भारत की सभी शिक्षा नीतियां (1968 से 2020 तक) | Complete History of NEP — Transcript
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- 0:00आज हमारे सामने भारत की शिक्षा व्यवस्था
- 0:02की कहानी बताने वाले तीन सबसे जरूरी
- 0:05दस्तावेज है। 1968, 1986 और 2020 की
- 0:09राष्ट्रीय शिक्षा नीतियां। हम सिर्फ यह
- 0:11नहीं देखेंगे कि इन नीतियों में क्या लिखा
- 0:13था बल्कि ये समझने की कोशिश करेंगे कि हर
- 0:16नीति अपने दौर की जरूरतों का जवाब कैसे दे
- 0:19रही थी। ये एक तरह से आजाद भारत की सोच के
- 0:22विकास की कहानी है।
- 0:23बिल्कुल सही। और हमारा मकसद सिर्फ एक
- 0:25टाइमलाइन बनाना नहीं है। हम इन तीनों
- 0:27नीतियों को मतलब एक दूसरे से जोड़कर
- 0:28देखेंगे। 1968 की नीति ने जो सपने देखे
- 0:311986 ने उन्हें जमीन पर उतारने के लिए
- 0:33क्या रास्ते बनाए और फिर 34 साल बाद 2020
- 0:37की नीति को ऐसा क्या लगा कि पुराना पूरा
- 0:39सिस्टम ही बदलना पड़ा
- 0:40हम्म
- 0:40इस पूरी चर्चा का जो निचोड़ है वो
- 0:42प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत काम का
- 0:44साबित होगा।
- 0:44तो चलिए सबसे पहले 1968 से ही शुरू करते
- 0:47हैं। भारत एक नौजवान देश था। उस समय
- 0:50शिक्षा को लेकर जो पहला सपना देखा गया वो
- 0:52क्या था? देखिए 1968 की जो नीति थी वह
- 0:56कोठारी आयोग की सिफारिशों पर आधारित थी और
- 0:58यह आप कह सकती हैं भारत की शिक्षा का
- 1:00संविधान लिखने जैसी एक कोशिश थी। इसके चार
- 1:03बड़े मकसद थे। पहला और सबसे जरूरी था 14
- 1:06साल तक के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और
- 1:08अनिवार्य शिक्षा।
- 1:09अच्छा, मतलब जो संविधान के अनुच्छेद 45
- 1:12में कहा गया था।
- 1:13उस वादे को पूरा करने की दिशा में यह पहला
- 1:15बड़ा कदम था।
- 1:16यह तो हो गई बुनियादी हक की बात। लेकिन उस
- 1:18दौर में देश को एक साथ जोड़ने की भी तो एक
- 1:21बहुत बड़ी चुनौती थी। हां और यहीं पर इसका
- 1:23दूसरा सबसे चर्चित और शायद सबसे
- 1:26विवादास्पद बिंदु आता है त्रिभाषा सूत्र
- 1:29थ्री लैंग्वेज फार्मूला
- 1:30इसका कागजी मकसद तो था राष्ट्रीय एकता को
- 1:32मजबूत करना। सोचा ये गया कि हिंदी भाषी
- 1:35राज्यों के लोग हिंदी और अंग्रेजी के
- 1:37अलावा एक और भारतीय भाषा सीखेंगे। खासकर
- 1:40दक्षिण भारत की कोई भाषा
- 1:42और गैर हिंदी भाषी राज्यों में वो अपनी
- 1:44क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी के साथ हिंदी
- 1:47सीखेंगे। सुनने में तो यह विचार बहुत
- 1:48अच्छा लगता है, लेकिन यह फार्मूला तो
- 1:51हमेशा से विवादों में ही रहा है। है ना?
- 1:53हां बिल्कुल। असल में जमीन पर यह बहुत कम
- 1:55उतर पाया। खासकर दक्षिण के राज्यों ने इसे
- 1:57कभी पूरी तरह से नहीं अपनाया और उत्तर
- 1:59भारत के स्कूलों में भी तीसरी भाषा के तौर
- 2:01पर संस्कृत या कोई और आसान विकल्प चुन
- 2:03लिया गया। तो वो जो एक सांस्कृतिक पुल
- 2:04बनाने का सपना था वो अधूरा ही रह गया।
- 2:07हम तो इस नीति के बाकी दो स्तंभ क्या थे?
