गांव का ₹0 बिजली वाला फ्रिज GAON KA DESI FRIDGE | HINDI KAHANIYA | HINDI STORIES | CARTOON | KAHANI — Transcript
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- 0:07सोनपुर बाजार की इस सड़क पर लस्सी और
- 0:10रबड़ी की दो दुकानें ठीक आमने-सामने थी।
- 0:13एक तरफ बनवारी लाया था तो दूसरी तरफ आकाश
- 0:17और दोनों के बीच हमेशा एक कड़ी लड़ाई चलती
- 0:20थी।
- 0:20आकाश मेरी अभी रूट के साथी कंडक्टर से बात
- 0:23हुई। बस किसी भी वक्त आती होगी। कुल्हड़
- 0:26और ग्लास फटाफट काउंटर पर सेट कर। मुसाफिर
- 0:29कड़ाके की धूप से बेहाल सीधे यहीं
- 0:32दौड़ेंगे। हां धीरज भाई बस तुम कुल्हड़
- 0:34गिनो जरा। मैं जल्दी से लस्सी लगाता हूं।
- 0:36हां थोड़ा जल्दी। हमारी बातें सुन-सुनकर
- 0:39सामने बनवारी लाल की छाती पर अभी से सांप
- 0:42लौटने लगा है।
- 0:43जब बनवारी ने धीरज को आकाश की तरफ इशारा
- 0:46करते देखा तो वो हड़बड़ा गया। वो खुद जाकर
- 0:50काउंटर पर ग्लास लगाने लगा और अपने ही
- 0:53आदमी संतू को काम में ढील देने के लिए
- 0:56फटकारने लगा।
- 0:57ओए संतू मरमर के काम करना बंद कर। हाथ
- 1:00जल्दी चला। अगर बस के सारे ग्राहक आकाश की
- 1:04दुकान पर चले गए ना तो तेरी पगार से पैसे
- 1:06काट लूंगा। हां। अरे कर तो रहे हैं मालिक।
- 1:09अब और कितनी जल्दी-जल्दी हाथ चलाएं। जितनी
- 1:12जल्दी जबान चलाता है उतनी जल्दी। कभी
- 1:14हॉर्न की आवाज के साथ धूल उड़ाती हुई बस
- 1:18बाजार में आके रुकती है। बस रुकते ही
- 1:21मुसाफिर अपनी प्यास बुझाने के लिए दोनों
- 1:24दुकानों की तरफ दौड़ पड़ते हैं।
- 1:26भाई जल्दी से एक गिलास बढ़िया ठंडी-ठंडी
- 1:28लस्सी पिलाओ। अभी लीजिए भाई एकदम मलाई मार
- 1:31के। आपकी थकान एक घूंट में गायब हो जाएगी।
- 1:34अरे वाह! लस्सी के साथ ये गाढ़ी रबड़ी भी।
- 1:38जरा एक प्लेट यह लगा देना। जी साहब सोनपुर
- 1:41बाजार में आए और हमारे यहां की रबड़ी नहीं
- 1:43खाई तो क्या खाया? ठीक है।
- 1:49आकाश के हाथ की रबड़ी मुंह में घुलते ही
- 1:52ग्राहक के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ
- 1:55जाती है।
- 1:55चलो आकाश भाई मेरा टाइम हो गया है। सवारी
- 1:58बैठ चुकी है। अब मैं निकलता हूं। यहां का
- 2:00मोर्चा अब तुम संभालो। लेकिन शाम को लौटते
- 2:03वक्त दुकान पर चक्कर जरूर मारना। रबड़ी
- 2:07बचा कर रखूंगा। ठीक है।
- 2:09धीरज पेशे से एक कंडक्टर है और आकाश का
- 2:12बहुत पक्का दोस्त है। वो ड्यूटी के
- 2:15साथ-साथ अपने दोस्त की दुकान जमाने में भी
- 2:18हमेशा मदद करता है। रात होते ही आकाश अपनी
- 2:22दुकान बढ़ाकर घर की ओर निकल पड़ता है और
- 2:26रात को वो जग्गू बर्फी लाकर गोदाम पर
- 2:29रुकता है।
- 2:29जग्गू भाई कल के लिए बर्फ का आर्डर थोड़ा
- 2:32बढ़ाना था। कल रविवार है। बाजार में भीड़
- 2:35ज्यादा होगी। इसलिए दो नहीं पूरी तीन
- 2:38सिल्लियां भिजवा देना। अरे भाई कल तीन
- 2:41सिल्ली तो क्या तुम्हें एक सिल्ली भी मिल
- 2:43जाए तो बहुत बड़ी बात समझो। एक सिल्ली
- 2:45क्यों भाई? ऐसा क्या हो गया? अरे क्या
- 2:48बताऊं? पीछे फैक्ट्री से माल कम आ रहा है।
- 2:51ऊपर से कल संडे है तो उनकी मशीन की
- 2:54सर्विसिंग भी है। अब मेरी मानो तो कल जैसे
- 2:57तैसे काम चला लो भाई। मैं मजबूर हूं।
