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Afsoos Aj ka Muselman Imaan ko Bhula Betha hai By Hazrat ji Molana Saad Sahb Kandhlawi DBA Ibn Abbas — Transcript

by Ibn Abbas · 2,926 words · 393 segments · language en · Watch on YouTube

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  1. 0:00[संगीत]
  2. 0:02मेरे अजीज मोहतरम दोस्तों, बुजुर्गों,
  3. 0:04अजीजों
  4. 0:05इस जमाने में मुसलमान
  5. 0:08दुनिया की दौलत को और दुनिया की चीजों को
  6. 0:13नेमत समझकर इस्तेमाल भी कर रहा है और नेमत
  7. 0:17समझकर इसका हासिल करने की कोशिश भी कर रहा
  8. 0:20है।
  9. 0:22लेकिन इसको यह नहीं मालूम के सबसे बड़ी
  10. 0:25दौलत और सबसे बड़ी नेमत [संगीत]
  11. 0:29जो मुसलमान को इस जमाने में सहाबा के बाद
  12. 0:33मिली है।
  13. 0:35जो मुसलमान को सहाबा के बाद सबसे बड़ी
  14. 0:38दौलत मिली है। जितनी बड़ी दौलत किसी मखलूक
  15. 0:43को नहीं मिली। बल्कि अगर यह भी कहा जाए
  16. 0:47कि ईमान सबा इकराम के बाद सबा इकराम के
  17. 0:51बाद ईमान
  18. 0:54अफजलियत के ऐतबार से
  19. 0:58अफजलियत [संगीत]
  20. 0:58के ऐतबार से
  21. 1:01और ईमान बिल गैब होने के ऐतबार से सहाबा
  22. 1:06के बाद अगर दिया गया है तो इस उम्मत को
  23. 1:08दिया गया है। हमने हर चीज को नेमत समझा।
  24. 1:13हर चीज को दौलत समझा। और इसको हासिल करने
  25. 1:16की हर मुमकिन कोशिश की। लेकिन इस जमाने
  26. 1:20में मुसलमान
  27. 1:22ईमान को सबसे बड़ी नेमत और ईमान को सबसे
  28. 1:25बड़ी दौलत नहीं समझता। बल्कि ख्याल ये
  29. 1:28पैदा हो गया है कि हम तो ईमान वाले हैं।
  30. 1:32ईमान की हमें क्या जरूरत है? इस जमाने की
  31. 1:35सबसे बड़ी गलतफहमी यह है और इस जमाने का
  32. 1:39सबसे बड़ा धोखा यह लगा है ईमान वालों को
  33. 1:41कि वह समझते हैं ये कलम ला इलाहा
  34. 1:44इल्लल्लाह इसकी मेहनत के मैदान वो अियार
  35. 1:47हैं जो अभी इस्लाम में नहीं आए हैं।
  36. 1:50हालांकि अल्लाह रब्बुल इज्जत कुरान में
  37. 1:54मोमिन को इस कलमे का ज्यादा अहल और ज्यादा
  38. 1:58हक़दार फरमा रहे हैं के मोमिन ईमान का अहल
  39. 2:02और ईमान के ज्यादा हकदार है। अल कम तकवाला
  40. 2:10मैंने एक बात अर्ज की है कि मुसलमान नहीं
  41. 2:13समझता इस जमाने का के हमें मलायका अंबिया
  42. 2:19और सहाबा मेरी बात तवज्जो चाहेगी बहुत
  43. 2:23जमाने का मुसलमान नहीं समझता के हमें
  44. 2:27मलायका अंबिया और सहाबा इन तीनों किस्मों
  45. 2:32से बढ़कर ईमान हमें दिया गया था।
  46. 2:36इन तीनों किस्मों से बढ़कर ईमान हमें दिया
  47. 2:39गया था।
  48. 2:40इसलिए के सही हदीस है।
