़
- 50:32पैनिकिक।
- 50:33एक्जेक्टली। और इस लूप को तोड़ने के लिए
- 50:36उसने जो किया वो सुनने में बहुत छोटा लगता
- 50:38है पर बायोलॉजिकली बहुत पावरफुल है।
- 50:41उसने ब्रेक लिया था। राइट?
- 50:43हां।
- 50:43टेरेस पर गया था वो।
- 50:44हां। जब उसकी वाइफ ने उसको फोर्स किया
- 50:47ब्रेक लेने के लिए। वो टेरेस पर बैठा।
- 50:50उसने काम के बारे में सोचना बंद किया और
- 50:52अपनी टीम के एक जूनियर मेंबर की मेहनत को
- 50:55याद किया। एक सच्ची अप्रिसिएशन फील की।
- 50:58सिर्फ फील की। सोचा नहीं, फील किया। यह
- 51:02डिस्टिंशन बहुत जरूरी है। उसने बॉडी को एक
- 51:05नया इमोशन एक्सपीरियंस करना सिखाया और
- 51:08जैसे ही उसने दिल से ग्रेटट्यूड या
- 51:10अप्रिसिएशन महसूस किया, उसकी एचआरवी
- 51:13कोहेरेंट हो गई। धड़कन का पैटर्न स्मूद हो
- 51:16गया।
- 51:17और तब जाकर दिमाग को एक क्लियर सिग्नल
- 51:19मिला होगा।
- 51:19हां, प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स वापस ऑनलाइन आ
- 51:22गया और जो स्यूशन उसको हफ्तों से नहीं मिल
- 51:25रहा था, वो 20 मिनट में सामने था। रियल
- 51:28चेंज तब होता है जब बॉडी भी नए इमोशंस फील
- 51:31करना सीखे।
- 51:32यह बात सच में मतलब अंदरूनी तौर पर झकझोर
- 51:35देने वाली है। हम बस दिमाग को पुश करते
- 51:38रहते हैं। जबकि बॉडी को वो फीलिंग देना
- 51:40जरूरी है। यही चीज एक और केस में भी दिखती
- 51:43है सुनीता वाले केस में।
- 51:44हां, वो ग्राफिक डिजाइनर
- 51:46जिससे एक क्रिएटिव ब्लॉक हो गया था। मतलब
- 51:48एक आर्टिस्ट के लिए तो उसकी क्रिएटिविटी
- 51:50ही सब कुछ है। वो घंटों बैठी रहती थी पर
- 51:52कुछ बन नहीं रहा था। क्योंकि क्रिएटिविटी
- 51:54के लिए आपके नर्वस सिस्टम का सेफ फील करना
- 51:57जरूरी है। सुनीता फ्रस्ट्रेशन के लूप में
- 52:00थी और फ्रस्ट्रेट होने पर दिल फिर से इन
- 52:03कोहेरेंट सिग्नल भेजता है। दिमाग रिस्क
- 52:06लेने से डरता है। नए आइडियाज ब्लॉक हो
- 52:08जाते हैं।
- 52:09तो उसने अपनी बॉडी का यह इमोशनल स्टेट
- 52:11चेंज कैसे किया?
- 52:12उसने अपनी मां के साथ वक्त बिताया। बचपन
- 52:15की यादों पर बात की। उन खुशगवार पलों में
- 52:17उसकी बॉडी को वापस सेफ फील हुआ। उसकी बॉडी
- 52:20उस पुराने स्ट्रेस पैटर्न से बाहर आई।
- 52:23हार्ट रिदमम कोहेरेंट हुई।
- 52:24और जैसे ही उसकी बॉडी रिलैक्स हुई, मैंने
- 52:27इसके बारे में पढ़ा है कि जब बॉडी रिलैक्स
- 52:29होती है और हार्ट कोहेरेंट होता है, तो
- 52:31ब्रेन का डिफॉल्ट मोड नेटवर्क एक्टिव हो
- 52:33जाता है।
- 52:34बिल्कुल सही।
- 52:34यह वो सिस्टम है जो हमारे बैकग्राउंड में
- 52:37चलता है। जो रैंडम डॉट्स को कलेक्ट करता
- 52:39है जब हम डायरेक्टली किसी चीज पर फोकस
- 52:41नहीं कर रहे होते। तो सुनीता की
- 52:42क्रिएटिविटी वापस आई क्योंकि उसके दिल ने
- 52:45दिमाग को रिलैक्सेशन का सिग्नल भेजा।
- 52:47एकदम ठीक। और यह बायोलॉजी सिर्फ कॉर्पोरेट
- 52:50मीटिंग्स या आर्ट तक ही सीमित नहीं है।
- 52:52जिंदगी के हर हिस्से पर इसका असर है। अगर
- 52:55हम एग्जाम्स की बात करें जैसे प्रिया की
- 52:57कहानी थी।
- 52:58ओ प्रिया स्टूडेंट्स का तो स्ट्रेस लेवल
- 53:00वापस में एक अलग ही लेवल पर होता है। उसको
- 53:02एग्जाम से पहले कुछ याद ही नहीं हो रहा था
- 53:03ना?
