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Abu Zulekha Ka Sona | Sabr Aur Imandari Ka Waqia | Islamic Story #roshnikemusafir — Transcript

by 주식학개론 · 2,911 words · 348 segments · language en · Watch on YouTube

Full transcript

  1. 0:05रमजान का महीना था। मक्का की मुकद्दस सर
  2. 0:09जमीन पर पहली सेहरी का वक्त था। फजर्र की
  3. 0:13अजान की सदाएं फजा में गूंजने लगी। मक्का
  4. 0:16में रहने वाले लोग अजान की आवाज सुनते ही
  5. 0:19बैतुल्लाह की जानिब रवाना हो गए। लेकिन एक
  6. 0:2260 साला बुजुर्ग अबू जुलेखा अभी अपने घर
  7. 0:25पर ही ठहरा हुआ था। उस बुजुर्ग ने बगैर
  8. 0:29कुछ खाए पिए रोजा रख लिया था। वो भूख की
  9. 0:32शिद्दत से निढाल था। इस वजह से नमाज के
  10. 0:35लिए खड़ा होने के काबिल नहीं था। उनकी
  11. 0:38गुजस्ता रात भी फाके में बैठ गई। सारा दिन
  12. 0:41मजदूरी में गुजरा। इसलिए खाली पेट सहरी
  13. 0:45करके उस बुजुर्ग ने नमाज घर में ही अदा
  14. 0:47की। उसके बाद वह गमजदा होकर एक कोने में
  15. 0:50बैठ गया। उस बुजुर्ग को अपनी फाकाशी पर
  16. 0:54इतना दुख नहीं था। जो चीज उसे सबसे ज्यादा
  17. 0:57गमजदा कर रही थी वो उसकी दो बेटियां और
  18. 1:00बीवी थी। उस बुजुर्ग का कोई बेटा नहीं था।
  19. 1:04वो अपने घर का वाहिद कफील और जिम्मेदार
  20. 1:07था। लेकिन उसका एक चीज पर बहुत पुख्ता
  21. 1:10ईमान था। कि वो यह कि जो मुकद्दर में लिखा
  22. 1:14है वह मिलकर रहेगा।
  23. 1:16उसकी बीवी कुलसूम उसे कहने लगी अबू जुखा
  24. 1:20आज तीसरा दिन है। हमने खाने को देखा तक
  25. 1:23नहीं है। आज के दिन भी बहुत गर्मी है और
  26. 1:26सब ने भूखे पेट रोजा रख लिया है। हम तो
  27. 1:29सब्र कर लेंगे मगर हमारी बच्चियां भूख की
  28. 1:32शिद्दत बर्दाश्त करने से कासिर हैं। भूख
  29. 1:35से उनका बुरा हाल हो रहा है। आप अल्लाह का
  30. 1:38नाम लेकर घर से निकलें। शायद वह हमारी
  31. 1:41रोजी का कोई बंदोबस्त फरमा दे ताकि शाम को
  32. 1:43हम रोजा इफ्तार कर सकें।
  33. 1:46अबू जुलेखा ने बीवी को तसल्ली दी और कहने
  34. 1:49लगा हां हां मैं जा रहा हूं इंशाल्लाह
  35. 1:52अल्लाह जरूर करम करेगा।
  36. 1:55कुछ ही देर में सूरज तुलू हो गया। अबू
  37. 1:58जुलेखा घर से निकला और मक्का के बाजार में
  38. 2:01दाखिल हुआ। लेकिन उसे कहीं से कोई रोजगार
  39. 2:04ना मिला। दिन गुजरने के साथ-साथ गर्मी की
  40. 2:08शिद्दत में इजाफा होता जा रहा था। लेकिन
  41. 2:10उसे कोई भी काम ना मिला। वो मायूसी की
  42. 2:14हालत में बाजार से निकला और चलता हुआ
  43. 2:16मक्का की एक वीरान वादी में जा पहुंचा।
  44. 2:20मुसलसल पैदल चलकर वो बहुत ज्यादा थक चुका
  45. 2:23था। जमीन पर ही बैठ गया। वो गहरी सोच में
  46. 2:27मुब्तला था। सोचते-सचते जहां पर वह बैठा
  47. 2:32था वहां पर दाएं हाथ से नरम मिट्टी को
  48. 2:34खोदने लगा। दिल ही दिल में अपने आप से
  49. 2:37कहने लगा कि अगर आज भी मजदूरी ना मिली तो
  50. 2:41वह घर वालों के खाने का बंदोबस्त कैसे
  51. 2:43करेगा?