- 2:59अच्छा कोई बात नहीं भाई। जो है वही भिजवा
- 3:02देना। एक दिन की तो बात है काम चला लेंगे।
- 3:06आकाश मायूस होकर वहां से हामी भरता है और
- 3:09आगे बढ़ जाता है। और उसके जाते ही अंदर से
- 3:13निकलकर बनवारी लाल मुस्कुराते हुए जग्गू
- 3:17के पास आ जाते हैं।
- 3:19बहुत बढ़िया जग्गू एकदम सटीक बहाना मारा।
- 3:22ये लो तुम्हारा इनाम। तुम फिकर मत करो
- 3:25बनवारी लाल। जग्गू बर्फीला का वादा है जब
- 3:28तक मेरी जेब गर्म रहेगी तुम्हारा माथा हम
- 3:31गर्म नहीं होने देंगे। बस कल का दिन संभाल
- 3:34ले भाई। इतवार की कड़क धूप में जब उसकी
- 3:37दुकान पर बर्फ नहीं होगी तो ग्राहक अपने
- 3:39आप दौड़कर मेरी दुकान पर आएंगे। गरम लस्सी
- 3:43तो कोई मुफ्त में भी नहीं पूछेगा।
- 3:45अगली सुबह रविवार के दिन आकाश दुकान खोलकर
- 3:50तैयारियों में जुट जाता है। बाजार में
- 3:52धीरे-धीरे भीड़ बढ़ने लगती है। लेकिन आकाश
- 3:56की आंखें बार-बार सड़क पर जग्गू बर्फीला
- 4:00की राह देख रही थी।
- 4:02देख संतू कैसे छटपटा रहा है। आज तो इसकी
- 4:05लस्सी का दही जमने से पहले ही खट्टा हो
- 4:08जाएगा। इतना दिमाग अपने धंधे में लगा
- 4:11लेते। आज सेठ अंबानी होते।
- 4:14तभी तो ग्राहक सीधे आकाश की दुकान की तरफ
- 4:17आते हैं।
- 4:18भाई जरा जल्दी से दो गिलास एकदम चिल्ड
- 4:20लस्सी लगाना। बड़ी तेज धूप है बाहर। जी
- 4:23भाई साहब अब बस थोड़ा सा रुकिए। बर्फ वाला
- 4:26आता ही होगा। थोड़ा सा मतलब कितनी देर?
- 4:29पता नहीं कब बर्फ वाला आएगा। कब तुम लस्सी
- 4:32दोगे।
- 4:33ये देखकर बनवारी लाल दूर से मजे लेते हुए
- 4:36मुस्कुराने [संगीत] लगता है। आकाश परेशान
- 4:39ही हो रहा था कि तभी धीरज कंधे पर ताट के
- 4:43बोड़े में लिपटी बर्फ की एक सिल्ली उठाए
- 4:46हां दुकान पर पहुंचता है।
- 4:49ये लो बर्फ। मेरे भाई, तुम कहां से यह
- 4:52बर्फ लेकर आए? तुम्हारा धन्यवाद हम किन
- 4:54शब्दों में करें? अरे धन्यवाद बाद में
- 4:57देना भाई। पहले इन ग्राहकों को ठंडी लस्सी
- 4:59पिलाओ। मैं बस स्टैंड की तरफ से आ रहा था।
- 5:02देखा जग्गू दुकान बंद करके कहीं गायब है।
- 5:06मुझे खटका हुआ तो भागकर बस स्टैंड वाली
- 5:09डेयरी से जैसे तैसे ये एक सिल्ली उठा
- 5:11लाया। इतनी जल्दी में बस यही एक जुगाड़ लग
- 5:14पाया। यह एक सिल्ली भी इस वक्त मेरे लिए
- 5:16सोने के बराबर है भाई। अरे अब तो लस्सी
- 5:19मिलेगी ना। हां हां बस मैं अभी लस्सी
- 5:22तैयार करता हूं।
- 5:23यह नजारा देख बनवारी लाल के चेहरे का रंग
- 5:26उड़ जाता है। वो गुस्से और जलन में तमतमा
- 5:30उठता है।
- 5:31हट तेरे जी। इस कंडक्टर को बीच में टांग
- 5:34अड़ाने की क्या जरूरत थी? अपनी कंडक्टर ही
- 5:37छोड़कर लस्सीमैन बनकर घूम रहा है। हम अब
- 5:40तो आपको तसल्ली हो गई ना मालिक। अरे
- 5:42ज्यादा तसल्ली मस्कल्ली करने की जरूरत
- 5:45नहीं है। जा और लाइनमैन को ढूंढ के ला।
- 5:47बोल बनवारी मालिक याद कर रहे हैं। ठीक है
- 5:50मालिक।
- 5:50दोपहर तक धीरज खिलाई बर्फ की इकलौती
- 5:54सिल्ली खत्म हो गई। बिना बर्फ के लस्सी
- 5:57बेचना मुमकिन नहीं था। इसलिए उदास मन से
- 6:00आकाश दुकान पर बड़बड़ा रहा था और फिर घर
- 6:04लौट आया। वहां उसे अपनी नई पड़ोसन गीता
- 6:08हाथ में नया मटका लिए बाजार से आती हुई
- 6:11दिखी।
- 6:12अरे गीता बाजार से आ रही हो?