- 53:04नहीं हो रहा था क्योंकि एग्जाम प्रेशर की
- 53:07वजह से बॉडी स्ट्रेस में थी और उस पैनिकिक
- 53:10स्टेट में दिमाग का हिपोकंपस ठीक से काम
- 53:13नहीं करता।
- 53:14हिप्पोकंपस जो मेमोरी रिटेन करता है।
- 53:16हां। वो इंफॉर्मेशन रिटेन करना बंद कर
- 53:19देता है। दिमाग चाहता है पढ़ना पर बॉडी डर
- 53:23रही है। पर जब प्रिया की दादी ने उसको
- 53:25किसी बात पर हंसाया उन्होंने एक खुशी का
- 53:28पल शेयर किया। उस हंसी ने उस इमोशन ने
- 53:32प्रिया के हार्ट में कोहिरेंस बनाई।
- 53:34उसकी बॉडी को एक नया सिग्नल मिला। एक सेफ
- 53:37सिग्नल।
- 53:37और उसके बाद उसका मेमोरी सेंटर दोबारा खुल
- 53:40गया और उसको पढ़ाई समझ आने लगी।
- 53:42वाओ। और मुझे लगता है इसका सबसे बड़ा असर
- 53:45हमारे रिश्तों पर होता होगा। अमित और नेहा
- 53:47की बात करते हैं। यह कहानी बहुत रिलेटेबल
- 53:49है। दोनों के बीच एक झगड़ा शुरू होता है
- 53:51और बात इतनी बढ़ जाती है कि वह एक दूसरे
- 53:53की बात समझ ही नहीं पा रहे थे।
- 53:55यहां वो चौथा पाथवे काम कर रहा था जिसका
- 53:58हमने जिक्र किया था एनर्जेटिक पाथवे।
- 54:00वो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड जो बाहर तक
- 54:03फैला होता है।
- 54:03हां, जब अमित और नेहा झगड़ रहे थे, तो
- 54:07उनके हार्ट फील्ड्स बहुत केटिक थे। अमित
- 54:11का स्ट्रेस वाला एनर्जेटिक फील्ड नेहा के
- 54:14नर्वस सिस्टम को ट्रिगर कर रहा था और नेहा
- 54:17का फील्ड अमित को
- 54:19ओ मतलब वो वर्ड से नहीं अपनी बॉडी की
- 54:21एनर्जी से लड़ रहे थे। उनकी बॉडीज एक
- 54:24दूसरे को थ्रेट मान रही थी।
- 54:26एक्जेक्टली और इसलिए लॉजिक काम ही नहीं आ
- 54:29रहा था। पर फिर अमित ने अलग जाकर कुछ देर
- 54:32शांति से सांस ली। उसने एक पुरानी अच्छी
- 54:36याद को दोबारा महसूस किया। अपनी बॉडी को
- 54:39उस गुस्से से बाहर निकाला।
- 54:40उसने बॉडी को नया इमोशन सिखाया। उसका
- 54:43हार्ट फील्ड कोहेरेंट हुआ और जब वो वापस
- 54:46आया तो बिना किसी नए आर्गुमेंट के सिर्फ
- 54:50उसके शांत फील्ड ने नेहा के नर्वस सिस्टम
- 54:53को भी रिलैक्स कर दिया।
- 54:54उनका कम्युनिकेशन बेटर हो गया। बिना कुछ
- 54:57बोले एक अजीब सी शांति से। यह बहुत
- 54:59प्रोफाउंड है। तो सवाल यह उठता है कि इस
- 55:04माइंड बॉडी कॉन्फ्लिक्ट को तोड़ने के लिए
- 55:07लोग प्रैक्टिकली कर क्या सकते हैं? अगर
- 55:09दिमाग एक स्टूडेंट है और दिल उसका टीचर है
- 55:12तो हम टीचर को कैसे समझाएं?
- 55:14लोग क्या करते हैं कि दिमाग की परेशानी को
- 55:16सिर्फ सोच-सच कर ठीक करना चाहते हैं।
- 55:18जबकि शुरुआत दिल से करनी पड़ेगी।
- 55:20बॉडी से करनी पड़ेगी।
- 55:21हां। और इसका सबसे प्रैक्टिकल और असरदार
- 55:24तरीका है ब्रीथिंग। जी
- 55:26जब आप धीरे-धीरे और ध्यान से सांस लेते
- 55:28हैं, डेलिबेट ब्रीथिंग करते हैं, तो यह
- 55:31सीधे आपकी वेगस नर्व को स्टिमुलेट करता
- 55:34है।
- 55:34वेगस नर्व को।
- 55:35हां, और सिर्फ 7 से 90 सेकंड्स के अंदर
- 55:38लगभग 1ढ़ मिनट में आपकी हार्ट रिदमम को ही
- 55:41रिंट होने लगती है।
- 55:42सिर्फ 1ढ़ मिनट में हम बॉडी का स्टेट चेंज
- 55:44कर सकते हैं।
- 55:45बिल्कुल कर सकते हैं। और दूसरा सबसे जरूरी