  52. 2:44अचानक मिट्टी खोदते-खोदते उसका हाथ किसी
  53. 2:47नर्म मुलायम चीज से टकराया। उसने हाथ
  54. 2:51बढ़ाकर उसे बाहर खींचा तो देखा कि यह एक
  55. 2:54रेशम के कपड़े की थैली थी जो सोने के
  56. 2:57सिक्कों से भरी हुई थी। उस थैली को देखते
  57. 3:00ही जैसे उसकी भूख प्यास खत्म हो गई हो।
  58. 3:04उसकी आंखें खुशी से चमक उठी। सोने के
  59. 3:07सिक्कों से भरी थैली देखकर वह सोचने लगा
  60. 3:10कि मैं कितना खुशनसीब हूं। छुपे हुए खजाने
  61. 3:14खुद ब खुद ही मेरे सामने हाजिर हो गए हैं।
  62. 3:16मैं जब यह सोने के सिक्के अपनी बीवी के
  63. 3:19हाथ में दूंगा तो वह किस कदर खुश होगी।
  64. 3:22अबू जुखा बहुत पुरजोश हो गया और रोशन
  65. 3:26मुस्तकबिल के ख्वाब देखने लगा।
  66. 3:29लेकिन अचानक उसके ईमान ने दस्तक दी और वह
  67. 3:32सोचने लगा यह माल मेरा नहीं है। किसी का
  68. 3:36खो गया है और यह मुझ पर हलाल भी नहीं है।
  69. 3:39यह जिसका है मुझे उस शख्स को ढूंढना होगा
  70. 3:42और यह माल उसके हवाले करना होगा। अगर वह
  71. 3:45मुझे नहीं भी मिला तो यह माल उस वक्त हलाल
  72. 3:48होगा जब एक साल तक ऐलान करने के बावजूद
  73. 3:52मुझे उसका मालिक ना मिला। फिर उसका जहन
  74. 3:55उसे उस चीज पर आमादा करने लगा कि क्यों ना
  75. 3:57मैं चंद सोने के सिक्के निकाल लूं और
  76. 4:00उन्हें इस्तेमाल कर लूं। बाद में मैं
  77. 4:02मेहनत मजदूरी करके जितने सिक्के उसमें से
  78. 4:04निकालूंगा उन्हें वापस रख दूंगा। फिर फौरन
  79. 4:08उसे ख्याल आया ऐ अल्लाह के बंदे सब्र कर।
  80. 4:12यह अमानत में खयानत है। उम्र के आखिरी
  81. 4:15हिस्से में पहुंचे हुए हो और अभी भी हीर
  82. 4:17फेर करने की कोशिश कर रहे हो।
  83. 4:20उसने अपने ख्याल को दिल से झटक दिया और इस
  84. 4:22बात का इरादा किया कि जब तक उस थैली का
  85. 4:25असली मालिक नहीं मिल जाता वह उसे अपने पास
  86. 4:28संभाल कर रखेगा। अब वह थैली लेकर घर की
  87. 4:31तरफ चल पड़ा। घर के दरवाजे से अंदर दाखिल
  88. 4:34होकर वह दबे कदमों कमरे की तरफ जाने लगा।
  89. 4:37अचानक उसकी बीवी ने उसे देख लिया। वो उससे
  90. 4:40पूछने लगी। अब्बू जुलेखा आप खाने के लिए
  91. 4:44क्या लेकर आए हैं? अपनी बीवी की आवाज
  92. 4:47सुनकर वह एकदम से चूक गया और खुद को
  93. 4:49संभालते हुए बीवी से कहने लगा मैं आज भी
  94. 4:52कुछ नहीं लाया। यह कहते हुए वह थैली अपने
  95. 4:55पी पीछे छुपा रहा था। आज तक अबू जलेखा ने
  96. 4:59अपनी बीवी से कुछ नहीं छुपाया था। बीवी ने
  97. 5:02जब देखा कि उसका शौहर उससे कुछ छुपाने की
  98. 5:05कोशिश कर रहा है तो उसने सख्त लहजे में
  99. 5:07कहा।
  100. 5:08आपके पास कुछ ना कुछ तो जरूर है लेकिन आप
  101. 5:11छुपा रहे हैं। मुझे जल्दी से बताएं कि
  102. 5:14आपके पास क्या है? यह बात अबू जलेखा पर