  49. 2:45[संगीत]
  50. 2:45मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं
  51. 2:49के इस वक्त मुसलमान जितना ईमान से गाफिल
  52. 2:52है, आमाल से भी इतना गाफिल नहीं है जितना
  53. 2:55ईमान से गाफिल है। हालांकि हकीकत यह है कि
  54. 2:59ईमान के बगैर ना आमाल पर इस्तकामत हो सकती
  55. 3:03है। ना ईमान के बगैर इसको बाततिल पर गलबा
  56. 3:08मिल सकता है। ना ईमान के बगैर अल्लाह के
  57. 3:11वादे इसके लिए पूरे हो सकते हैं और ना
  58. 3:13ईमान के बगैर इसके किसी अमल में इलास हो
  59. 3:16सकता है और ना ईमान के बगैर इसे अपने दीन
  60. 3:19पर इस्तकामत हो सकती है। ये जो बुनियादी
  61. 3:21चीजें हैं क्योंकि सारे वादे यकीन पर हैं।
  62. 3:26सारा इखलास यकीन में है। सारा गलबा यकीन
  63. 3:30पर है।
  64. 3:33लेकिन इस सब के बावजूद इस जमाने का
  65. 3:36मुसलमान जितना ईमान से गाफिल है, इतना
  66. 3:40आमाल से भी गाफिल नहीं है।
  67. 3:43हालांकि मैं दरमियान में अर्ज कर दूं कि
  68. 3:46उलमा ने लिखा है कि [संगीत] अहकाम का इल्म
  69. 3:49अमल के लिए मकसूद है। बजादे खुद मकसूद
  70. 3:51नहीं है।
  71. 3:53अमल इल्म बराए अमल है। इल्म बराए इल्म
  72. 3:56नहीं है। इल्म बराए अमल है। जब इल्म बराए
  73. 4:00अमल है, तो इल्म से फरागत हो जाएगी। लेकिन
  74. 4:05ईमान बराए ईमान नहीं है। अल्लाह के तौहीद
  75. 4:08को बयान करना बराए बल्कि अल्लाह की तौहीद
  76. 4:12को बयान करना बजाते खुद मकसूद है। यह उलमा
  77. 4:16के समझने की बात है। कि इल्म बराए अमल
  78. 4:20मकसूद है। इससे फरागत हो जाएगी। नमाज का
  79. 4:23इल्म अंदर आ गया है। इसके मुताबिक नमाज़
  80. 4:25पढ़ो। रोजे का इल्म अंदर आ गया है। इसके
  81. 4:28मुताबिक रोजा रखो। जकात का इल्म मालूम हो
  82. 4:30गया है। इसके मुताबिक जकात दो। हज का इल्म
  83. 4:33अंदर आखिर दाखिल हो गया है। इसके मुताबिक
  84. 4:36हज करो। आप हर नमाज में किताब खोलकर नहीं
  85. 4:39देखते कि नमाज का तरीका क्या है। आप हज
  86. 4:41करते हैं। हज का तरीका आपको मालूम है। आप
  87. 4:43जकात देते हैं। आपको माल की मिकदार मालूम
  88. 4:46है अपने और उस पर जकात की मिकदार आपको
  89. 4:48मालूम है। लेकिन ईमान से मोमिन को फदागत
  90. 4:52नहीं है। तो मैंने अर्ज किया के वो ईमान
  91. 4:58जो इस उम्मत को वो ईमान जो इस उम्मत को
  92. 5:03मलायका
  93. 5:05अंबिया और सहाबा से बढ़कर दिया गया था इस
  94. 5:08जमाने के मुसलमान ने सबसे ज्यादा ईमान को
  95. 5:12जाय किया है।
  96. 5:15सही हदीस है। यह फरमाया हुजूर अकरम
  97. 5:18सल्लल्लाह वसल्लम ने
  98. 5:21अपने सहाबा से फरमाया कि बताओ सबसे अफजल
  99. 5:25ईमान किसका है?