- 55:48समय होता है सुबह का। उठने के बाद के पहले
- 55:5120 मिनट।
- 55:52क्यों उस वक्त क्या होता है? उस वक्त आप
- 55:54जो इमोशनल स्टेट महसूस करते हैं, वह आपके
- 55:57पूरे दिन का बायोलॉजिकल टेंपलेट सेट कर
- 55:59देता है। अगर सुबह उठते ही आपने स्ट्रेस
- 56:02फील किया या बॉडी पुरानी एंग्जायटी में
- 56:04चली गई, तो पूरा दिन बॉडी उसको अपना
- 56:07नॉर्मल स्टेट मानकर रिएक्ट करती रहेगी।
- 56:09मतलब हमें उस आदत को सुबह ही तोड़ना होगा।
- 56:12एक क्वाइट रियलाइजेशन देनी होगी बॉडी को।
- 56:15यह वैसे काफी हद तक हमारी परंपराओं से
- 56:17मिलताजुलता लग रहा है।
- 56:18हमारी भारतीय परंपराओं ने इस बात को
- 56:20हजारों साल पहले ही समझ लिया था। अगर आप
- 56:22देखें तो हमारी संस्कृति में हृदय यानी
- 56:25दिल को हमेशा से चेतना का कॉन्शियसनेस का
- 56:29केंद्र माना गया है। दिमाग को नहीं।
- 56:31सही बात है। हमेशा हृदय की बात होती है।
- 56:34और जो प्रैक्टिससेस हमने बनाई हैं जैसे
- 56:36विपासना मेडिटेशन हो गया या फिर बड़ी
- 56:38जॉइंट फैमिलीज में एक साथ आकर खुशी मनाना
- 56:41या सत्संग करना। हां, जहां बहुत सारे लोग
- 56:44एक साथ बैठते हैं।
- 56:45यह ऐसी प्रैक्टिससेस हैं जिन्हें हम ग्रुप
- 56:47कोहेरेंस प्रैक्टिसेस कह सकते हैं। जब लोग
- 56:50एक साथ बैठकर एक पॉजिटिव इमोशन महसूस करते
- 56:53हैं तो उनके ओवरलैपिंग हार्ट फील्स एक
- 56:56दूसरे को फायदा पहुंचाते हैं। एक साथ सबकी
- 56:59बॉडी रिलैक्स होती है।
- 57:01एक की शांति दूसरे की मदद करती है। यह
- 57:03बहुत बहुत गहरा थॉट है कि ग्रेटट्यूड या
- 57:07एप्रिसिएशन या शांति सिर्फ कोई फील गुड
- 57:09एडवाइस नहीं है। ये पूरी तरह से बायोलॉजी
- 57:12और न्यूरोकार्डियोलॉजी है।
- 57:14पूरी तरह से साइंस है।
- 57:15हम दिमाग को फोर्स करके कंट्रोल नहीं कर
- 57:17सकते क्योंकि बॉडी अपनी पुरानी आदत
- 57:20दोहराएगी। पर हम दिल को शांत करके बॉडी को
- 57:23नए इमोशंस के लिए रिकंडीशन कर सकते हैं।
- 57:25और जब बॉडी काम होती है तो दिमाग अपने आप
- 57:28ही क्लियर हो जाता है।
- 57:29इस विषय पर सोचते हुए एक आखिरी और बहुत ही
- 57:32हैरान करने वाला ख्याल है जिसे मैं यहां
- 57:34रखना चाहूंगी।
- 57:35हां बताइए। जैसा हमने कहा कि दिल का
- 57:37इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड हमारे जिस्म के
- 57:40बाहर 8 से 10 फीट तक फैला होता है और यह
- 57:44आसपास के लोगों के नर्वस सिस्टम को
- 57:46प्रभावित करता है।
- 57:47वही 8-10 फीट वाला रेडियस।
- 57:49हां। तो सोचिए कि अगर बिना एक शब्द बोले
- 57:53हमारा दिल हमारे आसपास के लोगों पर असर
- 57:56डाल रहा है तो हम रोजाना अपने घर में अपने
- 58:00ऑफिस में अनजाने में अपनी कौन सी अंदरूनी
- 58:03इमोशनल स्टेट बाकी सबको ट्रांसमिट कर रहे
- 58:06हैं
- 58:07ये तो ये बहुत बड़ा सवाल है
- 58:08हां
- 58:09कि अगर हम अंदर से स्ट्रेस में हैं तो हम
- 58:11वही स्ट्रेस बाहर फैला रहे हैं
- 58:12और इसका उल्टा भी उतना ही सच है क्या
- 58:15हमारी अंदरूनी शांति किसी और की उलझन को
- 58:18सुलझा सकती है। अगर हम अपनी बॉडी को पास्ट
- 58:21इमोशंस से आजाद कर लें तो क्या हमारी एक
- 58:24क्वायट एक शांत स्टेट किसी और केटिक दिमाग
- 58:28को आराम दे सकती है?