  103. 5:17आशकार हो चुकी थी कि उसकी बीवी ने उसे कुछ
  104. 5:19छुपाते हुए देख लिया है। उसने अपने दोनों
  105. 5:23हाथ बीवी के सामने किए। उसके हाथों में
  106. 5:26सोने से भरी हुई वह थैली थी। और फिर उसने
  107. 5:29उसे सारी बात बता दी कि उसे यह थैली कहां
  108. 5:32से मिली है। कुलसूम दीनदार औरत जरूर थी
  109. 5:36लेकिन वो अबू जलेखा जैसा सब्र नहीं रखती
  110. 5:38थी। उसने फौरन अपने शौहर से कहा इसमें से
  111. 5:42कुछ सिक्के ले जाओ और कुछ खाने के लिए
  112. 5:44खरीद लाओ। अबू जलेखा ने गुस्से में जवाब
  113. 5:47दिया। नहीं हरगिज़ नहीं। अगर तुमने उस
  114. 5:51थैली को हाथ लगाया या किसी को भी उसके
  115. 5:53बारे में बताया तो मैं तुम्हें तलाक दे
  116. 5:56दूंगा। कुलसूम एकदम से डर गई और खून के
  117. 6:00घूंट पीकर खामोश हो गई। यह रात भी
  118. 6:03उन्होंने फाके में बसर की। अगले दिन अबू
  119. 6:06जलेखा घर से निकला और सोचने लगा आज मैं
  120. 6:10मजदूरी ढूंढने के साथ-साथ उस थैली के असल
  121. 6:12मालिक को भी ढूंढूंगा ताकि मैं उसके हवाले
  122. 6:15थैली करके उससे कुछ इनाम भी हासिल करूं जो
  123. 6:18मुझ पर हलाल होगा। वो इसी सोच में
  124. 6:22चलताचलता हरम की तरफ रवाना हुआ। जहां
  125. 6:25पहुंचकर उसने सामने देखा कि वहां पर एक
  126. 6:28बहुत बड़ा मजमा लगा है। एक यमनी आदमी
  127. 6:30बुलंद आवाज में ऐलान कर रहा था। ए अल्लाह
  128. 6:33के नेक बंदो मेरी एक थैली गुम हो गई है
  129. 6:37जिसमें 1000 सोने के सिक्के थे। जो कोई
  130. 6:40इसे रमजान के महीने में वापस करेगा अल्लाह
  131. 6:43उसे सात गुना बढ़कर अजर देगा।
  132. 6:46जब उस यमनी नौजवान ने अपना ऐलान मुकम्मल
  133. 6:49किया तो अबू जलेखा ने अपना हाथ बुलंद किया
  134. 6:51और कहने लगा मक्का में बहुत गरीब लोग रहते
  135. 6:55हैं। हो सकता है तुम्हारी थैली किसी खुदा
  136. 6:58तरस इंसान के हाथ लग गई हो। अगर तुम चाहते
  137. 7:01हो कि तुम्हारी थैली तुम्हें वापस मिल जाए
  138. 7:03तो तुम उसके लिए एक इनाम का ऐलान करो। हो
  139. 7:06सकता है वह शख्स इनाम का सुनकर खुशी से वह
  140. 7:09थैली तुम्हें वापस कर दे।
  141. 7:11उस यमनी नौजवान ने फौरन पूछा बाबा जी आप
  142. 7:15ही बताएं मैं इस थैली के एवज कितने सिक्के
  143. 7:18रखूं? जिस पर उस बूढ़े शख्स ने जवाब दिया
  144. 7:23100 सोने के सिक्के यानी इस थैली का दवां
  145. 7:26हिस्सा। जिस पर वो यमनी नौजवान बोला नहीं
  146. 7:30बाबा जी ऐसा नहीं हो सकता। यह बहुत ज्यादा
  147. 7:33है। मैं अपना मामला अल्लाह के सुपुर्द
  148. 7:35करता हूं। जिस पर वो बूढ़ा शख्स कहने लगा
  149. 7:39बेटा बड़ी हैरत की बात है कि तुम अपने
  150. 7:42पूरे हजार सोने के सिक्के गुवाना चाहते हो
  151. 7:46लेकिन 100 सोने के सिक्के इनाम में देकर
  152. 7:49अपने उन बाकी के 900 सिक्के बचाना नहीं