- 6:14जी भैया। सविता काकी की तबीयत कैसी है अब?
- 6:18क्या बताऊं आकाश भैया? इस कड़कती गर्मी के
- 6:21चलते मां की तबीयत और बिगड़ गई है। डॉक्टर
- 6:24ने कहा है कि उन्हें बार-बार ठंडा पानी
- 6:26पट्टी के लिए और पीने के लिए दो। घर में
- 6:29फ्रिज तो है नहीं। इसलिए बाजार से यह नया
- 6:32मटका खरीद कर ला रही हूं ताकि कम से कम
- 6:34मां को थोड़ा सा ठंडा [संगीत] पानी तो मिल
- 6:36सके।
- 6:37यह ठीक किया तुमने। वाकई इस बार गर्मी तो
- 6:40सच में बहुत ज्यादा है।
- 6:42हां। और इस उमस और गर्मी से घर की
- 6:45सब्जियां और बचा कुचा खाना भी कुछ ही
- 6:47घंटों में सड़ने लगी है। समझ नहीं आता कि
- 6:50इस तपती गर्मी से घर की कब्जियों को कैसे
- 6:53बचाऊं। गीता की यह बातें सुनते ही आकाश
- 6:57सोच में डूब जाता है। रात के सन्नाटे में
- 7:01बनवारी लाल और लाइनमैन दबे पांव आकाश की
- 7:05दुकान के पास वाले बिजली के खंभे के पास
- 7:08पहुंचते हैं। देखो यही है आकाश का
- 7:11कनेक्शन। कटर निकालो और खट से उड़ा दो
- 7:14इसकी तार।
- 7:15अरे बनवारी भाई बिना किसी वजह के किसी का
- 7:18बिजली काटना तो ठीक नहीं है ना। कल को अगर
- 7:21जेई साहब को पता चल गया तो मेरी नौकरी
- 7:24दांव पर लग जाएगी।
- 7:25इस पर बनवारी लाल ने लाइनमैन को नोटों की
- 7:29गद्दी थमाई और कहा
- 7:31जेई साहब को मैं संभाल लूंगा। तुम बस अपना
- 7:34काम करो। बोल देना कि लोड ज्यादा होने की
- 7:37वजह से तार जल गया। कुछ दिन बाद आकर जोड़
- 7:41देना। तब तक इसका सारा दही मलाई सड़कर
- 7:44पानी हो जाएगा पानी। जब जेई साहब को आप
- 7:47संभाल ही रहे हैं तो फिर क्या सोचना? बस
- 7:50दो मिनट रुकिए
- 7:51और लाइनमैन तुरंत खंभे पे चढ़ जाता है और
- 7:55कटर से आकाश की दुकान का मुख्य तार काट
- 7:58देता है।
- 7:59रविवार को तो तू जैसे तैसे बच गया आकाश
- 8:02लेकिन कल सोमवार को जब तेरी दुकान की
- 8:04मथानी और पंखा दोनों बंद रहेंगे ना तब
- 8:07देखता हूं तेरी लस्सी और रबड़ी कौन खाने
- 8:10आएगा। अरे जानवर भी नहीं पूछेगा तुमको।
- 8:13हां। अगली सुबह आकाश रोज की तरह समय पर
- 8:18अपनी दुकान खोलता है। दुकान की साफ सफाई
- 8:22और भगवान के आगे दिया जलाने के बाद जैसे
- 8:25ही वो टेबल पर पंखे का बटन दबाता है तो
- 8:29पंखा नहीं चलता है।
- 8:30अरे यह पंखा क्यों नहीं चल रहा? ये बिजली
- 8:34वाली मथनी भी काम नहीं कर रही। अब बिजली
- 8:37को अचानक क्या हो गया? कल रात तक तो सब
- 8:39ठीक था। आकाश को परेशान देख बनवारी बड़े
- 8:44मजे से मुस्कुराता हुआ उसकी दुकान पर आता
- 8:47है।
- 8:48अरे क्या हुआ आकाश भाई?