- 58:30शायद हमें लगता है कि बदलाव बाहर से आएगा।
- 58:33पर शुरुआत शायद इस क्वाइट रियलाइजेशन से
- 58:36करनी होगी कि हमारी चुप्पी हमारी अंदरूनी
- 58:40स्टेट ही सबसे बड़ी आवाज है। क्या हमारी
- 58:42अंदरूनी शांति किसी और की उलझन को सुलझा
- 58:45सकती है? शायद सबको आज थोड़ा ठहर कर इस
- 58:49बारे में सोचने की जरूरत है। आज के इस
- 58:50गहरे विश्लेषण की शुरुआत ना एक बहुत ही
- 58:54हैरान करने वाले विचार से करते हैं।
- 58:56बिल्कुल और आज का जो विषय है वो सच में
- 58:59इंसान के शरीर और उसकी चेतना के बीच के
- 59:01तालमेल को ना एक बिल्कुल नए नजरिए से
- 59:04हमारे सामने रखता है। हां और यह पूरी
- 59:06चर्चा मुख्य रूप से जो डिस्पेंजा की किताब
- 59:08है बिकमिंग सुपर नेचुरल
- 59:10उसका पांचवा अध्याय
- 59:11जी बिकमिंग सुपर नेचुरल के पांचवे अध्याय
- 59:14और प्राचीन भारतीय ज्ञान के उन वैज्ञानिक
- 59:16प्रमाणों पर आधारित है जो आज की आधुनिक
- 59:19दुनिया में बहुत ही ज्यादा प्रासंगिक हो
- 59:21गए हैं।
- 59:21सही बात है क्योंकि अक्सर हम देखते हैं कि
- 59:24विज्ञान और सदियों पुराना ज्ञान अलग-अलग
- 59:26दिशाओं में खड़े दिखाई देते हैं।
- 59:28हां ऐसा लगता है जैसे दोनों की आपस में
- 59:29कोई बनती ही नहीं है। बिल्कुल। लेकिन आज
- 59:32जिस बारे में हम बात करने वाले है ना यानी
- 59:34पाइनियल ग्लैंड।
- 59:35दिमाग के बिल्कुल बीचोंबीच मौजूद वो छोटी
- 59:37सी ग्रंथि।
- 59:37हां, वही। जब पाइनियल ग्लैंड की बात आती
- 59:40है ना तो विज्ञान और आध्यात्म दोनों एक ही
- 59:43सच्चाई की तरफ इशारा करते हैं।
- 59:45यह कोई रहस्यमई या मतलब जादुई बात नहीं
- 59:48है।
- 59:48नहीं, बिल्कुल नहीं। यह इंसान के
- 59:50न्यूरोलॉजिकल सिस्टम की एक बहुत ही ठोस और
- 59:53प्रमाणित वास्तविकता है।
- 59:54और यही आज के इस विश्लेषण का मिशन भी है।
- 59:57यह समझना कि कैसे इंसान की बायोलॉजी और
- 1:00:00प्राचीन ज्ञान एक ही बात कह रहे हैं।
- 1:00:02और जब इन स्रोत सामग्रियों को हम मिलाकर
- 1:00:04देखते हैं तो एक बहुत बड़ा अहम मोमेंट आता
- 1:00:07है।
- 1:00:07हां कि कैसे हमारे दिमाग के ठीक बीचों-बीच
- 1:00:09मौजूद एक बहुत ही छोटा सा हिस्सा हमारी
- 1:00:12नींद को ही नहीं बल्कि पूरी वास्तविकता को
- 1:00:15देखने के नजरिए को बदल सकता है। यह महज एक
- 1:00:17बायोलॉजिकल स्विच नहीं है बल्कि धारणा और
- 1:00:20चेतना को विस्तार देने का एक पूरा का पूरा
- 1:00:22प्राकृतिक सिस्टम है जिसे सदियों से
- 1:00:25पहचाना गया है।
- 1:00:26तो अगर हम पाइनियल ग्लैंड की शारीरिक
- 1:00:28बनावट और उसकी जगह से ही शुरुआत करें ना
- 1:00:30तो प्रकृति का ये डिज़ाइन बहुत ही दिलचस्प
- 1:00:33लगता है।
- 1:00:33हां इसका आकार बहुत ही छोटा होता है।
- 1:00:36मतलब महज एक चावल के दाने जितना करीब 8
- 1:00:39मि.मी. का होता है ये।
- 1:00:40बिल्कुल। और इसका जो रूप है वो एक पाइन
- 1:00:42कोन जैसा होता है।
- 1:00:43अच्छा तभी इसका नाम पाइनियल पड़ा है।
- 1:00:46एक्जेक्टली और दिलचस्प बात ये है कि दिमाग
- 1:00:49के ज्यादातर हिस्से जहां जोड़ों में या दो
- 1:00:52हिस्सों में बटे होते हैं
- 1:00:53जैसे लेफ्ट और राइट हेमिस्फेयर होते हैं
- 1:00:55दिमाग में।
- 1:00:56हां वैसे ही लेकिन ये जो ग्रंथि है ये
- 1:00:58एकदम अकेली होती है। स्वतंत्र और दिमाग के
- 1:01:01बिल्कुल केंद्र में स्थित होती है।
- 1:01:03मेडिकल साइंस के मुताबिक इसका जो सबसे
- 1:01:06स्थापित और जाना माना काम है वो है
- 1:01:08मेलाटोनिन नाम का हार्मोन बनाना। हां जो
- 1:01:11हमारी नींद के चक्र को नियंत्रित करता है।
- 1:01:13जैसे ही हमारी आंखों में सूरज की रोशनी कम
- 1:01:15होती है ना
- 1:01:16तो यह ग्रंथि सक्रिय हो जाती है
- 1:01:17और मेलाटोनिन को खून में छोड़ना शुरू कर
- 1:01:20देती है जिससे शरीर को नींद आने लगती है।
- 1:01:23नींद के इस चक्र को कंट्रोल करना इसका
- 1:01:24बुनियादी काम है और आज का आधुनिक चिकित्सा
- 1:01:26विज्ञान इसे बहुत अच्छी तरह समझता भी है।
- 1:01:30लेकिन स्रोत सामग्री में जो सबसे चौंकाने
- 1:01:33वाला तथ्य सामने आता है ना वो इसके अंदर
- 1:01:36मौजूद खास तरह के न्यूरोसेल से जुड़ा है।
- 1:01:38पाइनिलोसाइट्स राइट? हां, पाइनियल ग्लैंड
- 1:01:41में पाइनियलोसाइट्स नाम के सेल्स होते
- 1:01:44हैं। और न्यूरोलॉजी के अनुसार यह सेल्स
- 1:01:48हमारी आंखों के फोटो रिसेप्टर सेल्स के
- 1:01:50बिल्कुल समान होते हैं।
- 1:01:51मतलब ये वही सेल्स हैं जो रोशनी को पकड़ने
- 1:01:54या देखने का काम करते हैं।
- 1:01:55बिल्कुल वही।
- 1:01:56ये तथ्य मुझे व्यक्तिगत रूप से ना सबसे
- 1:01:58ज्यादा अजीब लगा।
- 1:01:59ऐसा क्यों?
