1980 के दशक में गाँव की शादी कैसी होती थी? | 1980s Indian Wedding | Hindi Documentery — Transcript
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- 0:00कल्पना कीजिए 1980 के दशक का भारत। दिसंबर
- 0:03की वह कड़कड़ाती हुई हड्डियां कपा देने
- 0:06वाली सर्द रात। रात के उस घुप अंधेरे और
- 0:09सन्नाटे को चीरती हुई दूर से आती एक
- 0:13भारीभरकम जनरेटर की वो डुक डुक डुक डुक की
- 0:17आवाज जो पूरे गांव की जमीन को अंदर तक कपा
- 0:21रही है। कच्चे घरों की मिट्टी वाली मुंडेर
- 0:23पर लटकती हुई लाल नीले और पीले रंग के
- 0:27बल्बों की वो लड़ियां जिनकी कांपती हुई
- 0:29पीली रोशनी पूरे गांव को एक अजीब से जादुई
- 0:34नशे में लपेटे हुए हैं। हवा में आज किसी
- 0:36महंगे परफ्यूम की खुशबू नहीं है बल्कि हवा
- 0:39में तैर रहा है आम की सूखी लकड़ी के जलने
- 0:42का धुआं, उबलते हुए शुद्ध देसी घी की वो
- 0:46अलौकिक महक और दूर किसी फटे हुए
- 0:48लाउडस्पीकर पर बजती शहनाई की वो दर्द
- 0:51[संगीत] भरी गूंज जो कानों से होते हुए
- 0:54सीधे इंसान की रूह में उतर जाती है। जरा
- 0:57अपनी आंखें बंद कीजिए और खुद को उस 40 साल
- 1:01पुराने कच्चे आंगन में ले जाइए। जहां आज
- 1:03के मॉडर्न डिजाइनर लहंगे या थ्री पीस सूट
- 1:06टक्सीडो का कोई नामोनिशान नहीं था। 1980
- 1:10के उस दौर का अपना एक अलग ही स्वैग और
- 1:13रुतबा हुआ करता था। जरा उस बारात और गांव
- 1:16के लड़कों को देखिए। नौजवानों के शरीर पर
- 1:18चमचमाते टेरीकॉट के बड़े और नुकीले कॉलर
- 1:21वाले शर्ट जिन्हें सीने तक खुला रखा जाता
- 1:24था। और पैरों में अमिताभ बच्चन वाले चौड़े
- 1:27बेल बॉटम पट जो चलते वक्त जमीन की धूल
- 1:31बुहारते थे। बालों में सरसों या चमेली का
- 1:34तेल लगाकर सलीके से काढ़ी गई मांग और कलाई
- 1:37पर एचएमटी की चाबी वाली घड़ी। वहीं दूसरी
- 1:40तरफ भठी के पास खटिया पर बैठे गांव के
- 1:43बुजुर्गों का नजारा बिल्कुल अलग था। उनके
- 1:46बदन पर कड़क कलफ लगा हुआ एकदम सफेद धोती
- 1:49कुर्ता। सिर पर सूती या रेशमी साफा और ठंड
- 1:53से बचने के लिए कंधे पर पड़ी हुई मोटी ऊनी
- 1:56शॉल या लोही। उनके होठों के बीच सुलगती
- 1:59हुई बीड़ी या हाथ में गुड़गुड़ाता हुआ
- 2:02हुक्का होता था। उन बुजुर्गों के चेहरे पर
- 2:04कोई बनावट नहीं होती थी। लेकिन उनके उस
- 2:07धोती कुर्ते और उनकी मूछों में जो भयंकर
- 2:10रुतबा होता था उसके आगे आज के अच्छे-अच्छे
- 2:13अमीर पानी भरते नजर आए। नया और पुराना
- 2:16भारत उस कच्चे आंगन में एक साथ खड़ा था।
- 2:19नौजवानों के बेल बॉटम और बुजुर्गों के
- 2:22धोती कुर्ते के रूप में। शादी की
- 2:24तैयारियां उसी दिन से शुरू हो जाती थी जब