- 8:50पता नहीं बनवारी भाई इस बिजली को क्या हो
- 8:52गया। मैं जब आ रहा था ना तो मेरी नजर खंभे
- 8:55पर पड़ी। तार टूटा पड़ा है वहां।
- 8:58ओह तब रात में शायद हवा पानी से या लोड
- 9:01ज्यादा होने से तार टूट गया होगा।
- 9:04बताओ जरा सुबह-सुबह ही दुकान की बत्ती गुल
- 9:07हो गई। अरे मथनी भी बंद है। अब तुम्हारे
- 9:09ग्राहक क्या पिएंगे? अब अब क्या करोगे?
- 9:13लाइनमैन को बुलाएंगे। अरे अब लाइनमैन का
- 9:15भी क्या भरोसा? वो सरकारी दामाद है। जब तक
- 9:19दो चार चक्कर नहीं काटोगे खंभे की तरफ
- 9:22देखेगा भी नहीं। अब हमारी मानो तो छोटे
- 9:25भाई आज दुकान बढ़ाओ और घर जाकर आराम कर।
- 9:28बिना बिजली के ये तुम्हारी मशीन तो कबाड़
- 9:31ही है। आज का धंधा तो समझो गया तुम्हारा।
- 9:34धंधा कैसे बंद कर दूं बनवारी भाई? नुकसान
- 9:37हो जाएगा। अब जब तक लाइन नहीं बन जाता तब
- 9:40तक हाथ से लस्सी बनाएंगे। ठीक है एक नंबर
- 9:43का। चाहे पैर खींच लो या हाथ। हार मानने
- 9:46को तैयार ही नहीं होता।
- 9:48दोपहर की कड़कती धूप में आकाश पसीने से
- 9:52तर-बतर होकर हाथ से ही मथाने चला रहा था।
- 9:56दुकान पर खड़े तीन चाय ग्राहक गर्मी से
- 10:00बेहाल होकर पसीना पोंछ [संगीत] रहे थे।
- 10:03अरे यार थोड़ा जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ यार।
- 10:06इस कड़ती धूप में खड़े-खड़े जान निकली जा
- 10:08रही है। थोड़ा फुर्ती दिखाओ। बस भैया दो
- 10:11मिनट बस तैयार ही हो रहा है। बिजली कटी है
- 10:14ना इसलिए हाथ से मथने में थोड़ा समय लग
- 10:16रहा है।
- 10:17आकाश जैसे तैसे हाथ से लस्सी तैयार करता
- 10:20है और कुल्हड़ भड़कर ग्राहक की तरफ बढ़ाता
- 10:23है।
- 10:24अरे ये क्या पिला रहे हो? यह लस्सी तो
- 10:27बिल्कुल ठंडी ही नहीं है। एकदम गुनगुनी लग
- 10:30रही है। भाई साहब वो आज बर्फ नहीं मिल पाई
- 10:34और ऊपर से बिजली भी कटी है। तो जब बर्फ और
- 10:37बिजली कुछ है ही नहीं तो दुकान काहे खोल
- 10:39रखे हो? इस तपती दोपहर में कोई गर्म लस्सी
- 10:42पीने थोड़े ही आएगा। चलो भाई यहां तो
- 10:45मट्ठा मिल रहा है। बनवारी की दुकान पर ही
- 10:48चलते हैं। वहां कम से कम लस्सी तो ठंडी
- 10:50मिलेगी। ग्राहक नाराज होकर दुकान से चले
- 10:54जाते हैं। ग्राहकों के जाने के बाद आकाश
- 10:57उदास मन से दुकान बढ़ा देता है। घर लौटते
- 11:01वक्त रास्ते में उसकी नजर एक पेड़ के नीचे
- 11:05बने निशुल्क प्याव पर पड़ती है। जहां
- 11:09मिट्टी के घरों पर जूट की गीली बोरिया
- 11:12लिपटी हुई थी। तभी एक बूढ़ा आदमी अपने
- 11:16कबाड़ का ठेला लेकर प्याऊ के पास रुकता
- 11:19है।
- 11:20आहा धन्य हो जिसने भी यह प्याऊ लगाया है।
- 11:24बाहर इतनी आग बरस रही है। पर इस गीली बोरी
- 11:28के जादू से मटके का पानी एकदम बर्फ जैसा
- 11:32ठंडा है। आ कलेजा तृप्त हो गया। बूढ़े
- 11:36आदमी की बात सुनते ही आकाश वही ठिटक जाता
- 11:40है। मटके पर लिपटी गीली बोरी को देखते ही
- 11:44अचानक उसके दिमाग में एक बत्ती जल जाती
- 11:47है।
- 11:48मटके पर लिपटी गीली बोरी बाहर से गर्म हवा