- 1:02:00मतलब इंसान की खोपड़ी के बिल्कुल बीचोंबीच
- 1:02:02जहां गुप अंधेरा है।
- 1:02:03हां, बाहर की रोशनी का कोई नामोनिशान नहीं
- 1:02:06है वहां। वहां प्रकृति ने ऐसे सेल्स क्यों
- 1:02:08दिए हैं जो रोशनी देखने के लिए बने हैं?
- 1:02:10यह तो ऐसा ही हो गया है जैसे किसी गहरी
- 1:02:12अंधेरी गुफा में जहां सूरज की कोई किरण
- 1:02:14नहीं जाती वहां कोई दूरबीन लगा कर बैठा
- 1:02:17हो।
- 1:02:17ये बहुत ही सटीक उदाहरण है और इन
- 1:02:20फोटोसेप्टर सेल्स का अंधेरे में मौजूद
- 1:02:22होना किसी बहुत बड़े बायोलॉजिकल रहस्य की
- 1:02:25तरफ इशारा करता है।
- 1:02:26क्योंकि प्रकृति आमतौर पर बिना किसी वजह
- 1:02:28के तो कोई संरचना विकसित नहीं करती। सही
- 1:02:30बात है। अगर दिमाग के उस अंधेरे हिस्से
- 1:02:33में रोशनी को महसूस करने वाले सेल्स हैं
- 1:02:36तो इसका सीधा मतलब है कि शरीर के अंदर भी
- 1:02:39एक प्रकार की ऊर्जा या रोशनी पैदा होती
- 1:02:42है।
- 1:02:42जिसे ये सेल्स पकड़ने के लिए बनाए गए हैं।
- 1:02:44बिल्कुल। इसके अलावा एक और बड़ा
- 1:02:47बायोलॉजिकल तथ्य यह है कि पाइनियल ग्लैंड
- 1:02:50दिमाग के ब्लड ब्रेन बैरियर के बाहर होती
- 1:02:53है।
- 1:02:53हम जो कि न्यूरोलॉजी के हिसाब से एक बहुत
- 1:02:56ही असाधारण बात है।
- 1:02:57हां। इस ब्लड ब्रेन बैरियर को समझने के
- 1:02:59लिए ना इसे दिमाग के एक वीआईपी सिक्योरिटी
- 1:03:02गार्ड की तरह देखा जा सकता है।
- 1:03:03हां, यह सुरक्षा व्यवस्था खून में मौजूद
- 1:03:06हर रसायन या बाहरी तत्वों को सीधे दिमाग
- 1:03:08में घुसने से रोकती है।
- 1:03:10लेकिन हमारी यह पाइनल ग्लैंड इस वीआईपी
- 1:03:12सुरक्षा घेरे के बाहर बैठी है।
- 1:03:13जिसका मतलब है कि यह खून के सीधे संपर्क
- 1:03:16में रहती है।
- 1:03:17और इसी वजह से यह ग्रंथि खून में होने
- 1:03:20वाले किसी भी रासायनिक बदलाव के प्रति
- 1:03:22बेहद संवेदनशील होती है। और इसी पर डॉक्टर
- 1:03:26रिक स्ट्रेसमैन जैसे शोधकर्ताओं की जो
- 1:03:28विस्तृत रिसर्च है वह बताती है कि गहरी
- 1:03:31ध्यान अवस्था जैसी खास परिस्थितियों में
- 1:03:34यह पाइनियल ग्लैंड डीएमटी नाम का एक
- 1:03:36शक्तिशाली रसायन भी पैदा कर सकती है।
- 1:03:38हां डीएमटी यह एक प्राकृतिक न्यूरोट
- 1:03:41ट्रांसमीटर है जो इंसान के देखने और महसूस
- 1:03:44करने के तरीके को असाधारण रूप से विस्तृत
- 1:03:47कर सकता है।
- 1:03:47मतलब हमारी धारणा को पूरी तरह बदल सकता
- 1:03:49है। बिल्कुल और शायद इन्हीं सूक्ष्म और
- 1:03:52गहरे न्यूरोलॉजिकल गुणों के कारण ही 17वीं
- 1:03:55सदी के मशहूर फ्रांसीसी दार्शनिक रेने
- 1:03:59डिसकातेस ने इस ग्रंथि को एक खास नाम दिया
- 1:04:02था।
- 1:04:02जी उन्होंने इसे आत्मा का निवास या सीट ऑफ
- 1:04:05द सोल कहा था।
- 1:04:05हां। डिस्कार्टिस का यह विचार तो अपनी जगह
- 1:04:08है। लेकिन जब हम हजारों साल पुराने भारतीय
- 1:04:10ज्ञान को इस वैज्ञानिक परिप्रेक्ष में
- 1:04:12देखते हैं ना तो सच में हैरानी होती है।
- 1:04:15क्योंकि उस प्राचीन दौर में तो कोई एमआरआई
- 1:04:17मशीन या स्कैनिंग तकनीक नहीं थी।
- 1:04:20बिल्कुल नहीं थी। फिर भी भारतीय परंपराओं
- 1:04:22ने बिना किसी मेडिकल चीर फाड़ के इस
- 1:04:26ग्रंथि की सटीक जगह और इसके काम को किस
- 1:04:28तरह पहचान लिया था? यह एक बहुत बड़ा रहस्य
- 1:04:31है।
- 1:04:32अगर हम प्राचीन ज्ञान के पन्नों को पलटें
- 1:04:35तो इस ग्रंथि को अजना चक्र या छठे चक्र का
- 1:04:38नाम दिया गया है।
- 1:04:39जो दोनों भों के ठीक बीच में स्थित माना
- 1:04:42जाता है।
- 1:04:43और अगर आज के शरीर रचना विज्ञान यानी
- 1:04:45एनाटॉमी के हिसाब से देखा जाए तो भों के
- 1:04:48बीच से ठीक पीछे दिमाग के एकदम केंद्र में
- 1:04:52पाइनियल ग्लैंड ही मौजूद है।
- 1:04:54प्राचीन दर्शन में इसे इंट्यूशन या
- 1:04:56अंतर्ज्ञान का केंद्र भी कहा गया है। एक
- 1:04:58ऐसी जगह जहां से इंसान सामान्य आंखों से
- 1:05:02परे की सच्चाई देख सकता है।
- 1:05:04शिव की तीसरी आंख की कहानी भी इसी अजना
- 1:05:06चक्र से जुड़ती है।
- 1:05:07हां बिल्कुल।
- 1:05:08अक्सर सामान्य कहानियों में तो यह बताया
- 1:05:10जाता है कि शिव की तीसरी आंख खुलने का
- 1:05:13मतलब विनाश है।
- 1:05:14लेकिन अगर श्रोत सामग्री के आधार पर इसका
- 1:05:16गहराई से विश्लेषण किया जाए तो यह तीसरी
- 1:05:19आंख किसी बाहरी दुनिया को देखने या खत्म
- 1:05:22करने का प्रतीक नहीं है।
- 1:05:24तो यह असल में किस चीज का प्रतीक है? यह
- 1:05:26असल में इंसान की अपनी अंदरूनी सच्चाई और
- 1:05:29उन गहराइयों को देखने की क्षमता को
- 1:05:32दर्शाती है जो रोजमर्रा के सामान्य
- 1:05:34विचारों से बहुत परे हैं।
- 1:05:36और यह सिर्फ एक दार्शनिक या अप्रतीकात्मक
- 1:05:38विचार नहीं था।
- 1:05:39नहीं बिल्कुल नहीं। प्राचीन भारतीय
- 1:05:41परंपराओं में इस अजना चक्र को जागृत करने
- 1:05:44के लिए पूरी वैज्ञानिक और न्यूरोलॉजिकल
- 1:05:47तकनीकें विकसित की गई थी।
- 1:05:49हम जैसे कि कश्मीर शैव धर्म में त्राटक का
- 1:05:52अभ्यास होता है।
- 1:05:53हां। जहां किसी एक बिंदु या दिए की लौ पर
- 1:05:56बिना पलक झपकाए ध्यान केंद्रित किया जाता
- 1:05:59है।
- 1:05:59इसी तरह योग विज्ञान में शंभवी मुद्रा है
- 1:06:02जिसमें आंखों को हल्का सा ऊपर और अंदर की
- 1:06:04तरफ मोड़कर भौहों के बीच ध्यान लगाया जाता
- 1:06:07है।
- 1:06:08यानी यह सब सिर्फ धार्मिक कर्मकांड या कोई
- 1:06:10अंधविश्वास नहीं थे।
- 1:06:11बिल्कुल नहीं। यह अभ्यास सीधे तौर पर एक
- 1:06:14तरह से पाइनियल ग्लैंड को सक्रिय करने के
- 1:06:17लिए डिजाइन किए गए बायोलॉजिकल टूल थे। उस
- 1:06:20समय की भाषा चाहे कितनी भी रहस्यमई लगती
- 1:06:22हो, लेकिन उसके पीछे का न्यूरोलॉजिकल
- 1:06:24विज्ञान
- 1:06:25हम
- 1:06:25बहुत ही सटीक था।
- 1:06:27इस संगम को समझने के बाद ना यह सवाल उठना
- 1:06:30लाजमी है कि यह पूरी प्रक्रिया वास्तव में
- 1:06:32काम कैसे करती है?
- 1:06:34हां। मतलब अगर कोई इंसान ध्यान करने बैठता
- 1:06:36है तो उसके दिमाग के अंदर ऐसा क्या
- 1:06:38बायोलॉजिकल बदलाव होता है कि यह ग्रंथि
- 1:06:41सक्रिय हो जाती है?