- 2:27घर के आंगन में पहली बार हल्दी कूटती थी।
- 2:30उस दौर में टेंट हाउस का मतलब कोई
- 2:32वाटरप्रूफ एसी पंडाल या मखमली कालीन नहीं
- 2:35होता था। वो लाल, नीले और सफेद पट्टियों
- 2:38वाला एक मोटा सूती तंबू होता था। जिसे
- 2:41गांव के लड़के अपनी पूरी ताकत लगाकर बांस
- 2:45की बलियों पर कसकर बांधते थे। तंबू के
- 2:47बीचोंबीच लटकती थी एक पेट्रोमैक्स गैस
- 2:50बत्ती जिसकी फुसफुस की आवाज और तेज सफेद
- 2:54रोशनी के चारों तरफ रात भर कीड़े मंडराते
- 2:58रहते थे। शादी के उस घर में कोई वीआईपी
- 3:01मेहमान नहीं होता था। घर के एक कोने में
- 3:03ढोलक की थाप पर बनन्ना बन्नी के वो गीत
- 3:06गाए जा रहे होते जिनमें गालियों और
- 3:08हंसीज़ाक का एक ऐसा शुद्ध रस होता था जो आज
- 3:12के गानों में कहीं नहीं मिलता। [संगीत]
- 3:14दूसरे कोने में गांव की औरतें मिलकर
- 3:17हफ्तों पहले से पापड़ और बड़िया सुखा रही
- 3:20होती थी। लेकिन इस पूरी शादी की असली जान,
- 3:23असली धड़कन घर के पीछे वाले उस खुले मैदान
- 3:27में धड़कती थी, जिसे हलवाई का अड्डा कहा
- 3:30जाता था। यह कोई आज का मॉडर्न किचन नहीं
- 3:32था। यह एक युद्ध का [संगीत] मैदान था।
- 3:35शादी से 3-4 दिन पहले ही गांव का मशहूर और
- 3:38सबसे गुस्सैल हलवाई अपनी [संगीत] पूरी फौज
- 3:41के साथ वहां आ धमकता था। जमीन में गहरे
- 3:44गड्ढे खोदकर चार से पांच विशाल भट्टियां
- 3:47बनाई जाती थी। लोहे की उन विशाल और काली
- 3:50कढ़ाईयों में जब शुद्ध देसी घी और पीली
- 3:53सरसों का तेल खौलता था तो उसकी महक चार
- 3:57गांव पार तक जाती थी। उस भठी की आग और
- 4:00धुएं से हलवाई का चेहरा बिल्कुल काला पड़
- 4:03चुका होता। वो मुंह में बीड़ी दबाए अपने
- 4:06चेलों पर चिल्ला रहा होता। लेकिन उसके
- 4:08खुरदरे हाथों में जो जादू था, वो आज के
- 4:11किसी फाइव स्टार शेफ के पास नहीं हो सकता।
- 4:13वह सिर्फ खाना नहीं पकाता था। वो उस खाने
- 4:16में गांव की इज्जत गूंथता था। आज के दौर
- 4:19में हम अपनी भारी प्लेट लेकर अजनबियों की
- 4:22तरह एक लाइन में खड़े होकर बफे में खाना
- 4:24खाते हैं। जहां सर्व करने वाले अनजान वेटर
- 4:27होते हैं। लेकिन 1980 के उस गांव के भोज
- 4:30का नजारा किसी महाकाव्य से कम नहीं होता
- 4:33था। शाम ढलते ही मैदान में जूट की
- 4:36लंबी-लंबी ताट पट्टियां बिछा दी जाती थी।
- 4:39कोई प्लास्टिक की कुर्सी नहीं, कोई
- 4:41डाइनिंग टेबल नहीं। अमीर जमींदार हो या
- 4:43गरीब मजदूर उस पंगत में सब एक साथ जमीन पर
- 4:47पालथी मारकर कंधे से कंधा मिलाकर एक ही
- 4:51लाइन में बैठते थे। उनके सामने कांच या
- 4:53स्टील की प्लेट नहीं होती थी। सामने रखे