  153. 7:51चाहते जिस पर वो यमनी नौजवान कहने लगा
  154. 7:55बाबा जी मैं इतनी बड़ी रकम इनाम में नहीं
  155. 7:57दे सकता इसलिए मैं अपना मामला अल्लाह पर
  156. 8:00छोड़ता हूं इस मजमे में एक शख्स जिसका नाम
  157. 8:05ज़द बिन खालिद था। वो इस सारी गुफ्तगू को
  158. 8:08बड़े गौर से सुन रहा था। उसने अंदाजा लगा
  159. 8:11लिया कि सोने से भरी वह थैली शायद इसी
  160. 8:14बुजुर्ग के पास है। कुछ ही देर में मजमे
  161. 8:17का इख्तताम हो गया तो सब लोग अपने घरों को
  162. 8:20लूटने लगे। इसके बाद ज़द बिन खालिद अबू
  163. 8:23जलेखा से मुखातिब होकर कहने लगा, बाबा जी,
  164. 8:27मेरे पास आपके लिए एक काम है। क्या आप
  165. 8:30मेरे साथ चल सकते हैं?
  166. 8:32बूढ़े ने फौरन हां में सर हिलाया और उसके
  167. 8:35साथ चल दिया। ज़द बिन खालिद की दुकान के
  168. 8:37बाहर कुछ सामान पड़ा था। उसने अबू जुखा की
  169. 8:40मदद से सारा सामान दुकान के अंदर रखा। यह
  170. 8:44सामान इतना ज्यादा वजनी नहीं था और काम भी
  171. 8:47दो-चार घंटों में खत्म हो गया। लेकिन फिर
  172. 8:49भी उसने अबू जुलेखा को पूरे दिन की मजदूरी
  173. 8:52के पैसे दिए। वो यह बात समझ चुका था कि
  174. 8:56अबू जुलेखा को उस वक्त पैसों की बहुत सख्त
  175. 8:59जरूरत है। उसने फौरन मजदूरी उसके हवाले
  176. 9:02की। अबू जुलेखा ने ज़द बिन खालिद का
  177. 9:05शुक्रिया अदा किया और घर की तरफ चल पड़ा।
  178. 9:08ज़द बिन खालिद चुपके से उस बुजुर्ग के
  179. 9:11पीछेछे चलने लगा। उसने अबू जुखा का घर तक
  180. 9:14पीछा किया। और जब वह अपने घर में दाखिल हो
  181. 9:17गया तो ज़द बिन खालिद दरवाजे के साथ कान
  182. 9:20लगाकर सुनने लगा।
  183. 9:22अबू जलेखा अपनी बीवी कुलसूम से कहने लगा,
  184. 9:26मैंने एक मजमे में एक यमनी शख्स को उस
  185. 9:29थैली की तलाश में ऐलान करते हुए सुना है।
  186. 9:32मैंने उसे यह भी कहा है कि तुम उस थैली के
  187. 9:35एवज 100 सोने के सिक्के इनाम रख दो। लेकिन
  188. 9:39उसने मेरी बात नहीं मानी। मेरा तो यही
  189. 9:41इरादा था कि मैं किसी तरीके से उसे यह
  190. 9:44थैली वापस कर दूं और मुझे भी उसमें से कुछ
  191. 9:46फायदा हो जाए। लेकिन वो शख्स बहुत उड़ैल
  192. 9:49है। अब तुम ही बताओ हमें अब क्या करना
  193. 9:52चाहिए? जिस पर उसकी बीवी कुलसूम कहने लगी
  194. 9:57अबू जुलेखा मैंने आपके साथ 40 साल फाकों
  195. 10:01और भूख में गुजारे हैं। आपने सारी जिंदगी
  196. 10:05कभी चोरी नहीं की। कभी किसी को धोखा नहीं
  197. 10:08दिया। और ना ही कभी किसी से कुछ छीना है।
  198. 10:12मेरी बात माने तो आप उस सोने का इस्तेमाल
  199. 10:16करें। मुझे लगता है कि अल्लाह ताला ने यह
  200. 10:19आपको तोहफा भेजा है। तो फिर उसके दिए गए
  201. 10:22तोहफे को क्यों ठुकरा रहे हैं? अगर आप यह