  100. 5:27पूछा सहाबा से अफजल ईमान किसका है? सहाबा
  101. 5:30ने अर्ज किया कि सबसे अफजल ईमान तो मलाइका
  102. 5:33का हो सकता है।
  103. 5:36फरमाया कि मलायका का ईमान अफजल होना क्या
  104. 5:39कमाल है? [संगीत] होना ही चाहिए। आरिश को
  105. 5:43वो थामे हुए हैं। [संगीत]
  106. 5:46हमें तो आरिश के वजूद पर ईमान लाना है कि
  107. 5:49हां है [संगीत] जन्नत दोजख के वजूद पर
  108. 5:52ईमान लाना कि हां है हम बगैर देखे उसको गए
  109. 5:54हैं। लेकिन मलायका जो जहन्नुम की बागे
  110. 5:58थामे हुए हैं। वो मलाइयका जो जहन्नुम के
  111. 6:01अज़ाब को बढ़ाने और जहन्नुम के अज़ाब के सारे
  112. 6:05निजाम पर मुसल्लत हैं। वो मलायका जो हर
  113. 6:09वक्त रुकू में या सजदे में या कौमे में या
  114. 6:12कायदे में या जलसे में है।
  115. 6:15जो सारा गैबी निजाम सारे गैबी निजाम में
  116. 6:19फरिश्ते फैले हुए हैं। उनसे बढ़कर ईमान
  117. 6:22किसका होगा? [संगीत]
  118. 6:24सबा ने अर्ज किया कि या रसूल अल्लाह अफजल
  119. 6:27ईमान तो उन्हीं का हो सकता है जो एक
  120. 6:30अल्लाह के मुकर्रम मखलूक मलायका है।
  121. 6:33फरमाया उनका ईमान ऐसा क्यों ना हो और उनका
  122. 6:36ऐसा ईमान होना क्या कमाल है उनका ईमान ऐसा
  123. 6:39होना ही चाहिए क्योंकि वो सदा गैबी निजाम
  124. 6:42देख रहे हैं। [संगीत]
  125. 6:43सहाबा ने सोच कर अर्ज किया कि फिर तो ऐसा
  126. 6:47ईमान अंबिया अली सलाम का हो सकता है। आपने
  127. 6:51फरमाया अंबिया सलाम का ईमान ऐसा क्यों ना
  128. 6:53हो अंबिया का ईमान ऐसा क्यों ना हो
  129. 6:58कि उन पर वही आती है उनके पास मलाइयका आते
  130. 7:01हैं जिब्राइल वही लेकर आते हैं फिर बाद
  131. 7:04अंबिया अल सलाम को आसमान पर उठाया गया
  132. 7:06सारा निजाम उन्होंने देखा इदरीस अल सलाम
  133. 7:09ने आसमानों की सैर की है हुजूर ने आसमानों
  134. 7:11की सैर की है आपने फरमाया के अंबिया का
  135. 7:14ईमान ऐसा क्यों ना हो क्या कमाल है इसमें
  136. 7:18उन्होंने सारा गैबी निजाम देखा है
  137. 7:21सहाबा ने अर्ज किया कि फिर तो आपके बाद हम
  138. 7:25रह गए।
  139. 7:27सहाबा का ईमान ही ऐसा होना चाहिए। अब
  140. 7:30क्यों सहाबा का ईमान ऐसा क्यों ना हो? वही
  141. 7:34को नाजिल होते हुए देख रहे हैं। फरिश्तों
  142. 7:36का नजूल देख रहे हैं गजवात में और फिर मैं
  143. 7:39तुम्हारे दरमियान में हूं। आपने फरमाया
  144. 7:42मैं तुम्हारे दरमियान में हूं। तुम
  145. 7:44मुस्तजल देख रहे हो आसमान [संगीत] से वही
  146. 7:46भी आते हुए। मुसल सेल देख रहे हो आसमान से
  147. 7:48गैबी मददों के आते हुए तुम्हारा ईमान ऐसे
  148. 7:52क्यों ना हो जी हां देखो सोचने की बात है