- 4:56जाते थे पत्तल। सूखे हुए महुए या पलाश के
- 4:59पत्तों को लकड़ी की बारीक सीकों से जोड़कर
- 5:02बनाए गए वो गोल और हरे पत्तल उन सूखे
- 5:06पत्तों से जो एक अजीब सी सोंधी खुशबू आती
- 5:09थी वो इंसान की भूख को 10 गुना भड़का देती
- 5:12थी। पानी पीने के लिए मिट्टी के कुल्हड़
- 5:15या सिकोरे रखे जाते थे। और फिर शुरू होता
- 5:17था वह असली और रोंगटे खड़े कर देने वाला
- 5:21भोज जिसे खिलाने वाले कोई भाड़े के वेटर
- 5:24नहीं बल्कि उसी गांव के नौजवान लड़के होते
- 5:27थे। वही लड़के जिन्होंने सुबह बेल बॉटम
- 5:30पहना था। अब सफेद धोती या पाजामा पहने कमर
- 5:33में लाल गमछा बांधे और नंगे पैर दौड़ रहे
- 5:37होते थे। जब वो बांस की बनी बड़ी-बड़ी
- 5:39[संगीत] टोकरियों से धुआं छोड़ती हुई एकदम
- 5:42गरमा गरम फूली हुई पूरिया परोसते थे तो
- 5:45नजारा देखने लायक होता था।
- 5:47अरे चाचा दो पूरी और लीजिए। कसम है आपको।
- 5:51एक पूरी तो खानी ही पड़ेगी। यह सिर्फ एक
- 5:53वाक्य नहीं था। यह उस 1980 के दशक की वो
- 5:57जिद थी जिसमें कोई फॉर्मेलिटी या दिखावा
- 6:00नहीं। बल्कि एक ऐसा अपनापन कूट-कूट कर भरा
- 6:03होता था जो सामने वाले को ना चाहकर भी
- 6:06खाने पर मजबूर कर देता था। उस पत्तल पर एक
- 6:09तरफ होती थी हलवाई के हाथों की वो जादुई
- 6:12कोहड़े की खट्टीमीठी सब्जी जिसमें मेथी और
- 6:16लाल खड़ी मिर्च का भयंकर छोंक होता था।
- 6:19दूसरी तरफ कटहल की सब्जी। रसेदार आलू गोभी
- 6:22और मिट्टी के कुल्हड़ में परोसा गया गाढ़ा
- 6:25दही बाड़ा। लेकिन इस पूरी शादी का सबसे
- 6:28बड़ा हीरो था उसका मीठा यानी लाल और
- 6:31नारंगी रंग की बूंदी और स्पंजी रसगुल्ले।
- 6:35जब वो चाशनी में डूबी हुई ताजी [संगीत]
- 6:37बूंदी पत्तल के एक कोने पर परोसी जाती थी
- 6:40तो उसकी चाशनी पत्तों के बीच से रिसकर
- 6:43थोड़ा सा बाहर मिट्टी पर बहने लगती थी।
- 6:45लोग उस मीठी बूंदी को तीखी सब्जी और
- 6:48गरमागरम पूड़ी के साथ मिलाकर एक ही बाइट
- 6:51में खाते थे। आज का कोई भी इटालियन या
- 6:53चाइनीस खाना उस सूखी पत्तल पर घी में तली
- 6:57पूरी और चाशनी वाली बूंदी के उस
- 6:59कॉम्बिनेशन को कभी नहीं हरा सकता। भोज के
- 7:02बाद बारी आती थी बारातियों के स्वागत की।
- 7:04पीतल के भारी बाजे गले में लटकाए लाल या
- 7:08हरे रंग की फीकी पड़ चुकी वर्दी पहने बैंड
- 7:11वाले जब अपने पूरे फेफड़ों की ताकत लगाकर
- 7:14आज मेरे यार की शादी है।
- 7:16बजाते तो बेल बॉटम और टेरीकॉट की शर्ट
- 7:20पहने वो नौजवान पागलों की तरह नाचते थे।
- 7:22उनके चौड़े पैंट हवा में ऐसे उड़ते थे
- 7:25मानो कोई फिल्म चल रही हो। और उस पूरी