- 2:10तीसरा था शिक्षकों की स्थिति को बेहतर
- 2:12बनाना। मतलब बेहतर वेतन, अच्छी ट्रेनिंग
- 2:14और समाज में सम्मान। यह माना गया कि अच्छे
- 2:16शिक्षकों के बिना कोई नीति सफल नहीं हो
- 2:18सकती और चौथा था विज्ञान और अनुसंधान पर
- 2:21जोर। गणित और विज्ञान को स्कूली पाठ्यक्रम
- 2:23का एक अनिवार्य हिस्सा बनाया गया।
- 2:25और यहीं पर वो एक जादुई आंकड़ा आता है जो
- 2:27आज तक हर शिक्षा नीति में दिखता है।
- 2:29जीडीपी का 6% खर्च करने का लक्ष्य।
- 2:31हां। और यह इस नीति की सबसे बड़ी विरासत
- 2:33भी है और सबसे बड़ी नाकामी भी।
- 2:35लक्ष्य रखना दूरदर्शिता थी लेकिन उसे कभी
- 2:37हासिल ना करवाना वो हमारी व्यवस्था की
- 2:39सच्चाई बन गया।
- 2:40तो 1968 की नीति ने एक मजबूत नीव तो रखी,
- 2:43बड़े सपने भी दिखाए। लेकिन कई वादे अधूरे
- 2:46रह गए। शायद इसीलिए लगभग 20 साल बाद 1986
- 2:49में एक नई नीति की जरूरत पड़ी।
- 2:51बिल्कुल। 1986 तक भारत बहुत बदल चुका था।
- 2:54अब सवाल सिर्फ स्कूल खोलने का नहीं था। अब
- 2:56सवाल था कि जो स्कूल हैं उनमें पढ़ाई का
- 2:58एक न्यूनतम स्तर हो और देश के हर कोने में
- 3:01एक जैसी व्यवस्था लागू हो। 1986 की नीति
- 3:04का आप कह सकते हैं मूल मंत्र था विस्तार
- 3:06और मानकीकरण।
- 3:07और इसी मानकीकरण के तहत वो 10 + 2 + 3
- 3:10वाला सिस्टम आया है ना जिसमें हम सब पढ़कर
- 3:12निकले हैं।
- 3:12सही कहा। 10 + 2 +3 की संरचना को पूरे देश
- 3:15में अनिवार्य कर दिया गया। इसका सबसे बड़ा
- 3:17फायदा यह हुआ कि आप यूपी से पढ़कर केस
- 3:20जाएं या बंगाल से गुजरात सिस्टम एक जैसा
- 3:22था।
- 3:22लेकिन इस नीति का जो दिल था वो समानता के
- 3:25लिए शिक्षा के विचार में था।
- 3:26महिलाओं, एससी, एसटी और अल्पसंख्यकों को
- 3:29शिक्षा से जोड़ने के लिए खास कार्यक्रम
- 3:30बनाए गए।
- 3:31और इसी दौर में ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड जैसी एक
- 3:34बहुत मशहूर योजना भी तो शुरू हुई थी। मुझे
- 3:36याद है बचपन में इसके बारे में बहुत सुना
- 3:38था। यह क्या था असल में? यह दिखने में
- 3:41बहुत सरल था, लेकिन इसकी सोच बहुत गहरी
- 3:43थी। ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड सिर्फ ब्लैकबोर्ड
- 3:46देने की योजना नहीं थी। यह देश के हर
- 3:48प्राइमरी स्कूल के लिए एक मिनिमम गारंटी
- 3:50थी। गारंटी कि हर स्कूल में कम से कम दो
- 3:53कमरे होंगे। दो शिक्षक होंगे जिनमें एक
- 3:55महिला होगी।
- 3:56अच्छा।
- 3:57और बच्चों के लिए ब्लैकबोर्ड के अलावा
- 3:59नक्शे, चार्ट और कुछ खिलौने भी होंगे। यह
- 4:02पहली बार था जब सरकार ने सुविधाओं को