- 11:52और अंदर का पानी एकदम ठंडा। अरे भाई अगर
- 11:56विज्ञान का यह नियम मटके के पानी को ठंडा
- 11:58रख सकता है तो वो मेरी दुकान के दही को
- 12:01क्यों नहीं बचा सकता? मिल गया रास्ता।
- 12:03बूढ़ा आदमी अपना ठेला संभालते हुए आगे
- 12:07बढ़ने लगता है।
- 12:08बाबा ओ बाबा जरा रुकना। यह साइकिल के
- 12:12दोनों पुराने पहिए मुझे दे दो।
- 12:14बेटा यह पहिया किसी काम का नहीं है। तुम
- 12:18इन कबाड़ के लोहे के पहियों का क्या
- 12:20करोगे? बाबा यह कबाड़ नहीं काम की चीज है।
- 12:24आप ये लो पैसे और ये दोनों पहिए मुझे दे
- 12:26दो। और सुनो तुम्हारे पास टाट की दो-चार
- 12:30खाली बोरियां होंगी क्या? आकाश टाट की
- 12:33बोिया और साइकिल की पहियां खरीद कर घर आता
- 12:37है। रात होते ही आकाश अपने घर के आंगन में
- 12:42धीरज के साथ मिलकर जुगाड़ का सामान इकट्ठा
- 12:45करता है। लालटेन की रोशनी में दोनों दोस्त
- 12:49पूरी शिद्दत के साथ काम में जुटे हुए थे।
- 12:52यह दो पहिए, यह बांस के डंडे इन सबको
- 12:56जोड़कर तुम फ्रिज कैसे बनाओगे यार? मेरी
- 12:58तो बुद्धि काम नहीं कर रही। धीरज भाई सब
- 13:01विज्ञान का खेल है। देखो, सबसे पहले इस एक
- 13:04पहिए को नीचे जमीन पर रखेंगे आधार के लिए
- 13:08और दूसरे पहिए को ऊपर का ढांचा बनाने के
- 13:11लिए। फिर इन दोनों पहियों के बीच में यह
- 13:14चार मजबूत बांस के डंडे खड़े कर देंगे। बस
- 13:17हमारा गोल फ्रिज का ढांचा तैयार हो जाएगा।
- 13:19दोनों दोस्त मिलकर फटाफट बांस के डंडों को
- 13:23पहियों से कस कर बांधते हैं। और देखते ही
- 13:26देखते फ्रिज का गोल ढांचा भी खड़ा हो जाता
- 13:30है। इसके बाद आकाश मोटी टाट की बोड़ियों
- 13:34को चारों तरफ से लपेट देता है। फिर वो
- 13:37बोड़ियों और अंदर वाले हिस्से के बीच की
- 13:41रेत भरने लगता है।
- 13:43अरे वाह ढांचा तो फर्स्ट क्लास बन गया
- 13:45भाई। लेकिन यह ठंडा कैसे होगा? क्या इसमें
- 13:49बर्फ भरेंगे? ना भाई ना। बर्फ का झंझट ही
- 13:52खत्म। इस ढांचे के सबसे ऊपर हम पानी से
- 13:55भरा मिट्टी का मटका रखेंगे। मटके के नीचे
- 13:58छोटा सा छेद करके अस्पताल वाली ग्लूकोज
- 14:00ड्रिप की नली लगा देंगे। जिससे पानी 24ों
- 14:03घंटे बूंदबूंद करके इस डांट पर गिरता
- 14:05रहेगा।
- 14:06आकाश फिर ड्रिप की नली के नीचे पतली सूती
- 14:09रस्सियां बांध देता है। जिससे [संगीत]
- 14:12पानी पूरे टाट में बराबर फैलने लगता है और
- 14:16सारी बोरी हमेशा गीली बनी रहती है।
- 14:19लेकिन यार सिर्फ गीली बोरी और रेत से
- 14:22चीजें ठंडी कैसे होंगी? भाधीज यही तो असली
- 14:25विज्ञान है। जब बाहर की सूखी हवा इस गीली
- 14:28टाट से टकराएगी तो टाट का पानी धीरे-धीरे
- 14:31भाप बनकर उड़ने लगेगा। पानी को उड़ने के
- 14:34लिए गर्मी चाहिए होती है। इसलिए वो इस
- 14:36पूरे ढांचे की गर्मी अपने साथ खींच लेगा।
- 14:40बस इसी वजह से अंदर ठंडक पैदा होगी और यह
- 14:43गीली रेत उस ठंडक को काफी देर तक संभाल कर
- 14:47रखेगी। ओहो मतलब बिना बिजली के भी अंदर का