- 1:06:42स्रोत सामग्री इसके लिए ब्रेन वेव्स यानी
- 1:06:45दिमाग की तरंगों का बहुत ही स्पष्ट
- 1:06:47विज्ञान समझाती है।
- 1:06:48इस प्रक्रिया को समझने के लिए हमें दिमाग
- 1:06:50की गति और उसकी फ्रीक्वेंसी को समझना
- 1:06:52होगा। आज की जो भागदौड़ वाली जिंदगी है
- 1:06:55जहां लगातार काम का तनाव है, सोशल मीडिया
- 1:06:58की नोटिफिकेशंस बज रही हैं
- 1:07:00और हमेशा कल की चिंताएं लगी रहती हैं।
- 1:07:02इन सब में दिमाग ज्यादातर बीटा वेव्स में
- 1:07:04फंसा रहता है।
- 1:07:05ये 13 से 30 हर्टz की फ्रीक्वेंसी होती
- 1:07:07है।
- 1:07:07हां।
- 1:07:08अगर इसे एक आसान उदाहरण से समझा जाए ना तो
- 1:07:10हर्ट्ज दिमाग के इंजन का आरपीएम या स्पीड
- 1:07:14लिमिट है।
- 1:07:14ये गाड़ी का उदाहरण बहुत अच्छा है।
- 1:07:16बीता स्टेट में होना मतलब गाड़ी को पहले
- 1:07:18गियर में रखकर एक्सीलरेटर पूरी तरह दबा
- 1:07:21देना। यह एक ऐसा रडार सिस्टम है जो लगातार
- 1:07:23बाहरी दुनिया से उलझने और खतरों को स्कैन
- 1:07:26करने में व्यस्त रहता है।
- 1:07:27और इस बीटा स्टेट में बहुत ज्यादा ऊर्जा
- 1:07:30खर्च होती है। यही कारण है कि आज का इंसान
- 1:07:33बिना कोई शारीरिक मेहनत किए भी मानसिक रूप
- 1:07:36से थका हुआ महसूस करता है।
- 1:07:38बर्न आउट का शिकार रहता है हमेशा।
- 1:07:40बिल्कुल। लेकिन जब ध्यान का अभ्यास शुरू
- 1:07:43होता है और सांसों की गति धीमी की जाती है
- 1:07:46तो दिमाग की यह लहरें अपनी उच्च गति से
- 1:07:49नीचे आने लगती हैं।
- 1:07:50दिमाग बीटा से अल्फा अवस्था में आता है।
- 1:07:53अल्फा वेव्स 8 से 12 हर्ट्ज की होती हैं
- 1:07:56जो थोड़ी शांत रिलैक्स्ड और रचनात्मक
- 1:07:58स्थिति है।
- 1:07:59और जब ध्यान और गहरा होता है तो दिमाग
- 1:08:01थीटा और डेल्टा अवस्था में चला जाता है।
- 1:08:04जो 4 से 8 हर्ट्जर्ट्स की बहुत ही धीमी और
- 1:08:07गहरी तरंगे होती है। इन धीमी तरंगों का
- 1:08:09असर ना दिमाग के दूसरे हिस्सों और रसायनों
- 1:08:12पर भी बहुत गहरा पड़ता है।
- 1:08:14हां, जब दिमाग इस गहरी शांति में पहुंचता
- 1:08:17है, तब हाइपोथैलेमिस जो दिमाग का एक अहम
- 1:08:20हिस्सा है, वो शरीर में तनाव पैदा करने
- 1:08:23वाले हॉर्मोंस का उत्पादन एकदम कम कर देता
- 1:08:26है।
- 1:08:26और जैसे ही शरीर से तनाव के रसायन कम होते
- 1:08:29हैं, शरीर सेरोटिन का स्तर बढ़ाने लगता
- 1:08:31है।
- 1:08:31यह वही रसायन है जो हमें खुशी और शांति
- 1:08:34महसूस कराता है। और यह सेरोटोनिन कोई
- 1:08:36साधारण रसायन नहीं है बल्कि एक बहुत ही
- 1:08:38महत्वपूर्ण कच्चा माल है।
- 1:08:40सही कहा। पाइनियल ग्लैंड इसी सेरोटोनिन का
- 1:08:43इस्तेमाल करके भारी मात्रा में मेलाटोनिन
- 1:08:46और संभावित रूप से उस शक्तिशाली रसायन
- 1:08:50डीएमटी का निर्माण करती है।
- 1:08:52इस पूरे न्यूरोलॉजिकल चक्र से यह बात
- 1:08:53साबित होती है कि इंसान की शांति सिर्फ एक
- 1:08:56खालीपन या कुछ ना करने की स्थिति नहीं है
- 1:08:59बल्कि यह शरीर के अंदर एक बहुत ही
- 1:09:02शक्तिशाली और जटिल रासायनिक प्रक्रिया की
- 1:09:04शुरुआत है। अब न्यूरोलॉजी के सिद्धांत को
- 1:09:06सुनने के बाद अक्सर ऐसा लग सकता है कि यह
- 1:09:09सारी बातें केवल किताबों तक सीमित हैं।
- 1:09:11या फिर यह सिर्फ उन योगियों के साथ होता
- 1:09:13है जो सालों से पहाड़ों पर गुफाओं में
- 1:09:15बैठे हैं।
- 1:09:15हां, लेकिन श्रोत सामग्री में असल जिंदगी
- 1:09:18की कई ऐसी केस स्टडीज हैं जो यह दिखाती
- 1:09:21हैं कि चेतना के विस्तार की यह प्रक्रिया
- 1:09:24आम इंसानों के लिए भी पूरी तरह काम करती
- 1:09:26है।
- 1:09:27इसमें 20वीं सदी के प्रसिद्ध संत रमण
- 1:09:29महर्षि का उदाहरण बहुत ही प्रासंगिक है।
- 1:09:32रमण महर्षि की घटना ना इस बात का बहुत ही
- 1:09:34सटीक और वास्तविक प्रमाण है कि चेतना का
- 1:09:37विस्तार बिना किसी लंबी ट्रेनिंग के भी हो
- 1:09:39सकता है।
- 1:09:40जब वो महज 16 साल के थे उन्हें अचानक
- 1:09:43मृत्यु का एक बहुत गहरा और भयानक डर सताने
- 1:09:46लगा।
- 1:09:46लेकिन इंसान की जो सामान्य प्रवृत्ति होती
- 1:09:48है डर से भागने की उसके विपरीत वो उस डर
- 1:09:51से भागे नहीं।
- 1:09:52वो जमीन पर लेट गए और उन्होंने आत्म मंथन
- 1:09:55शुरू किया।
- 1:09:55खुद से यह गहरा सवाल पूछा कि आखिर यह मैं
- 1:09:58कौन है जो मर जाएगा? और जब उन्होंने खुद
- 1:10:00को इस गहरे सवाल में पूरी तरह झोंक दिया,
- 1:10:03तो उनके दिमाग का शोर एकदम थम गया।
- 1:10:05न्यूरोलॉजी के नजरिए से इस घटना को देखा
- 1:10:07जाए तो उनका दिमाग उसी पल भयानक बीटा
- 1:10:10स्टेट के तनाव और सर्वाइवल मोड से निकल कर
- 1:10:13सीधे एक गहरी शांति में चला गया।
- 1:10:15उन्होंने अपनी शारीरिक सीमाओं से परे एक
- 1:10:18असीम चेतना का अनुभव किया। और यह
- 1:10:20बायोलॉजिकल बदलाव सिर्फ कुछ खास संतों तक
- 1:10:23सीमित नहीं है। एसएन गोय्वका द्वारा सिखाए