  149. 7:56मलायका का ईमान अंबिया का ईमान सहाबा का
  150. 8:00ईमान इन सबके ईमान के बाद आपने फरमाया कि
  151. 8:05सबसे अफजल ईमान उन लोगों का है जो मेरे
  152. 8:09बाद आएंगे दुनिया में और मुझे बगैर देखे
  153. 8:12सिर्फ कुरान हदीस को देखकर मेरे दीन में
  154. 8:15दाखिल होंगे मुझ पर ईमान लाएंगे
  155. 8:18जिन्होंने ना मुझे देखा है ना उन्होंने
  156. 8:22गैबी मदद और मौजात देखे हैं। अफजल तरीन
  157. 8:26ईमान उनका होगा। अल्लाहू अकबर।
  158. 8:31खैर मुसलमान ईमान से गाफिल है। लिखा है
  159. 8:34उलमा ने कि ईमान सहाबा के बाद आने वाले
  160. 8:38सहाबा के बाद ईमान में आने वाले मुसलमानों
  161. 8:41का ईमान वो अफजल तरीन ईमान है। क्योंकि ये
  162. 8:45तीनों किस्में गैब के निजाम को देखकर ईमान
  163. 8:47लाई हैं। [संगीत]
  164. 8:48इसलिए मैंने अ किया कि सबसे बड़ी दौलत
  165. 8:52ईमान है और ईमान में ईमान बिल गैब असल है।
  166. 8:56ईमान बिल गैब असल है। जिसमें मुशाहदात
  167. 9:00तजुर्बात जाहिरी तमाम निजामे कायनात इसका
  168. 9:05इंकार किए बगैर खुदा की कसम ईमान का जर्रा
  169. 9:09भी दिल में नहीं आता है। यह एक मुसल्लम
  170. 9:11बात है के निजाम कायनात का जाहिरी पूरे
  171. 9:15निजाम का मुशाहदात का इंकार किया करना
  172. 9:19पड़ेगा तब ईमान दिल में दाखिल होगा। अगर
  173. 9:22का निजाम कायनात को असल समझता है तो ईमान
  174. 9:27ईमान की हकीकत तक कभी ईमान की हकीकत क्या
  175. 9:30है ईमान की इब्तदा तक भी कभी रसाई नहीं
  176. 9:32होगी
  177. 9:34ईमान बिल गैब असल है इसलिए
  178. 9:38अंबिया अल सलाम का सबसे पहला काम यह हुआ
  179. 9:42[गाना गाने की आवाज़][संगीत]
  180. 9:43कि उन्होंने आकर जितनी भी शक्लें थी
  181. 9:47कायनात की और जितनी भी शक्लें इन्होंने
  182. 9:50खुद बनाई
  183. 9:52इन शक्लों पर अपने निजाम और अपने मसाइल को
  184. 9:57तकसीम करके
  185. 10:00ये शक्ल है रि देने वाली ये शक्ल है औलाद
  186. 10:04देने वाली ये शक्ल है बारिश देने वाली ये
  187. 10:06शक्ल है सेहत देने वाली इन सारी शक्लों का
  188. 10:12इंकार किया कुदरत के मुकाबले में ला इलाहा
  189. 10:15में सबसे पहले अल्लाह के हर गैर की नफी है
  190. 10:21सबसे पहले अल्लाह के हर गैर की नफी है। और
  191. 10:24इस नफी का मतलब सिर्फ इंकार करना नहीं कर
  192. 10:27देना नहीं है। बल्कि इस नफी का मकसद इस
  193. 10:31नफी का असल मतलब यह है कि तुम इन शक्लों
  194. 10:34से कोई उम्मीद ही मत रखना। इनसे उम्मीद की
  195. 10:36भी नफी करो। यह कहना नहीं ये ये खुदा नहीं
  196. 10:40है कि यह खुदा नहीं है तो तुम्हें इससे
  197. 10:42उम्मीद क्यों है?