- 14:50सामान ठंडा रहेगा। बिल्कुल। इसलिए इस देसी
- 14:53फ्रिज को छांव और हवादार जगह पर रखेंगे।
- 14:56इसमें सामान रखने के लिए लकड़ी के पटरे,
- 15:00पतले बांस और टूटी चारपाई की रस्सियों से
- 15:03मैं दो मंजिला रैक बनाऊंगा। इसकी रस्सियों
- 15:06वाली जाली से ठंडी हवा पूरे फ्रिज में
- 15:09घूमेगी। जिससे इसमें रखी सब्जियां, फल,
- 15:12दही और लस्सी लंबे समय तक एकदम ताजा और
- 15:17ठंडी रहेगी। वाह मेरे भाई, मान गए
- 15:20तुम्हारी खोपड़ी को। यह तो सचमुच का गांव
- 15:22का देसी फ्रिज बन गया। इसका सबसे पहले
- 15:25इस्तेमाल तुम कल अपनी दुकान पर करना और
- 15:28अपने ग्राहकों को ठंडी लस्सी और रबड़ी
- 15:31देना।
- 15:31अब आकाश की दुकान पर अनोखा गांव का देसी
- 15:35फ्रिज रखा हुआ था। फ्रिज के अंदर मिट्टी
- 15:39के [संगीत] बर्तनों में दही, ठंडी लस्सी
- 15:42और रबड़ी सजी हुई थी।
- 15:44आहा मजा आ गया आकाश भाई। लस्सी हो तो ऐसी।
- 15:48इस कड़कती धूप में कलेजा एकदम ठंडा हो
- 15:50गया। और यह रबड़ी देखो यार, एकदम गाढ़ी और
- 15:53ठंडी-ठंडी। कल तो तुम्हारी लस्सी गुनगुनी
- 15:56लग रही थी। आज अचानक ऐसा क्या जादू कर
- 15:59दिया। हां, दुकान में ना बिजली है ना कहीं
- 16:02बर्फ दिख रही है। यह सब इस देसी फ्रिज का
- 16:05कमाल है। बिना बिजली और बिना बर्फ के यह
- 16:08मेरी लस्सी और रबड़ी को एकदम मलाईदार और
- 16:11ठंडा रखता है।
- 16:12आकाश की दुकान पर भीड़ देख गांव के मुखिया
- 16:17चौधरी जी भी वहां आकर रुके।
- 16:19क्या बात है भाई? इतनी भीड़। मुखिया जी
- 16:23यहां इतनी भीड़ इस देसी फ्रिज की लस्सी
- 16:25पीने के लिए लगी है।
- 16:27अच्छा तो हमने क्या गुनाह किया है भाई?
- 16:30अरे हमें भी पिलाओ।
- 16:32मुखिया जी ने जैसे ही लस्सी का एक घूंट
- 16:35पिया उनके तो मानो पढ़े निकल आए हो।
- 16:38मान गए भाई। शहर का महंगा फ्रिज भी इसके
- 16:41आगे फेल है। इसमें रखी लस्सी का स्वाद तो
- 16:45एकदम सौंधा और गजब का आ रहा है। जरा एक
- 16:49कुल्हड़ और लगाना आकाश। देखते ही देखते
- 16:53आकाश का देसी फ्रिज पूरे सोनपुर में मशहूर
- 16:57हो गया। अपनी दुकान खाली देख बनवारी लाल
- 17:01जलन से पागल हो गया था। इसलिए उसी दोपहर
- 17:06जैसे ही आकाश 2 मिनट के लिए दुकान से हटा
- 17:10बनवारी अपने नौकर संतू के साथ दबे पांव
- 17:14वहां पहुंच जाता है।
- 17:16याद रखना संतू हाथ साफ होना चाहिए। किसी
- 17:20को रत्ती भर भी भनक ना लगे ताकि जब यह फटे
- 17:23तो पूरे गांव को यही लगना चाहिए कि इस
- 17:26आकाश का कबाड़ वाला जुगाड़ ही जानलेवा था।
- 17:30चिंता मत करिए मालिक यह केमिकल और चूना
- 17:32जैसे ही मटके के पानी में मिलेगा गैस का
- 17:35गुब्बारा बन जाएगा। पर [संगीत] मालिक कहीं
- 17:38हम भी लपेटे में ना आ जाए। साले अभी नहीं
- 17:41फटेगा। तू बस चुपचाप मटके की ड्रिप वाली
- 17:44नली खोल और यह मसाला अंदर डाल। संतू दबे
- 17:48पांव ब्रिज के पास जाता है। वो मटके का
- 17:51ढक्कन हटाकर पूिया का पाउडर पानी में पलट
- 17:54देता है। फिर ग्लूकोस [संगीत]