- 4:04शिक्षा के अधिकार का हिस्सा माना।
- 4:06लेकिन क्या यह सफल हुआ? देखिए कागज पर तो
- 4:08यह बहुत सफल था लेकिन जमीन पर इसकी कहानी
- 4:10मिलीजुली रही। फिर भी इसने देश के लाखों
- 4:13स्कूलों का जो बुनियादी ढांचा है उसे
- 4:15हमेशा के लिए बदल दिया। यह मानना पड़ेगा।
- 4:17इसी नीति की एक और बड़ी देन थी नवोदय
- 4:19विद्यालय।
- 4:20हां, ग्रामीण भारत के टैलेंट को तराशने के
- 4:22लिए बनाए गए स्कूल।
- 4:23जी। इन्हें पे सेटिंग स्कूल कहा गया था।
- 4:26मतलब ऐसे स्कूल जो अपने जिले के दूसरे
- 4:28स्कूलों के लिए एक मिसाल बने। और नवोदय
- 4:30विद्यालय ने ये काम काफी हद तक करके भी
- 4:32दिखाया है।
- 4:32और फिर 1992 में इसमें कुछ बदलाव भी किए
- 4:36गए थे।
- 4:37हां, 1992 में एक प्रोग्राम ऑफ एक्शन आया।
- 4:40उसमें कुछ जरूरी अपडेट्स थे। जैसे
- 4:42इंजीनियरिंग के लिए जेईई जैसी एक
- 4:44राष्ट्रीय परीक्षा की शुरुआत हुई। ऑपरेशन
- 4:46ब्लैक बोर्ड का दायरा प्राइमरी से बढ़ाकर
- 4:48अपर प्राइमरी मतलब आठवीं क्लास तक कर दिया
- 4:50गया। और शिक्षकों की ट्रेनिंग के लिए हर
- 4:53जिले में डाइट्स बनाने पर जोर दिया गया।
- 4:55तो 1986 की नीति ने सिस्टम को एक आकार
- 4:58दिया। उसे देश के कोने-कोने तक पहुंचाने
- 5:00की कोशिश की। लेकिन फिर 34 साल का एक बहुत
- 5:04लंबा गैप आ गया। इस बीच तो भारत पूरी तरह
- 5:07बदल गया। आईटी क्रांति हुई, अर्थव्यवस्था
- 5:10खुल गई, इंटरनेट आ गया। क्या हमारा वो 10
- 5:13प्लस 2 वाला सिस्टम इस नई दुनिया के लिए
- 5:16तैयार था?
- 5:17यही सबसे बड़ा सवाल था और इसका जवाब था
- 5:19बिल्कुल नहीं। 1986 का सिस्टम एक औद्योगिक
- 5:23युग की जरूरतों के लिए बना था। मतलब वो
- 5:26डॉक्टर, इंजीनियर, क्लर्क बनाने की एक
- 5:28फैक्ट्री जैसा था। लेकिन 21वीं सदी को
- 5:30इनोवेटर्स चाहिए, प्रॉब्लम सॉल्वर्स
- 5:32चाहिए, क्रिएटिव थिंकर्स चाहिए। हमारा
- 5:34सिस्टम रटने को इनाम दे रहा था। जबकि
- 5:36दुनिया सवाल पूछने वालों को आगे बढ़ा रही
- 5:38थी। तो 2020 की नीति सिर्फ एक अपडेट नहीं
- 5:42है। यह उस पुरानी फैक्ट्री को तोड़कर एक
- 5:44नया इकोसिस्टम बनाने की कोशिश है।
- 5:46और इसका विज़न भी बहुत बड़ा है। भारत को
- 5:49ग्लोबल नॉलेज सुपर पावर बनाना। चलिए इसे
- 5:52थोड़ा और समझते हैं। सबसे पहले स्कूली
- 5:54शिक्षा जहां 10 + 2 की जगह 5 + 3 + 3 + 4
- 5:58का डिजाइन आया है।
- 5:59हां और यह सिर्फ नंबरों का खेल नहीं है।
- 6:01यह बच्चों के विकास को देखने के नजरिए में
- 6:03बदलाव है। पहला स्टेल है फाउंडेशनल स्टेज
- 6:065 साल का। इसमें तीन साल प्री स्कूल और
- 6:08क्लास वन टू है। यहां कोई किताब नहीं, कोई