- 7:27बारात को रिकॉर्ड करने के लिए सिर्फ एक
- 7:30कैमरामैन होता था। जिसके कंधे पर वीएचएस
- 7:33वाला 10 किलो का भारी-भरकम कैमरा होता। उस
- 7:36कैमरामैन के साथ एक आदमी तार से जुड़ा एक
- 7:40बहुत बड़ा हैलोजन बल्ब लेकर चलता था। वो
- 7:421000 वाट का बल्ब जिसकी भी आंखों पर पड़ता
- 7:46वो इंसान कुछ देर के लिए अंधा ही हो जाता
- 7:48था। लेकिन उस सफेद रोशनी में चमकते वह बेल
- 7:51बॉटम वाले लड़के और धोती कुर्ता पहने
- 7:54मुस्कुराते बुजुर्ग वो मासूमियत आज के
- 7:57किसी iPhone में कैद नहीं हो सकती। लेकिन
- 7:591980 की उस शादी का सबसे रुला देने वाला,
- 8:03सबसे सच्चा और सीना फाड़ देने वाला पल
- 8:06होता था भोर के समय होने वाली विदाई। आज
- 8:10की तरह उस दौर में विदाई की कोई
- 8:12कोरियोग्राफी नहीं होती थी। कोई मेकअप
- 8:14खराब होने का डर नहीं होता था। 1980 की
- 8:17विदाई में जो रोना था, वह इतना सच्चा,
- 8:20इतना भारी और खौफनाक होता था कि गांव के
- 8:23सबसे कठोर इंसान की आंखें भी छलक [संगीत]
- 8:26जाती थी। सुबह के 4:00 बजे का वक्त घना
- 8:29कोहरा और एक अजीब सा सन्नाटा जब एक बाप
- 8:32अपनी बेटी को डोली या फूलों से सजी पुरानी
- 8:35एंबेसडर कार में बिठाता था तो वह सिर्फ
- 8:38अपनी बेटी को नहीं बल्कि अपने कलेजे के एक
- 8:41टुकड़े को हमेशा के लिए किसी और को सौंप
- 8:44रहा होता था। उस दौर में स्मार्टफोन या
- 8:47वीडियो कॉल नहीं होते थे। विदा होने का
- 8:49मतलब था कि अब बेटी से महीनों या सालों
- 8:52बाद ही मुलाकात होगी। वह लाल जोड़े में
- 8:54लिपटी हुई लड़की जब दहाड़े मार-मार कर
- 8:57रोते हुए अपने पिता के गले लगती थी, तो उस
- 9:00बाप के कांपते हुए हाथ उसे छोड़ नहीं पाते
- 9:03थे। उस पुरानी एंबेसडर कार के साइलेंसर से
- 9:06निकलता धुआं और सुबह की उस ठंडी [संगीत]
- 9:09धुंध के बीच रोती हुई उस लड़की की आवाज
- 9:12पूरे गांव के आसमान को एक ऐसी खौफनाक
- 9:15उदासी में डुबो देती थी जिसे शब्दों में
- 9:18बयां करना नामुमकिन है। जब वो कार गांव की
- 9:21पगडंडी से धूल उड़ाती हुई आंखों से ओझल हो
- 9:24जाती तो पीछे छूट जाता था सिर्फ एक खाली
- 9:27आंगन बुझी हुई भट्टियां बिखरे हुए पत्तल
- 9:31और एक ऐसा सन्नाटा जो हफ्तों तक उस घर को
- 9:34खाने दौड़ता था। 1980 के दशक की वो
- 9:37शादियां कोई करोड़ों का इवेंट नहीं थी। वो
- 9:39इंसानियत का सबसे बड़ा स्कूल हुआ करती थी।
- 9:42वह शादियां सिखाती थी कि कैसे एक पूरा
- 9:45गांव मिलकर किसी गरीब की बेटी की शादी को
- 9:48भी अपनी इज्जत बना लेता था। वहां कोई अमीर
- 9:51गरीब का भेद नहीं था। जमींदार का बेटा भी
- 9:54उसी पंगत में उसी पत्तल पर बैठकर वही