- 17:56ड्रिप की नाली के बल्ब को पूरी तरह बंद कर
- 18:00देता है ताकि मटके [संगीत] के अंदर की हवा
- 18:03बाहर ना निकल सके और दबाव बढ़ता रहे।
- 18:07अब होगा धमाका कुछ ही देर में। आए बड़े
- 18:10सत्यानाशिष्ट बनने। वो साइंटिस्ट होता है
- 18:13मालिक। अरे नहीं रे। यह सत्यानासिस्ट ही
- 18:17है। मेरे धंधे का सत्यानाश करने आया है।
- 18:20धीरे-धीरे मटके के अंदर बंद गैस धूप की
- 18:24गर्मी पाकर तेजी से फैलने लगती है और
- 18:27मिट्टी का मटका अंदरूनी दवाओं से थरथराने
- 18:30[संगीत]
- 18:31लगता है। तभी अचानक एक जोरदार धमाके के
- 18:35साथ मिट्टी का मटका चिथरे चिथरे होकर हवा
- 18:39में उड़ गया। पास के घरों से लोग चौंक कर
- 18:42बाहर आने लगे। अरे मोरी मैया बिजली का
- 18:46ट्रांसफार्मर उड़ गया क्या?
- 18:48अरे ये तो आकाश का फ्रिज फटा है। अरे बाप
- 18:52रे बाप देखो कैसे परखच्चे उड़ गए। अरे सब
- 18:55लोग दूर हटो भैया। कहीं कोई और बला ना फट
- 18:58जाए।
- 18:59दुकान पर भीड़ देखकर आकाश दौड़ते हुए
- 19:02दुकान पर आया।
- 19:04देखा लिया आप सब ने। बिना पढ़े लिखे
- 19:07विज्ञान का ऐसा खतरनाक प्रयोग करने से
- 19:10क्या होता है? हैं? यह कलमुहा पूरे गांव
- 19:13को ले डूबेगा।
- 19:15हां मालिक आज तो सिर्फ मटका फटा है। कल को
- 19:18पूरी दुकान उड़ जाती तो क्या होता? ऐसे
- 19:21जानलेवा खिलवाड़ को गांव में बर्दाश्त
- 19:23नहीं किया जाना चाहिए।
- 19:25आकाश जैसे हक्का-बक्का रह गया और मटके के
- 19:29टुकड़ों और बिखरी हुई गीली रेत को देखने
- 19:32लगा। उसकी आंखों में आंसू थे। उसे समझ
- 19:36नहीं आ रहा था कि जिस विज्ञान पर उसे इतना
- 19:39भरोसा था, वो ऐसे कैसे फेल हो गया।
- 19:43ऐसा कैसे हो सकता है? मटके में गैस कैसे
- 19:46बन सकती है? यह तो नामुमकिन है।
- 19:48बनवारी के भड़काई बातों में आकर डरे हुए
- 19:52गांव वाले धीरे-धीरे वहां से चले जाते
- 19:55हैं। तभी बदहवाज हालत में दौड़ता हुआ धीरज
- 19:59वहां पहुंचता है।
- 20:01आकाश ये क्या सुन रहा हूं मैं? मटका फट
- 20:04गया। कैसे भाई? पता नहीं धीरज भाई।
- 20:07विज्ञान का जो नियम सदियों से काम कर रहा
- 20:09था वो आज अचानक बम कैसे बन गया? मेरी समझ
- 20:13से बाहर है। अरे हट विज्ञान कभी झूठ नहीं
- 20:16बोलता। मिट्टी का मटका और पानी चाहे कितनी
- 20:19भी धूप हो कभी ब्लास्ट नहीं कर सकते।
- 20:22इसमें पक्का कोई झोल है।
- 20:24धीरज बिखरे हुए मलबे की बारीकी से जांच
- 20:27करने लगता है। अचानक उसकी उंगलियों में
- 20:30कुछ सफेद गाढ़ा पाउडर लग जाता है। वो उसे
- 20:34सूंघता है और फिर जीभ पर चखता है।
- 20:38चूना और यह अजीब सी गंध यह तो वही तेज
- 20:43केमिकल है जो लोग अपनी दुकान के चूहे
- 20:45मारने के लिए लाते हैं। और और यह देखो
- 20:48ड्रिप की नली का वाल्व जानबूझकर पूरा बंद
- 20:51किया गया है। इसका मतलब यह किसी ने
- 20:53जानबूझकर किया है। यह काम बस एक ही आदमी
- 20:56कर सकता है। रुक आज इसकी लंका मैं खुद
- 20:59ढहाऊंगा। तुम बस मेरे साथ चौधरी जी के घर
- 21:02चलो। थोड़ी ही देर में धीरज और आकाश गांव