- 6:11परीक्षा नहीं। सिर्फ खेल, कहानियां,
- 6:13संगीत।
- 6:13मतलब बच्चे पे छोटी उम्र से पढ़ाई का बोझ
- 6:16नहीं डाला जाएगा।
- 6:17बिल्कुल नहीं। फिर है प्रेपरेटरी स्टेज 3
- 6:20साल का क्लास थ्री से फाइव तक यहां से
- 6:23लिखने पढ़ने की दुनिया शुरू होगी। सारा
- 6:25फोकस होगा बुनियादी साक्षरता और संख्या
- 6:28ज्ञान पर। तीसरा है मिडिल स्टेज तीन साल
- 6:31का क्लास सिक्स से एट तक। यहां से विषय तो
- 6:34होंगे लेकिन साथ ही कोडिंग और कारपेंट्री
- 6:37जैसे व्यावसायिक विषय भी सिखाए जाएंगे।
- 6:39और आखिरी सेकेंडरी स्टेज जो चार साल का है
- 6:42क्लास 9 से 12 तक। यहीं पर शायद सबसे बड़ा
- 6:45बदलाव है।
- 6:46हां और वो है स्ट्रीम्स का खत्म होना।
- 6:48साइंस, आर्ट्स, कॉमर्स की जो दीवारें थी
- 6:50उन्हें गिरा दिया गया है। अब कोई छात्र
- 6:53फिजिक्स के साथ हिस्ट्री पढ़ सकता है या
- 6:55केमिस्ट्री के साथ बेकिंग का कोर्स कर
- 6:56सकता है? सोच यह है कि छात्र अपनी रुचि के
- 6:59हिसाब से अपना रास्ता खुद बनाएं।
- 7:01यह सुनने में तो बहुत ही अच्छा लगता है,
- 7:03लेकिन क्या यह व्यवहारिक है? क्या इससे
- 7:06ऐसे छात्र नहीं तैयार होंगे जिन्हें हर
- 7:08चीज के बारे में थोड़ा-थोड़ा पता हो, पर
- 7:10किसी भी चीज में गहराई ना हो? यह एक बहुत
- 7:12जायज चिंता है और इस नीति के सफल होने की
- 7:15सबसे बड़ी चुनौती भी यही है। इसे लागू
- 7:17करने के लिए स्कूलों को और शिक्षकों को
- 7:19बहुत लचीला होना पड़ेगा। लेकिन इसके पीछे
- 7:21की सोच यह है कि भविष्य में जो समस्याएं
- 7:24आएंगी वो किसी एक विषय के दायरे में नहीं
- 7:26होंगी। उन्हें सुलझाने के लिए अलग-अलग तरह
- 7:29की स्किल्स को जोड़ने की जरूरत होगी। और
- 7:31मूल्यांकन मतलब रिपोर्ट कार्ड बनाने का
- 7:33तरीका भी तो बदल रहा है। परख और 360°
- 7:36रिपोर्ट कार्ड की बात हो रही है।
- 7:38हां, परख को एक और परीक्षा बोर्ड की तरह
- 7:40मत देखिए। यह पूरी शिक्षा व्यवस्था का एक
- 7:43तरह से फिटनेस कोच है। इसका काम यह पता
- 7:46लगाना है कि सिस्टम में कहां कमी है और
- 7:48फिर उन कमियों को दूर करने के तरीके
- 7:50सुझाना है। और 360° रिपोर्ट आर्ट का मतलब
- 7:53है कि अब सिर्फ टीचर नहीं बताएंगे कि
- 7:55बच्चा कैसा है। बच्चा खुद अपना मूल्यांकन
- 7:57करेगा। उसके दोस्त करेंगे और टीचर भी
- 7:59करेंगे। यह तो स्कूल की बात हुई, लेकिन
- 8:01हायर एजुकेशन में भी एक बहुत बड़ी समस्या
- 8:04रही है। कई लोग किसी वजह से दूसरे साल में
- 8:06कॉलेज छोड़ देते थे और उनकी सारी मेहनत
- 8:08बेकार हो जाती थी। क्या नई नीति इसका कोई
- 8:11हल निकालती है?