- 1:10:26जाने वाले विपशना के 10 दिवसीय मौन
- 1:10:29शिविरों का डाटा इसका एक बहुत बड़ा और
- 1:10:31आधुनिक उदाहरण है।
- 1:10:33हम इन शिविरों में कोई सन्यासी नहीं जाते
- 1:10:35बल्कि आम लोग जाते हैं।
- 1:10:37डॉक्टर्स, इंजीनियर्स और कॉर्पोरेट जगत
- 1:10:39में भारी तनाव के बीच काम करने वाले लोग
- 1:10:4210 दिन का मौन ना आज के दिमाग के लिए एक
- 1:10:44बहुत बड़ा झटका होता है। बिल्कुल जो दिमाग
- 1:10:47रोजाना डोपामिन स्क्रीन और बीटा वेव्स की
- 1:10:49उच्च गति का आदि हो चुका है उसे जब अचानक
- 1:10:5310 दिन तक कोई बाहरी इनपुट नहीं मिलता कोई
- 1:10:56बातचीत नहीं होती
- 1:10:57तो वो शुरुआत में तड़पता है लेकिन फिर
- 1:10:59शांत होने पर मजबूर हो जाता है
- 1:11:00और इसी लंबी शांति का परिणाम है कि विपशना
- 1:11:03शिविरों में हिस्सा लेने वाले कई लोग अपने
- 1:11:06अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि कुछ दिन
- 1:11:09लगातार मौन में रहने के बाद
- 1:11:11उन्हें अपने माथे के बिल्कुल बीच में एक
- 1:11:13अजीब सा दबाव गरमा गर्माहट या स्पंदन
- 1:11:16महसूस होने लगता है।
- 1:11:17यह कोई शारीरिक बीमारी या दर्द नहीं होता।
- 1:11:21विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो यह
- 1:11:23दिमाग का लगातार अल्फा और थीटा स्टेट में
- 1:11:27बने रहने का नतीजा है।
- 1:11:28जिससे पाइनियल ग्लैंड सक्रिय होकर अपनी
- 1:11:31भौतिक उपस्थिति का एहसास कराती है।
- 1:11:34इसी कड़ी में भारत के पूर्व राष्ट्रपति और
- 1:11:37महान वैज्ञानिक डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम
- 1:11:40का उदाहरण भी एक बिल्कुल अलग नजरिया पेश
- 1:11:43करता है।
- 1:11:44हां कलाम साहब कोई सन्यासी या योगी तो थे
- 1:11:46नहीं। वो एक रॉकेट साइंटिस्ट थे। जिनका
- 1:11:49पूरा काम विश्लेषण और डाटा पर निर्भर था।
- 1:11:52लेकिन अपनी आत्मकथा विंग्स ऑफ फायर में
- 1:11:55उन्होंने साफ तौर पर बताया है कि उनके
- 1:11:57जीवन के सबसे बेहतरीन और महत्वपूर्ण
- 1:12:00वैज्ञानिक विचार किसी तनावपूर्ण विश्लेषण
- 1:12:03या बहुत जोर देकर सोचने से नहीं आए। उनके
- 1:12:05विचार उस गहरी आंतरिक शांति से निकले थे
- 1:12:09जहां दिमाग के विचार पूरी तरह शांत हो
- 1:12:11जाते हैं।
- 1:12:12जब बाहरी शोर बंद होता है तभी इंसान चेतना
- 1:12:15के उस स्तर तक पहुंच सकता है जहां से असल
- 1:12:18रचनात्मकता जन्म लेती है।
- 1:12:20यह दर्शाता है कि अजना चक्र या पाइनियल
- 1:12:23ग्लैंड का जागरण सिर्फ आध्यात्मिक मोक्ष
- 1:12:25के लिए नहीं है।
- 1:12:27बल्कि दुनियावी और वैज्ञानिक और बौद्धिक
- 1:12:30विकास के लिए भी उतना ही जरूरी है। कुंभ
- 1:12:32मेले पर हुए शोध का जिक्र करना भी यहां
- 1:12:35जरूरी हो जाता है।
- 1:12:36हां, कुंभ मेले में करोड़ों लोगों की भीड़
- 1:12:38होती है।
- 1:12:38लेकिन इसके बावजूद वहां एक सामूहिक
- 1:12:41श्रद्धा और शांति का माहौल बना रहता है।
- 1:12:44वहां आए ज्यादातर लोग कोई औपचारिक ध्यान
- 1:12:46तो करते नहीं है।
- 1:12:47फिर भी शोधकर्ताओं ने पाया है कि उस
- 1:12:50सामूहिक शांति में कई आम लोगों ने खुद को
- 1:12:54अपने शरीर से बड़ा महसूस किया। यह इस बात
- 1:12:57का बहुत बड़ा सबूत है कि जब सामूहिक रूप
- 1:13:00से इंसान गहरी शांति का अनुभव करता है तो
- 1:13:03पाइनियल ग्लैंड और ब्रेन वेव्स प्राकृतिक
- 1:13:05रूप से एक नए तालमेल में आ जाते हैं।
- 1:13:08यह सब समझने के बाद मन में स्वाभाविक रूप
- 1:13:10से यह सवाल आता है कि ध्यान का वो असली
- 1:13:13सफर कैसा होता है जो इंसान को इस ग्रंथि
- 1:13:16के जागरण तक पहुंचाता है।
- 1:13:18स्रोत सामग्री में ना इस सफर को बहुत ही
- 1:13:20स्पष्ट रूप से पांच अलग-अलग चरणों में
- 1:13:22बांटा गया है।
- 1:13:23यह समझना बहुत जरूरी है कि ध्यान कोई
- 1:13:26इलेक्ट्रॉनिक स्विच नहीं है जिसे दबाते ही
- 1:13:28दिमाग तुरंत शांत हो जाए।
- 1:13:30यह एक क्रमिक प्रक्रिया है।
- 1:13:32धीरे-धीरे होने वाली
- 1:13:33ध्यान के सफर का जो पहला चरण है उसे
- 1:13:36शुरुआत का संघर्ष या एंट्री रेजिस्टेंस
- 1:13:38कहा जाता है।
- 1:13:39जब कोई इंसान आंखें बंद करके बैठता है तो
- 1:13:42उसका दिमाग अपना नियंत्रण छोड़ना नहीं
- 1:13:44चाहता। आंख बंद करते ही अचानक याद आने
- 1:13:47लगता है कि बिजली का बिल भरना बाकी है या
- 1:13:50फिर अचानक नाक पर खुजली होने लगती है।
- 1:13:53यह असल में वो बीटा स्टेट है जो शांत होने
- 1:13:56का विरोध कर रहा होता है और शरीर को वापस
- 1:13:58बाहरी दुनिया में खींचना चाहता है।
- 1:14:00जब इस शुरुआती संघर्ष को पार कर लिया जाता
- 1:14:03है तब दूसरा चरण आता है जिसे सतह का शांत
- 1:14:07होना कहते हैं।
- 1:14:08कुछ मिनटों के बाद सांसे प्राकृतिक रूप से
- 1:14:10धीमी पड़ने लगती हैं। विचारों की रफ्तार
- 1:14:13कम हो जाती है और शरीर में एक हल्कापन