  198. 10:45यह खुदा नहीं है तो इससे उम्मीद क्यों है?
  199. 10:49मैंने अर्ज किया कि सबसे पहला काम सलाम का
  200. 10:52यह है कि वो आकर अपनी कौम को ईमान बिल गैब
  201. 10:56सिखलाते हैं। और ईमान बिल गैब ही असल है।
  202. 11:01लिखा है उलमा ने कि जिस चीज की तस्दीक
  203. 11:03देखकर की जाए उसको ईमान नहीं कहते।
  204. 11:06उसको ईमान नहीं कहते। तस्दीक देखकर की
  205. 11:08जाए।
  206. 11:10ईमान बिल गैब असल है। हुजूर अकरम
  207. 11:13सल्लल्लाह वसल्लम ने अपने सहाबा के यकीन
  208. 11:17को कायनात के जाहरी निजाम से हटाया था।
  209. 11:22सहाबा के यकीन को कायनात के जाहिरी निजाम
  210. 11:25से हटाया था। उन्होंने अपने कायनात में
  211. 11:28पेश आने वाले तगुरात को
  212. 11:32कायनात में पेश आने वाले तगुरात को कायनात
  213. 11:36से जोड़ने पर कुफ्र से डराया था। मेरी बात
  214. 11:39बहुत तवज्जो चाहती है कि निजामे कायनात को
  215. 11:42कायनात से मत जोड़ना। निजाम कायनात को
  216. 11:45बराहेरास्त खालिक कायनात से जोड़ना। अगर
  217. 11:49तुमने [संगीत] कायनात के निजाम को कायनात
  218. 11:51से जोड़ा तो देहयत तो देहत में पढ़ोगे।
  219. 11:54इसलिए कि दहत कहते ही इसको हैं कि निजाम
  220. 11:57कायनात [संगीत] का निजाम कायनात से चल रहा
  221. 11:59है। यानी जमाना ज़माने को चला रहा है।
  222. 12:02दहनियत इसी का नाम है। दहत इसी का नाम है
  223. 12:06कि निजामे कायनात कायनात से चलता है। नहीं
  224. 12:08निजाम कायनात खालिक कायनात से चलता है।
  225. 12:11खुदा की कसम जितने मुंतज़िर जितने मुंतज़िर
  226. 12:17इसराफ़िल सुर फूंकने में अल्लाह की तरफ़
  227. 12:20पेशानी लगाए हुए नजर जमाए हुए अल्लाह के
  228. 12:24अमर के मुंतज़िर हैं। जितना इंतज़ार इनका है
  229. 12:27अल्लाह के अमर में सुर फूंकने सारे आलम को
  230. 12:30तबाह करने के लिए खुदा की कसम इतना ही
  231. 12:33मुंतज़िर एक दरख्त का पत्ता सूख कर दरख्त
  232. 12:36से गिरने में अल्लाह के अम्र का मुंतज़िर
  233. 12:39है।
  234. 12:40जी हां।
  235. 12:42इस पर ईमान लाना होगा
  236. 12:45ताकि इस दरमियान की जितनी शक्लें हैं
  237. 12:48इसराफील के सुर फूंकने से लेकर इस पत्ते
  238. 12:51के गिरने तक और जिब्राइल के हजम और उनके
  239. 12:56कदोकामत और उनके फैलाव से लेकर उनके त से
  240. 13:00लेकर एक चुंटी तक जितनी शक्ल इनके दरमियान