  202. 10:26सोचते हैं कि अल्लाह आपसे इन सोने के
  203. 10:28सिक्कों के बारे में सवाल करेगा तो आप यह
  204. 10:31क्यों भूल जाते हैं कि वह आपसे भूखी बीवी
  205. 10:34और लाचार बेटियों के बारे में भी सवाल
  206. 10:36करेगा। जिसके बाद अबू जुलेखा दिल में
  207. 10:38सोचने लगा कि मैं इसमें से सोने के कुछ
  208. 10:40सिक्के खर्च कर लूं।
  209. 10:42लेकिन वह फौरन ही अपने फैसले से वापस पलटा
  210. 10:44और ख्याल करने लगा मैंने सारी जिंदगी सब्र
  211. 10:48से गुजारी है और आज मेरी टांगे कब्र में
  212. 10:50है तो मैं अपनी 60 साला जिंदगी के सब्र को
  213. 10:54एक ही दिन की लज्जत पर क्यों कुर्बान कर
  214. 10:56दूं खुदा हमारे हाल पर रहम फरमाए और उसने
  215. 11:00बुलंद आवाज में कहा मैं ऐसा हरगिज़ नहीं
  216. 11:03करूंगा मैं अपनी कब्र को आग से नहीं भर
  217. 11:06सकता
  218. 11:08ज़द बिन खालिद जो दरवाजे के साथ कान लगाकर
  219. 11:10यह सारी बातें सुन सुन रहा था। उसकी आंखों
  220. 11:13से आंसू बहने लगे। उसे अबू जुलेखा की
  221. 11:16बेबसी पर अफसोस होने लगा। उसने उसी वक्त
  222. 11:19अबू जुखा का दरवाजा खटखटाया। अबू जुलेखा
  223. 11:23फौरन बाहर आया।
  224. 11:25ज़द बिन खालिद अबू जुलेखा को गले से लगाकर
  225. 11:27रोने लगा। ऐ अल्लाह के बंदे मैं कुर्बान
  226. 11:32जाऊं तेरे सब्र पर। अल्लाह तुझे बहुत अजर
  227. 11:35देगा। तुम मुझे बताओ मैं तुम्हारी क्या
  228. 11:38खिदमत कर सकता हूं?
  229. 11:40अबू जुलेखा ने जवाब दिया ए खुदा के बंदे
  230. 11:44तुम पहले ही मेरी बहुत मदद कर चुके हो।
  231. 11:47तुमने जरा से काम के बदले मुझे पूरे दिन
  232. 11:50की मजदूरी दी। फिर ज़द बिन खालिद के ज़हन
  233. 11:53में ख्याल आया और वो उससे कहने लगा मैं
  234. 11:57जानता हूं कि सोने की थैली तुम्हारे पास
  235. 11:59है। तुम ऐसा करो इनाम की रकम को थोड़ा सा
  236. 12:02कम कर दो। शायद वो शख्स मान जाए। अबू
  237. 12:06जलीखा ने जो कुछ थोड़े से पैसे कमाए थे
  238. 12:08अपने घर वालों के पास बैठकर उन पैसों से
  239. 12:10इफ्तारी की। अगले दिन फिर काम की तलाश में
  240. 12:13घर से हरम की तरफ निकला। वो यमनी शख्स
  241. 12:17वहां पर मौजूद फिर से ऐलान कर रहा था। जो
  242. 12:20कोई मेरी सोने से भरी हुई थैली वापस करेगा
  243. 12:23अल्लाह उसे सात गुना अजर देगा।
  244. 12:27अबू जलीखा फिर से हाथ बुलंद करके अर्ज
  245. 12:29करने लगा। ए नौजवान मैंने तुमसे पहले भी
  246. 12:32कहा था कि मक्के में बहुत गरीब लोग रहते
  247. 12:35हैं। शायद वो थैली किसी खौफ खुदा रखने
  248. 12:38वाले को मिल जाए और वह तुम्हें इनाम के
  249. 12:41लालच में वापस कर दे। चलो तुम 100 सोने के
  250. 12:44सिके ना सही 10 का ही ऐलान कर दो। उसने
  251. 12:48कहा हरगिज़ नहीं। मेरा फैसला कयामत के दिन
  252. 12:52अल्लाह के सामने पेश होगा।