- 21:06के मुखिया चौधरी जी को साथ लेकर बनवारी के
- 21:10दुकान पर धमकते हैं।
- 21:12अरे चौधरी जी बाल आ गई। अच्छा हुआ आप आ
- 21:15गए। इस आकाश की दुकान तो अब हमेशा के लिए
- 21:19बंद ही करवा दीजिए। हां। अबे ओए बनवारी
- 21:22दुकान आकाश की नहीं तुम्हारी बंद होगी। हम
- 21:25सब जानते हैं कि तुमने ही आकाश के फ्रिज
- 21:28वाले मटके में चू चुना और केमिकल मिलाया
- 21:30था ताकि गैस के दबाव से वो फट जाए। अरे
- 21:33अरे सबूत क्या है तुम्हारे पास? कुछ भी
- 21:36अंड बक रहे हो। बिना सबूत के इल्जाम लगाया
- 21:39ना तो मानहानि का केस ठोक दूंगा। हां। हम
- 21:42सबूत लाए हैं बनवारी लाल।
- 21:44बनवारी के पैरों तले जमीन खिसक जाती है।
- 21:48जब उसने लाइनमैन को सिर झुकाए खड़ा देखा।
- 21:51पूरे गांव की लाइन ठीक है तो सिर्फ आकाश
- 21:54के दुकान की तार कैसे टूट गई? लाइनमैन ने
- 21:57सब उगल दिया कि तुमने पैसे देकर आकाश की
- 22:00दुकान का मुख्य तार कटवाया था और यह चूने
- 22:04और केमिकल का इंतजाम भी तुमने इससे ही
- 22:06करवाया है। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई
- 22:09चौधरी जी। इस बनवारी लाल ने ही मुझसे यह
- 22:12सब करने को कहा था ताकि आकाश भाई का धंधा
- 22:14ठप हो जाए। बनवारी लाल तुमने एक निर्दोष
- 22:18का धंधा बर्बाद करने की साजिश रची। सरकारी
- 22:21संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और पूरे गांव
- 22:24की जान खतरे में डाली। हमारी पंचायत का
- 22:27फैसला है कि आकाश की दुकान का जितना भी
- 22:30नुकसान हुआ है उसकी पाई-पाई तुम अपनी जेब
- 22:33से भरोगे और आज के आज तुम पुलिस के हवाले
- 22:37किए जाओगे।
- 22:38अरे नहीं चौधरी जी अब अनर्थ हो जाएगा।
- 22:40मुझे पुलिस के हवाले मत कीजिए। मुझसे
- 22:43[हंसी] बहुत बड़ी भूल हो गई। सच्चाई अब
- 22:47[संगीत] सामने आते ही आकाश पर सबका भरोसा
- 22:50और बढ़ गया। उसने दुकान पर नया देसी फ्रिज
- 22:55लगाया। जहां अब ठंडी लस्सी रबड़ी तो मिल
- 22:59ही रही थी। साथ ही गांव वाले आकाश को अपने
- 23:03लिए ऐसा फ्रिज बनाने का आर्डर भी देने
- 23:06लगे। सविता जी और गीता अपने घर के आंगन
- 23:09में बैठी थी। तभी आकाश और धीरज मुस्कुराते
- 23:13हुए एक देसी फ्रिज उठाए वहां पहुंचते हैं।
- 23:17आकाश भाई ये सब क्या है?
- 23:20ये तुम्हारे लिए एक छोटा सा तोहफा है
- 23:22गीता।
- 23:22शुक्रिया आकाश भैया। अच्छा इसके कितने
- 23:25पैसे हुए?
- 23:26मुझे पैसे [संगीत] नहीं चाहिए। इसे अपने
- 23:28भाई की तरफ से आशीर्वाद समझो।
- 23:31जीते रहो मेरे बच्चे। भगवान तुम्हारी इस
- 23:35नेक सोच को हमेशा तरक्की दे। आकाश ने
- 23:38[संगीत] साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत
- 23:41हो तो इंसान पूरे समाज की तस्वीर बदल सकता
- 23:45है। तो दोस्तों कहानी यहीं समाप्त होती
- 23:49है। अब जल्दी से कमेंट बॉक्स में जवाब
- 23:51दीजिए कि आकाश को देसी फ्रश बनाने की
- 23:54प्रेरणा कहां से मिली?
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