  241. 13:03में है इन सारी शक्लों का इसी तरह इंकार
  242. 13:06करना पड़ेगा
  243. 13:09कि करने वाली जात सिर्फ अल्लाह की है।
  244. 13:11अल्लाह को बोलना सबसे बड़ी इबादत है।
  245. 13:14अल्लाह को बोलना जिक्र है। इस जमाने में
  246. 13:17लोग सिर्फ तस्दी पढ़ने को जिक्र समझते
  247. 13:19हैं। मेरी बात तवज्जो चाहती है बहुत। इस
  248. 13:22जमाने में लोग सिर्फ तस्दी पढ़ने को जिक्र
  249. 13:24समझते हैं। नहीं। बल्कि नबी को जो जिक्र
  250. 13:29का हुकुम है, नबी को जो जिक्र का हुकुम
  251. 13:32है, उसमें नबी को इसका हुकुम है कि आप
  252. 13:35होइए और आप अल्लाह की बड़ाई को उसकी
  253. 13:39किबियाई को इन तमाम शक्लों के मुकाबले में
  254. 13:42बड़ा बयान कीजिए। आपसे और अंबिया अंबिया
  255. 13:46साबिकन से जो कुफ्र की लड़ाई है वह जिक्र
  256. 13:49पर नहीं है। वो जिक्र पर नहीं है। बल्कि
  257. 13:53वो लड़ाई अल्लाह के तज़किरों पर है। लड़ाई
  258. 13:57अल्लाह के तज़करों पर है।
  259. 14:01इन
  260. 14:02लड़ाई सारी इस पर थे। लड़ाई सारी इस पर
  261. 14:05थी।
  262. 14:08रब्बी अल्लाह की लड़ाई सारी इस पर है।
  263. 14:11इसलिए हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अल वसल्लम ने
  264. 14:14अपने सबा के ज़हन को कायनात के जाहरी निजाम
  265. 14:18से हटाया कि निजाम कायनात के तगुरात का
  266. 14:21कायनात से कोई ताल्लुक नहीं है।
  267. 14:25ऊंटों ने खारिश फैली मैं बताऊंगा समझाऊंगा
  268. 14:30कि जो हालात पेश आते हैं इन हालात में
  269. 14:33अल्लाह को लोग कितना याद रखते हैं।
  270. 14:36[संगीत]
  271. 14:37ठीक है। एक तस्बी आपने सुबह पढ़ ली, शाम
  272. 14:39को पढ़ ली। इसमें कोई शक नहीं। अल्लाह के
  273. 14:41जिक्र के अनवारात, उसके जिक्र के फजाइल,
  274. 14:43उसके जिक्र की बरकात सब अपनी जगह है। उससे
  275. 14:46इंकार नहीं है। लेकिन ये बात याद रखना
  276. 14:49[संगीत]
  277. 14:50कि अल्लाह के गैर का तासुर दिलों से
  278. 14:52निकलेगा नहीं। जब तक अल्लाह की जात से
  279. 14:56होने में उसके गैर का इंकार ना हो। एक ला
  280. 15:00इलाहा इल्लल्लाह का जिक्र है। एक ला इलाहा
  281. 15:02इल्लल्लाह के तजरे हैं।
  282. 15:05चुनांचे सहाबा ने अर्ज किया कि ऊंटों में
  283. 15:09खारिश फैल गई है। आपने सवाल खड़ा किया कि
  284. 15:13ऊंटों में खारिश कैसे फैली है?