- 8:12हां। और यह हायर एजुकेशन में इसका सबसे
- 8:15बड़ा और सबसे अच्छा सुधार है। इसे मल्टीपल
- 8:18एंट्री और एग्जिट सिस्टम कहते हैं। अब अगर
- 8:20कोई छात्र एक साल की पढ़ाई के बाद कॉलेज
- 8:23छोड़ता है तो उसे एक सर्टिफिकेट मिलेगा। 2
- 8:25साल बाद छोड़ता है तो डिप्लोमा, 3 साल पर
- 8:28डिग्री और चार साल पूरे करने पर रिसर्च के
- 8:31साथ डिग्री।
- 8:31और यह काम कैसे करेगा? क्या इन टुकड़ों को
- 8:34बाद में जोड़ा जा सकेगा?
- 8:35बिल्कुल। इसके लिए एक एकेडमिक बैंक ऑफ
- 8:38क्रेडिट यानी एबीसी बनाया जा रहा है। यह
- 8:41आपके बैंक अकाउंट जैसा ही है। बस इसमें
- 8:43पैसे की जगह आपके क्रेडिट पॉइंट्स जमा
- 8:45होंगे। आप 5 साल बाद भी वापस आकर किसी
- 8:47दूसरे कॉलेज में भी उन क्रेडिट्स का
- 8:49इस्तेमाल करके अपनी पढ़ाई वहीं से आगे
- 8:51बढ़ा सकते हैं। मतलब कोई भी मेहनत अब
- 8:53बेकार नहीं जाएगी। यह तो वाकई में एक बहुत
- 8:55बड़ा बदलाव है और सुना है कि यूजीसी,
- 8:58एआईसीटी जैसे दर्जनों रेगुलेटर की जगह अब
- 9:00एक ही बॉडी होगी।
- 9:02हां, मेडिकल और लॉ को छोड़कर बाकी पूरे
- 9:04हायर एजुकेशन के लिए एक ही संस्था होगी।
- 9:06एचईसीआई। उम्मीद है कि इससे लाल फीता शाही
- 9:08कम होगी और फैसले लेने में तेजी आएगी। साथ
- 9:11ही एमफिल की डिग्री को भी खत्म कर दिया
- 9:13गया है। अब मास्टर्स के बाद सीधे पीएचडी
- 9:15में दाखिला ले सकेंगे।
- 9:16तो कुल मिलाकर हमने देखा कि 1968 में एक
- 9:19आदर्शवादी सपना देखा गया। 1986 में उस
- 9:22सपने को एक ठोस ढांचे में ढालने की कोशिश
- 9:24हुई और 2020 में उस पूरे ढांचे को ही
- 9:2721वीं सदी के लिए नए सिरे से डिजाइन किया
- 9:30गया है।
- 9:30सही कहा हर नीति अपने समय का आईना थी।
- 9:33लेकिन एक सवाल है जो इन तीनों नीतियों को
- 9:36एक धागे में पिरोता है। वो है कारन्वयन
- 9:39यानी इंप्लीमेंटेशन की चुनौती। 1968 और
- 9:421986 की नीतियों के कई शानदार विचार जैसे
- 9:45जीडीपी का 6% खर्च या त्रिभाषा सूत्र जमीन
- 9:49पर पूरी तरह कभी नहीं उतर पाए। 2020 की
- 9:52नीति अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी नीति
- 9:54है। इसके लक्ष्य क्रांतिकारी हैं। अब
- 9:56सोचने वाली बात यह है कि क्या यह नीति
- 9:58कागज पर लिखे अपने वादों को हकीकत में बदल
- 10:00पाएगी? असली परीक्षा तो अब शुरू हुई है।
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