- 1:14:15महसूस होने लगता है।
- 1:14:17यहीं से असली मानसिक रिलैक्सेशन शुरू होता
- 1:14:19है और इसके बाद तीसरा चरण शुरू होता है
- 1:14:22जिसे गहराई कहते हैं।
- 1:14:24इस गहराई वाले चरण में ना समय का एहसास
- 1:14:26लगभग गायब होने लगता है।
- 1:14:28इंसान को यह पता ही नहीं चलता कि आंखें
- 1:14:30बंद किए हुए 10 मिनट बीते हैं या 1 घंटा।
- 1:14:32विचार ना के बराबर रह जाते हैं और यही वह
- 1:14:35जगह है जहां से चौथा चरण यानी दहलीज या द
- 1:14:40थ्रेशहोल्ड की शुरुआत होती है।
- 1:14:42यह अवस्था बहुत अहम है।
- 1:14:44बिल्कुल यह दहलीज सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव
- 1:14:47है। यहीं पर माथे के बीच उस दबाव या
- 1:14:50गर्माहट का एहसास होता है। जिसका जिक्र
- 1:14:53विपसना के अनुभव में आया था। यह वो पॉइंट
- 1:14:56है जहां शरीर की ऊर्जा पाइनियल ग्लैंड पर
- 1:14:59केंद्रित हो रही होती है।
- 1:15:00और जब इस दहलीज को पूरी तरह पार कर लिया
- 1:15:03जाता है तो पांचवा और अंतिम चरण आता है
- 1:15:06जिसे चेतना का विस्तार कहते हैं।
- 1:15:08इस अंतिम अवस्था में जागरूकता की कोई सीमा
- 1:15:12नहीं रह जाती। ऐसा महसूस होता है जैसे
- 1:15:14शरीर और कमरे की दीवारें मिट गई हैं।
- 1:15:17इंसान एक खुले आसमान या असीम शून्य में
- 1:15:20बदल गया है।
- 1:15:21और इसी चरण में एक ऐसी घटना का उल्लेख
- 1:15:24मिलता है जिसे प्राचीन भारतीय ग्रंथों में
- 1:15:27ज्योति दर्शन कहा गया है।
- 1:15:29यानी अंदर एक बहुत ही तेज और शुद्ध प्रकाश
- 1:15:33का दिखाई देना।
- 1:15:34आधुनिक विज्ञान इस आंतरिक प्रकाश को
- 1:15:36पाइनियल ग्लैंड के उन फोटो रिसेप्टर सेल
- 1:15:38से जोड़कर देखता है जिनकी चर्चा हमने
- 1:15:40शुरुआत में की थी। जब इंसान इस गहरी, शांत
- 1:15:44और असीम अवस्था में होता है तो वे सेल्स
- 1:15:46दिमाग की अपनी ही इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी
- 1:15:49पर प्रतिक्रिया करने लगते हैं।
- 1:15:51यह कोई भ्रम या मात्र कल्पना नहीं है। यह
- 1:15:54शरीर का अपना न्यूरोलॉजिकल सिस्टम है जो
- 1:15:58ऊर्जा को प्रकाश के रूप में प्रस्तुत करता
- 1:16:00है।
- 1:16:01जो चीजें सदियों से जादुई या विशुद्ध
- 1:16:03रहस्यमई लगती थी ना, उनके पीछे पूरी की
- 1:16:06पूरी बायोलॉजिकल मशीनरी काम कर रही है। यह
- 1:16:08समझना सच में बहुत सशक्त करने वाला है।
- 1:16:10लेकिन इस पूरे विश्लेषण को आधुनिक जीवन के
- 1:16:13चश्मे से देखना भी उतना ही जरूरी है।
- 1:16:15आज के इस तेज तर्रार और हमेशा कनेक्टेड
- 1:16:18रहने वाले दौर में रहने वाले किसी आम
- 1:16:20इंसान के लिए इस जानकारी के क्या मायने
- 1:16:22हैं?
- 1:16:23आज की दुनिया विशेषकर शहरी जीवन एक भयानक
- 1:16:26स्लीप क्राइसिस या नींद के संकट से गुजर
- 1:16:29रही है।
- 1:16:30स्क्रीन की नीली रोशनी, डिजिटल उपकरणों का
- 1:16:33एडिक्शन और काम का लगातार दबाव। इन सब ने
- 1:16:36इंसान के दिमाग को 24 घंटे बीटा स्टेट का
- 1:16:39बंदी बना दिया है।
- 1:16:40पाइनियल ग्लैंड जो नींद से लेकर गहरी
- 1:16:43चेतना तक का मुख्य केंद्र है उसे अपना काम
- 1:16:46करने के लिए गहरे अंधेरे और बाहरी शोर से
- 1:16:49पूरी तरह कट जाने की जरूरत होती है।
- 1:16:51जब तक वह शांति और अंधेरा नहीं मिलेगा,
- 1:16:54मेलाटोनिन और अन्य महत्वपूर्ण रसायनों का
- 1:16:57उत्पादन ठीक से नहीं हो पाएगा।
- 1:16:59इसलिए दिन भर में थोड़ी देर के लिए ही
- 1:17:01सही। स्क्रीन बंद करके दिमाग को शांत करना
- 1:17:04कोई विलासिता नहीं है।
- 1:17:06बल्कि अपनी ही खोई हुई बायोलॉजिकल क्षमता
- 1:17:09को वापस पाने की एक बुनियादी जरूरत है।
- 1:17:12यह समझना कि इंसान के शरीर में ही शांति,
- 1:17:16स्पष्टता और उच्च चेतना के उपकरण जन्म से
- 1:17:19मौजूद हैं। अपने आप में एक बहुत बड़ी
- 1:17:21शक्ति है।
- 1:17:22बाहर के शोर से कटकर ही इंसान इस अंदरूनी
- 1:17:25सिस्टम को उसके सबसे बेहतरीन रूप में काम
- 1:17:28करने का मौका दे सकता है। हमारी बायोलॉजी
- 1:17:30हमेशा से इसी शांति के लिए डिजाइन की गई
- 1:17:32है।
- 1:17:32बिल्कुल।
- 1:17:33इस पूरे गहरे विश्लेषण को समेटते हुए ना
- 1:17:36स्रोत सामग्री से प्रेरित एक ऐसा विचार
- 1:17:38सामने आता है जो सच में सोचने पर मजबूर कर
- 1:17:41देता है।
- 1:17:42वो क्या?
- 1:17:42यह सोचने वाली बात है कि अगर इंसान के ही
- 1:17:45दिमाग के बिल्कुल गहरे और अंधेरे हिस्से
- 1:17:47में एक ऐसी ग्रंथि मौजूद है जो सिर्फ उसके
- 1:17:50शांत होने का इंतजार कर रही है ताकि वह
- 1:17:52शरीर के अंदर की ही एक अद्भुत रोशनी और
- 1:17:54चेतना दिखा सके। तो इंसानी शरीर और
- 1:17:56बायोलॉजी में ऐसे और कितने रहस्यमई सिस्टम
- 1:18:00छिपे होंगे जो केवल इस बात का इंतजार कर
- 1:18:03रहे हैं कि बाहर का शोर बंद हो और उनके
- 1:18:05सक्रिय होने पर ध्यान दिया जाए।
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