  253. 12:55इसके बाद सारे लोग वहां से चले गए।
  254. 12:58तीसरे दिन फिर से वह यमनी नौजवान यही ऐलान
  255. 13:01कर रहा था। अबूजलीखा फिर वहां पर पहुंचकर
  256. 13:04उससे कहने लगा ए नौजवान मैंने तुमसे 100
  257. 13:08सिक्कों का ऐलान करने को कहा था। लेकिन
  258. 13:10तुमने इंकार कर दिया। फिर मैंने उसके
  259. 13:1410वें हिस्से का यानी 10 सिक्कों का कहा।
  260. 13:17तुमने फिर भी इंकार कर दिया। चलो आज तुम
  261. 13:20ऐसा करो कि सिर्फ एक सिक्के का ही ऐलान कर
  262. 13:23दो। यह तो तुम्हारी थैली का 1000वां
  263. 13:26हिस्सा बनता है। क्या पता वह शख्स इस एक
  264. 13:29सिक्के के बदले अपने घर खाना ले जाए और जो
  265. 13:32पैसे बचे इससे एक मशकीजा खरीद कर हाजियों
  266. 13:35को उजरत पर पानी पिला सके। जिस पर उस यमनी
  267. 13:39शख्स ने कहा हरगिज़ नहीं मैं एक सिक्का भी
  268. 13:43नहीं दूंगा और हमेशा की तरह आज भी अपना
  269. 13:46फैसला अल्लाह पर छोड़ता हूं।
  270. 13:49अबू जलीखा की उम्मीद का आखिरी सहारा भी
  271. 13:52खत्म हो गया।
  272. 13:53और वह सोचने लगा कि अब तो उसे पूरे के
  273. 13:56पूरे हजार सिक्के वापस करना पड़ेंगे और वह
  274. 14:00इन सिक्कों में से एक भी नहीं ले सकता।
  275. 14:03उसने उस यमनी नौजवान से कहा आओ मेरे साथ
  276. 14:06चलो और अपनी थैली ले जाओ। इस बुजुर्ग ने
  277. 14:09ज़द बिन खालिद को गवाह के तौर पर साथ चलने
  278. 14:11को कहा। घर में पहुंचकर उसने उन दोनों को
  279. 14:13दरख्त के नीचे बिठाया और उसने कमरे के
  280. 14:16अंदर जाकर महफूज जगह से वह थैली निकाली और
  281. 14:19उस नौजवान के सामने रखकर कहा क्या यह
  282. 14:22तुम्हारी थैली है? नौजवान ने कहा हां। फिर
  283. 14:26अबू जुलेखा ने थैली का सर खोला और उस थैली
  284. 14:28को जमीन पर उंडेल दिया। अब वो तीनों इन
  285. 14:31सोने के सिक्कों को गिनने लगे तो वह पूरे
  286. 14:34हजार निकले। यमनी नौजवान ने सिक्कों की
  287. 14:37थैली कंधे पर रखी और चल दिया। अबू जुलेखा
  288. 14:41और उसकी बेटियों की आंखें हैरत से खुली की
  289. 14:43खुली रह गई। चंद लम्हों के बाद अबू जुलेखा
  290. 14:46ने नजरें उठाकर देखा तो वह यमनी नौजवान
  291. 14:49वापस आ रहा था। अबू जुलेखा गमगीन हालत में
  292. 14:52बैठा हुआ था। उसे देखकर धीमी सी आवाज में
  293. 14:56कहने लगा बेटा कैसे आना हुआ? उस यमनी
  294. 15:00नौजवान ने जवाब दिया ऐ अल्लाह के नेक बंदे
  295. 15:04मेरे बाप ने जब वफात पाई तो उनके पास 5000
  296. 15:07सोने के सिक्के थे। उन्होंने मरने से पहले
  297. 15:10मुझे वसीयत की थी कि मेरा साजो सामान
  298. 15:12बेचकर हज का खर्च बना लेना और उस माल में
  299. 15:16से 1000 सोने के सिक्के उस शख्स को देना
  300. 15:19जो अल्लाह पर तवकुल करता हो और बहुत गरीब
  301. 15:22हो। चुनांचे मैंने अपने वतन यमन से लेकर