- 9:57बूंदी पूरी खाता था जो एक मजदूर खा रहा
- 9:59होता था। वहां दिखावा कम और रूहानियत
- 10:02ज्यादा थी। लेकिन आज 40 साल बाद जरा अपनी
- 10:06आंखें खोलकर आज की शादियों को देखिए। आज
- 10:09हमारे पास करोड़ों रुपयों के वाटरप्रूफ
- 10:11एसी पंडाल हैं। खाने के लिए 100 तरह की
- 10:14डिशेस वाले लंबे लंबे बफे हैं। जहां हम
- 10:17अजनबियों की तरह प्लेट हाथ में लेकर
- 10:20खड़े-खड़े अपना खाना ठूसते हैं। आज हमारे
- 10:22पास सर्व करने के लिए सफेद दस्ताने पहने
- 10:25हुए सूट बूट वाले वेटर हैं। आज शादियों को
- 10:28शूट करने के लिए आसमान में उड़ते हुए
- 10:30ड्रोन कैमरे हैं। लेकिन इन सबके बीच
- 10:33[संगीत] हमने वो स्वाद, वो सुकून और वो
- 10:36आत्मा हमेशा के लिए खो दी है। आज शादियों
- 10:39में खाना स्टील के उन ठंडे और महंगे
- 10:42बर्तनों में पड़ा रहता है। लेकिन उसे
- 10:44खिलाने वालों की आंखों में वो मनोहार और
- 10:47वह अपनापन कहीं मर चुका है। आज की विदाई
- 10:50में आंसुओं से ज्यादा इस बात की फिक्र
- 10:53होती है कि दुल्हन का मेकअप ना खराब हो
- 10:55जाए और फोटोग्राफर को रोने का एक परफेक्ट
- 10:58एंगल मिल जाए। [संगीत] आज हम शादियों में
- 11:00सिर्फ एक मेहमान बनकर जाते हैं। लिफाफा
- 11:02पकड़ाते हैं, खाना खाते हैं और वापस आ
- 11:05जाते हैं। हमने समाज में अपनी झूठी हैसियत
- 11:08साबित करने के चक्कर में अपनी उस 1980
- 11:11वाली सादगी, उन बेल बॉटम और धोती कुर्तों
- 11:14वाले उस सच्चे दौर को, उस पत्तल की महक को
- 11:18और उस कच्चे आंगन की खुशबू को एक बंद
- 11:21एल्बम में हमेशा के लिए दफन कर दिया है।
- 11:24आज हमारे पास सब कुछ है लेकिन वो 40 साल
- 11:26पुराना सुकून अब दुनिया के किसी बाजार में
- 11:29नहीं मिलता। इतिहास के पन्नों से निकाली
- 11:32गई जनरेटर की उस डुक-डुक और पत्तल की उस
- 11:35सौंधी महक वाली यह 1980 के दशक की अनसुनी
- 11:39और रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी आपको
- 11:42कैसी लगी? अगर इस वीडियो ने आपके दिल के
- 11:44किसी कोने को गहराई से छुआ हो। अगर आपको
- 11:47भी आज अपने गांव की वो पुरानी पंगत, वो
- 11:50धुआं और वो बूंदी पूरी का स्वाद याद आ गया
- 11:54हो, तो इस वीडियो को लाइक जरूर करें।
- 11:56कमेंट में हिम्मत करके बताएं कि क्या आज
- 11:59की शादियां सिर्फ एक बेजान और झूठा दिखावा
- 12:02बनकर रह गई है। इस वीडियो को अपने परिवार,
- 12:05माता-पिता और उन पुराने दोस्तों के साथ
- 12:08जरूर शेयर करें ताकि हम सब मिलकर उस
- 12:10भूले-िसरे दौर की यादों को एक बार फिर से
- 12:13जिंदा कर सकें। जय हिंद। हम्म
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