  285. 15:17सहाबी ने जवाब दिया कि एक ऊंट को हुई थी
  286. 15:19सबको हो गई। ये
  287. 15:23जी हां कि नहीं यह बात कलमे के और ईमान के
  288. 15:28बिल्कुल खिलाफ है। [संगीत] ये अल्लाह की
  289. 15:30कुदरत का इंकार कर देना है। जी हां पक्की
  290. 15:34बात है। ये कुदरत का इंकार कर देना है। कि
  291. 15:38एक को हुई थी फिर सबको हो गई। फरमाया आपने
  292. 15:41कि अगर इस एक से सबको खारिश हुई है तो
  293. 15:43पहले ऊंट को खारिश कहां से हुई? यह बतलाओ।
  294. 15:47[संगीत]
  295. 15:48नाउजब्लाह नाउजब्लाह ये कहना के पहले ऊंट
  296. 15:51को अल्लाह के हुक्म से हुई बाकी को ऊंटों
  297. 15:53से हो गई यह निजाम यह निजाम कुदरत का
  298. 15:56निजाम कहलाने के काबिल नहीं है ये निजाम
  299. 16:00कुदरत का निजाम कहने के काबिल नहीं है कि
  300. 16:03एक ऊंट को खारिश हो गई थी फिर सबको हो गई
  301. 16:05नाउजब्लाह अल्लाह तो एक को चाहते थे मगर
  302. 16:07सबको हो गई
  303. 16:09नहीं है इसकी कोई गुंजाइश नहीं है अल्लाह
  304. 16:13को अल्लाह मानने का तकाजा यह है कि कायनात
  305. 16:16में कोई जर्रा हर हरकत नहीं करता उसके
  306. 16:18अम्र के बगैर। तो जो उमूर पेश आते हैं उन
  307. 16:22उमूर को अल्लाह की तरफ फेरना।
  308. 16:25उन उमूर को अल्लाह की तरफ फेरना। ये ये है
  309. 16:28अल्लाह पर ईमान लाना। यह है अल्लाह पर
  310. 16:31ईमान लाना कि तुम कायनात के तगुरात को
  311. 16:34बराहरास्त खालिक कायनात से जोड़ो।
  312. 16:38वरना साफ बात यह है कि जो कायनात के
  313. 16:42तगुरात को कायनात से जोड़ देंगे
  314. 16:46उनके अल्लाह के दरमियान यह शक्लें हायल हो
  315. 16:49जाएंगी रुकावट बन जाएगी
  316. 16:52पक्की बात है कि जो कायनात के तगुरात को
  317. 16:57कायनात से जोड़ देंगे वो अल्लाह तक नहीं
  318. 16:59पहुंच सकेंगे
  319. 17:01[संगीत]
  320. 17:02वो अल्लाह तक नहीं पहुंच सकेंगे क्यों
  321. 17:05इसलिए के वह कहेंगे कि नजूमियों को भी खबर
  322. 17:09है क्या होगा।
  323. 17:11अगर नजूमी का इंकार नहीं करेंगे तो यह
  324. 17:14नजूमी होंगे। सितारों के पुजारी होंगे
  325. 17:17कि सितारों के पुजारी बनेंगे। अगर यह जमीन
  326. 17:21से होने का इंकार नहीं करेंगे तो यह जमीन
  327. 17:22के पुजारी बनेंगे। और दूसरों को भी कहेंगे
  328. 17:25आओ तुम भी हमारे साथ जमीन का शुक्रिया अदा
  329. 17:27करो कि जमीन गल्ला दे रही है। मैं बहुत
  330. 17:30अहम बात कह रहा हूं। अकायद बिगड़ते हैं
  331. 17:33निजाम कायनात को कायनात से जोड़ने की वजह
  332. 17:36से अकीदा बिगड़ता है काय निजाम कायनात को
  333. 17:39कायनात से जोड़ने की वजह से अकीदा दुरुस्त
  334. 17:42होता है निजाम कायनात का अल्लाह के
  335. 17:45मुकाबले में इंकार करने से अकीदा दुरुस्त
  336. 17:48होता है अकीदे की दुरुस्तगी यह है अगर यह
  337. 17:49नहीं सीखोगे ये नहीं सिखलाओगे और रोजाना
  338. 17:52बिल इल्तजाम बिला नागा इसकी दावत नहीं
  339. 17:56दोगे तो यकीन और हालात यकीन का बेगार और