  302. 15:25शहर मक्का तक किसी को भी आपसे ज्यादा गरीब
  303. 15:28और तवकक्कुल करने वाला नहीं पाया। यह
  304. 15:31सिक्के आप रख लें। आप उसे हलाल कामों में
  305. 15:34खर्च करें।
  306. 15:35नौजवान सिक्कों से भरी हुई थैली रखकर वहां
  307. 15:38से चला गया और अबू जुलेखा उसी वक्त अल्लाह
  308. 15:42के हुजूर सजदे में गिर गया। उसकी दाढ़ी
  309. 15:45आंसुओं से तर थी। उसने अपनी बीवी से कहा
  310. 15:48कुलसूम देख लिया तुमने अल्लाह सब्र करने
  311. 15:51वालों का अज्र जाया नहीं करता। हमने अपने
  312. 15:54आप को हराम के एक सिक्के से बचा लिया तो
  313. 15:56अल्लाह ने हमें हलाल के जरिए हजार सिक्के
  314. 15:59अता किए। उसके बाद अबू जुलेखा ने अपनी
  315. 16:02बीवी और बेटियों के साथ बैठकर इफ्तारी की।
  316. 16:05नमाज अदा करने के बाद अबू जुलेखा घर से
  317. 16:08बाहर निकलने लगा तो बीवी ने कहा आप कहां
  318. 16:10जा रहे हैं? अबू जुलेखा ने जवाब दिया मैं
  319. 16:14किसी ऐसे घर की तलाश में जा रहा हूं जिस
  320. 16:16घर में हमारे जैसे लोग बसते हो और उनकी
  321. 16:19सहरी और इफ्तारी हमारी तरह फाकों में
  322. 16:22गुजरती हो ताकि मैं उन्हें अपने साथ खाने
  323. 16:24में शरीक कर लूं। यह कहकर अबू जुलेखा
  324. 16:27दरवाजे से बाहर निकल गए। दोस्तों, यह
  325. 16:30कहानी हमें सब्र, ईमानदारी और अल्लाह पर
  326. 16:33कामिल भरोसे की शानदार मिसाल सिखाती है।
  327. 16:36इंसान की जिंदगी में कंट्रोल और आजमाइशें
  328. 16:39आती हैं। लेकिन जो लोग सब्र का दामन थामे
  329. 16:42रखते हैं और अपनी ईमानदारी पर कायम रहते
  330. 16:44हैं। अल्लाह ताला उन्हें ऐसी जगह से रिज़्क
  331. 16:47अता करता है जहां से उन्हें गुमान भी नहीं
  332. 16:49होता। यह किस्सा हमें बताता है कि हलाल और
  333. 16:53हराम की आजमाइश हर वक्त हमारे सामने होती
  334. 16:56है। लेकिन जो लोग सब्र और दयानत को नहीं
  335. 16:59छोड़ते वही हकीकी कामयाबी हासिल करते हैं।
  336. 17:02बाज औकात थोड़ी सी मुश्किलात इंसान को गलत
  337. 17:05रास्ते की तरफ ले जा सकती है। लेकिन जो
  338. 17:08लोग अपने जमीर की आवाज सुनते हैं वही आखिर
  339. 17:10में सुरखरू होते हैं। इस कहानी से हमें
  340. 17:13दूसरों की मदद करने और अपनी खुशियों को
  341. 17:16दूसरों के साथ बांटने का सबक भी मिलता है।
  342. 17:19जब अल्लाह ताला किसी को नवाजता है तो उसका
  343. 17:21बेहतरीन इस्तेमाल यही है कि इस नेमत को उन
  344. 17:24लोगों तक पहुंचाया जाए जो मोहताज हैं। इस
  345. 17:27तरह ना सिर्फ अल्लाह की रजा हासिल होती है
  346. 17:30बल्कि हकीकी खुशी और सुकून भी मुयस्सर आता
  347. 17:33है। दोस्तों अगर आपको हमारी आज की वीडियो
  348. 17:36पसंद आई हो तो इसे लाइक करें।

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