  340. 18:01हालात यहां तक पहुंचा देंगे कि तुम्हें भी
  341. 18:04बैठ के सोचोगे कि अगर हम इनके साथ जमी के
  342. 18:08जेना के हैं तो क्या होगा? कानून तो यूं
  343. 18:12कह रहा है पक्की बात है। वो तो अल्लाह की
  344. 18:17तरफ बुलाने की वजह से अल्लाह की गैर का
  345. 18:20तासुर दिल से निकलता है। जब मोमिन अपनी
  346. 18:23जुबान से कहता है कि अल्लाह करते हैं।
  347. 18:26जब मोमिन अपनी जुबान से कहता है कि अल्लाह
  348. 18:28करते हैं। खुदा की कसम इससे ज्यादा इससे
  349. 18:34ज्यादा बाततिल के दिल के मरूब होने के लिए
  350. 18:37खुदा की कसम कुरान हदीस में इसके अलावा
  351. 18:40इससे बढ़कर और कोई सबब मिलेगा नहीं। मैं
  352. 18:43जो कह रहा हूं समझ कर कह रहा हूं। जो
  353. 18:45मोमिन कहता है कि अल्लाह करेंगे इससे
  354. 18:49ज्यादा बाततिल के कुलूब को मरब करने वाली
  355. 18:53और कोई चीज नहीं है।
  356. 18:58कुलब
  357. 19:03ये तो खुश इससे होंगे। ये तो खुश इस बात
  358. 19:07से होंगे कि आप कहे कि नहीं जी ऐसा नहीं
  359. 19:09है। हम अल्लाह भी हैं। फिर आप भी हैं।
  360. 19:12अल्लाह के बाद आप ही हैं। जी [संगीत] हां।
  361. 19:15जी हां। अल्लाह भी हैं। आप भी हैं। अल्लाह
  362. 19:17के बाद आप ही हैं। हां। इससे खुश हो
  363. 19:21जाएंगे। और नहीं अल्लाह ही हैं। सिर्फ तो
  364. 19:25इनके दिल इनके दिल मरहू होंगे।
  365. 19:29इनके दिल मर होंगे इससे
  366. 19:33और इनके दिल शकिस्ता हो जाएंगे इससे कि
  367. 19:36मोमिन ये कहे कि अल्लाह से होता है
  368. 19:40मैंने अ किया के सबसे बुनियादी काम यह था
  369. 19:45कि निजाम कायनात के तगुरात को कायनात से
  370. 19:49मत जोड़ो। अल्लाह ताला निजाम कायनात को
  371. 19:52बदलते ही इसलिए हैं ताकि देखे के मुसलमान
  372. 19:56इस बारे में क्या कहता है। हुदैबिया की
  373. 19:58रात में बारिश हुई। [संगीत]
  374. 20:01हुदबिया की रात में बारिश हुई। इस बारिश
  375. 20:04पर आपने फरमाया सहाबा से कि सुबह को तुम
  376. 20:07में से बाज काफिर होंगे बाज मोमिन।
  377. 20:09[संगीत]
  378. 20:09सहाबा घबरा गए। क्यों हम काफिर हो जाएंगे?
  379. 20:13और क्यों ईमान खो बैठेंगे?
  380. 20:15ईमान की दौलत के हासिल होने के बाद हम
  381. 20:19ईमान से पलट जाएंगे।
  382. 20:21ऐसे कैसे हो जाएगा? फरमाया कि हां जो यह
  383. 20:25कहेगा कि बारिश अल्लाह के हुक्म से हुई है
  384. 20:28वो अल्लाह पर ईमान लाने वाला है और
  385. 20:30सितारों का इंकार करने वाला है। जो यह
  386. 20:32कहेगा नहीं बारिश फला सितारे की वजह से
  387. 20:35हुई है। वो अल्लाह के इंकार करने वाला
  388. 20:38सितारों पर ईमान रखने वाला है।
  389. 20:41[संगीत]
  390. 20:41तो मैंने अर्ज किया कि इधर नजूमी सितारों
  391. 20:45के पुजारी [संगीत] इधर जमीनों के पुजारी
  392. 20:49यह कहेंगे मुसलमानों से कि आओ देखो यह
  393. 20:53निजाम

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